रविवार, 8 मार्च 2026

भगवद् भाव कैसें बढ़े ? p1 - संध्या सत्संग - 04-03-2026 सुबह

 


भगवद् भाव कैसें बढ़े ? p1 - संध्या सत्संग - 04-03-2026 सुबह


  

TIME STAMP INDEX   

0:00 (bhajan) वहव्  ज्ञान तपसा  मद्भावमागताः
0:15 (shlok arth) राग भय और क्रोध से मुक्त होकर भगवान को प्राप्त होना
0:32 (vyakhya) सच्चा साधक कैसा होता है
0:48 (vyakhya) श्लोक का गहरा अर्थ
1:13 (vyakhya) भगवान के आश्रित होने का वास्तविक अर्थ
1:45 (vyakhya) ज्ञानमय तप की महिमा
2:01 (vyakhya) योग और ज्ञानयोग का अंतर
2:24 (prasang) गौतम से गौतम बुद्ध बनने की कथा
2:45 (vyakhya) स्थूल सूक्ष्म कारण शरीर से परे शिवस्वभाव की प्राप्ति
3:13 (drishtant) लहर और सागर का उदाहरण
3:44 (shlok vyakhya) मम वंशो जीव लोके
4:03 (vyakhya) चेतन और जड़ का अंतर
4:31 (vyakhya) मनुष्य की गलत पहचान
5:10 (vyakhya) ज्ञान योग से पवित्र साधक
5:27 (drishtant) बालक के राग का उदाहरण
6:01 (vyakhya) मुनियों की वाणी की शक्ति
6:12 (shlok path) वितराग भय क्रोध मनमया मामुपाश्रिताः
6:33 (vyakhya) राग भय क्रोध का अर्थ
6:48 (vyakhya) राग कैसे उत्पन्न होता है
7:15 (vyakhya) विघ्न से क्रोध और भय
7:34 (vyakhya) धन मान प्रतिष्ठा खोने का भय
7:57 (vyakhya) नश्वर पदार्थों में आसक्ति दुख का कारण
8:14 (vyakhya) परिवर्तनशील वस्तुओं को पकड़ने की भूल
8:37 (vyakhya) सबको एक दिन सब छोड़ना पड़ता है
9:12 (shlok vyakhya) अज्ञान से ढका हुआ ज्ञान
9:37 (vyakhya) त्याग करने पर भी मनमय न होने की भूल
10:27 (updesh) साधक के लिए दो मुख्य साधन
11:10 (updesh) नश्वर को नश्वर मानना और शाश्वत को अपना मानना
11:27 (kirtan) नारायण नारायण जप
11:53 (vyakhya) भगवान जहां ठहरे वहां ठहरना
12:08 (vyakhya) संत और शास्त्र क्या छीनना चाहते हैं
12:39 (updesh) भगवान को पराया मानकर भजन करने की भूल
13:11 (vyakhya) गीता अध्याय 4 श्लोक 10 की शिक्षा
13:36 (updesh) दुख भय क्रोध का निरीक्षण
14:10 (drishtant) गाड़ी में बैठने का उदाहरण
14:31 (drishtant) अपने गांव जाने वाली गाड़ी का उदाहरण
15:01 (vyakhya) असली घर कौन सा है
15:49 (vyakhya) आत्मज्ञान ही थकान मिटाने का स्थान
16:05 (prasang) योग वशिष्ठ का प्रसंग
16:23 (vyakhya) यज्ञ हवन से भी पूर्ण मुक्ति नहीं

17:03 (vyakhya) बाहर की वस्तुओं से मनुष्य सदा बंधा नहीं रह सकता
17:12 (drishtant) स्वप्न का उदाहरण देकर संसार की अस्थिरता समझाना
17:36 (vyakhya) स्वप्न में दिखने वाली वस्तुओं की अस्थायी स्थिति
17:52 (vyakhya) स्वप्न और स्वप्न के पात्रों की अस्थिरता
18:06 (drishtant) स्वप्न में दिखने वाले बाजार और लोगों का उदाहरण
18:46 (vyakhya) संसार को ब्रह्मा के स्वप्न के समान समझाना
19:09 (vyakhya) जगत की नश्वरता का वर्णन
19:40 (drishtant) राजाओं और बड़े लोगों की अस्थिर स्थिति
20:06 (vyakhya) समय के साथ सब घटनाओं का स्वप्न हो जाना
20:37 (vyakhya) समय की धारा में सब चेष्टाओं का बह जाना
20:55 (updesh) बीती हुई बातों को छोड़ने की शिक्षा
21:07 (updesh) लाभ हानि मान अपमान में समता
21:22 (drishtant) कांटा निकालने का उदाहरण
21:39 (vyakhya) विवेक से ज्ञानमय तप की प्राप्ति
21:52 (vyakhya) श्रीकृष्ण भाव की प्राप्ति का अर्थ
22:08 (vyakhya) जो स्वयं में स्थित नहीं वह दूसरों को मार्ग नहीं दे सकता
22:16 (shlok path) वितराग भय क्रोध मनमया मामुपाश्रिताः
22:30 (vyakhya) भगवान के परायण होने का अर्थ
23:02 (vyakhya) वस्तुओं का उपयोग करना लेकिन उनमें आश्रय न लेना
23:19 (vyakhya) जन्म से पहले और मृत्यु के बाद आत्मा का अस्तित्व
23:36 (vyakhya) आत्मा में स्थित होकर व्यवहार करना
23:46 (vyakhya) वस्तुओं को न पकड़ना न छोड़ना केवल उपयोग करना
24:12 (vyakhya) घर और धन में आसक्ति से भय उत्पन्न होना
24:29 (prasang) जीवनमुक्त महापुरुष और डाकुओं का प्रसंग
25:07 (prasang) महापुरुष का वैराग्य और निर्भयता
25:38 (prasang) बाबा का नाचना और नफे की बात
26:04 (prasang) लंगोटी बचने को भी नफा मानना
26:29 (prasang) प्रेम से डाकू का परिवर्तन
26:44 (vyakhya) जो स्वयं में संतुष्ट है उस पर सब प्रसन्न होते हैं
27:02 (kirtan) नारायण नारायण का स्मरण
27:20 (shlok path) वितराग भय क्रोध मनमया मामुपाश्रिताः पुनः उच्चारण
27:37 (vyakhya) राग भय और क्रोध का कारण
28:08 (drishtant) फूल मिलने और उससे आसक्ति होने का उदाहरण
28:25 (updesh) मिला तो ठीक नहीं मिला तो भी ठीक
28:33 (vyakhya) आदर्श भोगता और मूढ़ भोगता का अंतर
29:01 (vyakhya) भोगों के पीछे भागने और भोगों के आने का अंतर
29:14 (drishtant) जनक कबीर और कृष्ण का उदाहरण
29:36 (drishtant) छाया पकड़ने का उदाहरण
29:51 (drishtant) सूर्य की ओर चलने पर छाया पीछे आने का उदाहरण
30:07 (vyakhya) बाहरी सुख पकड़ने की चेष्टा का परिणाम

 इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:  

0:00 (bhajan) वह ज्ञान तपसा ज्ञान तपसा का भाव यह है कि ज्ञान रूपी तप के द्वारा साधक पवित्र होकर भगवान के भाव को प्राप्त होता है।

0:08 (shlok path) मद्भावमागताः का अर्थ है कि साधक अंत में भगवान के ही स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

0:15 (shlok arth) जिनके राग भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं और जो भगवान के ही आश्रित रहते हैं वे ज्ञान रूप तप से पवित्र होकर भगवान के भाव को प्राप्त होते हैं।

0:32 (vyakhya) सच्चा साधक वह है जिसके भीतर ज्ञान विवेक जागृत हो जाए और जो बाहर की वस्तुओं में उलझकर भी भीतर सबमें एक परमात्मा को देखे।

0:48 (vyakhya) इस श्लोक का गहरा अर्थ यह है कि साधक को अपने भीतर के राग भय और क्रोध को समाप्त करना होगा तभी वह भगवत भाव को प्राप्त कर सकता है।

1:13 (vyakhya) भगवान के आश्रित होने का अर्थ केवल मंदिर में जाकर पूजा करना नहीं है बल्कि अपने भीतर के आत्मस्वरूप में स्थित होना ही भगवान का आश्रय लेना है।

1:45 (vyakhya) ज्ञानमय तप सबसे बड़ा तप है क्योंकि ज्ञान से मनुष्य का अज्ञान मिटता है और वही उसे परम सत्य तक पहुंचाता है।

2:01 (vyakhya) योग की दृष्टि से एकाग्रता बड़ा तप है लेकिन जहां पतंजलि योग समाप्त होता है वहीं से ज्ञानयोग का आरंभ होता है।

2:24 (prasang) कहा जाता है कि गौतम ने वर्षों तक क्रिया योग की साधनाएं कीं और जब विवेक जागा तो वे केवल गौतम नहीं रहे बल्कि भगवान बुद्ध बन गए।

2:45 (vyakhya) जब साधक स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर से अपना संबंध तोड़ देता है तब वह अपने शिवस्वभाव को प्राप्त कर लेता है।

3:13 (drishtant) जैसे कोई लहर सागर में मिल जाए तो सागर ही बन जाती है वैसे ही साधक जब ज्ञान प्राप्त करता है तो भगवान के भाव को प्राप्त हो जाता है।

3:44 (shlok vyakhya) गीता में कहा गया है मम वंशो जीव लोके जीवभूत सनातन अर्थात जीव भगवान का ही अंश है और वह चेतन स्वरूप है।

4:03 (vyakhya) जड़ पदार्थ अपने अस्तित्व को नहीं जानते लेकिन मनुष्य में चेतना है इसलिए वह मैं हूं ऐसा अनुभव करता है।

4:31 (vyakhya) मनुष्य शरीर मन बुद्धि और संस्कारों को मिलाकर अपने को मान लेता है जबकि उसका वास्तविक स्वरूप चेतन आत्मा है।

5:10 (vyakhya) जो साधक ज्ञानयोग रूपी तप से पवित्र हो जाता है वही भगवत भाव को प्राप्त करता है।

5:27 (drishtant) बालक का राग सुशुप्त होता है इसलिए वह सरल और निश्चिंत लगता है और उसे देखकर माता पिता की थकान मिट जाती है।

6:01 (vyakhya) जिन मुनियों का राग भय और क्रोध समाप्त हो गया है उनकी वाणी साधकों के जन्म मरण की थकान मिटाने की शक्ति रखती है।

6:12 (shlok path) वितराग भय क्रोध मनमया मामुपाश्रिताः यह गीता का श्लोक साधक को राग भय और क्रोध से मुक्त होने की प्रेरणा देता है।

6:33 (vyakhya) वितराग का अर्थ है जिसके भीतर राग भय और क्रोध समाप्त हो गए हों।

6:48 (vyakhya) राग नश्वर वस्तुओं में आसक्ति करने से उत्पन्न होता है।

7:15 (vyakhya) जब कोई व्यक्ति हमारी इच्छा में विघ्न डालता है तो यदि वह छोटा है तो उस पर क्रोध आता है और यदि बड़ा है तो उससे भय उत्पन्न होता है।

7:34 (vyakhya) धन मान प्रतिष्ठा और वैभव खोने का भय भी मनुष्य को लगातार परेशान करता रहता है।

7:57 (vyakhya) वास्तव में राग भय और क्रोध का मूल कारण नश्वर पदार्थों और नश्वर संबंधों में आसक्ति है।

8:14 (vyakhya) संसार के सभी दुखों का कारण यही है कि मनुष्य परिवर्तनशील वस्तुओं को स्थायी समझकर पकड़ना चाहता है।

8:37 (vyakhya) संसार में कोई भी ऐसा नहीं हुआ जो धन शरीर या सत्ता को सदा के लिए संभाल कर ले गया हो।

9:12 (shlok vyakhya) अज्ञान से ज्ञान ढक जाता है और इसी कारण जीव मोह में पड़ जाता है।

9:37 (vyakhya) कई लोग नश्वर वस्तुओं को छोड़कर साधु बन जाते हैं लेकिन यदि मन भगवान में स्थित नहीं हुआ तो त्याग का अहंकार रह जाता है।

10:27 (updesh) साधक को दो ही काम करने हैं पहला नश्वर वस्तुओं से आसक्ति हटाना और दूसरा शाश्वत आत्मस्वरूप में प्रेम करना।

11:10 (updesh) यदि मनुष्य नश्वर को नश्वर समझ ले और शाश्वत को अपना स्वरूप जान ले तो उसका जीवन सफल हो सकता है।

11:27 (kirtan) नारायण नारायण का स्मरण करने से मन शुद्ध होता है और साधक भगवान के निकट पहुंचता है।

11:53 (vyakhya) भगवान जहां स्थित हैं वहीं मन को स्थिर कर देना ही सच्ची साधना है।

12:08 (vyakhya) संत और शास्त्र हमसे कुछ छीनना नहीं चाहते बल्कि वे केवल अज्ञान और गलत आसक्ति को दूर करना चाहते हैं।

12:39 (updesh) यदि भगवान को पराया मानकर भजन करेंगे तो भजन में पूर्णता नहीं आएगी।

13:11 (vyakhya) भगवद्गीता के चौथे अध्याय का दसवां श्लोक हमें राग भय और क्रोध से मुक्त होकर भगवान की शरण में जाने की शिक्षा देता है।

13:36 (updesh) जब भी दुख भय या क्रोध आए तो उसके कारण को भीतर खोजकर देखना चाहिए।

14:10 (drishtant) बिना सोचे समझे किसी भी गाड़ी में बैठ जाना ठीक नहीं है पहले देखना चाहिए कि वह गाड़ी हमें कहां ले जा रही है।

14:31 (drishtant) अपने गांव जाने वाली साधारण गाड़ी भी उपयोगी है लेकिन पराए गांव जाने वाली सुंदर गाड़ी भी व्यर्थ है।

15:01 (vyakhya) हमारा वास्तविक घर वह स्थान है जहां जाने से पतन न हो और जहां हमारी थकान मिट जाए।

15:49 (vyakhya) शरीर की थकान घर में जाकर मिटती है लेकिन आत्मा की थकान केवल आत्मज्ञान के घर में जाकर मिटती है।

16:05 (prasang) योग वशिष्ठ में प्रसंग आता है कि ब्रह्मा जी ने जीवों को राग भय क्रोध से दुखी देखकर यज्ञ हवन की व्यवस्था बनाई।

16:23 (vyakhya) लेकिन उन्होंने देखा कि यज्ञ और स्वर्ग प्राप्ति के बाद भी जीव संसार की वस्तुओं को पकड़ना नहीं छोड़ता इसलिए अंतिम समाधान ज्ञान ही है।

17:03 (vyakhya) मनुष्य बाहर की वस्तुओं से सदा बंधा नहीं रह सकता क्योंकि स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को भी कल्प के अंत में सृष्टि से अलग होना पड़ता है।

17:12 (drishtant) इस सत्य को समझाने के लिए स्वप्न का उदाहरण दिया जाता है कि मनुष्य रात में स्वप्न में बाजार और अनेक घटनाएं देखता है।

17:36 (vyakhya) स्वप्न में हलवाई की दुकान होती है, फोटोग्राफर होता है और ग्राहक मिठाई खरीदते या फोटो खिंचवाते दिखते हैं।

17:52 (vyakhya) लेकिन यह सब केवल तब तक ही रहता है जब तक स्वप्न चलता है, स्वप्न टूटते ही सब समाप्त हो जाता है।

18:06 (drishtant) स्वप्न में दिखने वाले लोग, रिश्ते, विवाह और प्रसंग सब उसी समय तक सत्य लगते हैं जब तक स्वप्न चलता है।

18:46 (vyakhya) इसी प्रकार यह संसार भी ब्रह्मा के स्वप्न के समान है जिसमें जन्म और मृत्यु की घटनाएं घटती रहती हैं।

19:09 (vyakhya) आंखों के सामने ही संसार का विस्तार और परिवर्तन होता रहता है और कुछ भी स्थिर नहीं रहता।

19:40 (drishtant) जिन राजाओं के महलों में कभी हजारों दीप जलते थे और नगाड़े बजते थे आज उनकी कब्रों का भी निशान नहीं मिलता।

20:06 (vyakhya) जो घटनाएं कभी बहुत बड़ी लगती थीं समय के साथ वे भी स्वप्न जैसी हो जाती हैं।

20:37 (vyakhya) समय की धारा में मनुष्य की सारी चेष्टाएं बहती चली जाती हैं।

20:55 (updesh) इसलिए बीती हुई बातों का शोक नहीं करना चाहिए।

21:07 (updesh) जो लाभ हुआ वह भी ठीक और जो हानि हुई वह भी ठीक इसी भाव से जीवन जीना चाहिए।

21:22 (drishtant) यदि कांटा पैर में लग जाए तो उसे निकाल कर फेंक देना चाहिए यह सोचकर नहीं बैठना चाहिए कि किसने लगाया।

21:39 (vyakhya) जब मनुष्य इस प्रकार का विवेक धारण करता है तब वह ज्ञानमय तप के द्वार पर पहुंच जाता है।

21:52 (vyakhya) तब वह श्रीकृष्ण के भाव को प्राप्त करता है अर्थात अपने आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है।

22:08 (vyakhya) जो स्वयं अपने आत्मस्वरूप में स्थित नहीं है वह दूसरों को भी सही मार्ग नहीं दिखा सकता।

22:16 (shlok path) गीता का श्लोक कहता है वितराग भय क्रोध मनमया मामुपाश्रिताः।

22:30 (vyakhya) भगवान के परायण होने का अर्थ यह है कि साधक समझता है कि धन सत्ता और वस्तुएं पहले भी नहीं थीं और आगे भी नहीं रहेंगी।

23:02 (vyakhya) इसलिए वह उनका उपयोग करता है लेकिन उनमें अपना आश्रय नहीं बनाता।

23:19 (vyakhya) जन्म से पहले आत्मा थी और मृत्यु के बाद भी वही आत्मा रहेगी।

23:36 (vyakhya) जो साधक उस आत्मा में स्थित होकर संसार में व्यवहार करता है वही वास्तव में भगवान का आश्रित है।

23:46 (vyakhya) वस्तुओं को न पकड़ना है और न छोड़ना है बल्कि उनका उचित उपयोग करना है।

24:12 (vyakhya) घर या धन से अधिक आसक्ति ही भय को जन्म देती है।

24:29 (prasang) एक जीवनमुक्त महापुरुष की कुटिया पर एक बार डाकुओं ने डाका डाला।

25:07 (prasang) महापुरुष ने कहा कि जो चाहिए ले जाओ और अपनी चादर तक उतार दी।

25:38 (prasang) जब डाकू सामान बांध रहे थे तब बाबा जी टिल्ले पर जाकर आनंद से नाचने लगे।

26:04 (prasang) उन्होंने कहा कि मैं तो नफे में हूं क्योंकि लंगोटी तो बच गई और खाया पिया भी नफे में रहा।

26:29 (prasang) महापुरुष की इस सरलता और प्रेम से डाकुओं का हृदय बदल गया।

26:44 (vyakhya) जो व्यक्ति अपने आप में संतुष्ट रहता है उस पर सब लोग प्रसन्न हो जाते हैं।

27:02 (kirtan) नारायण नारायण का स्मरण करते हुए आत्मानंद का अनुभव होता है।

27:20 (shlok path) पुनः गीता का श्लोक कहा गया वितराग भय क्रोध मनमया मामुपाश्रिताः।

27:37 (vyakhya) राग भय और क्रोध नश्वर वस्तुओं में आसक्ति से उत्पन्न होते हैं।

28:08 (drishtant) जैसे किसी ने फूल दिया तो प्रसन्नता हुई लेकिन यदि रोज वही फूल मिलने की अपेक्षा हो जाए तो समस्या पैदा हो जाती है।

28:25 (updesh) इसलिए जो मिला उसे स्वीकार करो और जो नहीं मिला उसके लिए दुखी मत हो।

28:33 (vyakhya) मूढ़ भोगता भोगों के पीछे भागता है जबकि आदर्श भोगता स्वयं में तृप्त रहता है।

29:01 (vyakhya) आदर्श भोगता के पास भोग स्वयं आते हैं जबकि मूढ़ भोगता भोगों के पीछे दौड़ता है।

29:14 (drishtant) राजा जनक, कबीर और श्रीकृष्ण जैसे महापुरुष भोगों में रहते हुए भी उनसे आसक्त नहीं थे।

29:36 (drishtant) जो व्यक्ति छाया पकड़ने के लिए दौड़ता है वह उसे कभी नहीं पकड़ सकता।

29:51 (drishtant) लेकिन जो सूर्य की ओर चलता है उसकी छाया स्वयं पीछे आती है।

30:07 (vyakhya) इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने आंतरिक सुख को छोड़कर बाहरी परिस्थितियों को पकड़ना चाहता है वह सदैव दुखी रहता है।

Manual Transcription- 

केवल दो काम, नश्वर को नश्वर मान ले और शाश्वत को मै मान लो.. 
भगवान् हमारी बेवकूफी छुड़ाना चाहते है कि  नश्वर पदार्थ हम नही है… . 
मनुष्य जन्म पाकर भी दुखी और परेशाँ होना बड़े शर्म की बात है… 
जब भी दुख, भय या क्रोध होता है तो देखो क्यों हुआ, दुख आता है तो उस पर हस्ताक्षर ना करे, चलती गाड़ी में कूदे नही, हमारे गाँव जाने वाली गाड़ी टूटी फूटी हो तो भी उसीमे बैठना है, हमारा गाँव है आत्म ज्ञान… . 
हमारा सपना शाश्वत है तभी तक सपने के पात्र जिंदा है जब सपना खत्म हो जाता है तो सपने की चीजे भी चली जाती है.. 
ऐसे ही ये संसार भी ब्रह्मा जी का सपना है, जगत स्थाई नही है सब सरकता जा रहा है… . 
समय की सरिता मे सारी स्वप्न की चेष्ठा सरकती जा रही है… 
व्यवहार मे भी कांटे लग रहे है तो उन्हे निकाल कर फेंक, किसने रखा, क्यों रखा इसका चिंतन छोड़ तो भय, राग, क्रोध दूर हो जायेगा… . 
वस्तुओ को ना छोड़ना है और ना पकड़ना है, यथा योग्य उपयोग, आसक्ति नही.. 
आसक्ति से भय, राग और क्रोध होता है… . 
जो अपने आप मे राजी नही है, उससे सब नाराज़ रहेंगे….
नश्वर वस्तुओ मे आसक्ति ना करे, ये वस्तुये सदा मिलती रहे, ऐसी ही बनी रहे, ये आग्रह भी नही रखे… 
आदर्श भोक्ता के पीछे भोग अपने आप आते है वो भोगों की चिंता नहीं करते, भोग आते है तो वो इनका यथा योग्य उपयोग कर लेते है इनमे फंसते नही है..  
मूढ भोक्ता ईश्वर को पीठ देकर छाया की तरफ भागते हैं, छाया के पीछे जाने वालों के हाथ कुछ नहीं आता… .

 

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