चिंता छोड़ो, निश्चिंत होना सीखो ! Meerut 2003
TIME STAMP INDEX
0:02 — वैदिक मंत्र और वैदिक ज्ञान की विशेषता है कि जीवन को पूर्णता देते हैं।
0:08 — श्री कृष्ण के जीवन में प्रेम, ज्ञान, कुशल क्रिया, आनंद, त्याग-सामर्थ्य सब पूर्ण थे।
0:16 — उनमें भूख सहने की शक्ति, समझने और भूलने की शक्ति भी थी।
0:24 — वे सोते तो पूर्ण निश्चिंत होकर सब भूल जाते थे।
0:30 — सामान्य लोग न बोलने का, न त्याग का, न भोग का सामर्थ्य रखते; वे भीतर से मजदूर समान हैं।
0:36 — उत्तम भोगता वही है जिसमें त्याग का सामर्थ्य हो; बिना त्याग के सच्चा भोग नहीं।
0:43 — वस्तुओं को वही भोग सकता है जो उनसे अलग होने की शक्ति रखता हो।
0:50 — संबंध काटने की शक्ति आवश्यक है।
0:57 — प्रश्न: संबंध कटेंगे तो संसार के बिना कैसे चलेगा?
1:03 — उत्तर: मोह-संबंध का त्याग किए बिना समर्थता नहीं आती।
1:09 — वस्तुओं से जितना पक्का संबंध, उतनी छोटी स्थिति।
1:22 — जितनी त्याग की ताकत, उतनी महानता।
1:29 — “पत्नी/पैसे के बिना नहीं रह सकते” — यह भ्रांति है।
1:34 — सत्य: त्याग के बिना नहीं रह सकते; रात में सबका त्याग कर सोते हो।
1:40 — सब भूलकर सोते हो तभी सुबह ताजगी मिलती है।
1:45 — बचपन का त्याग हुआ तभी युवावस्था का आनंद मिला।
1:51 — कई जन्मों की उपलब्धियाँ भी प्रकृति ने छुड़वाईं।
2:04 — जो शाश्वत से प्रेम करना चाहता है उसे मन हटाने की ताकत चाहिए; मंत्र-जाप से यह शक्ति आती है।
2:11 — जब चाहें मन शांत, जब चाहें आनंद, जब चाहें ज्ञान में गोता — यही सतगुण है।
2:26 — जिसके पास यह नहीं, वह औषधि, कैप्सूल, इंजेक्शन में सुख खोजेगा पर भीतर रस नहीं आएगा।
2:39 — ज्ञान पुस्तकों से रटना पड़ेगा और खुशी बाहरी साधनों से उधार लेनी पड़ेगी।
2:52 — जिसमें त्याग-सामर्थ्य है वह सहज में आनंदित रहता है।
2:57 — गरीब का बच्चा भी “मैं-मेरा” आग्रह बिना प्रसन्न रहता है।
3:10 — वस्तुओं की चिपकन न हो तो स्वाभाविक आनंद रहता है।
3:16 — सब करते हुए भी जब चाहो चिपकन रहित होना सीखो।
3:24 — (उदाहरण-वाक्य) रामकृष्ण ने कहा: संसार पानी है, परमात्मा का रस दूध है।
3:31 — दूध को दही बनाकर मथो तो मक्खन निकलेगा।
3:40 — मक्खन को पानी में रखो तो तैरता रहेगा, डूबेगा नहीं।
3:48 — साधना से मन को मथो, फिर संसार में रहकर भी डूबोगे नहीं।
4:02 — मंत्र-जाप, गुरु-कृपा, एकांत से सुखद जीवन मिलता है।
4:19 — आज धनी, निर्धन, पढ़े-लिखे, नेता — सब दुखी हैं।
4:38 — इच्छाओं के गुलाम बनकर जीवन का ढंग भूल गए।
4:46 — भगवान कहते हैं ऐसा मत करो।
4:51 — (श्लोक-संदर्भ) भगवद्गीता — “तमेव शरणं गच्छ…” — सब भाव से शरण जाओ।
5:04 — प्रणव (ॐ) मंत्र तुरंत परम शांति में ले जाने का सामर्थ्य रखता है।
5:12 — जैसे न बोलने से बोलने की शक्ति संचित होती है।
5:18 — आराम से काम की शक्ति संचित होती है।
5:25 — चिंतन छोड़कर नारायण में गोता लगाओ तो अद्भुत शक्ति जागती है।
5:38 — ध्यान इसलिए है कि जगत-स्मृति भूले।
5:58 — (श्लोक) “ध्यानस्थित गते मनसा…” — योगी उस परम तत्व को देखता है।
6:10 — (वाक्य) तत्प्रसादात परम शांति मिलती है।
6:17 — शाश्वत स्थान की प्राप्ति होती है।
6:26 — धन-पत्नी-शरीर को छोड़ना पड़ता है; पर आत्मा को नहीं छोड़ सकते।
6:45 — जिसे कभी नहीं छोड़ सकते वही परमात्मा है; उसे पाने की विद्या ब्रह्मविद्या है।
6:58 — जो सदा नहीं रह सकता वह माया-संसार है।
7:11 — छह दिन पहले का भोजन भी नहीं रख सकते; सब बदलता है।
7:18 — तीन तत्व: सत्य (सदा रहने वाला), असत्य (कभी न रहने वाला), मिथ्या (दिखे पर टिके नहीं)।
7:43 — शरीर मिथ्या है — पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा।
8:11 — मिथ्या को मिथ्या समझो और सत्य से प्रेम करो।
8:31 — ज्ञान हेतु राजे-महाराजे भी गुरुओं के द्वार जाते थे।
8:36 — (प्रसंग) राजा भर्तृहरि को जब सत्संग से ज्ञान मिला।
8:49 — (वचन) “स्वच्छ सत्संग कीनो…” — शुद्ध सत्संग से ही समझ आई।
9:05 — सोने की थाली, सुंदर पत्नी पिंगला — सब नश्वर आसक्ति थी।
9:18 — जो नहीं छूटता वह आत्मा-परमात्मा है।
9:30 — जो छूट जाए उसमें आसक्ति मूर्खता है।
9:37 — (दृष्टांत) बंदर मुट्ठी बांधकर फंस जाता है क्योंकि छोड़ता नहीं।
10:25 — मुट्ठी खोल दे तो छूट सकता है; “तेन त्यक्तेन भुंजीथा” — त्यागपूर्वक भोगो।
10:41 — मिथ्या को सत्य मानने से चिंता, तनाव बढ़ता है।
10:59 — (प्रसंग) दुबई से आया व्यक्ति 70,000 कमाता, पर 11 वर्ष की बेटी की शादी की चिंता में दुखी।
11:47 — सलाह: प्रयत्न करो, पर चिंता मत करो; “हरि चिंत्यो हरि करे, तू रहे निश्चिंत।”
12:18 — सत्य का चिंतन नहीं, बदलने वाली चीजों की चिंता अधिक।
12:24 — जिनको सत्संग में रुचि नहीं उनका जीवन पशु समान हो जाता है।
12:36 — खड़े-खड़े भोजन को शास्त्र में पिशाच-भोजन कहा।
12:54 — सुविधाएं होने पर भी सत्संग अभाव से अशांति रहती है।
13:12 — (गीता-संदर्भ) ऐसा लाभ पाकर बड़ा दुख भी विचलित नहीं कर सकता।
13:31 — निर्द्वंद अवस्था: सुख-दुख में समता।
13:53 — आया हुआ दुख जाएगा; आया हुआ सुख भी जाएगा।
14:14 — जो सुख-दुख देकर जाए उसमें चिपकना क्यों? उपयोग करो, बंधो मत।
14:27 — (कथा-आरंभ) श्री कृष्ण और भीम घने जंगल में रुके।
14:39 — प्रथम पहर भीम पहरा देंगे, द्वितीय पहर श्री कृष्ण।
14:53 — एक नाटा राक्षस आया और भीम को उकसाने लगा।
15:16 — जितना भीम क्रोधित होकर प्रत्युत्तर देते, वह उतना शक्तिशाली होता गया।
15:35 — युद्ध हुआ; भीम का बल घटता गया, राक्षस विशाल होता गया।
15:52 — पहर पूरा होते-होते भीम थककर चूर हो गए।
16:17 — तब श्री कृष्ण की ड्यूटी आई; भीम मार खाकर बैठे थे।
16:27 — (कथा जारी…) — आगे समाधान श्री कृष्ण देंगे।
16:34 — (कथा) जब श्री कृष्ण चौकी में लगे तो वही अनंत रूप वाला फिर आ गया।
16:42 — वह बोला: “कृष्ण, अपने को भगवान और अवतार क्या समझते हो?”
16:50 — कृष्ण ने पहचान लिया: “अच्छा, मिथ्या जगत का प्रतिनिधि आया है।”
16:58 — वह बोला: “मैं सारी दुनिया को नचाने वाला हूं, तुम भी एक हो।”
17:05 — कृष्ण शांत रहे, मुस्कुराए और महत्व नहीं दिया।
17:18 — जितना महत्व नहीं दिया, वह उतना छोटा होता गया।
17:26 — प्रभात होते-होते वह लघु हो गया।
17:33 — कृष्ण ने उसे पीतांबर में बांध लिया, जैसे खिलौना।
17:46 — सूर्योदय का समय हुआ; भीम अभी सो रहे थे।
17:53 — सूर्योदय के समय सोना आयु और प्रसन्नता घटाता है; अमृतवेला में उठना चाहिए।
18:02 — उस समय ओजोन, ऋणात्मक आयन, चंद्रमा की शीतलता और सूर्य-पूर्व ऊर्जा होती है।
18:16 — उस समय जप-ध्यान-प्राणायाम करने से विशेष लाभ होता है।
18:36 — भीम मार खाकर उठे; चलने की ताकत नहीं थी।
18:50 — (संवाद) कृष्ण ने पूछा: “क्या हुआ?”
18:57 — भीम बोले: “एक नाटा आया, मैं उलझा, वह पुष्ट होता गया, मैं दुर्बल।”
19:12 — भीम ने कहा: “वह छोटा था, पर मेरे क्रोध से विशाल हो गया।”
19:29 — कृष्ण ने पीतांबर से वही छोटा रूप दिखाया।
19:55 — कृष्ण बोले: “यह मिथ्या जगत है; जितना भिड़ोगे उतना बढ़ेगा।”
20:01 — “जितना नारायण चिंतन करोगे, जगत छोटा होगा और तुम महान।”
20:15 — गुरु मंत्र निश्चिंत होने की विद्या देता है।
20:22 — नींद में निश्चिंत नहीं, मूर्छित होते हो; जागृत में चिंतन में उलझते हो।
20:40 — मंत्र-जाप निश्चिंत नारायण में विश्रांति देता है।
20:46 — श्री कृष्ण प्रातः जप और प्राणायाम करते थे।
20:53 — भगवान राम भी प्राणायाम करते थे।
21:11 — इसलिए आप भी प्राणायाम और गुरु-मंत्र का लाभ लें।
21:18 — “नाम जपत मंगल दिशा दशा” — नाम-जप से दिव्य शक्तियाँ जागती हैं।
21:25 — प्राणायाम से स्वास्थ्य की रक्षा होती है; औषधियां इतना नहीं कर पातीं।
21:45 — विधिवत प्राणायाम से बीमारी की जड़ें कमजोर होती हैं।
22:06 — (प्राणायाम-विधि) दाहिने नथुने से श्वास लें, शुद्ध वातावरण में।
22:32 — मूलबंध लगाएं, गुदा संकोच कर श्वास भरें।
22:48 — आधा से पौना मिनट श्वास रोकें।
22:54 — बाएं नथुने से धीरे-धीरे छोड़ें।
23:11 — बाहर छोड़कर थोड़ी देर रोकें; फिर पुनः लें।
23:25 — दाहिने से छोड़ें; यह एक प्राणायाम हुआ।
23:30 — ऐसे सात बार करें।
23:45 — फिर दोनों नथुनों से श्वास लेकर रोकें, एक मिनट तक।
24:10 — दाहिना बंद कर बाएं से छोड़ें; पांच बार करें।
24:15 — कुल बारह प्राणायाम पूर्ण।
24:37 — इससे जप में सिद्धि, स्वभाव में प्रसन्नता, आरोग्य में वृद्धि होगी।
24:53 — फास्ट फूड तात्कालिक सुख देता है, आगे दंड देता है।
25:10 — खड़े-खड़े पानी/भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
25:30 — चाट-पकौड़ी रोग-प्रतिरोधक शक्ति घटाती हैं।
25:51 — कोई भी व्यक्ति दुखी होने के लिए कर्म नहीं करता; सब सुख हेतु प्रयास करते हैं।
26:06 — मिथ्या सुख लेकर फंस जाते हैं।
26:26 — आप दुखी होने के लिए जन्म नहीं लिए।
26:33 — जैसे कृष्ण कालिया नाग पर नाचते हैं, वैसे दुखों पर आनंद से नाचो।
27:01 — संसार की गाड़ी खींचने नहीं, आनंदित मुक्त आत्मा बनने आए हो।
27:23 — भीम के लिए जगत हावी, कृष्ण के लिए पीतांबर का खिलौना।
27:32 — (उक्ति) गोरखनाथ — “हंसी वो खेलीबो धरीबो ध्यान।”
27:49 — खाओ-पियो, पर आसक्ति मत रखो।
28:12 — जो बीत रहा है उसे बीतने दो; वर्तमान का आनंद लो।
28:36 — (प्रसंग) कढ़ी देखकर पत्नी की याद में रोना — यह आसक्ति है।
29:03 — सत्य आत्मा अमर है; नश्वर शरीर पर शोक क्यों?
29:29 — बीते सुख-दुख को याद कर वर्तमान खराब मत करो।
29:53 — न अतीत का शोक, न भविष्य का भय, न वर्तमान की आसक्ति।
30:09 — यही समत्व भगवद्गीता का संदेश है।
30:24 — गीता चाहती है कि तुम मंद-मंद मुस्कुराते हुए कर्मयोगी बनो।
30:37 — युद्ध जैसे घोर कर्म करते हुए भी निर्लेप रहना सीखो
30:42 — तुम्हारी माता गीता।
30:47 — भगवद्गीता का एक श्लोक-पाठ, भगवान नाम-कीर्तन और साधु दर्शन करोड़ों तीर्थों का फल देता है।
30:56 — (श्लोक-पाठ) गीता अध्याय 6 का प्रथम श्लोक — “अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः…”
31:01 — जो भगवान के श्रीमुख से निकला, वही तुम्हारी जिह्वा से उच्चारित कर पुण्य लाभ करो।
31:11 — (श्लोक-अर्थ) “अनाश्रितः कर्मफलं” — कर्मफल का आश्रय छोड़े।
31:17 — “कार्यं कर्म करोति यः” — करने योग्य कर्म करो।
31:26 — “स संन्यासी च योगी च” — वही सच्चा संन्यासी और योगी है।
31:35 — “फल मिलेगा तब सुखी होऊँगा” — यह भ्रम छोड़ो।
31:40 — “पैसे होंगे, शादी होगी, पुत्र होगा तब सुखी होऊँगा” — यह बाह्य आश्रय है।
31:53 — बाहर का आश्रय छोड़कर अपने में सुखी होने की कला सीखो।
32:10 — (दृष्टांत) एक मूंछ वाला व्यक्ति शराब के ठेके पर 25 पैसे की शराब अंजलि में माँगता है।
32:18 — ठेकेदार कहता है: “25 पैसे से क्या होगा?”
32:32 — वह कहता है: “नशा अपना होता है, शराब में क्या?”
32:45 — शराब ज्ञान-तंतु सुन्न करती है, योग्यता नष्ट करती है।
32:58 — यदि बोतल में सुख होता तो बोतलें नाच उठतीं।
33:11 — रात का नशा उतर जाता है; अंतरात्मा का अमृत जीवन सुधार देता है।
33:21 — (कथा) फूली बाई जोधपुर के पास विवाह के बाद विधवा हुईं।
33:32 — गुरु ने मंत्र और प्राणायाम विधि दी।
33:41 — (जप-भेद) वैखरी जप — ऊँचे स्वर में।
33:55 — मध्यमा जप — होंठों में, अर्थ सहित।
34:03 — पश्यंती जप — कंठ/हृदय में सूक्ष्म।
34:09 — परा जप — हृदय में अर्थ लीन; सामर्थ्य प्रकट।
34:15 — संसार का आश्रय छूटता है, मन स्वामी से एक होता है।
34:21 — फूली बाई शक्ति-संपन्न हो गईं।
34:44 — यशवंत सिंह नंगे पैर उनके दर्शन को आए।
35:20 — राजा ने प्रार्थना की: रानियों को उपदेश दें।
36:11 — रानियों ने उनका उपहास किया; उन्हें दुख नहीं हुआ, दया आई।
36:26 — जिसे आदर का आश्रय नहीं, वह अनादर से दुखी नहीं होता।
36:34 — (श्लोक-अर्थ) अनाश्रित कर्मफल — परिस्थिति का आश्रय मत करो।
36:48 — कर्म अपने आप में आनंद है।
37:03 — जो कर्म करे पर फल का आश्रय न ले, वही संन्यासी-योगी है।
37:28 — (प्रसंग) सुखदेव जी का आदर हुआ, पर वे हर्षित नहीं हुए।
37:40 — मूर्खों ने उपहास किया, पर उन्हें दुख नहीं हुआ।
38:06 — सात दिन की कथा से परीक्षित को परम पद की प्राप्ति हुई।
38:47 — (उपदेश) “गहनो गाठो तनरी शोभा…” — शरीर कच्चा घड़ा है।
39:12 — आत्मा पहले भी थी, अब भी है, बाद में भी रहेगी।
39:25 — “काया कांचो भांडो” — शरीर मिट्टी का पात्र है।
39:38 — राम भजो; आपस में क्यों लड़ते हो?
40:13 — फूली बाई ने बाह्य आश्रय छोड़ा; आत्मा में स्थित हुईं।
40:32 — (भजन) कबीर — “बिन सतगुरु इतना दुख पाया…”
40:52 — मात-पिता, बंधु, स्त्री साथ नहीं जाते।
41:10 — जब तक गुरु-गुण न ले, जीवन व्यर्थ।
41:23 — शरीर नख से शिख तक मल-मूत्र से भरा है।
41:54 — शरीर मिथ्या; जिसकी सत्ता से शोभा है, वह सत्य है।
42:09 — सतगुरु की शरण जाओ; वही तन-रोग का वैद्य है।
42:36 — जो संसार का आश्रय लेते हैं, वे भय और रोग से दबते हैं।
42:50 — (भजन) “सतगुरु बादल प्रेम के…”
43:10 — काम बाहर ले जाता है, प्रेम भीतर ले आता है।
43:27 — सुबह उठकर कुछ देर शांत बैठो; वही सत्ता जागृत में भी है।
43:49 — (कथा-संदर्भ) श्री कृष्ण जगत को खेल समझते, अपने में विश्राम पाते।
44:01 — श्री कृष्ण प्रातः ध्यान में मग्न होते।
44:08 — जप के बाद कुछ समय शांत बैठो।
44:20 — कार्य के बाद थोड़ी देर निराश्रित होकर विश्राम करो।
44:30 — इससे सूझबूझ और आत्मिक प्रभाव बढ़ेगा।
44:30 — ॐ
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