मंगलवार, 27 मई 2025

Divya Shraddha - दिव्य श्रद्धा




    

divya shraddha pvt 


         शरीर तब तक भारी रहता 1:42 है जब तक 1:45 उसमें कफ और वायु 1:48 की विपुलता रहती 1:53 है, कफ और वायु अधिक होता है तो शरीर आलसी 1:58 और भारी रहता है, 2:02 शरीर भारी तब तक रहता जब तक कफ और वायु का 2:05 प्रमाण अधिक है, वात  प्रकृति और कफ 2:12 प्रकृति, आसन स्थिर करने 2:16 से, एक ही आसन पर बैठने 2:23 से, शरीर में विद्युत प्रकट होती है, जो कफ 2:26 को और वायु को कंट्रोल करके शरीर को 2:29 आरोग्यता  देती है , 2:30  2:32 शरीर में बिजली पैदा होती है वह आरोग्यता 2:35 की रक्षा करती है, शरीर हल्का लगता है, 2:37 स्फूर्ति वाला लगता 2:43 है, क्रिया करने से विद्युत खर्च होती है, 2:50 और स्थिर आसन पर 2:56 बैठकर धारणा करने से ध्यान करने से 2:59 विद्युत बढ़ती 3:02 है, बिजली बढ़ती 3:05 है, और विद्युत तत्व बढ़ने से शरीर निरोग 3:09 रहता है, मन स्फूर्ति में रहता 3:16 है,




         संसार से वैराग्य होना कठिन 3:23 है, वैराग्य हो भी जाए तो कर्मकांड 3:28 से 3:36  मन उठना कठिन 3:39 है, कर्मकांड से उठ भी 3:44 गए तो ध्यान में लगना मन का कठिन 3:49 है ध्यान में लग 3:54 गए तत्व ज्ञानी गुरु मिलना 3:58 कठिन तत्व ज्ञानी गुरु मिल भी गए तो उनमें 4:02 श्रद्धा होना कठिन 4:05 है श्रद्धा हो भी गई तो उनमें श्रद्धा 4:08 टिकना कठिन 4:11 है, तामसी श्रद्धा होती है तो कदम कदम पर 4:15 फरयाद 4:18 करती तामसी श्रद्धा में समर्पण नहीं होता 4:21


        है भ्रांति होती है समर्पण 4:25 की, तामसी श्रद्धा विरोध करती, 4:31 राजसी श्रद्धा हिलती रहती है, और भाग जाती 4:35 है, किनारे लग जाती 4:38 है, और सात्विक श्रद्धा होती 4:43है तो चाहे गुरु के तरफ से कैसे भी कसोटी 4:47 हो किसी भी प्रकार की परीक्षा 4:51 हो तो सात्विक श्रद्धा वाला धन्यवाद से4:54 अहो भाव से 4:56 भरकर स्वीकृति दे देगा, 5:01 संसार से वैराग्य होना 5:05 कठिन वैराग्य हो गया तो कर्मकांड छूटना 5:09 कठिन कर्मकांड छूट गया तो उपासना में मन  लगना भी 5:14 कठिन उपासना में मन लग गया तो तत्व ज्ञानी 5:19 ब्रह्म ज्ञानी गुरुओं का मिलना 5:22 कठिन तत्व ज्ञानी गुरुओं का मिलना अभी हो 5:26 गया तो उनमें श्रद्धा टिकना कठिन5:30 क्योंकि प्राय राजसी और तामसी श्रद्धा 5:33 वाले लोग बहुत होते हैं तामसी श्रद्धा कदम 5:38 कदम पर इंकार करेगी विरोध करेगी अपना अहम 5:42 नहीं छोड़ेगी 5:44 और श्रद्ध के साथ इष्ट के साथ गुरु के साथ 5:48 विरोध करेगी, तामसी श्रद्धा होगी तो, राजसी 5:52 श्रद्धा होगी 5:53 तो जरा सा परीक्षा हुई या थोड़ा सा खड़ा 5:57 या तो राजसी श्रद्धा वाला किनारे हो जाएगा 6:00 भाग 6:02 जाएगा और सात्विक श्रद्धा होगी तो श्रद्ध 6:06 के तरफ से हमारे उत्थान के लिए चाहे कैसी 6:11 भी कसोटी हो चाहे कैसे भी साधन वजन की 6:16 पद्धतियां हो प्रयोग हो व्यवहार हो अगर 6:20 सात्विक श्रद्धा 6:22है तो वह तत्व वेता गुरुओं के तरफ से 6:26 मिलने वाली तमाम साधना पद्धति अथवा चार 6:30 व्यवहार जो 6:31 भी व अहो भाव से वाहवा 6:35 धन्यवाद उसे फरियाद नहीं होगी उसे 6:39 प्रतिक्रिया नहीं 6:41 होगी सात्त्विक 6:44 श्रद्धा हो गया तो फिर तत्व विचार में मन 6:48 लग जाता 6:50 है नहीं तो तत्व ज्ञानी गुरु मिलने के बाद 6:53 भी तत्व ज्ञान में मन लगना कठिन 6:58 है 7:00 आत्म साक्षात्कार गुरु मिल जाए और उसमें 7:02 श्रद्धा हो जाए तो जरूरी नहीं कि सब लोग 7:06 आत्म ज्ञान के तरफ चल 7:08 पड़े नहीं राजसी श्रद्धा तामसी श्रद्धा 7:12 वाला आत्म ज्ञान के तरफ नहीं चल 7:14 सकता व तत्व ज्ञानी गुरुओं का सानिध्य  पाकर 7:18 अपनी इच्छा के अनुसार फायदा लेना चाहेगा, 7:21 लेकिन जो वास्तविक फायदा है, जो तत्व 7:24 ज्ञानी गुरु देना चाहते 7:27 हैं, उससे वो वंचित रह जाएगा,  7:31 सात्विक श्रद्धा वाला होता है उसको ही 7:33 तत्व ज्ञान का अधिकारी माना गया, और वही 7:38 तत्व ज्ञान पर्यंत गुरु 7:41 में अडिग श्रद्धा,


         जैसे संदीपक की थी 7:47 भगवान विष्णु आए वरदान देने के 7:50 लिए नहीं लिया, भगवान शिव आए वरदान नहीं 7:55 लिया, गुरु ने कोड़ी का रूप धारण कर लिया, 7:59 बुरी तरह परीक्षाएं की, पीट देता था, मार 8:03 देते थे   8:04 चाटा, फिर भी वो  गुरु के शरीर से निकलने 8:08 वाला गंदा खून, कोड़ की बीमारी से आने वाली 8:14 बदबू, मवाद फिर भी संदीपक  का चित्त कभी शुभ 8:20 नहीं करता था, उबता नहीं 8:25 था, 


        ऐसे विवेकानंद की सात्विक श्रद्धा थी 8:28 तो राम कृष्ण देव 8:31 में, अहो भाव बना रहा और जब राजसी श्रद्धा 8:34 हो जाती तो कभी हिल जाती ऐसे छह बार 8:37 नरेंद्र की श्रद्धा हिली 8:40 थी, 


        आत्मज्ञानी गुरु मिल जाना कठिन है, 8:43 आत्मज्ञानी गुरु मिल जाए तो उसमें श्रद्धा 8:46 टिकना सतत कठिन 8:49 है, क्योंकि श्रद्धा रजस और तमस गुण से 8:52 प्रभावित हो जाती है तो हिलती जाती है या 8:55 विरोध कर लेती 8:58 है, इसलिए जीवन में सत्व गुण बढ़ना 9:02 चाहिए, आहार की शुद्धि से, चिंतन की शुद्धि 9:07 से, सत्व गुण  की रक्षा की 9:10 जाती है, अशुद्ध आहार अशुद्ध व्यक्तियों 9:14 विचारों वाले व्यक्तियों का संग साधन के तरफ 9:18 लापरवाही रखने से श्रद्धा का घटना बढ़ना 9:22 टूटना कुटना होता रहता है, इसलिए 9:26 साधक साध्य तक पहुंचने में उसे वर्षों गुजर  9:29 जाते हैं, कभी-कभी तो पूरा जन्म गुजर जाता 9:32 है, फिर भी साक्षात्कार नहीं कर पाते 9:35 हैं, हकीकत में छ महीना 9:40 अगर ठीक से साधना की जाए खाली छ 9:44 महीना, फक्त छ महीना ठीक से साधना की जाए 9:48 तो संसार 9:50 की वस्तुएं और संसार आकर्षित होने लगता 9:54 है, सूक्ष्म जगत की कुंजियां हाथ में आने 9:58 लगती है, 10:00 छ महीना अगर सात्विक श्रद्धा से ठीक साधन किया जाए तो बहुत आदमी ऊंचे उठ जाता 10:13 है, रजोगुण तमोगुण 10:17 से बचकर जब सत्व गुण बढ़ता है, तो तत्व 10:21 ज्ञानी गुरुओं के ज्ञान 10:24 में आदमी प्रविष्ट होता 10:27 है, तत्व ज्ञान का अभ्यास करने की आवश्यकता 10:31 नहीं 10:32 रहती,  अभ्यास तो भजन करने का है, और अभ्यास 10:36 तो श्रद्धा को सात्विक बनाने का 10:42 है, 10:45 अभ्यास भजन का अभ्यास बढ़ने से सत्व गुण 10:48 बढ़ने से विचार अपने आप उत्पन्न होता, 10:53 है महाराज ऐसा 10:56 विचार उत्पन्न करने के लिए भी भजन में 11:00 सातत्य होना चाहिए, और श्रद्धा की सुरक्षा 11:03 में सतर्क होना चाहिए, इष्ट में भगवान में 11:07 गुरु में 11:09 श्रद्धा, श्रद्धा हो गई तत्व ज्ञान में गति 11:13 करना, 


        तत्व ज्ञान तो कईयों को मिल जाता है 11:17 लेकिन उस तत्व ज्ञान में स्थिति नहीं 11:21 करते, और स्थिति करते हैं तो ब्रह्माकार 11:25 वृत्ति उत्पन्न करने 11:28 की खबर हम नहीं रख पाते 11:31 हैं, ब्रह्माकार  वृत्ति उत्पन्न हो 11:34 जाए, साक्षात्कार होता 11:37 है, साक्षात्कार करने के बाद 11:43 भी अगर उपासना  तगड़ी नहीं किया और गुरु 11:48 कृपा से जल्दी हो गया साक्षात्कार तब भी 11:53 भी विक्षेप रहेगा, मनोराज आने की संभावना है, 12:00 इसलिए साक्षात्कार के बाद 12:04 भी, ब्रह्म अभ्यास करने में लगे रहते हैं 12:08 बुद्धिमान उच्च कोटि के 12:13 साधक, साक्षात्कार करने के बाद भी भजन में 12:17 अथवा ब्रह्मा अभ्यास में ब्रह्मानंद में 12:19 लगे रहना यह साक्षात्कारी की शोभा 12:23 है,


         अब जिन महापुरुषों को परमात्मा का 12:27 साक्षात्कार हो जाता 12:33 वे, वे भी ध्यान भजन में और शुद्धि में 12:39 ध्यान रखें, रखते 12:42 हैं, तो हम लोग अगर लापरवाही कर दे तो हमने 12:47 तो अपने पुण्यं की कबर ही खोद 12:51 दी, इसलिए जीवन में जितना उत्साह होगा 12:56 सतर्कता होगी और जीवन दाता  का मूल्य 13:01 समझेंगे, उतना ही 13:04 यात्रा उच्च कोटि के 13:09 होगी, ब्रह्माकार  वृति उत्पन्न होना यह भी 13:13 ईश्वर की कृपा है, सात्विक श्रद्धा होगी तब 13:17 आदमी ईमानदारी से अपने अहम को परमात्मा 13:21 में अर्पित 13:24 होगा,


         तुलसीदास जी ने कहा यह फल साधन ते न 13:28 होई, 13:29   यह जो ब्रह्म ज्ञान का फल है वह साधन से 13:34 प्रकट नहीं होगा, साधन करते करते सात्विक 13:37 श्रद्धा तैयार होती है, और सात्विक श्रद्धा 13:42 ही अपने तत्व में इष्ट में अपने आप को 13:46 अर्पित करने को तैयार हो 13:48  13:49 जाती है, जैसे 13:52 लोहा अग्नि की वाहवाही तो करे, अग्नि के 13:55 वखाण तो करे, अग्नि को नमस्कार तो करे, 14:00 लेकिन तब तक लोहा अग्नि नहीं होता जब तक 14:03 लोहा अपने आप को अग्नि में अर्पित नहीं कर 14:06 देता 14:07 है, लोहा अग्नि के बठठे में अर्पित होते ही 14:11 उसके रग रग में अग्नि प्रविष्ट हो जाती है 14:14 व लोहा अग्नि का ही एक पुंज दिखता 14:18 है,


         ऐसे ही जीव उस ब्रह्म स्वरूप में अपने 14:23 आप को जब तक अर्पित नहीं करता, तब तक भले 14:26 भगवान के गीत गाए जाए, 14:29 गुरु के गीत गाए जाए, गुण अनुवाद किए जाए, 14:33 लाभ तो होगा, लेकिन गुरु मय, भगवत मय तब तक 14:37 नहीं होगा, जब तक अपने मैं को ईश्वर में 14:41 गुरु में अर्पित नहीं कर देता, ईश्वर और 14:44 गुरु शब्द दो है, बाकी एक ही तत्व होता 14:48 है, ईश्वर गुरु रामती मूर्ति भेदे  विभागिनो 14:52 मूर्ति से दो दिखते हैं, मूर्तिया अलग-अलग 14:55 है, आकृति अलग अलग दिखती है, बाकी ईश्वर और 14:57 गुरु एक ही चीज है ,  गुरु के हृदय में जो 15:00 चैतन्य है चमका है, वही ईश्वर के हृदय में 15:03 प्रकट हुआ है,


         ईश्वर भी, अगर परम कल्याण 15:07 करना चाहते हैं तो गुरु का रूप लेकर 15:09 उपदेशक का रूप लेकर भगवान कल्याण करेंगे,, 15:12 परम कल्याण संसार का आशीर्वाद तो भगवान 15:17 ऐसे ही दे देंगे, लेकिन जब साक्षात्कार 15:19 कराना होगा तो भगवान को भी आचार्य की गादी 15:22 पर बैठना पड़ेगा, आचार्य पद के ढंग से 15:26 उपदेश देंगे भगवान, जैसे श्री कृष्ण ने 15:29 अर्जुन को उपदेश दिया, श्री रामचंद्र जी ने 15:32 हनुमान जी को ब्रह्म ज्ञान का उपदेश 15:38 दिया,


         और साधक भजन करते 15:44 हैं भजन की तीव्रता से भाव मजबूत हो जाता 15:49 है, और भाव के बल 15:50 से, अपने भाव के अनुसार संसार में चमत्कार 15:55 भी कर लेता है, भाव की दृढ़ता से, 16:01 भाव पराकाष्ठा नहीं है, भाव बदलते रहते 16:06 हैं, पराकाष्ठा ब्रह्माकार  वृत्ति उत्पन्न 16:09 करके साक्षात्कार 16:11 करना, तो साधन भजन में 16:17 उत्साह और जगत 16:19 में नश्वर 16:22 बुद्धि और लक्ष्य की ऊंचे लक्ष्य की हमेशा 16:26 स्मृति ये साधक को बना देगा, अगर ऊंचे लक्ष्य 16:31 का पता ही नहीं, आत्म साक्षात्कार के 16:34 लक्ष्य का पता ही 16:36 नहीं, ब्रह्माकार  वृति उत्पन्न करके आवरण 16:40 भंग करना और साक्षात्कार कर, करके जीवन 16:44 मुक्त होने का अगर जीवन में लक्ष्य नहीं 16:46 है, तो छोटी मोटी साधना में छोटी मोटी 16:50 पद्धतियों में आदमी रुका ही रहेगा, कोलू  के 16:52 बैल जैसा वही जिंदगी पूरी कर देगा,


         मैंने 16:56 अर्ज किया था ना कि संसार से वैराग्य होना 16:58 कठिन है, 16:59 वैराग्य हुआ तो फिर कर्मकांड से मन उठना 17:03 कठिन है, कर्मकांड से मन उठ गया तो उपासना 17:06 में लगना कठिन है, उपासना में लग गया तभी 17:09 तत्व ज्ञानी गुरुओं को खोजना कठिन है, तत्व 17:12 ज्ञानी गुरुओं का मेलाप भी हो गया तो 17:15 उनमें श्रद्धा टिकना कठिन है, उनमें 17:17 श्रद्धा महाराज हो भी गई, श्रद्धा तो हो भी 17:21 जाती है लेकिन टिकी रहे, ये बड़ा कठिन है, 17:24 और श्रद्धा टिकाई तभी भी तत्व ज्ञान के 17:27 प्रति प्रीति होना कठिन, 17:29 तत्त्वज्ञान हो गया तो उसमें स्थिति होना 17:31 कठिन है, स्थिति हो गई महाराज तो ब्रह्मा 17:35 का वृत्ति करके आवरण भंग करके जीवन मुक्त 17:38 पद पे  पहुंचना, परम 17:41 पुरुषार्थ है, 


        अगर सावधानी से छ महीने तक 17:45 आदमी ठीक ढंग से उपासना करे, ठीक ढंग से, 17:50 तत्व ज्ञानी गुरुओं के ज्ञान को 17:53 विचारे, तो उसके मन 17:56 का संकल्प विकल्प कम होने  लगता है संसार का 18:00 आकर्षण कम होने लगता है, और उसके चित्त में 18:02 विश्रांति आने 18:04 लगती है, उससे संसार की सफलताएं आकर्षित होने 18:08 लगती है, संसार आकर्षित होने लगता है, संसार 18:12 माना क्या जो सरकने वाली चीजें हैं यह 18:15 संसार की जो भी चीजें व सरकने वाली वे उस 18:18 साधक से आकर्षित होने 18:22 लगते फिर 18:25 उसे रोजी रोटी ये वो कुटुम्बी  संबंधी समाज के18:30 दूसरे लोगों को रिझाने के लिए नाक रगड़ना 18:33 नहीं पड़ेगा, वे लोग तो ऐसे ही रिझने को 18:36 तैयार हो 18:38 जाएंगे,  खाली छ महीना ठीक ढंग18:42 से साधन में लगे रहे,  तो सारी जिंदगी की मजूरी 18:46 से जो नहीं पाया, वह छ महीने में तो वह 18:49 पाएगा, लेकिन साधक के लिए तो वह भी तुच्छ 18:51 हो जाता है उसका लक्ष्य साध्य है ऊंचे में 18:54 ऊंचा आत्म 18:57 साक्षात्कार 


 source Divya sraddha - private video


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रविवार, 25 मई 2025

Guru Bin Mite N Bhed - गुरु बिन मिटे न भेद

 

 


सत्संग सारांश

जबतक अंत-करण में भेद मौजूद होगा तब तक मुक्ति का अनुभव नहीं होगा , मोक्ष का सुख नहीं मिले गा | यहाँ पर जिस भेद  बताया गया है  

  • जिव - जिव का भेद

  • जिव - जड़ का भेद  

  • जड़ चेतन का भेद 

  • जिव - ईश्वर का भेद 

  • जिव - ब्रम्ह का भेद 


वह ब्रम्ह परमात्मा  सजातीय, विजातीय और स्वगत भेद से रहित है |


  1. सजातीय ,- अर्थात जैसे ब्राह्मण-ब्राह्मण सजातीय अर्थात उसके बराबर और कोई दूसरा ऐसा ब्रह्म में नहीं है | अर्थात ब्रह्म एक ही है 

  2.  विजातीय  - अर्थात जैसे ब्राह्मण - क्षत्रिय  अर्थात उसे थोड़ा छोटा या उसे थोड़ा बड़ा ऐसा भी ब्रह्म में नहीं है |

  3.  स्वगत - अर्थात अपने शरीर में  हाथ, पैर, नाक, कान आदि सब अलग अलग है ऐसा भी ब्रह्म में नहीं है  | अर्थात वह सम रूप है |


सत्संग 

0:00 यह पांच प्रकार के भेद जो हैं, जो  चाहे कितनी भी ऊंचाई पर चले जाओ लेकिन जब तक 0:06

भेद मौजूद रहेगा अंतःकरण में तब तक मुक्ति का अनुभव नहीं होगा, तब तक मोक्ष का सुख 0:15

नहीं मिलेगा, 


जीव जीव का भेद, जीव जड़ का भेद, जड़ 0:22 चेतन का भेद, जीव ईश्वर का भेद, जीव ब्रह्म का

0:27 भेद,  हकीकत में वो  ब्रह्म  परमात्मा जो है वह सजातीय विजातीय और स्वगत भेद से

0:36 रहित है, आज ऊंचा प्रकार का सत्संग थोड़ा सा सुन लो 0:42 भले, सजातीय विजातीय और स्वगत भेद से रहित है 0:48 परमात्मा, 


सजातीय माना उसकी बराबरी का दूसरा, जैसे ब्राह्मण ब्राह्मण सजातीय  हो गए 0:55 वृक्ष वृक्ष सजातीय  हो गए, पटेल पटेल सजातीय  हो गए, मनुष्य मनुष्य सजातीय  हो 1:02 गए, गाय गाय सजातीय  हो गई, हूँ। ..  तो ऐसा नहीं कि ब्रह्म परमात्मा है ऐसा 1:09 का ऐसा  दूसरा ब्रह्म है, यह ब्रह्म ये ब्रह्म ये सब इतने ब्रह्म बैठे हैं, इतने ब्रह्म नहीं हो, एक ही ब्रह्म है, इतने घड़े हो 1:16 सकते लेकिन आकाश एक ही  समझ गए क्या? ऐसे ही 1:22 इतने दिए हो सकते लेकिन अग्नि एक है, इतनी तरंगे हो सकती लेकिन पानी एक है 1:29 ऐसे ही ब्रह्म एक ही है, तो सजातीय  भेद से रहित, विजातीय भेद- ब्राह्मण और क्षत्रिय का 1:37 भेद विजातीय  भेद है, ऐसे ही कोई ब्रह्म है और कोई ब्रह्म से थोड़ा सा छोटा है, ऐसा भी 1:45 नहीं है , और स्वगत भेद जैसे मेरे शरीर में हाथ अलग है, पैर अलग है, नाक अलग है, तो कान अलग 1:52 है, यह स्वगत, स्व में जो भेद है, ऐसा भी नहीं परमात्मा में ब्रह्म में स्वगत भेद 1:58 से रहित है, सजातीय  भेद से रहित है विजातीय भेद से रहित 2:04 है तो वो परमात्मा सजातीय विजातीय  और स्वगत भेद से रहित, और यह जीव जीव के भेद जीव जड़ 2:13 का भेद जीव चेतन का भेद जीव ईश्वर का भेद और जीव ब्रह्म का भेद वो भी नहीं है ,  गुरु बिन 2:20ज्ञान न उपजे गुरु बिन मिटे न भेद, तो गुरु के बिना यह भेद मिटता नहीं, और 2:27 जब तक भेद मिटता नहीं है, तब तक भय जाता नहीं है, संशय जाता नहीं, यह भेद मिटने पर 2:34 ही भय और संशय का उन्मूलन होता है, श्री राम,  यह बात बड़ी महत्त्वपूर्ण 2:41 है,  इसको खूब ध्यान से समझ लेना, गुरु बिन ज्ञान न उपजे गुरु बिन मिटे न 2:49 भेद,  गुरु बिन संशय न मिटे जय जय जय गुरुदेव, तो गुरु बिन ज्ञान न उपजे मतलब 2:57 अपनी अखंडता का ज्ञान गुरु के बिना उपजता नहीं, देव आ जाएगा आपका वांछित फल दे देगा 3:05 लेकिन अखंड ज्ञान, तो यह भेद मिटाकर उपदेश देकर भेद 3:11 हटा देंगे,


 एक शिष्य ने गुरु के पैर पकड़े के गुरु महाराज कृपा करो मैंने सुना है कि 3:18 मैं ब्रह्म हूं, लेकिन लगता है कि ब्रह्म परमात्मा तो सर्वव्यापक है सर्वशक्तिमान 3:26 है, सजातीय विजातीय स्वगत भेद से रहित है,  और मैं तो हूं 3:32 क्षत्रिय, पुरुशु  हलवाई का बेटा 3:37 हूं,  मिर्चमल का मासा हूं, मैं तो ऐसा हूँ , गुरु बोला के चल गड़बड़3:46 करता है, ब्रह्म ज्ञान पाना है, हां गुरु जी, गुरु बोले  जाओ जरा पानी पिला,  के जाओ जरा पानी पिलाओ, गंगा 3:54 जी से भर के, उत्साह से लौटा मांज मुंज  के महाराज गुरु 4:00 के आगे धर दिया, तो गुरु उंगली लगा कर घुमाने लगा, अरे गंगाजल कहां है, गुरु जी गंगाजल है 4:07 गंगाजल में तो रेत के- रेत के, कण बहते हैं मछलियां नाचती है 4:13 कछुए थन धनाते  हैं, 4:19 और…  कई और भी फेन, झाग, बुलबुले, तरंगे होती 4:25है, इसमें तो कुछ नहीं, बोले गुरु जी वो  गंगा जी का बेट बड़ा लंबा चौड़ा उसको छोड़ो, और 4:33 लोटा का छोटा पना छोड़ो, गुरु जी आपके चरणों की कसम खाकर बोलता हूं वही 4:38 गंगाजल जो गंगा जी में बह  रहा है वही गंगाजल वही लोटे में गंगाजल ,  गुरु जी बोला तु मेरे 4:44 चरणों की कसम खाता कि वही गंगाजल है, तो ऐसे ईश्वर का, और शक्ति का, और उनका ये  आकृति 4:51 छोड़ दे, और तेरी आकृति छोड़ दे, बाकी मैं भी तेरी कसम खाकर बोलता हूं तू ही वो 4:56 ब्रह्म है,..... , श्री 5:02 राम,


 तो ये सजातीय भेद, विजातीय भेद, स्वगत भेद जो है, ये कार्य की अपेक्षा दिखता है 5:09 कारण में नहीं, और कार्य की अपेक्षा जो कार्य की अपेक्षा जो भेद दिखता है ना, वो 5:16 भेद दिखने भर को है, वास्तविक में नहीं है,


 जैसे सिनेमा के जगत में आप देखते हैं, तो 5:26 महाराज, एक ही लाइट है न, प्लास्टिक की पट्टियां पर पड़ती है अनेक भेद दिखते हैं, कोई 5:32 मोटर गाड़ी भाग रही है, तो कहीं रेल थन धना रही है, तो कहीं नरगिस पकड़ी जा रही है तो 5:38 कहीं गुंडे उसे जलाए जा रहे हैं, तो पीपल के पेड़ को आग लगाए जा रहे हैं, आप देखोगे 5:44 तो आग भी  वही है, तो पीपल का पेड़ भी वही लाइट का चमत्कार है, नरगिस भी वही लाइट का 5:52 चमत्कार है, तो सायरा बानु भी वही लाइट का चमत्कार है, तो देवानंद भी वही लाइट का चमत्कार  है,  एक लाइट ही अनेक होकर दिख रही है |  


6:01 अथवा तो एक बार कोई अखंडानंद जी देखने गए थे  म्यूजियम, तो गांधी जी के आश्रम था, कोई 6:09 गांधी जी की जगह थी, स्मूर्ति गांधी स्मूर्ति घर,  उसमें गांधी जी का बड़ा 6:15 चित्र था, वो उससे बुना हुआ 6:21 था, तंतुओं से, सूत का बना हुआ था, सूत से 6:27 बना हुआ था, सूत्र काम का बना हुआ उनका चित्र था, आप देखते 6:32 हैं तो डंडा हाथ में है, कमर थोड़ी झुकी है, चश्मा है, गांधी हाट की चंपल पहरी है गांधी के 6:40 पैर में, और हाथ में किताबें हैं, धोती है काछ, अब वो सूत के बने हुए, गांधी जी उनका 6:49 चश्मा भी सूत है, डंडा भी सूत है, काछा भी सूत है, सूत ही सूत है, भेद दिखने भर को 6:56 बाकी सूतर ही तो सूतर है, 


ऐसे ही अभी नौरतों में शक्कर के खिलौने 7:03 बनते हैं, फूल बनते हैं, घोड़ा बनता है, दिया बनता 7:09

है, हाथी बनता है, राजा बनता है, रांक बनता है, और देवी देवता की प्रतिमा बनता है, अनेक 7:16 रंग होते हैं, अनेक रूप होते हैं अनेक आकृति होती है, भेद दिखते हैं लेकिन जिसकी 7:21 शक्कर पर नजर है- भेद होते हुए भी अभेद है, जिस जिसकी खिलौनों पर नजर है, वो अभेद में 7:28 भी भेद देखते हैं ,  ऐसे ही व ब्रह्म परमात्मा,


 उड़िया बाबा एक दिन मजे में आकर अपने शिष्य को बोलते हैं 7:36 कि बेटा ब्रह्म ज्ञान का मतलब यह रेती का कणा है ना- यह भी ब्रह्म लगे जब तक नहीं दिखता तब तक गुरु ब्रह्म ज्ञान नहीं 7:43 हुआ, य रेत का जो कण है ना वह अगर ब्रह्म नहीं दिखता है तो ब्रह्म ज्ञान नहीं 7:51 हुआ,  महाराज जड़ चेतन का भेद बताते हैं, कि वो व्यवहार काल में बताया जाता है, परमार्थ 7:58 में जड़ चेतन नहीं है, उपदेश काल में जड़ चेतन है ,   एक सच्चिदानंद 8:06 परमात्मा, उसकी जो घन सुषुप्ति है, वह 8:12 जड़ जो अत्यंत घन है, क्षीण  सुषुप्ति जो है वह वृक्ष आदि हो 8:20 गए,  वृक्षों को भी वृक्ष भी तो ब्रह्म है, अरे पत्थर भी जड़ चेतन जीव जग सकल राम 8:28 जानी, घन सुसुप्ति जैसे एकदम खूब थका हो और खूब 8:34 दही खाया हो, जय जय, दही खा ार को नि डार को 8:42 लगन अथवा दारू पिया हो खूब, खूब थका हो, खूब खाया हो, खूब दारू पिया 8:49 हो, अब उसके दुसाला  हटा के तो महाराज सांप रख दो 8:57 उस पर, कोई पता नहीं पड़ेगा, क्योंकि घन सुषुप्ति है घन घोर,  ऐसे जो घन सुषुप्ति है वह सब जड़ रूप 9:06 में दिखता है, पहाड़ पत्थर आदि ब्रह्म की घन सुषुप्ति 9:13 है, वृक्ष आदि जो है वह ब्रह्म की क्षीण सुषुप्ति 9:18 है, जैसे सुषुप्ति माना प्रगड़ नींद, सुषुप्ति का मतलब है 9:24

नींद, तो वृक्ष आदि की जो है ना क्षीण सुषुप्ति है, जैसे आपको निंद्रा तो है 9:31 लेकिन प्रगाढ़ नहीं है तो कीड़ी मकोड़ा चलेगा या आपके सिर का बाल कोई खींचेगा तो 9:37 एहसास तो होगा,  जागृत में जो था इसने खींचा है वो नहीं, लेकिन मच्छर ने काटा 9:44 नींद नींद में हाथ घुमा लोगे करवट लोगे , एहसास होगा लेकिन प्रगाढ़ नहीं होगा, ऐसे ही 9:50 वृक्षों को दुख सुख होता है, कुल्हाड़ा  लगता है  तो उन्हें भी चोट तो लगती है, लेकिन जितना 9:55 जागृत व्यक्ति को दुख होता है उतना नहीं होता है, क्यों की  सुषुप्ति में है, सुन.. से 10:01 हैं, तो वृक्ष आदि जो है ब्रह्म की क्षीण सुषुप्ति 10:06 है,  और अज्ञानी मुड जीव जो जी रहे हैं वह स्वप्न में जी रहे, यह ब्रह्म स्वप्न में 10:13 जी रहा है, इसमें कोई विरला है जो सपने को 10:18 सपना समझ के अपने स्वरूप में आता है, वह ब्रह्म जागृत में आ गया, है तो एक ही 10:24 ब्रह्म, एक ही ब्रह्म हुआ घन सुषुप्ति – पाषाण आदि, क्षीण सुषुप्ति – वृक्ष 10:31 आदि, स्वप्ना जीव जनता, और जागृत ब्रह्म 10:38 वेत्ता,


 अब देखा जाए तो ब्रह्म वेता का 10:45 शरीर, अब थोड़ा सा सूक्ष्म विचार करो, एक पत्थर पहाड़ है, वृष्टि पड़ी वहां से घास 10:54 फूट निकलता है, ठीक है, आप जहां बैठे हैं कुछ काल पहले य भी पत्थर था, मैड हो गया, और 11:02 इसको खोदते तो अभी भी पुराने पत्थर जैसे निकलते, कुछ कुछ मैड में से भी पत्थर के काक निकलते, हो सकता है दश विश हजार वर्ष 11:10 पहले पत्थर जैसा हो हो सकता है, हिमालय में तो सीधा दिखता है पत्थर फूट 11:18 निकलता है, पत्थर में से घास, तो पत्थर के कुछ कण मिट्टी का रूप ले 11:23 लिया, पत्थर पड़ा पड़ा पड़ा ये अनुभव करना हो तो जो धाबा बनाने में ग्रीड कंक्रीट 11:30 आती है ना, उसको लाकर तुम दो साल रख दो, देखोगे थोड़े दिनों दो-तीन साल में देखोगे11:36 तो उसमें से काफी हिस्सा मिट्टी हो जाएगा, पड़े पड़े पत्थर भी 11:42 गलते हैं,  तो घन सुषुप्ति के रज कण में से वो वृक्ष पेड़ पौधे पैदा होते 11:50 हैं, तो पत्थर में से धीरे-धीरे समय पाकर घास उग आता है, आबू गए होंगे देखा होगा 11:58 पहाड़ों में पथरों में, अब वो घास बकरी ने 12:03 गाय ने खाया, और वो दूध बना, और वो दूध आदमी 12:09 ने पिया, और उसमें से गर्भाशय में गया, 


 दूध 12:17 में से वीर्य बना के, भैंस के दूध में ज्यादा वीर्य बनाने की ताकत है, गाय के दूध में मीडियम, बकरी के 12:24 दूध में कतई जरी, उसी जो ब्रह्मचर्य पालते वो बकरी का दूध पीते हैं, और कुछ नहीं 12:30 मेरे को काम वासना नहीं सताते, गाय–भैंस का दूध पियो तब पता चलेगा काम वासना नहीं 12:38 सताते, बकरी का दूध अब, जो कण जाएंगे नहीं तो फोर्स कैसे मारेंगे, तो महाराज


 12:46 वो घास में से मनुष्य बन गया के, घास में से दूध बना, पत्थर में से घास 12:54 बनी, घास में से दूध बना, और दूध में से मनुष्य बना बच्चा बना, उसी बच्चे को तुम 12:59 बचपन में किसी ब्रह्म वेता गुरु के चरणों में रख दो, अब वो ब्रह्म हो जाएगा कि 13:05 नहीं, जय जय, बाहर आए  13:10 कि को, वो पत्थर में से आया, अभी जो आप, मिट्टी में से तो अनाज बनता 13:17 है, मिट्टी में से तो मनुष्य बनते, पत्थर को हटाओ, जमीन घन सुषुप्ति में 13:25 है, मिट्टी के कण खाकर गेहूं बना, फल फला आदि 13:30 बना, और उसमें से फिर संतति बनी, तो घन में से क्षीण हुए, क्षीण में से स्वप्न में आए, और 13:39 स्वप्न में से, बालक है स्वप्न में आया, और वो अगर ब्रह्मवेत्ता के पास जाता तो जागृत 13:44 हो गए, भेद दिखने भर को है,  कि ये मिट्टी है, ये 13:50 घास है, ये दूध है, ये वीर्य है, ये बच्चा है 13:55 फिर देखो तो ब्रह्म है, “जड़ चेतन जीव जग सकल राम मय जानि” ये तुलसीदास का वचन है, सब 14:01 ब्रह्म हुआ कि नहीं हुआ? अच्छा, जड़ चेतन सब परमात्मा है कि? बिल्कुल सब 14:10 परमात्मा है,


 इसीलिए सनातन धर्म के ऋषियों ने एक बड़ी तरकीब लड़ाई, गुड़ तो जड़ है, गुड़ 14:19 में गणपति की बुद्धि किया, भगवान की बुद्धि, सुपारी में भगवत भाव किया, पत्थर लिंग है, “ओम नमो शिवाय महेश्वराय 14:28  शिवाय शिवराय संभवाय मयो भवाय च उड़ू ड़ू ड़ू 14:36 नम शंकर, क्या कर रहे कि? शिव जी की पूजा कर रहे, तो जड़ में भी ईश्वर को देखने को बताया 14:45 कि, मिट्टी के, सावन के महीने में, मिट्टी के शिव जी बनाए, ओम नमः शिवाय, अरे आटे का वो 14:52 बना दिया लंग, और लौंग डाल दिए, “झुले झुले झुले झुले लाल, आयो लाल, झुले लाल लेला लाल 14:59 डेरो रतनानी रत्नानी कर बलाय बाल, आयो लाल 15:05झूले लाल आयो लाल”, और तुमने आधा किलो आटा गोंदा,और वो घुमा फिरा के बना दिया मुदक, 15:12 लविंग डाल दिया और झूले लाल की भावना की, तो वेदांत की दृष्टि से देखा जाए जब सब 15:19 ब्रह्म है, तो वह भी तो भगवान है ही,


 इसलिए सबको अपनी श्रद्धा के अनुसार 15:27 वहां से फायदा होता है, लाभ होता है,  कुदाली से लेकर आत्मा पर्यंत को मानने15:34 वाले अलग-अलग व्यक्ति हैं, और सब \ एक दूसरे को तुच्छ मानते अपना सिद्धांत पक्का मानते, लेकिन जिसको वेदांत समझ में आ जाता है, वह 15:41लड़ता झगड़ नहीं भेद दिखते हुए भी अभेद पर उसकी नजर है, 


इसलिए वेदांत बोलता है – कर्मकांडी तुम जो करते हो तुम्हारी नजर में15:47 ठीक है, उपासक तुम जो करते हो ठीक है, तपस्वी जो तुम जो कर रहे हो ठीक है, जोगी जो 15:53 तुम कर रहे हो ठीक है, ज्ञानी समझता कि सबका सार तो यही है, 


16:00 आज भले कथा कम हुई, लेकिन एकदम निचोड़ मिल गया आप लोगों को, जय राम जी, 16:08 की तो यह जो जीव जीव का भेद है, तुम अलग, तुम अलग, देखा जाए तो पांच भूत, और उसका 16:15 मसाला देखा जाए तो पांच भूतो का मसाला प्रकृति, प्रकृति का मसाला चेतन, चाहे फिर घन सुषुप्ति का हो चाहे क्षीण सुषुप्ति कहो, 16:23  है तो चेतन, तो जीव जीव का भेद कल्पित भेद है, के ये  16:29 व्यास है, मारवाड़ी है, ये सुन के माना है,  16:34 ये जीव जीव का भेद वास्तविक में नहीं है, ठीक है,


 अच्छा, जीव और ईश्वर का 16:42 भेद, हां …. महाराज, वो जो चेतन है, उसमें जो स्फूरना हुआ, घन सुषुप्ति वाला 16:49 नहीं, क्षीण सुषुप्ति वाला नहीं, स्वप्ने वाला नहीं, शुद्ध चेतन शुद्ध चेतन में जो 16:57 स्फूरना हुआ, और फिर अपने  स्फुरना,  स्फूरना होते हुए भी 17:02 अपने स्वभाव को नहीं भूला वो निर आवरण कहलाया, वो सब ईश्वर कोटि 17:08 के हुए, जैसे जगदंबा है, शिव जी है, राम है, ब्रह्मा जी है, विष्णु जी हैं , गणपति हैं,  17:17 ये सब जो भगवान, भगवत कोटि में हैं , और भी देवी हैं लंबूसा  सावित्री का अपने स्फूरने को ना भूले, स्फूरना होते हुए 17:27 भी अपने को ना भूले, निरा आवरण रहे, उनको ईश्वर माना, और स्फूरना 17:33 हुआ और अपने को भूले, स्फूरना थोड़ा मलिन हुआ , इसलिए अपने को भूले,-----------


 जैसे कोई आदमी, दारू 17:42 पिया थोड़ा सा, लेकिन सजग है , और बड़े मजे से बातचीत करते करो, और दूसरा है व पिया और लथड़ा गया वो  17:50 दारूड़िआ माना जाएगा और वो खानदान माना जाएगा, जय राम जी, 17:57  ऐसे ही जिनका स्फूरना एक नशा, तो स्फूरना हुआ लेकिन जो पचा गए  स्फूरने को, वो ईश्वर हो 18:05 गए, अब क्या हुआ? कि जो 18:10 लथडता है वो हो गया पराधीन, और जो नहीं लथड़ता वो हो गया स्वामी , ऐसे ही स्फूरना हुआ और 18:29 लथडाहट नहीं आई वो ईश्वर होगया और लठ्डाहट आई वो जीव हो गया लताड़ने वाले जीव हो गया ईश्वर के अधीन हो गया 18:36 


तो महाराज, तो स्फूरना में स्वरूप को नहीं भूला उनको अनावरण बोलते हैं, और जो अपने स्वरूप18:44 को भूल गया, नशा किया और अपने आप को भूल गया, उन्हें सावरण कहते 18:50 हैं, अच्छा तो सावरण जो है, वह प्रकृति के आधीन 18:56 जीने लगे, और जो निराआवरण है वो माया को वश करके जीने 19:01लगे , तो माया को वश करके जीने वाला जो चैतन्य है उसको ईश्वर कहते हैं, और अविद्या 19:08 के वश होकर जीने वाला जो चेतन है उसको जीव बोलते, क्योंकि उसको जीने की इच्छा हुई , और 19:14 देह में मैं हो गया, ईश्वर को अपने चिन्मय वपु में “मैं” नहीं होता, अपना जहां से स्फूरना 19:22 होता है उसमें उनको मैं होता है, ज्ञानी भी गुरु का ज्ञान पाकर यह भेद हटाकर अपने 19:27 चिन्मय वपु  में मैं करते तो ज्ञानी भी ईश्वर हो जाते हैं, उनको भी हम ब्रह्म स्वरूप मानते 19:34 हैं, ईश्वर और गुरु दोनों की हम पूजा करते हैं , और दोनों आकर खड़े हो जाए तो पहले हम 19:39 गुरु को पूजेंगे, 


पुराणों में सुना कि, फलाने 19:45 ब्राह्मण ने फलाने तपस्वी ने तप किया , और भगवान आए और पुत्र अभिलाषा में एवं अस्तु 19:53 कह के भगवान अंतर्ध्यान हो गया और उसको बेटा हो गया, और जो महापुरुष 19:58 सावरण तो जन्मे, लेकिन फिर सत्संग सुनकर भेद मिटाकर निराआवरण में टिके वो भी बोले 20:04 अच्छा जा हो जाएगा, उनको भी हो जाता है


 जैसे काशी में एक किसी सेठ को बेटा 20:12 नहीं होता था, 50 साल की उम्र, आखिर संत तुलसीदास के पास आए, संत तुलसीदास ने कहा कि-  कल सरकार से 20:20 पूछकर बताऊंगा रात को युगल सरकार आएंगे, राम लखन लाला आएंगे कथा सुनने को रामायण 20:27 की, उनसे पूछ के बताऊ दूसरे दिन सेठ फल फलादी  मेवे मिठाई की दो बैल गाड़ियां भरकर 20:35 संत तुलसीदास की कुटिया पर पहुंचे, तुलसीदास ने कहा कि फल उतारो मत, मेवा 20:41 मिठाइयों को मैं छूंउगा नहीं, क्योंकि तुम्हारा कार्य हो नहीं रहा, तो मैं कैसे लू यह फल 20:47 फलादी,  सरकार ने कहा कि - 10 जन्म तक तुम्हारे भाग्य में नहीं, बेटा, वो  सेठ निराश उदास 20:54 होकर घर को लौट रहा था तो सीठानी ने कहा प्रसाद के निमित्त जो चीज लिया है व घर जाकर 21:00 क्या करेंगे ? अपन दो ठीकरे तो हैं, कहां डालेंगे, प्रसाद के निमित्त लिया तो प्रसाद 21:06 करो, बांटो, खाली करो बैल गड़िया, तो रोते चेहरे उदास बदन, रोते 21:12 चेहरे क्षीण  मन प्रसाद दे रहा, लुटा रहा खाली करने का 21:19 बोझा,  दूध के वारा भर के कोई आदमी पसार हुआ, उसने पूछा सेठ जी प्रसाद बांटते  तो कोई 21:24खुशी के लिए, कोई खुशी होती है, कोई उपलब्धि होती है, कोई मनोकामना पूरी होती तभी 21:30 प्रसाद बढ़ता है, आपके चेहरों पर तो उदासी है, कोई आपकी कामना पूरी हुई हो और आप खुश 21:37 हो और बांटते हो ऐसा नहीं दिख रहा है, आंखों में आंसू है, बताओ किस बात की बांट ते हो? 21:42 सेठ ने पूरी कथा सुना दी मुझे भागे को हजारों निराश में एक आशा का किरण फूटा था, 21:47 हकीम डॉक्टरों ने तो इंकार किया था, हाथ धो चुके थे, कई टूना फुना वालों के पास गया 21:54 लेकिन कुछ ना भरा, आखिर में कहा कि संत तुलसीदास के पास सरकार राम लखन 22:00 जी आते हैं वोह अगर आशीर्वाद दे देंगे तो बेटा हो जाएगा, तुम्हारे भाग्य में होगा तो भगवान 22:06 दे देंगे, मैंने जाकर उनसे कहा कि मेरे भाग्य में हो तो मेरे को संतान हो जाए,22:12भगवान से पूछो मेरे भाग्य में है कि नहीं, तुलसीदास ने बताया कि तुम्हारे भाग्य में 10 जन्म तक नहीं है तो मैं अभागा अब क्या 22:19 करूं? कहां से खुशी मनाऊं? रोते चेहरे सेठ ने अपनी गाथा सुना दी, उस अहिर ने कहा तू  22:26 चिंता मत करो धीरज रखो, यहां से थोड़ा आगे जाओगे, काशी की बात है, 22:32 मणिकर्णिका  घाट से थोड़ा आगे जाओगे तो मृगी घाट मिलेगा, मैंने देखा 22:38 है, वहां एक संत रहते हैं उनका नाम है 22:44 किन्नाराम,  वो  किन्नाराम अगर रिज गए तो भले भगवान ने ना कह  दिया, तभी भी किन्नाराम बोल 22:51 देंगे तो हो जाएगा बेटा, अहिर वारा भरने वाला व किन्नाराम को 22:56 जानता था, सेठ ने धीरज संभाला, वो  जाते रहे आते रहे जाते रहे आते रहे किनाराम जब आवे सेठ 23:04  तो चादर डाल के सो जावे, चुप हो जावे  चुप ही रहता था 23:10 ज्यादा, अभी भी है उनका जगह, हरिश्चंद्र घाट जो है ना, हरिश्चंद्र 23:17 ने दक्षिणा लेने के बाद उसका अपने बेटे को जलाया, हरिश्चंद्र घाट, राजा 23:25 हरिश्चंद्र शूद्र के वहां  नौकरी किया शमशान में, उस घाट  के पास में किनाराम का 23:33 डेरा, वो  वहां जाता रहा, एक दिन के नाराम उठे के रे क्या लाया सेठ?  23:40 के पूरी लाया, बोले जितनी रखेगा मुह में, जितनी खिलाएगा उतने बेटे होंगे, 10 पूरी थी 23:46 उसने तो धर दी, 10 बेटे, 23:51 आश्चर्य है,  महीना दो महीना चार महीना बीते तो पत्नी ने कहा कुछ, 23:59 वो बोलते ना हफ्ता, पाच हफ्ते से मिलना है, 20 परसेंट  माना दो 24:07 बेटे होने के लक्षण हो रहे हैं, जरा बार ज कुछ लक्षण, 10 महीने हुए, दो सुहावने 24:16 लाल, श्याम बलराम की बस प्रतिमा जैसे 24:21 जन्मी, 40 दिन के हुए बेटे तो माई ने कहा कि चलो संत के दर्शन करा देवे  आशीर्वाद ले 24:27 आवे, जिनके कृपा से प्रसाद, तो रास्ते में तुलसीदास का आश्रम 24:33 पढ़ता था, माई ने कहा चलो यह बाबा जी तो बोलते थे 10 जन्म में नहीं है, लेकिन अब 10 आ रहे, अब 20 परसेंट  तो अब तो मिल 24:44 गया, उसको क्या बोलते किस्त किस्त 20 तो किस्त मिल चुकी 24:51 है, जो तुलसीदास जी के चरणों में बच्चों को रखा, तो तुलसीदास ने कहा कि 25:00 ये किसके गोद में लिए, तो भाई का तो याद था कि- इसी महाराज ने बोला था, नहीं होंगे, बोले 25:06 महाराज किसी की लिए नहीं गोद में, मैंने अपने खून से सींचे, हैं मेरे ही शरीर से 25:12 पैदा हुए हैं, यह मेरे ही बेटे हैं, अब दो है, आठ और आ रहे हैं, आपने तो कहा था कि 10 25:17 जन्म में नहीं होगा, लेकिन किनाराम ने कहा कि 10 होगा, महाराज दो तो आही गए अब आठ और भी 25:25 आएंगे, तुलसीदास को हुआ कि किम आश्चर्य मतं परा, इससे बढ़कर आश्चर्य क्या होगा, अब तो 25:32 महाराज कथा तो सरकार को बाद में सुनाऊंगा, लेकिन यह पूछूंगा कि- कृष्णावतार में तो 25:38 लीला अवतार था, लेकिन रामावतार मर्यादा पुरुषोत्तम कदम कदम पर मर्यादा भंग ना हो 25:44 ऐसा आपका जीवन था, और आप रामावतार में झूठ बोलना कब से सीखे 25:49 क्यों? कृष्णा अवतार में कह देते तो हम मान ले चलो लीला है, लेकिन रामा अवतार में, 25:58आज तो दिन लंबा हो गया संध्या नहीं हो रही सरकार आए वो टाइम नहीं हो रहा है, बड़ी परेशानी से दिन पसार किया, आह्वान किया सरकार 26:07 आए कि- प्रभु कथा तो बाद में चलेगी रामायण, लेकिन यह मैं पूछता हूं कि आप रामावतार 26:13 में होते हुए कृष्ण लीला करना कब से चालू की? और मेरा आपने यूं कर दिया 26:20 सब, मैंने आपसे पूछा था कि फलाने सेठ के प्रारब्ध में बेटा है कि नहीं तो आपने कहा 26:26 इस जन्म में तो नहीं 10 जन्म में नहीं है, और उसको किनाराम ने कहा एक नहीं 10 होगा 26:32 और दो तो ले आया आज सुबह मैंने देखे उनके, राम जी मुस्कुराने लगे, बोले आप तो 26:38 हंसते लेकिन हमारा देखो फिर, संत के वचन कौन मानेगा, बोले तुमने तो पूछा था उसका 26:44 बैलेंस, लेकिन किनाराम ने तो कर दिया ऑडी ऑर्डर कर 26:49 दिया, तो तुमने प्रारब्ध पूछा कि उसके भाग्य में है कि नहीं, लेकिन किनाराम ने तो कहा जा 10 होंगे तो उन्होंने तो अपना विटो 26:56 पावर चलाया, मैं क्या करूं, तो मानना पड़ेगा कि जो निरा आवरण तत्व में 27:03 स्थित होते हैं फिर वो चाहे ब्रह्मा जी का रूप हो चाहे किन्नाराम का हो, उनका वचन प्रकृति को मानना पड़ता 27:09 है, जय जय,


 सीधी बात है,  ऐसे कई हमने आपने दृष्टांत सुने होंगे भगवान आए उसको फल दे 27:17 दिया बेटा हो गया और सिद्धपुर वाले आए, और आपस केरी दे दी बेटा हो 27:25 गया, जय जय, आपस केरी वाला आते है बाबा ये आपस केरी का परिणाम लाराम का लड़का 27:33 कुंदराम लाराम कुंद मल वालो टावर के पास, 


तो आप जब निरावरण होते हैं तो ईश्वर का 27:41 संकल्प जहां से स्फुरित  होता है वही चेतना  आपका है, आपका भी संकल्प वही से स्फुरित होता 27:48  है, रही बात, पावर हाउस तो वही का वही है, लेकिन वो जो 27:53 साधन है आपके साधन जितने बढ़िया होते हैं, ईश्वर के साधन बढ़िया है आपके साधन घटिया है, उसी आप मर्यादित हो 28:03 लेकिन तत्व में देखो तो वो एक, तो जीव ईश्वर का 28:09 भेद देखने भर का है वास्तविक नहीं, व चेला भागता भागता साई साई साई व राजा भोज आया 28:16 है राजा भोज, है तो नहीं, स्वामी जी व आ रहे हैं, अरे 28:22  तो साधु है हाथ में हंडी है, सन्यासी कि स्वामी जी वो अपन गए थे कुंभ के मेले में, 28:29 राजा भोज जो थे ने कुंभ में साधु की सेवा करने से वैराग आ गया, वही राजा भोज ने 28:34 राजपाट छोड़कर हाथ में हांडी लेकर सन्यास के कपड़े पहरे है, हांडी छोड़ दो लाल कपड़े की 28:40 बात छोड़ दो, उनका खजाना और ताज छोड़ दो, आदमी वही है, ऐसे 28:46 ही गंगू तेली और राजा भोज , तैली का व घना छोड़ दो और राजा का तखत छोड़ दो, मा, ऐसे ही 28:53 ईश्वर की माया विशिष्टता छोड़ दो और जीव की अविद्या विशिष्टता  छोड़ दो बाकी जो है एक 29:01 है, हालांकि माया और अविद्या है तो वह भी घन  सुषुप्ति और क्षीण सुसुप्ति  का मसाला है, और 29:08 क्या है, ये  ज्ञान कोई गुफा में बैठकर माला 29:14 घुमाने से नहीं मिलेगी, उपवास रखने से नहीं 29:20 मिले, तो जीव जीव का भेद दिखने भर को है, सुन सुन के में पटेल में गुजराती है, बाकी 29:27 देखा जाए तो उसी मटेरियल से, जीव ईश्वर का भेद तुम मिट्टी के घड़े में आकाश हो, और वह काच 29:34 के घड़े में आकाश है, काच का काच पना हटा दो मिट्टी का मिट्टी पना हटा दो आकाश एक है 29:40 कि? जय राम जी की,  तो जीव जीव का भेद फालतू है, देखने भर 29:46 को, जीव ईश्वर का भेद माया और अविद्या के कारण है, 29:53 अच्छा, जीव और ब्रह्म का भेद- अंतःकरण में जो चेतन आया और जीने की इच्छा आई तो जीव 30:00 हो गया, जीने की इच्छा छोड़कर चेतन को देखो तो जो ब्रह्म है वह वो है जो वो है वह 30:05 ब्रह्म है, गुरु बिना भेद न उप, गुरु बिना ज्ञान न 30:12 उपजे गुरु बिन मिटे न भेद, यह भेद मिटाना है, सजातीय भेद विजातीय भेद, स्वगत भेद, जिस 30:20 ब्रह्म में नहीं है वही ब्रह्म मेरा आत्मा है, ऐसा ज्ञान हो जाए तब साक्षात्कार होता 30:26 है, 


 ईश्वर दिख गया, हे भगवान आए - 30:32 शांताकारम भुजगशयनम *** भगवान  आशीर्वाद दे गए उनका सत्य संकल्प था, तेजोमय  बपू था ध्रुव  खुश हो गए, 30:39 वरदान मिला अटल का, फिर ध्रुव  को हुआ कि, भगवान ध्रुव  और कुछ मांग ले, के भगवान मेरी 30:45 मति से जो मांगूंगा वह अल्प होगा, लेकिन अब मैं यह पूछता हूं कि आपका वास्तविक स्वरूप 30:50 क्या है, और मैं क्या हूं, और अटल पदवी  क्या है? भगवान बोलते ध्रुव  यह पूछेगा तो ना 30:56 मेरा कुछ विशेषता रहेगी  ना तेरी कोई तुच्छता  रहेगी ना अटल पदवी का गौरव रहेगा, यह सब 31:02 जैसे स्वप्ने में एक स्वप्न दृष्टा को ईश्वर भी दिखे जीव भी दिखे अटल पदवी भी 31:08 दिखे, लेकिन है तो उसी के आत्मा का चमत्कार, ऐसे ही है ध्रुव  एक आत्मा का चमत्कार है 31:14 उसको रहने दे नहीं तो तू और मैं सब गायब हो जाऊ, जय 31:20 जय, बाप मने साक्षात्कार करे ,मने भगवान ना दर्शनछे  अरे अर्धो कलाक भी साक्षात्कार सिवा 31:27 त रही सको  नहीं, सतत सबको साक्षात्कार है, लेकिन उसका बोध नहीं, ज्ञान नहीं, 31:32 साक्षात्कार बड़ा आसान है, देखो भेद मिट गया की,  किन कारणों से भेद है समझ लो, 31:38 खाली वो समझ को बिठा दो साक्षात्कार हो जाएगा, फिर राग के समय राग सताएगा नहीं 31:45 द्वेष के समय द्वेष सताएगा नहीं, दिखेगा सही ज्ञानी में राग द्वेष हंसता रोता 31:50 लड़ता झगड़ दिखेगा लेकिन अंदर से वह भेद को जानता है क्या है, इसलिए ज्ञानी त्रिलोक 31:56 को मार डाले तो भी उसको पाप नहीं होता, और आप चिड़िया को 32:03 मारो न , क्योंकि आपके अंदर भेद घुसा है, ना हन्यते हन्य माने शरीरे, गीता में 32:12 कहा, शरीर के मरने से वह जो शुद्ध मैं है वह नहीं मरता, वह आत्मा नहीं32:17 मरता, शरीर भी वास्तव में मरता नहीं है, अब इसको जला दो तो इसमें जो जल भाग है वह 32:23 वाष्प हो जाएगा वो कहीं बरसेगा, जो मिट्टी का भाग है वो राख हो 32:29 जाएगा, व कहीं भी पौधा होकर खाद होकर कहीं भी काम आ 32:36 जाए जो अग्नि का भाग है जठरा अग्नि व जलाने पर महा अग्नि को मिल जाएगा, नाश तो 32:43 कुछ होता नहीं कि, हुआ क्या नाश? रूपांतरित होता है हमारी आंखों से ओजल होता है हम 32:48 समझ फलाना मर गया, मरता कोई नहीं, जब कोई मरता ही नहीं तो जमने का कैसे? 32:55 वो पंच महा भूतों का अलग अलग से थोड़ा इकट्ठा हो के यहां दिखा, 25 50 साल फिर उसी 33:00 में लीन हो जाएगा, ना कोई जन्मे ना कोई मरे ना कोई माई ना कोई बाप आपे लाडा आपे लाडी 33:06 आपे आप, कहीं लाडी दिख रहा है कहीं लाडा दिख रहा है ये सब भेद देखने भर को है, देखा 33:14 तो वही चेतन वही मसाला, 


कीड़ी में तू नानो लागे हाथी में तू 33:21 मोटो क्यों, बन मावत ने माथे बैठो हाकन वालो तू रो तू एरो खेल रचो मेरे दाता जा 33:29 देखू व तुम को तू, दुनिया में तो एक बिराजे नर नारी में दो दिखे क्यों? ये जो भेद है 33:36 ना, उसमें कलह है, और कलह होते हुए भी वास्तव में फिर भी कुछ नहीं, इसीलिए ज्ञानी 33:43 युद्ध करते हुए भी वनसी बज रही है, कृष्ण देखो कैसे निश्चिंत है, युद्ध चल रहा है नरोवा कुंजवा करा रहे फिर भी निश्चिंत 33:54 है, ये समझ चाहिए ज्ञान की बात, 34:00 हजारों यज्ञ हजारों तप करने से भी गुरु बिन ज्ञान न उपजे गुरु बिन मिटे न भेद, 34:06 गुरु बिन संशय ना जय जय जय गुरुदेव, तीर्थ का है एक फल 34:12 संत मिले फल चार, धर्म अर्थ काम और मोक्ष चारों के द्वार खुले हो जाते हैं। फिर वो आदमी 34:19 धर्मात्मा भी स्वाभाविक हो जाएगा क्योंकि अपने आप में अपने आप में उसको विश्रांति 34:24 मिलेगी, भगवान गोविंदाचार्य ने कहा यह धर्म मेघ समाधि है, जो अपने आप में शांत हो रहा 34:30 है समाहित हो रहा है, तो धर्ममेघ जैसे मेघ बरसता है बारिश ही बारिश कर देता है, ऐसे 34:35 समाधि से धर्म बरसता है, धर्ममेघ समाधि ऐसे योगी की सेवा करने वाले को जो पुण्य 34:42 होता है तो फिर वो योगी को कोई पुण्य की कमी होगी ? ये ज्ञान समझ में आजाए तो फिर  काम, 34:49 क्रोध, लोभ, मोह  मेरा तेरा, द्वैत में ही तो भय होगा, तुम कितने भी भयानक हो कितने भी 34:56 डरावने हो तुमको देखकर बच्चे डर जावे बड़े छोटे डर जावे लेकिन तुम अपने आप को देख 35:03 केर कभी नहीं डरोगे, तुमको देखकर कई लोग तुम्हारे पीछे दीवाने हो 35:08 जाए, लेकिन तुम अपने को देखकर कोई दीवाना हुआ? नहीं, दूसरे को देखकर काम होगा , अपने आप 35:15 को देखकर काम थोड़े होगा , दूसरे को देखकर क्रोध होगा अपने आप के ऊपर क्रोध कभी नहीं 35:21 होता, दूसरे को देखकर मोह होता है अपने आप में मोह नहीं होता, तो जब सब में अपना आप ]35:26 देख लिया, तो काम क्रोध लोभ मोह भय चिंता सब शांत हो 35:32 गया, फिर ऊपर से दिखने भर को देखेगा लेकिन गहरी नीव नहीं होगी 35:39 उसकी, यह ज्ञान अगर समझ में आ जाए महाराज तप का तप हो गया, जपी का जप हो गया, ध्यानी 35:45 का ध्यान सिद्ध हो गया, योगी का योग सफल हो गया, तो अब जीव जीव का भेद पल खुल गया क्या? 35:54 अच्छा, जीव जड़ का भेद, ये जमीन है और ये मैं हूं तत्व से 35:59 देखो तो कोई भेद नहीं है, इसको अगर मैं मानता हूं और ये जमीन है”, ये पानी है, जड़ 36:07 जड़ का भेद ये पानी है ये हवा है ये हवा है ये पानी है ये जमीन है, लेकिन 36:16 देखा जाए तो ये उन्हीं का तो मसाला सब मिश्रित है, ये और वो सब एक ही तो है, ठीक है  36:24 कि? अच्छा, तो जड़ जड़ का भेद, जड़ चेतन का भेद, चेतन में घन सुषुप्ति क्षीण  सुषुप्ति 36:32 स्वप्न और जागृत य अवस्थाओं के कारण भेद दिखता है, बाकी तो चेतन एक है, तो भेद के संस्कार मिट 36:40 जाते, भेद के संस्कार मिट जाते तो भेद का व्यवहार करते हुए भी 36:48 अभेद,शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ब्राह्मणे गवि हस्तिनि पण्डिताः समदर्शिनः 36:58 कुत्ते में, स्वान में, हाथी में, ब्राह्मण में और गाय में पंडित सम दर्शन करते हैं, 37:05 उनको ब्राह्मण गाय हाथी और कुत्ता सब एक रूप37:11 दिखता है, है एक रूप के नहीं है? 37:18 गुलाब, गेंडा, सफेद फूल, सेव, अलग-अलग दिखते लेकिन 37:24 तत्व से देखो तो एक है कि नहीं? ऐसे ही जिनको तत्व समझ में आ गया उनको चांडाल, 37:32 कुत्ता, गाय, ब्राह्मण, हाथी, उसमें एक ही होता है, 


तो किसी के घर को इस ब्रह्म वेता 37:43 गए, शाम को सत्संग करते थे, महाराज सत्संग करने तो घर का आदमी भी 37:50 गया, जिसने बाबा जी को उतारा दिया था, बड़ा भगत था बाबा जी का, लेकिन बुद्धु जी था 37:57 थोड़ा, बाबा जी ने इसी श्लोक पर प्रकाश डाला कि, जो बुद्ध पुरुष है जो ज्ञानी है 38:04 सच्चे जो संत हैं, ब्राह्मणे गवि हस्तिनि पण्डिताः समदर्शिनः वो  समदर्शी होते हैं, शाम 38:13 हुई, जब रात्रि का भोजन हुआ तो पत्नी का हाथ गंदा हो गया, मेंसस हो 38:20 गई, उसने क्या करा खड़ लाकर थाली में गुरु जी को रख दिया, 38:28 गुरु जी अब मैं भोजन बनाना जानता नहीं और पत्नी का हाथ गंदा हो गया, और आज मैंने 38:34 श्लोक जाना है कि सब में एक है, और ज्ञानी को सब में 38:40 एक दिखता है, तो गाय हाथी कुत्ता ब्राह्मण 38:46 चांडाल सब में एक तो भोजन बनाने वाली पत्नी का तो हाथ गंदा हो गया, इसलिए आज गाय का खोराक आप 38:54 अर्पण करता हूं गुरु, गुरु जी ने बोला बुद्धु जी मैंने कहा पंडिता सम दर्शन समवर्ती नहीं सम दर्शन 39:03 है समवर्ती नहीं होगा, कुत्ता को जो टुकड़ा 39:11 डालोगे तो कुत्ता को तो रोटी का टुकड़ा डालो, उतना टुकड़ा अगर हाथी को खिलाओगे तो मर जाएगा, और जो हाथी को खिलाते उतना बोझा 39:20 से कुत्ता दब के मर जाएगा, श्री राम, सम दर्शन होता है सम वर्तन नहीं 39:28 होगा, मां के साथ अपने ढंग का व्यवहार होगा, बहन के साथ अपने ढंग का व्यवहार होगा, 39:34 लेकिन देखेंगे तत्व से तो सब एक ही है, तत्व से सम दर्शन करना है सम वर्तन 39:43 नहीं , 


राम तीर्थ की सेवा करने वाले व्यक्ति को साक्षात्कार हो गया, रसोया था राम तीर्थ का, ओम ओम ओम ओम ओम 39:56 ओम ओम सर्वोहम की भावना वाली ध्वनि राम तीर्थ की सुनते सुनते उनके ही वाइब्रेशन उनके 40:02 इर्दगिर्द रहते रहते वो अनपढ़ लड़के को बोध हो गया, थोड़ा सा सुना ज्ञान बस मैं ही 40:09 हूं , रामतीर्थ कहीं गए थे वो एक शाम को छत पर खड़ा होके नाचा भला होया मेरा चरखा 40:17 टूटया जिंद सभा में छुट्टी, गहने गवाए हुए बेफिकरे बाह रही ना बुट्टी, सालू सल मर गए 40:24 सारे जिंद सभा छुट्टी, भला होया मेरा चर टटिया ओम ओम, लोगों ने कहा क्या बकता है 40:30 कि, बस य मन का चरखा टूटिया, मैं ईश्वर हूं, मैं ब्रह्म हूं, मैं 40:36 चैतन्य हूं, अरे बोले क्या बकता के बोले बकता नहीं मैं वही 40:42 हूं, तो तू ब्रह्म है, हां, हम तेरे को ब्रह्म तब मानेंगे जब तू 40:48 छत से कूदे, तब मानेंगे तू ब्रह्म है, जब तू सर्वत्र है तो छत से कूद तो हम माने कि तू 40:55 सर्वव्यापक है , बोला मैं कूदने को तो बिल्कुल तैयार हूं लेकिन बुद्धू भाइयों ऐसी कोई जगह बताओ 41:02 जहां मैं नहीं हूं छत के नीचे और छत के ऊपर मैं ही मैं हूं, कूदने की जगह कहां है, आकृति कूदेगी मैं थोड़ी 41:09 कूदूं, 


 ऐसे ही अजमेर में एक हो गया बूलचंद सोनी, कोई संत का सानिध्य लेते लेते महाराज,41:18 पहले तो आर्य समाजी था लेकिन देखा सुधा स्वाहा करते करते चित्त में कोई आनंद  41:27 तो नहीं आ रहा, कोई सत्य कुछ और चीज है, संत का शरण लिया उसको ब्रह्म ज्ञान हो 41:34 गया, फिर वह जो कर्मकांडी थे उनके साथ उसका मेल हुआ नहीं, एक दिन रे समाजी वालों ने मिलकर उसको 41:42 समझाना चालू कर दिया, भाई  तू तो आता नहीं,बोले चक्कर में आ गया, तू तो यार ***** यज्ञ 41:50 भगवान आए ही आ, बोले यज्ञ भगवान है, वो भगवान है, पता चला सब भगवान है, और मैं अपने 41:56 भगवान को जाना तो मैं अपने आप को सबको जाना, खाम खा में अपने से अपने आप को नहीं 42:02 जाना था तब वोह भगवान वह भगवान करके गिड़गिड़ा रहा था, लोग चिढ़ गए तो क्या तुम 42:08 भगवान हो क्या? हां हां, जब अग्नि भगवान है तो मैं जठरा है मेरे में, मैं भी तो भगवान 42:14  हूं ,हाँ  अच्छा अपने को भगवान हो अपने को क्या मानते, मैं भगवान नहीं मैं ब्रह्म मानता 42:21 हूं, जिससे भगवान और जीव सब प्रकट होते हैं वो मैं ब्रह्म हूं, अच्छा तो ब्रह्म हो गया बड़ा, हा, दूसरे 42:29 साथियों को बोला कि नास्तिक हो गया, सब मिलकर शंभू मेला मूर्खों का ज्यादा होता 42:34 है शेर तो अकेला होता है, गटे बहुत होते हैं, और सब गेटों ने घेर लिया बूलचंद सोनी 42:42 को, बोले आप ब्रह्म है तो हम तब मानेंगे जब आप हमको कुछ करीश्मा दिखाओ चमत्कार, बोले 42:50 क्या दिखाऊ? बोले भगवान तो सारा जगत बना लेता 42:55 है, 


लोग सब चीज  बनी बनाई देखते ना तो समझते कि ये ईश्वर ने जगत बनाया है,  जैसे कुंभार ने, 43:01 ऐसा बात नहीं है, ब्रह्म अपने आप में विवर्त हो रहा है, कोई बैठके  बनाया नहीं 43:06 है, जय जय, अच्छा तो जगत बनाया तो, जैसे कुंभार मिट्टी से घड़ा बनाता है ऐसे ही 43:13 भगवान ने जगत बनाया, तो मिटटी  जमीन को बनाने के लिए र मटेरियल कहां से लाया 43:21 भगवान, हवा को जल को वायु को बनाने के लिए रॉ मटेरियल भी तो चाहिए, कुंभार को रो 43:28 मटेरियल चाहिए, लोहार को रो मटेरियल चाहिए, तो भगवान ने जगत बनाया तो रो मटेरियल कहां से 43:35 लाए, यह जगत विवर्त हो रहा है परब्रह्म में, ऐसा नहीं कि भगवान एक जगह है उसने कुछ रो 43:41 मटेरियल लाकर जगत बना दिया, थोड़ी जमीन बना ली, थोड़ा पानी बना लिया, हवा बना ली फिर जीवों को रच लिया कि चलो खेलो अपने देखते, 43:49 ऐसा नहीं है, लोग ऐसा समझते भगवान ने दुनिया बनाई और 43:54 व नाटक देख रहा है खेल देख रहा है, ऐसा नहीं है, यह तो अल्प मति के लोग चल रहा है, 44:01 अंधे से अंधा मिले चलम गड़िया प्रवाह, एक अंधा दूसरे अंधा को रास्ता 44:08 दिखाए जा रहे है, सब जा रहे हैं हज पर उसी लिए श्रद्धालु सब है भगवान को सब मानते, 44:15 लेकिन मिला हुआ कोई विरले ज्ञानी को होगा बाकी के सब ठंन  ठंन  पाल 44:21 है, गुरु बिन ज्ञान न उपजे गुरु बिन मिटे ना भेद गुरु बिन संचय 44:31 ना मिटे जय जय जय गुरु, यह गाते गाते आपको 44:37 आठ  साल हो गए लेकिन तुम्हारा यह हाल है तो और की क्या बात होगी यार बोलो 44:43नि,  श्री 44:53 राम, मूलचंद खड़खड़ हसा बोले क्यों खेलता यार, हंसते क्यों, बोले तुम कितने भोले भाले हो,45:02 सृष्टि बनाने का संकल्प तो मेरा मैनेजर करता है ब्रह्मा जी, मैनेजर का काम सेठ को सपता है कैसा तुम 45:10 बेवकूफ आदमी, मैं भूल चंद नहीं भूल चंद तो उसका 45:17 दास है ब्रह्मा जी का, कोई बात नहीं, लेकिन मैं मेरी चेतना लेकर वह  ब्रह्मा जी संकल्प 45:24 करता है,  ब्रह्मा जी का अंतःकरण एकाग्र इसलिए उसका संकल्प फलता है, और बूलचंद का अंतःकरण 45:29 एकाग्र नहीं इसलिए उसका संकल्प नहीं फलता, लेकिन मैं तो बूलचंद के अंतक को ब्रह्मा 45:34 जी के अंतक को दोनों को सत्ता देने वाला अपने आप हूं मैं, तो मैनेजर का काम मेरे को 45:40 सपता है यार, श्री राम,


 तो यह जरूरी नहीं है कि आपको 45:47 साक्षात्कार हो जाए तो आप यह कर लेवे वो कर ले वो कर ले य जरूरी नहीं है , करना धरना तो 45:52 अंतक का और एकाग्रता का फल है, ब्रह्म का ब्रह्म कुछ नहीं करता, ब्रह्म तो सत्ता 45:57 मात्र है, सारी क्रिया सारी सत्ता उसी से स्फुरित  होती 46:03 है, तो जिनकी उपासना की होती है अंतःकरण एकाग्र होता है उनके जीवन में चमत्कार होते हैं, 


आशा रामायण का पाठ किया और छोरा 46:11 मर गया था और जिंदा हो गया था न बाबा जी का चलो वो सब योग का प्रभाव 46:17 है, कोई वेदव्यास जी हैं तो उनके पास चमत्कार भी है और ज्ञान भी है, वशिष्ठ के 46:22 पास चमत्कार भी है ज्ञान भी है, साई लीला शाह  के पास चमत्कार भी है ज्ञान भी है, किसी के 46:27 पास अकेला ज्ञान है तो भी भी मुक्त है, योग सामर्थ्य और तत्व ज्ञान नहीं है तो कुछ नहीं, तत्व ज्ञान पहले योग सामर्थ्य हो 46:35 चाहे ना हो, 


तरति शोकम  आत्म वित, आत्म विता शोक को तर 46:42 जाता है, शोक के प्रसंग में अगर आपको शोक नहीं होता है, राग के प्रसंग में आपको अंदर 46:48 राग नहीं होता है, द्वेष के प्रसंग में आपको अंदर द्वेष नहीं होता है, काम के पॉइंट पर आपको अंदर देखते हो कि काम नहीं 46:55 होता है, आप ब्रह्म  में, जय राम जी की, इसीलिए नानक ने कहा 47:01 ब्रह्म ज्ञानी की मत कोन बखान नानक ब्रह्म ज्ञानी की गत ब्रह्म ज्ञानी 47:09 जाने ज्ञानी को भोजन करते हुए देखो और हा हा कर रहे हैं बहुत मजा आ रहा है, कहीं मान  47:15 ना लेना कि इनको अच्छा लगा है, जय 47:20 जय, यानी सया पर सो रहे हैं गादी तक का पलंग आपको ऐसा नहीं लगे कि गादी का मजा है, 47:27 


गीता के छठे अध्याय के सातवे  अध्याय किसी के 47:34 महात्म में मैंने पढ़ा था, मैं जब घर में था तभी के बात है, तब में बच्चा था, तो लक्ष्मी भगवान 47:41 के चरण पखल रही है  और भगवान बोलते हैं लक्ष्मी तू समझती 47:46 होगी कि मैं चरण पखाल  रही  हूं, और विष्णु बड़ा आनंद से सो रहे हैं आनंद ले रहे हैं 47:53 लेकिन तेरे तुम जो चरण चंपी कर रहे हो उससे मैं आनंदित हो रहा हूं ऐसा नहीं, मैं 48:00 मेरे गीता के ज्ञान से तृप्त हो रहा हूं, मैं अपनी तृप्ति में तृप्त हूं, तेरी चरण 48:06 पखने से मैं तृप्त नहीं हो रहा हूं, लेकिन चरण पखलवा  के तेरे को मौका दे रहा 48:12 हूं 


सेवा का, ऐसे वो  गुरु पूनम को बताया था ना कि 48:19 गुरु गंगा में खड़े और चेले को बोला पानी पिलाओ, चला भागा लौटा लाया मांजा और गंगाजल 48:24 भर के दिया, दूसरों ने पूछा पानी गंगाजल ही आप पीते हैं तो फिर उसको बुलाने की मेहनत 48:29 करें, बोले इसको सेवा का मौका दिया यारे, श्री राम, ऐसे ही ब्रह्म वेता को कोई चीज कोई 48:39 वस्तु कोई व्यक्ति मिलकर ही आनंद आता है वो अपना आनंद स्वरूप वो स्वयं है, आनंद आता 48:46 हुआ दिखे तब भी भी समझना नहीं कि किसी व्यक्ति के कारण आनंद आया, किसी वस्तु के कारण आनंद आया, और वस्तु और व्यक्ति से अगर 48:54 आनंद आता है, और उनको सत्य मानता है तो ब्रह्म वेता नहीं है,जय राम जी की, ब्रह्म वेता अपने 49:01 आप में तृप्त होता है, सामान्य बच्चा कपड़े पहरता  है तो शोभायमान होता है, और कृष्ण जो 49:07 चीज पहर हैं वह चीज शोभा देती  है, उसकी कीमत बढ़ जाती 49:13 है, सामान्य आदमी वस्त्र अलंकार से बच्चा शोभायमान होता है, लेकिन जो ब्रह्म वेत्ता  है 49:20 वो  जो भी करता है वो शोभायमान होता है, 


49:29 जड़ भरत कहारों की जगह भर रहे तभी भी शोभनिय हैं  49:37 अष्टावक्र यूँ यूँ  चल रहे तब भी शोभनिय हैं , कृष्ण यं कर रहे तभी भी शोभनिय हैं, राम जी हाय  49:43 सीता सीते सीते सीते कर रहे भाई लक्ष्मण 49:50 भाई लक्ष्मण लक्ष्मण लक्ष्मण तभी भी शोभा दे रहा है, और आप 49:59 कुछ नहीं, श्री 50:11 राम, 


 तो जो सजातीय विजातीय  स्वगत भेद से रहित ब्रह्म परमात्मा है, 50:19 उसके जीव जीव का भेद जीव ईश्वर का भेद जड़ चेतन का भेद आदि भेदों को मिटाकर जो अपने 50:26 आप में शांति पा लेता है, उसका अहंकार जो 50:35 जीवत्व का  वो गयव हो जाता है, और अनहंकार होने से ब्राह्मी स्थिति होता है , अनहंकार जो वो शोभनीय हो जाता है,  जैसे बच्चे में अहंकार नहीं है तो जो कुछ करता है वो 50:40 सुहावना लगता है, दबा हुआ अहंकार है, लेकिन ज्ञानी का व्यतीत अहंकार है इसलिए ज्ञानी 50:46 जो कुछ करता है मजे, कृष्ण जो करते हैं अच्छा लग रहा है, रण छोड़ के भाग रहे हैं तभी भी मजा आ रहा है, 50:52 और दे धमाधम हू बैठो अर्जुन दे धमाधम तो भी अच्छा लग रहा है, पूजे जा रहे 50:58 हैं, क्योंकि श्री कृष्ण के चित्त में किसी के प्रति राग नहीं और किसी के प्रति द्वेष 51:04 नहीं, दो अलग दिखते हैं पांडव कौरव लेकिन कृष्ण तत्व दोनों का एक जानते हैं, उनके 51:10 कर्मों के अनुसार चेष्टा लीला करवा देते लेकिन अंदर से कृष्ण निश्चिंत है, यह ज्ञान 51:15 थकान मिटा देता है जन्म जन्म के पापों को कर्मों को दूर कर देता है,करता पन  को भगा देता है, भोक्ता पन की भ्रान्ति को तोड़ देता है, अहंकार को अलविदा कर देता है यह तत्व ज्ञान है, हजार तुम कथा सुनो  51:27  हजार कथा कर रामायण की लेकिन ऐसा ज्ञान कोई निराली चीज है, ऐसा सुना था कभी,


 51:35 फिर, खाके देख, वो नैनीताल में कोई आ जाता 51:40 था, आश्रम में बोझा  उठवा 51:46 के, मजूर बोजा उठते नेपाल के लोग आते थे गरीबी है नेपाल में, वो लोग आते थे सीजन 51:53 में, बस स्टैंड पर खड़े उनको डुट्याल  बोलते है,  51:59 अपन मजदूर बोलते हैं, कुल्ली, कुल्ली सामान उतारा, और बाबा जी 52:05 मेरे को बोलते अरे महंत। .  जी, साइ, अरे इसको बांधो 52:10 जी मैं सा रस्सी लाता हूं,वो घबरावे, साई अंदर कुटिया में जावे, और मैं रस्सी लाने के लिए 52:16 ढोंग करू, वो  मजूर घबरावे जो दो रुपया लेना था वो भी लिए बिना चलने की सोचे, मैं उसको 52:23 रोक दू ठहर जा, अभी रस्सी  लाता ठहर जा, क्या बात है, नहीं ठहरो गुरु जीी ने आज्ञा  करा तेरे को 52:31 बांधे गा,  इतने में स्वामी जी आ जाए इधर आओ, हाथ ले मिठाई मिठाई खाता है कि नहीं, नहीं तो 52:38 बांधेगा,  बोले खा , खा चबा के खाओ, देखे खाना जानता 52:44 है कि नहीं, अरे जानता है अरे आशाराम ये तो मिठाई खाना जानता है, रस्सी मत लाना, मैं कहा    52:49 साईं  छोड़ दिया मैंने, मिठाई खाना जानता है चबा चबा के, 52:55 पूड़ी  का दे देंगे घर में जाकर दो दिन खाना थोड़ा 53:00 थोड़ा, मिठाई खाएगा कि नहीं खाएगा, कैसी लगती मीठी? इउ …  लीला की मिठाई दोपहर को भी मीठी, 53:07 रात को भी मीठी, सुबह को मीठी, शाम को मीठी, मजूर चाहे अपना अर्थ ले ले लेकिन हम 53:14 समझते थे कि लीलाशाह बापू का ज्ञान जब विचारो तब मधुर, व लीला की मिठाई है तत्व 53:19 ज्ञान, जब सोचो जब, 53:26 गम टली चिंता मा गम टला भय मा गमला मा गया तत्व ज्ञान में आ जाओ लीलाशाह  बापू की मिठाई में, मधुरता आ 53:35 जाएगी, ओम 53:41 ॐ ॐ, 

 एक बार वो ऑब्जर्वेटरी थी, वैद्यशाला, 53:47 चांद तारों का फोटो लेते हैं, अंतरिक्ष की 53:52 रिसर्च करने वालों के, आश्रम के एक आधा किलोमीटर दूर, तो नैनीताल का वह देखने की 53:57 प्लेस है, तो कुछ जबलपुर के लोग आए थे व देखने गए थे लेकिन वो उलझ गए, उस समय बाबा जी 54:03 पत्थर कट्ठे कर रहे थे और हम भी उनके साथ थे, तो सिंधी लोग थे, उन्होंने सोचा कि नन 54:10 खाखड़ी पूछू सिंदी में बात करा मेरे को बोला कुली इधर आओ, व कपड़े तो ऐसे ही थे कच्छा और य 54:18 ऐसा चादर, ऑब्जर्वेटरी कहां है, मैं कहा व सामने दिख रही है उधर से जाक 54:27 माइयां  भी थी बच्चे भी थे सैलानी लोग थे, किधर से पग डंडी जाएगी कैसे देखेंगे व 54:34 साई ने कहा ठहरो ठहरो भाई मैं दिखा देता हूं, चलो मेरे पीछे पीछे आ जाओ,  साई आगे 54:39 आगे चले और इन्होंने पगडंडी पर लाइन लगी तो आगे तो इंजन और पीछे अपने 54:45 गार्ड, व माइया अंदर अंदर बोल कुली, वो  कुली दिखता तो बूढ़ा है लेकिन चलता तो तगड़ा 54:52 है, साई जी तो मजे में सारा  सुन रहे  लेकिन गाड़ी चल रही, मेरे से सहन नहीं हुआ?  मैं क्या 54:59 हमारे गुरु जी के लिए ऐसा मैं सुनू यह तो मैंने उनका हाथ पकड़ा आदमी का, मैंने कहा  तुम सिंधी हो? हां बोली तुम भी सिंधी लगता 55:08 है?  मैं कहा हम भी सिंधी है? तुमने लीलाशाह बापू का नाम सुना है ? 55:14 हाँ वो तो  बुद्ध है, नालो तो बुध नाम तो बहुत सुना है, और हमने सुना है कि नैनीताल के जंगलों में 55:19 रहते हैं, यह भी सुना है, मैं कहा लीला सा महाराज के दर्शन किए?  बोले दर्शन कहां भाग में ?55:25 जिनको तुम कह रहे कुली कुली वही है तुम्हारा बाप लीला शाह,  फिर तो ऑब्जर्वेटरी क्या जाते पैर 55:33 पकड़े, तोवा जाइ , साईं  ने कहा कोई बात नहीं, कि दादा भूल थीवे दादा भूल थीवे, ******

 गर्मियों के दिन में बाजार में बाबा जी के समाधि कर चाहे बैठो टांग पर टांग चढ़ा 55:48 के, ब्रह्म बता के तो ऐसे ही है, मौज है उसकी, तो जहां बसें आती है ना वहां कहीं बाबा 55:55 जी बैठे थे, सब निजारा देख रहे थे 56:00 खेल, बसें  आई पैसेंजर है फिर तो कुली कुली फिर सिलम पीते हुक्का पीते बीड़ी पीते गप 56:07 सप लगाते, आपस में झगड़ पड़े और साई देख रहे, झगड़ा किस बात का है साईंने देखा कि 56:14 इसने इन लोगों ने कमरा लिया है, और कमरे का किराया है बत्तीस रूपए,  और ये  है पंद्रह, दो दो रुप निकाला 56:24 है तो साई ने कहा कि यार दो हमारा ले लो 15 तुम 16 वां  में अपने साथ में 56:30 रहेंगे, और कई महीनों तक हर गर्मी में कई वर्षों तक साई उनके साथ 56:37 रहे, ड्यूट वालों के साथ, दो रुपये  में मेंबरशिप मिल गई, कौन अपना आश्रम बनावे?, बाद 56:43 में बनाया तो बनाया,लो  ब्रह्म वेता की 56:49 लीला, बस स्टैंड पर नहीं मजदूरी करते हैं, नैनीताल के इलाके में जरा जाड़े होते हैं, उनको डुट्याल,  बोलते हैं कुली कुली समझते ना आप 56:58 लाल कपड़े कमीज के बिना का कुली समझ लो, उधर लाल कपड़े नहीं पहनते, 15 तो वो कुली दो दो  रुपये  निकाले  और सोहलवें  57:07 कुलियों के बाबा, मेंबर हो गए उनके साथ रहने लग गए, लो हा तुम ब्रह्म वेता को कैसे 57:12 तूलोगे, तस्य तुलना केन जायते 57:18

 गुरुदेव दया कर दो मुझ पर, मुझे अपनी शरण 57:26 में रहने दो, मुझे ज्ञान के 57:32 सागर से स्वामी अब, निर्मल गागर भरने दो, गुरु देव 57:43 दया कर दो मुझ पर, तुम्हारी शरण में जो कोई 57:52 आया हो, तुम्हारी शरण में जो कोई आया हो 58:01 पार हुआ सो एक ही पल में, पार हुआ  58:09 सो एक ही पलमें,  इस दर पे हम भी आए हैं, इस दर पे 58:20 गुजारा करने दो, मुझे ज्ञान के सागर  से 58:28 स्वामी अब निर्मल गागर भरने दो ,    58:35 गुरुदेव दया कर मुझको, सिर पर 58:42 छाया घोर अंधेरा, हो सिर पर 58:49 छाया घोर अंधेरा हो, सुझत नहीं  58:57 राह कोई, सूझत  नाही राह कोई, ये नैन मेरे और  जोत तेरी, इन 59:09 नैनों को भी बहने दो, मुझे ज्ञान के 59:16 सागर से स्वामी अब निर्मल 59:22 गागर भरने दो , गुरु  देव दया 59:30 कर, चाहे तिरा दो चाहे डुबा 59:37 दो, चाहे तिरा दो चाहे डुबा 59:44 दो, मर भी गए तो देंगे 59:50 दुहाई, डूब  भी गए तो देंगे दुहाई, 59:57 ये नाव मेरी और  हाथ तेरे, यह नाव 1:00:05 मेरी हाथ तेरे, मुझे भव सागर से तरने दो मुझे 1:00:14 ज्ञान के सागर से स्वामी अब निर्मल गागर 1:00:24 भरने दो ,  गुरु गुरुदेव दया 1:00:30 कर दो मुझपर, तुम्हारी शरण में जो भी 1:00:36 आया हो, तुम्हारी शरण में जो कोई 1:00:43 आया हो, पार हुआ सो एक ही पल में, पार हुआ 1:00:53 सो एक ही पल में , इस दर पे हम भी आए हैं इस दर पे हम भी आए 1:01:06 हैं, इस दर पे गुजारा करने दो मुझे ज्ञान के 1:01:14 सावर से स्वामी अब निर्मल 1:01:20 गागर भरने दो, गुरुदेव है 1:01:29 चाहे तिरा दो चाहे डुबा 1:01:34 दो, चाहे तिरा दो चाहे डुबा 1:01:41 दो, मर भी गए तो देंगे 1:01:46 दुहाई, मर भी गए तो देंगे 1:01:52 दुहाई, ये नाव   मेरी और हाथ तेरे, ये है नाव मेरी और हाथ तेरे 1:02:04 मुझे भव सागर से ने दो, मुझे ज्ञान के 1:02:11 सागर से स्वामी अब निर्मल 1:02:17 गागर भरने दो, गुरु देव दया कर 1:02:25   सिर पर छाया घोर 1:02:32 अंधेरा हो सिर पर छाया घोर 1:02:38 अंधेरा हो,  सूझत  नाही राह कोई सूझत  1:02:48 नाही राह कोई ये नैन मेरे और ज्योत तेरी, 1:02:56 यह नैन मेरे अब जोत तेरी इन नैनों को भी 1:03:04 बहने दो, मुझे ज्ञान के सागर से स्वामी अब निर्मल गागर भरने दो  1:03:17 में गुरु देव दया करदो मुझपर


संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था सत्संग के मुख्य अंश : राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है । करने, जानने और मानने की शक्ति...