जीवन जब भयंकर दुखों से घिरा हो तो क्या करना चाहिए?
0:16 एक लड़की ने ठान लिया कि मैं तो पहले आत्म 0:19 विद्या पाऊंगी, जिससे सारे दुख सदा के लिए 0:23 मिट जाए और परमात्मा का साक्षात्कार हो 0:25 जाए। तो उसने तो सत्संग किया अनुष्ठान 0:29 किया। वो करके साक्षात्कार हुआ। फिर वो तो 0:32 बड़े घर राज कन्या थी तो उसकी शादी हो गई। 0:36 उसका नाम था मदालसा। 0:40 शादी हो गई तो उसने सोचा कि मेरे पेट से 0:43 जो बालक जन्माए वह फिर अज्ञानी कैसे रहे? 0:45 दूसरे फिर जन्मे मरे और यह भगवान बड़ा वो 0:49 भगवान बड़ा ये तो सब कर रहे हैं। लेकिन 0:51 आत्मा भगवान का ज्ञान मैं अपने बच्चों को 0:53 देके उन्हीं को भगवत रूप बनाऊंगी। तो एक 0:57 बेटे को उपदेश देकर साक्षात्कारी बना दिया 0:59 मादालसा ने, दूसरे बेटे को भी। और दूध पी, 1:05 बच्चे दूध पीते हैं ना उन्हीं को बोलते तू 1:07 शुद्ध है, तू अमर है, तू आत्मा है, तू चेतन 1:10 है, मरने वाला शरीर तू नहीं है, बदलने वाला 1:14 मन तू नहीं है, बदलने वाली बुद्धि तू नहीं 1:17 है, तू चित नहीं है, तू अहंकार नहीं है, तू 1:20 चैतन्य आत्मा है, अमर है अपनी अमरता को 1:23 जानना बेटा। ऐसा बोलती जाती, हाथ घुमाती जाती, दूध 1:27 पिलाती जाती। 1:29 फिर लोरी देती तो भी ऐसी बातें बताती। 1:32 बच्चे जब समझदार होते तो उनको आत्मज्ञान 1:34 से भरपूर कर देते और थोड़ा पढ़ लिख के 1:37 बच्चे साक्षात्कार ( करा) के महापुरुष ( बनादेति ऐसा ) एक दो तीन 1:41 चार जब पांचवा लड़का था अलरक। 1:45 उसको ऐसा उपदेश देने लगे तो राजा ने बोला 1:48 ये तो सब स्वतंत्र महापुरुष हो जाते, इसको 1:52 तो यह आत्मविद्या नहीं दो नहीं तो राज काज 1:56 कौन संभालेगा बोझा ? 1:59 तो उसको थोड़ा ज्ञान दिया थोड़ा ऐसे ही 2:02 रखा।
लेकिन मां तो मां होती है। अब मां जब 2:05 बुड्ढ हो गई अब देखा कि कभी भी शरीर मर 2:09 जाएगा और मेरे बेटे को तो अभी आत्मा का 2:11 पूरा ज्ञान नहीं हुआ तो उसको तो दुख होगा। 2:14 राज काज में तो राज संभाले। तो मां ने क्या 2:18 करा कुछ चिट्ठी लिखी थोड़ा सा कागज और 2:21 ताबीज में डाल दिया और अलर्क को दे दिया। 2:24 बेटा बेटा जब कोई मुसीबत आ जाए और उसका 2:28 कोई रास्ता नहीं निकले तब यह ताबीज खोलना 2:31 मुसीबत से बाहर जाने के लिए। 2:36 मां तो मर गई अलरख राज करने लगा, अब ऐसा कोई 2:40 राज है क्या, जिसको चिंता ना आवे दुख ना 2:43 आवे , 2:45 टेंशन ना आवे ? ऐसा कोई धनी है जिसको टेंशन 2:48 नहीं होवे? ऐसा कोई अज्ञानी है( टेंसन न हो )। जिसको आत्मा 2:52 का ज्ञान हो उसके पास तो धन टेंशन नहीं 2:54 करेगा। रहेगा लेकिन जिसको आत्मा का ज्ञान 2:57 नहीं वह धनी हो, सत्तावान हो, कुछ ना कुछ तो 2:59 चिंता रहेगी ना? 3:02 अब भाइयों ने देखा कि हमारा भाई आत्मा 3:06 साक्षात्कार नहीं किया हमारी मां का तो 3:09 उद्देश्य था सब बेटों को कराऊंगी लेकिन यह 3:12 हमारा छोटा भाई रह गया। अब क्या करें ? अब 3:16 इसको उपदेश देंगे तो मानेगा नहीं। क्योंकि 3:19 राजा बना है। तो बिना मुसीबत के 3:23 ये संत के पास पास जाने वाला नहीं है। तो 3:26 चारों भाइयों ने काशी के राजा को 3:30 बोला कि तुम हमको फौज दो। हमारे को अपने 3:34 भाई पर लड़ाई करने का नाटक करना है। अरे 3:37 बोले बाप जी आप जो, गुरु महाराज है, जो आप 3:40 जो आज्ञा करते। तो अलरक का राज तो छोटा था और 3:43 काशी नरेश के तो बड़ी फौज थी। बड़ा सेना। 3:46 और जब चारों तरफ अलरक के प्रांत को घेरा 3:50 तो अलरक घबराया। बोले हमारे चार भाई और 3:53 काशी नरेश मिलकर हमारे से युद्ध करते तो 3:56 मैं कहां जाऊंगा, कैसा करूं, क्या करूं, बड़ा 4:00 दुखी हुआ। और हमारे भाई को क्या करें तो 4:04 फिर सोचा दुखदख में सोचा कि अब क्या करूं, 4:07 क्या करूं तो याद आया कि मां ने बोला जब 4:09 बहुत दुख पड़े तो ये तावीज खोलना और तावीज 4:13 खोला तो उसमें चिट्ठी में लिखा था कि दुख 4:15 पड़े तो संत शरण जाइए। दुख पड़े तो संत 4:19 शरण जाइए। 4:22
तो देखा कि अभी संत गोरखनाथ संत 4:26 के पास हो गए। गोरखनाथ संत। गोरखनाथ का नाम 4:30 सुना है ना? तो संत गोरख गुरु गोरखनाथ के 4:33 पास गए। महाराज मैं तो बहुत दुखी हूं मेरे 4:36 भाई और काशी नरेश मिलकर मेरे पर बस वार 4:41 करते हैं। मैं कहीं का नहीं रहूंगा। आगे 4:43 ऐसे करूंगा। तो क्या बात है कि? बोले मैं 4:46 बहुत दुखी हूं। बोले अच्छा तो दुखी है तू ? 4:49 ठहरो। वह धोना जल रहा था उसमें चिमटा डाल 4:53 दिया। चिमटा जब तप के लाल हो गया तो कपड़े 4:56 से पकड़ के बोले तुम्हारे दिल में दुख है 4:58 ना, हटाओ हाथ हटाओ हम दुख को मारते। बोले 5:02 “महाराज इसमें तो, अरे दिल में दुख काहे का है 5:05 जरा खोजो ना नहीं तो लगाता हूं,काहे 5:07 का दुख है बोल ? बहुत कहां दुख है ? रहता है? दुख पहले 5:11 नहीं था, आया है ना तो किस बात का आया है 5:15 कैसे है दुख? तू दुखी है कि दुख आया है बोल, 5:20 बोल। तू दुखी है? दुख नहीं था तभी तू था कि 5:23 नहीं था? बोले महाराज था। और दुख जाएगा तो 5:27 तू रहेगा ना? (जी ) रहूंगा। तो अभी अभी दुख कहां 5:30 है? बोलो नहीं तो फिर इधर जहां हृदय में 5:33 दुख है तो मारता हूं। खोजो दुख कैसा है? 5:36 तो अलरक को तो अकल तो था। 5:40 बोले यह राज बना रहे और मैं शरीर भी बना 5:44 रहे। इसी कारण दुख है। और राज सदा रहने वाला 5:49 नहीं। शरीर सदा रहने वाला नहीं। महाराज यह 5:52 बेवकूफी के कारण दुख है और मैं सदा रहने 5:56 वाला आत्मा हूं लेकिन अभी आत्मा को जानता 5:58 नहीं महाराज। तो बोले आत्मा को नहीं जानता 6:02 है तो नहीं जानने को कौन जानता है? खो जो। 6:10 तो नहीं जानने को कौन जानता है? 6:23 ध्यान लग गया।
नहीं जानने को जो जानता है। 6:26 उस आत्मा परमात्मा में अलग विश्रांति मिल 6:30 गई। 6:35 आंखों में चमक आ गई। चेहरे पर प्रसन्नता आ 6:39 गई। गुरु महाराज को प्रणाम किया। महाराज 6:44 सदा के लिए दुख मिट गए। अब तो मौत भी 6:47 मेरे को दुखी नहीं कर सकती आपकी दया से 6:50 आत्मविद्या 6:52 का प्रकाश हुआ। 6:55 यह राजा हूं, मैं यह हूं। ऐसा राज तो जाने 6:59 वाला शरीर जाने वाला उसी को पकड़ के सुखी 7:01 रहने में मैं थक गया। भाइयों को संदेशा 7:05 भेजा कि इतना दिन तो मैंने संभाला। अब तुम 7:07 ले लो राज। संभालो। अब भाई लोग आए गले 7:11 लगाया। बोले हमें राज बीज नहीं चाहिए। 7:13 तेरे को तो आत्मराज मिले इसलिए हमने नाटक 7:16 किया था। अब अलरख तू जीवन मुक्त होकर राज 7:18 करो। अब तेरे को क्या है? अब तेरे को राज 7:20 बंधन नहीं है। औ तेरी आसक्ति बंधन थी। तू 7:24 अपने को नहीं जानता था और शरीर को मैं 7:26 मानता था तू अपने को जान लिया अब तेरे लिए 7:29 क्या है राज? खूब करो अब। तो पहले से भी 7:32 अच्छा राज करने लग गया। 7:35 आत्मराज पा लिया तो बाहर का राज में तो 7:37 कुछ भी नहीं। आसक्ति नहीं। परहित के लिए 7:41 क्या फर्क पड़ता है अपने लिए करते आसक्ति 7:44 तभी चिंता होती है, दुख होता है। 7:48 अपने को जो चाहिए वह तो हम है। उसको तो 7:51 मौत का बाप भी नहीं छीन सकता है। और जिसको 7:54 संभाल नहीं सकते उसको किसी भी प्रकार से 7:57 तो छोड़ना ही है। तो फिर काहे को उसमें 7:59 आसक्ति करो। 8:04 जो अपने को चाहिए वह तो अपन है। अमर आत्मा 8:09 चैतन्य और जो मर जाने वाला है उसको तो कोई 8:12 सदा रख भी नहीं सकता। 8:16 फिर काहे को डरना काहे को आसक्ति करना 8:19 धर्म के अनुसार व्यवहार हो बाकी डरना काहे 8:21 को? 8:23 अपने को चाहिए सत चित्त आनंद आत्मा परमात्मा। 8:28 और वह तो आत्मा परमात्मा जाने वाला नहीं 8:31 है। मौत भी उसको थोड़ी मारती है? मौत तो असत 8:35 जड़ दुख रूप शरीर को मारेगी।
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष, गुरुवर कार्य रहे ना शेष
मोह कभी ना ठग सके इच्छा नहीं लवलेश, मोह कभी ना ठग सके इच्छा नहीं लवलेश
पूर्ण गुरु कृपा मिली पूर्ण गुरु का ज्ञान, गुरुवर पूर्ण गुरु का ज्ञान
आसूमल से हो गए साईं आसाराम , आसुमल से हो गए साईं आसाराम”
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