मंगलवार, 27 मई 2025

Divya Shraddha - दिव्य श्रद्धा












    



divya shraddha pvt 


         शरीर तब तक भारी रहता है जब तक उसमें कफ और वायु की विपुलता रहती है, कफ और वायु अधिक होता है तो शरीर आलसी और भारी रहता है, 2:02 शरीर भारी तब तक रहता जब तक कफ और वायु का प्रमाण अधिक है, वात  प्रकृति और कफ प्रकृति, आसन स्थिर करने से, एक ही आसन पर बैठने से, शरीर में विद्युत प्रकट होती है, जो कफ को और वायु को कंट्रोल करके शरीर को आरोग्यता  देती है , शरीर में बिजली पैदा होती है वह आरोग्यता की रक्षा करती है, शरीर हल्का लगता है, स्फूर्ति वाला लगता है, क्रिया करने से विद्युत खर्च होती है, और स्थिर आसन पर बैठकर धारणा करने से ध्यान करने से विद्युत बढ़ती है, बिजली बढ़ती है, और विद्युत तत्व बढ़ने से शरीर निरोग रहता है, मन स्फूर्ति में रहता है,




       3:16  संसार से वैराग्य होना कठिन है, वैराग्य हो भी जाए तो कर्मकांड से मन उठना कठिन है, कर्मकांड से उठ भी गए तो ध्यान में लगना मन का कठिन है ध्यान में लग गए तत्व ज्ञानी गुरु मिलना कठिन तत्व ज्ञानी गुरु मिल भी गए तो उनमें श्रद्धा होना कठिन है श्रद्धा हो भी गई तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन है, तामसी श्रद्धा होती है तो कदम कदम पर फरयाद करती तामसी श्रद्धा में समर्पण नहीं होता है भ्रांति होती है समर्पण की , तामसी श्रद्धा विरोध करती, राजसी श्रद्धा हिलती रहती है, और भाग जाती है, किनारे लग जाती है, और सात्विक श्रद्धा होती है तो चाहे गुरु के तरफ से कैसे भी कसोटी हो किसी भी प्रकार की परीक्षा हो तो सात्विक श्रद्धा वाला धन्यवाद से अहो भाव से भरकर स्वीकृति दे देगा,

       5:05  संसार से वैराग्य होना कठिन वैराग्य हो गया तो कर्मकांड छूटना कठिन कर्मकांड छूट गया तो उपासना में मन  लगना भी कठिन उपासना में मन लग गया तो तत्व ज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी गुरुओं का मिलना कठिन तत्व ज्ञानी गुरुओं का मिलना अभी हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन क्योंकि प्राय राजसी और तामसी श्रद्धा वाले लोग बहुत होते हैं तामसी श्रद्धा कदम कदम पर इंकार करेगी विरोध करेगी अपना अहम नहीं छोड़ेगी और श्रद्ध के साथ इष्ट के साथ गुरु के साथ विरोध करेगी, तामसी श्रद्धा होगी तो, राजसी श्रद्धा होगी तो जरा सा परीक्षा हुई या थोड़ा सा खड़ा या तो राजसी श्रद्धा वाला किनारे हो जाएगा भाग जाएगा और सात्विक श्रद्धा होगी तो श्रद्ध के तरफ से हमारे उत्थान के लिए चाहे कैसी भी कसोटी हो चाहे कैसे भी साधन वजन की पद्धतियां हो प्रयोग हो व्यवहार हो अगर सात्विक श्रद्धा है तो वह तत्व वेता गुरुओं के तरफ से मिलने वाली तमाम साधना पद्धति अथवा चार व्यवहार जो भी व अहो भाव से वाहवा धन्यवाद उसे फरियाद नहीं होगी उसे प्रतिक्रिया नहीं होगी 6:41 | सात्त्विक श्रद्धा हो गया तो फिर तत्व विचार में मन लग जाता है नहीं तो तत्व ज्ञानी गुरु मिलने के बाद भी तत्व ज्ञान में मन लगना कठिन है | आत्म साक्षात्कार गुरु मिल जाए और उसमें श्रद्धा हो जाए तो जरूरी नहीं कि सब लोग आत्म ज्ञान के तरफ चल पड़े | नहीं राजसी श्रद्धा तामसी श्रद्धा वाला आत्म ज्ञान के तरफ नहीं चल सकता व तत्व ज्ञानी गुरुओं का सानिध्य  पाकर अपनी इच्छा के अनुसार फायदा लेना चाहेगा, लेकिन जो वास्तविक फायदा है, जो तत्व ज्ञानी गुरु देना चाहते हैं, उससे वो वंचित रह जाएगा, सात्विक श्रद्धा वाला होता है उसको ही तत्व ज्ञान का अधिकारी माना गया, और वही तत्व ज्ञान पर्यंत गुरु में अडिग श्रद्धा,


         जैसे संदीपक की थी भगवान विष्णु आए वरदान देने के लिए नहीं लिया, भगवान शिव आए वरदान नहीं लिया, गुरु ने कोड़ी का रूप धारण कर लिया, बुरी तरह परीक्षाएं की, पीट देता था, मार देते थे चाटा, फिर भी वो  गुरु के शरीर से निकलने ला गंदा खून, कोड़ की बीमारी से आने वाली बदबू, मवाद फिर भी संदीपक  का चित्त कभी शुभ नहीं करता था, उबता नहीं था, 8:25


        8:25 ऐसे विवेकानंद की सात्विक श्रद्धा थी, तो राम कृष्ण देव में, अहो भाव बना रहा और जब राजसी श्रद्धा हो जाती तो कभी हिल जाती ऐसे छह बार नरेंद्र की श्रद्धा हिली थी,  8:40


       8:40 आत्मज्ञानी गुरु मिल जाना कठिन है, आत्मज्ञानी गुरु मिल जाए तो उसमें श्रद्धा टिकना सतत कठिन है, क्योंकि श्रद्धा रजस और तमस गुण से प्रभावित हो जाती है तो हिलती जाती है या विरोध कर लेती है, इसलिए जीवन में सत्व गुण बढ़ना चाहिए, आहार की शुद्धि से, चिंतन की शुद्धि से, सत्व गुण  की रक्षा की जाती है, अशुद्ध आहार अशुद्ध व्यक्तियों विचारों वाले व्यक्तियों का संग साधन के तरफ लापरवाही रखने से श्रद्धा का घटना बढ़ना टूटना कुटना होता रहता है, इसलिए साधक साध्य तक पहुंचने में उसे वर्षों गुजर जाते हैं, कभी-कभी तो पूरा जन्म गुजर जाता है, फिर भी साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं, 9:35 हकीकत में छ महीना अगर ठीक से साधना की जाए खाली छ महीना, फक्त छ महीना ठीक से साधना की जाए तो संसार की वस्तुएं और संसार आकर्षित होने लगता है 9:54 , सूक्ष्म जगत की कुंजियां हाथ में आने लगती है, छ महीना अगर सात्विक श्रद्धा से ठीक साधन किया जाए तो बहुत आदमी ऊंचे उठ जाता है, रजोगुण तमोगुण से बचकर जब सत्व गुण बढ़ता है, तो तत्व ज्ञानी गुरुओं के ज्ञान में आदमी प्रविष्ट होता है, तत्व ज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं रहती,  अभ्यास तो भजन करने का है, और अभ्यास तो श्रद्धा को सात्विक बनाने काहै, 10:45 अभ्यास भजन का अभ्यास बढ़ने से सत्व गुण बढ़ने से विचार अपने आप उत्पन्न होता, है महाराज ऐसा विचार उत्पन्न करने के लिए भी भजन में सातत्य होना चाहिए, और श्रद्धा की सुरक्षा में सतर्क होना चाहिए, इष्ट में भगवान में गुरु में श्रद्धा, श्रद्धा हो गई तत्व ज्ञान में गति करना, 11:13  


        11:13 तत्व ज्ञान तो कईयों को मिल जाता है लेकिन उस तत्व ज्ञान में स्थिति नहीं करते, और स्थिति करते हैं तो ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की खबर हम नहीं रख पाते हैं, ब्रह्माकार  वृत्ति उत्पन्न हो जाए, साक्षात्कार होता है, साक्षात्कार करने के बाद भी अगर उपासना  तगड़ी नहीं किया और गुरु कृपा से जल्दी हो गया साक्षात्कार तब भी भी विक्षेप रहेगा, मनोराज आने की संभावना है, 12:00 इसलिए साक्षात्कार के बाद भी, ब्रह्म अभ्यास करने में लगे रहते हैं बुद्धिमान उच्च कोटि के साधक, साक्षात्कार करने के बाद भी भजन में अथवा ब्रह्मा अभ्यास में ब्रह्मानंद में लगे रहना यह साक्षात्कारी की शोभा है, 12:23


          12:23 अब जिन महापुरुषों को परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता वे, वे भी ध्यान भजन में और शुद्धि में ध्यान रखें, रखते हैं, तो हम लोग अगर लापरवाही कर दे तो हमने तो अपने पुण्यं की कबर ही खोद दी, इसलिए जीवन में जितना उत्साह होगा सतर्कता होगी और जीवन दाता  का मूल्य समझेंगे, उतना ही यात्रा उच्च कोटि के होगी, ब्रह्माकार  वृति उत्पन्न होना यह भी ईश्वर की कृपा है, सात्विक श्रद्धा होगी तब आदमी ईमानदारी से अपने अहम को परमात्मा में अर्पित होगा, 13:24


          13:24 तुलसीदास जी ने कहा यह फल साधन ते न होई, यह जो ब्रह्म ज्ञान का फल है वह साधन से प्रकट नहीं होगा, साधन करते करते सात्विक श्रद्धा तैयार होती है, और सात्विक श्रद्धा ही अपने तत्व में इष्ट में अपने आप को अर्पित करने को तैयार हो जाती है, जैसे लोहा अग्नि की वाहवाही तो करे, अग्नि के वखाण तो करे, अग्नि को नमस्कार तो करे, लेकिन तब तक लोहा अग्नि नहीं होता जब तक लोहा अपने आप को अग्नि में अर्पित नहीं कर देता है, लोहा अग्नि के बठठे में अर्पित होते ही उसके रग रग में अग्नि प्रविष्ट हो जाती है व लोहा अग्नि का ही एक पुंज दिखता है, 14:18


        14:18 ऐसे ही जीव उस ब्रह्म स्वरूप में अपने आप को जब तक अर्पित नहीं करता, तब तक भले भगवान के गीत गाए जाए, गुरु के गीत गाए जाए, गुण अनुवाद किए जाए, लाभ तो होगा, लेकिन गुरु मय, भगवत मय तब तक नहीं होगा, जब तक अपने मैं को ईश्वर में गुरु में अर्पित नहीं कर देता, ईश्वर और गुरु शब्द दो है, बाकी एक ही तत्व होता है, ईश्वर गुरुर आत्ममेती मूर्ति भेदे  विभागिनो मूर्ति से दो दिखते हैं, मूर्तिया अलग-अलग है, आकृति अलग अलग दिखती है, बाकी ईश्वर और गुरु एक ही चीज है ,  गुरु के हृदय में जो चैतन्य है चमका है, वही ईश्वर के हृदय में प्रकट हुआ है, 15:03


        15:03 ईश्वर भी, अगर परम कल्याण करना चाहते हैं तो गुरु का रूप लेकर उपदेशक का रूप लेकर भगवान कल्याण करेंगे, परम कल्याण संसार का आशीर्वाद तो भगवान ऐसे ही दे देंगे, लेकिन जब साक्षात्कार कराना होगा तो भगवान को भी आचार्य की गादी पर बैठना पड़ेगा, आचार्य पद के ढंग से उपदेश देंगे भगवान, जैसे श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया, श्री रामचंद्र जी ने हनुमान जी को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया, 15:38


          15:38 और साधक भजन करते हैं भजन की तीव्रता से भाव मजबूत हो जाता है, और भाव के बल से, अपने भाव के अनुसार संसार में चमत्कार भी कर लेता है, भाव की दृढ़ता से, भाव पराकाष्ठा नहीं है, भाव बदलते रहते हैं, पराकाष्ठा ब्रह्माकार  वृत्ति उत्पन्न करके साक्षात्कार करना, तो साधन भजन में उत्साह और जगत में नश्वर बुद्धि और लक्ष्य की ऊंचे लक्ष्य की हमेशा स्मृति ये साधक को बना देगा, अगर ऊंचे लक्ष्य का पता ही नहीं, आत्म साक्षात्कार के लक्ष्य का पता ही नहीं, ब्रह्माकार  वृति उत्पन्न करके आवरण भंग करना और साक्षात्कार कर, करके जीवन मुक्त होने का अगर जीवन में लक्ष्य नहीं है, तो छोटी मोटी साधना में छोटी मोटी पद्धतियों में आदमी रुका ही रहेगा, कोलू  के बैल जैसा वही जिंदगी पूरी कर देगा,


         16:56 मैंने अर्ज किया था ना कि संसार से वैराग्य होना कठिन है, वैराग्य हुआ तो फिर कर्मकांड से मन उठना कठिन है, कर्मकांड से मन उठ गया तो उपासना में लगना कठिन है, उपासना में लग गया तभी तत्व ज्ञानी गुरुओं को खोजना कठिन है, तत्व ज्ञानी गुरुओं का मेलाप भी हो गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन है, उनमें श्रद्धा महाराज हो भी गई, श्रद्धा तो हो भी जाती है लेकिन टिकी रहे, ये बड़ा कठिन है, और श्रद्धा टिकाई तभी भी तत्व ज्ञान के प्रति प्रीति होना कठिन, तत्त्वज्ञान हो गया तो उसमें स्थिति होना कठिन है, स्थिति हो गई महाराज तो ब्रह्मा का वृत्ति करके आवरण भंग करके जीवन मुक्त पद पे  पहुंचना, परम पुरुषार्थ है, 17:41


        17:41 अगर सावधानी से छ महीने तक आदमी ठीक ढंग से उपासना करे, ठीक ढंग से, तत्व ज्ञानी गुरुओं के ज्ञान को विचारे, तो उसके मन का संकल्प विकल्प कम होने  लगता है संसार का आकर्षण कम होने लगता है, और उसके चित्त में विश्रांति आने लगती है, उससे संसार की सफलताएं आकर्षित होने लगती है, संसार आकर्षित होने लगता है, संसार माना क्या जो सरकने वाली चीजें हैं यह संसार की जो भी चीजें व सरकने वाली वे उस साधक से आकर्षित होने लगते फिर उसे रोजी रोटी ये वो कुटुम्बी  संबंधी समाज के दूसरे लोगों को रिझाने के लिए नाक रगड़ना नहीं पड़ेगा, वे लोग तो ऐसे ही रिझने को तैयार हो जाएंगे,  खाली छ महीना ठीक ढंग से साधन में लगे रहे,  तो सारी जिंदगी की मजूरी से जो नहीं पाया, वह छ महीने में तो वह पाएगा, लेकिन साधक के लिए तो वह भी तुच्छ हो जाता है उसका लक्ष्य साध्य है ऊंचे में ऊंचा आत्म साक्षात्कार  18:57


       18:57 ध्रुव को पहलाज को पिता ने भजन करने से रोका था| लेकिन पहलाज की भगवान में प्रीति थी सत्संग सुना था कयादू के गर्भ में रहते रहते|  पांच महीने का पहलाज था मां के गर्भ में, तो उसकी मां नारद जी के आश्रम में रही थी मां तो सत्संग सुनते झोका खा लेती थी, लेकिन व मां के अंदर बैठा हुआ जो प्रहलाद था उसको सत्संग के संस्कार पड़े,  11 वर्ष का हुआ तो पिता ने उसे रात को निगरानी करने के लिए गस्त करने के  लिए सिपाहियों के साथ भेजा,

         19.५४  तो देखा कोई निभाडा,  किसी कुंभार ने  निभाडा  आग लगाई थी, घड़े पका रहा था मटके, अग्नि देखकर वहां गए कि क्या हुआ आग लगी है क्या?  देखा तो कुहार प्रार्थना किए जा रहा है, कि परमात्मा अब मेरे हाथ की बात नहीं और तू चाहे तो तेरे लिए कठिन नहीं| भगवान मैं तो नादान हूं, मैंने तो भूल की, लेकिन उस भूल को तू सुधार दे, तू दया कर, मैं जैसा हूं तैसा हूं लेकिन तेरा हूं तू रहम कर, तू अगर चाहे तो सब हो सकता है, उन निर्दोष बच्चों को तूही बचा सकता है, 20.32  पहलाद ने कहा क्या बात है क्या बोल रहे, ले निभाड़े में मटके बनाए थे, हमने मटके बनाए थे. उन मटको में बिल्ली ने बच्चे दे रखे थे,  सोचा कि जब मटके पकाएन्गे तो यह  बिल्ली के बच्चों को निकाल देंगे, उचित जगह पर रख देंगे , लेकिन भूल  गए, और बीच नेभाड़े के बिल्ली के बच्चे रह गए और निभाडे को आग लगा दी गई, अब याद आया है कि अरे… वो बेचारे नन्हे मुन्ने मासूम जल के मर जाएंगे, अब हमारे हाथ की तो बात नहीं, चारों तरफ आग ने लपट ले ली, वो अगर चाहे तो हमारी गलती को भी सुधार सकता है, बचा सकता है, 21.16  उन बच्चों को, प्रहलाद ने कहा ये क्या पागलपन की बात,  चारों तरफ आग और बिल्ली के बच्चे बच सकते हैं? 

 बोले वो परमात्मा करतुम शक्यं, अकरतुम शक्यं, अन्यथा करतुम शक्यं,  वो जो चाहे वह कर सकता है, उससे अलग भी कर सकता है, और नहीं भी कर सकता है, थाम दे, किसी वस्तु को थाम भी सकता है, एक जरा सा बीज देखो क्या हरा भरा कर देता है, फले केले कैसे लगा देता है य केल में, एक पानी की बूंद में कैसा राजा महाराजा खड़ा कर देता है, वही पानी की बूंद मनुष्य बनकर- रोती है, हंसती है, गाती है, आती है, और बॉय कट होता है, लेडीज कट बनता है क्या क्या कट बनता है, वही मनुष्य, और वही कभी अच्छा, कभी बुरा, कभी अपना, कभी पराया, ऐसे करके मेरा तेरा करके ढगले लगा के फिर राख की मुठी छोड़ के भाग जाता है| यह क्या उसकी लीला का परिचय नहीं है? उसकी चमत्कार नहीं है? समुद्र में बड़वानल रहती है वह पानी से बुझती नहीं, और पेट में जठराग्नि रहती है, वह शरीर को जलाती नहीं,  गाय सूखा घास खाती है, और चिकना चिकना मक्खन घी दूध और  दही बन जाता है, उसी घास का रूपांतर होके, और सर्प दूध पीता है, जहर बना देता है, मां रोटी खाती है और बच्चे के लिए दूध बन जाता है, और जब बच्चा बड़ा हो जाता तो दूध बंद हो जाता है,  क्या यह ऑटोमेटिक सिस्टम उसकी कितनी  है?  उसकी लीला पर पार उसकी महिमा अपरंपार है, 


वो अगर रहमत कर दे, बालक बिल्ली  के बच्चे बच सकते हैं, बोले कैसे बचते जरा जब ये  निभाडा  खोलो ने तब मुझे बुलाना, कुंभार ने कहा के राजकुमार निबाड़ा खोलू तब क्या तुम्हें बुलाऊ, मेरा  तो मटके का निबाड़ा है,  कोई ईट का नहीं निभाडा के तीन दिन चाहिए अग्नि|  आप सुबह आना आप आएंगे फिर मैं खोलूंगा सुबह को पहलाद आए और उसने भगवान का स्मरण करते अंतर्मुखी होकर उस अंतर्यामी परमात्मा को प्रार्थना करते हुए, निभाड़ के चह और से मटके हटाए और जब बीच के मटके तक पहुंचा तो देखा चार मटके कच्चे रह गए, और उनमें से बच्चे म्याव म्याव करते छलांग मार के जिंदे बाहर निकले |२३.52 


२३.52 पहलाज ने सत्संग तो सुन रखा था, अब स्मृति आ गई, सार तो वही है, पहलाज का मन भगवान में लग गया,  संसार से  वैराग्य हो गया, मन भजन में लग गया, मन भजन में लग गया तो महाराज विरोध हुआ, लेकिन विरोध होते हुए भी भजन करता है, फिर पिता ने हिरण्यकश्यप उने उसे धमकाया डांटा जलाद से धमकवाया  पर्वतों से धकेलवाया फिर भी प्रहलाद की श्रद्धा नहीं टूटी| 24.32 


  24.32  श्रद्धा होना कठिन है, लेकिन श्रद्धा हो जाए तो टिकना कठिन है, और श्रद्धा टिक गई तभी भी तत्व ज्ञान होना कठिन है | जय जय | बिना तत्व ज्ञानी गुरुओं के महाराज ….| पहलाज को पिता ने पानी में फिंकवाया तब भी देखा कि- जो हरी बिल्ली के बच्चों को बचा सकता है क्या  मैं उसका बच्चा नहीं? भगवान के शरण हो गए|  पानी में फिंकवाया डूबा नहीं, पहाड़ों से गिरवाया  लेकिन मरा नहीं,25.02  आखिर लोहे के थंबे को तपा कर हिरण्यकश्यप ने कहा तू बोलता व मेरा भगवान सर्व समर्थ है सर्वत्र है, तो कहां है तेरा भगवान दिखा? सब जगह है सर्वत्र है, और जहां चाहे जहां से भी प्रकट हो, तो जाय ये लोहे के थंबे में तेरा भगवान है तो उसको आलिंगन कर, और प्रहलाद ने सच्ची भावना से तीव्र भावना से आलिंगन किया और कड़ा भुस करके थंबा फट निकला, और उसमें से नरसिंह अवतार का प्राकट्य हुआ,  यदा यदा ही धर्मस्य | 


        25.३४जब भोगी का प्रभाव भक्त के प्रभाव को दबाता है, और भोगियों का प्रभाव बढ़ जाता है, जोर जुलम बढ़ जाता है तब तब भगवान चाहे कहीं से किसी रूप में से प्रकट होने को समर्थ है, भगवान तो प्रकट हो गया लेकिन भगवान के तत्व को जानना कठिन है महाराज, जय जय, नरसिंह भगवान्  का अवतार हुआ नरसी भगवान प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को उमरे पर बैठकर, गोद में लेकर पूछा के बोल दिन है कि रात, सुबह है कि शाम, ना दिन है ना रात है, ना सुबह है ना शाम है, संध्या है, मनुष्य हूँ के राक्षसों हूँ ,  ना मनुष्य ना पशु,  जो भी वरदान मांग रखे थे इससे ना मरू इससे ना मरू उससे ना मरू व सब के सब वरदान के बावजूद भी, ऐसा रूप भगवान ने धारण कर लिया, कि नखो से, ना अस्त्र से मरुँ  ना शस्त्र से मरुँ, ना पुरुष से मरुँ ना स्त्री से मरुँ, ना पुरुष ना स्त्री ना नान्यतर, एकदम नरसिंह अवतार, एकदम एक्स्ट्रा वीआईपी कोटा का अवतार, वो  प्रकट कर सकते, ऐसा जिस भक्त के लिए भगवान अवतार धारण कर सकते हैं, ऐसे भक्त प्रहलाद को| 


27.02  देखो तव ज्ञान नहीं हुआ तो उसकी श्रद्धा कैसे डाउन हो जाती है, अब देखना, ये  अध्यात्मिक विष्णु पुराण की कथा में से मैं तुम्हें सुना रहा हूं, हिरण्यकश्यप को फाड़ के  भगवान ने सद्गति देदी, राज पहलाज को मिला, भगवान अंतर्धान हो गए, समय जाने के बाद शुक्राचार्य देवों के जो असुरों के जो आचार्य थे, उन्होंने पहलाज को बोला कि अरे पहलाज क्या तूने बोला था विष्णु को, कि मेरे पिता को मार डालो, बो मैंने पिताजी को मारने के लिए तोत नहीं कहा था, वह तो उनके जैसे वरदान लिए दिए गए थे  ….|  बोले तूने तो कहा नहीं फिर तेरे बाप को क्यों मारा उसने? अगर   उनकी तुम्हारे में पूरी प्रीति थी तो तेरे बाप की बुद्धि सुधार देते, तेरे  बाप को मारा क्यों, देखो श्रद्धा तो है प्रहलाद की तीव्र लेकिन श्रद्धा को हिलाने वाले लोग जब मिल जाते हैं ना, तो श्रद्धा छू हो जाती है,  और ऐसे हजारों हजारों मिलते ही रहते हैं, यह दुर्भाग्य है हम लोगों का कि ऐसे हमको हिलाने वाले मिलते ही रहते हैं,  साधन में से श्रद्धा हिलाना, भगवान में से गुरु मंत्र में से, गुरु में से श्रद्धा हिलाने का कोई ना कोई अभागा आदमी हमको मिलता ही रहेगा, नहीं तो हमारा मन ही विरोध करेगा, मिलेगा, तर्क वितर्क सोच के, श्रद्धा को हिलाएगा|  इसलिए श्रद्धा टिकना कठिन|  


प्रहलाद को वो दैत्यों का गुरु कहता है, कोई तत्व ज्ञानी नहीं है लेकिन व्यवहार कुशल है, संजीवनी विद्या जानता है, प्रभाव तो है, लेकिन ब्रह्म ज्ञान के सिवाय का प्रभाव किस काम का? 


२८.50  तूने जब कहा नहीं और तेरे बाप को मार डाला, और फिर भी तू उसको पूजता है, कैसा तू मूर्ख है इतनी श्रद्धा, अंधश्रद्धा, किसी को कह दो इतनी श्रद्धा अंधश्रद्धा, वो बोलेगा नहीं अंध श्रद्धा, नहीं मेरी सच्ची श्रद्धा है, सच्ची श्रद्धा तो बोलेगा लेकिन तुम्हारा अंध श्रद्धा बोलना भी उसके श्रद्धा के निव को तो जरा झकझोर देगा |  शब्द असर करते हैं, देर सवेर असर करते हैं,  फिर दो दिन बीते, फिर बातचीत में, अच्छा तेरी श्रद्धा है, विष्णु  भगवान ने मार डाला, पिता को, तो पिता की मृत्यु होने के बाद भी तेरे को ऐसा नहीं होता है कि उन्होंने ठीक नहीं किया, इतना भी तेरे पास अकल नहीं, इतनी भी तेरी समझ नहीं है, देखो कैसे कैसे उलट रहे खोपड़ी को, | बोले हा ठीक तो नहीं हुआ, लेकिन अब क्या करें, हिला, भीतर से हिला | जय राम जी की |हाँ  ठीक तो नहीं किया लेकिन

 अब क्या करे,  भगवान है, अच्छा तो नहीं हुआ लेकिन अब क्या करे, भगवान है | समझो श्रद्धा के परसेंटेज डाउन

 हो गए  | क्या करें,  भगवान छे  गुरु छे , gj…. चला चला तो हली गया चला पड़ कर बापू छ भगवान न गुरु छ आप गुरु छ जवा दो जवा  


तो तुम  बड़ी कृपा कर रहे हो, तुम अपने अहम के दायरे को मजबूत करके क्षमा कर रहे हो गुरु को, तुम मिट नहीं रहे हो , गुरु के कृत में, भगवान की दृष्टि में तुम अपने मैं को मिटा  नहीं रहे हो, लेकिन तुम मैं को सुरक्षित रखकर भगवान या गुरु को माफ कर रहे हो | जय राम जी की | ध्यान रहे यह सूक्ष्म बातें हैं तत्व ज्ञान में साक्षात्कार में कौन सी बातें आकर हमारे जैसे, उदै  घुन लग जाती, लगती जरा  बारीक उदै  है, लेकिन कितने मजबूत लक्कड़ को मिट्टी में मिला देती है | ऐसे ही यह जो बातें हैं ना हिलाने वाली, लगती तो छोटी छोटी सी, लेकिन परब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार के करने के सामर्थ्य को खाकर नष्ट कर देती है|31.०९  यह बेवकूफी ऐसी होती है, इसीलिए साक्षात्कारी महापुरुष जल्दी से तैयार नहीं हो पाते |  क्यूँ की साधक हैं बिचारे बाज, और लोग है शिकारी, किसी न किसी भाव से किसी न किसी वातावरण से उसको

 गिरा देते हैं |  स्वामी विवेकानंद बोलते थे कि, गुरु बनना माना अपने तपस्या के कोष में से कुछ न कुछ दान करना, आज हर भिखारी सहस्त्र हजारों असरपिया  दान करना चाहता है | उसकी साधना का कोश तो होता नहीं उसके पास, उसके पास आध्यात्मिक कोष का खजाना पूरा भरा हुआ होता नहीं, कुछ थोड़ी बहुत सूचनाएं

 सुनकर थोड़ी बहुत कथाएं वार्ताएं सुनकर सब गुरु बनने लग जाते| 31.52 


 महाराज शुक्र ने हिलाया, किसको? प्रहलाद को, जो  पर्वतों से गिराने पर जिसकी श्रद्धा नहीं गिरी   भगवान के प्रति श्रद्धा नहीं गिरी, पानियों में फिकवाने से जिसके जीवन की रक्षा कर दी जीवनदाता ने, उस जीवन दाता के प्रति प्रहलाद को थोड़ा हुआ कि, इन्होने यह ठीक नहीं किया, 32.12  जब इष्ट में लग जाता कि ठीक नहीं किया तो क्या तुम्हारी श्रद्धा का ये प्रदर्शन है कि नहीं | मेरी भगवान में इतनी श्रद्धा फिर भी मेरे बाप को मार डाला,  ये तो अच्छा नहीं किया, बोले जब अच्छा नहीं किया, तो ऐसे आदमी को खबर पड़नी चाहिए कि, क्या किया?  खबर मैं कैसे परूँ , वो  तो भगवान है, विष्णु है, बोले विष्णु किसको बोलता है? व्हाट इस द  मीनिंग ऑफ़ विष्णु?  विष्णु भगवान का मतलब क्या होता है?  बोले वासम करोति वासुदेव, जो सब में बस रहा है व वासुदेव है | बोले जो सब में बस रहा है तो फिर व वैंकुठ वाले को वासुदेव मानना बेवकूफी है कि नहीं?  तेरे हृदय में भी तो वासुदेव है, तो हृदय के वासुदेव को मानना है कि  वैकुंठ के वासुदेव के आगे नाक रगड़ता है?  ये बात भी सची है,  बोले सच्ची बात है तो, शास्त्र में तो यहाँ  तक लिखा है, कि जब तक  पिता के हत्यारे को ठीक नहीं किया जाए, तब तक पुत्र को खाना पना विष है, हराम है, और तू मजे से राज्य कर रहा है, हे पहलाद-  तेरे जैसा है, इतनी अकल नहीं, gj…  ह करे करे करे व हिप्नोटाइज कर दिया बेचारे को, बोले गुरु महाराज ऐसे तो मैं ठीक करना तो चाहता हूँ, लेकिन क्या करू?  उनकी तो बड़ी पहुंच है | gj …..श्रद्धा तो मरी परवारी के ठीक करना तो चाहता हूं, लेकिन अब ठीक नहीं कर सकता हूं, श्रद्धा पूरी हो गई कि नहीं?  अरे जो पहलाज को पहाड़ियों से गिराया और श्रद्धा नहीं टूटी है, आग  के थंबे को आलिंगन करवाया और श्रद्धा नहीं टूटी है, पानी में फीकवाया और श्रद्धा नहीं टूटी है, वह कान बबरान से अटकल मटकल वाला श्रद्धा के जगत में अभी गया ही नहीं ३३.५७ जय श्री कृष्ण।

 श्रद्धावान लभते ज्ञानम् तत्पर सजते इंद्रिय 

श्रद्धा हो, साधन भजन में तत्परता हो, आपकी गुरु में या भगवान में श्रद्धा है उसकी कसौटी कैसे हो? कि भगवान ने या गुरु ने जो आदेश दिया है, उस साधन में तुम्हारी तत्परता है कि नहीं? अगर तत्परता नहीं है तो आपके भगवान में या गुरु में श्रद्धा नहीं है। गुरु ने जो साधन  दिया उसमें तुम्हारी तत्परता होनी चाहिए, गुरु ने दिया मंत्र, गुरु ने दिया ध्यान की विधि, उसमें आप तत्पर नहीं है, तो समझो गुरु में श्रद्धा का आपका अभाव है। तत्परता हो और इंद्रिय संयम हो शिष्य का बेड़ा पार, मेरे तो बहुत श्रद्धा है, मुख मेरे को तो रोज दर्शन के बिना चेन नहीं पड़ती, आपका रोज दर्शन करता | अच्छा, मैंने माला दिया था जप करते हो कि, आज तो घर भूल के आया हूं आज जप नहीं किया है, क्या खाक तूने दर्शन किया, gj माथा माला कनप कान जपी  तो दुखी, परेशान, जाओ मरो, संसार बट्ठी  में सेक आओ । श्री राम। ३५.10 

तो श्रद्धा के साथ साधन में तत्परता होनी चाहिए, साधन भजन छूटा और श्रद्धा छूटी, तो वही पहुंच जाएंगे जहां से 10 साल पहले चले थे,

श्रद्धावान लभते ज्ञानम् तत्पर संजते इंद्रिय

 श्रद्धा तत्परता और इंद्रिय संयम,  श्रद्धा तत्परता और इंद्रिय संयम बेड़ा पार हो जाए। महाराज। प्रहलाद को जब राज मिल गया, इंद्रियों को छूट छाट दी, रजोगुण बढ़ गया, तमोगुण रजोगुण बढ़ गया, अब वो श्रद्धा की सात्विकता से नीचे उतर आया, और बहकाने वाले मिल गए, बोले ऐसे तो मैं विष्णु को ठीक करना तो चाहता हूं, लेकिन अब उसक वैकुंठाआधीपति, बोले क्या है आवाहन करो, पहले तो तेरे पास कुछ था नहीं, तू अनाथ था, तो उसका सहारा ले लिया, अब तो तू राजा बन गया, इतनी फौज तेरे पास है, हिम्मत रख, अपने शास्त्रों में तो लिखा है, निर्भय बनो, व निर्भय जिन्होंने बनवाया है उन्हीं के साथ तो निर्भय फाइटिंग के लिए तैयार हो  रही, ऐसे लोग बड़े अभागे होते हैं।

36.25  ऐसी एक महिला थी जो सब कुछ छोड कर  घाटवाले बाबा के चरणों में पहुंच गई थी, दिल्ली में वह शिक्षिका थी, आचार्य थी, उसका नाम था पुष्पा बहन, उसने हरिद्वार में अपना मकान खरीदा, क्योंकि गुरु महाराज के रोज दर्शन करना है, ऐसे ज्ञानी के दर्शन, सारे तीर्थों का फल, सारे यज्ञों का फल, सारे तपों का फल, सहज में मिल जाए, ऐसे ज्ञानवान को के दर्शन छोड़कर मैं दिल्ली में कब तक रहूंगी, मकान ले लिया, धीरे धीरे वो दिल्ली में से कुछ छुट्टियां लेकर आती थी, रहती थी, और रिटायरमेंट जल्दी लेना था, उसे मैंने एक बार देखा कि - वो खट्टी आम होती ना? कैरी, काची केरी, खट्टे आम के पकोड़े बना के आई, घाट वाला बाबा को बोलते - स्वामी जी लो, मैंने बड़े मेहनत करके पकोड़े बनाए, आपके लिए, खाओ, उन्होंने कहा मैंने अभी दूध पिया है, दूध के ऊपर पकोड़े नहीं खाए जाते, बोले मैंने मेहनत करके बनाया उसका क्या? ये श्रद्धा है? श्रद्धेय का चाहे मर्जी हो न हो, लेकिन तुम जैसा चाहो ऐसा श्रद्धेय करे तो तुम्हारी श्रद्धा है कि तुम्हारी नालायकी  है? 

Gj…आपने धारू भगवान थ कराए तो भगवान में आपी श्रद्धा के भगवान आपने उपयोग करि 37.४९ हम भगवान के उपयोग में आ जाए, भगवान हमारे उपयोग में, हम भगवान को अपने उपयोग में क्यों लाए, तो हमारा अहम और है, भगवान की कीमत हमारे तुच्छ अहम से, हमारे तुच्छ व्यवहार से, हमारी तुच्छ मेहनत से, क्या भगवान, भगवान की विशेषता भगवान की माता कम है?

 38.04 स्वामी जी मैं तो आपको खिला कर छोडूंगी। कृपा करके लो ये,  देखो कितने गरम गरम। बोले भाई अब जा… मैं सुन रहा था देख रहा था  तमाशा.. बोले नहीं मैं तो आज आपको खिला के छोडूंगी आप जब तक नहीं खाएंगे तब तक मैं यहां से नहीं जाऊंगी,  अरे जा दुष्ट कहीं की, आग्रह करती है दुराग्रह … चल नहीं खाते.. बोले नहीं स्वामी जी को खाना पड़ेगा, … तेरे को इतना समझाता तेरे को कोई डर नहीं है, बोले आप ही ने तो बताया निर्भय बनो, मैं नहीं डरती हूं तुम कितना भी डाटो, मैं तो नहीं डरूंगी, वैसी की वैसी नकटी रहूंगी, अरे गुरु महाराज संकेत कर रहे उसका तुझे ख्याल नहीं है, वो तेरी निर्भयता है कि नकटा पन  है?  गुरु महाराज संकेत करें और उसका तुझे ख्याल नहीं है तो त निर्भय हो रहा है, नहीं ये नकटा पन है |  महाराज | उसने नहीं हटी नहीं, जब एक बार दो बार कहने से आदमी नहीं मानता है तो स्वाभाविक है उसको कड़क शब्द कहने पड़ते |  अरे चल जा दुष्ट कहीं की, बोले कुछ , आप कुछ भी कहो मैं नहीं डरूंगी, नहीं डरी तो ठीक है, लेकिन आध्यात्मिक रास्ते चली नहीं और मकान बकान बेच के वही दिल्ली में टकरा रही है बुढ़िया | जय श्री कृष्ण | धीरे धीरे धीरे धीरे फिर दिशा बदल गई, अब मकान बकान बेच के फिर वो दिल्ली में किसी बेटी के घर रह रही है, अब बुढी हो गई | कभी कभी आती है हरिद्वार ,  मैं बोलता हूं कैसा ….सो सो  आंसू रोना है |  श्री राम | 

39.41 रुपया चला गया तो बड़ी बात नहीं है, कपड़े चले गए थोड़े बहुत कम हो गए तो बड़ी बात नहीं है, महाराज मकान और दुकान थोड़ा कम हो गया तो बड़ी बात नहीं, लेकिन जीवन में जीवनदाता के रास्ते का जो श्रद्धा है वो चली गई तो समझो उसका सर्वनाश हो गया, वो कंगाल हो गया, जैसे जी में जान रहे तन में प्राण रहे ते स प्रीत संधि डोरी तो पासे सुर रहे, अब देखना प्रह्लाज  कहां गिर रहा है बेचारा, बोले आप अगर कहते हैं, तो फिर मैं विष्णु का आवाहन कर दूं, ऐसे तो इतनी सेना है वैसे तो मैं उनको ठीक कर सकता हूं, पहले तो अकेला था यह बात ठीक है, आप सच कह रहे हो |   सुनते सुनते सुनते विरोधी बातों का भी सत्यत्व हो जाता है | और श्रद्धा कम होती है , महाराज सेना को हुकम कर दिया, यज्ञ याग तप जप नहीं होना चाहिए, हमारा पिता जो कहता था वही ठीक था, श्रद्धा होती है तब सही बात …., जय जय, ओम ओम ओम |  40.52 तामसी श्रद्धा और राजसी श्रद्धा फरियाद करती और थोड़ा सा हिलाया पीठ  दे देती है | महाराज प्रह्लाज  बोलता है कि चलो .. ठीक है, विष्णु विष्णु की पूजा नहीं होनी चाहिए, यह तो मैं बच्चा था ना भोला था ना वो मुए  कुंभार का सब देखा ना तभी से मेरी बुद्धि बिगड़ी थी, ले गए थे तेरे को जीव में से ब्रह्म बनाने के लिए, लेकिन अब तो ब्रह्म के बजाय  क्या बने तेरी मर्जी की बात है, ले जाने वाले का कसूर नहीं, आने वाले का कसूर नहीं, लेकिन रजोगुण तमोगुण आ जाता है ना, तो आदमी को परेशान कर देता है |  श्री राम | 

41.30  इसलिए कृपा करके सत्व गुण बढ़ाया जाए, साधन भजन को नहीं छोड़े, तत् पता |  खैर,.. पहलाज कहता है, फोज तैयार करो विष्णु को आवाहन  किया, भगवान विष्णु भक्त वत्सल, उनको पता चला कि प्रहलाद सात्विक श्रद्धा छोड़कर, आ गया है… चक्कर में, और प्रहलाद ने मेरा आवाहन किया मेरे साथ युद्ध करने को तैयार हो गया, अरे … जो पर्वतों से गिराने पर भी मेरा नाम और मेरा स्मरण नहीं छोड़ता था, दरिया में फिकवा ने  पर भी जो मेरे सहारे के सिवा और किसी के सहारे को सच्चा नहीं मानता था, और लोहे  के तपे हुए थंबे को आलिंगन करते समय भी मेरे सिवाय और  जिसकी नजर में और कोई सार नहीं था ऐसा पहलाज सद्बुद्धि को सात्विकता को त्याग कर कुमती का आश्रय लिया है | 

 भगवान और गुरु औ बात सहन कर लेंगे, लेकिन तुम्हारा अहंकार और तुम्हारा पतन उनको रुचता नहीं | उनसे सहन नहीं होता | इसलिए तुमको ठपका दे दे के भी सावधान कर देते हैं |  करो य तने द बर कने भी तमने सावधान कर | जय श्री कृष्ण | ला लोने बच्चे तो एकांत मा राजसी श्रद्धा तामसी श्रद्धा जय जय आप तो छेटा छटा र आप तो ज सत्संग कड़क गया आपने के नजी नहीं सेवा नहीं आपने तो दूर नहीं सेवा  करो  | तो महाराज | आप अपने अहम को बचाने के लिए,... ईश्वर का त्याग करने को राजी हो गए लेकिन अहम का त्याग नहीं करते हैं, आपको समझो डांट पड़ेगी फटकार पड़ेगी या कुछ सीख मिल कल्याण के लिए कुछ भी आपसे व्यवहार होगा तो आपके अहम को ही डांट पड़ेगी, आपके आत्मा को तो गुरुजी डांट नहीं सकते | गुरुजी डांटना भी नहीं चाहते, आत्मा को तो तो कोई आज तक डांट नहीं सका, डांटेंगे  तो अहम को डांटेंगे, जय श्री कृष्ण | 43.32   जो कुछ टकोरा पड़ता है, या घड़ाई होती है, तो अहम की होती है, तो आप अहम को संभालने के लिए भगवान को त्याग करना चाहते हैं |  भगवान छूट जाए तो छूट जाए गुरु महाराज छूट जाए तो छूट जाए लेकिन ये अहम मेरा ना छूटे |  आप कितने अहम के भगत है?  जय श्री कृष्ण |  कही दो बद्धा 

नरसीह मेहता कहते - 

भोए सुवारु , भूखे मारू, ऊपर थी मारू मार, इटल करता जो हरि भजे तो करी नाखु  निहाल|


  बुख रखा जमीन जमीन पर पड़े रहे , बुखे मार ऊपर थी  मार मार दे दे दे कर, अने तो प जो श्रद्धा टकी रे समझी ग निहाल हो गया फिर निहाल हो गया, जैसे जी में जान रहे तन में प्राण रहे, तेसी प्रीत संधि डरी तोपा से सुर अरे क्या आरती पिछले भगवान भगवान क्या दिखावे की भगवान भगवान की भगवान क्या दया करते हैं, 15 साल से भगवान का भजन करता हूं, और बेटे की शादी नहीं होती, क्या भगवान भगवान, तो तू बेटे की शादी का भगत हुआ भगवान का भगत नहीं हुआ, लगता सबको है कि मेरी श्रद्धा है, और श्रद्धा एक अद्भुत चिगम है, दो परसेंट होता है तभी भी श्रद्धा लगती है, पांच लगता है तो भी श्रद्धा, 25 होता है तभी भी श्रद्धा, लेकिन श्रद्धा जब 100 डिग्री तक नहीं पहुंचती ना, तब तक श्रद्धेय की साक्षात्कार नहीं होता , जब 100 डिग्री तक नहीं पहुंचता तब तक  बस्पिभुत  नहीं होता है |  तो कभी पानी 50 डिग्री पर गया फिर 40 पर आया फिर 60 पे गया फिर 35 पे आया फिर 45 पे गया लगता है कि श्रद्धा है श्रद्धा है जिसको अपने में मेरे में बहुत श्रद्धा ऐसा लगता हैना तो श्रद्धा से जब दूर होता है ना तब लगता कि मेरे में बहुत श्रद्धा है | मेरे में दोष है ऐसा दिखता है ना, तो दोष से थोड़ा दूर होगा तभी दोष दिखेगा, ऐसे ही मेरे में ये गुण है वो गुण है यह दिख रहा है ना, तो तुम गुणों से जब थोड़े दूर होते हो ना जब गुण नहीं होते तभी लगता है कि गुण है, आंख में काजल होता है ना तो नहीं दिखता कि आंख को काजल, आंख से दूर होता है तब काजल दिखता है, ऐसे ही श्रद्धा से थोड़ा आदमी दूर होता है तब लगता है कि मेरे में श्रद्धा है, जय जय | अपने में श्रद्धा दिखती है ना तो समझ लेना कि श्रद्धा अभी परसेंटेज कम है इसलिए दिख रही है | अपने में गुण दिख रहा है ना तो समझ लो गुणों से कुछ हम और दूर हैं,४६.00 |  जितना अपने में गुण की तत्परता होनी चाहिए उतनी नहीं है | सद्गुणों के साथ एकम एकता नहीं है | लोहे में अग्नि दिख रही है लोहे को तो कुछ हिस्सा लोहे का बाकी है इसलिए उसमें अग्नि दिख रही है | जब पूरी अग्नि हो जाती है तो लोहे को दिखती नहीं दिखता नहीं कि मुझ में अग्नि है| वो तो अग्निमय  हो जाता है, तो श्रद्धा वाला श्रद्धमय हो जाएगा |  उसका रीत भात स्वभाव उसके ज्ञान अपने आप फुट…|  गुरु में, आत्मज्ञानी गुरु में, अथवा परमात्मा में पूर्ण श्रद्धा हो, तो ज्ञान अपने आप फूट निकलता है, उनके अनुभव जैसा अनुभव अपने आप होने लगता है, विचार अपने आप होने लगता है, भजन बढ़ जाता है ना, तो आत्म विचार निष्ठा अपने आप प्रकट होने लगती है | ४६.४४ लेकिन हमारी श्रद्धा, हमारा अहोभाव बट जाता है, कुछ बाह बाई करने वालों के पीछे, कुछ उनके पीछे, कुछ उनके पीछे, ओ 

४६.५९ एक भक्त ने कहा कि मेरे को तो मेरे साई तीन साल के बाद मिले, हैं मोरो म जा सा साले मिले पुराने साई तीन साल के बाद मिले, साई तो वही के वही थे तीन साल तुम्हारी वाहवा हो रही थी, कथा कर रहे थे, तो तुम्हारी श्रद्धा बट गई थी, तुम्हारी प्रीति बट गई थी, अब जरा थोड़ा कंट्रोल हुआ और थोड़ा साधन भजन हुआ | तो फिर हुआ साई तो ही मैं तो भाई वही का वही तीन साल में खो नहीं गया था मैं तो वही का वही था | करनी आप आपनी केनेडे  दूर | अपनी करनी से हम भगवान के और ईश्वर के नजदीक  होते हैं और अपनी करनी से ही हम भगवान और ईश्वर से दूर अपने को महसूस करते हैं |  को वत लागे आप दूर थ गया बापने बापने नजी में हो तो लागे दूर थ गया अने कित बार ना नक तो नजदिक्  तब लगता है जब आपका सात्विक श्रद्धा होती अहो भाव  होता है, और दूर तब लगता है जब आप अहम के गुलाम होते हैं | जय श्री कृष्ण | 

47.५९ महाराज प्रहलाद को अब विष्णु दुर लग रहे हैं, सेना की तैयारी हो गई विष्णु का आहवान कर दो साधु ब्राह्मणों को देखना प शुकन है, साधु संत हमारे राज्य में नहीं चाहिए | जय श्री कृष्ण | अब हो गया टेंपरेचर 100 परसेंट , यदा यदा ही धर्मस्य - एक युग में भगवान कई बार भी आ सकते हैं, और कई तो शास्त्र में भगवान के प्रगट्य  का वर्णन है, और कुछ प्रगट का तो वर्णन शास्त्र भी अंकित नहीं कर पाए,  इतने भगवान के प्रगट हो गए होंगे | जय जय | छोटे मोटे प्रागट्य सब शास्त्रों ने नहीं अंकित किए | कर नहीं पाएंगे | जैसे किसी की जीवनी लिखी जाए तो सब प्रसंग थोड़ी लिखे जाते ? कोई जो याद रहे मुख्य रहे वैसे ही | ऐसे भगवान का प्रागट्य सब के सब हम लोग या शास्त्र लोग थोड़े समझ सकते हैं | भगवान की गति तो भगवान ही जाने  | महाराज | 


48.५७ भगवान बूढ़े  ब्राह्मण का रूप धारण करके प्रहलाद के पास आए | वो 24 अवतारों में नहीं है लेकिन है तो अवतार | जय राम जी की  | जैसे वरुण अवतार 24 में अवतार में नहीं,  24 अवतारों में नहीं व पचीस वा माना जाता है | ऐसे 26 वा  मानो, 27 वा मानो, संख्या तुम बढ़ाओ ना बढ़ाओ, गिनो ना गिनो, लेकिन वो तो दयालु है है है और रक्षा करता है…, बूढे ब्राह्मण का रूप धारण करके, लकड़ी टेकते टेकते, हाथ कंपित हो रहे  आए दरबार ने कहा ये  ब्राह्मण दूर हटो | बोले मैंने सुना है  कि - प्रहलाद साधु ब्राह्मण और भगवान का बड़ा भक्त है | मैं प्रहलाद से मिलने आया | बोले वो पहलाज पहले ऐसा था बुद्धू | अभी पहलाद में अकल आ गई है | पटा वाला में भी अकाल आगई |  श्री राम | 

४९.43  वो तो पहले ऐसे गिड़गिड़ाता था  भगवान भगवान करता, लेकिन अब पहलाद  समझदार हो गया | और पहलाद विष्णु भगवान को आवाहन किए हैं, उनको भी ठीक करने वाले हैं |  बोले अच्छा उनको ठीक करने वाले हैं तो ठीक है | लेकिन वो खुद को भी ठीक करें | बोले खुद तो ठीक हो गया तभी तो आज उनको ठीक करने की तैयारिया हो रही है | और युद्ध की तैयारियों में साधु ब्राह्मण का दर्शन अप शुकन है | बिल्कुल सच्ची बात | लड़ाई झगड़े की तैयारी और साधु दिख गए तो समझ लेना कि उतना फोर्स लड़ाई झगड़े का नहीं रहेगा | सच्चे साधु और ब्राह्मण, जो संध्या करते, त्रिकाल संध्या करते हैं, क्षमाशील है, ऐसे पवित्र ब्राह्मण और साधु मिल गए, तो महाराज लड़ाई झगड़े में अपशुकन समझना | फिर लड़ाई झगड़ा मत करना | जैसे …बोले प्रहलाद आने नहीं देंगे? बोले आने नहीं देंगे तो कुछ भी हो, मैं तो जाऊंगा, नहीं मैं ब्राह्मण मैं नहीं जाने दूंगा, बोले नहीं जाने देगा तो वैसे ही मैं देरो थरथरा रहा हूं, भूखा प्यासा हूं, यहीं बैठूंगा तू धक्के मार के मुझे गिरा दे, मेरी मौत हो जाएगी, तुझे ब्रह्म हत्या लगेगी, जा फिर पहलाज तेरे को क्या छोड़ाता  मैं भी देखता हूं | पठा वाला ने देखा कि अब क्या करें ? वो तो पगार दार है | पगार दार आदमी की बेवफाई और वफाई क्या भरोसा ? उसने कहा अच्छा मैं जरा उधर खिसक जाता हूँ , और तुम नजर बचा के घुस जाओ | ऐसा नहीं होता क्या,  पटा वालों की दुनिया में?   लोग कैसा करते ना साहब लोग मैं मेरी बदली हो जाए तो मेरा य हो जा तो थ पलाना माते थ पला माते कर करो मारी नौकरी ने अड़च ना आ हा जय श्री कृष्ण  | 


५१.25 महाराज पटा वाला ने तो दे दिया मौका,  और भगवान गए व पहलाज  के सामने थरथरा रहे हैं, बोले ब्राह्मण कैसे घुस गया? बोले मैंने सुना है कि तूने विष्णु को ठीक करने का आयोजन किया है, और उस विष्णु के मद को तोड़ने के लिए तूने जो आयोजन किया है, उसमें मेरा भी साथ है… क्योंकि विष्णु एक ऐसा आदमी है कि जिसने मेरा सर्वनाश कर दिया है |  प्रहलाद ने कहा फिर इधर ब्राह्मण नजदीक बैठो | बताओ क्या क्या किया ,  बोले मेरा परदादा को मार दिया, मेरे दादा को मार दिया, मेरी मां को मार दिया, मेरे बाप को मार दिया, मेरे पड़ोसियों को मार दिया, तेरे बाप को भी मार दिया उसने | बोले तभी तो मैं उसको ठीक करता हूं, तो बोले ये मेरे सब मर गए उनके लिए भी उनको ठीक करो | और तुम और हम मिलकर विष्णु की खबर लेंगे | बोले ब्राह्मण मेरे को पहले ऐसे ही था मैं बुद्धु   | जब शुक्राचार्य ने मेरे को समझा ना तब मेरी आंख खुली है | भगवान बोलता धिक्कार है, भीतर से कहते हैं धिक्कार है तेरी आंख खुलने को वो आंख तेरी बंद होनी चाहिए, बोले हां तेरी आंख तो खुली है, लेकिन अभी पूरी नहीं खुली, बोले ब्राह्मण अच्छा तुम बताओ | मैं तो यह सोचता हूं कि तुम विष्णु से युद्ध करना चाहते हो तो बताओ विष्णु कहां है ? बोले असली विष्णु तो सर्वत्र है, और वास्तव विष्णु है | बोले जो सर्वत्र है तो व वहां भी है कि? हां तो तुम्हारे हृदय में भी है? तो हा | तो फिर उनको परास्त करने के बाद भी हृदय के विष्णु नहीं सकेगा तू | तो मालूम होता है जैसा मैं बेवकूफ गधा हूं | ऐसा तू वीआईपी कोटा का गधा है| बोले ब्राह्मण क्या बोलते हो ? बोले हा सही बोलता हूं | जब बोलता है भगवान सर्वत्र है, तो जो सर्वत्र है उससे तो लड़ कर  कैसे जीत  सकता है? उससे लड़ने में सफल कैसे हो सकता है? सर्वत्र है उसको आप वश कैसे कर सकते ? उसके वश होने में ही तुम्हारा कल्याण है, उसको वश तुम कैसे कर सकते हो? एक बुलबुला सागर को वश करने की कोशिश करें नहीं, बुलबुला सागर में मिटे यही उसको सागर को वश करना हुआ, वो स्वयं सागर हो जाए, ऐसे ही तू तो बेवकूफ है | कैसे के चक्कर में आ गया ? मैं तो सोचा था तू अकलमंद होगा, और मेरे मां-बाप उसने मारे तो उसका बदला लेगा, लेकिन तू तो अपने आप को विनाश करने का, फौज को विनाश कर रहा है |  मालूम होता है जैसे मैं बेवकूफ हूं, ऐसा तो बेवकूफ का सरदार है | प्रहलाद सोचता है  कि ब्राह्मण इतना पतला और  ऐसा और इतना बोलने में उसकी इतनी तेजस्वीता? बोले तो फिर? क्या विष्णु भगवान को मैं ठीक नहीं कर सकता हूं, मेरे पास इतनी सेना उतनी सेना उतनी सेना बोले वह सेना से ठीक नहीं होते हैं, अपने को ठीक करने से वह ठीक हो जाते हैं | क्योंकि, वो तो सदा ही ठीक है, अपनी बेवकूफी होती तब बेठीक  लगते हैं | देख तू ऐसा कर, मैं लकड़ी गाड़ता  हूं, जमीन में, अगर इस लकड़ी को तूने उखाड़ दिया, तो मैं समझूंगा कि तू विष्णु के साथ एक क्षण के लिए टकरा सकता है | ऐसा करके ब्राह्मण रूप धारी भगवान आदि नारायण ने परम कृपा करके, लकड़ी खोस दी, प्रहलाद उठा के ब्राह्मण तुम क्या समझते हो? मैं हिरण्य कश्यप का पुत्र प्रहलाद हूं | पहले भगवान का पुत्र था, हिरण्य कश्यप का पुत्र प्रहलाद हूं, ये लकड़ी मेरे लिए खींचने को बोल रहे हो?  ब्राह्मण यह तो तीनखा है हमारे आगे | ऐसा करके लकड़ी को झपेट के  उठाने को सोचा , झपट के पकड़ा लेकिन लकड़ी हिले नहीं | दूसरा हाथ लगाया … अब तो इज्जत की सवाल है | 

५५.22  जैसे रावन झुका ना हनुमान का पैर उठाने को | हनुमान ने कहा मेरा पैर क्या पकड़ता है जा के भगवान राम के पकड़ तो तेरा कल्याण हो जाएगा लंकेश | ऐसे ही लकड़ी को खींचने के लिए, जमीन में से जो, जमीन में खोस दी, भगवान ने ब्राह्मण रूप धारित श्री हरि ने, वो  लकड़ी को जो खींचने को  गया | महाराज झुकना तो पड़ा, थोड़ा प्राणायाम हो गया, थोड़ी विष्णु भगवान की कृपा हो गई, उसका रजो तम गुण बदला, सत्व आया, कुछ भी हुआ, प्राण उत्थान हुआ कि कुछ भी हुआ, महाराज | उसकी बुद्धि ने थोड़ा प्रकाश पा लिया |  अरे देखते देखते लकड़ी गाड़ी और इतना खींच रहा हूं निकल नहीं रही है ये कोई ब्राह्मण साधारण ब्राह्मण नहीं है | कोई कुछ और कुछ है,  … बोला आप सच बताओ … कौन हो? मैं क्या सच बताऊ, तू तू खोज ले, तू कौन है, सच बता दे, आहा इतना विरोध करने के बाद भी, विरोधी भाव आने के बाद भी, जिन्होंने  युद्ध करने के लिए सेना तैयार की है, ऐसे भगवान अपने प्यारे भक्त का कल्याण कैसा चाहते हैं?  कि पहलाद  तू सच बता दे तू कौन है?  तू अपने को खोज | मैं कौन हूं यह मत मेरे से पूछ, तू कौन है यह तू जान लेगा तब तुझे पता चल जाएगा कि मैं भी कौन हूं?  जब तक तूने अपने को ठीक से नहीं जाना पहलाज तब तक तू मुझको नहीं जान सकता मैं कौन हूं ? इसीलिए तू कभी तो मेरे लिए मर मिटने को तैयार होता और कभी तू मेरे को मारने के लिए तैयार हो जाता है | प्रहलाद  को प्रकाश हुआ कि मैं तो मर  मिटने के लिए तो विष्णु भगवान के लिए मर मिटने को और उसी को मारने के…|  ब्राह्मण तुम कौन हो ? बोले तू अपने को खोज तब मैं देखूंगा मैं कौन हूं ? पहलाज अहोभाव से भर गया, चरणों पर अपना सिर रख दिया कि भगवान आप ब्राह्मण के रूप में नारायण, मुझे क्षमा करो, माफ करो, तो भगवान ब्राह्मण के रूप में से भगवान आदि नारायण के रूप में प्रकट हुए, भगवान बोलते पहला तू मुझे मारने से तू बचा रहा है |  …तू मुझे माफ  कर ये  सेना को जरा रोक दे मैं तो बहुत डर रहा हूं | पहलाज कहता  है भगवान त मुझे माफ कर, आप मुझे माफ कर दो, भगवान बोलते पहला तू मुझे माफ कर दे भाई, अपराधी तो मैं हूं तेरी नजरों में, पहलाज बोलता नहीं मेरी बेवकूफी ही अपराध पैदा करती थी | जय जय | 

५७.50 भगवान आप मुझे क्षमा कर देना, बोले पहलाज तेरा कसूर नहीं है, जब श्रद्धा तामसी या राजसी करवत लेती तब श्रेद्ध्य  के प्रति ऐसा भाव आ जाता है | ….हे निदान औरों की क्या बात जो भगवान के लिए मर मिट रहे हैं, पिता और पूरा राज्य विरोध कर रहा है, फिर भी भगवान विष्णु की भक्ति प्रहलाद ने नहीं छोड़ी, वही काम बे कान बंबेराने से पहलाज भगवान का विरोधी बन गया, देखो यह आदमी कैसा कैसा गिरता है, कब गिरता है? 

५८.१८  संसार से वैराग्य होना कठिन है, वैराग्य  होए तो कर्मकांड में से आगे यात्रा करने की रुचि होना कठिन है, यात्रा करने की रुचि हुई तो यात्रा का मार्ग दिखाने वालों का मिलना कठिन है, और उपासना तक ही रुक गए उपासना में से फिर ज्ञानी गुरुओं को खोज लेने की तीव्रता मिलना कठिन, ज्ञानी गुरु मिल गए तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन है, और श्रद्धा हो गई तभी भी तत्व ज्ञान के लिए तत्परता होना कठिन है, विष्णु भगवान में भगवान विष्णु तो ज्ञानियों के शिरोमणि है, फिर भी भगवान विष्णु से इतना लाभ हुआ तत्व ज्ञान पाने की पहलाद ने कुछ सोची नहीं, इसलिए हिल गया, अगर तत्व ज्ञान पा लेता साक्षात्कार कर लेता तो एक शुक्र नहीं हजार शुक्र आके हिलाते तो नहीं हिलता |

५९.06  गुरुत्व आकर्षण के नियमों के पार जब तक चीज नहीं गई, तब तक चाहे कितनी भी ऊंची गई लेकिन फिर भी हवाओं के दाब से नीचे गिर सकती है, ऐसे ही आदमी वातावरण के और खानपान के और संस्कारों के दाब से फिर आदमी ऊपर नीचे होता रहता है, कोई कोई चीज जो है व गुरुत्व आकर्षण नियमों के पार चली जाती है, ऐसे कोई कोई विरला माई का लाल जो है तत्व ज्ञानी गुरु में तीव्र श्रद्धा करके, और सतत साधन भजन की निगरानी रखते हुए, संसार के आकर्षणों से माया के बंधनों से पार होकर महेश्वर स्वरूप को पाकर सदा सदा के लिए मुक्त हो जाता है, ऐसों को नमस्कार है, ऐसों को धन्यवाद है |

५९.४४  छोटी सी कहानी एक छोटी सी घटना हम सुन लेंगे, सोबरी ऋषि हिमालय की तलेटी में तपस्या करते थे, तपस्या करते करते वो वृद्ध हो गए, हिमालय की ठंडी सहने में उनको कठिनाई होती थी, वे सरजु के किनारे नदी में आकर एकाग्रता करते थे, 1.00 .तपस सर्वेश एकाग्रता परम तप सोबरी ऋषि ने इतनी ऊंची एकाग्रता की यात्रा की महाराज, उनके पास रिद्धियां  सिद्धियां सतसंकल्प सामर्थ्य आदि सब आगया | एक दिन किसी ललना ने वहां स्नान किया, और मत्स की कुछ काम देखकर, वह परिवार के साथ टहलते हैं और आनंद करते ऐसा देखकर सोबरी ऋषि के मन में हुआ कि - अपने भी संसार बसाए तो कैसा होगा ? इस कथा से हमको समझना होगा कि, भोग का उपयोग किया जा सकता है , लेकिन भोग भोग कर कोई आदमी पूरा संतोष नहीं होता है | वस्तुओं का उपयोग करना और बात है, लेकिन वस्तुओ के आधीन होकर जीवन का उपयोग कर देना , ये समझो भोगों के आधीन हम भोगे गए | सोबरी ऋषि ने शादी की इच्छा की और राजा मानधाता के पास गया | महाराज जैसे बृहस्पति इंद्र के दरबार में जाए और इंद्र उठ खड़े हो, ऐसे प्रताप शली राजा सोबरी ऋषि के तप का प्रभाव जानते थे, व प्रभावशाली राजा नतमस्तक होकर सोबरी ऋषि का आदर सत्कार करते, यह भारत की प्राचीन संस्कृति है |

1.1.०७  राज्य सत्ता से धर्म सत्ता ने हमेशा ऊंचा  आसन लिया है, क्योंकि ऊंचे में ऊंचा परब्रह्म परमात्मा है, धर्म सत्ता उससे संबंधित है, लोगों के जीवन के साथ राज्य सत्ता का संबंध है, लोंगों  की आध्यात्मिकता के साथ धर्म सत्ता का संबंध है | यह धर्म सत्ता और राज्य सत्ता मिलकर, हमारा ऐहिक और परमार्थिक सुरक्षा करती है, और प्रोग्रेस करती है, ये इनका कर्तव्य होता है | 

०१.०१.53 तो महाराज, धर्म सत्ता का अग्रगण्य सम्राट जब पहुंचा है, राज्य सत्ता के अग्रगण्य के पास, तो मानधाता उठ खड़े हुए हैं | मानधाता ने कहा मुनीश्वर आज मेरा यह दरबार पवित्र हुआ, मैं आपके चरणों में क्या भेट रखूं, क्या सेवा करू, सोबरी ऋषि ने कहा कि राजन तू इतना प्रभावशाली है कीर्ति वाला है, तेरी 50 लड़कियां है, और मुझे संसार…. मारे संसार मांडवा नहीं इच्छा जय श्री कृष्ण | जब तक पूर्ण साक्षात्कार नहीं होता  है, तब तक कभी कौन सी इच्छा आजाए, कभी कौन सी इच्छा आजाए कहना मुश्किल है | मुझे संसार बसाने की इच्छा है, और एक लड़की तू मुझे बिहा दे, कन्या दान कर | राजा ने देखा कि लंबी लंबी जटा है, आंखें अंदर चली गई है, चेहरे पर झुरिया पड़ गई, अब इस बूढ़े बाबा जी को अपनी युवती लड़की राजकुमारी बिहा के दूं, ये कैसे हो सकता है, और इंकार करूं तो इनके अभिशाप से मेरा सर्वनाश भी हो सकता है | राजा सिर नीचे करके सोच विचार करता है, तब सोबरी ऋषि समझ गए कि राजन तू क्या सोच विचार में पड़ा है | मैं बुढ़ा सा लगता हूं इसलिए, बोले महाराज, हमारे राज्य का कुल धर्म का यह परंपरा से नियम है, कि कन्या जिसको पसंद करे वही कन्या का वर होता है, जिसे वेजंती माला पहरा दे | तो अंतःपुर में आप चलिए, और लड़की अगर आपको कोई पसंद करें तो मैं आपको कन्यादान दे सकता हूं, सोबरी समझ गए महाराज, देवों को यक्ष को गंधर्व को विद्याधर को भी रूप धारण करना जो कठिन है, वो उन्होंने अपने योग विद्या के बल से ऐसा तेजस्वी रूप धारण कर लिया कि   50 की 50 कन्याएं बोलती कि मैंने तो इनको पहले देखा, मैं इनको बरुंगी ,  बोलते नहीं ये मेरा है, ये मेरा है, ऐसे करके 50 ने मन उनके चरणों में अर्पित कर दिया | कथा कहती है कि मानधाता अब क्या इंकार करें ? 50 कन्याए बीहाकर वर राजा को दे दी गई | उन 50 पत्नियों को लेकर सोबरी ऋषि सरजु  के किनारे आए हैं, और विश्वकर्मा को बुलाया है, 50 महलों की रचना हुई | और दिव्य महलों में दिव्य भोग भोगते भोगते कुछ समय पसार हुआ, वह मान्धाता  चिंतित है कि, एक पति और 50 पत्नियां अब एक के साथ मिलता जुलता बात करता होगा तो दूसरी 49 बेटियां मेरी कितनी दुखी होगी ? और संसार में पति पत्नी का जो संयुक्त कुटुंब का या जो कपल का सुख होता है वह मेरी बेटियों को नहीं मिलता होगा, मेरी बेटियां निशा से डालती होगी, मैंने राज बचाने के भय से बेटियों की जिंदगी बेच दी, ऐसा करते करते वो दिनदिन अंदर-अंदर चिंतित होता जाता था, चिंता ऐसी डाकनी काटी कलेज खाए साई बिचारा क्या करे कहां तक कथा सुनाए | चिंता बुरी भला होती है, चिता तो एक बार जलाती है लेकिन चिंता तो आदमी को बार बार जलाती | 

रोम का बादशाह सीजर, उसके विरोधी बढ़ गए, साथियों ने कहा कि तुम जरा अंग रक्षक रखो, नहीं तो तुम्हें कभी भी कोई मार सकता है  रास्ते में | बोले अंग रक्षक रखू और मरने का भय रखूंगा तो न जाने दिन में कितनी बार मरूंगा, और जब मरने का होगा तो किसी भी  निमित मर जाऊंगा, इसलिए मुझे ज्यादा व्यवस्था सुरक्षा की जरूरत नहीं है | मैं जरा उस विधाता के नियम पर डिपेंड करके जिऊंगा | जब जैसे घटना घटनी होगी घट जाएगी | जो आदमी मौत से डरता है, क्या वो अमर हो जाता है, वो भी मरता है, और जो मौत से नहीं डरता है वो भी मरता है | लेकिन जो मौत से ज्यादा डरता है, वो तो रोज-रोज मरता है, और जो मौत से नहीं डरता  है वो एक बार मरता है |  जैसे कृष्ण कही देव पड़े | कृष्ण कन्हैया लाल की | 

०१.06.०३  मांधाता चिंतित रहे इतने में महाराज देव ऋषि नारद आए, और नारद मान्धाता  की व्यथा को समझ गए थे, मान्धाता को कहा कि चलो जरा अपने सरजु के किनारे घूम आए, सोबरी के पास जाते हैं संत संत के नाते हम मिलेंगे, और तुम अपनी बेटियों का हालचाल पूछ लेना, एक पंथ दो कार्ज | नारद बड़े मनोवैज्ञानिक संत रहे, मनोविज्ञान के किताब तो अब छपे हैं लेकिन आध्यात्मिक यात्रा करने वाला ऑटोमेटिक मनोवैज्ञानिक का बाप हो जाता है | जय श्री कृष्ण कही  देव  पडे |   महाराज नारद जी के साथ मांधाता गए और बच्ची के महल में प्रवेश हुआ तो बच्ची ने देखा कि पिता वर्षों के बाद पिता को पुत्री देखती है तो कितना हृदय भर आता है | बेटी का हृदय भर आया, बाप बेटी मिले, और कहां है जमाई राज? के पिताजी वो अभी अभी बाहर गए देखो हमारा घर कितना सुंदर है देखो देखो हमारा पूजा का रूम कितना सुंदर है? यह ध्यान का खंड कैसा है? पिताजी अपने महल में तो ठीक है विषय विलास की साधना सामग्री थी, लेकिन इन्होंने ऐसे महल बनवाए कि जब संसार का भोग भोगना है तो उसका उपयोग करो, और जब आत्मा का खजाना लेना है तब वहां भी डुबकी मारो | देखो आप अपने महल में भी पूजा का रूम बनवाना, ध्यान का खंड बनवाना, बेटी तू तो इतनी खुश रहती है लेकिन मुझे चिंता है कि मेरी बेटियां दुखी थी, लेकिन ऐसा महल ऐसा ऐसी सुविधाएं ? बोय तो योगी है सिद्धियों के बल से सब कुछ सुलभ कर दिया है |  पिताजी मैं बहुत बहुत खुशी हूं, ऐसी और कोई किसी राजा की लड़कियां ऐसी सुखी नहीं होंगी, जैसी मैं सुखी हूं, लेकिन मुझे एक बड़ा भारी दुख है, कि तुम्हारे जमाई जो है ना सदा मेरे महल में ही रहते हैं, कभी मेरा महल छोड़कर गए नहीं आज न जाने क्यों अभी गए कोई पता नहीं, पिता के आंखों से आंसू टपके, नारद जी ने कहा धीरज रखो, धीरज रखो दूसरे महल में चलते हैं |  दूसरे महल में गए तो महाराज वही दिव्य कथा लेकिन वह लड़की कहती कि मुझे एक ही दुख है कि तुम्हारे जमाई मेरे महल में ही रहते हैं अब भी दूसरी जगह गए हैं |  हर महल में गए और खबर मिली कि और तो सब ठीक है लेकिन तुम्हारे जमाई, माना मेरे मिस्टर मेरे पा ही रहते तो मेरी 49 बहनों का क्या होता होगा ? नारद ने समझाया कि सोबरी ने योग बल से मन शरीर की यात्रा करते कुंडलिनी का पहला चक्र दूसरा चक्र तीसरा चक्र चौथे चक्र को भेद कर वहां ऐसी स्थिति की, कि एक रूप में से अनेक रूप हो गए | ऐसा श्री कृष्ण ने भी किया था | और गर्गाचार्य का भी हुआ था | और योगेश्वर के जीवन में भी सुनाई पड़ता है | नरसिंह मेहता की शिष्या के जीवन में भी सुनाई पड़ता है |

1.०८.५५  रतनबाई के जीवन में, ऐसी सारी शक्तियां सबके अंदर सुसुप्त में पड़ी है, लेकिन आज का मानवी बाहर इतना बहल गया कि उसको अंदर के खजाने का पता ही नहीं | खैर नारद जी जब लौटे मान दता को संतोष हुआ, समय बीतने के बाद सोबरी ऋषि ने कहा कि अरे मैंने ललना का स्नान देखा और मच्छ की कड़ा देखकर मैंने संसार के सुख भोगने की इच्छा किया, लेकिन रिद्धि सिद्धियों के बल से जो मान्धाता  जैसे राजा को जो सुविधाएं नहीं है वो उससे भी बढ़िया सुविधाएं भोगने के बाद भी, ऐ संसार तू पूरा सुख नहीं दे सका, ऐ संसार तू सब दुख नहीं मिटा सका, ऐ संसार तू संसारिओं के लिए  मुबारक हो,  हमें तो हमारा राम रस पीने दे | जब सोबरी ऋषि संसार से पूर्ण संतुष्ट नहीं हुए तो तुम और हम कौन से बगीचे की मूली है | संसार का औषध बत  उपयोग करो, और परमात्मा रस का पान करो यही आज के दिन का पैगाम समझ लो | जय राम सियाराम, दो मिनट प्यार से हां, आहो भाव से, बधा करीश, गौरांग चैतन्य महाप्रभु की निगाह पड़ी धोबी पर, धोबी वाइब्रेट हुआ और पूरा गांव वाइब्रेट हुआ, तो फिर आश्रम में रहने वाले तुम भी तो वाइब्रेट होगे ना, दो मिनट के लिए


 सियाराम राम गाएगा |  सियाराम राम …..

 हरि ओम ओम गाएगा | हरि ओम ओम …..

 शिव ओम ओम गाएगा | शिव ओम …..

 झूले लाल लाल लगाएगा | झूले लाल लालगा …..

सिया राम राम गाएगा  | सिया राम राम …..

तू भक्ति को बढ़ाए जा | भक्ति को बढ़ाए जा …..

 तू प्रीति को बढ़ाए जा |  प्रीति को बढ़ाए जा ….

 तेरी नैया पार लगाए जा | मेरी नैया पार लगाएजा…..

 तू बंदगी बढ़ाए जा | बंदगी बढ़ाए जा …..

 वो खुद ही प्यारा आएगा  | वो खुद ही प्यारा आएगा…..

 ओम ओम गाए जा | ओम ओम गाए जा….

 हरि  बोल बोल हरि बोल बोल बोल हरि बोल बोल बोल

 जय हो प्रभु तेरी जय हो जय हो जय हो जय हो

 हरि हरि बोल


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