अभ्यास की महत्ता
सत्संग सार -
सत्संग -
0:03 बिना अभ्यास के नहीं होता कुछ ।आटा गुथने का 0:08 भी अभ्यास है तो गुथ सकते है,। रोटी बनाने का भी अभ्यास है तो बना 0:15 सकते हैं ।ऐसे ही संसार से तरने का अभ्यास करना पड़ता 0:21 है।
जप का अभ्यास है तो माला 0:27 घूमाते है ।साक्षी होने का अभ्यास हो ,सुख दुख के प्रसंग में उनसे पथक होने का आये। 0:37 चित के विचार चित्त के दोषों के 0:42 समय अपनी निर्दोषता का याद अभ्यास आ जाए चित के दोष शांत होने 0:49 लगएगे। जो जो ज्ञान की तरफ बढ़ता जाएगा त्यों त्यों दोष नाश होने लगेगे।
दोष अज्ञान से होते 0:57 हैं ना ,1:03 दोष सब अज्ञान से होते है ।आत्म ज्ञान का अभ्यास से दोष दूर होने 1:11 लगेंगे। योग के अभ्यास से भी चित्त के दोष दूर होने 1:16 लगेगे। जितना आदमी दुखी सुखी होता है उतना उसके अभ्यास की कमजोरी 1:23 है ।जितना आदमी भय भीत रहता है, मृत्यु का 1:28 भय है मौत आ जाए, और डर लगता है समझो अभ्यास की कमी है ,,अमर आत्मा को जानने 1:37 की।
आत्मा देव को नहीं जाना उसी लिए मौत का भय 1:43 है ,आत्मा देव को जान लिया तो मौत तो उसकी होती 1:48 नहीं ।शरीर को डरा डरा के रखो तभी भी हो एक दिन तो 1:54 मरेगा ।तो अविद्या है ,अज्ञान है ,आत्मा का ज्ञान नहीं, 2:02 आत्मा का ज्ञान के लिए 2:08 अभ्यास है।
बिना अभ्यास के कोई चीज सिद्ध नहीं होती , अभ्यास में वैराग 2:18 चाहिए, अंदर वैराग्य नहीं है तो आदमी जो भी काम करेगा सेवा करेगा तो भी स्वामी को 2:25 भोगी बनाएगा ,वैराग्य नहीं ना ,और और और ।
बिना अभ्यास और वैराग्य के ज्ञान जमता 2:33 नहीं, टिकता नही। अभ्यासेन कौन्तेय वैराग्येण ग्राह्न्ति।।2:41 ऐसा वैराग हो के अपने देह से भी वैराग 2:46 हो ,एक दिन छोड़ना है उसको ,अभी से अपना नहीं 2:52 मानो,।संसार का मानो।उसको तंदुरुस्त रखा ठीक है उपयोग करने के 2:58 लिए ,,है संसार का ।
महापुरुषों की युक्ति समझ के अपने 3:04 चित्त को शांत कर लेते उनको तत्व ज्ञान में फिर देरी नहीं 3:10 लगती बुद्धिमान को ।राग और द्वेष से बुद्धि दुर्बल हो जाती है ।राग द्वेष जितना कम होगा 3:18 उतना बुद्धि बढ़िया होगी।
एक चितेरे ने फर्स्ट क्लास चित्र 3:24 बनाया ,छ महीना तक बनाया ,पूरी कारीगिरी लगाई अपनी ,3:30 जाकर अपने मास्टर को दिखाया गुरु को ।गुरु ने कहा वाह ऐसा तो मैं भी नहीं बना 3:36 सका ।वो रोने लगा लड़का ,बोले क्यों रोता है ,जब मेरे कृत्य 3:45 से कमी कोई नहीं निकालेगा तो मैं आगे कैसे बढु। मेरे कृत्य से कमी नहीं निकलेगी तो मैं 3:54 आगे कैसे बढु।
कृत्य प्रकृति में होता है ना,, प्रकृति अपूर्ण 4:00 कोई कृत्य पूर्ण होता नहीं ।तो कृत्य करने वाला पूर्ण 4:09 कैसे ??कहने का तात्पर्य है कि जो ऊंचा उठाना चाहते हैं ना ,हम ऑफिसों में इधर उधर 4:15 होता है ना तो क्या तुमने बढ़िया बढ़िया क्या लिखा है ,,तुम्हारा हिसाब बढ़िया अप टू डेट कौन सा है? ऐसा थोड़ी ऑडिटर देखेगा ।4:22 गलती कहां है ,ऑडिट का मतलब है गलती कहां है ,कमी क्या 4:28 है।
ऐसे अपने जीवन में जो कमी है उसको देखो, 4:34 दिखेगी तब जब तुम्हारे से दूर होगी ।अब तुम देखोगे नहीं तो तुम्हारे में 4:39 बैठ जाएगी ।तुम तुम देखोगे तो तुम्हारे से दूर 4:44 हो जाएगी ,दूर होगी तभी दिखेगी ,तो फिर अपने में मानो नहीं उसको । ये मेरे 4:52 में नहीं है ,ये जो कमी दिख रही मेरे में नहीं चित्त में है ,चित्त का मैं दृष्टा हूं साक्षी हु,,,,।5:00 ओम आनंद।
आप इस प्रकार का अभ्यास बनाओ कमिया भी निकलती जाएगी ,आत्म ज्ञान भी होता 5:06 जाएगा ।युक्ति है जब तक आत्म ज्ञान नहीं होता तब तक 5:12 दृष्टि का ,भी वाणी का ,कान का ,संयम करना 5:18 चाहिए। चित्त से ब्रह्मचर्य के विरुद्ध कोई फुरना उठा तो उसी वक्त पतन होना शुरू हो 5:25 जाता है। तन का ,मन का ।5:32 एकांत में भगवान को गुरु को प्रार्थना करना चाहिए ,रोना चाहिए ,कि मैं ऐसा अभागा हो रहा हूं ,मेरे 5:40 चित्त में ऐसे दोष हो रहे हैं ,हृदय पूर्वक जब तक प्रश्चित या प्रार्थना नहीं होती तब 5:45 तक भीतर से दोष निकलते भी नहीं ।
गुरु या पिता दोष निकालने को करे 5:53 लेकिन आदमी स्वयं जब तक उसमें डटता नहीं अपने दोष निकालने में तब तक गुरु और पिता का भी 5:59 उपदेश 100 फायदा नहीं करता ।हम लोग दोष छुपाते 6:05 हैं दोष को पोशते हैं हम लोग। दोष को छुपावे नहीं, दोष को पोशे 6:12 नहीं, दोष दोषों से पृथक हो। ब्रह्म परमात्मा निर्दोष है ।हम भी 6:21 पृथक होंगे तो निर्दोष होंगे ,और उसमें उनको छुपाएगे तो अपने में 6:26 भरेंगे ।कोई चीज छुपाने के लिए क्या करना है,अपने घर में रखनी पड़ती है 6:34 ना, छुपाते तो क्या हो अपने घर में रखते हो ऐसे कोने में रखते हो कि घर में नहीं रहती 6:41 दिमाग में रह जाती है।फलानी जगह वस्तु डटी गाड़ दिया, दिमाग में भर 6:49 दिया ।
ऐसे ही दोषों को छुपाने से दोष दिमाग में आ जाते है, अपने शरीर में तो होते हैं फिर मन 6:57 शरीर में घुस जाते हैं, और भी पक्के छुपाते जाए और करते जाए तो 7:05 कारण शरीर में घुस जाते हैं, और वह कई जन्मों तक भटकाये ।
वृद्धावस्था आएगी नहीं कोई थूकेगा भी ,7:14 नहीं जवानी में भगवत प्राप्ति कर लिया तो ठीक है नहीं तो बुढ़ापे में तो कोई सामने 7:19 हमारे देखेगा भी नहीं, अगर हम पतन के रास्ते चले ।मरने के बाद फिर पतन के रास्ते चले तो 7:28 वृक्ष बनेंगे ,कौन हमारे को प्रणाम करेगा, गधा बनेंगे, भैसा 7:34 बनेंगे, शुकर कुकर सुअर बनेंगे ।तब ये जिनको 7:40 थैंक यू कहते हैं धन्यवाद कहते हैं वह लोग छुड़ाने को आएंगे 7:45 क्या?? जिनके साथ हम ममता का विचार व्यवहार रखते हैं वे 7:54 लोग छुड़ाने को आएंगे जब हम गधा बनेंगे ,सूअर बनेंगे ,भैस 8:02 बनेंगे ।
बुद्धिमान इशारे से समझ 8:07 जाये। बुद्धिमान को अभ्यास करने में देर नहीं 8:14 लगती ।मूर्ख लोग तो फिर बहते रहते हैं उसी बहाव में ,जो गिरावट की आदत पड़ गई बोले अब 8:20 हमारा निकलना मुश्किल है। नहीं कीतना भी गिर गया निकलने को तैयार हो 8:29 जाए निकले ओर गिरता चला जाए तो गिरे।। कठिन भी नहीं है एकदम 8:39 सुगम, और सुगम नहीं है, महा कठिन है महा 8:45 कठिन ईस लिए है ,जो बदलने वाला शरीर है, बदलने वाला अंतःकरण है ,बदलने वाली 8:54 अवस्थाएं हैं, नष्ट होने वाली चीजें हैं ,उनके साथ चिपक जाते है हम उसी इसलिए महा 9:01 कठिन ,,और जो सब बदलाहट को देखता है उस मै साक्षी पने में स्थित होने का 9:10 अभ्यास नहीं है ,इसीलिए कठिन लग रहा है ।अभ्यास कर ले तो 9:18 सरल हो जाए ।अभ्यास की कमी से ही हम लोग पिछड़ जाते 9:24 हैं ।
अभ्यास कही जंगलों में जाकर करना ह??,नही। 9:30 अमुक जाकर करना है???नही।। जहां आत्म भाव जगाने 9:35 का वातावरण मिले ,जहां जगा सको ,वह जगह अच्छा है ,और 9:43 आत्मा सत्संग में जगेगा आत्मा आत्म देव की बातें सुनने से 9:49 जगेगा ,इसीलिए ज्ञानवानों की संगति करो।
वशिष्ठ जी कहते हैं संगति माना उनके वचन 9:57 सुनकर फिर वो अपने वचन बना लो ।उनका अनुभव सुनकर अपना अनुभव बनाओ। ओर ये अभ्यास 10:07 है, शरीर की ऐसी इतनी आवश्यकताएं ना बढ़ाओ, शरीर का इतना परिचय ना बढ़ाओ, इतना संसार 10:14 का व्यवहार ना बढ़ाओ, कि परमात्मा देव में जगने का अभ्यास करने का मौका ही ना 10:23 मिले,। इसलिए समय बचाकर थोड़ा तो एकांत में बैठकर अभ्यास करो ,एकांत का जमा हुआ अभ्यास 10:28 फिर व्यवहार में में ले आओ ।व्यवहार करते करते परिस्थितियां जो आए उसमें साक्षी होने का अभ्यास करो। 10:34 महा सुगम है।
अभयास पर पहलवान ओर बाबा की कहानी
बड़ा पहलवान था ,लोगों की नजर 10:43 में ।एक बड़ा विशाल भैसा मोटा ,उसको उठाता 10:49 था रोज ।गांव के लोगों ने कोई साधु को कहा कि अमुक आदमी भैंसा उठाता है ।है तो पतला 10:58 दुबला लेकिन भेसा बड़ा मोटा ,उसको उठा 11:03 लेते वो, बड़ा अद्भुत पहलवान जैसा काम करके दिखाता, यह क्या कारण होगा। महात्मा ने कहा 11:10 चलो हम पूछ के बताते हैं देखें,, उससे कहा कि भाई तुम इतना 11:17 बड़ा भीमसेनी भैसा उठाते हो हो तो पतले दबले ।।महाराजय जब भैस जन्मा था उस दिन 11:26 मैंने उसको कंधे पर उठाया दूसरे दिन भी उठाया ऐसे मैं रोज इसको उठाता हूं रोज यह 11:32 बढ़ता गया और मैं उठाता गया तो अभ्यास मेरा बढ़ गया ।
वशिष्ठ जी कहते हैं कि अभ्यास जिसमें 11:39 किया वो वस्तु सुगम हो जाती है ।बिना अभ्यास के सिद्ध नहीं होती। आत्म भाव का 11:46 अभ्यास, जगत के मिथ्यतव का अभ्यास ।शरीर शरीर की परिस्थिति 11:53 संसार ये सब बह रहा है ,बदल रहा है उसको देखने का अभ्यास आ जाए ।12:00 अपने को अपने आप में जगने का अभ्यास। विकार आया ,क्रोध आया, कि अछा क्रोध 12:06 आया अरे आ गया क्रोध ,ऐसा करके भी जग गया तो, अब 12:11 जगने का आदत पड़ जाएगा ।बोले और तो सब ठीक है ज्ञान भजन ध्यान समझ में तो आता है 12:17 लेकिन स्वामी जी मन में यह बेईमानी है, विकार नहीं 12:25 छूटते ,।साधक बनकर बेईमानी रखना, 12:31 अपने को परमात्मा का बनाकर फिर बेईमानी 12:37 रखना ,सत्संग कोई बेईमानी रखने का तो रास्ता नहीं है ,बेईमानी छोड़ने का मार्ग 12:44 है । ईश्वर की वस्तुओं को अपनी मानना ये बेईमानी 12:50 है ।ईश्वर की वस्तुओं को अपनी मानना ये 12:56 बेईमानी है ।
बेईमानी छोड़ने का करो तो बेईमानी छूट जाए। बस अपनी ना मानो बेईमानी छूट 13:04 गई। ईश्वर की है ईश्वर की वस्तु है ,तो उसका ठीक सदुपयोग 13:12 करें ,अपनी इधर उधर हो जाए तो कोई वादा नहीं फालतू हो जा। बिगाडो ,ईश्वर की है ,,भगवान 13:19 की है ,मैंनेजर काम करता है ना बड़ी कुशलता से करता है नफा होता है तो 13:27 फर्म का होता है,घाटा होता तो फर्म का होता है। वह करता काम अपने दिलचस्पी से उस मैनेजर 13:34 का प्रमोशन होता जाता है। फर्म के नफे और घाटे से उसको उतना राग 13:40 द्वेष नहीं होता। ऐसे ही शरीर की अनुकूलता प्रतिकूलता 13:47 से, परिस्थितियों की अनुकूलता प्रतिकूलता 13:52 से ,अपने को राग द्वेष नहीं होना चाहिए।
शरीर भी एक कंपनी है ,13:59 फर्म है ,इसको खिलाओ पिलाओ, चलाओ ,संभालो तंदुरुस्त रखो हुशार बनाओ ,कुशल 14:07 बनाओ ,कंपनी का विकास करो, लेकिन मैनेजर बन कर ।14:13 प्रकृति की दी हुई चीज है और प्रकृति ईश्वर की है ।ऐसा अभ्यास हो जाए तो भी 14:19 ठीक।
वेदांत कोई तंदुरुस्त रहने की मना नहीं करता है।भोजन करने की ,व्यापार करने की ,धनवान 14:27 होने की कोई मना नहीं करता ।लेकिन यह बदलने वाले वस्तुओं से चिपक के 14:34 अबदल आत्मा को अबदल अपने स्वरूप को भूलकर जन्म मरण 14:41 के दुखों में जाने की बेवकूफी वेदांत सहन नहीं करता वो छुड़ाने की कोशिश करता 14:48 है।
हमारे मनुष्य जन्म का कितना बड़ा मूल्य है वो वेदांत समझाता 14:56 है। वेदांत की बातें समझकर ज्ञान की ,भक्ति की ,योग की बातें समझ कर उनका अभ्यास किया 15:02 जाए ।भक्ति ,योग ,ज्ञान वही ले 15:07 जायेगे, जहां ईश्वर चाहते हैं ।ईश्वर हमारा कभी अहित नहीं कर सकते 15:14 हैं ।जैसे मां बच्चे का अहित नहीं सोच सकती ,कर नहीं सकती ।ऐसे परमात्मा तो परम माय बाप 15:21 है, वह हमारा अहित नहीं करते हैं । ईश्वर तो चाहते हैं हमें जगाना ,इसीलिए हमको मनुष्य 15:28 जन्म दिया। कीट पतंग पशु आत्म ज्ञान के अधिकारी नहीं 15:34 है, भगवत प्राप्ति के। देव गंधर्व अधिकारी नहीं ,उनको भी भगवत 15:41 प्राप्ति करनी हो तो मनुष्य जन्म ।।तो मनुष्य ही तो अधिकारी है, और 84 15:50 लाख योनिया है उसमें वह अधिकार नहीं है मनुष्य जन्म में आत्म ज्ञान पाने का प्रभु 15:56 की प्राप्ति करने का अधिकार है ।भगवान ने तो अधिकारी बना दिया ,भगवान तो तुम्हें मुक्त करना चाहते हैं, भगवान तो अपने 16:04 स्वरूप का दर्शन तुम्हें कराना चाहते, तभी तो मनुष्य बनाया है । 84 लाख योनियों को दूसरों को अधिकार 16:12 नहीं है, देवताओं को भी अगर मोक्ष पाना है तो मनुष्य बनना 16:18 पड़ेगा। दैत्य असुरों को ,राक्षसों को, भैसा को ,या पेड़ को पौधे को थोड़े साक्षात्कार 16:23 होगा या भगवान की भक्ति होगी।।
मनुष्य है भगवत प्राप्ति का अधिकारी,,,, तो भगवान के तरफ से 16:30 तो हमको अधिकार मिल गया है भगवान के तरफ 16:35 से हमको मुक्त होने का, भगवत प्राप्ति करने का अधिकार मिला है ।
जब इतर योनि अधिकारी 16:43 नहीं है, इतर योनि को अधिकार नहीं है कि और देवताओं को भी अगर मुक्ति चाहिए तो मनुष्य 16:50 बनना पड़ेगा ।देवता लोग भी मृत्यु लोक में मनुष्य बनकर साधन भजन करने की बांछा करते 16:57 हैं ।तब कोई ऐसे देवता आकर फिर भगवत प्राप्ति कर लेते 17:04 हैं ,तो हमको मनुष्य जन्म मिला फिर श्रद्धा है, थोड़ी बहुत बुद्धि है, फिर सत्संग मिला, 17:12 तो यह सब ईश्वर की कृपा है ना ।।
ईश्वर ने इतना सहयोग 17:19 दिया तो फिर हम ढील क्यों करें ।अब ईश्वर जो चाहते हैं हमारा भला ही चाहते ना ,,,17:29 ईश्वर हमारा कल्याण नहीं चाहते हमको भैसा बना 17:35 देते, गधा बना देते ,ईश्वर हमारा कल्याण चाहते ना उनकी नजर में हम जच गए हैं, 17:42 उनको फिर फिर क्यों हल्की बुद्धि करके नीचे गिरे,, हल्के विचार करके नीचे 17:50 गिरे ,,बड़े-बड़े महलों में रहने से आदमी बड़ा नहीं होता, बड़े भाषण करने से आदमी बड़ा नहीं 17:57 होता ,,अथवा आकाश में हेलीकॉप्टर में हवाई जहाजों में उड़ने से आदमी बड़ा नहीं होता,, 18:04 बड़े विचारों से आदमी बड़ा होता है । छोटे विचारों से आदमी छोटा होता है।
ब्रह्मा के विचार 18:11 करो, मैं कौन हूं, यह शरीर आखिर कब तक 18:16 रहेगा ,,यह संबंध कब तक रहेंगे ,,मैं नित्य हूं, यह अनित्य 18:23 है ,,मैं एक रस हूं ,,ये अवस्थाएं बदलने वाली हैं ,,18:29 मन भी बदलता है,, बुद्धि के निर्णय भी बदलते हैं,, मैं अबदल हूं ,वो कौन 18:37 हूं ,,सत्संग में सुना है कि अबदल तो आत्मा है, तो मैं वही हूं ।।यह बड़े विचार 18:45 है अबदल में टिकने का अभ्यास करो ।महान बन 18:51 जाएगा।।
ऐसे महान ज्ञानवान अलग-अलग प्रारब्ध है, अलग-अलग 18:57 अपनी मौज है ,कई ऐसे ज्ञानवान है जो कंद्रराओ में बैठे है समाधि कर लिया स्वरूप को जान कर उसमें 19:05 विश्रांति ।।।कई ऐसे हैं के लीला करते हैं ,उपदेश करते हैं ,कई ऐसे हैं ,विनोद करके जीवन 19:11 बिताते हैं,, कई पागलों का वेश धर के बैठे हैं ,,कई ऐसे ज्ञानवान 19:20 है ,,जो नित्य नियम ,जप ,तप, कर्म करते हैं 19:25 वैसे व्यवस्थित ताकि दूसरे लोग भी उधर की तरफ मूड जाए कईयों का ऐसा स्वाभाविक होता है।।
19:33 तो कई ज्ञानवान अपने अपने ढंग से बोध होने के बाद शेष जीवन यापन करते हैं,, लेकिन 19:41 स्वरूप में जग गए एक बार परमात्मा का दर्शन हो गया ज्ञान हो गया फिर सारी 19:48 प्रकृति, सारी परिस्थितियां उनके लिए खिलवाड़ मात्र हो जातीहै , विनोद मात्र हो 19:56 जाती है। ।आश्चर्य त्रिभुवन जय ,,,,श्रुति कहती है वह 20:02 आश्चर्य कारक है ,बाले बाल वताम युवे युवा बच्चों में बच्चों जैसा ,जवानों में जवान जैसा, 20:08 गरीबों के साथ गरीब जैसा ,अमीरों के साथ अमीर जैसा, लेकिन अंदर से समझता कि सब खेल 20:15 है ।
अभ्यास करते तो आत्म ज्ञान होना कोई कठिन नहीं है। अभ्यास के बल से तो मैं ब्राह्मण हूं ,20:22 मैं वैश्य हूं, मैं क्षत्रिय हूं ,मैं जीव हूं, मैं फलाने का बेटा हूं ,मैं फलाना भाई 20:28 हूं, ये सुन सुन के तो माना है। मारो नाम मंगू बा ,,मारू नाम अमथा 20:36 लाल,, मारो नाम मफत लाल ,,,मफत लाल क्या ?बचपन में पडा नाम मफत 20:45 लाल सुन सुन के पक्का हो गया। 100 आदमी सो रहे हैं हेई मफत 20:53 लाल,,, ये भी तो अभ्यास से ही पड़ा है ।जो भी नाम पड़ा है जो भी 21:02 जिसका ,,ऐसे ही अपने आत्मा में जगने का अभ्यास करे।
ओम ओम ओम 21:13 ओम ,,दुराचार, 21:18 अश्रद्धा या फाका ,,ऐसा दुर्गुण है कि उसमें सब योग्यता नाश हो जाती है ।अहंकार जो है, फांका, 21:29 ऐसा दुष्ट है कि उसमें सब सद्गुण नाश हो जाते हैं ,और श्रद्धा ऐसा सद्गुण है कि उसमें सब 21:41 दुर्गुण बह जाते है।
श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती 21:47 है सात्विकी राजसी और तामसी
सात्विक श्रद्धा एक बार हो गई नहीं 21:57 डिगेगी उसमें ज्ञान बढ़ जाएगा। वचन सुनते ही गुरु के ,जिसमें 22:05 श्रद्धा है, श्रद्धा के वचन सुनके श्रद्धेय के, समझो मेरी मेरे गुरुदेव में श्रद्धा है 22:12 सात्विक श्रद्धा है, तो उनका वचन सुनूंगा ,,बस मैं अपने जीवन को ऐसा ढाल 22:20 दूंगा ये सात्विक श्रद्धा ज्ञान पैदा कर देती है। सात्विक 22:27 श्रद्धा जिसमें करेंगे उसके सब गुण अपने में आ जाएंगे। भगवान विष्णु में श्रद्धा है भगवान 22:35 विष्णु का जो सामर्थ्य है जो अंतर्यामी पना है वह अपने में आ 22:40 जाएगा। भगवान विष्णु को अपने स्वरूप का बोध है अपने को भी होने लगेगा ऐसा गुरु मिल 22:48 जाएगा। सात्विक श्रद्धा जो है एक बार हो गई तो हो गई ज्ञान करा के छोड़ेगी ।22:57 सात्विक श्रद्धा चाहे हजार मुसीबत आ जाए ,हजार प्रतिकूलता आ 23:03 जाए ,श्रद्धेय व्यक्ति का बाह आचरण नहीं देखती श्रधयेय व्यक्ति के आदेश 23:10 को ,सात्विक श्रद्धा ऐसी है कि जिसमें हम श्रद्धा करते हैं उसके दोष नहीं दिखेंगे ,उनका ज्ञान 23:19 हमको हजम होगा, उनके प्रति फरियाद नहीं होगी ।मेरी सात्विक श्रद्धा है जिसमें तो 23:28 उसके प्रति मेरे दिल में फरियाद नहीं होगी ।जैसे सुदामा,, सात्विक श्रद्धा थी और कृष्ण 23:40 ने दुशाला छीन लिया ,नंगे पैर रवाना कर 23:46 दिया ,खाने को कुछ था नहीं ,मांगने को आया एक कोड़ी भी 23:52 नहीं दिया श्री कृष्ण ने ,,जो दुशाला दिया था वो भी वापस ले लिया। तभी भी सुदामा कहता 23:59 के भगवान कितने दयालु है । साथ में पढ़े थे ,मेरे मित्र हैं, ,24:05 मेरे मित्र कितने दयालु है प्रभु, मैंने मांगा धन, संपत्ति ,रोजी रोटी, 24:12 लेकिन कहीं रोजी रोटी के मोह में फस ना जाऊ इसलिए मेरे को कुछ नहीं दिया। कितनी दया किया, बड़े अच्छे है ये सात्विक 24:22 श्रद्धा है ।
जब घर पहुंचते हैं ,तो सुशीला सज धज कर महारानी जैसी होकर आ रही 24:30 है दासियो के साथ,, 24:47 पूछते है ये कैसी बदल गई एकदम ,झोपड़ी की जगह पर महल । सुशील ने कहा कि तुमने वहां प्राथना किय्या भगवान ने यहा रिद्धि सिद्धि के सन लीला करके अमीरी में बदल दिया । बोले प्रभु कितने दयालु हैं ,,ज़24:53 मेरा भक्त रोजी रोटी की चिंता में कहीं भजन ना भूल जाए इसलिए ऐसा कर लिया। सब छीन लिया तभी 25:00 भी सात्विक श्रद्धा ऐसी है वह ज्ञान से अपना ज्ञान का उपयोग करके 25:07 सही अर्थ लगा लेगे ।
राजसी श्रद्धा जब तक आपके अनुकूल चला थोड़ा 25:14 बहुत ,ठीक ठीक चला ,घरता और थोड़ा पुचका ये वह तो राजसिक श्रद्धा टिकेगी। जहां थोड़ा 25:21 सा 19, 20 कुछ हुआ के मैं मारो सु दोष तो आ मा तोते मातो से ,,हिलेगी ।।
तामसी 25:30 श्रद्धा जो है वो तो थोड़ा सा 19, 20 हुआ विपरीत हो जाएगा ,दुश्मन बन 25:39 जाएगा, श्रद्धय का। कई लोग ऐसे होते हैं तामसी प्रकृति के 25:46 भगवान शिव की पूजा करेंगे ,फिर देखेंगे कोई इच्छा पूरी नहीं हुई ,शिव जी का फोटो फेंक 25:54 देंगे। कई लोग देवी देवताओं के फोटो रखते हैं पूजते हैं ,फिर अपनी इच्छा के अनुसार उनको नहीं 26:02 हुआ, तो वो देव को छोड़कर दूसरे देव को दूसरे देव को छोड़कर तीसरे देव 26:09 को ,।
अगर सात्विक श्रद्धा है तो बस लग गया तो लग गया और उसको गुरु के वचन भी ऐसे 26:17 लगेंगे जैसे शुद्ध वस्त्र को केसर का रंग चढ़ता है। सात्विक श्रद्धा ऐसी 26:25 चीज। अगर सात्विक श्रद्धा है तो स्वाभाविक होगा स्वाभाविक नहीं होता है तो फिर ऐसा 26:32 करने से सात्विक श्रद्धा हो जाएगा। ज्ञान का साधन है कि पुण्य क्रिया 26:38 करें ।दूसरों को सुख पहुंचाए जैसे अपने शरीर को दुख दुख के समय 26:44 दुख होता है, वैसे ही दूसरों को दुख ना 26:50 दे, जप, व्रत ,नियम ,शास्त्र पठन ,सत्पुरुष का सानिध्य, 26:58 उनके वचनों में विश्वास, ऐसा सब करने से सात्विक श्रद्धा होने लगता 27:05 है।
यह ब्रह्म विद्या का साधन है ।आत्म ज्ञान पाने 27:11 का। जो आत्म ज्ञान पा लिया, उसके आगे 33 करोड़ देवता का पद कुछ 27:18 नहीं । जिसने आत्म ज्ञान पा लिया उसके आगे इंद्र का राज्य कुछ नहीं। जिसने आत्म ज्ञान 27:26 पा लिया उसके आगे योग समाधि से हजार वर्ष का बनकर कोई बैठे हैं वह भी कुछ नहीं। 27:34 आत्मज्ञान एक ऐसी चीज है ,,हजारों वर्ष की समाधि करके बड़े योगी बैठे हैं लेकिन आत्म 27:41 ज्ञान नहीं है, तो कुछ नहीं। एक दिन वह फिर नीचे आ जायेगे ।
27:47 आत्म ज्ञान हो गया ,बेड़ा पार। तो आत्म ज्ञान का साधन 27:54 है, संतों की संगति ,सत शास्त्रों का विचार ,28:01 कभी-कभी लोग धैर्य छोड़ बैठते हैं, ईश्वर के रास्ते जो आदमी चलता है ना धैर्य ना 28:07 छोड़े तो पहुंच जावे ।धैर्य छोड़ देते हैं तो किसको साक्षात्कार हुआ इसका तो 28:14 नहीं हुआ, इसको भी नहीं हुआ ,उसको भी नहीं हुआ, लेकिन जन्म जन्म मुनि जतन कराए जन्म 28:20 जन्म तक जतन करते थे ऐसे लोग आत्म ज्ञान पाकर धन्य धन्य हो जाते थे ।28:27 अपने के दो दिन में चार दिन में दो साल में एक साल में इतना प्रयत्न नहीं तीव्र तो 28:33 अभी तक कुछ नहीं हुआ ,अभी तक कुछ नहीं हुआ, तो कई लोग ऐसे होते हैं ।अच्छा खाओ 28:40 पियो मौज करो।
गुटली डाल के मिट्टी डाल के पानी 28:46 पिला कर छोड़ देना चाहिए, कुछ समय जम 28:52 जाए अब गुटली डालना क्या है ,,,,कि ब्रह्म ज्ञान का सत्संग महापुरुषों से सुन के 28:58 हृदय में रख देना चाहिए ,सत्संग सुन के ओ हा हे हो वो बंदर जैसा फिर गुटली रख के 29:04 मिट्टी डाला और फिर निकाले तुरंत।गुटली डाल के छोड़ देना 29:11 चाहिए। ऐसे ही संस्कार डाल के उसको रख देना 29:17 चाहिए संस्कार ।संस्कार फिर खुले नहीं जो सुना है ज्ञान का संस्कार उसको जमाना 29:24 चाहिए ,फिर उसको पानी पिलाना चाहिए ,नित्य सत्संग करते रहना ये पानी पिलाना है, 29:30 सत्संग, सेवा ,परोपकार ये उसको पानी पिलाना गुटली में से छोड़ होता है लेकिन 29:37 जानवर खा जाए तो ??आम नहीं मिलेगा । उसकी रक्षा 29:43 करना ,रक्षा करना क्या है ,,,कि गधा खा ना जावे बकरी उसको चर ना जावे भैस उसको लपका 29:51 ना मार दे ,ऊंट उसको पैर से कुचल ना दे, इसके लिए वाढ करनी पड़तीहै । 29:58 जानवर आवे नहीं ,खेती में वाढ करते ना,,, नहीं करो तो 30:08 सफाया। ऐसे यह ब्रह्मज्ञान की खेती में वाढ करने के लिए अहंकार तो नहीं 30:15 घुसता ,गधा 30:22 दुशचरित विकार तो नहीं घुसते,पापाचरण तोघुसता ,, नहीं तो यह पौधा खा जाएंगे ।30:29 उसकी रक्षा करनी पड़ती जैसे पौधे की रक्षा के लिए वाढ है ,30:35 और जानवरों से बचा हुआ है ,ज़ऐसे इसमें खबरदारी की, विवेक की वाढ बनानी पड़ती 30:42 है ,लोभ, मोह ,विकार, वाह वही यह कहीं हमारा 30:47 पौधा उखड़ तो नहीं देगी। मान पुड़ी है जहर की खाए सो मर 30:54 जाए। कोई मान में गिरते हैं तो कोई काम में गिरते हैं, कोई लोभ में गिरते हैं, कोई मोह 31:02 में गिरते हैं, तो ये सब जानवर हैं जानवर जैसे पौधा खा लेता है ऐसे ही यह 31:10 विकार हमारी साधना रूपी पौधा चट कर 31:15 देते है।
तो धैर्य होना चाहिए धैर्य के साथ खबरदार तो जिसकी सात्विक श्रद्धा होती है 31:22 उसके अंदर य गुण अपने आप आ जाते हैं।