शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

साधक ऐसा चाहिए ( Sadhak Aisa Chahiye ) Part -2

 


 साधक ऐसा चाहिए - part 2 


 

सत्संग के मुख्य बिंदु —


  1. आत्मा का विस्मरण – जीव अपनी असली पहचान, जो शुद्ध, नित्य और आनंदस्वरूप है, भूल गया है।


  1. माया का प्रभाव – अज्ञान के कारण वह माया (भ्रम और असत्य) में उलझा रहता है।


  1. क्षणिक सुख की दौड़ – स्थायी आनंद को छोड़कर, अस्थायी सुखों की ओर आकर्षित होता है।


  1. जन्म-मरण का चक्र – यह मोह उसे पुनः पुनः संसार में बाँधता है।


  1. मुक्ति का मार्ग – केवल आत्मज्ञान और सत्य के अनुभव से ही यह बंधन टूट सकता है।

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सत्संग


        0:03तो आत्मा का ज्ञान प्राप्त करके जैसे सर्प के चूली छोड़ देता है, फिर 0:11 उसकी चिंता में नहीं पड़ता अथवा तो जैसे सच्चा दाता आदमी दान की हुई चीज  0:19 वस्तुओं का चिंतन नहीं करता, अथवा तो मल त्यागने के बाद उस मल का 0:26 क्या हुआ उस विष्ठाकिधर पड़ी है और क्या हुआ उसका विष्ठा  का ऐसा समझदार आदमी चिंता 0:32 नहीं करता। ऐसे हे  उधव मेरे कुटुंविऑ का क्या हुआ, उनका क्या 0:39 हुआ, इस चिंता को छोड़कर आत्म परायण हो 0:45 रहो, जब जीव आत्म परायण होता है तो उसके साथ जिनका भी संबंध होता है उनका अपने आप पालन 0:51 पोषण और भरण  होने का कार्यक्रम प्रकृति अपने हाथ ले लेती है।  1:00 नाहक जीव चिंता करता है कि बच्चों का क्या होगा, बेटी का क्या होगा, बेटे का क्या 1:05 होगा, अनंत अनंत सामर्थ्य जिस चैतन्य परमात्मा में है वह सृष्टि चला रहा 1:13 है, जीव अपना अज्ञान सामने लाकर अपने को करता भरता मानता 1:22 है, मलुक ने ठीक कहा है -

 अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। 

 दास मलूक  यो  कहे, सबका दाता राम। 


         मनुष्य सोचता कि मैं मेहनत करता हूं, 1:35 कमाता हूं, तब कुटुंब भी खाते हैं।  नहीं नहीं तुम्हारे पहले भी वे कुटुंब 1:41 भी कहीं न कहीं खाते थे और तुम्हारे बाद भी वे खाते पीते और मरते रहेंगे। तुम्हारे होने से यह नहीं है, इनके 1:49 होने से तुम नहीं हो, प्रभु के होने से सब कुछ दिखता है, जिस प्रभु के होने से सब कुछ 1:56 दिखता है उस प्रभु में अपने चित्त को लगाने का अभ्यास करना।  2:03 जैसे दुराचारी  आदमी स्त्री की याद करता है, लोभी धन की 2:09 याद करता है,. कामी कामिनी  की याद करता है, अभिमानी सत्ता की याद करता है, ऐसे ही साधक 2:15 अपने साधन की याद करके साध्य स्वरूप में स्थिर होने का अभ्यास करता 2:22 है। 


 यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।  


        हे उधव।  ये  श्रीमद् 2:32 भागवत का 11 वां स्कंध सातवां अध्याय का श्लोक है।  हे उधव जो कुछ मन से सोचा जाता है वाणी 2:40 से श्रवण और नेत्र आदि इंद्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान है, मन का विलास 2:47 है, माया मात्र है।  इस माया मात्र जगत को सच्चा मानकर, जीवन गवा कर उस पतंग की नाई 2:54 अपना अंत मत लाना। 


         दत्तात्रेय यदु राजा को कहते कि, मैंने 2:59 पतंगिया को भी गुरु किया,  उस पतंगिया  को थोड़ा सा रूप में आसक्ति होती है, और 3:07 अपनी जान दे देता है।  ऐसे ही साधक किसी रूप को बारबार ना निहारे और किसी दृश्य 3:13 चलचित्र को न देखे, चलचित्र आंख के द्वारा जाते हैं तो 3:19 विकार पैदा कर देते हैं।  साधक को काष्ट की 3:25 पुतली को भी नहीं छूना चाहिए, और साधिका काष्ट के पुतले को भी नहीं छुए 3:31 एकांत में बहन के साथ अथवा भाई के साथ उम्र लायक नहीं बैठना चाहिए, जब तक 3:37 परमात्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब तक इस दगाबाज मन पर भरोसा नहीं करना 3:46 चाहिए। आठवा एडवर्ड इंग्लैंड का स्त्री के 3:51 संपर्क में आकर अपने राज्य को खो दिया।  उस अभागे ने तो इंग्लैंड का राज्य खोया लेकिन 3:58 इस मनुष्य जन्म का तो हाल और बुरा है।  यह तो परमात्मा का राज्य खोते ही आए हैं।  4:04 सदियों तक परमात्मा का राज्य खोते आए।  स्त्री के मोह में पड़कर राज्य खो दिया, 4:11 और हम लोग संसार के मोह में पड़कर परमात्मा को खो रहे हैं।  


        हे यदु 4:19 राजा मैंने कीड़े को भी अपना गुरु बनाया 4:24 है।  बमरी कीड़े को ले आती है, अपने घोसले में रखती है, बिल  में रखती 4:33 है, उस घर को ढाक देती है डंक मार के, वो कीड़ा भमरी का चिंतन करता करता भय से भी 4:42 परमात्मा उसका भमरी का चिंतन करता है।  फिर दूसरा डांक लगता है चिंतन तेजी से हो जाता 4:49 है।  और चिंतन चिंतन में उसके ऊपर पतला सा डाला 4:56 जाला बन जाता है।  फिर बम से बाहर निकलती है तो  तीसरा डंक 5:01 मारती है तो, पुरुषार्थ करता है और जाला को तोड़ता है।  तोड़ने का जब पुरुषार्थ करता है तो उसे पंख फूट निकलते और आकाश उड़ जाता 5:09 है।  ऐसे दुख के डंक लगे तो साधक को पुरुषार्थ करना चाहिए, साधना बढ़ा देनी 5:16 चाहिए, मान और अपमान के डक लगे तो साधक को तीव्र पुरुषार्थ करके और ब्रह्म ज्ञान के 5:23 पाक खोल देने चाहिए, ब्रह्माकार वृत्ति करके अपने स्वरूप में पहुंच जाना चाहिए।  5:31 ये माया मात्र जगत

 साला तीरथ ससुरा तीरथ तीरथ है घरवाली

 मात पिता की बात न जाने तीरथ छोटी साली

         ऐसा मानने वाले अभागे आदमी, जैसे नरक 5:48 में और गर्भ में भटकते रहते हैं, ऐसे ही साधक संतों के द्वार पर और 5:55 परमात्मा की चर्चा में अपना समय पसार करता है।  तुम ऐसे मूर्खों के चक्कर में मत आना तुम 6:02 ऐसे मूर्ख मत बनना, तुम साधक बनना,

 काम न, क्रोध न, लोभ न, मोह कछु

 एकल भला अनीह,

 साधक ऐसा चाहिए जैसा वन  का सिंह। 

         जैसे सिंह की गुफा में आराम करने की इच्छा कोई नहीं 6:26 करता, अथवा तो कुएं में गिर कर समाधि लगाने की कोई इच्छा नहीं 6:32 करता, ऐसे संसार रूपी कूप में गिरकर कोई सुख की इच्छा नहीं कर 6:39 सकता, साधक समझदार होता है विवेकी होता है, 6:44 इस सारे जगत को नश्वर समझकर अपने चित्त को परमात्मा में लगाता है


 यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।  


        हे ओधव  6:54 जो भी मन से वाणी से चक्षु से दिखता है, उसको सबको माया मात्र समझना।  7:00 मिथ्या समझना, स्वपना समझना। 

 गो गोचर जन  लग मन जाई

 सो सब माया जानम भाई

         राम जी से कहलवाया है, तुलसीदास ने।  गो, 7:13 गोचर,  गो माना इंद्रिया, गोचर माना इंद्रियों के द्वारा विचरने वाला मन,  7:19  इंद्रिया विषय और मन जहां तक जाता है वो सब माया 7:24 है।  माया माना धोखा है।  इस धोखे में अपना जन्म गवाने वाले व्यक्तियों से 7:32 बचकर, अपने जीवन को धन्य करने वाले साधकों का जो संग करता है वह साधक बन जाता 7:39 है।  करके देखना किसी गुरु भक्त का साथ, करके देखना किसी साधक का संग, वो 7:47 तुम्हें साधना का रंग लगाकर छोड़ 7:53 देगा।  जैसा संग होता है ऐसा रंग लग जाता है।  संग करना है तो किसी गुरु भक्त का करना, 8:01 किसी साधक का करना, अथवा तो अंतर्यामी आत्मा का करना नहीं तो असंग 8:09 रहना।  कठियारे पर गुरु की कृपा बरस रही है कठियारे का विवेक और वैराग्य बढ़ रहा 8:15 है।  जब तक विवेक और वैराग्य ना बढ़े तो ब्रह्मा जी आकर उपदेश दे, कृष्ण आकर उपदेश 8:21 दे, और गुरु हजार बार उपदेश दे, फिर भी आत्मा शांति नहीं मिलती।  अपना अभ्यास काम 8:26 देगा।  वे हत भागी है जिनके पास साधन है, खाने को 8:33 भोजन मिल जाता है, रहने को मकान या झोपड़ा मिल जाता है, और फिर भी आत्मा का ध्यान 8:39 नहीं करते और साधना नहीं करते वे  अभागे है। 

  स धुनी धुनी पछतावे

 जब बुड्ढे होंगे तो कोई उनका होगा 8:46 नहीं।  जब शरीर का तेज जाता रहेगा तो कोई सामने देखेगा नहीं।  जब शरीर का बल जाता 8:52 रहेगा तो कोई पानी देने वाला मिलेगा नहीं।  पछताते पछताते मरेंगे, और मरने के बाद भी 8:58 उनको शांति नहीं ब्रम राक्षस होकर घूमेंगे, प्रेत होकर घूमेंगे कोई बाप वहा मदद नहीं 9:06 करता। सियाणा  आदमी बुढापा आने के पहले अंधापा आने के पहले तीर्थ यात्रा कर लेता है, संत 9:13 दर्शन कर लेता है, सियाणा  आदमी बुद्धि की मंदता आने के 9:19 पहले ही बुद्धि में ब्रह्म ज्ञान भर लेता है।  चतुर आदमी मन दुर्बल होने के पहले ही, 9:30 हरि की चर्चाएं का मनन करके आत्म शांति पा लेता 9:35 है।  समझदार आदमी मौत आने के पहले मर जाता 9:43 है।  जैसे वमन किया हुआ, उल्टी किया हुआ पदार्थ फिर खाने की इच्छा नहीं होती, ऐसे 9:50 ही साधक को विषयों की इच्छा नहीं 9:55 होती।  जैसे हिंदू को गौमांस  भक्षण करने की नहीं होती, ऐसे ही साधक 10:05 को जगत के पदार्थों का भक्षण करके सुख पाने की इच्छा नहीं होती, वह खाता है लेकिन 10:11 शरीर को टिकाने के लिए, वो देखता है जीवन को चलाने के लिए, वो सुनता है प्रभु को 10:18 पाने के लिए, जब तक हाथों में बल है समझदार, हाथ निर्बल हो 10:25 जाएंगे उसके पहले ही दान पुण्य और सेवा कर लेता है।  10:30 जीभ  लथड़ जाती है, बोलने का बल नहीं होता उसके पहले ही वह राम नाम का रटन कर लेता 10:37 है, बुढ़ापा आएगा जीभ लथड़ जाएगी, नसों में शक्ति ना रहेगी, भाषा जैसी तैसी होने लगेगी, 10:46 दांत गिर जाएंगे मुखाजी हो जाएंगे, उसके पहले ही वो हरि चर्चा कर लेता है हरि चर्चा 10:52सुन लेता है, सुना लेता है।  घर में आग लगने के पहले जिसके पास पानी है उसको पश्चाताप नहीं करना पड़ता। 11:00 उसको पश्चाताप नहीं करना पड़ता हे पथिक तुझे जाना है तो ठंडे पहर तो अपनी 11:07 यात्रा तय कर, नहीं तो धूप चलेगी और थकेंगे और आह निकालोगे।   सूर्य ढलेगा अंधेरा हो जाएगा और 11:15 तुम्हारे मार्ग रह जाएंगे, तो अपने मार्ग को तय कर ले ठंडे पहर। 11:22 अभी जीवन ठंडे पहर में है।  मां बाप गुरु का सहयोग 11:28 है।  जवानी का सहयोग है, अकल का सहयोग है, अभी ठंडा पहर है, अपनी आत्म ज्ञान की यात्रा करलो नहीं 11:36 तो बाद में फिर खूब पछताना पड़ेगा।


  छोड़ 11:42 दे इस अंधे लोगों के व्यवहार की आसक्ति को।  फलाना काम नहीं करूंगा तो लोग क्या 11:49 कहेंगे? उधारा करके भी घर का पालन पोषण नहीं करूंगा तो लोग क्या कहेंगे? कूड़ कपट 11:56 करके भी मोह ममता का व्यवहार नहीं करूंगा तो लोग क्या कहेंगे?  इसकी चिंता को लात मार, 12:01 लोकेश्वर को नहीं पाऊंगा तो वो क्या कहेगा, इसका ख्याल कर।  आत्मदेव को नहीं पाऊंगा 12:07 तो वह क्या कहेगा इसका तू ख्याल कर।  मनुष्य जन्म पाकर भी यदि पशुओ की नाई 12:15 जिऊगा  तो प्रभु क्या कहेगा गुरु का ज्ञान क्या करेगा 12:20 फिर अपने विवेक को सदा जागृत रखो।  न जाने गुरु का सानिध्य कब तक है?  न 12:29 जाने ये तुम्हारे कान तुम तक तुम्हारे लिए कब तक वफादार रहेंगे, पता थोड़ी है।  तुम्हारे 12:35 कान बहरे हो सकते हैं, तुम्हारी आंखों की रोशनी जा सकती है, तुम्हारे गुरु कहीं चले 12:42 जा सकते हैं, अथवा मर भी सकते हैं।  कोई पता नहीं क्या होगा 12:48 कल? जब तक सहारा मिल रहा 12:53 है, तो चलने में आना कानी मत कर चल डाल जितना चलना चाहिए।  13:00 जितना चल सके उतना चलने से काम नहीं चलेगा, जितना चलना चाहिए उतना चल डाल 13:06 भैया।  जितना टिकट वाले को पैसा दे सको, उतने की टिकट से काम नहीं चलेगा, जितने टिकट के 13:12 लिए पैसे होने चाहिए उतने जुटा लो।  जितना प्रभु को पाने के लिए विवेक और वैराग्य 13:18 चाहिए उतना जुटा लो।  वरना गाड़ी तो मोक्ष द्वार तक पहुंच जाएगी, हम यही के यही ना रह 13:26 जाए।  सूर्य ढल जाए और यात्रा अधूरी ना रह जाए इसलिए खूब विवेक का वैराग्य का सहारा 13:36 लो।  अपने मन को कहो कि मिल गया फिर क्या? ये खा लिया फिर 13:43 क्या? ये रख लिया फिर क्या? रुपए थापण रख के मर 13:48 जाओगे भोगेगा कोई।


  दत्तात्रेय कहते हैं 13:53 मैंने मधुमक्खी को भी गुरु बनाया है मधुमक्खी संग्रह करके 14:00 मर जाती है संग्रह के कारण ही उसे कोई और निचोड़  लेता है साधक को अधिक संग्रह नहीं करना चाहिए, 14:07 भविष्य की चिंता नहीं करना चाहिए, वर्तमान में आत्म मस्ती में रहना 14:12 चाहिए।  रोटी के टुकड़ों की चिंता नहीं करना चाहिए


 सोचा मैं ना कहीं जाऊंगा यही बैठकर  अब खाऊंगा,

 जिसको गरज होएगी लाएगा सृष्टिकर्ता खुद आएगा। 


 ऐसे लोग हमारे सामने से गुजरे फिर भी हम सोच रहे।  कि थापण मुको आम करो तेम करो पर्यु पर्यू  

 ह कर मुनु होता चने आत्मा मा 14:41 मुको समय बड़ा कीमती है, एक स्वास चला जाए तो वापस लौटने का कोई सहयोग नहीं, साक्षात 14:50 ब्रह्मा जी भी आकर तुम्ह एक मिनट अधिक जिंदा रखना चाहे तो वो अन्याय 14:56 करेगा।  मनुष्य जन्म में जितने तुम श्वास मिले हैं 21600 स्वास प्रतिदिन तुम्हारे 15:03 नाश हो रहे हैं।  जब खत्म हो जाएंगे तो एक स्वास तुम अधिक नहीं ले सकते।    इतना तुम्हारा कीमती 15:11 जीवन है एलिजाबेथ मरने को पड़ी थी और डॉक्टरों को कहा कि मुझे जिंदा रखा जाए एक 15:17 मिनट तो एक लाख रुपया।  डॉक्टर स्वयं मरते हैं तो उसको कैसे जिंदा रखेंगे, वो भी मर 15:23 गए, डॉक्टर भी मर गए।  दूसरे को फूंक मार के जगाने वाले लोग भी मर गए।  15:29 मोरबी कांड में कई मूर्खों ने बीमा उतराया  होगा, कई लोगों ने सेफ डिपॉजिट रखी होगी, 15:36 कईओं ने जमाई ढूंढे होंगे, कईओं ने साले को राजी रखा होगा, कई ने ससुर को रिझाया होगा,मोरबी 15:43 कांड होने के 10 मिनट पहले ही कहीं कई प्लान होंगे, किसी को कहीं जाना होगा, किसी 15:48 को बारात में जाना होगा, किसी को इधर जाना होगा, किसी ने गहने को संभाला होगा किसी ने 15:55 साड़ियों को रखा होगा, किसी ने टेलीफोन पर किसी को वायदा दिया होगा कि आज पिक्चर में 16:00 आना है फलाने बजे।  मोरबी  कांड होने के 10 मिनट पहले कितने कितने सबके प्लान 16:07 थे, बैंक मैनेजर की साय थी किसी को तो किसी को कारकून का सहारा था।  किसी को वकील साब 16:14 का सहारा था, तो किसी को असल का सहारा था।  किसी को जमीन का सहारा था, किसी को जागीर 16:20 का सहारा था।  जरा सा पाहड़ टूटा सब सहारे नाश हो गए।  16:30 कृष्ण कहते हैं


 यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।

 नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।


 जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से श्रवण और नेत्र आदि इंद्रियों से अनुभव 16:47 किया जाता है, वह सब नाशवान है, मन का विलास है, माया मात्र 16:53 है।  होनहार हुई क्या हुई? जरा सा हवा ज्यादा चली बस।  सौराष्ट्र मा घर विना विणा थई गया 17:01 माल विणा थया मकान विणा थया दुकान विना थया खेतर विणा थया पैसा विणा थया अ विणा 17:09 थया बध खटक परमात्मा विणा थ गया कोने 17:15 टक इसी का नाम माया है। 

 माया मात्र मिदम  जगत

 मोह निशा सब सोवन हारा

 देख ही स्वपने अनेक प्रकारा

         17:29 कपोत को भी अपना गुरु बनाया है, कपोत कपोती  चारा लेने को 17:35 गए।  लौट के आए तो उनके बच्चे पारिधि  ने जाल में फसाये 17:40 थे।  बच्चे के मोह में मां उधर पड़ी,वो  भी फस 17:45 गई।  कपोत  भी मां के पीछे लगा तो व भी फस गया। पारिधि उनको जाल में लेकर गया तड़प रहे है।  17:54 ऐसे ही अज्ञानी मनुष्य मोह में तड़पते तड़पते अपना जीवन गवाते हैं।   18:00 साधक को ऐसी मोह ममता से बचना 18:09 चाहिए।  जैसे धधकती  आग को कोई सय्या  बनाने की इच्छा नहीं 18:14  करता, जैसे कांटों का भोजन करने की कोई 18:22 इच्छा नहीं करता, ऐसे ही साधक विषय वासना की इच्छा नहीं करता।  18:32 जैसे सर्प के मुंह में पड़ा हुआ मेडक नहीं सोचता कि मैं काल के मुंह में पड़ा 18:38हूँ, और जंतुओं को झेलता  रहता है।  ऐसे ही अज्ञानी मनुष्य काल के मुह में पड़े 18:46 हैं।  और विषयों का सेवन करते हैं, सफेद बाल आ जाते हैं, जुरिया पड़ने लगती है, फिर भी 18:54 उन अभागोको को पता नहीं चलता कि काल ने मेरे को पकड़ा है।  19:00 कब झपट लेगा वो पता नहीं चलता। 


         इस सरोवर के जल को बाद में पीना यदि 19:08 पिएगा तो मर जाएगा तुरंत।  खबरदार मेरे प्रश्न का उत्तर दे।  यदि 19:16 उत्तर सही होगा तो सरोवर पूरा तुम्हारा है, और मैं जहां रहता हूं वहा धन  के हमबार 19:21 गड़े हैं, वो भी सारा धन तुम्हारा है, मेरे प्रश्न का उत्तर दो।  19:29 इस जगत में आश्चर्य क्या है , मुझे बताओ सहदेव  उत्तर ना दे पाया, यक्ष ने उसको मार 19:36 डाला, दूसरा भाई खोजते खोजते वही पहुंचा देखा कि एक भाई मृतक है मृतक भाई को बाद 19:41 में उठाऊंगा, प्यास लगी पानी पीने को जाता है।  फिर अज्ञात वाणी 19:48 हुई, यना कुल   सहदेव को देख  लाश हो पड़ा है, तेरा भी यही  हाल 19:54 हो जाएगा।  मेरे प्रश्न का उत्तर दे, यदी  उत्तर सही होगा तो सरोवर पूरा तुम्हारा है अमृत 20:01 सा पानी पीना।  और धन के अंबार ले जाना।  मेरा प्रश्न ये है कि क्या जगत में 20:10 आश्चर्य ही है ?  उत्तर ना दे पाया मारा गया।  अर्जुन आया, अर्जुन का भी यही हाल 20:17 हुआ, भीम का भी यही हाल हुआ, आखिर इन भाइयों को खोजते और पानी को खोजते खोजते 20:23 युधिष्ठिर आए, युधिष्ठिर ने देखा कि चारों भाइयों की लाश पड़ी है, क्या किया जाए रोना धोना तो 20:30 बाद में लेकिन पहले अपने प्राणों को तो बचाऊं, युधिष्ठिर गए   सरोवर के करीब, अज्ञात आवाज आया 20:38 यक्ष का, ये युधिष्ठिर  खबरदार, तेरे चार भाइयों को मैंने नहीं मारा 20:44 है, मेरा प्रश्न है, 


        किसी बुद्ध पुरुष ने पूछा था, मैं कोई 20:51 जैसा तैसा आदमी नहीं हूं, मैं बड़ा विद्वान पंडित, जाना माना कथाकार था मैं, बड़ी लंबी 20:59 चौड़ी कथाएं करता था।  बहुत लोग मुझे मानते थे जानते 21:04 थे।  और बहुत मेरे चेले चाटी भी थे, और मेरे पास खूब खड़ा गड़ा हुआ धन पड़ा 21:13 है।  मैंने किसी सच्चे संत के प्रश्न का उत्तर ठीक ना दे पाया और अनादर कर दिया 21:19 उससे मैं श्रापित हुआ, मैंने गिड़गिड़ाया  और उस श्राप की 21:26 निवृत्ति का उपाय पूछा, तो मुझे वरदान मिला है कि जिस दिन इस 21:32 प्रश्न का ठीक से उत्तर तू समझ लेगा उस दिन तेरी सद्गति होगी। हे  युधिष्ठिर  मैं कई वर्षों से यूँ  21:41 परेशान हूं।  हजारों जय करने वाले मेरे काम में नहीं आए।  लाखों रुपए और करोड़ों धन के हीरे 21:48 जवार मेरे काम में नहीं आए।  मेरी पत्नी मेरे काम में नहीं आए. मेरे पुत्र मेरे काम में नहीं आए मेरे 21:55 दोस्त मेरे काम में नहीं आए. मेरी बाहर की कथाएं और मेरे बाहर  का ज्ञान मेरे काम में नहीं आया। की तुम कृपा करो मेरे प्रश्न का 22:02 उत्तर दो, ताकि मेरी मुक्ति हो, मेरी 22:09 गति हो। 


        युधिष्ठिर कहते  मैं पानी पी लूं फिर, नहीं पहले मुझे प्रश्न का उत्तर 22:15 दो, उत्तर सही होगा तो मैं तुम्हें धन्यवाद दूंगा धन के अम्भार  दूंगा तुम्हारे भाइयों को 22:21 जिंदा कर दूंगा।  मैं जैसा तैसा यक्ष नहीं।  इतना सामर्थ्य है, लेकिन मेरे को 22:28 उस  प्रश्न का उत्तर ठीक से नहीं सूझता  तो मैं अभागा होकर भटक 22:34 रहा। युधिष्ठिर कहता है की पूछ लो भैया, जल्दी करो।  यक्ष पूछता है  कि जगत में आश्चर्य क्या 22:42 है, युधिष्ठिर  धर्म का अवतार थे।  युधिष्ठिर  कहते हैं 

अहन्यहनि भूतानि , गच्छन्ति यमालयम् ।

शेषाः स्थावरं इच्छन्ति ,  किं आश्चर्यं मत: परम् ।।

                                                     ( -महाभारत) 


         सब मौत के तरफ जा 22:54 रहे, पौधा मर रहा है, पेड़ मर रहा है, किड़ियाँ  मर रही है, ची टिया मर रही है, चूहे मर रहे, बिल्ली 23:01 मर रही है, जानवर मर रहे, मनुष्य मर रहे, फिर भी बाकी के जो है वो अपना गहरी नीव  जमा रहे हैं।    23:09 इससे बढ़कर आश्चर्य क्या हो सकता है। 

अहन्यहनि भूतानि ,गच्छन्ति यमालयम् ।

 इससे बढ़कर क्या आश्चर्य है।   श्री कृष्ण कहते

 यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।  


 तुमको लगेगा कि आज बापू बड़े गंभीर है।  गंभीर नहीं श्लोक 23:36 ऐसा है। आज वचन ऐसा मिल पड़ा है।  श्लोक ऐसा लिख दिया गया है।  कि तुम्हारे जीवन का राज खुल 23:45 जाए।  शायद एक वचन तुम्ह लग जाए।  शायद एक अक्षर तुम्हें लग 23:51 जाए।  शायद कोई वाक्य चुभ  जाए तीर कि नाई।  23:58


 यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।

 नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।


 जो कुछ मन से सोचा जाता 24:12 है, वाणी से श्रवण नेत्र आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान 24:21 है।  मन का विलास है।  माया मात्र है, धोखा मात्र है, दिखने भर को है बाकी कोई 24:29 तुम्हारा कुछ नहीं है । 

 हजार हजार दावा दे तुम्हें पिता की तू चिंता नहीं कर बेटी में 24:35 बैठा हूं।  बेटी लाख लाख वायदा करे के पपा तुम चिंता मत करना मैं तुम्हें सुख 24:42 दूंगी।  बेटा सुख देगा, बाप सुख देगा, फलाना सुख देगा, ऐसा कौन आदमी है जो सुखी है? जो 24:49 सुखी होगा वही तो सुख देगा ना? जो सुखी है वही सुख 24:54 देगा।  और ये मजे की बात है कि सुख देने की चीज नहीं है, सुख होने की जरूरत है, सुख 25:01 दिया नहीं जाता, सुख लिया नहीं जाता, इंद्रियों के भोगों को अथवा वाहवाही  को जो 25:07 लोग सुख मानते हैं, अथवा एस  आराम को जो लोग सुख मानते हैं,  वो तो और ज्यादा दुखी होते 25:13 हैं।  ना बेटा सुख देगा, ना बाप सुख देगा, ना भाई सुख देगा, ना भतीजा सुख देगा, सब मरने 25:20 वाले हैं।  मरने वालों से तुम सुख चाह रहे हो? सुख यदि चाहिए तो अमर आत्मा की तरफ चलो।  25:26 भाई सुख देगा? भाई सु सुख नहीं देगा, गुरु सुख देगा।  उस भाई में यदि गुरु की बुद्धि   25:32 आ जाए, उस भाई में यदि संत का भाव आ जाए, उसके वचन यदि जीवन में उतर जाए, उसके वचन 25:38 तुम्हारे वचन हो जाए, तो सुख तुम्हारा स्वभाव हो सकता है, वरना एक बेटा तो क्या 25:44 सब बेटों को मिला लो इस जन्म के बेटे तो क्या सब बेटों को ले आओ, सब मिलकर भी 25:49 तुम्हें सुख नहीं दे सकते और ज्ञान हो जाए तो सब मिलकर तुम्हें दुख नहीं दे सकते, 25:54 लेकिन समझेगा कौन ये बात? कृष्ण के बच्चे थे और कृष्ण  के उपदेश को नहीं लिया, तो आपस में दारू पी के 26:00 लड़ मरे, भगवान के पार्षद थे, जय विजय लेकिन भगवान के तत्व को नहीं समझा, तो गिराए गए। 26:08 तुम किसी के बेटे हो जाओ तो क्या फर्क पड़ता है।  नारायण स्वामी  साई का बेटा है, नहीं नहीं साईं का बेटा होने से काम 26:16 नहीं चलेगा, साई का शिष्य होने से काम नहीं चलेगा, साई जो तुम्हें दिखा रहे हैं उस यार 26:23 को देखने की तत्परता जब तक तुम्हारे में नहीं आएगी तब तक यात्रा अधूरी रह जाएगी। 26:32 ॐ ॐ ॐ 

  कृष्ण कहते हैं, हे उधव तू बद्रिकाश्रम चला 26:42 जा।  साध को कभी कभी अजगर  की नाई अकेले पड़ा रहना चाहिए।  कभी एकांत में गुफा में पड़े 26:50 रहना चाहिए।  बहुत विस्तार नहीं करना चाहिए और विस्तार हुए तो फिर कभी कभी खिड़की बंद कर 26:56 देना चाहिए।  अधिक देर लोगों के बीच आने के बाद कुछ 27:03 घड़ियों के लिए लोकेश्वर में भी डूबना चाहिए।  सिकंदर दरा27:10हलव सोनी लंका वारा हल गया कारन खजाने जा27:16मालि काथ खाली बेचारा27:21ह बड़े बड़े खजाने के मालिक चले गए, जिनकी धाक से  पृथ्वी के लोग कांपते थे वे 27:30 लोग मर मिट गए, उनकी राख अब देखने को नहीं मिलती, तुम कब तक इस शरीर को संभालोगे 27:38 भैया, तुम कब तक इस मकानों को और कबाब  को संभालोगे, तुम्हारा जन्म मकान और कबाड़ 27:45 संभालने के लिए नहीं हुआ है,  तुम्हारा जन्म आत्मा का पाने के लिए हुआ है।  तुम्हारा जन्म, जन्म मृत्यु से पार 27:52 होने के लिए हुआ है।  भरतरी महाराज कहते हैं कि मैंने ऐसा 27:59 मूर्खता की।  लोग ऐसी मूर्खता करते हैं कि चंदन की लकड़िया 28:08 जलाकर हाथ सेकते हैं, ऐसी मूर्खता करते कि स्वर्ण  के बर्तन 28:14 में लसन पका रहे हैं सुवर्ण  तुल्य मनुष्य जन्म मिला है और  विषय 28:20 रूपी लसन उसम पका रहे है।   जैसे कोई हीरे जवारा जड़त28:28थाली में प्रांगण का कचरा बुहारे , कचरा उठाता 28:35 है।  ऐसे ही हीरो से भी अधिक कीमती जो तुम्हारी इंद्रियां है, मन है, शरीर 28:42 है, उसको तुम संसार का कचरा उठाने में मत लगाना।  यह सब संसार का कचरा है। ये  झूठी 28:51 पृथ्वी और झूठे भोग, ऐसा नश्वर देह  और नश्वर शरीर, में भी 28:56 मैंने एक बात पाली के नश्वर  शरीर है।  उसमें शाश्वत परमात्मा के गीत सुने जा सकते हैं, 29:01 इसलिए बंसी को भी मैंने अपना गुरु बना दिया,  


तुम्हारे जीवन में यदि गुण ग्रहिता 29:08 है तो, पत्तों से भी तुम्हें ज्ञान मिलेगा, पक्षियों से भी तुम्हें ज्ञान मिलेगा, हवाओ 29:14 से भी तुम्हे ज्ञान मिलेगा।  

जैसे हवा गंध को ग्रहण करती लेकिन 29:20अपने में नहीं रखती, पहुंचाकर आप निर्लेप हो जाती है, ऐसे ही साधक शुभ शुभ कर्म और 29:26 व्यवहार उसके जीवन में आ भी जाते हैं, लेकिन अपने में नहीं रखता है, उसके जीवन से जो कुछ हो गया उसको याद नहीं करता भूल जाता है।  आप 29:33 फ्रेश हो जाता है, इसलिए मैंने हवाओं को भी अपना गुरु बनाया 29:39 है।  जैसे हवा कल की गंध और दुर्गंध को नहीं रोकती, ऐसे ही साधक कल के बात को कल के राग 29:46 और द्वेष को अपने चि में ना रखे।  कल जो हो गया हो गया, अपने चित्त में तो एक परमात्मा की 29:53 शांति को ही रखो और तुम्हारा कुछ नहीं।  ॐ ॐ ॐ 

 देखिये सुनिए गुनिये  मन माही

 मोह मूल परमार्थ नाही

 जो लोग प्लानिंग करते हैं, कथा का, सत्संग का, टाइम टेबल करते हैं, उनके  के द्वारा 30:28 सत्य नहीं निकलता सत्य को निकालने के लिए कोई नियम की गुलामी की जरूरत नहीं पड़ती 30:34 सत्य स्वाभाविक सहज में निकलता है वो सत्य होता है।  जो नियमों से बांधा जाता है वह 30:39 सत्य नहीं होता।  अपने जीवन को परमात्मा के गीतों से 30:45 भर देना।  तुमने देखा है कि बुलबुल जब परम स्वतंत्र और स्वाभाविक होती है तो मधुर 30:52 गीत निकलते है।  बुलबुल को पकड़ो और बोलो गा गा मारो थप्पड़ से गवा टाइम सर तो, उसके 31:00 गीत ना होंगे आर्टिफिशियल होगा कुछ।  पोपट को बोलो बोल बोल बोल 11 से 12 तक 31:08 बोल, अथवा 12 से एक तक बोल, एक से डेढ़ तक बोल, तो क्या बोलेगा।  पोपट  जब अपने आप में 31:13 तृप्त होता है, तब जो बोलता है वह संगीत बन जाता है।  ऐसे तुम जब अपने आप में शांत 31:21 स्वभाव फिर जब बोलते तो परमात्मा के गीत हो जाते हैं।   सत्य को नियमों में नहीं बांधा जा 31:28 सकता  है।  कथाओं को नियमों में बांधा जा सकता है।  ऑफिस के काम को नियम में बांधा जा सकता 31:34 है, लेकिन संतों की वाणी को नियम में नहीं बांधा  जा सकता। 

 पहले का जमाना था, ऋषि के आश्रम में 31:41 लोग जाते थे, रहते थे, घूमते घामते दो वचन निकल पड़े, चलते फिरते दस  पाच  मिनट मिल पड़ा, 31:49 दो घंटा चार घंटा कभी मिल गया, कभी चार दिन में एक बार मिल गया।  सहज में जो आ जाता 31:55 था वह  गुरु के वचन गुरु के नहीं साधक के बन जाते थे।  शिष्य के बन जाते 32:01 थे।  उन वचनों को आत्म साथ करके शिष्य शिष्य नहीं बचते थे, शिष्य भी गुरु हो जाते थे। ये  32:08 काम अटपटा नहीं है, लेकिन जगत सच्चा लगता है इन्द्रीओं के भोगलोलुपता  ले आते है,  तब यह काम कठिन 32:14 होता है।  नहीं तो परीक्षित सात दिन में मुक्त हो सकता है, जनक राजा पगड़े में पैर डालते मुक्त हो सकता है।  खट्वांग  एक महूरत  में 32:22 मुक्त हो सकता है, तो हम लोगों को देर क्यों होती है ? 32:29 या तो हमारे गुरु अज्ञानी है, मूर्ख है, लोभी है, लालची है, कथाकार 32:36 है।  या तो फिर हमारे अंदर अज्ञान है, लोभ है, 32:41 मोह है, ममता है, ईश्वर से ज्यादा जगत को मूल्य दे बैठे हैं।  ईश्वर से ज्यादा बाहर 32:47 की वाहवाही को देखते हैं।  ईश्वर से ज्यादा बाल बच्चों को मूल्य दे बैठे हैं।  ईश्वर से 32:53 ज्यादा धन जन और सुख संपत्ति को मूल्य दे बैठे हैं।  या तो हमारी गलती है, या गोला कंडम है, 32:58 या तो पावर हाउस नहीं है, या तो पावर हाउस का कनेक्शन में कुछ गड़बड़ है, या हमारी 33:05 श्रद्धा में गड़बड़ है, या हमारी समझ में गड़बड़ है, या तो हम कंडम है, या तो हमारा 33:10 गुरु कंडम है।  ऐसा समझ ले। तुम्हारे जीवन में गुरु की मुलाकात के 33:17 बाद यदि परिवर्तन नहीं दिखता है तो समझ लेना कि कहीं ना कहीं गलती है।  तुम जैसे 33:24 थे वैसे के वैसे यदि अभी भी तुम हो तो समझ लेना कि कहीं ना कहीं खराबी है।  वायर को 33:31 ठीक कर लो, या तो गोला को चेंज करो, या तो फिर पावर हाउस बदल 33:37 लो।  भगवान के लिए गुरु को छोड़ना पड़े तो खुशी से छोड़ देना लेकिन परमात्मा को मत 33:44 छोड़ना।  बाप को छोड़ना पड़े तो छोड़ लेना लेकिन परमात्मा को मत छोड़ना।  बहन को 33:49 छोड़ना हो तो छोड़ देना, भाई छोड़ना पड़े तो छोड़ देना, पुत्र और परिवार को छोड़ना 33:54 पड़े तो छोड़देना लेकिन उस परमात्मा को मत छोड़ना।  34:00 देह  का त्याग करना पड़े तो कर देना, चांडाल  के घर की भिक्षा मांग कर जीना पड़े तो जी 34:06 लेना, लेकिन उस ईश्वर का त्याग करके महलों में रहने की जरूरत नहीं।  उस महल में रहने 34:12 वाले कब्र में दफनाए  गए, उन महलो में हवा खाने वाले राख हो गए 34:19 है।  मुबारक हो मरना राने।  ओम ओम ओ 34:36 ओ 


 यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।

 नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।


 इस श्लोक  को तुम जरा याद कर लो तो ठीक ही 34:54 रहेगा,


 यवम माम चन स्वरम ग 35:02 मानम विधि माया मनो मयम माया 35:10 मनोय


 श्रीमद् भागवत का ग्यारहवां वा स्कंद है और सातवां अध्याय है, शायद 

यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।

 नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।


जो कुछ मन से सोचा जाता है, जो कुछ 35:54 मन से सोचा जाता है, वाणी से श्रवण नेत्र आदि इंद्रियों से

“36:03 अनुभव किया जाता है, वाणी से श्रवण नेत्र आदि इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है, वह 36:11 सब नाशवान है, वह सब नाशवान है,  मन का विलास 36:19 है, माया मात्र है, स्वप्न मात्र 36:25 है, भ्रांति मात्र है। 


 इसी बात को तुलसीदास अपनी भाषा में कहते 36:33 हैं। 


 देखिये सुनिए गुनिये  मन माही  देखिये सुनिए गुनिये  मन माही


 मोह मूल परमार्थ नाही    मोह मूल परमार्थ नाही

 36:57 ॐ ॐ ॐ ॐ  ॐ ॐ ॐ ॐ 


 कीर्तन करने से शायद विवेक और वैराग्य की बात सुनने से ऐसी कोई घड़िया आ जाए, एक वचन भी आपको 37:14 अपना हो जाए, बस बेड़ा पार हो जाएगा।  एक अक्षर भी तुमको अपना बन जाए बस, 37:20 अभी शास्त्र का है गुरु का है, ये तुम्हारा वचन हो जाए काफी हो जाएगा।  ये मोह मुल है, 37:27 इतना केवल हो जाए बस काफी है।  मोह मूल है, माया मात्र है।  तो बाजीगर 37:33 के रुपए नाश होते हैं, तो बाजीगर होता नहीं।  बाजीगर के खिलौने टूटते तो बाजीगर रोता 37:39 नहीं।  सिनेमा का हलवाई मर जाता है तो हलवाईन  रोती 37:44 नहीं।  सिनेमा के पर्दे पर सब चीज आती है और जाती है, लेकिन दर्शक बाहर निकलते तो उनकी 37:50 स्मृति रखते नहीं है।  और यदि रखते हैं तो बेवकूफ है।  ऐसे ये  सारा संसार की स्मृति मरने के 38:00 पहले मिटा देना।  क्योंकि सब स्वप्न मात्र 38:05 है। 


यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।

 नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।


 देखिये सुनिए गुनिये  मन माहीं  देखिये सुनिए गुनिये  मन माही

 मोह मूल परमार्थ नाही    मोह मूल परमार्थ नाही

 देखिये सुनिए गुनिये  मन माहीं  देखिये सुनिए गुनिये  मन माही

 मोह मूल परमार्थ नाही    मोह मूल परमार्थ नाही


 ये एक चौपाई तुम अपनी बना लो, तो बेड़ा पार करने में फिर और मेहनत नहीं 39:21 करनी पड़ेगी। ये  एक चौपाई तुम अपनी बना लो केवल,

 देखिये सुनिए गुनिये  मन माही


में विचार करने में आ रहा है वो सब मोह मूल है, वास्तव में नहीं है, 39:38 परमार्थ नहीं है, मोरबी में जैसे सब था, 10 मिनट के बाद देखो तो छू हो गया, ऐसे ही 39:45 महाप्रलय में ये जगत पूरा का पूरा छू होता है। 


राम  परवाना  भेजिया वा चत कबीरा रोय

 क्या करूं तेरे वैकुण्ठ को जहां साध संगत नहीं

 स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य नाश होते 40:00 हैं, और सत्संग का अमृत पीने से पाप नाश हो हैं।  स्वर्ग का अमृत पीने से अप्सरा मिलती है, और सत्संग का अमृत पीने से परमात्मा मिलता 40:09 है, जैसे कुत्ते का मास खाने की कोई इच्छा नहीं करता, ऐसे साधक अप्सरा के मास को चूसने 40:15 की इच्छा नहीं करते।  साधक तो सब इंद्रियों को समेट के अपने आत्मा में आ जाता है।   40:21 अजगर का ओशिका करने की कोई इच्छा नहीं करता, अजगर का उसका करने की इच्छा नहीं 40:29 करता, और  अर्थी पर बिस्तर लगा के आराम करने की कोई इच्छा नहीं करता, स्वान के खाल में रखे 40:36 हुए खीर का पान करने की कोई इच्छा नहीं करता।  अथवा तो लोहे के रस को पीकर प्यास 40:42 बुझाने की कोई इच्छा नहीं करता।  ऐसे ही साधक संसार की चीजों को पाकर सुख की इच्छा नहीं 40:50 करता।  बस इतना ही कहना है।  


राम कृष्ण देव को नरेंद्र ने विनती की कि मेरे को कब  होगा? 40:57 कृपा करो बहुत दिन हो गए, राम कृष्ण कहते तू तैरना जानता है चल 41:03 मेरे साथ, ले आए गंगा किनारे।  बोले मार गोता। गोता मार और गर्दन पकड़ दी।  पानी में गर्दन 41:10 पकड़ दी  शिष्य के, शिष्य तो हटा  कटा था, लेकिन श्रद्धा तो हटे कटे को नहीं देखती, श्रद्धा 41:16 तो श्रद्धा है।  पानी में तुम्हारी गर्दन पकड़ ले कोई, क्या होगा यह अनुमान करना है 41:23 सास रुधा देता, निकाला तो लंबी श्वास लेकर गुरु जी की तरफ देखा, कुछ कहना नहीं फरयाद तो 41:31 जग नहीं, यहाँ समर्पण है।  अनकंडीशनल सरेंडर होने की बात थी। अच्छा बेटा तूने गोता तो ठीक मारा, फिर 41:38 से जरा मार, वो  पता कि फिर से मारेंगे  क्या करेंगे, क्या पता।  लेकिन कह रहे हैं गुरु जी 41:43 चलो मार, फिर से गोता मारा।  तो पहले जितनी देर पकड़ रखा उसे कुछ सेकंड ज्यादा पकड़ रखा।  41:51 र छोड़ा तो। .....  बोला बेटा फिर एक 41:59 और मार।  परिस्थितियां  कहती ये  तो मरने का धंधा  है।  जरा ना कह दूँ,  ऊपर का मन कहता है ना कह दू,42:07 व्यवहार कहता है कि कुछ छटकने की बात बता दू।   लेकिन श्रद्धा कहती की चलो जो भी होगा 42:14 साधु ते होवे न कारज हानी।  ब्रह्म ज्ञानी ते कछु बुरा न भया।  साधु के हुए न कारज हानि।   मारा गोता और गर्दन 42:25 पकड़ ली।  पहले की अपेक्षा  दूसरी बार ज्यादा, दूसरों की अपेक्षा तीसरी बार ज्यादा देर 42:31 पकड़ रखी।  महाराज  कितनी देर पकड़नी चाहिए उससे भी ज्यादा देर राम कृष्ण पकड़ रखा।  पकड़ रखा तो, उनका क्या हाल हुआ होगा 42:39 अनुभव करना है तो चलो साबरमती।  अनुभव करना हो तो चले साबरमती  सामने है।  सामने 42:46 है।  क्या होता है, तो अनुमान करो, अनुभव न करो तो अनुमान तो करो।  जब तीसरी बार गुरुदेव ने छोड़ा तो आख 42:55 तो बस, सास कुछ कह रही है, चेहरा कुछ कह रहा है,43:00 रुआं रुआं  कुछ कह रहा है, लेकिन सब कुछ  श्रद्धा ने बांध रखा है।  राम कृष्ण पूछते बेटा क्या हुआ? पहली 43:08 बार, दूसरी बार, और तीसरी बार, बोले गुरुजी बस, यह क्या हो रहा है बस बाहर निकलू , पहले 43:15 तो धक्का मार के बाहर  निकलूँ, फिर श्रद्धा  ने रोका, कैसे भी करके लेकिन बस बाहर निकलू।  बोले दोबारा 43:21 जब गर्दन दबाई तब क्या हुआ? बोले दोबारा भी यही हुआ बाहर निकलूँ।  बाहर गुरुजी अच्छे हैं या बुरे हैं ये  भी याद नहीं आया।  घर जाना या मकान बोले और कुछ, किसी से मिलने की इच्छा इच्छा  बोले ना 43:33 कुछ खाने की, बोले कुछ बनने की इच्छा हुई, बोले ना जगत को सुधारने का विचार आया, बोले 43:38 नहीं, खुद सुधरने का विचार आया बोले नहीं, किसी को मारने का विचार आया, ना मानने का 43:44 विचार आया, ना मरने का विचार आया, ना जीने का विचार आया, बस बाहर निकलू बस।  इधर से 43:50 निकले, उधर से निकलू, अगल से निकलू, बगल से निकलू, बस बाहर आ जाऊ। बोले उस समय उधर 43:56 कोई तेरे को हीरे मोती दे देता तो, बोले गुरुजी कोई बात, बोले कोई राज अभिषेक कर 44:02 देता वह कोई मछली आती, कोई  मच्छ अवतार  आता और बोलता  राज अभिषेक करता हूं, और दो घड़िया 44:07 बैठे, बोले गुरुजी मच्छ अवतार है कि, और कोई अवतार आये , बस बाहर निकलूं।  बोले अच्छा तीसरी बार जब गर्दन दबाई 44:15 तब क्या हुआ? बोले तीसरी बार तो गुरुजी, पहली बार से दूसरी बार ज्यादा,  दूसरी बार से तीसरी बार बस यही हुआ था, बोले तीनों समय को 44:24 एक बार मिला दे ऐसी जब तड़प होगी तब तेरे परमात्मा भीतर दिखाई 44:31 देगी। 


 राजा विक्रमादित्य  जा रहे थे, कोई ब्राह्मण निराश होकर यज्ञ कर रहा था।  क्योंकि 12 साल 44:38 पूरे हो गए यज्ञ करते करते, अभी आदित्य के दर्शन नहीं हुए, विक्रमादित्य  ने पूछा क्या कर रहे हो ब्राह्मण?44:46 बोले राजन मैं यज्ञ करता हूं लेकिन भगवान सूर्यनारायण यहाँ  दिखते, यहाँ  आके प्रकट होते तो क्या फर्क पड़ता। 44:53 मेरा यज्ञ स्वीकार नहीं कर रहे, विक्रमादित्य  ने कहा तेरा यज्ञ स्वीकार नहीं कर रहे हैं, 44:59 तू तेरा यज्ञ तू कर ही नहीं रहा, यज्ञ करे और भगवान प्रकट ना 45:05 हो, देख मैं करता हूं हट जा, अपना जो कुछ नहाने धोने की विधि दे कर के अपना चंदन 45:11 मंदन का तिलक करके, म्यान  में से तलवार निकाल के रख 45:17 दी।  अपने मन को कहा कि देख इधर उधर गया आज 45:22 शाम होते होते भगवान भास्कर नहीं आए तो फिर अग्नि में ये मस्तक जाएगा।  45:31 यज्ञ करते करते शाम क्या होना है शाम के पहले सुबह हो 45:37 गई, सूर्यनारायण प्रकट हुए, दर्शन दिए, बोलते यज्ञ  ऐसा किया जाता है। 


 निश्चित बल 45:44 ही परिस्थितियां लाता है, बाकी ऐसे ऐसे से काम नहीं चलता, तीव्रता हो तो सात दिन काफी है।  एक45:51 मुहूर्त काफी है।  तीव्रता नहीं है इसलिए गुरुओं को मेहनत करना पड़ता है, राग रागिनी ये 45:57 वो प्रसाद, ये  वो कभी न कभी पुण्य बढ़े ताक तीव्रता 46:02 आये,  इंतजारी बेकरारी दर बदर वो घड़िया आती है कि आपको बस चैन नहीं 46:11 पड़ती, तब वो अंदर से प्रकट हो जाता है, ईश्वर को पाने के लिए इतना लंबे चौड़े सत्संग की जरूरत नहीं है।  लेकिन ईश्वर की प्यास पैदा करने के लिए है।  ईश्वर तो अपना आप 46:25 है।  कृष्ण के साथ खड़ा है आदमी फिर भी ईश्वर 46:30 से दूर है वो, अर्जुन जैसा आदमी कृष्ण के साथ खड़ा है।  भगवान के साथ खड़ा, है फिर भी ब्रह्म ज्ञान 46:38 से दूर है।  सुना रहे उपदेश सुना रहे हैं, प्यास नहीं है जब प्यास तीव्र आई तो अब 46:44 मेरे को कुछ नहीं सूझता है, प्रभु अब तुम मेरे को उगारो।  तब ज्ञान का एक शब्द भी लग 46:51 जाता है। 


 तो चित्त जितना जितना मलिन होता है उतना उतना जगत को चाहता है। 46:58और चित जितना जितना शुद्ध होता है, उतना उतना जगत की नश्वरता निहारता है।  और चि जब 47:05 परम शुद्ध होता है तो जगदीश्वर के सिवाय उसके लिए एक सांस भी लंबी हो 47:10 जाती है।  जब चित्त  परम शुद्ध हो जाए, तो जगदीश्वर के अनुभव के सिवा उसकी एक सांस भी उसके 47:16 लिए भारी पड़ती। 

 

 रामतीर्थ रात रात भर रोते थे कि आज की रात चली 47:22 गई।  ध्रुव को पांच वर्ष में, प्रहलाद  को मिला,  मेरा 22 मा साल जा रहा है अभी बाईसवां साल भी 47:30 अंत की घड़ियों में आ रहा है, 22 वा पूरा हो जाएगा।  अरे तीर्थ राम तेरे घर में राम 47:35 छुपा और तूने नहीं देखा,  तुने MA पढ़कर क्या किया? अमुक होकर क्या हुआ? ऐसे करके47:41अपने को कोसते थे, कभी तो भाव भीभोरो तो  कभी रोते थे।  उनकी पत्नी जानती थी कि मेरे पति से क्या वेदना 47:48 है।  पली पना किसीन यार मिल जिसन मिल उना खाना खराब करके मिल खाना पीना हराम हो 47:56 जाता है। 


 हम जब थे तो भोजन 24 घंटे में एक बार करते 48:02 थे वो भी मूंग भिगो के रखते थे, और जल्दी से चढ़ जाए स्नान बन कर लेते उधर उस 48:08 मूंग हुआ करते। अब  सब्जी बबजी नहीं तो कभी आलू डाल दिया, कभी कुछ डाल दिया,  कभी तो 48:13 मूंग कच्चे खा लेते, कभी दाल पी लेते, दाल का पानी पी लेते, इतना समय कौन गवावे  उसको गर्म 48:19 करके। ऐसी तड़प होती है तो गुरु का हृदय  उछल पड़ता है, ऐसे बाप तड़प ना तो 48:27 तड़प 48:33 नथी हां तड़प नहीं है, फिर भी बाबा जी उछलने, बाबा जी तो उछलते रहते हैं, तुम हमें 48:39 तड़प नहीं है, फिर भी बाबा जी उछलते रहते हैं, उछलते रहते हैं तो भी अनुभव नहीं होता 48:44 है, क्यों  कि तड़प नहीं है।  इसलिए उछला हुआ भी माल आकर चला जाता है, थोड़ा मजा दे देता है,48:50 नहीं तो एक उछल में अनुभव हो सकता है।  वो अनुभव नहीं होता झलक आ जाती है , और झलक आ जाती 48:5 7 इसीलिए तो पहुंचते हो तुम,  नहीं तो अहमदावादी 49:06 हाँ कोई डॉक्टर है, कोई वकील है, कोई कुछ है, कोई दो घंटे में सौ रुपया  कमाने वाला है, कोई उस्ताद 49:12 है, कोई कुछ है, इधर आके बैठे चुप करके, रस कर कुछ ना कुछ मिलता है, और मिलता है, अनुभव 49:19 में आता है, तो कुछ ना कुछ पुण्य तो है। 

 

लाखों लाखों आदमी में जिसमें  श्रद्धा नहीं उससे तुम श्रेष्ठ हो, श्रद्धा तो है, लाखों 49:27 लाखों लोगों को श्रद्धा है लेकिन उस श्रद्धा का सदुपयोग नहीं करते तीर्थ में नहीं जाते, उससे वो तीर्थ में जाने वाले अच्छे हैं।  49:34 लाखों लाखों लोग तीर्थ में जाते हैं, लेकिन सत्संग नहीं सुनते, कथा नहीं सुनते, उसे कथा 49:40 वाले श्रेष्ठ  हैं।  लाखों लोग कथा सुनते हैं लेकिन वो  कथा का आध्यात्मिक अर्थ नहीं 49:45 समझते सत्संग नहीं सुनते, कथा सुन लेते हैं।  उससे तो सत्संग सुनने वाला श्रेष्ठ है।  लाखों लोग 49:51 सत्संग सुनते हैं, उससे मनन करने वाला श्रेष्ठ है, लाखों लोग थोड़ा बहुत मनन करते हैं 49:57 उससे तो सत्संग में आनंदित होने वाला श्रेष्ठ है।  अब बाकी इतना इतना है तो बाकी तो थोड़ा ही है।  श्री50:06राम।  जब सत्संग भी सुन रहे हैं, आनंदित भी हो रहे हैं, तो बाकी आनंद को ठहराना ही तो है 50:12और कुछ नहीं। 

 आनंद  ब्रह्म   परमात्मा 

वेद क्या कहते है? परमात्मा कैसा है? ऐसा मत समझना कि दो हाथ पैर वाला आ50:23 जाएगा साक्षात्कार हो जाएगा।  अथवा चार हाथ  ले कर आएगा उसी दिन दर्शन हो जाएगा।  आएगा कुछ 50:29 नहीं हा और जो आएगा तो चला जाएगा आएगा तो यात्रा अधूरी है,


 रूप न रेख न रंग कछु प्रभु त्रे गुना भिन्न जिसे बुझाए नानका सोई प्रसन्न


 जिसका कोई रूप नहीं है, रूप होगा 50:46 तो साकार होगा, मायावी होगा, शुद्ध आत्मा नहीं होगा।  रूप वाला कृष्ण तो था अर्जुन के 50:52 साथ, रूप वाला राम तो रावण ने भी देखा था, फिर भी रावण का क्रोध नहीं गया, रावण की 50:57 मुड़ता नहीं गई।  प्रभु क्या है ?  कि प्रभु तुम्हारे

 दिल तस्वीर है यार जब गर्दन झुका ली मुलाकात कर ली

 ऐसा वो प्रभु उस   है , उस  प्रभु को पाकर एक फकीर अल  मस्त था घूम रहा 51:11 था, घूमते घूमते किसी राज्य में गया द्वारपालों ने रोक 51:16 दिया, बोले महाराज राजा के महल में आप नहीं जा सकते।  बोले मैं 51:22 कोई अलग आदमी थोड़ी हूं।  मैं राजा का साढू हूँ।  बोले बाप जीी तुम51:28सन्यासी राजाना साधू क्या राजा म सू नहीं राजा साहब को तो साली वाली है नहीं51:36 तेरे को क्या पता मुर्ख, जाकर  राजा को बोलो तुम्हारा साढ़ू साहब आया51:42है। है  महाराज एक कोई साधु आए फकीर, सन्यासी और बोलते है कि मैं राजा का साढ़ू हूँ, अब तो राजा51:51को भी आश्चर्य हुआ।  राजा को भी आश्चर्य, मेरा साढ़ू  पत्नी को51:58बुलाया तेरी तू तो बोलती थी  मैं अकेली हूं एक ही बहन है।  मैंने तो देखी नहीं साली, कोई बड़ी साली थी क्या? और मा नहीं बोले नहीं52:05नहीं एक ही हूं मैं एक ही बस एक। एक  ब्रम जैसी हूँ  मैं भी जैसे ब्रह्म एक है, ऐसे मैं भी52:11माता पिता को एक ही हूँ  तो फिर साधु से मिलना पड़ेगा, बुलाओ साधु को, बया बोले बा बोले हा साडू भाई52:20बोले महाराज य हमारी पत्नी के सामने बात ले कर आप आप मेरे को साढ़ू  कैसे मानते? बोले52:27तू मेरा साढ़ू  है।  अपन दोनों साढ़ू  भाई है बोले बाबा जी कैसे?  रानी को बोला तो याद कर 52:35 कोई काका की छोकरी कोई किसी की छोकरी को से कोई 52:41 माता श्री राम मिठी मा का गोल 52:46 ल तो बाबाजी के चेले ने कहा कि बाबा जी ब्रह्मचारी हैं,  श्री राम।  हमारे गुरुजी52:54ब्रह्मचारी कोसी जी52:59फकीर ने कहां ये  चेला भी ठीक कर रहा है, मैं भी ठीक क रहा हूं।  मेरा शिष्य कहता है कि ब्रह्मचारी है गुरुजी वो भी ठीक कह रहा है53:06और मैं कहता तू मेरा साढ़ू है मैं भी ठीक कह रहा हूं।  बोले महाराज ठीक कह  रहे तो कृपा करके53:13टीका कीजिए विवरण कीजिए जरा कथा कीजिए इसका कथन कीजिए।  बोले53:21राजन भगवान की53:27दो शक्तिया है ,  दो बहने हैं।   एक53:33है फकीरी और दूसरी है अमीरी।  अमीरी के साथ तो तूने शादी की, जो53:41अंत में बर्बादी होगी, और फकीरी के साथ हमने शादी की इसलिए आबादी53:46 है, फकीरी के साथ हमने शादी की है उस लिए  आबादी53:55है। 

 हर रोज नई एक शादी है हर रोज मुबारक बाजी है

 जब आशिक मस्त फकीर का हुआ तो फिर क्या दिलगिरी बाबा

  तो जब फकीरी के साथ शादी हो जाती है, तो आप राजाओं के तो बन जाते 54:15 साढ़ू।   जय जय। राजाओं के हो जाते हैं साढ़ू , एक राजा के नहीं सब राजाओ के आप साडू हो जाते हैं।  54:23 साडू भाई।  लेकिन वो छोटे साढू  होते हैं, और तुम होते हो बड़े साढ़ू,  तो बड़े साधू को देना पड़ता है, इसलिए 54:31 फकीर लोग राजा को देते हैं राजाओ की उनको जरूरत नहीं रहती।  फकीर लोग का ज्ञान देती लेती फकीर54:40पर फकीर के इच्छा 

हर रोज नई एक शादी है हर रोज मुबारक बाजी है

 जब आशिक मस्त फकीर हुआ तो फिर क्या दिलगिरी बाबा


 राजन इस हेतु में 54:57 तुम्हारा साडू लगता हूं।  अब साडू की बात मानना चाहिए।  बोलो साडू भाई अब संत साढू  मिलता तो 55:05 चाहिए भी क्या मुसीबत। .....  श्री  राम।


  राजा ने देखा कि महाराज बड़े अलबेले महाराज हैं,  और वास्तव में 55:18 अलबेले थे ,  उनके पास कोई कथाए वार्ता नहीं थी, उनके पास अपना अनुभव छलकता था वही काफी 55:24 था, जब अनुभव लगता है तो और चीजों की जरूरत पड़ती है।  कहानिया कथाए कितनी भी सुने उससे काम 55:33 नहीं चलता, कथा और कहानियों के पीछे अपना आध्यात्मिक फ़ोर्स  होता है।  सच पूछो 55:40 तो ये  कहानी कोई शास्त्र में नहीं कोई शास्त्र में साढू  की कथा नहीं है।  लेकिन कहने 55:47 वाले का अपना फोर्स है, अपना स्वाद है, अपनी अनुभूति है, राजा सरेंडर हो गया, राजा का 55:54 कल्याण का रास्ता मिल गया। 55:59 कोई महात्मा अधिक पढा है इसलिए बड़ा है, ना ना किसी के पास अधिक शिष्य इसलिए बड़ा 56:06 है? कभी नहीं।  अधिक मठ मंदिर है, उस लिए बड़ा है ना ना।  अधिक उम्र का उस लिए बड़ा है , 56:12 ना ना लेकिन उसकी ऐसी कोई घड़िया की ईश्वर के लिए उसको अधिक प्यास रही होगी।  ऐसी 56:19 प्यास रही होगी कि उस प्यास में व स्वयं खो गया होगा, जब स्वयं खो गया होगा तो फिर वो  अनंत 56:26 हो गया होगा।  इसलिए व बड़ा है। 


 एक कोई वेदांती था 56:32 गृहस्थ जीवन में भी साक्षात्कार होता है।  कईयो को होता है।  पहले ऋषि मुनि तो ग्रहस्ती 56:37 हुआ करते थे।  तो शंकराचार्य के बाद दश नामी चले और सन्यासी वैरागी त्यागी पुरी गिरी य 56:46 सब चला।  आद शंकराचार्य के बाद ही ये  सब 56:51 ज्यादा विस्तार हुआ।  सन्यास का तो मर्यादित था।  वशिष्ठ भी ऐसे ऋषि जीवन में 56:59 साक्षात्कार।  ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओम ओ ओ ओ ओ 57:06 ओ ओ

 बहुत बढ़िया बात थी क्या बात, वेदांती 57:16 था गृहस्ती उसके पास कोई आदमी 57:23 आया, ज्ञानी में और अज्ञानी में क्या  फर्क होता है, इसको पूछना था।  वो वेदांती सब्जी लेने 57:30 गया था, वो संत जो थे संत कह देंगे।  क्योंकि उसके मन की वासना शांत हो गई इसलिए संत।  57:38 उसको काका भी कह दो।  वो काका सब्जी लेने गया था और कोई आदमी जिज्ञासु  उससे प्रश्न पूछने गए उसके घर 57:46 पहुंचा।  बैठ गया पलंग पे टांग प टांग चढ़ा के सेठ हो 57:53 वो जब आए संत, काका जब आए तो काका से पूछता 58:01 है कि टोपन दास आप बताओ मेरे को ईश्वर में और जीव में क्या फर्क 58:09 है।  ज्ञानी में और अज्ञानी में क्या फासला है।  जीवात्मा और परमात्मा में क्या फासला 58:15 है।  ब्रह्मवेता और जगतवेता में क्या फासला है बताओ।  उस ज्ञानी ने सीधा जवाब ना देते हुए 58:22 उन्होंने देखा कि भाषा ऐसी वापरता कि बड़ा विद्वान है।  अब इससे विद्वता से काम नहीं चलेगा 58:28 प्रैक्टिकल से काम चलेगा। उसने सीधा जवाब ना देते हुए अपने नौकर को खूब 58:35 डाटा। कहाँ  है महाराज नौकर को डांटा तो उसकी पेंट गीली हो 58:42 गई, जीव का स्वभाव होता है भय।   और सुरका उतर के नीचे बैठ 58:50 गया।  जो पलंग में बैठा था ना उतर के नीचे बैठ गया हाथ जोड़ के  सुकड़ गया।  58:58 टोपन दास सिंहासन पर बैठकर बोलते हैं, कि इसका नाम है ब्रह्म, और इसका नाम है 59:05  जीव इसका नाम है जिव। इसका नाम है ब्रह्म,  इसका नाम है शिव, 59:12 और उसका नाम है जीव, बोले ये कैसे, जैसे तुम्हारे हाथ से भले ठीक है, लेकिन 59:18 परिस्थितियों से जो भयभीत हो जाए ये  जीव है, और परिस्थितियों में जो अडिग है  उसका नाम शिव है।  59:26 


धीरो न द्वेष्टि संसारमा- त्मानं न दिदृक्षति।

हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति॥१८- ८३॥ (अष्टावक्र गीता अध्याय १८)

 तुम्हारे मारने से वो  मरता नहीं, और तुम्हारे जलाने से व जीता नहीं।  तुम्हारी 59:39 प्रशंसा करने से व बढ़ता नहीं और तुम्हारी निंदा से व उतरता नहीं उसका नाम है ब्रह्म 59:46 बेता। 

 दिल में दे धारे कसा दुनिया हालत जो करे परद जनी 59:57 बो च जरा बाहरी बाग वांग रहे दिलशाद तो ज्ञानी 1:00:04 रही लोडन में लोडन खा रहे आजाद तो ज्ञानी लोडो में रहते हुए जुलो में रहते हुए 1:00:12 संसार में रहते हुए संसार के आयात और प्रतिघात में रहते हुए भी उसके चित्त में 1:00:17 कभी भी क्षोभ  नहीं होता।  क्योंकि वो समझता है 

 यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।

 नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।



 ये लोक श्री कृष्ण उद्धव को समझा रहे 1:00:54 हैं।





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