यह भी नहीं रहेगा… बीमारी हो या गरीबी, सबका इलाज इस सत्संग में !
TIME STAMP INDEX
0:02 — गर्मी के कारण आंखों में जलन, मुंह में छाले, गुस्सा, अधिक मासिक धर्म, फोड़े-फुंसी — यह पित्त प्रकोप के लक्षण हैं।
0:22 — ऐसी गर्मी का असर हो तो समझो पित्त संबंधी रोग है।
0:36 — (उपाय) सुबह मंजन करते समय कटोरी में ठंडा पानी लेकर एक घूंट मुंह में रखें।
0:42 — ठंडे पानी से आंखों पर छींटे मारें; दिमाग की गर्मी खिंचेगी।
0:50 — सिरदर्द वालों को भी यह प्रयोग लाभ देगा।
0:56 — नाक से गहरी श्वास लें; गर्मी या सिरदर्द भगाने हेतु।
1:12 — श्वास रोककर मन में “ॐ शांति शांति” जपें।
1:27 — सवा मिनट तक रोकें; पित्तजन्य रोग बिना दवा शांत होंगे।
1:47 — धीरे-धीरे दाएं नासिका से श्वास छोड़ें।
2:06 — ऐसा 3–5 बार करें; गर्मी संबंधी शिकायत में लाभ होगा।
2:20 — यदि रात्रि 12 बजे नींद खुलती है तो यह भी पित्त दोष है।
2:26 — ऐसे व्यक्तियों को मिश्री चूसनी चाहिए।
2:58 — मिश्री गर्मी शांत करती है, पर यह स्थायी उपाय नहीं।
3:09 — (योग-सूत्र) जीभ तालु में लगाकर स्मरण शक्ति जागृत करें।
3:16 — 50 ग्राम सौंफ।
3:23 — 50 ग्राम धनिया।
3:28 — 50 ग्राम आंवला चूर्ण।
3:34 — उतनी ही (50 ग्राम) मिश्री; कुल 200 ग्राम मिश्रण।
3:41 — 10–12 ग्राम दोपहर भोजन बाद लें; पित्त रोग शांत होंगे।
3:50 — नींद न आती हो, स्वप्नदोष या प्रदर हो तो एक चुटकी हल्दी मिलाएं।
4:09 — पलाश के फूलों का शरबत भी गर्मी मिटाता है।
4:15 — (शास्त्रसम्मत उपाय) आंवले का रस सिर पर लगाकर 1 घंटा रखें।
4:29 — बालों की जड़ें मजबूत होंगी; आंवला श्रेष्ठ रसायन है।
4:37 — वात, पित्त, कफ — तीन दोषों को शमित करता है।
4:45 — 25–35 ग्राम आंवला रस, शहद/मिश्री व पानी मिलाकर पिएं।
5:00 — यह दीर्घायु, आरोग्य, ओज और शक्ति देता है।
5:28 — शीतलता का अनुभव शीघ्र होगा।
5:41 — रक्त और वीर्य वृद्धि, शरीर पुष्ट करेगा।
5:49 — नेत्र ज्योति बढ़ती है।
6:14 — वर्ण निखार, बाल मजबूत, मस्तक-हृदय ताजगी।
6:27 — अम्लपित्त, पेशाब जलन, अधिक मासिक स्राव, श्वेत प्रदर, बवासीर में लाभ।
6:48 — स्वप्नदोष व दुर्बलता में रसायन रूप।
7:03 — मधुमेह व उष्ण प्रकृति वालों हेतु विशेष लाभकारी।
7:16 — यह शरीर स्वास्थ्य की चर्चा थी।
7:23 — मानसिक स्वास्थ्य शरीर से हजार गुना मूल्यवान है।
7:31 — बौद्धिक स्वास्थ्य करोड़ गुना मूल्यवान; इससे साक्षात्कार संभव।
7:44 — (कथा) एक दरवेश हज को जाते समय “शाकिर” नामक व्यक्ति के घर ठहरा।
8:24 — शाकिर कृतज्ञ और नम्र स्वभाव का था।
8:46 — विदा समय शाकिर ने खजूर भेंट दी।
9:09 — शाकिर बोला: “यह भी तो नहीं रहेगा।”
9:30 — लौटने पर दरवेश ने देखा शाकिर निर्धन होकर मजदूरी कर रहा है।
10:05 — शाकिर बोला: “अमीर नहीं रहा तो गरीब भी नहीं रहेगा।”
11:18 — समय बदला; जमींदार की मृत्यु से शाकिर धनी हो गया।
12:11 — शाकिर बोला: “छप्पर फाड़ दिया तो भी छप्पर तोड़कर ले लेगा।”
12:27 — अनुकूलता में हर्ष और प्रतिकूलता में शोक — छोटे मन की पहचान।
12:45 — सुख-दुख का सतुपयोग करने वाला परम योगी है।
13:26 — अंततः शाकिर की मृत्यु हुई।
13:52 — उसकी कब्र पर लिखा था: “यह भी तो नहीं रहेगा।”
14:47 — भूकंप में कब्रिस्तान भी मिट गया।
15:02 — (सार) बिना सत्संग अज्ञान नहीं मिटता।
15:13 — (संदर्भ) भगवान शिव पार्वती को अगस्त्य आश्रम में सत्संग हेतु ले जाते।
15:20 — भगवान राम सीता को वशिष्ठ के चरणों में ले जाते।
15:42 — वनवास में राम अत्रि, भारद्वाज आदि आश्रमों में सत्संग करते।
15:50 — (उक्ति) तुलसीदास — “एक घड़ी आधी घड़ी…” साधु संग कोटि अपराध हरता है।
16:06 — परमात्मा कर्म का प्रेरक, नियंता और फलदाता है।
16:18 — अनुकूलता में अहंकार रावण की दिशा है।
16:25 — प्रतिकूलता में दोषारोपण अज्ञान है।
16:39 — सुख के भोगी सुख से खोखले होते हैं।
16:45 — दुख के भोगी भयभीत होते हैं।
16:52 — सुख-दुख दोनों का उपयोग करो।
16:58 — दैनिक साधना को जीवन की पायदान बनाओ।
16:53 — सुख आए तो “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के लिए उसका उपयोग करो।
16:59 — दुख आए तो समझो सुख भी स्थायी नहीं; यह भी बदल जाएगा।
17:06 — सुख जाएगा तो दुख देगा; यह निश्चित है।
17:12 — दुख जाएगा तो सुख देगा; यह भी निश्चित है।
17:18 — दुख भी एक बार सुख देता है, और सुख भी एक बार दुख देता है; समय यूँ ही व्यर्थ न करो।
17:25 — सुख के भोगी मत बनो, दुख के भोगी मत बनो; तभी योगी बनने में सफल हो जाओगे।
17:32 — (उक्ति) श्री कृष्ण — “सुखं वा यदि वा दुःखं…” उपभोग नहीं, उपयोग करो।
17:40 — तुच्छ से तुच्छ व्यक्ति भी यदि उपयोग करे तो महान बन सकता है।
17:47 — जो सत्संग का “स” नहीं जानता, वह भी यदि सुख का उपयोग करे तो प्रसिद्ध हो सकता है।
17:55 — (दृष्टांत) एक भयंकर शराबी था; इतना कि कुल्ला भी शराब से कर लेता था।
18:02 — जन्मदिन पर चांदी की थाली में मेवा-मिठाई लेकर जा रहा था।
18:22 — मार्ग में एक संत की उजड़ी कुटिया की ईंट से ठोकर लगी और गिर पड़ा।
18:34 — सवा मुहूर्त तक बेहोश रहा; होश आने पर विचार बदल गए।
18:42 — समझा: “भगवान ने मुझे ठोकर दी कि मैं गलत मार्ग पर जा रहा था।”
18:50 — चांदी की थाली और सब वस्तुएँ दान-पुण्य में दे दीं।
19:02 — वर्षों बाद वह शराबी मर गया; नाम प्रसिद्ध था।
19:08 — (दृष्टांत) यमराज ने कहा: “जीवन में कोई पुण्य नहीं, केवल संत स्थान पर सवा मुहूर्त और थोड़ा दान।”
19:20 — उसे विकल्प मिला: पहले हजार वर्ष नरक या पहले सवा मुहूर्त इंद्र पद।
19:58 — उसने पहले इंद्र पद भोगने का निर्णय किया।
20:04 — विचार किया: “सवा मुहूर्त बाद सब छूट जाएगा; भोग क्या करूँ?”
20:10 — (पुराण प्रसंग) वशिष्ठ का आवाहन कर कामधेनु दान कर दी।
20:17 — (रामायण संदर्भ) कामधेनु गाय वशिष्ठ के पास थी; वही दान की।
20:24 — (पुराण प्रसंग) विश्वामित्र को उच्चश्रवा घोड़ा दान किया।
20:36 — अन्य ऋषियों को स्वर्ग की मणियाँ और वैभव दान करने लगा।
20:49 — इंद्र घबराकर गुरु बृहस्पति के पास गए।
20:56 — उत्तर मिला: “तुमने वैभव का भोग किया; इसने उपयोग किया।”
21:07 — यमदूत आए; हजार वर्ष की यातना क्षमा हो गई।
21:21 — अगला जन्म दैत्य कुल में विोचन के घर हुआ; नाम पड़ा बलि।
21:39 — (पुराण प्रसंग) वही बलि आगे चलकर दानवीर राजा बलि बना।
21:52 — देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु वामन रूप में आए।
22:07 — (वामन कथा) तीन पग भूमि माँगी; बलि ने दान कर दी।
22:15 — बलि को पाताल राज्य मिला; भगवान स्वयं द्वारपाल बने।
22:21 — (परंपरा) रक्षाबंधन पर लक्ष्मी जी बलि को राखी बाँधती हैं।
22:37 — (सार) जो मिला है उसका सदुपयोग करो; बलिदान से “बलि” नाम अमर होता है।
23:05 — परिवार, पड़ोस, समाज के मंगल हेतु अपनी वस्तुओं का उपयोग करो।
23:27 — गरीब की बेटी के विवाह में सहयोग करो; संतोष और पुण्य दोनों मिलेंगे।
23:46 — एक दिन शरीर भी बिगड़ जाएगा; वस्तुओं का मोह व्यर्थ है।
23:53 — (कथा) रामसुखदास महाराज से सुनी कहानी।
24:00 — हाथी की मृत्यु पर यमराज ने कहा: “मनुष्य बड़ा कैसे?”
24:17 — उत्तर: “शरीर से नहीं, बुद्धि से मनुष्य बड़ा है।”
24:30 — यमदूत एक सत्संगी युवक को पकड़ लाए परीक्षा हेतु।
25:06 — उसने चतुराई से यमपुरी में निर्णय की स्थिति बदल दी।
26:05 — (रामायण उक्ति) “करन-करावनहार स्वामी…” सब ईश्वर प्रेरित है।
26:26 — भक्त ने कहा: “आपके दर्शन के बाद भी पतन हो तो दर्शन का फल क्या?”
26:45 — मनुष्य भगवान का सखा, पिता, गुरु भी बन सकता है।
27:17 — (सार कथा) जिसने अवसर का सदुपयोग किया, वह वैकुंठ तक पहुँचा।
27:40 — जो मिला है उसका सदुपयोग करो; दुरुपयोग से दुर्गति होती है।
28:01 — (भजन) “यहाँ कुछ अपना नहीं है…” सब नश्वर है।
29:19 — शरीर भी अपना नहीं; हमारे कहने से नहीं चलता।
29:40 — रावण, सिकंदर, हिरण्यकश्यप — किसी का वैभव स्थायी नहीं रहा।
30:06 — दुख आए तो दुखहारी में प्रीति करो; विवेक और वैराग्य जगाओ।
30:16 — सुख आए तो बहुजन हिताय उपयोग करो।
30:32 — “यह भी नहीं रहेगा” — वैभव, अभिमान, शान सब नश्वर है।
30:55 — शाश्वत केवल आत्मा-परमात्मा है; वही नियंता और साक्षी है।
31:02 — उसी से प्रीति करो, स्मरण करो, ज्ञान प्राप्त करो।
31:14 — ओम्।
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