आश्रम संध्या सत्संग 27-02-2026 शाम | Surat Holi 2007
TIME STAMP INDEX
00:01 आत्म विश्रांति आवश्यक सामर्थ्य, सद्गुण और सफलताएँ दे देती है (उपदेश)
00:07 संसार में श्रम, धोखा और दुख अधिक है; डॉक्टर, वकील, सेठ बनकर भी तृप्ति नहीं मिलती (उपदेश)
00:39 संसार तेरा स्थायी घर नहीं; दो-चार दिन रहकर अपने स्वराज, आत्मराज को याद कर (उपदेश)
00:50 स्व का आत्मराज निष्कंटक है, वहीं सच्चा सुख है (उपदेश)
00:56 सच्चा सुख, सच्चा जीवन और श्रम रहित सफलता परमात्मा से मिलती है (उपदेश)
01:18 जगत का पालनहार और नियामक एक ही सत्ता है (उपदेश)
01:40 कृष्ण का बड़ा नाम है; उसके ज्ञान के आगे दुनिया तुच्छ है (भजन)
01:50 एक ही सत्ता सबके हृदय का संचालन करती है, वही सुखस्वरूप है (उपदेश)
02:07 वही परमात्मा गर्भस्थ शिशु का पालन करता और माँ में दूध उत्पन्न करता है (उपदेश)
02:21 बुद्धिमान भी दुख से नहीं बचता, पर नींद और श्वास सबको समान मिलती है (दृष्टांत)
02:57 भगवत सत्ता से न चाहने पर भी दुख और सुख आते हैं (उपदेश)
03:11 सुख स्थायी रहे ऐसा आग्रह या दुख स्थायी रहे ऐसा भय—दोनों हानिकारक हैं (उपदेश)
03:33 भगवान के सुखस्वभाव को जानकर श्रम रहित मौज में रहो (उपदेश)
03:50 श्रम रहित मौन सत्संग की महिमा बताई (उपदेश)
04:02 श्रम रहित मौन सत्संग न नींद है न कल्पना; शांत सत्ता में स्थित होना है (उपदेश)
04:16 कार्य से पहले और बाद में थोड़ा मौन विश्राम करो (उपदेश)
04:29 आत्मा सत्य है, शरीर सत्य नहीं; सुबह-शाम आत्मा में शांत हो जाओ (उपदेश)
04:50 इससे बुद्धि में भगवत बल बढ़ता है (उपदेश)
05:05 मनचाही वस्तु पाकर सुखी होना निम्न है; इच्छा हटाकर आत्मा में आना उच्च है (उपदेश)
05:28 इच्छित वस्तु भोगने के बाद भी अंत में खोखलापन रहता है (दृष्टांत)
05:46 गाड़ी, धन, पद बढ़े तो परिश्रम और शत्रु भी बढ़ते; अंत में सब छूट जाता है (उपदेश)
06:19 संसार का कार्य करते हुए भी समय निकालकर इच्छा रहित आत्मविश्राम पाओ तो दोनों हाथ में लड्डू (दृष्टांत)
06:41 भगवान अंतरात्मा से बुलाते हैं—मेरी ओर आकर शांति पा ले (संवाद)
07:02 एक ही परम सत्ता कर्म का नियमन और फल प्रदान करती है (उपदेश)
07:27 जैसे आकाश एक है वैसे परमात्मा सत्ता सर्वत्र है (दृष्टांत)
07:32 उसमें श्रम रहित विश्राम पाओ तो टेंशन और दुख नहीं टिकते (उपदेश)
07:47 बीते दुख को याद कर शोक करना ओज और बुद्धिबल नष्ट करता है (उपदेश)
08:09 भविष्य की चिंता मोह है; इससे बुद्धि दब जाती है (उपदेश)
08:21 उस परम सुखदायी सत्ता में विश्राम पाने का चिंतन करो (उपदेश)
08:31 जैसे नींद और श्वास सबके अधिकार की चीज है, वैसे परमात्मा में शांति भी सबका अधिकार है (दृष्टांत)
09:10 बाहर बिखरने से शक्ति खर्च, परमात्मा में विश्राम से शक्ति संचय होता है (उपदेश)
09:22 नींद से जड़ शक्ति मिलती है, परमात्मा में शांति से चेतन शक्ति मिलती है (उपदेश)
10:04 शांत बैठो; मन भटके तो भी मैं परमात्मा का हूँ, परमात्मा आनंदस्वरूप है (उपदेश)
10:50 मन विक्षिप्त हो तो लंबा श्वास लेकर नाड़ी शोधन कर “हरि ओम” से शांत हो जाओ (उपदेश)
11:18 पति दूसरी शादी करे तो भी ईश्वर में विश्रांति से बल और पुण्य बढ़ेगा (दृष्टांत)
11:46 हजारों बार पति आए-गए; आत्मा अमर है, व्यर्थ शोक मत करो (दृष्टांत)
12:20 श्रम रहित भगवान में शांति पाना उतना सहज है जितना श्वास और नींद (उपदेश)
12:39 भोजन से अधिक शक्ति श्वास से मिलती है; उससे भी अधिक शक्ति परमात्मा से मिलती है (दृष्टांत)
13:06 श्वास के साथ भगवान का नाम जपकर विश्रांति का अभ्यास करो (उपदेश)
13:25 इससे जीवन आनंददायी और विद्यार्थी विद्या में उन्नत होते हैं (उपदेश)
13:33 त्रिबंध सहित प्राणायाम से विशेष लाभ होता है (उपदेश)
14:00 मूलबंध, उड्डियानबंध और जालंधरबंध लगाकर प्राणायाम करो (उपदेश)
14:31 त्रिबंध प्राणायाम से काम विकार पर संयम और मन पर नियंत्रण आता है (उपदेश)
15:05 काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों पर विजय हेतु मूलबंध प्राणायाम उपयोगी है (उपदेश)
15:37 पेट अंदर खींचकर प्राणायाम करने से पाचन तंत्र, किडनी मजबूत होते और रोग मिटते हैं (उपदेश)
15:52 आयुर्वेदिक दवा की भी आवश्यकता नहीं रहेगी, प्राणायाम से स्वास्थ्य रक्षा होगी (उपदेश)
15:59 आरोग्य की रक्षा स्वतः होगी (उपदेश)
16:06 जालंधर बंध करने से श्वास की चाल संयमित होती है (उपदेश)
16:12 सामान्यतः एक मिनट में 15 श्वास, एक घंटे में 900 श्वास खर्च होते हैं (उपदेश)
16:25 24 घंटे में लगभग 21600 श्वास होते हैं (उपदेश)
16:31 यदि श्वास घटाकर 16000–17000 कर दिए तो आयु 20–25% तक बढ़ सकती है (दृष्टांत)
16:45 40 वर्ष की आयु 45–50 तक और 60 वर्ष 70 तक बढ़ सकती है—श्वास संयम से (दृष्टांत)
17:00 जालंधर बंध से टेंशन, चिंता और मानसिक असंतुलन कम होता है (उपदेश)
17:21 इससे हाई बीपी, लो बीपी तथा हाइपो/हाइपर थायरॉइड में लाभ होता है (उपदेश)
17:40 सप्ताह या पंद्रह दिन में एक उपवास करने की सलाह (उपदेश)
17:46 उपवास से शरीर में बने ट्यूमर और आम को जठराग्नि नष्ट करती है (दृष्टांत)
18:13 उपवास सच्चा हो; फलाहार, मिष्ठान्न आदि से पेट न भरें (उपदेश)
18:29 केवल जल, नींबू जल या शहद जल से उपवास करें तो रोग मिटते हैं (उपदेश)
18:57 इंद्र ने दैत्यराज से पूछा—राज्य छिनने पर भी तुम प्रसन्न कैसे? (प्रसंग)
19:37 यह महाभारत के शांति पर्व का प्रसंग है (प्रसंग)
19:51 दैत्यराज बोले—जगत में कोई स्थिति सदा एक समान नहीं रहती (उपदेश)
20:10 शरीर और राज्य अनित्य हैं; जो पहले था, अब है और रहेगा उसी आत्मा में विश्राम पाता हूँ (उपदेश)
20:33 शत्रु शरीर को कष्ट दे सकते हैं, आत्मा को नहीं; दुखी होना मेरे हाथ में है (उपदेश)
21:06 संत संग से आत्मविश्राम का महत्व समझा (प्रसंग)
21:21 राज्य छूटे तो छूटे; आत्मा को कोई छीन नहीं सकता (उपदेश)
21:37 इंद्र ने कहा—राज जाने पर भी तुमने असली राज पा लिया (प्रसंग)
22:06 मंत्री, मित्र, वाहवाही सब छूटे—यह संसार का स्वभाव है (उपदेश)
22:21 “देखत देखत ऐसा देख मिट जाए धोखा रह जाए एक” एकत्व में शांति (उक्ति)
22:49 पुत्र या पति के वियोग पर हाय-हाय करना अज्ञान है (उपदेश)
23:07 “हाय हाय नहीं, हरी हरी”—एक ही परमात्मा लीला कर रहा है (उपदेश)
23:22 सुख-सुविधा मिलने पर बड़ा और जाने पर छोटा मानना मूर्खता है (उपदेश)
24:08 गुजरात और राजस्थान के राज्यपाल का उदाहरण—पद से अहंकार नहीं (दृष्टांत)
24:30 वस्तु मिलने-जाने से जो अपने को बड़ा-छोटा माने वह अज्ञानी है (उपदेश)
24:47 आत्मा नित्य है, वस्तुएँ अनित्य; वस्तुएँ तुम्हारे लिए हैं, तुम उनके लिए नहीं (उपदेश)
25:15 शरीर-संसार रहें या जाएँ, आत्मा नित्य रहती है (उपदेश)
25:43 अनित्य के आकर्षण से दुख और थकान होती है; परमात्मा में विश्राम करो (उपदेश)
26:03 प्रतिदिन समय निकालकर ईश्वर में विश्रांति पाओ (उपदेश)
26:14 जिसने अनुराग दिया उसी से और मांगना अज्ञान है (उपदेश)
26:47 निगुरों की संगति से विवेक नष्ट होता है; सब हाय-हाय में भागते हैं (उपदेश)
27:11 परमात्मा में शांति न हो तो सूझबूझ भी सही नहीं रहती (उपदेश)
27:26 “एक भूला दूजा भूला भूला सब संसार” गुरुज्ञान से ही आधार मिलता है (उक्ति)
27:48 दैत्यराज शत्रु द्वारा सब छिनने पर भी प्रसन्न रहे (प्रसंग)
28:07 सहायता न मिले तो भी संताप न करो; शोक से रूप, आयु और ओज नष्ट होता है (उपदेश)
28:41 प्रसन्नता से ही आदर मिलता है; चिंता करने वाला तिरस्कृत होता है (उपदेश)
29:07 युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से प्रश्न किया (प्रसंग)
29:21 धन-संपत्ति और सफलता न मिले तो भी सुखी कैसे रहें? (प्रश्न)
29:47 भीष्म जी बोले—सफलता न मिले तो भी मनुष्य सुखी रह सकता है (उपदेश)
30:23 उद्योग करने पर भी धन न मिले तो उसकी इच्छा छोड़ दो (उपदेश)
30:41 जो मिला है वह भी छूटेगा; इच्छा छोड़ने से शांति मिलेगी (उपदेश)
31:12 इच्छा त्याग मात्र से परमात्मा में विश्रांति मिलती है (उपदेश)
31:19 परमात्मा के सुख के आगे धन और सफलता तुच्छ लगते हैं (उपदेश)
31:29 एक ऋषि का उदाहरण—धन के लिए उद्योग करते थे (प्रसंग)
31:37 मंकी ऋषि ने सोचा आश्रम के पास भूमि घेरकर अनाज उगाऊं, धनवान बनूं (प्रसंग)
31:52 दो छोटे बछड़े सस्ते में खरीदे कि बड़े होकर बैल बनेंगे और हल चलाएंगे (प्रसंग)
32:09 प्रारब्ध वेग से मार्ग में एक ऊंट बैठा था; दोनों बछड़े रस्सी सहित दाएं-बाएं निकलने लगे (दृष्टांत)
32:24 रस्सी ऊंट से अटकी, ऊंट खड़ा हुआ और दोनों बछड़े लटककर मर गए (प्रसंग)
32:40 ऋषि ने सोचा—जीवन भी ऐसा ही है; धन के लिए कितनी योजनाएं, पर प्रारब्ध न हो तो सब व्यर्थ (उपदेश)
33:08 मन को समझाया—धन-सफलता की इच्छा जितनी की, उतनी परमात्मा-शांति के लिए की होती तो कहाँ पहुँचता (उपदेश)
33:41 धन में अनर्थ है; प्रारब्ध हो तो सहज मिले, न हो तो प्रयास विफल (उपदेश)
34:00 दुख के स्थान पर हँसी आई—संसार का स्वभाव समझ में आया (प्रसंग)
34:22 टिप-टॉप रहने की इच्छा भी त्यागी; बुढ़ापा-मरण निश्चित हैं (उपदेश)
34:53 इच्छा-त्याग से परमात्मा-शांति मिली; गहरा आनंद प्रकट हुआ (उपदेश)
35:00 शुकदेव जी ने पिता व्यास जी से श्रेष्ठ धर्म का उपदेश माँगा (प्रसंग)
35:36 व्यास जी बोले—इंद्रिय-भोग की वासना जीव को तबाह करती है (उपदेश)
36:06 सादा जीवन रखो; शेष समय ध्यान-प्राणायाम में लगाकर परमात्मा-विश्रांति पाओ (उपदेश)
36:30 बुद्धि भगवत-प्रसाद बनती है; दुखों का अंत होकर ब्रह्मज्ञान होता है (उपदेश)
37:01 ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि और वाणी पाप-ताप हरती है; इसी हेतु मानव जन्म मिला (उपदेश)
37:30 इंद्र और युधिष्ठिर के प्रश्न—संसारी वस्तु न मिले तो भी दुख-रहित कैसे? (प्रसंग)
37:46 उत्तर—सबके प्रति समता रखो (उपदेश)
37:54 धन-संपत्ति हेतु विशेष खटपट और इच्छा न करो (उपदेश)
38:01 सत्य का आश्रय लो; भोग-वासना त्यागो; कर्म में आसक्ति छोड़ो (उपदेश)
38:16 धन, सत्ता, प्रसिद्धि बिना भी ऊँचा सुख और पद संभव है (उपदेश)
38:50 धन-सुविधा होते हुए भी लोग दुखी होकर आत्महत्या करते—क्योंकि शांति नहीं (दृष्टांत)
39:16 इच्छा-पूर्ति में श्रम और थकान; भोग में पराधीनता, शक्तिहीनता और जड़ता (उपदेश)
40:22 वस्तुओं का सीमित उपयोग करो; अंतरात्मा का आनंद लो—यही विश्राम का मार्ग (उपदेश)
41:05 सुखी रहने के पाँच सूत्र—समता, इच्छा-त्याग, सत्य, भोगासक्ति-त्याग, कर्मासक्ति-त्याग (उपदेश)
41:49 प्रीतमदास/सूरदास जैसे संत साधारण जीवन में परमात्मा-विश्रांति से ऊँचाई पर पहुँचे (दृष्टांत)
42:24 विश्रांति से दिव्य ज्ञान और राग-द्वेष रहित अवस्था आती है (उपदेश)
42:49 भक्ति में भी श्रम न बनाओ; कीर्तन-भजन के बाद भगवान में शांत हो जाओ (उपदेश)
43:13 मनमानी भक्ति क्लेश देती; शास्त्र-संत सम्मत भक्ति शांति देती (उपदेश)
44:16 यह भाषण नहीं—ईश्वर में विश्रांति और सत्य का संग है (उपदेश)
44:35 श्रम के पहले और बाद विश्राम आवश्यक; थोड़ा आत्मा में भी विश्राम करो (उपदेश)
45:09 विश्राम बिना श्रम की योग्यता नहीं; परमात्मा-विश्रांति बिना मुक्ति की योग्यता नहीं (उपदेश)
45:44 ध्यान-योग शिविर का उद्देश्य—गुरु-मौन से संशय निवृत्ति और विश्रांति (उपदेश)
46:07 रामण महर्षि के चरणों में विश्राम की महिमा; प्रधानमंत्री पद से भी बड़ा सुख (दृष्टांत)
46:28 मोरारजी देसाई ने कहा—प्रधानमंत्री सुख से बढ़कर आत्म-शांति है (प्रसंग)
46:53 इंद्र-सुख भी आत्म-शांति के आगे तुच्छ है (उपदेश)
47:05 कम खाओ, अधिक विश्राम पाओ; परमात्मा-शांति ही सार है (उपदेश)
47:30 प्रसाद की लालसा नहीं; परमात्मा का दिया हुआ आंतरिक दान स्वीकार करो (उपदेश)
47:42 “बापू आप हमारा दिया हुआ नहीं लेते तो आपका दिया हुआ हम भी नहीं लेंगे” (संवाद)
47:47 “बताओ, फिर आपकी मर्जी की बात है” (संवाद)
47:55 “ये लो, ये मिठाई नहीं” — विनोदपूर्ण भाव (संवाद)
48:10 “क्या साटा-माटा है? हम दें तो आप लो, तब हम आपका लें?” (संवाद)
48:17 “ऐसा साटा-माटा तो नहीं है ना?” — सरल हास्य (संवाद)
48:22 “साहब दया रखना, आप दोगे तो हम आपके दिए से ढक जाएंगे” (संवाद)
48:29 गुरु-प्रसाद के आगे शिष्य का समर्पण भाव (उपदेश)
48:36 “ॐ नारायण हरि, आज रे आनंद भयो” (भजन)
48:44 “मारा सतगुरु आया पावना” — गुरु-आगमन का उत्सव (भजन)
48:51 “सतगुरु आया पावना, परमेश्वर आया पावना” (भजन)
48:56 राजस्थान में गाया जाने वाला भक्तिभावपूर्ण कीर्तन (कीर्तन)
49:04 “फूलों जैसी प्रेम री चादर” — प्रेम का अलंकार (भजन)
49:11 “फूलों पहरावना, हारोरा पहरावना” — गुरु-सज्जा (भजन)
49:21 “आज रे आनंद भयो, मारा सतगुरु आया” (भजन)
49:30 “सदगुरु आया पावना, जोगी आया पावना” (भजन)
49:41 “रेशम री बिछावना, उठे बिराजे मोरा सतगुरु” (भजन)
49:50 भजन-कीर्तन द्वारा भी विश्राम पाया जा सकता है (उपदेश)
49:55 “बाबा, अपने परमात्मा सुख में आ जा” — आह्वान (उपदेश)
50:02 “गोमती गाय रो दूध मंगाऊं, दूध री खीर रंधावना” (भजन)
50:09 “अमृत भोजन गुरु जी ने जीमावना” — प्रेमपूर्ण सेवा (भजन)
50:14 भोजन से पहले और बाद परमात्मा में विश्राम का निर्देश (उपदेश)
50:20 “जीमाने के पहले थोड़ा विश्राम, बाद में भी विश्राम” (उपदेश)
50:28 “आनंद देवा, ओ शांति देवा” (कीर्तन)
50:35 “ॐ परमात्मा देवा” (कीर्तन)
50:55 आश्रम में ‘मोनी बाबा’ नामक महात्मा का उल्लेख (प्रसंग)
51:03 उनका विश्राम-भाव इतना गहरा कि हाथ पकड़कर खड़ा कर दो तो स्थिर रहें (प्रसंग)
51:10 संकल्प हटते ही पुनः विश्राम में स्थित हो जाना (दृष्टांत)
51:24 विश्राम में महान बल है (उपदेश)
51:33 अभ्यास से विश्राम की सिद्धि बढ़ती है (उपदेश)
51:48 “काहे को हाय-हाय?” — व्यर्थ चिंता त्यागो (उपदेश)
51:56 ओंकार मंत्र — गायत्री छंद, परमात्मा ऋषि, अंतर्यामी देवता (उपदेश)
52:05 जिस परमात्मा में शांत होना चाहते हैं वही अंतर्यामी देवता है (उपदेश)
52:13 वही गर्भस्थ शिशु का पालन करता है (उपदेश)
52:21 वही शरीर, मन और समस्त ब्रह्मांडों का स्वामी है (उपदेश)
52:27 वही ओंकार मंत्र का देवता है (उपदेश)
52:33 उसी की प्रीति और विश्रांति हेतु जप किया जाता है (उपदेश)
52:40 “प्रेम मन इधर-उधर न जाओ” — एकाग्रता का आह्वान (उपदेश)
52:51 “ॐ” — जप का आरंभ (कीर्तन)
53:18 “हरि ॐ, ॐ आनंद ॐ” (कीर्तन)
53:24 “ॐ ॐ शांति ॐ” (कीर्तन)
53:30 “ॐ ॐ ॐ माया हो” (कीर्तन)
53:54 “ॐ” — पुनः जप (कीर्तन)
54:08 “[संगीत] आनंद है” — भगवत-विश्रांति का अनुभव (भजन)
54:16 “[संगीत] माधुर्य है, भगवत विश्रांति है” (भजन)
54:25 “तू-तू मैं-मैं दूर जाए” — द्वैत का त्याग (उपदेश)
54:31 “हमें जो चाहिए वो हमारे साथ है” — शाश्वत का बोध (उपदेश)
54:36 जो छूटने वाला है वह आता-जाता रहता है (उपदेश)
54:44 जो चाहिए वह शाश्वत है और अपना है (उपदेश)
54:50 “[संगीत] आनंद, मंगल” (भजन)
54:55 “ऐसा भी होता है, पता नहीं था” — आश्चर्य भाव (प्रसंग)
55:04 “यहां भगवान मिलते हैं, पता नहीं था” (प्रसंग)
55:11 गुरु की पहचान करना सरल नहीं (उपदेश)
55:24 “नजरों से निहाल हो जाते जो संतों की नजरों में आ जाते” (भजन)
55:32 प्रभु की दृष्टि में आने से जीवन खुशहाल होता है (उपदेश)
55:38 “नजरों से निहाल, खुशहाल हो जाते” (भजन)
55:44 “हे गुरु कृपा, तू मेरे हृदय में सदा निवास करना” — प्रार्थना (प्रार्थना)
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