गुरुवार, 28 अगस्त 2025

ज्ञानज्योति प्रगटाओ| Gyanjyoti Pragtao| Part-2

 


सत्संग के मुख्य अंश-

वेदों का पठन-पाठन तथा मूर्तिपूजा उपासना के रूप में कब से प्रचलित हुई? 

सूक्ष्म बुद्धि से शिवपद को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। 

शांति का जीवन में क्या महत्व है तथा वह किस प्रकार प्राप्त होती है? 

अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी शरण आने को क्यों कहा? 

जैसा अन्न होता है वैसा मन बन जाता है...कणाद मुनि का प्रसंग !

तन-मन और प्राण का समन्वय हो तो आत्मराज्य में प्रवेश मिल जाता है। 

तमोगुणी, रजोगुणी तथा सत्वगुणी मनुष्य के क्या लक्षण हैं? 

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सत्संग

0:01 सब धर्मों से श्रेष्ठ धर्म है मन इंद्रियों का शांत 0:12 होना, ध्यान आध्यात्मिकता की अंतरंग साधना 0:20 है, जिस समय ब्राह्मण बुद्धिमान थे, समाज में विवेक वैराग्य बुद्धि बल का 0:30 प्रभाव था, उस समय ज्ञान मार्ग का वेद और उपनिषदों 0:38 का श्रवण मनन होता था, पठन पाठन होता 0:45 था, जिस समय क्षत्रिय और वैश्य का प्रभाव 0:51 बढ़ा, तब से मूर्ति पूजा पाठ पूजा का प्रारंभ हुआ 1:01 होगा ऐसा विद्वान पुरुषों को लगता 1:07 है, और जब आदमी का तन  बीमार मन 1:15 मलिन भोग वासना बढ़ी मतलब शुद्र चीजों की आसक्ति बढ़ी, 1:23 शुद्र का प्रभाव बढ़ा, मजदूर बढ़े, 1:31 तब परोपकार 1:37 सेवा आदि के द्वारा परमात्मा को पाने का मार्ग 1:46 खुला। 


बुद्धि सूक्ष्म है तो उपनिषदों का विचार करने मात्र से 1:55 जीव शिव पद को पा लेता है, बुद्धि मध्यम है तो उपासना आदि करने 2:05 से व्यक्ति अपने चैतन्य स्वरूप ईश्वर की यात्रा की ओर चल पड़ता 2:12 है, और बुद्धि अगर मजदूरी कर रही है विषय भोगों की मजदूरों का प्रभाव पड़ा शुद्र 2:22 चीजों में उलझने वालों का प्रभाव बढ़ गया जीवन में तो ज्ञान मार्ग की साधना कठिन सी 2:28 लगने लगी, इसलिए फिर सेवा भाव कर्मकांड उसका 2:37 प्रचार जो ब्रह्म वेता है उन महापुरुषों का अनुभव 2:43 है कि, क्रिया करने से जो चीज मिलेगी वह नश्वर 2:51 होगी, कर्म से जो फल मिलेगा वह शाश्वत नहीं होगा, 3:01 उपासना से जो फल मिलेगा वह आखरी नहीं 3:08 होगा, लेकिन ज्ञान से जो फल मिलेगा वह तो मिला मिलाया था, उसका केवल 3:16 अज्ञान दूर होता है, विश्व में कितने भी कर्म कर ले कितनी 3:23 भी उपलब्धियां कर ले, लेकिन अपने स्वरूप का बोध नहीं हो 3:31 तो मृत्यु का झटका आते ही करता बेचारा अनाथ रह जाता 3:41 है, वह कर्ता अपने मूल स्वरूप को जाने इसलिए 3:46 भागवत कार  ने कई ऐसे श्लोक रचे कि, कर्ता अपने घर 3:56 पहुंच जाए, उसमें का एक श्लोक आज हम 4:06 विचार करेंगे, ये एकनाथी भागवत का श्लोक बोर्ड पर लिखा है, दोहरा दो 4:13 


अमान मत्सरो दक्ष , निर्ममो दृढ सौहद

  असत्वरो अर्द्ध जिज्ञासु, अनाश्यु अमोघ वा


 

 जो सत शिष्य 5:20 है,  वह मान और मत्सर से रहित, अपने को कार्य 5:26 से कार्य में दक्ष, अपने कार्य में दक्ष, ममता रहित, गुरु में 5:33 दृढ़ प्रीति वाला, निश्चल चित और परमार्थ का जिज्ञासु, ईर्षा से रहित, और सत्यवादी 5:43 होता है।  इस प्रकार के नौ सद्गुणों से सुसज्जित जो होता है, वह सत शिष्य सतगुरु 5:52 के थोड़े उपदेश मात्र से, साक्षात्कार करके जीवन मुक्त पद में आरूढ़  हो जाता 5:58 है। 


 गुरु के लक्षण बताए शास्त्रों में जो प्राणी मात्र 6:04 का हित चाहता हो, सर्व भूत हिते रता जिसकी बुद्धि 6:14 हो, जो अपने स्वरूप में जगा हो, जिसको जगत 6:20 मिथ्या भाषता हो, स्वप्न तुल्य लगता हो, अथवा त्रिकाल में ही जगत की उत्पत्ति ही 6:26 ना दिखती हो, इस प्रकार की जिनकी दृढ़ अनुभूति 6:32 है, जो अपने वृत्तियों से पर अपने स्वरूप में जगे हैं, इस प्रकार के कई ज्ञानवान 6:39 महापुरुषों के लक्षण कहे गए।  उनमें मुख्य लक्षण है कि, जिनके चरणों में बैठने से 6:46 हमारे चित्त में शांति आती हो, वह बढ़िया से बढ़िया ज्ञानियों का लक्षण है।  ज्ञानवान 6:52 के चरणों में बैठने से शांति का एहसास होता हो, तो यह बढ़िया बढ़िया उनका 7:01 लक्षण।


  कुछ ऐसे लक्षण होते, स्वसंवेद और कुछ परसंवेद होते हैं। यज्ञ करना, तप करना, 7:09 तीर्थ करना, कीर्तन करना, होम करना, हवन करना, य स्व करने वाले को भी पता होता और दूसरे 7:16 लोग भी देखते हैं, यह पर संवेद भी है, लेकिन 7:21 आत्मज्ञान पर संवेद नहीं, वह स्वसंवेद है, वह दूसरों को नहीं दिखेगा, आत्मज्ञान 7:28 तुम्हे हो जाए तो तुम्हारा ज्ञान का अनुभव दूसरों को नहीं दिखेगा, दूसरों का तुम्हारा बाह्य व्यवहार 7:37 दिखेगा, लेकिन तुम अपने स्वरूप में जगे हो वह तो तुम्हें ही अनुभव होगा, इसलिए ज्ञान 7:43 का अनुभव स्वसंवेद है, 


फिर भी शास्त्रों ने बड़ा साहस किया स्वसंवेद अनुभव होते 7:50 हुए भी साधक को कैसे पता चले कि, जिनके नजरों में जिनके वातावरण में आने से शांति 7:58 आती हो, क्योंकि ज्ञान का परम शांति का अनुभव ज्ञानी का स्वसंवेद अनुभव होता है, 8:04 वो क्रियाकलाप व्यवहार करते हुए भी अपने हृदय में परम शांत अवस्था का अनुभव करता 8:11 है। 


 और परम शांत अवस्था से बढ़कर व शांति के अनुभव से बढ़कर और कोई जगत में 8:20 श्रेष्ठ अनुभव नहीं माना गया, देवी देवताओं का दर्शन या रिद्धि 8:27 सिद्धियों की उपलब्धि, उसका बुद्धिमान ने इतना महत्व नहीं गिना, 8:33 जितना शांति का महत्व है, और वह शांति आत्मज्ञान से होती है, लब्धवा ज्ञानम पराम 8:41 शांति, 


श्री कृष्ण ने देखा कि अर्जुन रथ तो लेकर आया है युद्ध करने के लिए, ईर्ष्या थी 8:49 और लोभ था, और अब पलायन वादी के बात कर रहा है कि, मैं सन्यासी हो जाऊंगा भिक्षा मांग 8:55 कर खाऊंगा, इन सुहृदों को मित्रों को कैसे मारूं, ये पृथ्वी का राज मुझे नहीं चाहिए, मैं साधु हो जाऊंगा, तो अंदर में तो भोग की 9:03 वासना है, ईर्ष है, लालच है,  और बाहर से पलायन वाद करता है। इसलिए अर्जुन जाएगा तो भी ठीक 9:11 से संन्यासी के धर्म को नहीं निभा सकेगा, इसलिए भगवान ने उनको कर्म निष्काम 9:18 कर्म मार्ग का उपदेश दिया, योग का उपदेश दिया, और व अगर तू उसमें नहीं आ सकता तो सब 9:23 कर्म मुझे अर्पण करके, तू साक्षी मात्र होकर चलता रहे, ऐसा करके श्री कृष्ण ने 9:28 अर्जुन को अपने स्वभाव में अपने आत्म स्वभाव में जगाया, मैं क्षत्रिय हूं उस 9:34 स्वभाव को त्यागने का उपदेश दिया,


 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकम् शरणम व्रज,

अहम त्वां सर्व पापेभ्यो  मोक्षयिष्यामि मा शुच। 


 मैं क्षत्रिय हूं मेरा यह कर्तव्य है, मेरा वो कर्तव्य, ये सब 9:47 कुछ छोड़कर तू मेरी शरण आ जा, मेरी शरण आ माना, ये सारे भाव जहां से उठते हैं, उस भाव 9:55 के आधार में तू आजा, तो तुझे बोध हो जाएगा, फिर तुझे कर्म बांध नहीं सकेंगे, तो बोध 10:02 होने के लिए ब्रह्म वेता का सानिध्य नितांत जरूर 10:09 जरूरी है।  लेकिन ब्रह्मवेत्ता का सानिध्य मिले, हमें बोध पाने के ये नव गुण न हो तो, 10:17 ब्रह्म वेता के सानिध्य से छोटा मोटा ही लाभ होगा लेकिन, आत्म साक्षात्कार का लाभ 10:23 से हम वंचित हो जाएंगे।  तो आत्म साक्षात्कार का लाभ हो इसलिए आज के इस 10:28 श्लोक को, हम अच्छी तरह से समझेंगे, कि जो सत शिष्य है, मान और मत्सर से रहित होता 10:35 है, जैसे धनवान के पीछे कोई गठ पड़े तो धनवान कैसे संभल जाता है, अथवा धनवान के 10:43 पीछे इनकम टैक्स की इंक्वायरी निकले तो व कैसा अपना सेटिंग कर लेता है? जय राम जी की।


 10:50 ऐसे ही जिसमें सद्गुण है उसकी वाह-वाह होने लगती तो, वाहवा की जगह से अपने को 10:57 बचाकर निर् मान की जगह पर जाता है, और यही कारण था कि राजे महाराजे जब गुरुओं के 11:04 द्वार पर जाते थे तो, भिक्षा पात्र लेकर मधुकरी करने जाते थे, राजा बन के गुरु जी 11:11 को एक महल में रखकर ब्रह्मविद्या ले सकते थे, लेकिन वह ब्रह्म विद्या पचती नहीं, मैं 11:17 राजा हूं और मैं राजगुरु हूं, उनको भी मैं राजगुरु हूं और उनको भी लगे मैं राजा हूं, 11:22 तो पंडित गुरु पंडित हो सकते हैं लेकिन ब्रह्मवेत्ता नहीं, 11:34


 उपनिषदों के ज्ञान में जो महापुरुष सन्यासियों को पढ़ाने का संकल्प करते 11:42 थे तो, फिर उनको कणाद आदि मुनि की कथा सुना देते थे, कणाद मुनि हो गए दर्शन शास्त्र के 11:49 अच्छे विचारक, वे एकांत अरण्य में रहते थे, और अपनी 11:55 आजीविका खेतों में जो कण गिर जाते थे उसको चुनकर उसी से गुजारा करते थे, और छठा भाग राज्य 12:02 को कर में दे देते थे, उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध के, तत्वज्ञान 12:08 का उपनिषदों का दर्शन शास्त्र का जो उनका विचार थे, उन विचारों को पढ़कर दूर दूर से 12:14 अच्छे अच्छे विद्वान संत उनका दर्शन करने आते, 


आखिर राज्य को पता चला, राजा को पता 12:20 चला कि कणाद मुनि इतने पवित्र हैं कि उनके जो दर्शन शास्त्र के सिद्धांत और अनुभव के 12:27 वचन हैं, उनसे बड़े अच्छे-अच्छे बुद्धिमान लोग आकर्षित होकर आए। जांच करो वह क्या 12:34 खाते हैं, कैसे रहते, मेरे राज्य में रहते और मैंने उस साधु पुरुष का दर्शन नहीं किया, उनकी सेवा नहीं की, पता चला कि वह 12:40 मुनि तो कण ढूंढ के खाते, राजा शर्मे हुए पश्चाताप से भर गए, गए मुनीश्वर के कुटिया 12:49 पर, और अपना ताज बाज उतार कर लंबे दंडवत प्रणाम किए, के मुनीश्वर मैं आपसे क्षमा 12:54 चाहता हूं, आप मेरे राज्य के अरण्य में रहते हैं, और राजा का फर्ज है कि साधु ब्राह्मण 13:02 अतिथि साधु ब्राह्मण अपंग आदि उन लोगों की संभाल रखे, और आप जैसे महान विद्वानों की 13:10 मैंने सेवा नहीं की, और आपको कण ढूंढकर गुजारा करना पड़ा, मैंने आपकी सेवा नहीं की, 13:16 मैंने खबर तक नहीं ली, आपकी इसलिए मैं बड़ा शर्मिंदा हूं, आप मुझे क्षमा करें, अभय दान 13:22 दे, मुझ भाग्य का नाम फलाना फलाना है, और मैं यहां इस नगर की व्यवस्था करता हूं, मुझे राजा कहते हैं लोग मैं ऐसा नहीं कहा 13:30 मुझे लोग राजा कहते। बोले ठीक है, सुखी भव, निर्भय रहो, बोले महाराज अब इस दास की 13:37 प्रार्थना स्वीकार करो कि, आप ये कुटिया बुटिया छोड़ो आप चलो मेरे महल में आपको एक 13:44 महल का खंड पूरे का पूरा अर्पण कर देता हूं, सेवक होंगे नौकर होंगे, दास होंगे, 13:51 दासिया होंगी, कोई पैर चपी करेगा तो कोई बादाम का रोगन घिसे, ताकि आप ठीक से 13:56 बुद्धिमता का और कोई तत्व चिंतन कर 14:02 सके, और खाने पीने के लिए केसर कस्तूरी पिस्ता बादाम डले हुए बासु दी खीर 14:09 होगी, महाराज आपकी पूरी सेवा होगी, ताकि आप पूरा तत्व चिंतन करके और बढ़िया दर्शन 14:15 शास्त्र लिख सके। 


 महाराज ने कहा सीधा चला जा, और मुड़ के दोबारा इधर मत 14:22 आना, जय राम जी की।  कणाद मुनि ने कहा दोबारा नहीं 14:27 आना, अगर महल में रहूंगा तो, राज्य का अन्न कैसा होता है उस राज्य के अन्न को खाकर 14:35 मैं तत्व चिंतन करूंगा कि, तेरी सेवा लेकर मैं तेरे गुणगान लिखूंगा, जैसा अन्न होता है ऐसा मन हो जाता है,  14:43 तो उपनिषदों का ज्ञान उस वक्त प्रचलित था, जो 14:50 लोग अपनी बुद्धि को दूषित होने से बचाते 14:55 थे, परिश्रम से के परिश्रम करके जीवन को सुदृढ़ करते थे, और बुद्धि का 15:04 विकास करते थे, शारीरिक और मानसिक जब विकास था ठीक से, उस समय उपनिषदों का 15:10 प्रचार प्रसार हुआ होगा।  


चीन में आज से 3000 वर्ष पहले 15:16 कन्फूसियस  जा रहे थे, एकाएक वो चकित हुए, कि एक किसान अपने 15:24 बेटे के साथ कुए में से पानी खींच रहे हैं, 15:29 खेत को पिला रहे हैं, चमड़े के कोष को खींच रहे हैं, कंफ्यूज इसको हुआ कि इन विचारों 15:35 को अभी तक पता नहीं चला कि बैल की खोज हुई है, बैल के द्वारा कुए में से पानी खींचा 15:40 जाता है, इतना मैन पावर खर्च रहे हैं, जहां बैल पावर की जरूरत है, या मोटर की एक हॉर्स 15:48 दो हॉर्स पावर मोटर की जरूरत है, वहां मैन पावर बिचारे बिगाड़ रहे हैं, मैन पावर की 15:54 रक्षा करने को मैं इनको सिखाऊं, जरा उपदेश दूं, जय श्री कृष्ण 16:01 कन्फ्यूशियस रुक गए और उस बुड्ढे के कंधे पर हाथ रखकर कहा 16:07 कि, किसान तुम्हें पता है कि बैल की खोज 16:12 हुई है, बैल के द्वारा कुए में से पानी निकाला जाता है, और खेत में सिंचा जाता है, 16:17 बुढे ने कहा चुप रहो धीरे बोलो, मेरा लड़का सुन लेगा, बाद में बात करते अकेला में, जाकर 16:25 कन्फ्यूशियस  से उसने बात की, कि मुझे पता है बैल के द्वारा पानी खींचा जाता है, 16:31 लेकिन मैं क्यों खींच रहा हूं, अपने बेटे के साथ कि वो स्वावलंबी हो, और कुछ शरीर से 16:40 परिश्रम होगा तब उसका मन खिलेगा, बुद्धि का विकास होगा, जो शरीर से परिश्रम नहीं करते 16:47 हैं, मैन पावर मैन पावर बचा बचाकर शरीर को लाड लड़ाते हैं, वो बेचारे थोड़ी तितिक्षा 16:54 नहीं सह सकेंगे, तो आप कृपा करके आपका उपदेश 16:59 और किसी जगह पर आजमाना, मेरा लड़का कहीं आलसी ना हो जाए। जय 17:06 जय। 


 मिस्टर सोलन से पूछा गया कि आप इतने 17:11 बुद्धिमान और इतना ऊंचा भारी उपदेश देते हैं, और शरीर का बांधा भी बढ़िया है, क्या 17:20 कारण है?  जहां बुद्धि अकल होती है वहां शरीर लथु होता है, और जहां शरीर पाढ़े जैसा होता 17:26 है वहां उपला मार नहीं होता है, लेकिन आपका शरीर का बांधा भी बढ़िया है और 17:33 बुद्धि का भी विकास इतना है, इसका कारण क्या? सोलन ने 17:40 कहा कि कुछ न कुछ परिश्रम में खोज लेता हूं, इसलिए शरीर का बांधा मजबूत है, और मैं 17:48 संसार में विद्यार्थी होकर रहता हूं, कुछ ना कुछ नया विचार रहता हूं, खोजता रहता हूं , 17:54 इसलिए बुद्धि का भी विकास है, तो बुद्धि का विकास और शरीर का बांधा मजबूत है।


 ऐसा जो 18:02 जमाना था उस जमाने में उपनिषदों का ज्ञान का प्रचार प्रसार अच्छी तरह से हुआ, आज 18:09 क्या है कि अंदर में वासना है 20वीं सदी की, और ज्ञान लेना चाहते इसवी सन पूर्व न 3 18:17 हजार वर्ष पहले का, इसलिए क्या होता है कि ज्ञान का ओढ़ना, 18:23 ओढ कर भक्ति का कथाकार का ओडना, ओढ कर काम वही करते जो 20वीं सदी के लोग कर जब 18:29 कतरे लोग, जय श्री कृष्ण। 


तो बुद्धि को शुद्ध करें, और बुद्धि 18:37 किन साधनों से शुद्ध होती है कि, अमानी, मान की इच्छा से आदमी कुछ का कुछ 18:44 करने लगता है, मान की इच्छा ही छोड़ दो, तो तमाम प्रपंच से आदमी बच जाता है, अदम्भित्व, 18:52 ईर्षा का अभाव, मत्सर का अभाव, ये अगर सद्गुण आने लग जाते हैं तो, आदमी तमाम तमाम 19:00 दोषों से बच जाता है, और तमाम तमाम व्यर्थ के परिश्रम से बच जाता है, तो उसका तन और 19:06 मन जो है, आत्म विश्रांति के काबिल होता है, कई लोग शरीर को तो स्थिर रखते हैं, 19:14 लेकिन मन भागता है, कई लोग मन को स्थिर करने की कोशिश करते, तो प्राणों का ठिकाना 19:19 नहीं, हकीकत में तन मन और प्राण ये तीनों का जब समन्वय होता है तो आत्मी आत्म राज्य 19:27 में प्रवेश करता है, प्राण बल नहीं है तो मन की भावना तो अच्छी 19:34 है, लेकिन रोता रहेगा शरीर तंदुरुस्त है लेकिन मन विकारों 19:39 में भाग रहा है, तो तंदुरुस्ती टिकेगी नहीं, महाराज मन के विचार तो ठीक है लेकिन 19:46 शरीर लथ है तो भी जप तप सेवा पूजा आदि कुछ कर सकेगा नहीं , सत्संग की जगह पर भी 19:52 नहीं आ सकेगा, जरा सा गर्मी होगा कि चलो, व जवा दो बापू तो बदे छ जय श्री कृष्ण।  पटाने 19:57 नमस्कार करो तो शरीर सुदृढ़ हो प्राण शक्ति हो, और मन 20:04 शक्ति हो, उस आदमी के लिए यह लोक और परलोक खिलौने हो जाते 20:10 हैं, उस आदमी के लिए आत्म विद्या घर की विद्या हो जाती 20:15 है, 


तो आज हम इस श्लोक को विचारेंगे  कि, सत 20:20 शिष्य मान और मत्सर से रहित होता है, अपने बराबरी के शिष्यों को 20:29 या अपने से ऊंचो को या अपने से छोटों को देखकर ऊंचो को देखकर कुंठित नहीं होता, 20:36 छोटों को देखकर अहंकारी नहीं होता, बड़ों को देख, बराबरी को देखकर ईर्षित नहीं होता, 20:42 लेकिन सबको गुरु के कृपा पात्र समझकर सबसे आदर का व्यवहार करता है, प्रेम का व्यवहार 20:47 करता है, प्रेम और आदर का व्यवहार करने से आप यूं न सोचे कि मैंने उसको आदर दिया, या 20:54 मैंने उसको प्रेम किया, लेकिन प्रेम और आदर का व्यवहार करने से तुम्हारा सत्व गुण 21:00 बढ़ता है,  तुम्हारी योग्यता बढ़ती है, आपके घर अतिथि आ गया, या आपने जिससे व्यवहार 21:07 किया, उससे नम्रता का व्यवहार किया, तो आप छोटे नहीं हुए, हकीकत में नम्रता का 21:12 व्यवहार करके उसको आपने बड़ा बनाया, तो आपने दूसरे को बड़ा बनाया, दूसरे को बड़प्पन 21:18 का दान किया, तो आप दाता हो गए, जय राम जी की।


 हम लोगों का मन क्या सोचता है कि, हम तो 21:26 बड़े बने, और हमारे इर्दगिर्द वाले हमको मान दे, लेकिन ज्ञानी का स्वभाव होता है सत 21:33 शिष्यों का स्वभाव होता है कि आप अमानी रहते हैं, दूसरों को मान देते हैं, जैसे 21:39 भगवान रामचंद्र जी आप अमानी और गुरु जी को मान देते, लखन भैया को मान देते हैं, गुरु 21:46 के वचनों को मान देते हैं, पिता के वचनों को मान देते हैं, तो आप अमानी दूसरों को 21:51 मान ये सतोगुण बढ़ाता है, तमोगुण का लक्षण 21:57 है- आलस्य, निद्रा, वैर, प्रमाद, दीर्घ 22:03 सूत्रता।  रजोगुनिओ   का लक्षण है प्रवृत्ति, किसी में दोष ना देखना, भोग 22:12 बढ़ाना, यश बढ़ाना, और ऐहिक जगत में सुख खोजना, यह रजोगुणीओं  आदमियों का लक्षण होता है।  22:21 और सात्विक आदमी का लक्षण होता 22:26 है, मैं कौन हू, कहां से आया हूं, आखिर क्या होगा, इस संसार की ये  माया की जाल से मुक्त 22:36 कैसे होऊं, उसमें शांति होती है, सहन शक्ति होती है, 22:41 क्षमा होती है, परोपकार होता है, और मान मत्सर ये वेर जेर से व दूर रहता है।  यह 22:50 सात्विक आदमी का लक्षण है, और सात्विक आदमी ज्ञान में जल्दी प्रविष्ट हो सकता है।  रजो 22:57 तमो गुणिओं  को परिश्रम करना पड़ता है, और सत्व संजायते  ज्ञानम, सत्व गुण होने से ज्ञान जल्दी 23:04 प्रकट होता है, तो गुण तो माया के हैं।  तमोगुण हो, रजोगुण हो, सतोगुण हो लेकिन यह 23:10 सतोगुण जो है वो माया के पार ले जाने में सहायक है, सात्विक व्यक्ति को स्वाभाविक 23:17 सुख, स्वाभाविक शांति मिलती है।  राजसी व्यक्ति को परिश्रम करके भोग भोग कर थोड़ा 23:23 सा सुख लेना पड़ता है।  और तामसी आदमी पाप का पोटला चढ़ाते चढ़ाते जरा सा सुख का 23:29 एहसास करता है, लेकिन अंदर से दुखी को दुखी रहता है, भयभीत रहता 23:35 है,


 एक बार बुद्ध के चरणों में एक युवक आ 23:41 गिरा।  जैसे सुखा बांस गिरे, ऐसे चरणों में आकर प्रणाम किया, अनजान था भिक्षुक ना था, 23:48 शिष्य नहीं था, पहली बार आया और बुद्ध के पास श्री चरणों में लंबा पड़ गया।  बुद्ध ने 23:54 पूछा य क्या कर रहे हो, तुम मेरे को जानते तक नहीं।  बोले महाराज खड़े-खड़े तो बहुतों को 24:03 देखा, खड़े-खड़े देखा लेकिन सिवाय दुख के परेशानी के और 24:09 कुछ नहीं मिला, इसलिए मैं श्री चरणों में लेटकर कुछ देखना चाहता 24:15 हूं, खड़े हैं तो हमारा अहंकार खड़ा है, खड़े हैं तो हमारी मान्यताएं खड़ी है, खड़े 24:22 हैं तो हमारी वासना खड़ी है, वो खड़े-खड़े तो वासना अहंकार और मान्यताओं ने बोझा ही 24:27 दिया, परेशानी दी, इसलिए मैं श्री चरणों में लेट गया, ताकि मेरा ईगो भी जरा विश्रांति 24:35 ले।  बुद्ध ने भिक्षु कों को संकेत करके कहा - कि भिक्षुको  तुम तो मेरे को भगवान मानकर प्रणाम 24:44 करते हो, आदर करते हो, लेकिन ये  मेरे को भगवान नहीं मानते, अनजान व्यक्ति समझकर कोई 24:50 साधु बाबा है, ऐसा समझकर अपने आप को मिटा रहे हैं, ये तुम लोगों से ज्यादा लाभ ले 24:57 रहे हैं।  तुम तो यश को मान को ज्ञान को इधर को उधर को देखकर फिर झुकते हो, और झुकने 25:04 में भी होता है कि हम शिष्य और हमने प्रणाम किया, लेकिन यह तो झुक कर सचमुच में 25:09 झुकता है, और यह सचमुच में झुककर झुकते झुकते वो कोई बाहर की आकृति का अवलंबन 25:17 लेते लेते अंदर निराकार की शांति में जा रहा है।  ये तुम लोगों से बढ़िया शांति ले 25:22 रहा है।  तुम लोगों से बढ़िया प्रसाद में प्रवेश कर रहा है। 

 गीताकार ने कहा -

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते |

 प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || 65||.


 जगत में सब दुख दूर करने की ताकत नहीं, 25:41 संसार में यह क्षमता नहीं, पूरा संसार मिलकर एक आदमी के सब दुख दूर नहीं कर सका, 25:50 है।  पूरा संसार मिलकर एक आदमी को पूरा सुख नहीं दे सका है।  संसार में पूरा सुख देने 25:58 की ताकत नहीं, और पूरा दुख मिटाने की ताकत नहीं, अगर संसार के साधनों से पूरा दुख मिट 26:05 जाता, तो भगवान राम जिसके घर अवतरित हुए हैं, ऐसे दशरथ को दुख नहीं देखना पड़ता, और 26:13 ऐसे कौशल्या मा को दुख नहीं देखना पड़ता, विधवा होने का और ऐसे कई कई को कपट का छल 26:20 आदि का सहारा नहीं लेना पड़ता, राम जी के तो दर्शन कर रही थी।  मंथरा भी कर रही थी।  26:27 बढ़िया से बढ़िया मिली थी मंथरा को।  जहां भगवान राम अवतरित हुए हैं, वहां 26:34 मंथरा की सर्विस हुई है, फिर भी देखो। 


 एक शिष्य ने गुरु से 26:43 पूछा - कि हम लोगों के पास पांच इंद्रियां हैं।  लेकिन गुरु महाराज जब दुख होता है तो 26:50 आंख ही क्यों रोती है, कान नहीं रोते, नाक नहीं रोता, मुंह नहीं 26:55 रोता, आंख ही क्यों रोती है।  गुरु भी कोई जोगी थे ज्ञानी थे, गुरु ने कहा बेटा आंख 27:03 का मन के साथ सीधा संबंध है।  इसलिए मन को थोड़ा सा भी दुख होता है 27:08 तो आंख गीली हो जाती है।  तो आंख का मन के साथ सीधा संबंध है।  तो 27:15 आंख को ऐसा दृश्य नहीं दिखाएं, रामायण भले देखें, लेकिन रामायण के आगे और पीछे 27:21 क्या-क्या आता है,...  जय जय, और उससे मन चंचल तो नहीं हो जाता ? जो लोग गहरी मोड़ी रात 27:30 को रात की, देर तक वो चलचित्र देख देख के 27:35 सो जाते हैं, उनका मन तमस और रजस में आ जाएगा, सात्विकता चली 27:43 जाएगी, चलचित्र देखते देखते, रात्रि को।  के चलो दुकान से आए नौकरी से, टीवी चल रही, 27:48 देखते देखते देखते सो गए, तो महाराज सुबह भी ऐसे ही विचार आएंगे, टेंशन बढ़ जाएगा, 27:55 चिंताएं बढ़ जाएगी, और आकर्षण बढ़ जाएगा, भीतर के गीत से आदमी दूर चला जाएगा, और 28:00 बाहर के गीतों की गुलामी का उसके हाथ में जंजीर पड़ जाएगी, इसलिए क्या करना चाहिए? 28:07 कैसे करना चाहिए ? कितना करना चाहिए?  वो सब विवेक से सोचकर आदमी चले तो आत्म शांति 28:16 पाने के लिए काफी समय है।


 लेकिन हम अजायी वस्तुओं में ,  अजाय आकर्षणों में, अपने अंदर 28:23 की शक्तियों को बिखेर देते हैं, तो अजायी वस्तु, अजाय अक्षर आकर्षणों से बचने के लिए 28:29 आज का श्लोक हमें कहता है कि, मत्सर रहित और अपने कार्य में दक्ष 28:36 रहे।  अपने कार्य में दक्ष रहे, जैसे व्यापारी अथवा वकील, साहब से बातचीत करता 28:44 है, हंसता है, लेकिन वकील का लक्ष्य क्या है कि, असल पर इनकम टैक्स ज्यादा ना पड़ 28:51 जाए।  जय जय । अथवा तो कोर्ट में लड़ता है, तो कुछ भी बयान  28:58 करता है, तो असल की फेवर की पॉइंट उसके मगज में घूमती है।  ऐसे ही अपने मन में आत्म 29:06 ज्ञान पाने की रुचि होनी चाहिए, तो हम लोग व्यवहार में दक्ष रहेंगे।  व्यवहार में अगर 29:14 दक्षता नहीं है, तो आपकी सज्जनता भी आपको लंबा समय आपकी सहाय नहीं कर सकेगी, दक्षता 29:20 नहीं है तो सज्जनता, सज्जनता के बहाने आप किस व्यवहार में, किस वातावरण में, किस 29:27 फील्ड में, बह जाए आपको पता नहीं चलेगा।  इसलिए आपके जीवन में 29:32 दक्षता भी होनी चाहिए।  मत्सर रहित हो, ईर्ष रहित 29:38 हो, मान की इच्छा से रहित हो, साथ साथ में दक्ष 29:46 हो।  


जैसे - मछली जाल में फंसती  तो छटपटाती है, 29:52 ऐसे प्रशंसकों के बीच साधक आता है तो उसका मन छटपटाता है। 29:58 जैसे लुटेरों  के बीच खानदान आदमी छटकने की कोशिश करता है।  ऐसे ही प्रशंसकों के बीच से 30:05 साधक छटकने की कोशिश करता है।  तो यह समझ लो कि उसमें दक्षता है।  नहीं तो, प्रससंको के बीच 30:13 रहते रहते मान की बातें सुनने की आदत पड़ जाएगी, और जो मान का प्यासा होगा मान की 30:22 इच्छा रखेगा, वाहवाही का जिसको लत लग गई,  वो अपमान नहीं सह 30:29 सकेगा, और जो मान का गुलाम है, उसको लोग पुचकार के खाम खा की मजूरी उसके सिर पर डाल 30:37 देंगे, जय राम जी।  शास्त्रों ने तो यूं कहा - 


मान पुड़ी है  जहर की खाए सो मर जाए

 चाह उसी की राख वो भी अति दुख पाए


 मान की चाह से आप कहीं गए 30:51 और आपको मान नहीं मिला, आप शादी में गए कपड़े लाते गहने गांठे पहर के गए शादी में,  फलाने 30:58 के दोस्त, गए और उधर आपका किसी ने भाव नहीं पूछा, खाली प्लेट आद आइसक्रीम खिला दिया, तो 31:04 आइसक्रीम का स्वाद फीका हो जाएगा।  क्योंकि मान के लिए गए थे और वहां किसी ने पूछा नहीं, अरे यार गए तो सही खर्चा तो बहुत गया, 31:11 लेकिन हमारे को तो देखा भी नहीं यार।  खाम खा के अशांति लेकर चले आएंगे, और 31:17 मान की इच्छा नहीं है तो थोड़ा सा भी किसी ने मान दे दिया तो काफी है, और नहीं भी दिया तभी भी आपकी मौज, आपके पास रहेगी, तो 31:25 हम मान की इच्छा से कोई भी कर्म करते हैं, मान की इच्छा से कोई भी फंक्शन में जाते, 31:30 अथवा मान की इच्छा से कोई भी व्यवहार करते हैं, और मान नहीं मिलता तो दुख होता है, और मान की इच्छा ही नहीं है तो मान मिल गया 31:37 तो क्या है? और नहीं मिला तो क्या ? आप स्वतंत्र हो गए।  तो मान की इच्छा आपको पराधीन बनाती 31:43 है।  जय राम जी की।  यह कहना बड़ा आसान है और कह तो मैं भी देता हूं, लेकिन मान की इच्छा 31:50 मिटाई उनको मेरा प्रणाम जय।  





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सोमवार, 25 अगस्त 2025

मंगलवारी (अंगारकी ) चतुर्थी महिमा | Importance of Mangalwari (Angarika) Chaturthi |

   

मंगलवारी (अंगारकी ) चतुर्थी महिमा | Importance of Mangalwari (Angarika) Chaturthi |

   सत्संग -  

     जैसे सूर्य ग्रहण को दस लाख गुना फल होता है वैसे ही मंगलवारी चतुर्थी को होता है | बहुत मुश्किल से ऐसा योग आता है | इसको अंगारक चतुर्थी भी कहते हैं | मत्स्य पुराण , नारद पुराण  आदि शास्त्र में इसकी भरी महिमा है | इस दिन छुट्टी ले लो तो और अच्छा है| गौ झरण से छोटा सा कमरा साफ़ करके गौ चंदन अगरबत्ती जलाकर इस दिन जप , मौन और ध्यान में रहो | आप संसारी मजदूरी करके जो जो नहीं पा रहे हैं वह सब आपके लिए आसान हो जायेगा भगवद प्राप्ति आसान  होजाएगी| इस दिन अगर कोई जप , दान , ध्यान , संयम करता है तो वह दस लाख गुना प्रभावशाली होता है , ऐसा वेद व्यासजी ने कहा है |वेद व्यासजी का वचन सारगर्भित माना जाता है |

        सूर्यग्रहण में किया हुआ जप तप दस लाख गुना माना जाता है | सोमवती अमावस्या , रविवार की सप्तमी , मंगलवार की चतुर्थी ……. और मंगलवार की चतुर्थी जब आती है इसकी एक विशेषता होती है , अंगारक चतुर्थी है यह | यह अंगारक चतुर्थी कभी कभार आती है|

         तो मंगल की चतुर्थी में मैं तो चाहूँगा आप सारे काम धंधे से फारक होकर (छुट्टी लेकर) मंगल की चतुर्थी को अपना एक कमरा (फिनाइल की अपेक्षा) गौ झरण से साफ सुथरा करके,  यह न हो तो गंगा जल का प्रयोग करें| और गाय के गोबर से या गौ-चन्दन अगरबत्ती से कमरे को सात्विक बना दीजिये और जप करें| कुटुंब के लोग करें या एक आदमी करे| जप ध्यान करोगे तो वह जप, ध्यान , मौन शास्त्र-अध्ययन …. आरोग्य का जप करोगे तो आरोग्य जप सिद्धि हो जाएगी| एका-एक कोई मुसीबत को वापस भेजने वाला मन्त्र का जप करोगे तो एका-एक आई मुसीबत वापस भी भेज सकते हैं या जिसने भेजी है उसको सौगात भी भेज सकते हैं, जय राम जी की|

        रोना नहीं आए तो झूठ मूठ  का रोना कि  — प्रभु तुम्हारी प्रीती दे दो, दंभ से बचाओ, इर्ष्या से बचाओ, अभिमान से बचाओ, असत्य से बचाओ, जीभ की लोलुपता से बचाओ, व्यर्थ की बकवास से बचाओ, व्यर्थ के झाँका-झाँकी  से बचाओ, व्यर्थ की हस्त चांचल्य (नाक खोदना , तिनका तोड़ना आदि, यह नीच मन की पहचान है ) से बचाओ , बिन जरुरी बोलते रहेंगे -नहीं इस व्यर्थ की शक्तियों को सार्थक में लगाने का संकल्प करके मंगलवार के चतुर्थी के दिन को महा मंगलमय बना लेना|


गणेश चौथ का चाँद दिख जाये तो कलंक से बचने का सबसे अच्छा और सरल उपाय |

 


गणेश चौथ का चाँद दिख जाये तो कलंक से बचने का सबसे अच्छा और सरल उपाय |

  0:05 भादरवा सुद चौथ को हे चंद्रदेव तुमको 0:09 कोई भी देखेगा तो उसको कलंक लगेगा तो उसका 0:12 मैंने तोड़ निकाला है। 

 शास्त्र में से दो 0:15 प्रकार का तोड़  है 0:20  कार्तिक स्वामी और गणपति दो भाई थे शिव 0:27 पार्वती के बेटे 0:29 कार्तिकेय ने कहा बड़ा भाई हूं मैं बोले 0:32 बड़े भाई तो हूं लेकिन जिसका बड़ा विवेक हो 0:34 वो बड़ा भोले विवेक विवेक क्या तो क्या 0:36 मेरा कम है जरा जैसे भैया भैया में लग 0:39 जाता है तो दोनों भाई आए शिव पार्वती के 0:42 पास के मां बाप आप ही तय करो कि हम दोनों 0:45 में कौन बड़ा।  शिव पार्वती ने कहा जो 0:48 पृथ्वी के तीर्थों की यात्रा करके जल्दी 0:51 यहां पहुंचेगा वह बड़ा माना जाएगा।  तो 0:53 कार्तिक जी तो निकल पड़े और गणपति जरा 0:58 शांत स्वभाव के धीरा सो गंभीरा और ऐसे 1:02 उनका मॉडल भी ऐसा है कि शांति से ही सब 1:05 काम हो इतना बड़ा पेट और नन्हा सा उनकी 1:09 व्हीकल 1:11 तो तो शांत स्वभाव था उनका 1:14 तो बोले सर्व तीर्थमयी माता 1:18 सर्वदेवमय पिता तो शिव पार्वती की उंगली 1:22 पकड़ के थल्ले पर बिठाया, और गणपति जी उनको 1:26 तिलक करके पूजन करके प्रदक्षिणा करने लगे, 1:29 और प्रणाम किया। पार्वती जी यूं देखती है। 1:33 शिव जी यूं देखते हैं क्या कर रहा है? 1:35 नन्हा मुन्ना और कुछ करें तो जरा आश्चर्य 1:38 भी होता है कि क्या कर रहा है। फिर दूसरा 1:40 चक्कर मारे और प्रणाम करें। तो गुदगुदी 1:44 होने लगी। बेटा क्या है? बोले अभी बताता 1:46 हूं। तीसरा चक्कर, चौथा चक्कर, सात चक्कर 1:51 मार डाले गणपति जी ने। ये क्या कर रहे हो? 1:54 गजानन गणू क्या कर रहे हो? 1:57 बोले बड़े भैया तो 2:00 पृथ्वी के तीर्थों की यात्रा करने गया और 2:03 मैं तो पृथ्वी की सात बार यात्रा पूरी कर 2:07 चुका हूं। सर्व तीर्थमई माता और सर्वदेवमय 2:12 पिता शिव पार्वती ने गले लगाया बेटा उम्र 2:16 में तो वो बड़ा है लेकिन विवेक शक्ति में 2:19 तू बड़ा है। संयम शक्ति में तू बड़ा है। 2:23 शास्त्र ज्ञान में तू बड़ा है। क्या 2:25 करणीय? क्या अकरणीय? बाहर का तीर्थ तो 2:29 तामसी लोग घूमते हैं। सात्विक लोग तो आत्म 2:32 तीर्थ में आते हैं। इसलिए गजानन हमारी 2:35 पूजा के पहले ही तेरी पूजा होगी। लल्ला 2:38 बेटा 2:40 


अभी कोई भी काम करो गणा गवाहा निधि गवा 2:45 महेश गं गणपतये नमः 2:50 ऐसे ही ब्राह्मण को बोलना पड़ेगा। चाहे 2:53 वास्तु पूजन हो 2:55 चाहे शिलान्यास हो चाहे राज तिलक करते हो 3:00 मंगवा निधि गंगा 3:03 गणेश्वराय 3:07 लेकिन ये गणपति जी का वचन सिद्धि कैसी है 3:10 रे सेड गोल मटोल जरा लड्डू प्रिय शरीर 3:16 तो चंद्रदेव ने हंसी कर दी कि चंद्र तुझे 3:20 अपनी शोभा पर गर्व है, तू मेरी मस्करी करता 3:24 है जा तुझे जो देखेगा तू मुझे कलंकित करता 3:27 है, तुझे जो देखेगा उस पर कलंक लगेगा।  तो 3:30 लोग चंद्र देव पर थू थू करने लगे कि इसको 3:32 देखेंगे कलंक लगेगा, चंद्रदेव घबराए ना 3:36 रगड़ा हाथ जोड़ी की तो गणपति जी ने कहा 3:39 अच्छा तो वर्ष भर तो तुम्हें 364 दिन तो 3:44 माफ कर देता हूं लेकिन आज का दिन तो लोगों 3:47 को पता लगे कि अपना रूप लावणी या गुण 3:50 देखकर अभिमान मान करना और दूसरे में 3:54 दोषारोपण करके उसकी खिल्ली उड़ाना कितना 3:57 खतरनाक होता है। यह लोगों को भी पाठ 4:00 मिलेगा और तुझे भी याद रहेगा बच्चों।


 तो 4:03 भादरवा सुद चौथ के दिन तुमने यह 4:05 छेड़खानी की थी। तो भादरवा सुद चौथ को 4:09 हे चंद्रदेव तुमको कोई भी देखेगा तो उसको 4:12 कलंक लगेगा। भगवान कृष्ण ने एक बार देख 4:15 लिया भाद्रवा शूद चौथ का चांद तो उनको 4:18 भी स्यमन्तक  मणि चुराने का कलंक लगा तो आप 4:22 भादरवा चौथ का चंद्रमा नहीं देखिएगा।  4:26 लेकिन नहीं देखिएगा तो आज चौथे चंद्रमा ना 4:29 दिखे ना दिखे ना दिखे करके भी कई लोग देख 4:32 लेते हैं।  4:34 आप इधर नहीं देखना 4:36 तो बलात दिख जाता है।  आज नहीं देखना है 4:40 नहीं देखना है, अभी दिखता तो नहीं ऐसे ऐसे 4:43 करके भी लोग देख लेते हैं। तो उसका मैंने 4:46 तोड़ निकाला है। शास्त्र में से दो प्रकार 4:48 का तोड़ है। अगर चंद्र दिख जाए तो शास्त्र 4:53 का एक श्लोक है।

सिहः प्रसेनमवधीत सिंहो जाम्बवता हतः ।

 सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः ॥


 (सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत ।)


  ब्रह्म वैवर्त पुराण में इस मंत्र से पानी 5:13 अभिमंत्रित करके 5:18 पी ले, छिटक दे, तो उसका प्रभाव कुप्रभाव कम 5:22 होता है। उससे भी सरल उपाय और है। आप 5:26 भादरा शुद्ध तीज का चांद देख लो जानबूझ 5:30 के। अगर चौथ का दिख जाए तो पांचम का भी 5:33 देख लो। तो कंटिन्यूटी के प्रभाव में चौथ 5:36 का प्रभाव कम हो जाएगा।


रविवार, 24 अगस्त 2025

ज्ञानज्योति प्रगटाओ| Gyanjyoti Pragtao| Part-1|

 




ज्ञानज्योति प्रगटाओ|  Gyanjyoti Pragtao|  Part-1| 


सत्संग के मुख्य अंश:

  • ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के अद्भुत लक्षण...

  • सत्शिष्य वही है जो मान-बड़ाई से दूर रहे... ऐसा क्यों जरूरी है शिष्य के लिए? 

  • नाशवान चीजों का अहंकार हमें अविनाशी परमात्मा से दूर करता है और यही अहंकार गुरु के द्वार पर मिटता है और उस परमात्मा को पाना सहज होता है .. विस्तृत वर्णन !

  • शिष्य कब शिष्य है और कब वह शिष्य होते हुए भी शिष्य नहीं? ... जानिये सत्शिष्य के लक्षण !

  • भगवान के दर्शन बाद भी आत्मशांति नही तो अभी पाना बाकी रहा !

  • जो मान देकर कुछ लेना चाहे वह ठग है और जो मान या अपमान देकर कुछ देना चाहे वो ब्रह्मवेत्ता हैं !

  • आध्यात्मिक धन पाने की ये युक्तियाँ आप भी सीख लें !

  • ब्रह्मवेत्ता के शिष्य को ये दो मंत्र याद रखने ही चाहिए !

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सत्संग-

        0:00 उपनिषदों का सिद्धांत के गुरु की कृपा के बिना ज्ञान नहीं हो सकता है, 0:05 और गुरु की कृपा होती है वृत्ति निर्मल करने से, 0:10 वृत्ति निर्मल नहीं होगी तब तक गुरु की सेवा भी नहीं कर सकते हैं, 0:16 और गुरु के सिद्धांतों में अपने वृत्ति को लगा भी नहीं सकतेहैं,  0:23 तो  श्रीमत भागवत का श्लोक वृत्ति निर्मलता का संकेत करता है, 0:31 जैसे खेत भी हो बीज भी हो 0:38 और पानी भी हो लेकिन कुशल खेड़ू नहीं है, तो बीज का फल पूरा नहीं मिलता, ऐसे ही जीव भी है ब्रह्म भी है लेकिन जीव ब्रह्म की एकता कराने वाले 0:56 सद्गुरु की कृपा अगर हम ठीक नहीं पचापाते, तो जीवन भर मनमाने साधन करने से , मनमाने  1:16  आविष्कार करने से भी कोई खास लाभ नहीं होता है । मनमाने अविष्कार तो लाखों लोग  कर रहे हैं,  कई आविष्कार हुए कभी जगत का क्या हुआ? 1:24 जितने विज्ञानी बने उतने अगर ब्रह्मवेत्ता होते तो आज दुनिया कहां हो जाती 1:29 जितने वैज्ञानिक बने हैं, मनमाना आविष्कार किए हैं, जगत के चीजों के, उतने अगर ब्रह्मवेत्ता  1:35 होते। तो ऐसे ही सहज में सुख और शांति मिल जाता खुद ही,


 ऐसा ही ब्रह्मवेत्ता की लक्षण  होते हैं, सुहृदता समता लेकिन मुख्य लक्षणों उन महापुरुषों का होता है शांति, सच्चे शिष्य हृदय में शांति, 2:02 उनके दर्शन से उनके सानिध्य मात्र से उनको शिष्यों को साधकों को शांति का अहसास होने लगता है। ये ब्राह्मवेत्ताओं के लक्षण है।   2:17 जैसे दिया बड़बानल में मिल कर एक हो जाता है, बूंद  सागर में मिलकर एक हो जाती है, घटाकाश महाकाश  में मिलकर एक हो जाती है। 2:31 अथवा घी की पुतली घी है, शक्कर के गुड़िया शक्कर ही हैं, ऐसे   2:38 ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है,  जिसको ब्रह्म का साक्षात्कार होता है उसका 2:43 तन भी चिन्मयबपु कहा जाता है। उसको उसके  चरण उसके चरण रज भी हम लोगों के 2:50 कल्याण करने लगता जाता है। जब ब्रह्म वेत्ताओं की चरण रज  2:55 कल्याण करती है , मनोकामना पूरी करती है,  तो ब्रह्मवेत्ता जिसका स्वयं कल्याण करना चाहे 3:04 उसको तो फिर संदेह क्या है । 3:10 ब्रह्म वेत्ताओं के चरण रज से अगर मनोकामनाएं पूरी होती है , श्रद्धालु की , तो ब्रह्म वेत्ता स्वयं  जो चीज देना चाहते हैं वो चीज कितनी महान होगी ? तो उपनिषद कहती है की ब्राह्मवेत्ताओं के कृपा  के बिना ब्रह्म साक्षात्कार नहीं होता , और जब तक ब्रह्म परमात्मा का  साक्षात्कार नहीं होता तब तक ये जीव कितना भी कुछ कर लेता है, लेकिन मृत्यु का झटका लगते ही  अनाथ हो जाता है। 3:36 कई कर्तव्य निभाले लेकिन उसका कर्तृत्व 3:44 ब्रह्म में लीन नहीं होता है। फिर  भागवत कार ने आगे के श्लोक में बताया, 3:53 गुरु के लक्षण तो ये लगभग,  पूरा वर्णन तो शास्त्र भी नहीं कर सकते संकेत मात्र कर सकते हैं। ऐसा है एकनाथी भागवत में,  4:01


 शिष्य के लक्षण बताएं हैं, जो  शांत हो, तितिक्षावान हो, जैसे चूहा बिल्ली से भागता है । ऐसे ही शिष्य मान बढ़ाई से दूर रहे, मान बढ़ाई से देहाध्यास बनता है और देहाध्यास अहंकार को जन्म देकर आत्मा से विमुख कर देता है। शिष्य सतशिष्य वही है जो मान बढ़ाई से दूर रहे। जिसको मान की पुड़िया  जहर जैसी लगे, 4:52 


मानपुडी है जहर की खाए सो मर जाए, 

चाह उसकी रखता वह भी अति दुख पाए  

5:01 जो मान की इच्छा रखता है , वो भी संसार में दुख उठाता है। 5:07 क्योंकि मान मिलेगा तो किसी शरीर को नाम को मिलेगा, तो शरीर नाम के साथ जुड़ा रहेगा  तो  5:15 अति दुख पाएगा। गर्भों  का दुख है, अपमान का दुख है। जिस को मान की इच्छा है वो थोड़ा सा अपमान भी तो नहीं सह सकेगा। 

तो शिष्य 5:32 आध्यात्मिक मार्ग का श्रेष्ठ पथिक  है। मान  से दूर भागता है, 5:41 अहंकार बढ़े ऐसे वातावरण से वो दूर भागत है। लेकिन अहंकार विसर्जित हो ऐसे गुरुओं के द्वार पर उसकी स्वाभाविक रुचि होने लगती है। तो  आधी अविद्या ऐसे गुरु के सानिध्य से और गुरुओं के द्वार आने जाने से दूर हो जाती है। क्योंकि  वहां छोटे से छोटे व्यक्तियों और बड़े से बड़े व्यक्तियों के साथ होते हैं । तो 6:10 छोटे बड़े का भेद मिटने की जगह हो जाति है।

 6:17 तो जो मान्यता होती अहंकार बनता है धन से सत्ता से बुद्धिमता से सौंदर्य से , तो ये नाशवान चीज है, तो उस नाशवान  चीजों से अहंकार रिकवर होता है। तो चीजें तो नाशवान होती है। लेकिन अहंकार जो  रिकवर होता है, वो हमें अविनाशी परमात्मा से दूर कर देता है|  और अहंकार इन नाशवान चीजों का है| नाशवान चीजों की अहंकार  छोड़ने से अविनाशी का मुलाकात हो  जाती है। 

 तो शिष्य के लक्षण है जो शांति प्रिय हो,  जो सत्य प्रिय हो, सत्य बोलने में जिसकी रूचि हो, शांति में जिसकी रूचि हो, तितिक्षा जो सहन करता हो, और मान बढ़ाई  से दूर भागता हो, संसार के भोगों से जिसका मन  समझ गया हो की ( कुछ नहीं) वो है शिष्य l  मंत्रदीक्षा ले ली ये तो शिष्य होगया ठीक है लेकिन शिष्य तब है जब गुरुके सिद्धांत से संग्लन हो, जितने  7:32  जितने अंश में हम लोग गुरुओं के सिद्धांत से जुड़े हैं उतना ही हमारा शिष्यत्व है। गुरु के द्वार पे आकर फेर दूसरों का उपयोग कर लेवे, तो वो गुरु द्रोही हुआ।   तो शिष्य जो है वो कीर्ति से भोगोंसे, कपट से दूर भागता है , जो भोग से कपट से दूर भागे वो है शिष्य| और जो गुरु के कृपा के चादर ओढ़ के भोग कपट चोरी, दारी, हिंसा ये आदि सब करने लग जाये , वो तो असुर है , जैसे असुर लोग देवताओं के झुण्ड में घुस के अपना काम कर लेते हैं,तो एकनाथ महाराज ने शिष्य का लक्षण  वर्णन किया और

 ब्रह्मवेत्ता  8:31 महापुरुषों के स्वभाव का वर्णन किया, ब्रह्मवेत्ता के लक्षण नहीं।  ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के स्वभाव 8:40 तो शांति, उनके सानिध्य में शांति हमें शांति मिलने लग जाए ये उनकी मुख्य पहचान है । प्रारब्ध बेग से ब्रह्मवेत्ताओं  के लक्षण तो अलग अलग होता है, कोई राज्य करता है,  8:49   कोई समाधि करते कोई उपदेश देते कोई पागलों का 8:57 रूप बनाकर बैठे होते हैं, ब्रह्मवेत्ता, घाट वाला का जीवन अपने ढंग का है,  मस्तराम का अपने ढंग का, 9:04 गुरुदेव का हमारे गुरुदेव का अपने ढंग का  था, उधर है भावनगर के जो मस्तराम बैठे हैं 9:11 उनका अपने ढंग का, 9:17 नहाना धोना कुछ नहीं, वहीँ लेट्रिन वहीं बाथ  रूम, उन्ही कपड़ों में, लेकिन उन  के लक्षण वाह्य  लक्षण तो नहीं, मुख्य लक्षण है की उन के निकट बैठने से शांति आती है। वो ब्रह्मवेत्ता हैं। और ये बहुत ऊँची चीज है। 

 आत्मिक शांति ये बहुत ऊँची चीज है।  भगवन के दर्शन से भी ऊँची चीज है।  9:40 अर्जुन को भगवान के दर्शन और अंदर शांति 9:46 नहीं थी तो भगवान को मेहनत करना पड़ा, 9:51 भगवान के दर्शन हो जाए,  लेकिन आत्मा शांति नहीं पाया, तो फिर भगवान 9:59 को कष्ट देना पड़ेगा, फिर भगवन आये उपदेश दें , उसके मनन कर के और तब शांति पाओ तब भगवान  हम परम तृप्त होते है,  खुश होतीं और साधक भी खुश होते हैं।  भगवन आकर उपदेश दें अथवा गुरुओं का सान्निध्य लेकर उपदेश लेकर उनके कृपा लेकर, शांति लाभ करना चाहिए। ह्रदय की शांति, सबकुछ करते तो ह्रदय के सुख के लिए तो करते हैं, और क्या है? सुख अपने आप मिलने लगता है।

 जो भी दुनिआं के दौड़ धुप करते है वो सुख के लिए करते हैं।  आंतरिक सुख के लिए, …तो हृदय शांत  होने लगता है, तो जिसे शांति प्रिय है , अमानित्व अदंभित्व आर्यव  10:52  क्षमा शौच ये  शिष्य के लक्षण है,  ह्रदय में क्षमा स्वभाव शौच माने शुद्धि, वाह्य और अभ्यन्तर शुद्धि, निरभिमानता निरहंकारिता ये शिष्य के सद्गुण है| ये बढ़ते जायेंगे तो गुरु की कृपा पचती जाएगी। 

 जैसे भूमि हो न जमीन है। पिहत के हो जड़ा न हो ऐसा जमीं की सुयोग्यता होती है तो वहां ईसबगोल ज्यादा होता है। वातावरण अनुकूल हो तो । और गुजरात साइड में इसबगोल होगा।  रतलाम में इसबगोल करो तो फेल जाता है,  उधर नहीं बन सकता, वहां के धूप इधर नहीं है, रतलाम में अफीम बहुत अच्छा होता है खस खस बहुत बढ़िया होता है।  वो इलाके में रतलाम के इलाके में , तो ऐसे ही जैसे बीज बोने के लिए भूमि और हवामान और वातावरण काम करता है|

 ऐसे ही ब्रह्म साक्षात्कार के लिए भी वातावरण   12:08 संस्कार इस पर भी आधारित होता है, 12:16 साधक  जितना कुशल होगा उतना वहां ब्रह्म विद्या फलेगी फूलेगी | सत्शिष्य ने मान यश वावाहि कष्ट रूप लगती है,  उसे बहार आवे, ऐसा शिष्य की अवस्था हो जाती है, आदर  बुद्धि सन्मान मले यहाँ आप चारु छन ते आत्मबुद्धि हैदेइछे देहात्मा बुद्धि तहे तो आत्मिक सुख बहुत दूर हेवनु छे gj   सम्मान में आत्मबुद्धि होने से देहात्मबुद्धि हो जाती है।  देह आत्मबुद्धि होने से जीवत्व मजबूत होने लगता है, शिवत्व गलने के बजाय शिवत्व से दूर हो जाता है।  

इस लिए धरम से शुरुआत होती है  देवी देवता , आप ही बनाओ सुपारी, आप ही बनाओ गुड़ के गणपति और प्रणाम करो, क्यों?... की देह आत्मबुद्धि कम हो । 13:24 देह आत्मबुद्धि।  मान  में सत बुद्धि सुख बुद्धि रखने   से, 13:31 मान  में नाम में सुख बुद्धि रखने  से देहात्म  वृत्ति  मजबूत होती है, 13:39 मान और सुख मान में 13:44 मिथ्या बुद्धि करने से देह आत्म अध्यास घटता है सहजता होता है और सहजता का जो स्वतंत्र सुख है।

 मान का सुख परतंत्र है।  कोई मान देगा तब सुख और मान दे के ये …. ये करते हैं आजकल। ये  नहीं की मान दे के भगवन के तरफ ले जाएं, ऐसा कहां होता है।  मान दे कर पांच पचीस हजार पड़ा हुआ है, लाख रूपया पड़ा हुआ के, तो आओ भाई सेठ, अथिति विशेष, साहेब  आओ भाई आम करो, करॉय करवाइदेचहे,  तो हकीकत में जो मान देते हैं, वो अंदर से आत्मज्ञानी है की नहीं वो हमको देखना पड़ेगा। वो हम को यमराज के पास से छुड़ाने में समर्थ हैं कि नहीं,14:20 यमराज के पास से जो छुड़ाने में समर्थ है, वो  मान तब देंगे जब हम ईश्वर के तरफ 14:45 बढ़ेंगे, देहध्यास  छोड़ने की तरफ बढ़ेंगे, अथवा  कोई ना कोई हमारे में आध्यात्मिक गुण  14:53 होगा उसको मान देकर विकसित करेंगे, ऐसा नहीं की मान दे के  तुम्हारा कुछ लेना चाहते हैं, नहीं नहीं, 14:59 जो मान देकर तुम्हारा कुछ लेना चाहे वो तो ठग  है, तो वो तो ठग है, मान देकर कुछ लेना चाहते हैं वो  15:07 तो ठग हैं,   लेकिन मान दे कर अथवा डाँट  के 15:13 विनोद प्यार कैसे भी करके तुमको कुछ देना चाहते वो  ब्रह्मावेत्ता होते   हैं , जो  वो तुमको देना चाहे , और  ऐसा दें फिर कहीं लेना न पड़े ऐसा जो देना चाहे वो ब्रह्म वेत्ता हैं, और मान आदि दे के या कुछ  और डाट धमकी देके तुमसे कुछ  चाहते हैं वो तो  ठग हैं।  तो श्रीकृष्ण किसी को डांट  धमकी देते हैं।   राज ले लिया तो ठग हुए की नहीं राज क्या ले लिया अहंकार ले लिया, उनके कर्म ले लिया 15:46 राजसूय  किया नहीं जिसके कहने मात्र से 15:53 राजाओं ने राज छोड़ दिया उन्होंने राज किया नहीं,

जैसे मछली जाल  में फंसा कर छटपटाती है 16:01 ऐसे ही साधक  मान से छटपटाता है , दूर भागता है।  मान में यश में सुख बुद्धि होने से अंदर से  आदमी पराधीन हो जाता है।   16:14 इसलिए उसमें सुख बुद्धि नहीं करना चाहिए।  जीसे अंतःकरण शुद्ध होता है और  आत्मज्ञान की प्यास बढ़ती है।  रामतीर्थ   रात रातको उठ उठ के रोते  थे की बाइस साल होगया, आज के दिन भी ऐसे ही गया , फिर कब मिलोगे?  भगवान हृदय में हो और कब मिलोगे?  ऐसे छटपटाहट  है न जिव को शुद्ध बना देती है। 

 इनकम टैक्स  वाले आते जाते हैं तो धनवान अपना धन को सेट कर देता है।  इनकम टैक्स की दौरे की  होते ही अपने धन को अपने कागजात को सेट कर देता है।  ऐसे  ही मान यश आने की संभावना होती  उससे पहले वो सद्गुण का धनवान जो साधक है वो अपने से कार्य को गुणों को  छुपा के दूसरों को आगे कर देता है।   17:06 ये ये नश्वर धन  छुपाने के लिए कितनी आइडिया कितनी लगाने पड़ती है, तो वह तो आध्यात्मिकता 17:11 पुण्य का धन है। 

  अपमान होने से पाप खत्म होते हैं और मान 17:16 मान होने से पुण्य खर्च जाते हैं,  यश मान  होने से  पुण्य खर्चता है , अपमान होने से पाप खर्च जाते हैं, आप  कुदरती यश मान होता हो 17:22 वो अलग बात है।  अपने को थोड़ा,  लेकिन अंदर से 17:31 यश मान की इच्छा करें तो अपना पुण्य खर्च होता है।  पुण्यों का फल है न मान यश प्रतिष्ठा ऐसे ही रघुकुल के राजा को बोलै के वहां बिस्तर लगाओ जाके, भाभी के द्वार,  शाम को ।  छे बजे विस्तरा लगा के शो जाओ, वशिष्ठ ने बताया,  रघु कुल का सम्राट और बिधवा भविके द्वार पर महल के द्वार पर बिस्तरा लगा कर सो जाना, छे बजे, लोगो ने तो कुछ का कुछ कहा, अफ़्वहा हो गए लेकिन उन के कोढ़ उतरता गया उतरता गया, सातवे दिन का का जरा सा  फोड़ी रही , गुरु महाराज जरा सा फोड़ी रही वोले  मेरे से हिस्से का है मैं निंदा करूँ तो उतरजाएगी लेकिन तुम्हारे जैसे सज्जन आदमी की नंदा कर के में क्यों पाप का भागी बनूँ।   18:29 ये  तुम्हारे अफवाह  और निंदा हुए उन्होंने तुम्हारा पाप धो डाला, ये बताया था न कथा रघुकुल का कथा,

 मान पूड़ी है जहर की मान की जगह से दूर भागना चाहिए साधक को,  मूढ़ जो है संसारी पामर मन होता है  18:51  वो मान मान की जगह पे  भागेगा।  18:57 और साधक मान की जगह से दूर भागेगा, और ज्ञानी मान अपमान दोनों को पार  करता जायेगा, 19:04 मृत्यु कितने बड़ा खतरनाक अपना अपमान है, यम आके प्राण निकाले, समसान में ले जाए लक्कड़ ऊपर दाल देवे ये कितना अपमान है, यमनु प्राण काढ़े समसान में ले जाए लकड़ा ऊपर हल गावे ये  अपमान ाजआर मान मिळवावे मान मुटु तो माथे छे  जो छे न मन भागीजै मान लिए दे लोगोने  ये न घोरापमान ठेवे नु छे  अपमान थवाणु तो ममन माँ प्रीति अंदर थी होए न अपमान न दुःख नहीं पचवै सके छे इसलिए राजा महाराजा न सु करता  20:02 गुरु  बोलते  जा बेटा भिक्षा कर आ , हेउ नथी के गुरु मान  

नहीं नहीं  20:15 शिष्य को ऐसा मान मिले की ब्रह्म देव अपनी गद्दी  से उतर के उसे वेल कॉम करे, शिष्य अपना देहध्यास छोड़ता है तो उसके देह लीन हो जाएगा फिर , ऊपर  लोको में जाता है तो इंद्र उसके पूजन करते  हैं, 20:30 ऐसा बनाना चाहते हैं, इसलिए  लौकिक मान की शुक्र की पूजन किया न इंद्र ने, और गुरु ने क्या किया झाड़ू लगवाया, ब्रह्मवेत्ताओं  के शिष्य जो ब्रह्म वेत्ता मूल महापुरुष होते हैं 20:55 उनके वहां कोई शिष्य हो गया फिर वह किसी का गुलाम नहीं होता,  ज्ञानी का शिष्य कहीं  भी गुलाम नहीं हो 21:02 सकता, 

अरे लड़कियां आती  होगी शेर जैसी  हैं,  रास्ते में कई मिलिट्री कई हो इस की ताकत नहीं, सिंघण उठी जाए ऐसा होता है ब्रह्मवेत्ता का शिष्य ऐसा होता की  वो ब्रह्म के सिवाय कहीं  21:19 झुकेगा नहीं,  अभी कहीं झुकना है तो गुरु को ठीक से जाना नहीं,  किसी से प्रेम से व्यवहार करें नम्रता से 21:35 करें वो अलग बात है, अंदर से किसी से प्रभावित हो जाए, ऐसा तो ब्रह्मवेत्ता का शिष्य नहीं हो सकता, 21:44 दूसरे  किसी से प्रभावित हो जाए ऐसा ब्रह्मवेत्ता का शिष्य नहीं है वो, अगर  कहीं किसी से प्रभावित हो गया तो वो ब्रह्मवेत्ता का शिष्य नहीं है वो, ब्रह्मवेत्ता का शिष्य किसी से इम्प्रेस नहीं होता, जो प्राइम मिनिस्टर के सेक्रेटरी है, वो पट्टा वाला से  या  22:02 कलेक्टर से इम्प्रेस होगा क्या?  अगर इम्प्रेस हो रहे तो प्रिम मिनिस्टर का सेक्रेटरी पद नहीं संभाल सका,  सीधी बात है सीधी दृष्टान्त है, 22:16 ऐसा होता है। 

  मान का इच्छा करेगा उसका देह द्यास बढ़ेगा वो अपमान नहीं सह  सकेगा, उसको धन का लोभ  रहेगा,  विषयों में रुचि रहेगी प्रीति रहेगी, और 22:30 पराधीनता रहेगी अंदर से, और पराधीन स्वप्ने सुख नहीं ,  22:38 इसलिए आईडिया से  आदमी समझते सनझते समझते  ऊपर उठ जाता है।  अमानित्व शिष्य के लक्षण है, दूसरा मत्सर  रहित होना।

 ज्ञान के भी मत्सर  होता है।  ज्ञान के मत्सर  से भी बड़े बड़े झगड़े होते हैं , और वो मत्सर तो महाराज भल भालों को लग जाता है,  कोई भी अकल  होइसारी ाव्रत ये न मतसार होए अंदर, अपणु बीजू , ये जो मत्सर है वो बड़ो बड़ो को पटकता  है, विस्वामित्र जैसों को पटक दिया मत्सर ने।  है  मेरा तपस्या है , मेरा ज्ञान ऐसा है, इसलिए दूसरी सृष्टि कर के दिखाया, तप नाश कर दिया, जो जोगी होते हैं न अगर आत्मज्ञानी गुरु  अपनी घर तरनि और जोगी हो गए , तो योग की शक्ति आजायेगी तो थोड़ा अपमान हो जायेगा मान मत्सर,  तो अपनी तप खरच कर,  पनि बताबी जाए की बतावी न पांच मानस तवी बतावै पंडर वरस पूरा ठेगई बुद्धू लोग तो ये मत्सर भी तप नाश कर देता है पुण्य क्षीण कर देता है, इसे  शिष्य बचता  है ,

 गुरु कैसे संतुष्ट हों, तो हम मान मत्सर सहेंगे तो गुरु संतुष्ट नहीं रहेंगे ?  23:45  हम नीरअहंकारी बनेंगे तो गुरु संतुष्ट नहीं रहेंगे ? 24:03  हम निरंकारी होंगे मान मत्सर  रहे होंगे तो गुरु राजी 24:16 रहेंगे,   मूल मंत्र है के गुरु कैसे राजी हो, पहले मंत्र है की ब्रह्मवेत्ता गुरु कैसे मिले, जिसके हृदय में छटपटाहट है   ब्रह्मवेत्ता गुरु उसको मिलते हैं, , और छटपटाहट नहीं तो उसको मिले हुए  भी वो वहां टिकेगा  नहीं, ब्रह्मवेत्ता गुरु कैसे मिले , वो ब्रह्मवेत्ता गुरु राजी कैसे हों, ये दो  मंत्र जीवन में आ जाये, तो बाकी के सद्गुण अपने आप आने लगेंगे,  ब्रह्म वेत्ता गुरु कैसे मिले, और वो राजी कैसे हों,  हम पर संन्तुष्ट कैसे रहें, 24:33

 जैसे मा स्वाभाविक बच्चे को दूध पिलाती  है, लेकिन कभी-कभी बच्चे ऐसे  अंगड़ाई लेती है की  25:07 तो मां के वक्ष स्थल से दूध उभर आता है, 25:12 ऐसे ही हम लोगों का ऐसा व्यवहार हो की हमको देखते देखते गुरु के ह्रदय से  हमारे 25:19 कल्याण का भाव उभर उभर कर निकले, वह लाभ करता जाता है, हमारा कल्याण करता जाता है, 25:30  क्यों की वो महापुरुष सत्य संकल्प होते हैं, अपने लिए तो संकल्प उठता नहीं, जल्दी उनके संकल्प उठता नहीं , लेकिन हो तो जब हमारे कल्याण का, 25:37 उससे बहुत लाभ होता है, नहीं तो ये जिव वेचारा करोड़ जन्म के माता पिताओं का लेना देना करोड़ों जन्म का एक ही जन्म में साक्षात् कार कर ले,  गुरुओं का सत्य संकल्प का तो प्रभाव है, 

आप मत्सर माने मान मत्सर इर्षा दुसरो को वो करते है , दुसरो को छोटा दीखाने के लिए  भी अपना समय शक्ति गवां देते, लड़ते झगड़ते ये मत्सर हैं, तड़ातड़ी धड़ा धड़ी ये मत्सर का दोष होता है न अंदर में तब आजाता है ऐसा भड़का व्यवहार करवाणु ये मत्सर का दोष होता है इसलिए नहीं तो सौम्यता 26:24  मत्सर  कम हो जाएगा तो सौम्यता आजायेगा, सौम्यता बढ़ता है तो समझो साधना बढ़ रही 26:30 है। और मान और मत्सर बढ़ रहा है तो समझ लो कोई दूसरी दिशा में गाड़ी जा रही है। 

  26:38 जो दुर्जन है अहंकारी है उसको निंदा का बाण लगता है,  इससे तो जहाँ  निंदा होती वही 26:43 जाता है, भीख मांगने जा रहा है, अपमान की जगह, 26:49 जो अपमान को चाहता है, या  जो अपमान की जगह पर जानबूझकर जाता है, उसको अपमान के असर भी तो नहीं होती।   और जो मान चाहता और मान नहीं 26:57 मिले तो कितना दुख हो,  कोई फंक्शन में बुलाया  अतिथि विशेष करेंगे, ैनमते कोई व्यक्ति गया ैलो लोक सु करू इ लोग कैथे जो अथिति विशेष करूछु आ साहेब न करूछु ता ना जमीं एम् ने अथिति विशेष करवाणु जे मानस अतिथि विशेष केंसिल  तो बारे दिन थयो न शब्दों छे न बीजू कोई छे ते बात हेवनु , gj सो कड़ो आदमी से जो मिले सुख क्षण  भर तो, सौकोड़ो की गुलामी होइ की तालु पड़े तो सर लगे   27:33  केटलो झूठ केटलो पोलसन अतिथि विशेष न, बारीक़ से देखो तो सरासर वेवकूफी है,  और शिष्य का स्वतंत्र सुख होता है,  और मान चाहने वालो का तो हजारो हजारो पराधीनता का सुख होता है, पराधीनता का कोई सुख होता है? धुतकारा पड़ता न, आवे  भइल आभै फलाना आभै फलाना 

एक दूसरे के क्या क्या करना पड़ता है, और फिर भी  28:56 अंदर की मस्ती होती  कहां उनमें ? 29:02 गुरु की प्रसन्नताएं और अपना कार्य कैसे सिद्ध हो, अपना कार्य क्या है की ?- आत्म ज्ञान । 29:07 आत्मज्ञान माने  में क्या? जो भी करना चाहिए  वो कर लेता है , जैसे व्यापारी दक्ष रहता है, ग्राहक को वो वैरायटी दिखाएगा वो दिखाएगा,  कैसे भी 29:17 ग्राहक माल ले जाए और दो पैसा मिल जाए उसमे वो दक्ष होता है, ऐसे ही शिष्य का तीसरा गुण है दक्षता, कैसे भी कर् के इस जन्म में आत्मज्ञान हो जाये , समय व्यर्थ न जाये, ये पुट्ट और नूह और  पत्नी और समाज की छोटी मोटी बावाही ये इधर ही पड़ी रहेगी, मिथ अपमान निन्गो  ये माथा चढूनी बाई बयान तो शरीर को जलाएंगे ये बड़ा अपमान है, अकेला समसान में छोड़के कुटुम्बी चले आएंगे, फिर जीवन भर इसका मान हुआ तो क्या हुआ? 29:59 तो यह अपमान मृत्यु का अपमान हो जाए, उसके पहले मृत्यु के पार जगह पर पहुंच जाएं, इसमें 30:05 वह शिष्य दक्ष रहता है   कुशल रहता है, उसमें उसने अगर बुद्धि का उपयोग किया तो ठीक शिष्य है, और 30:13 ठीक मनुष्य जन्म का उसने फायदा उठाया, नहीं तो बुद्धू है बुद्धू, कमा कमा के रुपए पैसे 30:19 क्या-क्या जिगिड जिगिड कर के, छोरे छोरियों  को बहू को दे के, और आप 30:24 यमदूतओं के गुलाम हो गया, तो वो  मूर्ख है।  शिष्य में तो ये होता है अदम्भित्वं अमानित्व अमात्सर्य दक्षता ये गुण होते हैं, तो वहां ज्ञान टिकता है, गुरु के कृपा ठीक से खींच के आ जाती है, पोतानु कार्य आत्म लाभ आत्म लाभ प्राप्त करना माँ आलास नहीं विलंब नहीं , विलम्ब करिस्साके नहीं आलस रखे नहीं , बॉडी शिष्य छे व दक्ष कहवै छे दक्षता कुशलता हाँ  आलस आत्मलाभ करना माँ आलास थे तो व दक्ष नथी बुद्धू छे , शिष्य तो छे पर बुद्धू छे , विनम्र छे पर बुद्धू छे। 


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संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था सत्संग के मुख्य अंश : राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है । करने, जानने और मानने की शक्ति...