रविवार, 4 मई 2025

Atmasakshatkar Saral Hai (आत्म साक्षात्कार सरल है - p1| संध्या सत्संग 09-01-2026 सुबह )

आत्म साक्षात्कार सरल है |  संध्या सत्संग 09-01-2026 सुबह 


TIME STAMP INDEX 

0:01 – परमात्मा को विशेष रूप में देखने की भूल
0:31 – क्रिया से परमात्मा नहीं मिलता
1:26 – मान्यताएं ही दूरी बनाती हैं
1:45 – कटोरी और पीतल का उदाहरण
2:20 – सोना और गहना, पानी और तरंग का उदाहरण
2:40 – स्थावर और जंगम का भेद
3:13 – विशेष चेतना और सामान्य चेतना
3:43 – माया और ब्रह्म का अंतर
4:20 – समुद्र और तरंग का दृष्टांत
5:10 – स्वप्न और जाग्रत का उदाहरण
6:14 – आत्मा और माया का संबंध
6:44 – साधना का वास्तविक अर्थ
7:33 – भगवान सर्वत्र और अभी है
8:49 – माया और महेश्वर
9:44 – सत्व, रज, तम की माया
10:16 – आत्मविचार से सद्गुण
11:32 – अभेद भाव से सद्गुण उत्पन्न
12:18 – आत्मवत सर्वभूतेषु
13:00 – महान पुरुष की पहचान
14:11 – अभी आत्मज्ञान संभव है
15:12 – मान्यता का बंधन
16:29 – तत् त्वम् असि का अर्थ
17:41 – आत्मविचार से मंगल आचरण
19:38 – ओम का ध्यान (जप)
22:40 – मैं आनंद स्वरूप हूं
23:44 – द्वैत कल्पना मात्र है
24:24 – निराकार की सत्ता से साकार
25:39 – मैं साक्षी चैतन्य हूं
27:05 – सर्वत्र एक ही परमात्मा
28:19 – जगत माया मात्र है
29:05 – देह नश्वर, दृष्टा अमर
30:52 – आकाश और घड़े का उदाहरण

इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:  

0:01 परमात्मा हम में भी उतना ही पूर्ण है। संसारियों की भूल है कि जैसे संसार को आकृति में देखते हैं वैसे ही परमात्मा को भी किसी रूप में देखना चाहते हैं। यह पहली भ्रांति है। दूसरी भ्रांति है कि कुछ करने से परमात्मा मिलेगा।

0:31 महापुरुषों का अनुभव है कि परमात्मा क्रिया से प्राप्त नहीं होता। जो करने से मिले वह न करने से छूट जाएगा। परमात्मा तो साक्षी रूप से अभी है।

1:26 यह मान्यता कि अभी योग्य नहीं हैं, बाद में होंगे, यही दूरी बनाती है। परमात्मा पहले है, अहंकार बाद में है।

1:45 जैसे कटोरी में पहले पीतल है, बाद में कटोरी का नाम रूप है। हम नाम रूप देखते हैं, तत्व नहीं देखते।

2:20 पहले सोना है, बाद में गहना। पहले पानी है, बाद में तरंग। जगत भी सच्चिदानंद का ही रूप है।

2:40 स्थावर और जंगम दो भेद दिखते हैं। जहां अंतःकरण है वहां चेतना विशेष रूप से प्रकट है, पर सामान्य चेतना सर्वत्र एक है।

3:13 विशेष चेतना आती जाती है। सामान्य चेतना सदा रहती है। व्यवहार विशेष में है, आधार सामान्य में है।

3:43 जो बदलता है वह माया है। जो सदा एक समान है वही ब्रह्म है।

4:20 समुद्र शांत हो तो एक रस है। तरंग उठे तो विशेषता है। तरंग उसी एक के आधार पर है और उसी में लीन होती है।

5:10 स्वप्न में अनेक दृश्य आते हैं। जागने पर सब मिट जाते हैं, पर देखने वाला वही रहता है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा आते जाते हैं, पर देखने वाला एक रस रहता है।

6:14 तुम वही एक रस हो। तुम्हारी शक्ति का नाम माया है और तुम्हारा नाम आत्मा है।

6:44 साधना का अर्थ है उलटी मान्यताओं को हटाना। अपनी असलियत को स्वीकार करना ही साधना है।

7:33 भगवान सदा है, सर्वत्र है, अभी है। जो सब में है वह हम में भी है।

8:49 जो दिखता है वह माया है। जो देखता है वह महेश्वर है। देखने वाला तुम ही हो।

9:44 राक्षस तमस की माया, मनुष्य रजस की माया, देवता सात्विक माया। यह सब विशेष रूप हैं, पर साक्षी एक है।

10:16 आत्मविचार से आचरण मंगलमय होता है। मैं सब में हूं ऐसा मानने से धोखा और द्वेष नहीं रहता।

11:32 अभेद भाव से ही सद्गुण आते हैं। जैसे पानी में उतरकर ही तैरना सीखते हैं, वैसे ही अभेद भाव से ही सद्गुण प्रकट होते हैं।

12:18 आत्मवत सर्वभूतेषु। सबको अपने समान देखो। भय और भेद छोड़ो।

13:00 जो सब में अपने को देखता है वही महान पुरुष है। वेश से नहीं, समझ से महानता है।

14:11 आत्मज्ञान अभी संभव है। भविष्य में मिलेगा यह मान्यता बाधा है।

15:12 अनेक साधक मानते हैं कि पहले शरीर शुद्ध होगा तब ज्ञान होगा। पर इतिहास में कईयों को तुरंत ज्ञान हुआ।

16:29 तत् त्वम् असि का अर्थ है वह तत्व तू ही है। भविष्य में नहीं, अभी।

17:41 आत्मविचार से भय, द्वेष, चिंता मिटते हैं। सब में वही परमात्मा देखने से कलह नहीं रहता।

19:38 ओम का जप करते ही अपनी साक्षी सत्ता की याद आती है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण सबका आधार मैं ही हूं।

22:40 मैं आनंद स्वरूप हूं। अनेक शरीरों में वही चैतन्य चमक रहा है। जहां देखो वहां राम ही राम है।

23:44 द्वैत कल्पना मात्र है। साकार अनुभव निराकार की सत्ता से ही संभव है।

24:24 रस भी उसी एक की सत्ता से है। इंद्रियों को जो शक्ति है वह साक्षी से है।

25:39 विशेष तरंगे आती जाती हैं। मैं एक साक्षी चैतन्य हूं। देह को मैं मानने की भूल छोड़नी है।

27:05 जो सर्वत्र है वह यहां भी है। वशिष्ठ, कबीर, शंकर, ईसा, मूसा सब में वही एक चैतन्य है।

28:19 जगत माया मात्र है। देह, घर, धन सब नश्वर है।

29:05 देह की आयु क्षीण होती है, पर दृष्टा नहीं बदलता। सुबह से अब तक शरीर बदला, पर मैं वही हूं।

30:52 जैसे घड़े की उम्र है पर आकाश की नहीं, वैसे ही शरीर नश्वर है पर आत्मा चिदाकाश स्वरूप अजर अमर है।

Manual Transcription


0:05 बड़ी बाधा बड़ी बाधा पड़ती है कि जैसे हम संसार को देखना चाहते ऐसे परमात्मा को देखना चाहते हैं 0:12 विशेष रूप में कुछ आकृति लेकर खड़ा हो कुछ वरदान देता हो। 0:19 एक भ्रमणा  ये है। दूसरी ब्भ्रमणा  ये है कि हम मान बैठे हैं कि कुछ करने से मिलेगा 0:30 सुयोग्य महापुरुषों का अनुभव है कि कुछ करने से क्रिया साध्य परमात्मा नहीं 0:38 है| जो चीज करने से मिलेगी वह ना करने से छूट जाएगी, परमात्मा करने से मिलेगा ऐसी बात 0:48 नहीं| और जो लोग ऐसी बात धारणा पकड़ के बैठे हैं, कि अभी तो हम ऐसे हैं वैसे हैं 0:54 कुछ करेंगे जप करेंगे तप करेंगे भूखा मरेंगे यह करेंगे वैसा करेंगे तब कहीं कुछ 1:00 होगा, आएगा, हां तब अंतःकरण में कुछ चमत्कार करने के अथवा अंतःकरण के भावना के अनुरूप 1:08 दृश्य देखने की तुम्हारे चित्त में सामर्थ्य आ जाए, लेकिन चित्त का साक्षी रूप 1:14 अभी जो परमात्मा है ,वह कुछ करने से नहीं मिलता उसको जान लो बस अभी अभी हम ऐसे हैं बाद में 1:23 मिलेगा अभी यहां नहीं है फिर कहीं से आएगा अभी हम उसके दर्शन के योग्य नहीं है 1:30 फिर होंगे यह जो हमारी मान्यता है ना वही भगवान से हमको दूर 1:36 कर देती है। नहीं तो, पहले तो वह परमात्मा है बाद में हमारा अहम। है। 1:41

 कटोरी लिए खड़े हैं देखो क्या दिखता है बोले बाबा जी कटोरी है अरे पहले क्या 1:47 दिखता है भैया, कटोरी दिखती है, ठीक से कहो बाबा, जी आपके हाथ पर कटोरी दिखती है, और 1:54 ठीक से कहो जरा बस कटोरी है, आपके हाथ में है, 2:00 पहले पीतल दिखता है बाद में कटोरी दिखती है ऐसे जहां देखो सामान्य रूप से पहले परब्रह्म 2:06 परमात्मा दिता, बाद में उसका नाम रूप डिजाइन, पहले सोना दिखता है, बाद में गहना, 2:11 ले हम कहते चूड़ी दिख रही है, अंगूठी दिख रही है, पहले पानी दिखता है बाद में तरंग । 2:20 हम तो कहे तरंगे हैं तरंगे है जो तरंग रूप हो गई है, वो पानी तो है ऐसे ही जो जगत रूप 2:27 दिख रहा है वो सारा का सारा वही सच्चिदानंद

 तो इसमें दो भेद है, स्थावर और 2:37 जंगम, जिसमें जो चलते फिरते हैं व जंगम कहे जाते हैं| जिसमें जीव है उन्हें जंगम कहे 2:45 जिसमे जिव नहीं वह स्थावर तो जीव कैसे है तो सर्वत्र परमात्मा फिर दो भेद 2:52 कैसे हुए स्थावर और जंगम जहां जहा अंत करण है वहा वहां उस चैतन्य की विशेष 3:00 चेतना प्रतीत होती है | विशेष चेतना आती है जाती है | सामान्य 3:08 चेतना ज्यों का त्यों मौजूद रहती है। तो व्यवहार विशेष चेतना में होता 3:15 है| और विशेष चेतना है यही परमात्मा की माया है|

 माया से तो दिख रहा है अदल बदल 3:23 अदल बदल दिख रहा है माया है और वस्तु का वास्तविक तत्व वो ब्रह्म है, परमात्मा है| 3:33 अथवा यूं समझ लो कि शरीर अदल बदल हो रहा है, परमात्मा की माया है| तो परमात्मा कहां है 3:40 परमात्मा वो है जो सदा एक जैसा हे जो अदल बदल होता है वो उसकी माया 3:45 है\ तो बताओ कि वो परमात्मा तुमसे कितना दूर है| जो अदल बदल हो रहा है वो माया 3:53 विशेष में हो रहा है और जो शुद्ध है वो एक जैसा रहता है | 4:02 हिल चाल विशेष हुई, लेकिन एक रस, परमात्मा की, 4:10 मूल गरिमा है| तो गहराई से देखो या तो, सीधी बात से 4:18 समझ लो, तुम आंखें बंद करके खोजोगे तब भी वो देखेगा ऐसी बात नहीं, केवल 4:26 बुद्धि की आंख से अभी अभी देख सकते 4:32|

 जो बदलता है वह परमात्मा की विशेष माया है, विशेष चेतन 4:38 है| और जो एक जैसा रहता है व परमात्मा ज्यूँ का त्यूं  4:44 भरपूर| हालांकि जो एक जैसा जो रहता है उसी की सत्ता से विशेष दिखता है| उसी की सत्ता 4:51 से विशेष होता है| जैसे समुद्र जल शांत है तो एक जैसा रहा और उसमें तरंग है तो 4:57 विशेषता आई| विशेषता जब नहीं थी तब भी व था| विशेषता आई है तो एक के आधार पर आई है| और 5:04 विशेषता लीन हो जाएगी तभी भी उस एक में लीन हो 5:14 जाएगी ।

 तुम सो गए हो, सामान्य रूप से रात को, स्वपना आया, बड़ी चहल पहल हुई, नदिया तलाव 5:23 पर्वत, युद्ध राज्य सिंहासन राज्य अभिषेक, हार जीत, सब दिखा विशेषता आंख खुली तो तुम वही 5:32 के वही, जो सोए थे वो , तो बताओ व विशेषता सामान्य के सहारे 5:40 हुई| सामान्य पहले था 5:45 दृष्टा, स्वप्न की विशेषता आई तब भी दृष्टा है| और स्वप्न की विशेषता चली गई तब भी वह 5:50 सामान्य दृष्टा ज्यूँ का त्युं रहा | ऐसे ही सत्ता  में बचपन दिखा जवानी दिखी 5:58 बुढ़ापा दिखा, सुख दिखा दुख दिखा, ये सब जिसने देखा वो एक रस व एक रस तुम हो या और 6:06 कोई आकाश पाताल का बैठा हु परमात्मा एक रस हुआ ? तुम एक रस हुए शरीर की कितनी बदलाहट 6:16 हुई, दुखों की कितनी बदलाहट हुई, सुखों की कितनी बदलाट हुई, तो तुम और तुम्हारी शक्ति 6:23 तुम्हारी शक्ति का नाम माया है और तुम्हारा नाम महात्मा है

 अब तुम मान बैठे हो 6:29 आत्मा कहीं है, ईश्वर कहीं है, फिर कुछ 6:36 मिलेगा, तो यह मान्यता भी तुम्हें , अपने आप से दूर कर 6:45 देती है, साधना वह करनी है कि उल्टी मान्यता हटानी बस इस का नाम साधना 6:53 है।   इधर उधर की जो मान्यता में तुम बिखर रहे हो , मन बिखर रहा है उसकी बिखरान को थोड़ा 7:01 थाम के अपनी असलियत को स्वीकार कर लो वो चाहे अभी एक मिनट में कर लो, चाहे एक साल में कर 7:08 लो एक हजार जन्म में करो करोड़ जन्मों में करो बात इतनी 7:14 है|

 बड़ा लाभ होता है महापुरुषों के अनुभव 7:19 को, सीधा साधा स्वीकार करके, अपना अनुभव बना ले 7:24 तो, जन्मो जन्मों की मजूरी छूट जाती, जन्मों जन्मों का परिश्रम बच जाता HE , 7:40 है, भगवान सदा है, सर्वत्र 7:48 है, नहीं है? जो सदा है व अभी भी है, जो 7:54 सर्वत्र है, वो यहां भी है, और जो समान रूप से है सब में, तो हमारे 8:01 में भी उतना ही है, ये चमड़े की दीवाल लगा के मैं अपने को 8:06 मैं मानते हो, और उधर को तू  बोलते, यह सब कल्पना है, अंतकरण  में वृति आई विशेष कल्पना हुई, मैं 8:14 और तू, रात को वृति  हमारी लीन हो गई मैं तू नहीं रहा,

 सब रात की नींद में एक जैसा सुख लेते 8:22 हैं, चाहे कोई पलंग पर सोया हो चा पत्थर पर सोया हो, गहरी नींद में जब 8:30 वृत्ति बहिर्मुख होना बंद हो जाती है फिर शांत हो जाती है तब एक जैसा 8:35 सुख, स्वाश लेते हैं तब भी भी एक जैसी रिदम, नींद में शवास में पड़े हैं सो रहे हैं, 8:43 स्वास चल रहा है, ऐसा तो नहीं कोई स्वास लेने के बिना नींद कर रहा 8:50 है, सब नींद करते तो शवास सब लेते, तो सब केवल तरंगे है, एक ही समुद्र, 9:01 सब केवल दिखावा भर है, बहुत का दिखावा है, बहुत का पसरा 9:09 है, जो जो दिखता है वह सब माया है, और जो देखता है वह महेश्वर है, और वो महेश्वर मुझसे 9:16 दूर नहीं , मैं ही तो देख रहा हूं|

 ध्यान करा सांप 9:22 दिखा, बापू मेनू साप दिखाये छे, एने ऊपर 9:30 गोलाकार  कुंडलाकार सांप देखा, ठीक है तो सांप देखा, सांप नहीं दिखा 9:38 तभी तुम, सांप दिखा तभी तुम, सांप दिखना बंद हो गया तभी तुम, तो दिखा ये तुम्हारी 9:44 माया, और देखने वाले तुम, मैं देखने वाला हूं ये मेरी माया 9:50 है, आ गए आत्म ज्ञान की तरफ| देवी देवता दिखे दरिया समुद्र दिखा 9:58 राक्षस आया दिख रहा है, राक्षस मेरी तमस 10:04 माया, मनुष्य मेरे रजस माया, 10:10 देव देवी मंदिर महात्मा ये मेरी सात्विक 10:17 माया, ऐसा दिखता उस समय ऐसा करो, आप आ गए अपनी असलियत में, बहुत ….. 10:31

 जिसको भीतर की यात्रा का स्वाद नहीं लेना है, और अपनी गरिमा को नहीं जानते वही, 10:36 उन्हीं का अंतःकरण अशुद्ध और अशुद्ध प्रवृत्ति होती 10:42 है, तो समाज में तो हाहाकार मच रहा है, पहले तो आदमी को अच्छा बनना 10:50 चाहिए, तो समाज के लिए नहीं है, ये तो जो अच्छा बनने से भी परे मुक्त होने के लिए 10:56 बैठे उन साधकों के लिए है| और उन्हीं को यह बात समझ में आएगी और वही 11:04 इस बात से पूरा लाभ उठा सकेंगे, मैं परमात्मा तो सब परमात्मा है, 11:11 

मुझ में परमात्मा है, तो सब में परमात्मा है, तो धोखा किससे 11:16 करेगा, विकार किससे भोग  करेगा, झूठ किसे बोलेगा, ऐसा कोई सद्गुण 11:23 नहीं कि, आत्म विचार से पैदा ना हो, और ऐसा कोई दुर्गुण नहीं जो भेद भावना से आवे न , 11:30 सारे दुर्गुण जो है भेद भावना से आते हैं, और सारे सद्गुण है अभेद भाव से पैदा 11:38 होता है,  लोग क्या सोचते हैं कि, पहले तो सदगुण भर लेवे फिर अभेद 11:45 भाव करें। ये पता ही नहीं कि अभेद भाव से ही सदगुण भरे जाते हैं।पहले तो तैरना सीख ले फिर पानी में 11:53 पैर रखे। तो गादी तकिया में सीखो बाबा। डोनालॉप का मंगा लो गादी उस पर तैरना सीख 12:03 लो फिर पानी में जंप मारो। पानी में तो तैराया जाएगा। ऐसे ही अभद भाव 12:10 से सद्गुण आयेंगे। 12:16 मुझ में राम तुझ में राम, धोखा किसको 12:24 दू। आत्मवत पश्येत सर्व भूतेषु |

 12:30 शास्त्र कहता है कि अपने जैसा सबको देखो। तुम जैसे नदियों को तलाव को वृक्षों को 12:36 देखते हो। निशंक होकर ऐसे प्रत्येक आदमी को देखो। यह चोर है, यह गुंडा है, यह डाकू है, यह 12:42 ऐसा है, यह वैसा है, यह कल्पना को छोड़ो तो तुम्हारे लिए चोर चोर नहीं रहेगा, डाकू डाकू नहीं रहेगा, गुंडा गुंडा नहीं रहेगा। 12:49 जिसको चोर का भय है उसको चोर ही मिलेंगे। जिसको डाकू का भय है उसको डाकू ही 12:56 मिलेंगे। जिसको दुर्जन का भय है उसको दुर्जन ही मिलेंगे, दुर्जन में, डाकू में, चोर में छुपा 13:02 हुआ मैं ही हूं। मैं हूं तो उसके लिए वह उसका ही रूप हो जाएगा। दुनिया से चाहे वो कैसा भी चलते 13:10 हो। जो ऐसा सब में मेरा मैं पने का अनुभव करता है वह महान 13:16 पुरुष के आगे सब नतमस्तक हो जाएंगे।

 महान पुरुष खाली संत साधु नहीं, जो महान तत्व को 13:24 मैं मानता है, वह महान हो जाता है। वही महान पुरुष है| 13:29 साधु वेष में भी महान पुरुष हो सकते हैं, गृहस्थ वेष में भी हो सकते हैं, वेष का नाम महान नहीं है, समझ का नाम 13:41 महानता है। हाँ, तो यह समझ साधु वेष में निखरी 13:47 प्रकट हुई इस लिए हम लोग साधुओ को साधु वेष को आदर करते हैं। लेकिन अभी तो साधु 13:54 वेष में, साधु वेष सब लोग मना लेते हैं। 14:02 ओम ओम 14:10 ओम।

 ये तालबे मंजिले तू मंजिल किधर देखता है, दिल ही तेरी मंजिल है तू दिल की ओर 14:16 देख।

 कई भाव आए, कई गए, कई वृतिया बनी और कई बिखरी, कई अवस्थाए आई और गई, तू वही का 14:26 वही। देख सभी अभी मुक्त हो ।

 नारायण क्या बोलता है कि मैं तो अभी पढ़ूंगा, फिर आत्म ज्ञान 14:32 पाऊंगा, फिर हिमालय जाऊंगा, समाधि लगा के शरीर छोड़ दूंगा, 14:41 क्यों, अभी अभी आत्म ज्ञान नहीं हो सकता क्या? अभी अभी तू ज्ञान स्वरूप नहीं है 14:46 क्या? पढ़ने के बाद तू ज्ञानी बनेगा? पढ़ने के बाद तो अंतःकरण में कुछ संसार के 14:53 मान्यताओं के संस्कार घुसेंगे, अंतःकरण में कुछ सूचनाए 15:03 इकठी होगी , सूचना नहीं इकट्ठी हुई तब भी तू है, सूचना ईकठी होगी तब भी तू है। और बुढ़ापा 15:10 आएगा या हिमालय में शरीर जाकर छोडूंगा, समाधि लगाऊंगा, अब अभी क्या हिमालय में जाकर 15:18 ज्ञान पाऊंगा ये जो दृढ़ता है, मन में मान्यता है, तो अभी हो नहीं 15:24 सकता।

 मैं ऐसे ऐसे सज्जनों को संतो को जानता हूं, जो 15:30 संत कहो, साधक कहो, सन्यासी कहो, जिन्होंने मान रखा है की हम प्राणायाम 15:36 करेंगे, जप करेंगे, अच्छा है धन्यवाद है। करो, मना नहीं 15:42 है। फिर शरीर को शुद्ध करेंगे, रक्त को बदलेंगे, 15:48 मज्जा को बदलेंगे, हड्डियां बदल जाएगी, एकदम शुद्ध हो 15:53 जाएंगे। कंचन काया प्राप्त होगी, कंचन। बाद में ही भगवान का दर्शन होगा 15:59 उसके पहले नहीं हो सकता। ऐसी जिनकी मान्यता थी वे लोग 22-22 साल, 25-25 साल, मौन रखे 16:08 हैं। जो उनकी मान्यता थी वो किए, और अंत में निराश होकर मर 16:14 गए। बाद में मिलेगा ना, यह हमारे लिए विघ्न हो 16:20 गया।

 यदि ऐसा होता तो जनक को पिंगले में पैर डालते डालते नहीं होता। सुकदेव जी को 21 दिन में नहीं 16:28 साक्षातकार होता परीक्षित को सात दिन में नहीं 16:33 होता। कंचन जैसी काया किया क्या परीक्षित ने, तब ज्ञान 16:40 हुआ?

 राम तीर्थ बोलते थे -

मुआ पछीनो वायदो, न काम, को जाने छे काल। आज, अदारे, अब घड़ी साधु 16:47 यो लो नगदी रोकड़ माल ।

 अभी जो तुम्हारे दिल को धड़कन दे रहा है, वह कौन है? तुम्हारे से 16:52 कोई अलग है? तुम ही तो धड़कन दे रहे हो। अभी जो अन्न को पचा रहा , वो कोन कोई भुत आके पचा रहा? 17:00 तुम ही तो पचा रहे हो। अभी जो बुद्धि को देख रहा है, वो कोई आकाश पाताल का यक्ष गंधर्व आके 17:06 तुम्हारी बुद्धि को देख रहा। कि तुम देख रहे हो? अभी जो बुद्धि का मन का दृष्टा है वह 17:11 एक रस है कि भविष्य का दृष्टा एक रस होगा? अभी एक रस है अभी तुम ही 17:19 हो।

तत्वमसी तत्+त्वं+आसी वो जो तत्व स्वरूप है, वो तुम ही 17:27 तो हो, वेद कहता है। बात घुस गया, कुछ होगा, बनेगा 17:36 आएगा, ऐसा थोडे की तत्वम भविष्यसी, तू तत्व बनेगा,। तत्वम बभुव तू तत्व 17:46 था। यह मान्यता जो है ना हम लोगों 17:54 को. .. जिसको ऐसे आत्म विचार में स्थिति करता है, उसका आचरण 17:59 मंगलकारी हो जाता है, शुभ हो जाता 18:05 है, दगा, फटका ये वो सब उससे अपने आप अलविदा हो 18:16 जाता है। अशांति भय चिंता द्वेष 18:22 राग कंकास| सब में एक परमात्मा को देखेगा तो 18:30 कंकास किससे 18:36 करेगा, सब में उस परमात्मा को देखेगा तो द्वेष किसे 18:44 करेगा। तुम तुम्हारे शरीर के कौन से अंग के साथ द्वेष करते हो, किसके साथ कंकास करते हो। 18:50 और शरीर के कौन से अंग से तुम डरते हो, बताओ। है तो सब अलग अलग, 18:59 किसी अंग से डरना चाहिए किसी अंग से कंकास करना चाहिए नहीं वह सब मैं ही हूं|

 जब सब सब 19:04 अकार उकार मकार अर्धमात्रा स्थूल सूक्ष्म कारण 19:09 प्राञ स्थूल सूक्ष्म और कारण मुझसे ही दिखते हैं वो मैं प्राञ हूं। 19:19 ओम, ओम. ........ ओम 19:38 वचन का मैं का हूं में दृष्टा, मन वाणी का हूं में स्रष्टा, 19:44 मैं मन को वाणी को हम देख रहे हैं, सता दे रहे 19:49 हैं। मन वचन को हम देख रहे हैं। ॐ ॐ ॐ 19:58 ॐ ॐ । अपनी गहराई में डूबते जाओ, महसूस करो 20:05 तुम्हारी, साक्षी सत्ता के बिना कौन सा विचार, कौन सा संकल्प जी सकता 20:12 है।ओम ओम ओम ओम 20:20 ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओ ओ 21:01 ओम ओ ओ ओम ओम 21:12 मैं आनंद स्वरूप हूं, मैं आत्मा हूं, शांत स्वरूप 21:23 हूं। अनेकों शरीरों में 21:29 मेरा ही व एक परमात्मा चैतन्य चमक रहा है, अनेको रूपों 21:36 में। अनेक आकृतियों में। जहां देखू 21:44 वहां राम। ओम ओम 21:50 ओम। सबके रोम रोम में वही चैतन्य राम मेरा आत्मा रम रहा है। 22:00 मेरा आत्मा क्या मैं ही तो रम रहा हूं। सब में , वाह वाह ओम 22:11 द्वैत कल्पना मात्र है, भ्रांति मात्र है। 22:20 अविद्या मात्र 22:25 है।

 गन्ने का रस मीठा लगता है, पानी फीका लगता है, लेकिन प्यास तो पानी से ही बुझती 22:32 है। और मजे की बात है कि गन्ने का रस में भी कृपा तो पानी की ही 22:37 है। ऐसे ही साकार विषय साकार दर्शन साकार 22:42 मुलाकातें चित्तवृत्ति को रसमय दिखती है, लेकिन वह चित्तवृत्ति को सत्ता तो निराकार 22:50 मुझ से आती है। 22:56 और उनकी, जीवन शक्ति भी मुझ निराकार आत्मा 23:06 से। गन्ने का रस पानी की सत्ता से है, रस की सत्ता से पानी नहीं, पानी की 23:13 सत्ता से रस है। ऐसे ही सामान्य चैतन्य की सत्ता से ही 23:21 विशेष रस वाला व्यवहार दिखता है। रस वाला बनता बिगड़ता है लेकिन 23:28 रस वाले को जो रस का दान करता है वो एक रस आत्मा में ही हूं। रूप का रस 23:36 आया, गया, रूप देखने का रस कब आया कि? मैंने 23:42 सत्ता दी तब, मन को आया, लड्डू खाने का रस गुल्ला खाने का रस 23:49 तब आया जीव को, जब मैंने सत्ता दी, कान को शब्दों का रास तब आया 23:56 जब मन वृत्ति में मुझ दृष्टा की सत्ता दी। 24:02 तो विशेष जो तरंगे हैं, उठती है, बनती है, बिगड़ती है आती है, 24:11 जाती है, इन सब में मैं एक का एक दृष्टा साक्षी।

 सीधी बात जो अभी है वही, अनादि काल 24:19 से मैं हूं, मैं इस देह को मैं मानने की गलती छोड़ 24:24 रहा हूं। इस देह से ऐश करने की मूर्खता को अलविदा। इस देह से सुखी होने की भ्रांति मैंने 24:33 छोड़ दी। हजारों शरीरों में मैं सुख का आस्वादन कर रहा हूं, वो सुख टिकता नहीं , दुख 24:40 का, बोजा ढो रहा हूं वह दुख भी टिकता नहीं। देह को ढो  रहा हूं देह भी टिकती नहीं। ये 24:48 विशेष मेरी माया है।ये माया में ऐसी लीलाएं होती रहती 24:54 है। विलास मात्र है। 25:01 वृति विलास है, माया विलास है, चित्त विलास 25:07 है। इस चित के साक्षी, चैतन्य स्वरूप मुझको मेरा 25:15 प्रणाम। ओम ओम ओम 25:30 ओम ओम ओम 25:38 ओम। ...............

 इन विचारों को एकांत में,पवित्र वातावरण 25:45 में, शुद्ध हदय से, बारबार दोहरा 25:52 कर, अपनी तुच्छ मानी हुई बातों को पकड़ी हुई कल्पनाओं को छोड़ो तो, अभी। 25:59 अभी जो सर्वत्र है वो यहां भी है, जो सदा है वो अभी भी है, जो सब में है वो हम में 26:07 भी है, और जो सम है वो सब में एक जैसा ही है, ऐसा नहीं कि वशिष्ठ जी के हृदय में वो 26:14 परमात्मा बड़ा था, कबीर के हृदय में वो परमात्मा बड़ा था, 26:20 भगवान शंकर के हृदय में वो परमात्मा या ईसा मूसा के हृदय में वो परमात्मा बड़ा था, 26:26 नहीं, वो था है और रहेगा, ये माया की तरंगे जो शरीर ना 26:33 थे ,और ना रहेंगे, बीच में दिखने भर को है, फिर चाहे ईसा मूसा के हो, कबीर जी के हो, 26:39 नानक जी के हो, अथवा किसी स्त्री के हो या पुरुष के देह आकृति, ये सब उस चैतन्य का 26:47 विलास मात्र है माया मात्र |

 माया 26:58 मात्र जगत इदं| यदिदं मनसा वाचा चक्षुभ्याम श्रवण आदि भी, नस्वरम गृहमाण च विद्धि माया मनोमयम |

 य सब 27:07 मनोमय, इस मनोमय देह को, देह से इंद्रियों से दिखने 27:13 वाले पदार्थों को, कब तक हम थामने की इच्छा करेंगे,

 क्या 27:19 करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज छोड़ी छोड़ी सब जात है देह गेह धनराज 27:28

 ये देह भी छोड़ना पड़ेगा, अभी प्रभात को हम आए उस समय जो हमारी देह की उम्र 27:36 थी, दो घंटे हमारे चले गए, आठ बज रहे 27:44 हैं, शरीर की जो आयुष सुबह छ बजे थी, वो 27:50 अभी अभी नहीं रही, एक घंटा 52 मिनट चला गया, 27:59 देह तो जीर्ण शीर्ण होता रहता है, ये काल का असर देह पर पड़ता है, मुझ 28:06 दृष्टा पर नहीं, शरीर की उम्र और शरीर के कण वैसे न 28:12 थे, जैसा हम अभी आए सुबह, सत्संग हल में आए 6 28:19 बजे, सर्दियों के दिन में अंधेरे अंधेरे में आए, उस समय जो हमारा शरीर था, शरीर की 28:27 आयुष्य थी, वह अभी नहीं बची, उसमें से जीर्ण शीर्ण हो 28:32 गई, लेकिन हम वही के वही है, शरीर वही का वही नहीं, शरीर में कितना 28:38 ही भीतर बदला हट हुआ, लेकिन हम वही के 28:43 वही, कल सुबह जो हमारी उम्र शरीर की थी अभी नहीं है, अभी जो उम्र है वह शाम को नहीं 28:52 रहेगी, शरीर की आयुष से क्षीण हो रही है, लेकिन 28:58 हम अपने को शरीर मानते तो समझते कि हमारी आयुष्य क्षीण हो रही है, ये गलती 29:04 है, हमारी आयुष्य क्षीण होती तो भाई हजारों बार तुम्हें शरीर मिले मर 29:12 गए, तुम तो क्षीण नहीं हुए, ऐसा ये शरीर भी एक खोल है, जैसे आकाश में घड़े, अथवा मथ मकान कवर 29:21 बन जाते हैं, मकान की उम्र हो सकती है, आकाश की क्या उम्र, घड़े की उम्र हो सकती है जीर्ण शीर्ण आकाश की 29:30 क्या उम्र जीर्ण शीर्ण होगी|

 ऐसे ही हम चिदाकाश स्वरूप निराकार 29:36 चैतन्य आत्मा है, ऐसा जो मानता है वही जानता है, बाकी के सब बालक 29:45 है, सब में एक, एक में सब, सब घड़े एक आकाश 29:50 में, और सब घड़ों में एक ही आकाश, ऐसे ही सब शरीर एक चिदानंद स्वरूप परमात्मा में, 29:58 और सब शरीरों में वही चिदानंद परमात्मा, वही दृष्टा साक्षी शुद्ध बुद्ध 30:07 अकर्ता अभोक्ता निर्लेप, 30:12 संकल्पों की भीड़ से जरा बच के निहारो अपने आप 30:18 में, क्या भविष्य पर रखोगे, भगवान सदा है तो अभी है, सर्वत्र है 30:27 तो यही हैं, सब में है तो मुझ में भी है, समान रूप से है तो मेरे में भी उतने ही का उतना 30:36 है|

देह सभी मिथ्या हुई जगत हुआ निसार, हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात कार |

 देहो को 30:47 मिथ्या, जगत के भोगों को निसार, दृढ़ता से समझा और मैं अभी उतने का उतना 30:56 शुद्ध बुद्ध हूं, ऐसा स्वीकार कर लिया, तो अपने आत्मा का 31:04 साक्षात्कार, ये जरूरी नहीं की आशाराम बापू  को अढ़ाई  दिन मस्ती रही तो हमको भी अढ़ाई दिन रहेगी तभी 31:09 साक्षात्कार होगा, नहीं तुम अढ़ाई दिन पानी पीते रहो तब भी 31:14 तुमने सरोवर का पानी को समझा ऐसी बात नहीं तुम अढ़ाई सेकंड पियो त भी सरोवर का पानी 31:20 वही है, अढ़ाई साल तक पीते रहो तो भी वही का वही है, ऐसे तुम्हारे चित्तवृत्ति शांत हो कर अपने 31:28 आप में अढ़ाई सेकंड के लिए 31:35 भी अपनी गरिमा में बैठ गई, तो हो 31:42 गया,

 मुझे परमात्मा नहीं मिला परमात्मा मेरे से दूर है, यह सब मलिन चित्त के विचार 31:53 है, मुझसे मेरा भाई दूर है, मेरा मित्र दूर है, पड़ोसी दूर है, मेरी आंख मुझसे दूर है, 31:59 मेरी जीभ मुझसे दूर है, मेरा परमात्मा मुझसे दूर कैसे हो सकता है, जिसको मैं मैं मानता हूं, मैं मानना 32:07 मेरी मूर्खता है, इस देह को मैं मानता हूं इसीलिए परमात्मा दूर लगता है, मैं देह हूं 32:13 ही नहीं, देह मिथ्या है, देह के व्यवहार मिथ्या है, संसार मिथ्या है, भोग निसार है, 32:20 इस सबका दृष्टा साक्षी आत्मा में सार रूप हूं, ऐसा जो मानता है वही जानता है, और कोई 32:28 जानते 32:34 नहीं,

 आदत पड़ गई आंखों से देखने की इच्छा, सोचते कि भगवान भी कोई इन आंखों से 32:40 देखेंगे, कभी आएगा, अभी नहीं है फिर मिलेगा, जो अभी नहीं है वह कभी नहीं, जो 32:47 यहां नहीं वह कहीं नहीं, जो आप में नहीं वो किसी में 32:55 नहीं, यदि तुम्हारे में नहीं है तो किसी में नहीं, क्यों की वो तो सर्वव्यापक है, विभु 33:03 है, सर्वत्र है, ये फलानी जगह जाऊंगा जरा साधना करूंगा तभी 33:11 मिलेगा, ये भूत निकाल दो, फलानी जगह तो कई लोग रह रहे 33:23 हैं|  

सत्संग की आधी घडी , इसी का नाम सत्संग है, 33:31 सुमिरन वर्ष 50, वर्षा वर्षे एक गड़ी अरहट फिरे बार 33:37 मास, एक घड़ी भी सत्संग की वर्षा बरसती है, आप जान लो अपने को, हो गया बेड़ा पार, हो गए 33:45 मालामाल, निहाल हो गए , निहाल तो थे 33:51 ही, लेकिन शरीर को मैं मान के बेहाल हो गए, 33:58 इंद्रियों के द्वारा भोग विलास की वासना में घसीटे गए, इसीलिए बेहाल हो 34:06 गए, निहाल तो हो ही हो 34:14 तुम|  

ध्यान करूंगा, समाधि करूंगा, हिमालय में जाऊंगा, शरीर छोड़ 34:23 दूंगा, शरीर तू छोड़ देगा, कैसे छोड़ेगा ? बोले प्राण चढ़ा के शरीर छोड़ दूंगा, एक 34:31 शरीर तू छोड़ेगा अनेको शरीर है तेरे, एक शरीर तेरा तू छोड़ेगा, अनेको शरीर 34:39 में तू है, तो एक शरीर में मैं मानता है तब शरीर 34:45 छोड़ूंगा समाधि करके, शरीर छोड़ने से 34:50 भी आत्म ज्ञान हो जाए ऐसी बात नहीं है, ना समझी छोड़ दो, तो शरीर तो छूटा 34:58 हुआ ही है, रोज रात को नींद में छोड़ देते 35:03 शरीर, शरीर तो छूटा हुआ ही है, शरीर का प्रारब्ध आएगा तो तुम रखना चाहोगे तो एक 35:09 सेकंड रख नहीं सकोगे, तो छूटेगा ही, छूटा हुआ ही है, स्वासो 35:16 स्वास में शरीर के कितने कण छूट रहे हैं, शरीर थामने की भी इच्छा ना करो, शरीर 35:21 छोड़ने की भी इच्छा ना करो, इच्छा मात्र माया है|

 35:29 सब हो रहा है, बीत रहा है, समय की धारा 35:36 में, काल पाकर शरीर बनते हैं, काल पाकर शरीर मरते हैं, 35:43 मैं, मैं काल को भी देखता हूं, जिसने सुबह के 6 बजे को देखा उसने अभी आठ बजने को भी 35:50 देखा, छ आए और गए, आठ आए और जा रहे हैं, मैं वही का वही 35:57 

 जिसने पूर्व को देखा उसने पश्चिम को 36:03 देखा, अभी जो पढ़ रहे हो उससे तुम इधर को बैठे हो तो लग रहा है कि मैं पूर्व में 36:10 हूं पढ़ने वाला पश्चिम में, और तुम उस तरफ जाके बैठो तो पढ़ने वाला पूरव में देखेगा और 36:15 तुम पश्चिम में, तुम उत्तर के तरफ बैठो तो ये पढ़ने 36:20 वाला दक्षिण में दीखेगा, तुम दक्षिण में बैठो तो पढ़ने वाला उत्तर में 36:26 दिखेगा, तो ये सब तुम्हारे देह को मैं मानकर पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण 36:35 है, शरीर को मैं मानकर समय की धारा है, लेकिन यदि शुद्ध आत्मा को मैं मानते हो 36:43 तो ये सब मन की कल्पना है, पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण, छ आठ 10, बचपन जवानी बुढ़ापा, जीवन 36:53 और मृत्यु, ये सब तुम्हारे चैतन्य की विशेष स्फुरणा माया उसमें ही सब 37:02 है| माया रचित यह देह है, माया रचित यह गेह 37:09 है, माया रचित देह को छोड़ा तो क्या 37:15 छोड़ा, मैं तो हिमालय में समाधि करूंगा, जाओ करो, 37:20 लेकिन मैं कौन हूं ये तो जानो, अपने को जानो फिर जाकर समाधि करो,

अपने को जानेगा तो पता चलेगा कि, मेरी 37:28 तो सदा समाधि है, असमाधि  कभी हुई नहीं, देह की सदा समाधि 37:36 रही नहीं, और मुझ अखंड चैतन्य की समाधि कभी टूटी 37:44 ही नहीं,बाकी रहा सवाल  अंतःकरण का, अंतःकरण  37:51 समाधि करो अच्छा है, ज्ञान समाधि करो, योग समाधि करो, 37:58 योग समाधी करो ठीक है, यह अंतःकरण कर रहा 38:03 है, पढ़ने भी अंतःकरण जाता है, दुखी भी अंतःकरण होता है, सुखी भी अंतःकरण 38:10 होता है, जन्मता भी अंतःकरण मरता भी अंतःकरण है, मैं 38:16 तो वही का वही, आहा हा , ओम ओम 38:22 ओम ओम ओ ओ 38:30 ओओओओ ओम ओम ओम 38:39   ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम। ..............

वाह 38:51 वाह खूब गहरी शांति, खूब शांति, भीतर ही भीतर, वाह वाह अब ओम की गुंजन रूए 39:00 रूए में हो भीतर, भीतर ही भीतर में ओम स्वरूप आत्मा 39:07 हूं, वाह वाह क्या शुभ समाचार है, 

आजनी घड़ी घडी 39:13 आमणि रे, मारा गुरु आवयानी वधामणि रे ,

सचमुच में 39:23 तुम्हारा गुरु तो तुम्हारा आत्मा जब हृदय में प्रकट होता है तब समझो कि तुम्हारा गुरु आए, अभी 39:29 तो बाहर से गुरु जो दिखते हैं वो तो देह गुरु जी का दिखता है, गुरु तत्व तो तुम्हारे हृदय में छुपा 39:35 है, 

आजनी घड़ी घडी 39:13 आमणि रे, मारा गुरु आवयानी वधामणि रे ,

वाह वाह, ध्यान करके ईश्वर को देखने की कोशिश नहीं करो, 39:58 ध्यान करके, कोई रूप देखने की, कोई अवस्था बनाने 40:04 की कोशिश मत करो, यह सब जो विचार रूप देखना की इच्छा हे , यह 40:12 सब रुकावट हैं , इच्छा मात्र रुकावट 40:18 है, हे वासना हे इच्छा है अहंकार जाओ, 40:23 तुम्हें हमने माफ कर दिया, सदियों से हमें सता रहे थे, शरीरों 40:29 में जकड़ा रहे थे, हमारी नासमझी से तुम हम पर राज्य कर 40:35 रहे थे, जाओ तुम्हें माफ है, क्योंकि ना समझी हमारी 40:40 थी, हे इच्छा अहंकार वासना 40:46 जाओ, अब हम अपने आप में आराम पा रहे हैं, अपने राम स्वरूप में हम 40:57 रमण कर रहे 41:04 हैं, खाना पीना चलना फिरना शरीर का मन का इन्द्रीओं का, प्रकृति का 41:10 स्वभाव है, सत्ता देना मेरा स्वभाव 41:23 है, ओम ॐ ॐ , गुरु 41:38 ओम, मला मभ ओम 41:50 ओम वाह वाह वा वाह वाह वाह 41:58   [हंसी] 42:15 देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो 42:21 गया, ना छेड़ो मुझे यार में खुद प मस्ताना हो गया 42:38",

 video -Sakshatkar saral hai  -- private linK


  साक्षात्कार सरल है in short


 परमात्मा प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा यह है कि -

  • हम संसार की तरह ही आकृति के रूप में परमात्मा को देखना चाहते हैं, 

  • दूसरी बाधा है कि कुछ करने से परमात्मा मिलेगा

( जैसे जप, तप, भुखमरी आदि, लेकिन जो करने से मिलेगा वो ना करने से छूट भी जाएगा) 

  • चित्  का साक्षी रूप जो परमात्मा है वह कुछ करने से नहीं मिलेगा, उसको जान लो ! 

  • अभी हम ऐसे हैं बाद में मिलेगा, 

  • अभी यहां नहीं है फिर कहीं से आएगा, 

  • अभी हम उसके दर्शन के योग्य नहीं है फिर होंगे, 


 


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