भगवद् भाव कैसें बढ़े ? भाग-2 | संध्या सत्संग - 05-03-2026 सुबह
TIME STAMP INDEX
0:02 (vyakhya) बाहरी परिस्थितियों से सुख पाने की भूल
0:11 (vyakhya) भोगों से सुख पाने की असंभवता
0:21 (updesh) बाहरी साधनों से स्थायी सुख नहीं मिलता
0:28 (vyakhya) थोड़े समय का हर्ष और बाद में अशांति
0:35 (vyakhya) बाहरी साधनों की इच्छा से अशांति
0:42 (vyakhya) राग भय और क्रोध की उत्पत्ति
0:49 (drishtant) मांस के टुकड़े पर झगड़ती चीलों का उदाहरण
0:58 (updesh) भोगों का सदुपयोग करने की शिक्षा
1:08 (vyakhya) शरीर और संसार की प्रकृति
1:18 (vyakhya) शरीर और वस्तुओं की नश्वरता
1:26 (updesh) शरीर को संसार की सेवा में लगाना
1:35 (updesh) भोगों का निष्काम उपयोग
1:44 (prasang) विद्यासागर की बुद्धिमत्ता
2:01 (prasang) बालक विद्यासागर और माइलस्टोन का प्रसंग
2:23 (prasang) यात्रा में अंग्रेजी अंक सीखने की घटना
2:37 (vyakhya) संसार के उपयोग और वैराग्य का विवेक
2:51 (updesh) सेवा द्वारा परमात्मा की ओर जाना
3:07 (vyakhya) चेतन और अचेतन अवस्था का चुनाव
3:15 (prasang) विश्वविद्यालय में विद्यासागर की नियुक्ति
3:25 (prasang) अतिरिक्त वेतन का प्रसंग
3:39 (prasang) वाचस्पति को पद देने का सुझाव
4:06 (prasang) वाचस्पति का आश्चर्य
4:22 (vyakhya) मानव दानव और देव का अंतर
4:33 (vyakhya) यज्ञ और त्याग का महत्व
4:50 (vyakhya) बहुजन हिताय का भाव
5:06 (vyakhya) समाज से मनुष्य का संबंध
5:15 (vyakhya) शुभ और अशुभ विचारों का प्रभाव
5:29 (vyakhya) मनुष्य का विश्व से जुड़ाव
5:37 (drishtant) सूर्य और पृथ्वी का संबंध
5:58 (vyakhya) शरीर का विश्वेश्वर से संबंध
6:07 (vyakhya) इंद्रियों से चैतन्य तक की कड़ी
6:24 (vyakhya) परमात्मा से संबंध के बाद भी दुख का कारण
6:31 (vyakhya) राग भय और क्रोध की जड़
6:40 (vyakhya) नश्वर में आसक्ति की भूल
6:51 (updesh) एक बीमारी और एक दवा
7:06 (prasang) अर्जुन को दिया गया ज्ञान
7:21 (vyakhya) ज्ञान से कर्ताभाव का नाश
7:30 (prasang) महाभारत के बाद कुंती का निर्णय
7:47 (prasang) धृतराष्ट्र और गांधारी का वनगमन
8:04 (prasang) कुंती का सेवा भाव
8:19 (vyakhya) कुंती की दृढ़ता
8:32 (updesh) जीवन में दृढ़ संकल्प का महत्व
9:13 (updesh) प्रातः साधना और श्वास अभ्यास
9:32 (vyakhya) संकल्प शक्ति का विकास
10:02 (vyakhya) मनुष्य में ईश्वर का बल
10:20 (updesh) परिस्थितियों से हारने की भूल
10:37 (vyakhya) मनुष्य की वास्तविक शक्ति
11:08 (vyakhya) विषयों में आसक्ति से दुर्बलता
11:22 (updesh) दृढ़ निश्चय से परिवर्तन संभव
11:30 (prasang) वालिया लुटेरे का परिवर्तन
11:47 (prasang) वाल्मीकि ऋषि बनने की कथा
12:05 (vyakhya) मनुष्य में परमात्मा शक्ति
12:20 (updesh) दूसरों की बातों से दुखी न होना
12:37 (vyakhya) विपरीत विचार से विजय
13:00 (kirtan) ओम जप
13:08 (vyakhya) राग मिटते ही भय और क्रोध मिटते हैं
13:23 (updesh) दूसरों के स्वभाव को समझना
13:38 (drishtant) बाप बेटे और घोड़े की कथा
14:47 (vyakhya) लोगों को संतुष्ट करना असंभव
15:14 (updesh) संसार की आलोचना से निर्भय रहना
15:23 (vyakhya) महापुरुषों की भी आलोचना होती है
15:46 (updesh) शास्त्रसम्मत जीवन का महत्व
16:07 (prasang) विद्यासागर और बालक का प्रसंग
16:30 (prasang) बालक से प्रश्नोत्तर
17:08 (prasang) बालक की सादगी और उत्तर
17:26 (prasang) व्यापार का विचार
17:34 (prasang) विद्यासागर का एक रुपया देना
17:43 (prasang) दो वर्ष बाद विद्यासागर और युवक की भेंट
17:58 (prasang) युवक की दुकान और कृतज्ञता
18:12 (prasang) एक रुपये के सदुपयोग का परिणाम
18:26 (vyakhya) सदुपयोग से मिलने वाला आनंद
18:39 (vyakhya) परहित से स्थायी कीर्ति
18:56 (vyakhya) धोखे से मिली कीर्ति अस्थायी
19:05 (vyakhya) परिश्रम और सदुपयोग से यश
19:20 (vyakhya) विद्यासागर का सादा जीवन
19:36 (vyakhya) सेवा का अवसर खोजने का स्वभाव
19:50 (vyakhya) सहानुभूति से मिलने वाला आंतरिक सुख
20:14 (updesh) ईश्वर प्राप्ति की सरल विधि
20:21 (updesh) नश्वर का सदुपयोग और शाश्वत में प्रीति
20:42 (vyakhya) छोटे कर्म का बड़ा परिणाम
20:50 (prasang) दुखी ब्राह्मण से भेंट
21:08 (prasang) ब्राह्मण का विवाह खर्च का कर्ज
21:25 (vyakhya) सामाजिक रीति से उत्पन्न कष्ट
21:41 (prasang) महाजन के मुकदमे की चिंता
22:14 (prasang) विद्यासागर द्वारा जानकारी लेना
22:30 (prasang) गुप्त रूप से कर्ज चुकाना
22:39 (prasang) ब्राह्मण को केस समाप्त होने का समाचार
22:49 (vyakhya) परोपकार से मिलने वाला आनंद
23:05 (vyakhya) विद्यासागर के जीवन से शिक्षा
23:13 (prasang) स्टेशन पर डॉक्टर से भेंट
23:29 (prasang) डॉक्टर द्वारा मजदूर समझना
23:37 (prasang) विद्यासागर द्वारा बैग उठाकर ले जाना
23:52 (prasang) डॉक्टर को पहचान का पता चलना
24:08 (updesh) अहंकार रहित और स्वावलंबी जीवन
24:25 (vyakhya) डॉक्टर का पश्चाताप
24:33 (vyakhya) आत्मपहचान का संदेश
24:42 (kirtan) नारायण नाम जप
24:52 (vyakhya) बाहरी आकर्षण से भय और शोक
25:09 (vyakhya) बाह्य आकर्षण में फंसने की भूल
25:22 (vyakhya) मन्मय न होने से दुख
25:27 (kirtan) ओम जप
25:33 (vyakhya) बाह्य व्यवहार और आंतरिक विवेक
25:50 (vyakhya) राम तत्व और आत्मदेव का स्मरण
26:08 (vyakhya) नश्वर में आसक्ति से राग भय क्रोध
26:17 (vyakhya) मन्मय होने की अवस्था
26:25 (vyakhya) सेवा की सीमितता
26:33 (vyakhya) सेवा में भी पराधीनता
26:51 (vyakhya) पूर्ण आत्मबोध में पूर्ण सुख
27:04 (updesh) निष्काम कर्म का महत्व
27:13 (updesh) हृदय शुद्धि और ध्यान
27:28 (updesh) विवेक से आत्मसाक्षात्कार
27:36 (kirtan) ओम जप
27:45 (vyakhya) वासना और आग्रह से दुख
28:02 (vyakhya) दुख से बचने का प्रयास
28:10 (vyakhya) सुख की इच्छा का कारण
28:20 (vyakhya) परिस्थितियों को अनुकूल बनाने का आग्रह
28:38 (updesh) सुख भीतर से लेना
28:51 (vyakhya) बाहरी सुख की असंभवता
29:11 (drishtant) आग में कूदकर ठंडक चाहने का उदाहरण
29:18 (kirtan) ओम जप
इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:
0:02 (vyakhya) जो मनुष्य बाहर की परिस्थितियों को इकट्ठा करके धन के ढेर लगाकर और रूप लावण्य के साधनों से सुखी होना चाहता है वह ऐसा है जैसे कोई अग्नि में कूदकर ठंडक चाहता हो।
0:11 (vyakhya) भोगों से सुख पाने की कोशिश करना बुद्धिमानी नहीं है क्योंकि इससे स्थायी सुख नहीं मिलता।
0:21 (updesh) आज तक ऐसा कोई मनुष्य नहीं मिला जिसने केवल बाहरी साधनों से स्थायी सुख प्राप्त किया हो।
0:28 (vyakhya) कुछ समय के लिए हर्ष और प्रसन्नता मिल सकती है लेकिन उसके बाद मन अशांत और खिन्न हो जाता है।
0:35 (vyakhya) जितना मनुष्य बाहरी साधनों से सुख पाने का आग्रह करता है उतना ही उसका स्वभाव विकृत और अशांत होता जाता है।
0:42 (vyakhya) उसी आग्रह से मनुष्य के भीतर राग भय और क्रोध उत्पन्न होते हैं।
0:49 (drishtant) जैसे मांस के टुकड़े को देखकर चीलें आपस में लड़ती हैं वैसे ही भोगों के कारण मनुष्य भी एक दूसरे से लड़ते हैं।
0:58 (updesh) इसलिए भोगों और वस्तुओं का सदुपयोग करना चाहिए।
1:08 (vyakhya) यह शरीर पहले नहीं था और आगे भी नहीं रहेगा क्योंकि यह पंचभूतों से बना है।
1:18 (vyakhya) संसार की वस्तुएं भी प्रकृति की हैं और शरीर भी उन्हीं तत्वों से बना है।
1:26 (updesh) इसलिए शरीर को संसार की सेवा में लगा देना चाहिए।
1:35 (updesh) भोगों का उपयोग केवल सुख के लिए नहीं बल्कि सेवा और निष्कामता बढ़ाने के लिए करना चाहिए।
1:44 (prasang) कोलकाता के प्रसिद्ध विद्वान विद्यासागर अत्यंत बुद्धिमान और विवेकशील थे।
2:01 (prasang) बचपन में वे अपने पिता के साथ टांगे में बैठकर कोलकाता जा रहे थे।
2:23 (prasang) रास्ते में माइलस्टोन देखकर उन्होंने अंग्रेजी के अंक सीख लिए।
2:37 (vyakhya) बाद में उन्हें यह विवेक हुआ कि संसार की वस्तुओं का सदुपयोग करके परमात्मा की ओर जाना चाहिए।
2:51 (updesh) सेवा और सदुपयोग से मनुष्य अपने परमात्मा स्वरूप में प्रवेश कर सकता है।
3:07 (vyakhya) मनुष्य चाहे तो भोगों में डूबकर अचेतन अवस्था में जा सकता है या उनका सदुपयोग करके परम चेतना में जा सकता है।
3:15 (prasang) आगे चलकर विश्वविद्यालय में उनकी नियुक्ति हुई।
3:25 (prasang) उन्हें तर्कशास्त्र पढ़ाने के लिए अतिरिक्त 40 रुपये का वेतन मिला।
3:39 (prasang) उन्होंने कहा कि वाचस्पति नामक विद्वान उनसे बेहतर पढ़ा सकते हैं।
4:06 (prasang) यह सुनकर वाचस्पति आश्चर्यचकित रह गए।
4:22 (vyakhya) जब मनुष्य भोगों में रहता है तो मानव होता है, आसक्ति करता है तो दानव और त्याग करता है तो देव बनता है।
4:33 (vyakhya) यज्ञ का अर्थ त्याग है और त्याग से ही देवत्व प्रकट होता है।
4:50 (vyakhya) बहुजन हिताय की भावना ही सच्चा मंगल है।
5:06 (vyakhya) मनुष्य समाज से जुड़ा हुआ है इसलिए समाज के हित में ही उसका हित है।
5:15 (vyakhya) शुभ विचार वातावरण में शुभ प्रभाव फैलाते हैं और अशुभ विचार अशुभ प्रभाव फैलाते हैं।
5:29 (vyakhya) मनुष्य अकेला नहीं है बल्कि पूरे विश्व से जुड़ा हुआ है।
5:37 (drishtant) जैसे पृथ्वी सूर्य से जुड़ी है वैसे ही मनुष्य भी प्रकृति और विश्व से जुड़ा है।
5:58 (vyakhya) शरीर भी विश्वेश्वर से जुड़ा हुआ है।
6:07 (vyakhya) आंख मन से, मन बुद्धि से, बुद्धि चित्त से और चित्त चैतन्य से जुड़ा है।
6:24 (vyakhya) इस प्रकार मनुष्य परमात्मा से जुड़ा होने के बाद भी दुखी रहता है।
6:31 (vyakhya) इसका कारण राग भय और क्रोध है।
6:40 (vyakhya) नश्वर वस्तुओं में आसक्ति ही इन विकारों का कारण है।
6:51 (updesh) बीमारी एक ही है और उसकी दवा भी एक ही है।
7:06 (prasang) अर्जुन को भी यही शिक्षा दी गई थी कि अपने धर्म के अनुसार कर्म करो।
7:21 (vyakhya) जब ज्ञान के साथ कर्म किया जाता है तब कर्ताभाव समाप्त हो जाता है।
7:30 (prasang) महाभारत युद्ध के बाद कुंती ने धृतराष्ट्र और गांधारी के साथ वन जाने का निर्णय लिया।
7:47 (prasang) उन्होंने सेवा और वैराग्य का मार्ग चुना।
8:04 (prasang) कुंती ने कहा कि मैं आपकी सेवा के लिए साथ चलूंगी।
8:19 (vyakhya) उनके जीवन में दृढ़ता और निष्ठा थी।
8:32 (updesh) जीवन में दृढ़ संकल्प होना बहुत आवश्यक है।
9:13 (updesh) प्रातःकाल साधना और गहरी श्वास के अभ्यास से इच्छाशक्ति बढ़ती है।
9:32 (vyakhya) नियमित अभ्यास से संकल्प शक्ति विकसित होती है।
10:02 (vyakhya) मनुष्य के भीतर ईश्वर का अपार बल है।
10:20 (updesh) जब मनुष्य भीतर से हार जाता है तभी परिस्थितियां जीत जाती हैं।
10:37 (vyakhya) वास्तव में मनुष्य के भीतर तुच्छता नहीं बल्कि दिव्यता है।
11:08 (vyakhya) विषयों में आसक्ति होने पर मनुष्य अपनी शक्ति खो देता है।
11:22 (updesh) दृढ़ निश्चय से जीवन का परिवर्तन संभव है।
11:30 (prasang) वालिया लुटेरा भी संत के संग से बदल गया।
11:47 (prasang) वही आगे चलकर वाल्मीकि ऋषि बना।
12:05 (vyakhya) मनुष्य के भीतर असीम परमात्मा शक्ति विद्यमान है।
12:20 (updesh) दूसरों की बातों से दुखी नहीं होना चाहिए।
12:37 (vyakhya) विपरीत विचार से मनुष्य विजय प्राप्त कर सकता है।
13:00 (kirtan) ओम का जप करके मन को शांत किया जाता है।
13:08 (vyakhya) राग मिटते ही भय और क्रोध अपने आप समाप्त हो जाते हैं।
13:23 (updesh) दूसरों के स्वभाव को समझकर अपने राम में मस्त रहना चाहिए।
13:38 (drishtant) बाप बेटे और घोड़े की कथा से यह समझाया गया कि संसार को खुश करना असंभव है।
14:47 (vyakhya) लोग हर स्थिति में कुछ न कुछ कहते ही हैं।
15:14 (updesh) इसलिए संसार की आलोचना से भयभीत नहीं होना चाहिए।
15:23 (vyakhya) महापुरुषों की भी आलोचना होती रही है।
15:46 (updesh) शास्त्र सम्मत जीवन जीने से मन स्थिर रहता है।
16:07 (prasang) एक बार विद्यासागर के पास एक बालक सहायता मांगने आया।
16:30 (prasang) विद्यासागर ने उससे पूछा कि यदि अधिक पैसे मिलें तो क्या करेगा।
17:08 (prasang) बालक ने सरलता से अपनी आवश्यकताएं बताईं।
17:26 (prasang) उसने कहा कि कुछ पैसे से चने खाएगा और कुछ से व्यापार शुरू करेगा।
17:34 (prasang) उसकी बुद्धि और सरलता देखकर विद्यासागर ने उसे एक रुपया दे दिया।
17:43 (prasang) दो वर्ष बाद जब विद्यासागर उसी बाजार से गुजर रहे थे तो एक युवक ने उन्हें रोककर हाथ जोड़कर अपनी दुकान पर आने का आग्रह किया।
17:58 (prasang) विद्यासागर ने कहा कि मैं तुम्हें पहचानता नहीं हूं। युवक ने कहा कि यह दुकान आपकी कृपा से ही बनी है।
18:12 (prasang) युवक ने बताया कि वही लड़का है जिसे विद्यासागर ने एक रुपया दिया था और उसी रुपये से उसने व्यापार शुरू किया।
18:26 (vyakhya) उस रुपये के सदुपयोग से जो आनंद और शांति मिली वही सच्चा लाभ था।
18:39 (vyakhya) जब मनुष्य अपने धन और साधनों को परहित में लगाता है तो उसकी कीर्ति स्थायी हो जाती है।
18:56 (vyakhya) धोखा या छल से मिलने वाली प्रसिद्धि केवल थोड़े समय के लिए होती है।
19:05 (vyakhya) अपने परिश्रम और सदुपयोग से किया गया कार्य ही स्थायी यश देता है।
19:20 (vyakhya) विद्यासागर स्वयं सादा जीवन जीते थे और अपने ऊपर अधिक खर्च नहीं करते थे।
19:36 (vyakhya) वे हमेशा सेवा का अवसर खोजते रहते थे।
19:50 (vyakhya) किसी दुखी व्यक्ति से सहानुभूति से बात करने से मार्गदर्शक को भी भीतर से आनंद मिलता है।
20:14 (updesh) ईश्वर को पाने के लिए कोई कठिन मजदूरी नहीं करनी पड़ती, केवल सही समझ की आवश्यकता है।
20:21 (updesh) नश्वर वस्तुओं का सदुपयोग और शाश्वत आत्मा में प्रेम यही दो साधन हैं।
20:42 (vyakhya) ये छोटे से दिखने वाले कर्म हैं लेकिन इनका फल बहुत बड़ा होता है।
20:50 (prasang) एक बार रास्ते में विद्यासागर को एक ब्राह्मण मिला जो बहुत दुखी था।
21:08 (prasang) उसने बताया कि बेटी के विवाह में सामाजिक रीति के कारण अधिक खर्च हो गया और उसे कर्ज लेना पड़ा।
21:25 (vyakhya) कभी-कभी समाज की परंपराएं मनुष्य को कठिनाई में डाल देती हैं।
21:41 (prasang) महाजन ने उस पर मुकदमा कर दिया और ब्राह्मण को अदालत में जाना पड़ रहा था।
22:14 (prasang) विद्यासागर ने उससे महाजन का नाम और मुकदमे की तारीख पूछ ली।
22:30 (prasang) बाद में उन्होंने गुप्त रूप से उसका कर्ज चुका दिया।
22:39 (prasang) अदालत जाने के दिन ब्राह्मण को पता चला कि उसका मुकदमा समाप्त हो गया क्योंकि महाजन को पैसा मिल गया था।
22:49 (vyakhya) ब्राह्मण को यह जानकर बहुत शांति मिली लेकिन विद्यासागर को तो उस समय ही आनंद मिल गया था जब उन्होंने सहायता की थी।
23:05 (vyakhya) विद्यासागर के जीवन की ऐसी अनेक घटनाएं प्रेरणा देने वाली हैं।
23:13 (prasang) एक बार वे स्टेशन पर उतरे तो एक डॉक्टर मजदूर को बुला रहा था।
23:29 (prasang) डॉक्टर ने उन्हें मजदूर समझकर बैग उठाने के लिए कहा।
23:37 (prasang) विद्यासागर ने बिना कुछ कहे बैग उठाकर डॉक्टर के घर तक पहुंचा दिया।
23:52 (prasang) बाद में डॉक्टर के बड़े भाई ने उन्हें पहचान लिया और उनका आदर किया।
24:08 (updesh) विद्यासागर ने कहा कि मेरी मजदूरी यह है कि भारतवासी अहंकार रहित और स्वावलंबी बनें।
24:25 (vyakhya) यह सुनकर डॉक्टर को अपने व्यवहार पर बहुत पश्चाताप हुआ।
24:33 (vyakhya) विद्यासागर ने कहा कि पहले अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानो।
24:42 (kirtan) इसके बाद नारायण नाम का जप किया गया।
24:52 (vyakhya) स्त्री, पुरुष और पदार्थों का आकर्षण ही मनुष्य को भय, शोक और बंधन में डाल देता है।
25:09 (vyakhya) जब हम बाहरी आकर्षणों में फंस जाते हैं तो मन परमात्मा में स्थिर नहीं हो पाता।
25:22 (vyakhya) इसी कारण दुख और पापों की शुरुआत होती है।
25:27 (kirtan) ओम का जप किया गया।
25:33 (vyakhya) बाहरी व्यवहार करते हुए भी भीतर विवेक रखना चाहिए।
25:50 (vyakhya) भीतर राम तत्व, कृष्ण तत्व और आत्मदेव का स्मरण रखना चाहिए।
26:08 (vyakhya) नश्वर वस्तुओं में आसक्ति कम होने से राग, भय और क्रोध कम हो जाते हैं।
26:17 (vyakhya) तब मन परमात्मा में स्थित होने लगता है।
26:25 (vyakhya) विद्यासागर की तरह सेवा करना श्रेष्ठ है।
26:33 (vyakhya) लेकिन सेवा में भी धन, शरीर और बुद्धि की कुछ पराधीनता रहती है।
26:51 (vyakhya) पूर्ण सुख तब मिलता है जब आत्मा का साक्षात्कार होता है।
27:04 (updesh) इसलिए पहले निष्काम कर्म करना चाहिए।
27:13 (updesh) निष्काम कर्म से हृदय शुद्ध होता है और फिर ध्यान में लगना चाहिए।
27:28 (updesh) ध्यान और विवेक से आत्मसाक्षात्कार संभव है।
27:36 (kirtan) ओम का जप किया गया।
27:45 (vyakhya) संसार के व्यवहार और अपनी वासनाओं के आग्रह से ही सारे दुख उत्पन्न होते हैं।
28:02 (vyakhya) मनुष्य दुख से बचना चाहता है लेकिन कारण नहीं छोड़ता।
28:10 (vyakhya) सुख की इच्छा ही आग्रह का कारण है।
28:20 (vyakhya) परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास उसी इच्छा का रूप है।
28:38 (updesh) सुख भीतर से लेना चाहिए और बाहर की वस्तुओं का केवल उपयोग करना चाहिए।
28:51 (vyakhya) जो बाहर से सुख पाने की कोशिश करता है वह भ्रम में है।
29:11 (drishtant) यह ऐसा है जैसे कोई आग में कूदकर ठंडक पाने की कोशिश करे।
29:18 (kirtan) अंत में ओम का जप किया गया।
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