मंगलवार, 6 मई 2025

Sukshm Gyan part - 1 (सुक्ष्म ज्ञान - आश्रम संध्या सत्संग 14-02-2026 सुबह )


 सुक्ष्म ज्ञान - आश्रम संध्या सत्संग 14-02-2026 सुबह

TIME STAMP INDEX 

0:02 आत्मा का ज्ञान और प्रीति न होने से जीव दुखी है
0:19 आत्मा परमात्मा पर दो आवरण
0:58 अस्त्वापादक और अभानापादक आवरण
2:38 चित्त के दो भाव जगत भाव और ब्रह्म भाव
3:37 चित्त बोध और ब्रह्म बोध का अंतर
4:59 वृत्ति क्या है और उसका स्वरूप
5:45 वृत्ति का जगत की ओर और ब्रह्म की ओर जाना
7:05 गुरु और शिष्य का पक्षियों वाला प्रसंग (कहानी)
10:22 ब्रह्म बोध की प्राप्ति का अनुभव
14:40 सतगुरु की महिमा
18:51 ज्ञानी का व्यवहार और ब्रह्म स्थित अवस्था
19:36 राजा जनक और ब्रह्मचारी का प्रसंग (कहानी)
26:33 सिद्धियों की सीमा और ब्रह्म बोध की श्रेष्ठता
28:15 हनुमान जी को आत्मज्ञान का उपदेश (कहानी)

इंडेक्स के अनुसार कंटेंट: -

0:02 उसका ज्ञान ना होने के कारण जीव दुखी है और उसके लिए प्रीति ना होने के कारण परेशान है। आत्मा परमात्मा पर दो प्रकार के आवरण हैं।

0:19 जैसे सूर्य पर बादल का आवरण होता है वैसे ही आत्मा पर आवरण है। सूर्य होते हुए भी बादल से ढक जाए तो दिखाई नहीं देता।

0:58 एक अस्त्वापादक आवरण है जिससे ईश्वर है या नहीं इसका पता ही नहीं चलता। दूसरा अभानापादक आवरण है जिसमें मानते तो हैं पर अनुभव नहीं होता।

2:38 चित्त के दो भाव हैं। एक जगत भाव और दूसरा ब्रह्म भाव। जगत भाव से देह, राग, द्वेष और कर्म बंधन में फंसते हैं। ब्रह्म भाव से परमात्मा की प्राप्ति होती है।

3:37 एक चित्त बोध है जो संसार में उलझा रहता है। दूसरा ब्रह्म बोध है जो परमात्मा की सत्ता को जानकर उसी में स्थित होता है।

4:59 वृत्ति को ख्याल, सुरता, विचार भी कहते हैं। इंद्रियों से जुड़कर जो अनुभव होते हैं वह जगत की वृत्ति है।

5:45 सामान्य लोग जगत की वृत्ति में भटकते हैं। उत्तम साधक गुरु कृपा से वृत्ति को ब्रह्म की ओर मोड़ते हैं। परिणाम से बड़ा परिणाम करने वाला है।

7:05 एक शिष्य ने गुरु से मुक्ति मांगी। गुरु ने देखा कि उसकी वृत्ति अभी जगत में है। नदी पर पक्षियों को देखने भेजा। पहले उसे पकड़ने की इच्छा हुई। फिर इच्छा बदली। अंत में वह समझ गया कि सबमें वही चैतन्य है।

10:22 जब ब्रह्म बोध हुआ तो न पकड़ने की इच्छा रही न पाने की। सबमें अपना ही स्वरूप दिखा। तब शांति और आनंद की प्राप्ति हुई।

14:40 गुरु बहुत होते हैं पर सतगुरु दुर्लभ हैं। सतगुरु शब्द की चोट से भ्रम दूर करते हैं। ब्रह्म बोध से शिष्य सतगुरु बन जाता है।

18:51 ज्ञानी बाहर से खाते पीते और व्यवहार करते दिखते हैं, पर उनकी मुख्य वृत्ति ब्रह्म में रहती है। जगत उन्हें छू नहीं पाता।

19:36 एक शिष्य को गुरु ने राजा जनक के पास भेजा। जनक ने तेल का कटोरा देकर नगर घुमाया और तलवार लटकाकर भोजन कराया। शिष्य का ध्यान कटोरे और तलवार में रहा इसलिए जगत भीतर नहीं घुसा। यही ब्रह्म स्थित अवस्था है।

26:33 अष्ट सिद्धियां और चमत्कार भी जगत के अंतर्गत हैं। उड़ना या जल में रहना कोई बड़ी बात नहीं। जब तक ब्रह्म बोध नहीं तब तक सब अधूरा है।

28:15 हनुमान जी के पास सिद्धियां थीं फिर भी वे श्री राम के चरणों में गए। मोतियों में उन्हें आत्मरस नहीं मिला। तब राम ने आत्मज्ञान दिया। हनुमान जी ने कहा व्यवहार से मैं सेवक हूं, तत्व से मैं तुम ही हूं। तब राम ने उन्हें आलिंगन किया और कहा अब नाम मेरा होगा पर जय तुम्हारी होगी।

 Manual Transcription

 

 0:00 एक चित् बोध है और दूसरा ब्रह्म बोध है। चित बोध जगत है ,और ब्रह्म बोध मोक्ष है ।0:09 चित्तबोध अहंता  का नाम है । जब तक चित बोध फुरता है, तब तक संसार है, और जब चित का 0:19 अभाव होता है , तब मुक्ति होती है । इस चित के अभाव का 0:26  नाम बह्म बोध है। आत्मब्रह्म की सत्यता हृदय में न भाषित 0:34 हो तो ,वह अस्त्वापादक आवरण है ,और जब आत्मा की 0:39 सत्यता हृदय में भासित हो, परंतु दृढ़ 0:44 प्रत्यक्ष   भदित ना हो तो वह 0:56 अभानापादक आवरण है।

उसका ज्ञान न होने के कारण दुखी है, उस के लिए प्रीति ना होने के कारण,जीव परेशान है। 1:03 आत्मा परमात्मा के ऊपर दो प्रकार के ] 1:16 आवरण होते है,जैसे सूर्य पर बादलो का आवरण होता है, तो सूर्य होते हुए भी नहीं दिखता। बैटरी 1:35   के सेल के ऊपर सील का आवरण होता है तो सेल होते हुए भी टोर्च जलती नही, क्योंकि सील है सेल पर । ऐसे ही अपने आत्मा परमात्मा चेतन्य पर दो प्रकार के आवरण है, एक अस्तवापादक आवरण, दूसरा अभानापादक आवरण ।

अस्त्वापादक आवरण  ईश्वर है कि नही है ,पता ही  नही है, लेकिन जो सत्संग करते है कुछ सुनते है, वह इस्वर ही हमारा आत्मा हो कर बैठा है, ऐसा ज्ञान पाते है, तो उनका अस्तवपादक आवरण तो हट जाता है। लेकिंन भान नही हो रहा है, मानते तो है, लेकिन अनुभव नही हो रहा है, भान नही हो रहा है, उसको बोलते है अभानापादक आवरण।

 तो अस्तवपादक आवरण सामान्य आदमी को, जो संसार में सत बुद्धि करते अपने को खपा रहे है, 2:43  उन अल्पमति के लोगो को अस्तवपादक  आवरण होता है। और साधक को होता है अभानापादक आवरण। 2:50 भान नहीं होता, जिस परमेश्वर का अनुभव करना है उसका भान नही होता। उसे बोलते है अभानापादक आवरण। ये दो आवरण हट जाए तो जेसे चन्द्रमा ठीक दिखता है बादल हटने से,सूर्य ठीक दिखता है हमारी आँख खुल जाए, बादल हट जाए तो सूरज दिखेगा, चन्द्रमा दिखेगा, ऐसे हि चित की दो अवस्था होती है|

एक ब्रह्म भाव। पहले पढा न चित के 2  भाव होता है 3:43 एक जगत भाव और दूसरा ब्रह्म भाव, जगत भाव से चित 3:51 राग को, द्वेष को, देह को  मैं मानता है,  3:56 और कर्म के बंधन में फसता है, और ब्रह्म भाव से 4:03 चित् 4:14   बह्म परमात्मा को पा लेता है,  बह्म भाव और जगत भाव , एक चित बोध है और दूसरा बह्म बोध,, चित्त बोध ) बोध कहो भाव कहो एक चित्त बोध है एक  ब्रह्म बोध, चित बोध तो सबके पास है ,ये गुलाब है ,ये फलाना है ये फलाना है ये चित बोध है,दूसरा होता है बह्म बोध। चित बोध,संसार के  चितता रहता है, सत्ता तो उसी की लेता है, परमात्मा कि, लेकिन चेतता है संसार को ।  4:55 वो  इस में खप जाता है। चित्त बोध, और   ब्रह्म बोध उसी की सत्ता लेकर उसी को पाता है। हाँ पढ़ो। .. 

एक चित बोध है, दूसरा बह्म बोध, चित बोध जगत है, और ब्रह्म बोध मोक्ष है। चित बोध अहन्ता का नाम है, जबतक चित बोध फुरता  है, तब तक संसार है, और जब चित का अभाव होता है तब मुक्ति होती है ।

मुक्ति माने खयाल इसको सूरता भी बोलेते है ,उसको संवित भी बोलते है ,उसको फुरना भी बोलते है ,उसको वृत्ति  भी बोलते है , उसको विचार भी बोलते है, तो एक वृत्ति जगत की ओर फुरती  है, आँख से जुड़ी देखा,कान से जुड़ी सुना,  नाक से जुडी सुंघा, जीभ से जुड़ी चखा, मन से जुडी वृत्ति  संकल्प विकल्प किया , बुद्धि से वृत्ति जुड़ी  निश्चय किया ।6:14 ये  हो गया जगत इसमें तो लाखों लोग भटकते विचारे। 6:21 जो उत्तम प्रकार के साधक है ,उनकी वृत्ति 6:28 गुरु कृपा से ,साधन से ,पुरुषार्थ से, ब्रह्म की और फुरती   है ।

ये देखा तो सही, देखेगा वो भी,खायेगा वो भी ,देखा ठीक है माया है सकल्प है फुरना है, देखा ये बड़ा सत्संग हॉल है ,लेकिन हॉल हमारे सकल्प का फुरना है  फुरना दिखा नही फुरना साकार हुआ तो ये हॉल दिख गया। फुरना विचार तो छोटा दिखता है और उसका परिणाम बड़ा दिखता है । परिणाम बड़ा दिखता है  फिरभी  परिणाम बड़ा नही है परिणाम पैदा करने वाला बड़ा है। नृत्य  नर्तक से बड़ा नही हो सकता है ,,गीत गायक से बड़ा नही हो सकता है , कविता कवि से बड़ी नही हो सकती। लेकिन कवि की कविता  अ… देखो उसकी पिकचर देखो तो लम्बा चोडा हो जाता है । कवि कालिदास के देखो दूसरे की देखो |

तो एक वृत्ति जगत की तरफ फुरती  है दूसरी वृति बह्म की तरफ फुरती है।

एक शिष्य ने गुरु को कहा, 7:38  गुरु जी आप अगर कृपा कर दें 7:45 तो मेरा कल्याण हो जाए ,मुझे  मुक्ति का अनुभव हो जाये। शिष्य प्यारा था,सेवाभावी था 7:53 सदाचारी था , भगवान की पाने  की तड़प थी, 7:59 ईमानदार था, जो कुछ मन में आता गुरु से निवेदित कर देता । गुरु ने देखा कि छोकरे की वृत्ति अभी तो जगत में है , जगत की वृति हटाने के लिए इसको प्राक्टिकल अनुभव करे ऐसा उपदेश दें । गुरु जोगी थे ध्यानकर देखा कि नदी में दो पक्षी आये है सारस सारसी, कभी कबार आते है, वो।जा बेटा जा नदी पर बेठो उधर क्या दिखता है और क्या विचार आता है, मेरे को बताना, गया नदी पर 8:44 अरे इतने बढ़िया सुंदर पक्षी 8:55 वाह इनको पकड़ कर ले जाएं पिजरे में रखें, पालें अपना बना ले तो कितना अच्छा। लेकिन वो सारस सारस पक्षी जैसे  मोर दिखता है तो पकडने थोड़ी है ।पकड़ना संभव थोड़ी एक आध  9:01 आदमी को।।वो उड़ जाएगा  । सारस सारसी उड़ गए । गुरु ने पूछा क्या विचार आया बोले वो ऐसे ऐसे उनको देखा ओर उनको  पकड़ के रखे  मजा आएगा।अच्छा कुछ समय बिता साधन भजन कुछ हुआ ,बुद्धि सूक्ष्म ,हुई गुरु ने कहा जाओ वापस कुछ मिलेगा। अब जो पक्षी दिखे, उनको पकड़ने की इच्छा तो नही हुई लेकिन मन मे यह आया कि हम जब भी आये ये हमे दिखे कितने अछे लगते है। कुछ समय के बाद गुरु ने कहा कि फिर जाओ फिर वे दिखे  10:0 अब के पकड़ने की ईच्छा नही हुई सामने आए इनको बन्धन में बांधने की भी इच्छा नही हुई,हम जब आये ये हमे दिखे ये इच्छा भी नहि हुई अबके हम भी इनके साथ  उड़े तो कैसा मजा 10:13 गुरु ने कहा बेटा अभी तत्त्व  ज्ञान सुनो । तत्व  ज्ञान सुना के दिखता अलग अलग है 10:21 लेकिन दिखता दिखने का साधन अलग है जिसकी सत्ता से देखा है वो एक है और जो दिखता है 10:27 उसमें और देखने वाले में मूल रूप से भेद ही नहीं ।10:33 वृत्ति   जगत के तरफ थी तीन  चार  बार । अब गुरु ने ज्ञान दिया वृति  ब्रह्मा की तरफ आ गई।

10:39 बहुत सूक्ष्म बात  है , भले अभी कठिन लगेगी इसको पचा लिया तो बड़ा 10:45 कल्याण हो जाता है। दस साल हरि ॐ हरि ॐ करे फिर भी यह ज्ञान तो पाना ही पड़ेगा।अब की बार गया तो वह पक्षी दिखे उनको पकड़ने की इच्छा नही हुई,हम आये तब ये आये ऐसी इच्छा भी नही हुई,इनकेसाथ उड़ने की भी इच्छा नही हुई अब पता चला कि पक्षियों के रूप में भी मेरा ही चैतन्य है और यहा साधक के रूप में भी मेरा ही चैतन्य है। 11:20 चिड़िया और उनके किलोल   में भी मेरा ही चैतन्य है आहा मैं ही मैं हूं 11:27  अब वृत्ति तो फुरि पर वो जगताकार नही है  ब्रह्माकार है | अब सब में सोल , चित निस्फुर 11:39 हो गया। अब सब मैं हूं ,अपने से कोई दूर चीज होती है तो उसको पाने की इच्छा होती है 11:45 अपने से कोई अलग चीज है सो उससे हटने की इच्छा होती है दुख अलग है तो हटाना पड़ता है| सुख अलग है तो पाना पड़ता 11:54 है। तो अपने से कोई अलग चीज है तो उसको पाने  12:01 या हटाने का मजदूरी करना पड़ता है। अपने आत्मा को पाना और हटाना क्या ?12:09 मैं कपड़ा हटा सकता हूं लेकिन अपने आप को क्या हटाऊंगा।।कपड़ा को मीठाई को पाउगा , अपने आप को क्या पाना सदा है। तो सर्वत्र जो अपना आप ज्ञान के द्वारा समाज मे आ जायेतो फिर वो चित जगत बोध में होते हुए भी ब्रह्म बोध में चला जाएगा।ओर ब्रह्म बोध में चला गया तो बड़ी शांति , 12:40 बड़ा आनंद, सारे साधनाये वहां पुरी हो गई ब्रह्म बोध में चित चला है।

 12:48 जैसे खिलौने अलग-अलग होते है शक्कर एक कि एक । गहने अनेक अनेक 12:54 सोना एक का एक, मिट्टी अनेकानेक मिट्टी के 12:59 बर्तन अनेकानेक  मिट्टी एक कि एक। ऐसे ही चित में विचार  ओर जगत का आकर्षण अनेक पर उसका आधार एक का एक । उस एक के एक आधार को जो जान लेता है उसे जगत मे होते हुए भी ब्रह्म बोध हो जाता है।अब थोड़ा ये सुना ब्रह्म बोध का थोड़ी शांति मिली फिर चले जायेंगे जगतमे।मेरा तेरा आया फिर हटाएंगे ,फिर ब्रह्म बोध में आये तो इसमें जितनी प्रीति होती है जितनी सावधानी होती है उतना ही जल्दी परमात्मा का अनुभव होता है । और सारे पाप ,सारे आकर्षण , सारि बुराइया खत्म हो जाती है।नही तो कुछ भी करो कुछ न कुछ बुराई रह जायेगी, कुछ न कुछ पाप रहेगा 13:53 कुछ ना कुछ आकर्षण रहेगा कुछ ना कुछ विकर्षण रहेगा, 13:58 कुछ ना कुछ बंधन रहेगा चाहे कितना भी बड़ा आदमी हो जाए ।14:05 

जां लगी आत्म तत्व चीन्ह्यो नहीं तां लगी साधना सर्व जूठी। कितना भी साधन किया, धन 14:13 कमाने का साधन भी झूठा ,सत्ता अपने का साधन भी झूठा, रिद्धि सिद्धि पाया अंत में वो खत्म किया, आखिर 14:21 झूठा हो गया इसीलिए ये सब करते-करते आत्मा ज्ञान पाने की तरफ चलना चाहिए।

 14:29 वो आदमी पूजनीय हो जाता है वो तो सबका गुरु है चाहे कोई उसे माने  चाहे ना 14:36 माने वो तो गुरु है गुरुओं का भी गुरु है । सत्य का बोध हो गया उसको ,जिसको ब्रह्म का बोध हो गया, ब्रह्म सत्य है 14:45 जिसको सत्य का बोध  हो गया वह सतगुरु हो गया। 14:52 गुरु तो बहुत होते संसार में ,सतगुरु ऐसे कभी-कभी कहा कहा मिलते ।सतगुरु मेरा सुरमा,करे शब्द की चोट ,मारे गोला प्रेम का हरे भरम को कोट।। 15:07 जन्म जन्मांतर के जो भरम है वह सब दूर हो जाते हैं।

तो एक चित बोध ओर एक ब्रह्म बोध, छोरे को पहले चित बोध था सत्संग सुनते सुनते सूक्ष्म बात समझते समझते चित बोध में से ब्रह्म बोध में आ गया।अब पक्षी को फंसाने की भी इच्छा नही हुई,जब हम जाए तब आये ये इच्छा भी नही हुई, हम उनके साथ ऐसे बनकर घूमे ये इच्छा भी नही हुई। हम उड़ ही रहे है कहि पक्षी बनकर उड़ रहे है कहि पशु बनकर विचर रहे है ,कहि देवता बनकर, कहि दैत्य बनकर , कहि ये देह बनकर, ओर ये देह मिट जाती है फिर भी हम अमिट है सोहम,आंदोहम ब्रह हम ,चिदघन स्वरूपोहं

 16:01 शिष्य को जब गुरु के ब्रह्मबोध   की बात याद आई, तो चित ब्रह्म मय चित्त हो गया तो महाराज क्या हुआ ब्रह्म सुख ।16:16 ब्राह्मी स्तिथि प्राप्त कर कार्य रहे न शेष मोह कभी ना ठग सके इच्छा नहीं लवलेश  पूर्ण 16:25 गुरु कृपा मिली  पूर्ण गुरु का ज्ञान  गुरु भी पूर्ण हो और गुरु की कृपा भी पूर्ण मिल जाए ।पूर्ण गुरु की कृपा मिली पूर्ण गुरु का ज्ञान बस वो साधक से सिद्ध हो गया।

16:39 गुरु के द्वार आया गुरु ने कहा कि बेटा बोलो क्या चाहिए भगवान चाहिए?सद्गुरु के चरणों मे नतमस्तक हो गया। बोले मुक्तिचाहिये? उसके चेहरे पर ब्राह्मी शांति उसकी आखो में ब्रह्म तेज ,उसके ह्रदय में ब्रह्म भाव,गुरु ने पूछा बेटा क्या चाहिए भगवान चाहिए बोला नही मुक्ति चाहिए बोला नही ,रिद्धि सिद्धि चाहिए बोला नही,क्या चाहिए बोले क्या चाहिए कुछ नही चाहिए बोला कुछ नही चाहिए या कुछ चाहिए जगत बोध में फसा था तब था ,17:33 अब ब्रह्म बोध में ना कुछ छोड़ना है, ना पकड़ना है, ना पाना है, ना त्यागना है 17:41 पायो  कहे सो बावरा  खोया कहे सो कूर पायाखोया कुछ  नही। चित एक रस भरपूर 17:52 गुरु प्रसंन्न हुए के आज शिष्य शिष्य नहीं शिष्य सद्गुरु बन गया । सत्य का बोध हो गया ,सत्शिष्य था। शिष्य में से सतशिष्य से बनना होता है,सत्शिष्य से आज सद्गुरु का जन्म हो गया।    18:12 अब तो ब्रह्मा विष्णु महेश प्रश्सन्न करना नहीं पड़ेगा तुझे वह प्रसन्न 18:18 मिलेंगे ।ब्रह्मा विष्णु भी चाहते की आज जीव ब्रह्म रूप हो गया , ब्रह्म बोध से।18:26 अब तुझे मुक्ति पाना नहीं , अब तू ब्रह्म बोध से ब्रह्म मय हो गया है । ऐसे ब्रह्म बिध से 3 मिंट के लिए भी कोई सम्प्पन हो जाये तो इंद्र का राज्य भी कुछ भी नही,18:32 इतना महान हो जाता है। स्वर्ग का वैभव भी कुछ नहीं। इस जगत का 18:53 आकर्षण भी कुछ भी नहीं ,वह करेगा सब खाएगा, पिएगा लगा ,देगा सब करेगा 18:59 उठत बैठत वोई उटाने कहत कबीर हम इसी ठिकाने ।19:0 जगत के लोगों को जगत जैसा दिखेगा जैसे हम खाते , हम पीते हैं हम देते, रहते है  ऐसे 19:12 ज्ञानी भी देखेगा लेकिन ज्ञानी की वृति उसमें ब्रह्मा मय है ।

19:19 ऐसा एक सवाल अपने गुरु से शिष्य ने पूछा 19:31 गुरुजी आप आश्रम में है ये है वो है,राजा जनक बोलते है ज्ञानी है हमको समाज नही आता कैसे ज्ञानी है  ? गुरुजी ने कहा अच्छा जाओ जनक के पास में चिट्ठी19:39 लिख देता हूं ।जनक की वृति राजकाज करते जगत बोध  से 19:45 संपन्न होते हुए ब्रह्म बोध में कैसे? जरा देख कर आओ ।चिट्ठी लिख दी जनक राजा पर, जाने माने भजनानंदी संत थे। जनक राजा ने, उस ब्रह्मचारी को कहा कि अच्छा मेरे को ब्रह्मा ज्ञान कैसा हुआ उसका 20:08 अनुभव करना है, में अनुभव तो  बाद में कराऊंगा पहले दक्षिणा दो, एक काम 20:13 करो, कल सुबह तुम्हें नगर में जाना होगा। पूरा 20:19 नगर घूमना होगा । और मैंने आदेश जारी कर दिए है, नगर में खूब 20:27 सजावट होगी ,अच्छे अच्छे रास्ते  से रास्ते से तुझे दो जल्लाद ले चलेंगे ।20:34 तेल का कटोरा देता हूं पूरा नगर तुम घूम के आना । तेल का कटोरा देता हूँ 20:43 तेलके कटोरे में से बून्द गिर गई तो सिर उत्तार दिया जाएगा, अगर तुम ठीक   से  घूम के आ गये , फिर तुम्हे ब्रह्म बोध दे देंगे| ब्रह्म ज्ञान की बात ,20:57 सूक्ष्म बात  सुना देंगे प्राइवेट बात ।दिन भर नगर से गुजरा। कहि शहनाइयां बज रही, कहि तुरीया है ,कहि झांज ,कहि मंजीरे, कहि नर्तकियों,  कहि उत्सव, तो कहि बेंड बाजा ,तो कहि वैसे में   नगर में बहुत कोहाहल होता है , राजा ने कुछ विशेष भी रख दिये कहि कहि पर।21:17 पूरा दिन वह छोरा घुमा ब्रह्मचारी , शाम को आया और जनक ने देखा के कटोरे में से  21:24 से तेल नहीं ढूली , छल लोछल कटोरा भर था।1:30 अच्छा ठीक है ब्रह्मचारी , समय हो गया समय हो गया भोजन कर लो, फिर ज्ञान की बात 21:36 करेंगे । स्नान ध्यान कर के भोजन खंड में पहुचे । रसोईये को जो बताया था वैसे सारि  वयवस्था हो गई, परोसी गई थाली। हाथ मे जल लिया अब वो ब्रह्मचारी ने एक कोर मुह में रखा रसोईये ने कहा कि तुम खाते हो प्रेम से खाओ लेकिन ऊपर जरा देख लो कि ऐसे तलवार लटक रही है. ...। था तो कोई धातु की तार लेकिन लगती ऐसी की धागा , धागे में तलवार टंगी है, बस लगता है अभी गिरी अभी गिरी। हवा का झोंका आया की बस गिरी।वह खाता जा रहा है पर नजर पूरी की पूरी उस तलवार में टिक गई। अलग अलग चीजे है थाली में उनके स्वाद में राग नही , अस्वाद में  द्वेष नही। कहि नमक ज्यादा था तो, कहि शक्कर ज्यादा थी , तो कहि मिर्च ज्यादा था, और कहि बहुत बढ़िया था 22:35 और कही घटिया था । ऐसे थाल में व्यंजन थे, इधर 22:43 उधर से खाया , लेकिन उन व्यंजनों की खटास मिठास, अच्छाई बुराई चित पर नहीं हुई चित पर 22:50 ज्यादा ध्यान उधर कर रहा । जे से थोड़ी पीड़ा होती है, फिर बड़ी पीड़ा आ जाये तो थोड़ी पीड़ा आदमी भूल जाता है। 22:5छोटा सुख होता है तो बड़ा सुख आ जाता तो छोटा सुख  भूल जाता है । ऐसे ही वह वृति वह चली गई,कैसे भी करके पेट भर लिया भूखा था राजा जनक ने भोजन के बाद उसको बिठाया बोले अब देखो 23:15 ब्रह्मचारी नगर मैं आज तो बहुत व्यवस्था थी,कितनी बाराते देखी तुमने? बोला आवाज तो खूब सुनाई पड़ता था पर बारात कितनी मुजे पता नही 23:26 क्यों? मेरा  पूरा ध्यान उधर  था। अच्छा क्या क्या देखा?  बोले महाराज क्या देखा क्या सुना बस तेल का बून्द का ढुल न जाए ।23:43 बून्द ढुल न जाये बून्द सम्भालने में सुख तो नही आ रहा था   लेकिन जिम्मेदारी महसूस करके तुम देख रहे थे ढुला नहीं तेल , तेल की बूंद नही ढुला 23:50 23:57 ठीक है कटोरा पर ध्यान था । इतना सारा नगर तुम्हारे अंदर कितना घुसा था ।24:03 बोले महाराज रति भर भी नहीं क्यों की ध्यान कटोरे में था । ऐसे ही हमारा ध्यान ब्रह्म में होता है इसलिए 24:10 इसलिए जगत हमारे में घुसता नहीं। 24:15 अच्छा भोजन के समय तुमने क्या खाया ? खीर भी बढ़िया बनी थी,श्रीखंड भी था फलाना भी था । बोले महाराज  24:24 अच्छा भी था कही कैसा भी था, बस पेट भर लिया कैसे भी , बोले क्यों? बोले तलवार अभी गिरी अभी गिरी। ....... तो वृति तलवारा कार थी कढ़ी कार वृत्ति नही बनी वृत्ति तलवारा कार थी सीराकार वृति नही बनी । मुह में डाला सीरा की बेसन की कड़ी है कि क्या है बस24:48 काम कर  लिया। अगर कभी खाया तो गौण वृति से मुख्य वृत्ति वह बनी रही।

ऐसे ही ब्रहवेता महापुरुषों को मुख्य वृति ब्रह्म में होती है और गौण वृति से व्यवहार करते है, 25:05 कभी कबार दोनों वृति से भी व्यवहार करते हैं लेकिन व्यवहार हुआ पूरा फटाक से वृत्ति 25:10 वहां पहुंच जाती है , जैसे आम के डाल से आपको आम तोड़ना है तो आपने हाथ लंबा किया, 25:18 डाल को झुकाया आम तोड़ दिया, अब हरि डाल है, उस में से आपने उस डाल से आम लिया है या पत्ते पत्ते कुछ आदि जो कुछ लेना था लिया , फिर डाल को छोड़ा तो वह ऊपर चली जायेगी । 25:35 अच्छा किसी ठूठा को आपने थाम के  रखा है तो ऊपर 25:40 है छोड़ दिया तो नीचे आ  जाएगा। अगर ठूँठा लग जाता है जमीन पकड़ लेता और 25:48 पेड़ होता है तो फिर उसकी डाल को आप खींच कर उतारेंगे तो उतरे छोड़ेंगे तो चढ़ जाएगी| 25:54 अगर उसने जमीन नहीं पकड़ी ठूठ ने, वह हरा भरा नहीं हुआ है तो उसको  आप थाम रखेगे तो थमेगा छोड़ देंगे तो गिरेगा ।26:06 ऐसे जिसने केवल जगत की वृत्ति बनाई उसको भगवान के तरफ वृत्ति थामनी पड़ती है, ऊपर 26:14 रखती पड़ती जब भजन ध्यान छोड़ दिया तो वृति फिर नीचे आ जाएगी।26:19 और जिसने ब्रह्मा अभ्यास करके वृति  की सिंचाई कर दी अपने चित की,, 26:27 हरा  भरा हो गया ब्रह्म ज्ञान से उसका चित, फिर उसके ब्रह्मवृति को ले आओ संसार में ,26:34 व्यवहार कर छोड़ दिया तो वहीं पहुंच गए ।। 

उठत बइठत वही उटाने। कहत कबीर हम उसी ठिकाने | 26:46 तो एक जगत बोध होता है दूसरा ब्रह्म बोध होता है, सचखंड का ज्ञान, अतल वित्तल का 26:54 ज्ञान, रसातल पाताल का ज्ञान ,अष्ट सीधियो का सामर्थ्य  भी जगत बोध  के अंतर्गत 27:00 है अष्टय सिद्धिया भी मानसिक जगत के तक ही है ये सारे हमने पापड बेले और बहुत सारा अभ्यास भी किया ।

जब तक ब्रह्मबोध नहीं होता है तब तक, एक 27:13 ऐसा भी हमारा समय था ऐसे 25 साल पहले 28 साल पहले 27:22 27:35 की साधन करते थे और सुबह सुबह घूमने जाते थे तो शरीर उड़ रहा है ऐसा भास होता। हमको उस दिशा में जाना नही था हमने वो साधना छोड़ दी।

उटुनिया महादेव वहां रुके थे लोक संपर्क नहीं था, अनजान हो के रहते थे ।27:41 थोड़े दिन साधना से हमको अमुक अमुक अनुभव होते थे। लेकिन वह भी है तो जगत के अंदर । अब शरीर से सिद्धि के बल से उड़े, पक्षी जन्मजात उड़ता है 27:51 क्या फर्क पड़ा? हम साधना करके उड़ जाए, 27:57 पक्षी तो जन्मजात उड़ सकता है, तो साधन भजन करके पक्षी जैसी योग्यता पा लिया तो क्या हो गया? 28:04 हम घंटा पर पानी में रह सके तो मेंढक आदि और जलचर रहते ही हैं । तो ये जो सिद्धिया है, कभी बड़ा शरीर कभी छोटा शरीर मिलता है आदमी को। ऐसे सिद्धियों के बल से आदमी बड़ा भी हो जाये,छोटा भी हो जाये 28:14 हनुमान के पास थी,  अणिमा, गरिमा, लागिमा अणिमा पराकाष्ठा आदि सिद्धिया थी।28:27 ऐसे हनुमान जी भी श्री राम के चरणों में गए और राम जी की सेवा की और राम जी 28:33 ने हनुमान जी को ब्रह्म बोध दिया , 28:40 सभा में मोतियों की माला मिली, तो हनुमान जी ने देखा की इन मोतियों में आत्म रस तो नही, ब्रह्म रस तो नही, राम रस तो नही, तो 28:50 मोतियों को फेंकने लगे हनुमान जी। तो वहां के जो जौहरी 28:56 थे जौहरियों ने कहा कि बंदर को तो जमरूप देना चाहिए, बन्दर क्या जान सच्चे मोती, लेकिन हनुमान जी बुद्धिमान थे , 29:03 रामजी पहचान गए की हनुमान जी को जगत की कोई वस्तु प्रसन्नता नहीं दे सकते । हीरे मोती जवाहरात से 29:10 हनुमान जी पसन्न  नहीं होते, मणिओं की माला से हनुमान जी प्रसन्न नही होते । तो आत्मा मणि का 29:17 उपदेश ही हनुमान जी के अधिकार में है, 29:23 राम जी ने हनुमान जी को आत्मा ज्ञान का उपदेश दिया। ओर ये उपदेश सुनते ही हनुमान जी , ब्रह्ममय चित हो गया 29:30 रामजी ने पूछा की हनुमान जी बताओ 29:39 अब मैं तुम्हें कैसा लगता हूँ, राम जी बोलते हैं हनुमान जी तुम बताओ अब 29:46 मैं तुम्हें कैसा लगता हूं ?? आप स्वामी,और में सेवक हु29:54 सृष्टि दृष्ट्याः   तुम इस्वर हो में जीव हु। तत्व दृष्ट्याः सो हम, जो आप हो वो में हु। 30:03 राम जी हनुमान जी को आलिंगन करते हैं । राम जी कहते हैं की हनुमान जी 30:09 अब तो नाम तो मेरा लेंगे लोग लेकिन जय तुम्हारी होगी राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की। 30:16 क्योंकि तुम्हारे पास तो सेवा का भी धन है और ब्रह्म धन है , ब्रह्म बोध का भी धन  है। 30:24 मेरे मंदिर में तो लोग दर्शन करने को आएंगे, लेकिन तुम्हारी हाजिरी जरूरी रहेगी ,30:29 और तुम्हारे मंदिर में तुम तुम स्वतंत्र रहोगे , धरती पर जितने भी राम मंदिर होंगे 30:37 विधिवत वहां हनुमान जी जरूर पाओगे और हनुमान जी के स्वतंत्र भी। 30:42 तो स्वामी से भी अगर गीना जाए तो सेवक की मूर्तियां ज्यादा है। जय राम जी की, एक तो सेवा का प्रभाव है, दूसरा स्वामी जो मिला है वही सेवक को मिला है ।

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