शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

मंगलमय दृष्टि - संध्या सत्संग - 28-02-2026 सुबह (मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है।)

 

मंगलमय दृष्टि - संध्या सत्संग - 28-02-2026 सुबह

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0:01 (सूत्र) मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन है — विषयासक्त मन बंधन का कारण, निर्विषय मन मोक्ष का कारण।

0:18 (सिद्धांत) बंधन-मुक्ति कोई देवता नहीं बनाते; शरीर और परमात्मा के बीच का सेतु मन ही निर्णायक है।

0:40 (उपदेश) लोकों को राजी करना (लोकानुरंजन) अलग है, सेवा करना अलग; धर्मगति के लिए सेवा आवश्यक है।

1:11 (विश्लेषण) “दूसरों को वश कैसे करें, राजी कैसे करें” जैसी पुस्तकें शोषण वृत्ति बढ़ाती हैं — यह तत्वज्ञान की दृष्टि से अनुचित है।

2:05 (चेतावनी) लोकानुरंजन से विषय-भोग तो मिल सकता है, पर मुक्ति दूर हो जाती है।

3:43 (दोहा) “पराधीन सपनेहुँ सुख नाही” — पराधीनता में सुख नहीं।

4:21 (सिद्धांत) धर्मानुकूल कामना-पूर्ति भी परमार्थ नहीं; परमार्थ है मन को शत्रु न बनने देना, विवेक से मित्र बनाना।

5:06 (सूत्र) “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः” — मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है।

5:42 (सिद्धांत) इच्छित पदार्थ से क्षणिक हर्ष; आत्मज्ञान से परम शांति।

6:22 (चेतावनी) दूसरों का शोषण कर कोई पूर्ण सुखी नहीं हुआ — इतिहास साक्षी है।

6:36 (कविता) “अगर आराम चाहे तू दे आराम खलकत को…” — औरों का बेड़ा पार कर, तेरा बेड़ा पार।

7:09 (वैदिक दृष्टि) सुख लेने की लिप्सा योग्यता नष्ट करती है; सुख देने से मन मित्र बनता है।

8:18 (आध्यात्मिक अनुभव) सुख देने की भावना से भीतर श्रीहरि का स्वाद जागता है; स्वतंत्र सुख प्रकट होता है।

8:32 (स्पष्टीकरण) वर्णाश्रम का कर्तव्य सामाजिक व्यवस्था है; परमार्थ उससे भिन्न है।

9:28 (विवेचन) कर्ता अनेक मान्यताएँ ओढ़कर कर्म करता है; परिणाम समय की धारा में नष्ट हो जाते हैं।

10:20 (चेतना) मृत्यु समय कर्ता अकेला रह जाता है; संबंध अस्थायी हैं।

11:54 (आलोचना) बाहर का व्यवहार सुधारने में तत्परता है, पर मन को सुधारने का प्रयास नहीं।

12:24 (चिंतन) बाह्य विकास हो रहा है, आध्यात्मिक पतन भी साथ-साथ हो रहा है।

13:22 (सत्य) संसार से पूर्ण सुख कभी नहीं मिला; यह समझते ही श्रीहरि की ओर मन मुड़ता है।

14:33 (दृष्टांत-कथा) बाबा और दो पथिक (कथा) — जैसा मन, वैसा संसार अनुभव; निंदक को निंदक वातावरण, सज्जन को सज्जन वातावरण।

17:26 (संवाद) “हम झूठ नहीं बोले; जैसा मन वैसा वातावरण।” (संवाद)

18:38 (परिभाषा) धार्मिकता भी परमार्थ नहीं; विषय-वासना रहित मन ही परमार्थ है।

19:05 (विश्लेषण) जिस कार्य में आनंद आता है, वहाँ मन आंशिक एकाग्र होता है; एकाग्रता में आनंद और सर्जन-शक्ति छिपी है।

21:26 (सूत्र) “अनुकूल वेदनीयम् सुखम्, प्रतिकूल वेदनीयम् दुःखम्” — अनुकूलता-प्रतिकूलता सुख-दुख के कारण।

22:22 (उपदेश) अनुकूल-प्रतिकूल सुख-दुख को पकड़े नहीं, साक्षी भाव से देखें।

22:50 (आत्मचिंतन) मिली वस्तु अस्थायी है; मन को देखने वाला सदा है — “मैं कौन हूँ?” की खोज मुक्ति द्वार खोलती है।

23:15 (विवेचन) मन दुधारी तलवार — दिव्यता की चाह भी, विषय-विकार की चाह भी।

23:57 (दृष्टांत) बिना दर्पण दूसरों का दोष दिखता है; दर्पण मिलने पर अपना दोष दिखता है। (दृष्टांत)

24:34 (साधना) दूसरों के दोष जैसे देखते हैं, वैसे अपने देखें; अपने गुणों में आसक्ति घटाएँ — मन शीघ्र शुद्ध होगा।

25:02 (साधक-नीति) अपकार भूलें, उपकार भूलें; वेद-वचन, माता-पिता-गुरु-वचन और गलती बताने वाले के वचन शिरोधार्य करें।

25:48 (दृष्टांत-कथा) हलवाई और परीक्षा परिणाम (कथा) — अपनी गलती दिखते ही क्रोध शांत।

26:46 (अद्वैत सिद्धांत) द्वैत से दुर्गुण जन्मते; अद्वैत ज्ञान से सद्गुण प्रकट होते हैं।

27:17 (निष्कर्ष) लोकानुरंजन नहीं, सेवा धर्म है; मोक्ष हेतु मन को निर्विषय करना आवश्यक।

27:30 (वर्गीकरण) भोगी तीन प्रकार — कनिष्ठ, मध्यम, उत्तम।

27:41 (कनिष्ठ भोगी) छल-कपट से “कैसे भी हैप्पी रहो” — पशु से भी अधम प्रवृत्ति।

29:52 (मध्यम भोगी) “जियो और जीने दो” — अपना हित, पर का अहित नहीं।

30:13 (उत्तम भोगी) शास्त्र मर्यादा से भोग, दान-पुण्य से स्वर्ग कामना; परंतु भोग-इच्छा शेष होने से परम शांति नहीं।

30:56 (अंतिम सिद्धांत) जब तक भोग-इच्छा है, तब तक बंधन है; मुक्ति हेतु इच्छा-शून्य, निर्विषय मन आवश्यक।


भगवद दर्शन से भी ऊंचा है सत्संग - आश्रम संध्या सत्संग 27-02-2026 सुबह |

 

भगवद दर्शन से भी ऊंचा है सत्संग - आश्रम संध्या सत्संग 27-02-2026 सुबह |

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0:00   आत्म शांति में रुचि रखने वाले पृथ्वी के देव

0:33   कबीर जी का वैकुंठ प्रसंग (प्रसंग)

1:03   सनकादि ऋषि और सत्संग की महिमा

1:14   केवल दर्शन से दोष नहीं मिटते

2:17   अर्जुन को श्रीकृष्ण का उपदेश और मोह नाश

2:54   सतगुरु तत्व बिना साधना अधूरी

3:15   कबीर वचन और भटकता जीव

4:03   भगवद्गीता श्लोक समुद्र दृष्टांत

4:39   तीन अनिवार्य जीवन सत्य

6:16   राम नाम ही सच्चा धन

6:41   यमराज और हाथी की कथा (कथा)

7:59   जीवित मनुष्य की चतुराई (कथा)

10:54   वैकुंठ भरने का रहस्य (कथा)

15:40   मनुष्य जीवन की महान संभावना

16:26   संत संग की आवश्यकता

17:27   तुलसीदास का परिवर्तन (कथा)

19:47   सच्ची प्रार्थना की शक्ति

22:36   संत द्वार का कुत्ता बनने की विनती (प्रसंग)

23:47   सत्संग का आह्वान (भजन)

24:46   कामनाओं का शुद्धिकरण

25:52   गरुड़ मोह और सत्संग से निवृत्ति (कथा)

28:34   सत्संग से अंतर्ज्योति जागरण

29:29   ज्ञानी पुरुषों की विशेषता


इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:00 (विवरण) जिनके जीवन में आत्म शांति पाने की रुचि और तत्परता है वे पृथ्वी पर के देव हैं। स्वर्ग के देव पुण्य क्षय करते हैं, जबकि पृथ्वी के देव दान, सेवा, सुमिरन से पाप नष्ट कर हृदय अमृत पीते हैं।

0:33 (प्रसंग) कबीर जी के पास भगवान का परवाना आया, पर वे वैकुंठ नहीं जाना चाहते क्योंकि वहां सत्संग नहीं। “राम परवाना भेजिया…” कहकर वे सत्संग की महिमा बताते हैं।

1:03 (विवरण) सनकादि ऋषि आत्मा-परमात्मा चर्चा में शांति पाते हैं। एक वक्ता, तीन श्रोता बनकर ब्रह्मचर्चा करते हैं और परम विश्रांति पाते हैं।

1:14 (उदाहरण) केवल भगवान का साकार दर्शन हो जाए तो भी काम, क्रोध, कपट रह सकते हैं। मंथरा, कैकयी, शूर्पणखा, शकुनि, दुर्योधन — सभी ने दर्शन किए पर दोष रहे।

2:17 (सिद्धांत) अर्जुन को श्री कृष्ण ने उपदेश देकर कृष्ण तत्व का बोध कराया। तब अर्जुन ने कहा “नष्टो मोह…” — ज्ञान से मोह नष्ट हुआ।

2:54 (सिद्धांत) सतगुरु आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार न कराए तब तक साधना अधूरी रहती है और मन सुख-दुख में डोलता रहता है।

3:15 (उपदेश) कबीर वचन “भटक मुआ भेदु बिना…” जीव की दशा बताते हैं। बिना तत्वज्ञान जीव वासनाओं में भटकता है।

4:03 (श्लोक) भगवद्गीता का “आपूर्यमाणम अचल प्रतिष्ठं…” — जैसे समुद्र नदियों से भरकर भी अचल रहता है, वैसे निर्वासनिक पुरुष शांति पाता है।

4:39 (उपदेश) तीन बातें अनिवार्य हैं — मृत्यु निश्चित है; बीता समय नहीं लौटता; लक्ष्य परमात्मा होना चाहिए। लक्ष्य बिना जीवन भटकन है।

6:16 (दोहा) “कबीरा यह जग निर्धन…” — राम नाम धन बिना कोई धनवान नहीं। बाहरी धन यहीं रह जाएगा, आत्मधन ही साथ जाएगा।

6:41 (कथा) यमराज और हाथी संवाद में हाथी कहता है मनुष्य बड़ा है क्योंकि वह बुद्धि से राज्य करता है। जीवित मनुष्य की शक्ति अद्भुत है।

7:59 (कथा) यमदूत जीवित किसान को उठा लाते हैं। वह चतुराई से यमपुरी का अध्यक्ष बनकर सबको वैकुंठ भेज देता है और भगवान से तर्क करता है।

10:54 (कथा) भगवान आते हैं, संवाद होता है। अंततः उसकी बुद्धि और परोपकार भाव से प्रसन्न होकर उसे और हाथी को वैकुंठ ले जाते हैं।

15:40 (सिद्धांत) मनुष्य भगवान का माता-पिता भी बन सकता है — दशरथ-कौशल्या, वसुदेव-देवकी उदाहरण हैं। पर सतगुरु बिना मनुष्य भटकता है।

16:26 (उपदेश) “संत जना मिल हरि जस गाइए” — संत संग से ही मार्ग मिलता है। गुरु बिना हरि मिलना कठिन है।

17:27 (कथा) तुलसीदास पत्नी आसक्ति से प्रेरित होकर अंधेरी रात में पहुंचे। पत्नी ने शरीर की नश्वरता समझाई — आधी प्रीति राम में होती तो भवभय मिटता।

19:47 (परिवर्तन) तुलसीदास रोकर प्रार्थना करते हैं — संत का शिष्य, द्वार की गाय, घोड़ा, कुत्ता बनने की विनती। सच्ची प्रार्थना से अंतःकरण शुद्ध हुआ।

22:36 (प्रसंग) भगवान ने कुत्ता या घोड़ा नहीं, तुलसी को संत तुलसीदास बना दिया — “तुलसी वन की घास…” कृपा से महिमा मिली।

23:47 (भजन) “कर सत्संग अभी से प्यारे…” — जीवन क्षणभंगुर है, देह जलानी है, अभी से ईश्वर संग करो।

24:46 (सिद्धांत) हल्की वासनाओं को निकालने हेतु अच्छी कामना अपनाओ। कांटे से कांटा निकालो। देवदर्शन, सत्संग से कुसंग मिटता है।

25:52 (कथा) गरुड़ ने राम को नागपाश से छुड़ाया, पर अहंकार से मोह हुआ। शिव ने उन्हें काकभुशुण्डि से सत्संग सुनने भेजा। सत्संग से मोह मिटा।

28:34 (सिद्धांत) दर्शन से मोह रह सकता है, पर सत्संग से मोह दूर होता है। सत्संग अंतर्ज्योति जगाता है — शांति, माधुर्य, ज्ञान लाता है।

29:29 (निष्कर्ष) जिनके हृदय में अचल शांति है वे अज्ञानियों को आत्मज्ञान देते हैं। आप भी सत्संग सहारा लेकर दिल मंदिर में प्रवेश करें और हर परिस्थिति में ज्ञान का सहारा लें।



आश्रम संध्या सत्संग 26-02-2026 सुबह ( किम भूषणाद् भूषणम अस्ति शीलम्)

 आश्रम संध्या सत्संग 26-02-2026 सुबह

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 0:00 (श्लोक पाठ) किम भूषणाद् भूषणम अस्ति शीलम् — भूषणों का भूषण शील है।

0:18 (श्लोक पाठ) तीर्थं परम किम स्वमनो विशुद्धम् — उत्तम तीर्थ अपना निर्मल मन है।
0:39 (श्लोक पाठ) किमत्र हेयम् कनकं च कांता — त्याज्य कनक और कांता हैं।
0:57 (श्लोक पाठ) श्राव्यं सदा किम गुरु वेद वाक्यम — सदा श्रवणीय गुरु और वेद वचन हैं।
1:11 (परिचय) यह मणि-रत्न-माला का आठवाँ श्लोक है, आदि शंकराचार्य विरचित।
2:17 (व्याख्या) बाहरी संपत्ति से वह सुख नहीं मिलता जो शील से मिलता है।
2:33 (प्रसंग) इंद्र के पास स्वर्ग वैभव होते हुए भी आनंद नहीं था, जबकि प्रह्लाद शील से आनंदित थे।
3:25 (सिद्धांत) जिसके जीवन में शील है वह साधनों में भी सुखी और अभाव में भी संतुष्ट रहता है।
3:40 (दृष्टांत) स्वर्ण, रजत, कुंडल, चूड़ी, चैन, नथ आदि देह को सजाते हैं, आत्मा को नहीं।
4:46 (उपदेश) देह सजाने से सच्ची शोभा नहीं आती, शील से ही आंतरिक शोभा निखरती है।
5:13 (कथा) राजकुमार पहली पत्नी को छोड़ गंधर्वराज की कन्या से विवाह कर राज्य संभालता है।
8:20 (कथा) अंगूठी से पहचान कर पहली पत्नी दासी भाव से सेवा को तैयार होती है।
9:16 (कथा) दोनों रानियाँ एक-दूसरे को श्रेष्ठ मानती हैं — यह शील का आदर्श है।
9:37 (उदाहरण) राम और भरत राज्य के लिए एक-दूसरे को अग्रसर करते हैं — यही शील है।
9:52 (शील तत्व) सत्य, प्रिय, हितकर, मधुर और अल्प वचन; व्रत और परहित — अंतःकरण निर्माण के साधन हैं।
10:06 (सिद्धांत) वेद का प्रमाण विभाग आत्मज्ञान देता है और निर्माण विभाग अंतःकरण शुद्ध करता है।
11:10 (प्रसंग) स्वामी रामतीर्थ के पास धनी स्त्री आई पर गहनों से शांति नहीं मिली।
12:14 (निष्कर्ष) शील रूपी भूषण के बिना बाहरी वैभव बोझ समान है।
12:52 (साधक लक्षण) पृथ्वी जैसी सहनशक्ति, सूर्य जैसा तेज, सिंह जैसी निर्भीकता आवश्यक है।
13:41 (साधना सिद्धांत) तीव्र वैराग्य और सद्गुरु मिलने पर शीघ्र आत्मानुभूति संभव है।
14:12 (कीर्तन) सियाराम राम गाय जा — (कीर्तन) अंतःकरण निर्माण का साधन है।
14:36 (जयघोष) जय श्री कृष्ण, जय हनुमान — (कीर्तन) भाव निर्माण करता है।
15:08 (सिद्धांत) देह के गहने बाहरी हैं; भजन-कीर्तन-ध्यान आंतरिक गहने हैं।
16:05 (शील परिभाषा) जैसा व्यवहार अपने लिए चाहते हैं वैसा दूसरों के लिए करें।
16:58 (महाधन) प्राणी मात्र में आत्मदृष्टि रखना ही शील है।
17:34 (उदाहरण) मीरा, शबरी, द्रौपदी, रतिदेव — बाह्य गहनों बिना भी शील से महान।
18:49 (प्रसंग) रामकृष्ण परमहंस ने कहा — थोड़ा आसक्ति देह टिकाए रखती है, रस गया तो देह छूटेगी।
20:25 (सिद्धांत) दोष से तादात्म्य बंधन है; आत्मदेव से तादात्म्य निर्दोषता लाता है।
21:38 (मार्ग) शील से अंतःकरण निर्माण; ज्ञान से अंतःकरण से संबंध-विच्छेद।
22:22 (फल) निर्मल अंतःकरण भक्ति रस और आत्मसाक्षात्कार में सहायक है।
22:59 (व्यवहार लाभ) धार्मिक व्यक्ति परिवार और समाज के लिए विश्वसनीय बनता है।
23:57 (तीर्थ व्याख्या) गंगा, यमुना, काशी आदि बाहरी तीर्थ हैं; परम तीर्थ अंतर्मन है।
24:27 (कथा) दो भाइयों का तुंबा — बाहर स्नान से मधुरता नहीं आती।
26:03 (दृष्टांत) हरिनाम जप रूपी राख, प्रेम रूपी जल, सत्कर्म रूपी कंकड़ से मन-तुम्बा शुद्ध होता है।
27:23 (सिद्धांत) पवित्र मन वाला तीर्थ में शीघ्र समाहित होता है; अपवित्र मन लाभ नहीं लेता।
27:59 (त्याज्य) कनक (धन) और कांता (काम) का आकर्षण पतन का कारण है।
28:22 (गृहस्थ मार्ग) वस्तु त्याग नहीं, आसक्ति त्याग आवश्यक है।
29:17 (चेतावनी) गिरना प्रमाद है; गिरकर न उठना पाप है।
29:51 (श्रवणीय) सद्गुरु और वेद वचन सदा सुनने योग्य हैं।
30:08 (उपमा) वेद सागर हैं और ब्रह्मवेत्ता गुरु बादल हैं जो अनुभव सहित ज्ञान बरसाते हैं।
30:31 (भजन) ज्ञान बिना आत्मा नहीं — (भजन) गुरु-कृपा से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।

निर्भयनाद - संध्या सत्संग 25-02-2026 सुबह

 निर्भयनाद - संध्या सत्संग 25-02-2026 सुबह

  इंडेक्स

0:00 अभयं सत्व संशुद्धि — जीवन में निर्भयता आवश्यक है; भय पाप है और निर्भयता जीवन है।

0:07 भय अज्ञान और अविद्या से उत्पन्न होता है; निर्भयता ब्रह्मविद्या से आती है।

0:27 पापी, संग्रही और परिग्रही व्यक्ति भयभीत रहता है; निष्पाप और सतोगुणी निर्भय होता है।

0:47 जिसके जीवन में दैवी लक्षण हैं वह इस लोक और परलोक दोनों में सुखी रहता है।

1:05 मन की अमन अवस्था (संकल्प-विकल्प की शांति) से जीवन में चमन आता है।

1:22 श्लोक संकेत — अभयं, सत्व-शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप की आवश्यकता।

1:35 मनुष्य का अंतरात्मा महान है; भय, स्वार्थ और रज-तम गुण उसे दीन बनाते हैं।

2:03 दुख मनुष्य का स्वभाव नहीं; सुख उसका स्वाभाविक तत्व है।

2:16 (दृष्टांत) दांत स्वाभाविक हैं; दांतों में तिनका अस्वाभाविक लगता है — वैसे ही हृदय में दुख अस्वाभाविक है।

3:07 रजोगुण-तमोगुण से दुख उत्पन्न होता है; दूसरों को भयभीत न करने वाला ही निर्भय हो सकता है।

3:28 सच्ची निर्भयता सतोगुण से आती है; गुंडागर्दी निर्भयता नहीं है।

4:36 डरपोक ही दूसरों को डराता है; निर्भीक व्यक्ति पोषण करता है, शोषण नहीं।

4:51 (कथा) हुगली जिला देरे गांव के खुदीराम ने झूठी गवाही से इंकार किया और सत्य पर अडिग रहे।

5:42 (कथा) बाहरी हानि सहकर भी सत्य का साथ देने से आध्यात्मिक विजय हुई।

6:51 (कथा) उसी खुदीराम के घर महान आत्मा अवतरित हुए — स्वामी रामकृष्ण परमहंस।

7:03 पाप और अनाचार के सामने सत्य बोलने का साहस रखना चाहिए।

7:38 निर्भयता का अर्थ उद्दंडता नहीं — माता-पिता, गुरु का अपमान निर्भयता नहीं।

8:14 (प्रसंग) घाट वाले वेदांती बाबा और पुष्पाता — निर्भयता की गलत व्याख्या का उदाहरण।

9:06 निर्भयता का अर्थ 26 दैवी गुणों से युक्त होना है; मन का गुलाम न बनना।

9:41 अंतःकरण की निर्मलता, ज्ञानयोग में स्थिति और दान से निर्भयता आती है।

10:00 भक्त का दान वस्तुओं का; ज्ञानी का दान आत्मजागृति और निर्भयता का।

10:37 दया और दान का भेद — गरीब की सहायता दया; सत्पुरुष की सेवा दान।

11:10 इंद्रिय-दमन आवश्यक — आंख, कान, जिह्वा का संयमित उपयोग।

11:43 इंद्रिय-असंयम से सूक्ष्म शक्तियों का ह्रास; संयम से आत्मसाक्षात्कार की क्षमता।

12:23 सामान्य और योगी में अंतर — सूक्ष्म शक्तियों के सदुपयोग का।

13:19 (व्यवहारिक उपदेश) भोजन, वाणी और आचरण में संयम आवश्यक।

14:18 (उद्धरण) “कबीरा निंदक ना मिलो…” — निंदा सुनना भी पाप का भागी बनना है।

14:49 तप, अकल और जीवन-शैली से उन्नति होती है।

15:00 मन की निर्मलता, ज्ञानयोग में निरंतरता और इंद्रिय दमन से तप बढ़ता है।

16:07 (उद्धरण) “जो तूफानों से टक्कर ले उसे इंसान कहते हैं।”

16:45 मृत्यु के तूफान से भी टकराने का सामर्थ्य — यही सतोगुणी मनुष्यता है।

17:05 (महाभारत प्रसंग) अर्जुन का भय और श्रीकृष्ण का उत्साह — हृदय की दुर्बलता त्यागो।

17:28 (जप) “नारायण नारायण” — साहस और श्रद्धा का आह्वान।

17:56 समस्या न सुलझे तो भगवान/गुरु के समक्ष ध्यान व प्राणायाम द्वारा समाधान खोजो।

18:45 आंतरिक निर्भयता से समाज में शांति आती है; सत्य में अडिग रहो।

19:02 (महाभारत प्रसंग) कर्ण की शक्ति घटोत्कच पर प्रयोग; कुशलता और सतर्कता की आवश्यकता।

20:04 (महाभारत प्रसंग) दुर्योधन और गांधारी — श्रीकृष्ण की रणनीतिक चतुराई।

20:18 (महाभारत प्रसंग) जयद्रथ वध — अर्जुन को भ्रम से निकालकर विजय दिलाई।

20:54 आसुरी तत्वों से न डरें; सतर्कता और तेजस्विता रखें।

21:14 सच्चा भक्त कायर नहीं; माया में रहकर भी माया से अलेप रहता है।

21:45 (प्रसंग) यीशु का दूसरा गाल सिद्धांत — सहनशीलता का उद्देश्य बैर मिटाना।

22:23 (प्रसंग) शिष्य द्वारा असुर को उत्तर — अहिंसा की रक्षा हेतु उचित प्रतिकार।

23:04 समाज में अधर्म बढ़े तो सतोगुणी को हिम्मत और तेज से कार्य करना चाहिए।

23:26 (कथा) गुलाम नबी — रोजा रखकर भी चोरी; पुरुषार्थ बिना केवल दया पुकार व्यर्थ।

25:13 कहावत — “हिम्मत बंदे मददे खुदा” — साहस करने वाले की ईश्वर सहायता करता है।

25:49 मनुष्य में अपार दिव्य शक्ति छिपी है; नकारात्मक विचार उसे क्षीण करते हैं।

26:20 श्री कृष्ण का उपदेश — अभयं और दैवी गुणों को अपनाओ।

26:34 आध्यात्मिक उन्नति से नैतिक बल; नैतिक बल से सामाजिक उन्नति।

27:08 आध्यात्मिकता बिना नैतिकता केवल दिखावा; भौतिक उन्नति बंधन बन सकती है।

27:26 धन का उपभोग करो, धन तुम्हें न भोगे — अन्यथा चिंता रोग बनती है।

27:46 (कथा) कलकत्ता के सेठ — नौकरी छूटने पर चिंता; वास्तविक सुख रसोइया भोग रहा था।

29:48 नैतिक बल से व्यवहारिक सदुपयोग; डगमग व्यक्ति स्वयं भी गिरता और दूसरों को भी गिराता है।

30:21 (जयघोष) “जय श्री कृष्ण कन्हैया लाल की जय” — निर्भय, सतोगुणी जीवन का आह्वान।


 

ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया यानी अपने से धोखा - संध्या सत्संग 24-02-2026 सुबह|


ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया यानी अपने से धोखा - संध्या सत्संग 24-02-2026 सुबह|


 0:02 मन अर्पित नहीं किया तभी तक नचाता है, विकारों में गिराता है और उद्वेग में डालता है।

0:17 (मंत्र जप) ओम ओम ओम – शास्त्र आचरण और धर्म अनुष्ठान का फल वैराग्य है।

0:29 यदि वैराग्य नहीं आया तो धर्म सही नहीं हुआ और शास्त्र का अर्थ पूरा नहीं समझा।

0:46 धर्म से वैराग्य, योग से ज्ञान और ज्ञान से मोक्ष तथा निर्वाण की प्राप्ति होती है।
1:16 मनुष्य जन्म का फल परमात्मा ज्ञान है, केवल शरीर पालन नहीं।
1:40 ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाओगे तो अंत में रोना पड़ेगा।
2:08 व्यवहार जगत से करो, प्रेम केवल भगवान से करो।
2:24 मोह, प्रीति, मान-मनुहार सब परमात्मा से ही रखो।
2:53 हृदय में प्रार्थना, फरियाद और गुनगुनाहट से भगवान को पुकारो।
3:19 मृत्यु से पहले शरण में पहुँचने की विनती करो।
3:49 अर्थी पर चढ़ने से पहले जीवन का सच्चा अर्थ समझ लो।
4:03 (मंत्र जप) ओम ओम ओम।
4:08 स्वर्ग, सौभाग्य, सुंदर स्त्री, इंद्र का नंदनवन भी मिले तो अंत में क्या? फिर जन्म-मरण।
5:10 दिल्ली का तख्त या इंद्र का राज मिले तो भी मृत्यु निश्चित है।
5:49 जमीन पर अनेक मालिक आए और चले गए, पृथ्वी यहीं रही।
6:30 (दृष्टांत) शतरंज बिछी रहती है, खिलाड़ी एक-एक कर चले जाते हैं।
7:20 मृत्यु से पहले शाश्वत सत्य समझ में आ जाए तो सुंदर होगा।
8:00 मरकर छोड़ने से पहले जीते जी मोह छोड़ देना श्रेष्ठ है।
8:39 ईश्वर के सिवाय मन लगाना अपने से धोखा है।
8:54 धर्म होगा तो वैराग्य बढ़ेगा, पाप होगा तो विषयों में रुचि बढ़ेगी।
9:30 वासना अंधा करती है, ज्ञान की आंख पहले खोलो।
9:50 मृत्यु से पहले मन को कुटुंब से हटाकर परमात्मा में लगाओ।
10:11 (चेतावनी) साधकों को भोग में गिराने वाले भारी पाप कमाते हैं।
10:41 धन छीनना इतना पाप नहीं जितना भगवान का मार्ग छीनना।
11:15 संत क्षमाशील हैं, पर ईश्वर मार्ग छोड़ने का फल भुगतना पड़ेगा।
11:45 (प्रसंग) ओमकारेश्वर नाम के सज्जन भजन में तल्लीन रहते थे।
12:21 एक युवराज ने 2000 अशर्फियां दीं, पर उन्होंने लौटा दीं।
13:00 उन्होंने कहा मित्रता परमात्मा के नाते थी, धन के नाते नहीं।
14:06 भक्ति को बिक्री या दलाली का साधन नहीं बनाना चाहिए।
15:11 ईश्वर के लिए सब त्याग दो, पर संसार के लिए ईश्वर का त्याग मत करो।
16:08 ईश्वर मिलेगा तो सब मिलेगा, ईश्वर छोड़ा तो कुछ नहीं टिकेगा।
16:32 एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।
17:12 मृत्यु से कोई नहीं बचता, जीते जी ममता छोड़ दो।
17:34 सेवा करो पर ममता हटाओ, संबंध ईश्वर से रखो।
18:24 सवासन में अहंकार को परमात्मा चरणों में समर्पित करो।
19:16 जगत स्वप्न जैसा है, इसे सच्चा मानना बर्बादी है।
20:20 जो बाद में स्वप्न होगा वह अभी भी स्वप्न ही है।
20:50 पहले परमात्मा साक्षात्कार का लक्ष्य रखो, फिर संसार।
21:21 अमेरिका में रहना गौरव नहीं, आत्मदेश में रहना गौरव है।
22:26 सारी विद्या व्यर्थ है यदि परमात्मा को नहीं जाना।
23:18 ईश्वर का मार्ग शरीर, धन या विद्या नहीं पूछता, आत्मज्ञान पूछता है।
24:04 (धार्मिक नियम) अशुभ समय में मैथुन पाप और पतन का कारण है।
24:59 भोग से दुर्बलता, ध्यान से कल्याण।
25:33 परमात्मा आकृति नहीं, वह सत्ता है जिससे सब चलता है।
26:03 जिसने आत्मा को जाना वही राम, कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य समान हो गया।
26:36 शांति और निसंकल्पता से मनुष्य ऊँचा होता है।
27:18 संसार में अधिक चतुराई बंधन बढ़ाती है।
27:47 कम बोलो, कम खाओ, समय का सदुपयोग करो।
28:19 आयु समाप्त होने से पहले आत्मा और अपने बीच का पर्दा हट जाए।
28:41 मैं देह नहीं, मैं साक्षी, अजन्मा, अमर आत्मा हूं – यह समझ आ जाए।
29:01 (मंत्र जप) ओम शांति शांति, अद्वैत शांति।
29:40 चित्त की वृत्ति को शांत होने दो।
30:08 चित्त की शांति महान संपत्ति है, मन की चंचलता दुखद विपत्ति है।
30:40 मन का उपशम परम कल्याणकारी है।
31:04 स्वासो श्वास में परमात्मा की शांति और आनंद में पवित्र होते जाओ।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

स्वीकृति और सावधानी - संध्या सत्संग 23-02-2026 सुबह

 स्वीकृति और सावधानी - संध्या सत्संग 23-02-2026 सुबह

TIME STAMP INDEX    

0:01 साधन में श्रम नहीं सुकृति
0:20 मन की जिद और ध्यान में पुनरावृत्ति
0:48 सुकृति और सावधानी का महत्व
1:17 तुच्छ इच्छा और साधन की थकान
1:35 मनमानी और सृष्टि का नियम
2:07 व्यवहार में सावधानी ही साधन
3:02 खुशामद और राग द्वेष
3:28 सुकृति से सहज साधन
4:40 अहंकार न पोषना सावधानी
5:19 सेवा का भाव और राजकुमार [कथा]
6:22 समय और व्यवहार की सावधानी
7:12 श्रम व्यर्थ यदि सुकृति नहीं
8:06 राग द्वेष से अशांति
9:34 चिंतन का प्रभाव
10:20 अभ्यास योग और अनन्यता
11:18 चित्त की शुद्धि और साक्षी भाव
12:39 दो सूत्र सुकृति और सावधानी
13:24 शक्ति अनुसार साधन
14:01 तीन दिन का प्रयोग
15:02 विचारों की सुकृति
15:25 सड़क किनारे घर का दृष्टांत [उदाहरण]
17:18 काम क्रोध और सावधानी
18:14 पांच विकार और तुलसी वचन [उदाहरण]
19:16 इंद्रिय मन बुद्धि का संबंध
21:16 ध्यान और संध्या
22:47 रोग भय में सावधानी
24:00 शाश्वत संबंध परमात्मा से
25:21 बाह्य आडंबर और अंतर्यामी
25:25 शरणागति श्लोक [प्रशंसा]
26:26 सेवा की शुद्ध भावना
27:08 वाहवाही और मधुर स्वभाव
28:00 बुद्धू हलवाई का बेटा [कथा]
29:33 अहम की अस्वीकृति



इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:01 अरे क्या करूं शक्ति नहीं है ऐसा कभी मत सोचो। साधन में श्रम की आवश्यकता नहीं है, शक्ति की जरूरत नहीं है। केवल सुकृति की जरूरत है और सावधानी की जरूरत है।

0:20 जब मन में ठान लेते हैं कि मैं किसी की बात नहीं मानूंगा तो वही बात ध्यान में दोहरती रहती है। इसलिए साधन में जिद नहीं सुकृति चाहिए।

0:48 साधन करने में श्रम नहीं सुकृति है। जो तेरी मर्जी सो मेरी मर्जी। जहां सुकृति नहीं वहां लोग साधन करके भी थक जाते हैं और बदलाहट नहीं आती।

1:17 भजन श्रेष्ठ का करते हैं और चाहते तुच्छ हैं। भगवान तुच्छ देकर फसाना नहीं चाहता। इसलिए सुकृति का अभाव है।

1:35 सबके मन की होने लगे तो संसार चल ही नहीं सकता। इसलिए अपनी मनमानी छोड़कर उसकी हां में हां मिलाओ।

2:07 व्यवहार में सावधानी भी साधन है। आश्रम में गंदगी करना, राग द्वेष करना यह असावधानी है। धर्म स्थान पर अहम पोषना साधन नहीं है।

3:02 जो खुशामद करे वह सोने जैसा लगे और जो सत्य कहे वह पीतल जैसा लगे यह सावधानी की कमी है। राग द्वेष से साधन बिगड़ता है।

3:28 यदि सावधानी बरतें तो साधन सहज हो जाएगा। सुकृति दे दो ईश्वर और गुरु के अनुभव में सहमत हो जाओ।

4:40 सावधानी यह कि अहंकार नहीं पोषना, राग द्वेष नहीं पोषना, शत्रु मित्र भाव नहीं बढ़ाना। मंदिर में जाकर भी दोष देखना असावधानी है।

5:19 सेवा करनी है तो जहां हो कर सकते हो। पहले सेवा लेने वाले नहीं मिलते थे। राजकुमार ने अपना चाबुक स्वयं उठाया कि मैं तुम्हारी सेवा क्यों लूं जब मैं समर्थ हूं। [कथा]

6:22 जिनसे बात करते हैं क्या उतना जरूरी है यह देखो। समय कहां दे रहे हो यह देखो। केवल सावधानी और सुकृति से साधन हो जाता है।

7:12 चाहे 40 साल भजन करो या 40 जन्म करो यदि सुकृति और सावधानी नहीं तो कुछ हाथ नहीं लगेगा। बाहरी तप से अहम पोषित होगा।

8:06 एंटी ग्रुप बनाना, राग द्वेष रखना, यही असावधानी और असुकृति का फल है। इसी से परिवार समाज राज्य में अशांति फैलती है।

9:34 जैसा चिंतन वैसा चित्त। संसार का चिंतन राग या द्वेष लाएगा। भगवान का चिंतन भगवान को हृदय में लाएगा।

10:20 अभ्यास योग से चित्त अनन्य बनाओ। जैसे अलग अलग यंत्रों में एक ही बिजली है वैसे सबमें एक ही सत्ता है। शत्रु में भी वही है।

11:18 चित्त दूषित न हो यह सावधानी है। सुख दुख के भोगी मत बनो, दृष्टा बनो। तब दुख दबाएगा नहीं।

12:39 दो ही सूत्र हैं सुकृति और सावधानी। श्रम साध्य नहीं है। शक्ति जितनी है उतनी से करो, पर शक्ति व्यर्थ न बिखरे इसकी सावधानी रखो।

13:24 25 वोल्ट हो तो 25 का ही बल्ब जलाओ। अपनी योग्यता अनुसार साधन करो और व्यर्थ आकर्षण में शक्ति न खोओ।

14:01 तीन दिन केवल सुकृति और सावधानी का अभ्यास करो। जो वर्षों में न मिला वह शांति प्रसन्नता मिल सकती है।

15:02 विचार आ रहे हैं तो उनसे लड़ो मत। सुकृति दो कि आ रहा है मैं देख रहा हूं। तब विचार शांत होंगे।

15:25 सड़क किनारे घर हो तो गाड़ियां गुजरती रहती हैं। आदत पड़ जाती है। ऐसे ही अनुकूल प्रतिकूल भाव आते जाते हैं। तुम आत्मा में बैठो। [उदाहरण]

17:18 काम क्रोध लोभ इसलिए आते हैं कि उसकी हां में हां नहीं की। राम का चिंतन नहीं तो विकार आते हैं। सावधानी से संबंध बदल दो तो विकार बदल जाएंगे।

18:14 पतंग रूप में जलता है, हाथी स्पर्श में फंसता है। एक एक विकार से जीव नष्ट होता है तो पांच विकारों में गिरा तो क्या हाल होगा। विकारों की हां में हां मत करो। [उदाहरण]

19:16 इंद्रिय मन बुद्धि का खेल है। मन इंद्रियों की ओर गया तो पतन, बुद्धि की ओर गया तो उत्थान। बुद्धि को बलवान करो बुद्धिदाता की हां में हां मिलाकर।

21:16 ध्यान और संध्या भगवान की स्मृति जगाने के लिए है। प्राणायाम जप से तन मन स्वस्थ होता है और साक्षी भाव जागता है।

22:47 रोग आए तो लंबा श्वास लो हरि ओमकार जपो। बीमारी शरीर को है मुझे नहीं। भय चिंता मन में है मैं साक्षी हूं।

24:00 ईश्वर से संबंध जोड़ना नहीं है वह शाश्वत है। शरीर संसार से माना हुआ संबंध है। तरंग और पानी जैसा जीव और परमात्मा का संबंध है।

25:21 बाहरी माला व्रत यात्रा सबको मुबारक। तुम अंतर्यामी में जाओ जहां जाने के बाद कहीं जाना नहीं।

25:25 सो साहिब सदा हजूर है। जो दूर जानता है वह अंधा है। घट में साक्षी चैतन्य है उसकी शरण जाओ। तमेव शरणम गच्छ सर्व भावेन। [प्रशंसा]

26:26 शरीर से जो कर्म करो अंतर्यामी की प्रसन्नता के लिए करो। नाम या प्रशंसा के लिए नहीं। सावधानी से सेवा में चार चांद लगेंगे।

27:08 जो वाहवाही के लिए सेवा करते हैं उनका स्वभाव तोचड़ा हो जाता है। जो भगवान की प्रसन्नता के लिए करते हैं उनका स्वभाव मधुर हो जाता है।

28:00 बुद्धू हलवाई का बेटा काशी पढ़ने गया। सब करता था पर दो कमी थी अपनी अकल नहीं और गुरु की बात नहीं मानता। [कथा]

29:33 वैसे ही हम शास्त्र और संत की बात नहीं मानते। मन की सेवा करेंगे तो अहम पुष्ट होगा। गुरु शास्त्र को स्वीकृति और अहम को अस्वीकृति कर दो तो कल्याण हो जाएगा।




रविवार, 22 फ़रवरी 2026

आश्रम संध्या सत्संग 22-02-2026 शाम (नीम पत्ते, काली मिर्च, अलूणा आहार, बिल्ली-कुत्ता रखने का निषेध)

आश्रम संध्या सत्संग 22-02-2026 शाम 

TIME STAMP INDEX

0:04 नश्वर शरीर और संसार मिथ्या

0:12 असत का उदाहरण – मनुष्य/खरगोश के सींग (उदाहरण)

0:35 सत की परिभाषा – त्रिकाल में जिसकी सत्ता

0:43 सिद्धांत पक्का करने की युक्ति – जीभ तालू में लगाकर पुनरावृत्ति

1:12 सत, असत, मिथ्या की स्पष्ट परिभाषा

1:28 सिद्धांत पकड़ने से भगवत विश्राम

1:42 ज्ञानजन्य साधना और क्रियाजन्य साधना का अंतर

1:57 पढ़ाई उदाहरण – क्रियाजन्य उपलब्धि (उदाहरण)

2:19 ‘मैं अमुक हूं’ – ज्ञानजन्य स्वीकृति

2:36 ईश्वर प्राप्ति में ज्ञानजन्य स्वीकृति का आश्रय

3:03 सार बात बताने की भूमिका

3:19 सत्संग समापन और विभाग बंद करने की सूचना

3:28 पुनः सत, असत, मिथ्या की स्थापना

3:47 परमात्मा और आत्मा सत्य

3:55 शरीर से पूर्व भी ‘तुम’ का अस्तित्व

4:02 सुख-दुख मिथ्या, जानने वाला सत

4:08 दुख, चिंता, भय मिथ्या सिद्ध करना

4:31 निश्चिंतता का महत्व

4:56 सत्संग प्रतीक्षा का प्रतिफल (उदाहरण)

5:15 दुख मिथ्या, असत नहीं – पुनः स्पष्टता

5:27 सुख, चिंता, भय, निंदा, वाहवाही मिथ्या

5:42 मिथ्या को सत्य मानकर परेशानी

6:03 शरीर की वाहवाही और नाम के पीछे अनर्थ

6:15 प्रांतीय पहचान भी मिथ्या

6:31 मिथ्या मान्यताओं से उपद्रव

6:46 ज्ञानजन्य स्मृति का आग्रह

7:10 बचपन से वृद्धावस्था परिवर्तन उदाहरण

7:30 भोजन और कोशिकाओं का परिवर्तन (उदाहरण)

7:37 ‘मैं’ अपरिवर्तित – सत्य

7:53 दुख-सुख, मान-अपमान मिथ्या स्वीकार

8:17 विवलता रहित निर्णय का लाभ

8:23 ड्राइविंग और घबराहट उदाहरण

8:39 आत्मा सत है – स्थापना

8:52 शरीर न रहने पर भी आत्मा का अस्तित्व

9:00 प्रलय में भी परमात्मा का अस्तित्व

9:08 आत्मा और परमात्मा सत स्वरूप

9:15 भगवान की जात के होने की घोषणा

9:29 भगवान सत और चेतन, आत्मा भी सत-चेतन

9:37 इंद्रियों में चेतना आत्मा से

10:07 आनंद इंद्रियों में नहीं, स्व में

10:21 आत्मा सत और आनंद वंशज

10:29 परमात्मा सच्चिदानंद स्वरूप

10:29 भागवत श्लोक से भगवान की स्तुति – सच्चिदानंद रूपाय (श्लोक)

10:59 भगवान लीला हेतु अवतार और मनुष्य को सत-चित-आनंद स्वीकार

11:12 सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय का कर्ता सत-चित-आनंद

11:18 शरीर की उत्पत्ति, स्थिति, विनाश के साक्षी ‘आप’

11:27 भगवान की जात के होने की स्थापना

11:34 “मैं भगवान का हूं, भगवान मेरे हैं” स्वीकार

11:45 धोखा या सेल्समैन भाव का खंडन

12:00 भगवान से संबंध में क्रिया की आवश्यकता नहीं

12:14 पति-पत्नी उदाहरण से ज्ञानजन्य स्वीकृति (उदाहरण)

12:42 माला बिना परमात्मा संबंध की स्वीकृति

13:00 भगवान सत-चित-आनंद, हम उन्हीं के वंशज

13:24 शास्त्र, उपनिषद, महापुरुष और अनुभव से पुष्टि

13:44 दुख-सुख बदलते, ‘हम’ स्थिर

14:07 शरीर और संसार परिवर्तनशील

14:22 चैतन्य की जात – परमात्मा से एकता

14:42 वर्ण/जाति व्यवहार में, वास्तविक में मिथ्या

15:13 पुनः सत-चित-आनंद स्वरूप की स्वीकृति

15:26 रात में सच्चिदानंद गोद में विश्राम

15:41 रात के निर्णय और ऊर्जा क्षीणता

16:02 सुबह के निर्णय श्रेष्ठ – चेतना प्रभाव

16:17 व्यवहार सुधार और निश्चिंतता

16:49 निश्चिंतता से निर्भयता

16:58 छोटे-बड़े का आश्रय उदाहरण

17:23 मिथ्या शरीर वालों का आश्रय लेकर ठगे जाना

17:43 सेठ पर आश्रय और हार्ट अटैक उदाहरण (उदाहरण)

18:14 नेता/अधिकारी की अस्थिरता उदाहरण (उदाहरण)

18:32 “तमेव शरणं गच्छ” – शास्त्रीय आदेश (श्लोक)

18:57 सर्वभाव से सच्चिदानंद की शरण

19:08 शाश्वत स्थान का प्रसाद

19:14 नश्वर आश्रयों का अनुभव

19:21 जन्म-मरण चक्र और गर्भ दुख

19:37 मिथ्या शरीर-संसार को सत्य मानने से दंड

19:44 सत्य आश्रय से दंड मुक्ति

19:51 “तमेव शरणं गच्छ…” श्लोक उच्चारण (श्लोक)

19:59 शाश्वत स्थान – परब्रह्म परमात्मा प्राप्ति

20:05 भगवान में अपनापन की स्वीकृति

20:13 भगवान हमारे, हम भगवान के – सत-चित-आनंद स्वरूप

20:20 भगवान को मानने से निश्चिंतता

20:28 शरीर नाशवान, पर भगवान अछूट

20:35 भगवान दयालु, हितैषी

20:41 मिथ्या छूटे तो नई स्थिति में सच्चिदानंद निकटता

20:48 दुख-मुसीबत में अमृत और विकास छिपा

21:02 दुख से न दबना – विवेक-वैराग्य जागरण

21:09 दुख को ‘स्टेप’ बनाना

21:16 दुख, मुसीबत, विरोध को सोपान बनाना

21:28 सुख और वाहवाही को भी सोपान बनाना

21:34 मंदिर सोपान उदाहरण से परिस्थिति लांघना (उदाहरण)

21:48 ताली न बजाने की सूचना

21:54 व्यक्तिगत स्वास और समष्टि वायु संबंध

22:08 स्वास से ऑक्सीजन, रक्त परिश्रमण

22:15 व्यक्तिगत स्वास व्यापक वायुमंडल से जुड़ा

22:24 शरीर में विद्युत तत्व की क्षमता (उदाहरण)

22:32 विद्युत तत्व से इंजन चलने की बात (उदाहरण)

22:38 विद्युत सक्रिय करने वाले तत्व पर प्रश्न

22:44 स्वास और घर्षण से विद्युत तत्व

22:55 श्वास सत्ता का स्रोत – सत-चित-आनंद

23:02 चेतन और आनंद से संबंध

23:11 विद्युत तत्व सूर्य से जुड़ा

23:17 परमेश्वर से संबंध

23:23 सूर्य ठंडा होने पर विज्ञान असमर्थ उदाहरण (उदाहरण)

23:34 सच्चिदानंद परमात्मा से आत्मा संबंध

23:51 सूर्य, वायु, तत्वों से जुड़ाव उदाहरण

23:57 पंचमहाभूत से शरीर संबंध

24:11 आकाश भीतर-बाहर एकत्व

24:17 पंचभौतिक शरीर का महाभूतों से संबंध

24:28 जीवात्मा का परमात्मा से ओतप्रोत संबंध

24:35 खेल को सत्य मानने की गलती

24:43 (कथा) स्त्री का पति बीमार – पूजा से ठीक

24:56 (कथा) पुनः बीमार – मृत्यु – भगवान को फेंकना

25:02 भगवान साध्य हैं, साधन नहीं

25:10 मिथ्या सुधार हेतु भगवान प्रयोग – भक्ति व्यभिचार

25:25 भगवान से प्रीति न कर पाना

25:32 भगवान से मिथ्या वस्तु मांगना

25:38 मांग को भगवान से अधिक महत्व

25:45 मंदिर-मस्जिद-चर्च में साधन

25:52 साधन में भी असाधन को महत्व

26:00 भगवान सत-चित-आनंद, सजातिता

26:07 शरीर से विजातिता

26:14 विजातिता को महत्व, सजातिता से विमुखता

26:20 (उदाहरण) काम सिद्धि पर श्रद्धा, असफलता पर दोष

26:34 भगवान/बापू पहले जैसे नहीं रहे – भ्रम

26:42 परिवर्तनशील संसार उदाहरण

26:51 वासना के बल से अस्थिरता

26:57 मिथ्या को सत्य मानने की मूर्खता

27:04 अज्ञान से दोष उत्पत्ति

27:14 “अज्ञान आवृतं ज्ञानम्…” (श्लोक)

27:24 जंतु जीवन – गीता में गाली उल्लेख

27:31 शरीर को ‘मैं’, संसार को ‘मेरा’ मानना

27:38 अज्ञान से ज्ञान ढका, मोह उत्पन्न

27:46 “मोह सकल व्याधि…” (चौपाई)

27:52 भगवान से अन्य वस्तु मांगने की भूल

28:09 आत्मचिंतन – मानना पड़ेगा

28:15 उपाय प्रश्न

28:21 “भजताम प्रीति पूर्वकम…” (श्लोक)

28:28 बुद्धियोग प्रदान

28:36 कभी देना, कभी न देना – जगाने हेतु

28:42 (दोहा) कबीरा कुत्ते की दोस्ती

28:50 प्रेम की मांग – पत्नी, पति, नौकर, मित्र

29:08 मन की करने वाला प्रिय बनता

29:22 रुझान और प्रियता सिद्धांत

29:35 मन परिवर्तनशील – प्रकृति का

29:48 मित्र, फर्नीचर बदलना – रस की खोज

29:56 भगवान रस स्वरूप – सत-चित-आनंद

30:04 रस हेतु पति-पत्नी, मित्र, भाई-बहन से स्नेह मांगना

30:11 स्नेह कमी पर बिल्ली-कुत्ता पालना

30:25 बिल्ली-कुत्ते से स्नेह प्राप्ति भावना

30:31 नारद पुराण में बिल्ली-कुत्ता रखने का निषेध (शास्त्र उल्लेख)

30:45 फटे बर्तन आदि अशुभ प्रभाव

30:57 शास्त्र न मानो तो वैज्ञानिक मानो

31:08 टी गुंडी कीटाणु बिल्ली में (वैज्ञानिक उदाहरण)

31:20 पेट सफाई से कीटाणु प्रसार

31:28 गर्भवती और गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव

31:41 वैज्ञानिक प्रमाण का आग्रह

31:58 दया से टुकड़ा दो, स्पर्श-सुख न लो

32:05 कुत्ते का मुंह चाटना निषेध

32:12 (कथा) राजा भरत और हिरण स्नेह

32:18 मृत्यु समय स्मरण से अगला जन्म हिरण

32:26 बिल्ली-कुत्ता पालने से जन्म आशंका प्रश्न

32:34 परिवार पर कीटाणु प्रभाव चेतावनी

32:48 सत्संग से जागृति

32:55 सत-चित-आनंद को अपना मानना

33:02 अपनापन से स्नेह उत्पत्ति

33:11 पारस्परिक स्नेह सिद्धांत

33:18 इधर-उधर भटकाव समाप्त

33:24 “सतृप्तो भवति…” (शास्त्रीय वाक्य)

33:31 तृप्त, अमृत, तारने वाला भाव

33:47 होली उत्सव आरंभ

33:54 सोमलता रस और यज्ञ परंपरा (प्राचीन प्रसंग)

34:03 सोमलता लुप्त – विकल्प खोज

34:09 अर्जुन वृक्ष औषधि उल्लेख

34:24 राशि वनस्पति विकल्प

34:30 यज्ञ, भोग और पान

34:49 भगवान को अपना मानने का अभ्यास

35:02 रात्रि स्मरण साधना

35:08 दिन में स्मृति अभ्यास

35:16 सच्चिदानंद निकटता अनुभव

35:22 समर्थ शरण से निश्चिंतता

35:30 निश्चिंतता से निर्भीकता

35:37 घबराहट से सामर्थ्य दुरुपयोग न हो

35:51 सतता-चेतनता से आनंद अनुभव

35:59 बिल्ली-कुत्ता, पान-मसाला, दारू आकर्षण क्षीण

36:06 स्वास्थ्य केंद्रित भोजन

36:13 स्वास्थ्य केंद्रित जीवन

36:21 मन-बुद्धि निरोगता

36:28 सहज ध्यान, भक्ति, कर्मयोग

36:34 सम्राट उदाहरण – राज्य और अहंकार

36:49 हिरण्यकश्यप द्वारा अत्याचार (कथा)

36:56 प्रह्लाद की भगवान में आस्था

37:04 भगवान द्वारा रक्षा

37:10 होली उत्सव संदेश

37:16 (कथा) शिवजी द्वारा कामदेव दहन

37:31 (कथा) होलिका वरदान और प्रह्लाद

37:39 अग्नि में होलिका दहन, प्रह्लाद रक्षा

37:55 रुतु परिवर्तन उत्सव

38:04 नीम काढ़ा स्नान विधि

38:18 नींबू स्नान उल्लेख

38:25 नीम पत्ते, काली मिर्च, अलूणा आहार

38:44 प्रश्न – हिरण्यकश्यप दैत्य, प्रह्लाद भक्त

39:06 होलिका दहन पुनः उल्लेख

39:12 प्रह्लाद भक्ति स्रोत प्रश्न

39:20 नारदजी उपदेश उल्लेख

39:26 प्रह्लाद की अद्भुत रक्षा

39:42 शुक्राचार्य पुत्रों का दैत्य ज्ञान

39:56 प्रह्लाद दिव्य ज्ञान प्रभाव

40:03 गर्भ में नारद सत्संग

40:10 अन्य गर्भस्थों से भिन्नता प्रश्न

40:25 प्रह्लाद समर्थता पर जिज्ञासा

40:30 प्रश्न समाधान कठिन – संकेत

40:39 (पुराण प्रसंग) ब्रह्मवैवर्त पुराण पाताल खंड उल्लेख

40:45 जय-विजय भगवान के पार्षद

40:52 जय = अहंता, विजय = ममता व्याख्या

41:03 अहंता-ममता से सच्चिदानंद अनुभव बाधित

41:11 सनकादि ऋषियों को खदेड़ना

41:19 सनकादि ब्रह्मवेत्ता – सच्चिदानंद साक्षात्कार

41:27 ज्ञानी के लिए जन्म-मरण विचरण समान

41:51 सनकादि भगवान नारायण से मिलने पहुँचे

41:58 जय-विजय द्वारा अपमान

42:07 तीन बार खदेड़ना

42:15 श्राप – तीन जन्म दैत्य योनि

42:38 भगवान नारायण का प्रकट होना

42:45 श्राप को उचित ठहराना

42:52 सेवक-मालिक निकटता उदाहरण

43:04 शिष्य को अधिक छूट उदाहरण

43:23 संत द्वारा संतुलन स्थापना

43:36 उदंडता स्वीकार

43:43 श्राप को अनुमोदन

43:51 जय-विजय का प्रार्थना करना

43:58 भगवान का आश्वासन – साथ अवतार

44:04 कुश्ती खेलकर मुक्त करना

44:12 जय-विजय = हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप

44:19 वाराह अवतार द्वारा हिरण्याक्ष वध

44:25 सेवक शुद्धि हेतु अवतार योजना

44:37 सनकादि भी अवतार सहयोग हेतु

44:48 भक्त रूप से अवतरण योजना

45:02 सनकादि = प्रह्लाद रूप अवतार

45:15 भगवान द्वारा हिरण्यकश्यप नियंत्रण

45:23 समाज हेतु ज्ञान-भक्ति-लीला अमृत

45:31 हिरण्यकश्यप वरदान मांगना

45:36 न दिन में मरूं, न रात में

45:49 अहंकार दिन-रात न मरना उदाहरण

46:03 न अंदर, न बाहर

46:09 न अस्त्र, न शस्त्र

46:17 न देव, न दानव, न मानव

46:25 कथा का अमृत – अहंकार प्रतीक

46:33 विलक्षण अवतार धारण

46:45 नरसिंह अवतार वर्णन

47:01 चौखट में वध

47:10 संधि काल में वध

47:18 स्वास संधि काल में अहंकार क्षय

47:25 सच्चिदानंद प्रकटता

47:32 नाखून से वध

47:42 हिरण्याक्ष = ममता, हिरण्यकश्यप = अहंता

47:56 अहंता-ममता से परमात्मा अवरोध

48:04 द्वार के दो असुर – अहंता, ममता

48:12 अजपा गायत्री उपाय

48:18 “हरि ओम” उच्चारण

48:33 ह और म के बीच निर्विकल्पता

48:41 अहंकार-चंचलता प्रवेश निषेध

48:50 अभ्यास से संकल्प-विकल्प क्षय

49:06 पत्तझड़ समान चित्त शुद्धि उदाहरण

49:13 शांति और निकटता अनुभव

49:31 “बिनु रघुवीर पद…” (चौपाई)

49:40 वासना जीव को जलाती

49:46 शरीर अनित्य – प्राप्ति व्यर्थता

49:52 सब प्राप्त वस्तु छूटने का नियम

49:59 भविष्य प्राप्ति अनिश्चित, वर्तमान त्याग निश्चित

 50:00 अहंकार की तृप्तिहीन मांग – “और चाहिए”

50:07 हिरण्यकश्यप का भय उत्पन्न करना (कथा संदर्भ)

50:15 अहंकारी व्यक्ति से लोग दूर भागते

50:21 अहंकारयुक्त वार्ता अप्रिय लगना

50:28 अहंकार केंद्रित व्यक्ति का त्याग

50:35 (उदाहरण) राम के दर्शन हेतु भील-भिलनी आना

50:41 (उदाहरण) रावण निकलने पर लोग छुपना

50:51 (उदाहरण) कृष्ण को देखने गोप-गोपियां आना, कंस से लोग छुपना

50:59 अहंकार दूसरे को कुछ नहीं मानता

51:07 परमात्मा सबको अपना स्वरूप मानते

51:16 शरणागति से अहंकार विलय

51:24 व्यवहार में भिन्नता, भीतर समता

51:34 वितराग, भय-शोक रहित स्थिति

51:49 जन्म-मरण से मुक्ति

51:55 जन्म और मृत्यु महान दुख

52:02 मृत्यु से सब छूटना

52:08 गर्भ, जन्म अनिश्चितता उदाहरण

52:14 जन्म-मरण चक्र अहंता-ममता से

52:22 अहंता-ममता मिटाने का उपाय

52:28 “मैं भगवान का हूं” – अहंकार समर्पण

52:37 “भगवान मेरे हैं” – ममता भगवान में

52:45 नित्य-सुख स्वरूप में स्थिरता

52:52 अनित्य में रहने से भटकाव

53:01 शरीर में मैं-पन = रावण मार्ग

53:08 आत्मा में मैं-मेरा = राम मार्ग

53:18 भगवान सत-चित-आनंद स्वरूप

53:27 धन तिजोरी में, अहंकार “मेरा”

53:33 धनवान की अनिद्रा उदाहरण

53:47 अहंकार की प्रसिद्धि लालसा

53:54 वस्तु आधारित अहंकार

54:01 वस्तु और शरीर अनित्य

54:07 (उदाहरण) लंकापति रावण – लंका ईंट प्रश्न

54:19 हिरण्यकश्यप अहंकार

54:26 “अहंकार विमूढात्मा…” (श्लोक भाव)

54:31 प्रकृति में सब होना, अहंकार कर्तापन

54:40 अनेक जन्मों से मैं-मेरा भाव

54:48 भगवान में ममता, भगवान का होना

54:54 निश्चिंतता और निर्भीकता

55:01 भगवान को अपना मानने से प्रेम

55:09 ज्ञान, भक्ति, कर्म मार्ग का समन्वय

55:24 भगवत स्वभाव में स्थित होना अनिवार्य

55:31 धन से दुख अंत नहीं

55:38 यात्रा-प्रसिद्धि से दुख अंत नहीं

55:44 परमात्मा में डुबकी से दुख शमन

55:52 सत-चित-आनंद-ज्ञान स्वरूप

55:57 भगवान सत स्वरूप पुनः स्थापना

56:05 नारायण स्तुति पुस्तक उल्लेख

56:13 पढ़ना और शांत होना साधना

56:19 आत्मा-परमात्मा स्वभाव एकत्व

56:26 शीघ्र ईश्वर प्राप्ति उपाय

56:33 मिथ्या शरीर को सत्य मानना बाधा

56:41 भगवान को दुर्लभ मानने की भूल

56:48 भगवान न कठिन, न दूर, न पराए

56:56 इंद्रिय भोग आकर्षण बाधा

57:04 विषय भोग से बुद्धि दुर्बल

57:10 भगवान में प्रतिष्ठा न होना

57:17 डॉक्टर उदाहरण – बुद्धि उपयोग

57:25 मेंढक चीरना, जांच-पड़ताल उदाहरण

57:32 पहले परमात्मा में डुबकी, फिर कर्म

57:42 डॉक्टरों को ठीक करने वाली मति संकेत

संध्या सत्संग 22-02-2026 सुबह (हनुमान प्रसाद पोद्दार और सेवक, मस्तराम बाबा का राज्य परिवर्तन )

 संध्या सत्संग 22-02-2026 सुबह 


TIME STAMP INDEX 

0:04 अकर्तापन और अभक्त भाव
0:26 हनुमान जी का अविश्रांत भाव [कथा]
1:10 परिश्रम और आराम का दृष्टांत [उदाहरण]
2:23 गुरु का उपदेश राम में विश्राम
2:42 निष्काम कर्म और आनंद
3:37 कार्य में उत्कृष्टता का भाव
4:11 पृथु राजा का विनम्र स्वभाव [कथा]
5:09 हनुमान प्रसाद पोद्दार और सेवक [कथा]
6:51 गीता प्रेस का चौकीदार [कथा]
9:09 वाहवाही और निष्काम सेवा
9:44 आश्रम में पारस्परिक स्नेह
11:13 ड्यूटी और आज्ञा पालन
11:59 सच्चे गुरु और विकास [उदाहरण]
13:04 अनुकूल प्रतिकूल में समता
13:26 भिक्षा और महापुरुषों का आचरण
14:36 गुरु आज्ञा ही सेवा
15:38 भोग और चिंता का जाल
17:50 वशिष्ठ वाणी का सार
18:46 सेवा में एकता और विजय
19:18 मस्तराम बाबा का राज्य परिवर्तन [कथा]
22:56 अपनी जगह पर निखरना
24:26 सतशिष्य और शीघ्र सिद्धि
24:48 साधन भजन सुमिरन का रहस्य
25:34 विवेक और राम जी का आदर्श
27:25 विकास और तत्परता
28:11 मन की निगरानी
28:54 ईश्वर मार्ग और धन का धोखा


इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:04 अकर्तापन और अभक्त भाव जगाते जाएं। काम तो हाथ पैर करते हैं, सेवा मन बुद्धि करती है और सत्ता परमात्मा से मिलती है। स्मृति करते करते सुमिरन हो जाता है। ऐसा काम करें कि काम सेवा बन जाए, पूजा बन जाए, बंदगी बन जाए।

0:26 हनुमान जी का युद्ध भी पूजा था, लंका जलाना भी पूजा था। राम काज बिनु कहां विश्रामा। समुद्र में पर्वत ने विश्राम को कहा पर हनुमान जी ने कहा मेरे लिए विश्राम नहीं जब तक राम कार्य पूरा न हो। [कथा]

1:10 चार बेटों को पिता ने समझाया कि अभी थोड़ा और परिश्रम करो, कब्र में तो सदा विश्राम है। साधन मिलते ही आलसी मत बनो। जब तक जीना तब तक सीना। [उदाहरण]

2:23 पिता कब्र में आराम की बात करता है पर गुरु कहता है राम में आराम करो, उसके पहले मत रुको।

2:42 निष्काम भाव से कार्य करते समय ही आनंद छलकता है। फल की प्रतीक्षा करने वाले अज्ञानी हैं। कर्म अपने आप में पूर्ण है। जितनी निष्कामता उतना आनंद।

3:37 जो काम किया उस पर रुकना नहीं, और श्रेष्ठ कैसे हो सकता है यह देखो। कम समय और कम शक्ति में और उत्तम कैसे हो सकता है यह चिंतन करो।

4:11 पृथु राजा अपनी प्रशंसा सुनकर कहते थे यह सब आपकी कृपा है, मेरी क्या प्रशंसा। मधुर भाषी, न्यायप्रिय और विनम्र थे। [कथा]

5:09 हनुमान प्रसाद पोद्दार ने चोरी करने वाले सेवक की इज्जत बचाई, स्वयं रुपये रख दिए और उसे ईमानदार कहा। वह सेवक रो पड़ा और सच में बदल गया। प्रेम से परिवर्तन हुआ। [कथा]

6:51 गीता प्रेस में एक चौकीदार ने दक्षिणा लेने से मना कर दिया। चार सौ रुपये में संतोष और सेवा भाव। उसका त्याग ही उसका सुख था। [कथा]

9:09 वाहवाही से मिलने वाला सुख क्षणिक है। बिना प्रशंसा की इच्छा से किया कार्य ही भजन बनता है। काम के लिए काम करना ईश्वर प्रीति है।

9:44 गुरु भाई और आश्रमवासी ऐसे मिलें जैसे प्रभु से मिल रहे हों। परस्पर आदर स्नेह से ही रस प्रकट होता है। तोचड़ापन से साधुता नहीं दिखती।

11:13 अपनी ड्यूटी तत्परता से करो। गुरु की आज्ञा में कमी न रहे। आज्ञा पालन से भीतर योग्यता विकसित होती है।

11:59 चित्रकार को गुरु ने केवल प्रशंसा की तो वह रो पड़ा कि गलती न बताओगे तो विकास रुक जाएगा। सच्चा गुरु दोष घटाता है, चापलूस गुरु उपयोग करता है। [उदाहरण]

13:04 प्रतिकूलता में भी उद्वेग न हो। महापुरुष भिक्षा में अपमान सहकर समता साधते थे।

13:26 समर्थ रामदास, गोपीचंद, भरतरी जैसे महापुरुषों ने भी भिक्षा मांगी। परमात्मा को रिझाने के लिए दंभ नहीं, विनय चाहिए। [कथा]

14:36 गुरु को प्रसन्न करने के लिए चापलूसी नहीं, उनकी आज्ञा का पालन ही सेवा है। गुरु संतोष से जन्मों के जप तप सफल हो जाते हैं।

15:38 भोग की वस्तुएं एकत्रित करने वाले उन्हें संभालने में ही जीवन गंवा देते हैं। चिंता में जलते रहते हैं, शांति नहीं मिलती।

17:50 वशिष्ठ जी का सार है कि सुख न धन में है न स्वर्ग में, सुख वहां है जहां संत का मन विश्राम पाता है। मान के लिए नहीं, परमात्मा प्रीति के लिए काम करो।

18:46 स्नेह से सेवा करने पर सजातीय संस्कारों में एकता आती है और विकारों पर विजय मिलती है।

19:18 मस्तराम बाबा ने राजा बनकर तीन दिन में सब पद बदल दिए ताकि सबको अपनी अपनी स्थिति और जिम्मेदारी का बोध हो जाए। [कथा]

22:56 झाड़ू लगाना हो तो ऐसा लगाओ कि पूजा बन जाए। रसोई बनाओ तो बंदगी हो जाए। गुरु ने विश्वास किया है तो गैर हाजिरी में भी सावधान रहो।

24:26 सतगुरु मिल जाए और शिष्य सच्चा हो तो वर्षों की आवश्यकता नहीं। परीक्षित, जनक, शुकदेव को देर नहीं लगी।

24:48 जानी हुई गलती न दोहराना साधना है। प्रभु प्रीति से काम करना सेवा है। कर्तापन मिटाना सुमिरन है।

25:34 शरीर रोगों की खान है, गृहस्थी दुखों की खान है, अविवेक जन्मों की खान है। राम जी प्रजा के दुख में सजग होते थे जैसे मां बच्चे के दुख में सावधान होती है।

27:25 जो मिला है उसमें पूरी ईमानदारी से तत्पर रहो तो ईश्वर और बड़ा कार्य देगा। मन की सीमित सोच विकास रोकती है।

28:11 मन पर भरोसा न करो। बड़ों की निगरानी में रहो। मन की बदमाशी प्रारंभ में ही प्रकट कर दो तो बचाव हो जाता है।

28:54 ईश्वर मार्ग पर चलो तो धन वैभव स्वयं आएंगे। पर धन के लिए ईश्वर को छोड़ दिया तो यह धोखा है। इसलिए सावधान रहो।




ज्ञान की कुंजी - संध्या सत्संग 21-02-2026 सुबह

 ज्ञान की कुंजी - संध्या सत्संग 21-02-2026 सुबह



TIME STAMP INDEX 
0:01 आत्मा मित्र और शत्रु का सिद्धांत
0:14 अनात्म में चित्त लगाने का परिणाम
0:32 महापुरुषों की महानता का रहस्य
0:57 मृत्यु स्मरण और जागृति
1:55 सप्ताह और अनिवार्य मृत्यु
2:40 मृत्यु और परमात्मा को सामने रखने का फल
3:10 चित्त शांति और आनंद
4:04 ध्यान का फल और सहज सुख
4:54 सद्गुरु की कृपा और गुरु तत्व
6:22 गुरु शिष्य संबंध का सत्य
7:29 औपचारिक आदर और वास्तविक सम्मान [उदाहरण]
8:39 शुद्ध हृदय और गुरु कृपा
9:28 नश्वर और अधिष्ठान का स्मरण
10:09 इच्छा और अधिकारी बनने का सिद्धांत
12:30 आत्म स्थिति और जीवन का भार [उदाहरण]
14:21 अनुकूलता प्रतिकूलता और निश्चिंतता
16:17 जीवन का बोझ और परमात्मा को समर्पण [दृष्टांत]
18:24 निश्चिंत कर्म और प्रकृति का सहयोग
19:15 भीतर की एकता और बाहरी संबंध
21:05 मूल गोत्र ब्रह्म है
22:24 भ्रम और आत्म अनुभव
23:14 केवली कुंभक और स्मरण की शक्ति
24:14 ब्रह्म ज्ञान हवाई मार्ग
25:52 अनेक साधना मार्ग और योग्यताएं
28:14 सब भक्त हैं पर भक्ति के स्तर अलग
29:50 खंड भक्ति और अखंड दृष्टि


 इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:01 आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु है। यदि चित्त अनात्म वस्तुओं में लगाते हैं तो मनुष्य स्वयं अपना शत्रु बन जाता है।

0:14 अनात्म पदार्थों में मन लगाने से मनुष्य छोटा होता है। आत्मा में मन लगाने से वही मनुष्य श्रेष्ठ और अपना मित्र बन जाता है।

0:32 नानक, कबीर, महावीर, बुद्ध, क्राइस्ट, कृष्ण तुमसे अलग नहीं थे। वे अपने स्वरूप में स्थित हुए इसलिए महान हुए। हम पराए में स्थित होते हैं इसलिए दुख पाते हैं।

0:57 मृत्यु को स्मरण रखो। सात दिन में मरना है ऐसा मानकर चलो। कौन सा दिन अंतिम हो जाए कोई भरोसा नहीं।

1:55 सप्ताह के सात दिन हैं और इन्हीं में किसी दिन मृत्यु निश्चित है। इसलिए चतुर वही है जो मृत्यु और परमात्मा दोनों को सामने रखे।

2:40 मृत्यु और परमात्मा को सामने रखने से जीवन में जागृति आती है। अपने गांव का संकेत दिखे तो बिना पूछे आगे बढ़ जाना चाहिए।

3:10 जब चित्त शांत होता है तो खुली आंखों से भी आनंद आता है। यह संतों की कृपा से अनजाने में ध्यान की स्थिति है।

4:04 ध्यान का फल आनंद है। भगवान के दर्शन का फल यह है कि जीव अपने सहज सुख स्वरूप को पा ले।

4:54 सद्गुरु विधि से नहीं बंधते। वे बिना मांगे दे देते हैं। सच्चा गुरु स्वयं गुरु होने की इच्छा नहीं रखता, वह विश्वात्मा है।

6:22 गुरु बनाना या तोड़ना मनुष्य के हाथ में नहीं। सच्चा गुरु हो जाता है। शिष्य भी हृदय से हो जाता है, कागज से नहीं।

7:29 [उदाहरण] कानून से प्रणाम नहीं कराया जा सकता। जैसे कप्तान जानता था कि सैनिक बाहर से सलाम करते हैं पर भीतर से नहीं। वास्तविक सम्मान हृदय से होता है।

8:39 शुद्ध हृदय से निकटता बढ़ती है तो गुरु की कृपा बरसती है। विधि से दीक्षा हो या न हो, भीतर की भावना मुख्य है।

9:28 नश्वर वस्तुओं को याद करने से वे नहीं आतीं। अधिष्ठान को याद करो तो सब वस्तुएं पीछे चलेंगी।

10:09 पश्चिम कहता है पहले अधिकारी बनो फिर इच्छा करो। वेदांत कहता है अधिकारी बनो और इच्छा छोड़ दो। सम्राट को छोटी इच्छाएं नहीं करनी पड़तीं।

12:30 [उदाहरण] मेहमान के आने पर साधारण व्यक्ति बोझ अनुभव करता है, पर जो आत्म स्थिति में है उसे कोई बोझ नहीं लगता। प्रकृति सहयोग करती है।

14:21 संसार में या अनुकूलता आएगी या प्रतिकूलता। तीसरा कुछ नहीं। परमात्मा न आता है न जाता है।

16:17 [दृष्टांत] युवक ने घोड़े का बोझ बांटने के लिए सामान अपने सिर पर रख लिया और स्वयं कष्ट पाया। वैसे ही जीवन का बोझ हम स्वयं उठाते हैं जबकि वह परमात्मा पर है।

18:24 चिंता रहित कर्म करो। परिणाम जो आए वह स्वीकार करो। निश्चिंत होने पर प्रकृति सहयोग करती है।

19:15 भीतर वाले आत्मा से एक रहो तो लोग भी अनुकूल होते हैं। बाहर को सजाने में लगे तो धोखा मिलता है।

21:05 हमारा मूल गोत्र ब्रह्म है। बाहरी गोत्र स्मरण रहे तो ठीक, पर मूल गोत्र परमात्मा है।

22:24 पांच प्रकार के भ्रम से हम स्वयं को अलग मानते हैं। वास्तव में परमात्मा हमसे अलग नहीं है, एक क्षण भी नहीं।

23:14 केवली कुंभक से ब्रह्म स्थिति आती है। जिनका स्मरण किया जाता है वे प्रकृति को अनुकूल कर देते हैं।

24:14 ब्रह्म ज्ञान हवाई मार्ग है। परमात्मा के निकट होने से कार्य सहज सिद्ध होते हैं।

25:52 एक ही साधना पद्धति पर अटकना उचित नहीं। मनुष्य की प्रकृति, तत्व और कोष के अनुसार साधना भिन्न होती है।

28:14 संसार में सब भक्त हैं। कोई धन का, कोई सत्ता का, कोई देवता का। पर ये खंड भक्ति है।

29:50 वेदांत अखंड दृष्टि देता है। खंड भक्ति करो पर दृष्टि अखंड रखो, तभी जीवन सफल होगा।




जीवकला का रहस्य - संध्या सत्संग 20-02-2026 सुबह

 जीवकला का रहस्य - संध्या सत्संग 20-02-2026 सुबह 



TIME STAMP INDEX   

0:01 ब्रह्म ज्ञान की महिमा और संसार से मुक्ति
0:58 आत्मविद्या का उपाय और गुरु संग
1:36 दिखावा और वास्तविक शांति
3:00 वशिष्ठ और सीता का प्रसंग [कथा]
4:26 वासना और जन्म मरण का चक्र
5:29 संसार की मिथ्यता और वासना
6:14 मनुष्य जन्म की महिमा
7:25 षड विकार और उर्मियां
8:43 विधि और निषेध से आत्मज्ञान
11:00 वेद उपनिषद और संत वचन
11:37 कबीर वचन और शरीर का निषेध
14:21 शुभ अशुभ कर्म और आलस्य
16:03 सत्संग और भगवत कथा की महिमा
17:33 गुण और प्रकृति का आधार
20:07 त्रिदोष और शरीर का नियम
23:04 कलाएं और जीवों की श्रेष्ठता
27:16 मनुष्य की श्रेष्ठता और श्रद्धा
28:03 आत्म मनन और सुख की खोज
30:01 सुख स्वरूप आत्मा का बोध
30:43 आत्मज्ञानी संत की महिमा


इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:01 उत्तम में उत्तम ब्रह्म ज्ञान है। ब्रह्म परमात्मा के विषय का ज्ञान पाकर अज्ञान मिट जाता है और फिर पतन का डर नहीं रहता। जैसे पानी 80 डिग्री तक गर्म होकर छोड़ दिया तो ठंडा हो जाएगा, पर पूरा उबाल आ गया तो कार्य सिद्ध हो गया। मन के इरादे पूरे करके लोग संसार में भटकते हैं। संसार समुद्र से तरने के लिए ज्ञानवानों का संग और निर्वेर पुरुषों की सेवा आवश्यक है।

0:58 आत्मविद कैसे मिले उसका उपाय बताया कि ज्ञानवानों का संग करो और ब्रह्मज्ञानी महापुरुष की टहल करो। उनकी आज्ञा में रहो, उनकी प्रसन्नता का ध्यान रखो तो आत्म विषयणी बुद्धि बनेगी और अविद्या का नाश होगा।

1:36 दिखावटी व्यवहार अलग है और वास्तविक ठोस व्यवहार अलग है। ठाट माठ से शांति नहीं मिलती। समझ, सच्चाई और सद्भाव से शांति मिलती है। दिखावे से अहंकार बढ़ता है और अशांति आती है। जगत विषयणी बुद्धि दुख का कारण है।

3:00 [कथा] राम जी वनवास जा रहे थे। सीता जी को गहने पहनकर भेजने में वशिष्ठ जी ने हस्तक्षेप किया। लोगों ने निंदा की पर बाद में वही गहने और अंगूठी पहचान का साधन बने। वशिष्ठ का हस्तक्षेप डिस्टर्ब करना नहीं था, रक्षा करना था।

4:26 जैसे गेंद हाथ से उछलती है वैसे जीव वासना से जन्मांतरों में भटकता है। कभी स्वर्ग कभी पाताल कभी पृथ्वी। वासना त्याग कर आत्म पद में स्थित होना चाहिए।

5:29 संसार रात्रि की मंजिल समान है, देखते ही नष्ट हो जाता है। मिथ्या वासना से जीव भ्रम में जगत को सत्य मानकर दुख भोगता है। जो वासना से तर गए वे चंद्रमा समान शांत हैं।

6:14 मनुष्य शरीर विशेष है क्योंकि इससे आत्म पद पाया जा सकता है। जो नर देह पाकर भी आत्म पद न चाहे वह पशु समान है।

7:25 जन्म, बढ़ना, बदलना, क्षीण होना और नष्ट होना ये छह विकार शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। भूख प्यास आदि उर्मियां मन और प्राण के विकार हैं। आत्म विषयणी बुद्धि न होने से मनुष्य भ्रम में रहता है।

8:43 आत्मा परमात्मा की सिद्धि विधि और निषेध दोनों से होती है। जैसे दूध में सफेदी है वैसे सब में चैतन्य है यह विधि है। मैं हाथ नहीं हूं, शरीर नहीं हूं यह निषेध है। निषेध से अहंकार कम होता है।

11:00 चार वेद और उपनिषद तत्वमसि कहते हैं कि तू वही चैतन्य है। संत वचन भी यही बताते हैं कि भगवान सर्वत्र है।

11:37 कबीर ने कहा यह तन विष की बेल है गुरु अमृत की खान है। [उदाहरण] शरीर पानी के बुलबुले जैसा है। अभी है अभी नहीं। धन दौलत भी साथ नहीं जाती।

14:21 शुभ कर्म से और अशुभ छोड़ने से आत्म सिद्धि होती है। आलस्य से निद्रा, निद्रा से प्रमाद और प्रमाद से विस्मृति आती है। इसलिए ईश्वर चिंतन आवश्यक है।

16:03 सत्संग कल्पवृक्ष है। जिस भावना से सुना जाता है वैसा फल मिलता है। भगवत कथा हजार अश्वमेघ यज्ञ से भी श्रेष्ठ है। विधि और निषेध दोनों से भगवान की प्राप्ति होती है, तत्परता चाहिए।

17:33 पांच भूतों में गुण हैं पर वे स्वतंत्र नहीं, चेतन से आए हैं। मनुष्यों में भी क्षमा, दान, सेवा आदि गुण परमात्मा से ही हैं। प्रकृति के तीन गुण सात्विक राजस तामस परिवर्तनशील हैं।

20:07 शरीर में वात पित्त कफ का चक्र चलता है। यह ईश्वर की व्यवस्था है। सूक्ष्म बीज से पूरा शरीर बनता है। प्रकृति जड़ है, गुण चेतन से हैं।

23:04 श्री कृष्ण में 64 कलाएं, राम में 12 कलाएं विकसित बताई जाती हैं। पत्थर में अस्तित्व कला है। जीवों में अस्तित्व और ग्राह्य कला है। जंतुओं में स्थलांतर की कला भी है। जितनी कलाएं विकसित उतनी श्रेष्ठता।

27:16 मनुष्य में पांच कलाएं विकसित हैं। वह संबंध पहचान सकता है, विचार कर सकता है, लोक लोकांतर का चिंतन कर सकता है। श्रद्धा और आत्म विचार से मनुष्य और श्रेष्ठ बनता है।

28:03 मनुष्य मनन करे कि उसे चाहिए क्या। पत्नी, पुत्र, धन सब सुख के लिए चाहिए। अंत में निष्कर्ष यही कि सुख चाहिए और वह भी सदा और स्वतंत्र।

30:01 जिसको सुख चाहिए उसका मूल स्वरूप ही सुख है। जैसे अग्नि की लौ ऊपर जाती है और पानी सागर की ओर जाता है वैसे ही जीव सुख की ओर जाता है। आत्मा ही सुख स्वरूप है।

30:43 जो आत्म विचार कर ले वह श्रेष्ठ है। और जिनको आत्मज्ञानी संत मिल जाए वे सबसे उत्तम हैं।





शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

आश्रम संध्या सत्संग 19-02-2026 सुबह | Surat 2011

 आश्रम संध्या सत्संग 19-02-2026 सुबह | Morning Sandhya #Satsang - Surat 2011 Ashram Sandhya

TIME STAMP INDEX

0:03 कल्याण की शीघ्रता और तपस्या का अंतर
0:22 हिरण्यकश्यप और तीन प्रकार का जगत
1:55 मन को ब्रह्म में स्थिर करने का फल
2:26 हिरण्यकश्यप और रावण की तपस्या
3:35 संकल्प से सृष्टि बदलने की शक्ति [उदाहरण]
4:38 संसारी सुख की मलिनता
5:52 अंत में दुख और निष्कर्ष
6:27 संतोषी योगी और भक्तों का सुख
7:22 सामर्थ्य और विवेक का महत्व
8:39 सदुपयोग और दुरुपयोग का फल
9:49 ईश्वर प्राप्ति ही श्रेष्ठ फल
10:59 ईश्वर प्राप्ति का सरल उपाय
12:28 सब में भगवान और सब भगवान में
14:40 आत्मा ही प्राचीन देवता
15:29 स्वप्न का दृष्टांत [उदाहरण]
16:44 पंचभूत और परमात्मा
17:38 गेहूं का दृष्टांत [उदाहरण]
18:17 कपड़े का दृष्टांत [उदाहरण]
19:10 तपस्या और भगवत प्राप्ति
19:59 इंद्र और बृहस्पति का प्रसंग [कथा]
22:09 जागृत स्वप्न सुषुप्ति और आत्मा
22:52 भगवान ही अविनाशी बीज
24:46 आत्मा अव्यय है
26:10 अध्यात्म की सर्वोच्चता
27:23 तीन उच्च भाव
27:59 दधीचि और अर्जुन का प्रसंग [कथा]
29:00 संत संग की महिमा


 इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:03 ध्यान से सुनना। जल्दी से जल्दी अपना कल्याण कर सकते हैं और 60 हजार वर्ष तपस्या करने के बाद भी अपना कल्याण नहीं कर सकते।

0:22 सात दिन में भी परम कल्याण हो सकता है और 60 हजार वर्ष के बाद भी नहीं। हिरण्यकश्यप ने 60 हजार वर्ष तप किया पर होड़ में लगे। जो दिखता है वह आदि भौतिक जगत है, जो संचालित करता है वह आदि दैविक है और दोनों का मूल आत्मा ब्रह्म परमात्मा है।

1:55 क्षण भर के लिए भी जिसने मन को ब्रह्म परमात्मा में स्थिर कर दिया उसने सब तीर्थ स्नान, दान और यज्ञ कर लिए। एकाग्रता से शक्ति आती है पर ब्रह्म में लगाना अलग बात है।

2:26 हिरण्यकश्यप ने तप से सोने का हिरणपुर बनाया। रावण ने सोने की लंका बनाई। प्रजा को सुख देने की योजनाएं की पर संसारी सुखों में फंस गए।

3:35 [उदाहरण] वह ऊंचे खड़े होकर संकल्प करता तो खेत लहलहा जाते, समुद्र से मोती निकल आते। ऐसी तपस्या की शक्ति थी।

4:38 पर संसारी सुख मलिनता से जुड़े हैं। कोई सुख ऐसा नहीं जिसमें गंदगी न हो। इंद्रिय सुख अंत में बांधता है।

5:52 अंत में रावण मारा गया और हिरण्यकश्यप नरसिंह द्वारा मारा गया। निष्कर्ष यह कि परमात्मा सुख बिना वासनाएं नहीं मिटती।

6:27 संतुष्ट सतत योगी वही है जिसका मन बुद्धि भगवान में अर्पित है। मीरा, शबरी, रहिदास, जनक जैसे भक्त सोने की लंका वालों से अधिक सुखी रहे।

7:22 एक सामर्थ्य है और एक विवेक है। धन, बुद्धि, आरोग्य सब सामर्थ्य है। उसका सदुपयोग विवेक से करो तो बढ़ता है, दुरुपयोग करो तो नाश होता है।

8:39 भोजन, व्यवहार, शास्त्र पढ़ना सब में विवेक रखो। विवेक बढ़ेगा तो आत्मा अविनाशी और जगत विनाशी समझ आएगा।

9:49 सामर्थ्य और विवेक का सतुपयोग करने से ईश्वर प्राप्ति का उद्देश्य बनता है। यही श्रेष्ठ फल है।

10:59 ईश्वर प्राप्ति का सरल उपाय है जगत में भगवान को देखना। जैसे मिठाइयों में शक्कर मूल है वैसे जगत में भगवान मूल है।

12:28 सब में भगवान है और सब भगवान में है। जैसे तरंगों में पानी और पानी में तरंग। बर्तनों में मिट्टी और मिट्टी में बर्तन।

14:40 तुम्हारा अंतरात्मा सबसे प्राचीन देवता है। सृष्टि से पहले भी वही था और बाद में भी वही रहेगा।

15:29 [उदाहरण] स्वप्न में तुम ही सब बन जाते हो। खरीदने वाले, बेचने वाले, सुखी दुखी सब तुम ही हो।

16:44 पंचभूत प्रकृति है और उसमें परमात्मा व्याप्त है। जैसे सूत बिना कपड़ा नहीं वैसे परमात्मा बिना जगत नहीं।

17:38 [उदाहरण] खेत में हरा पौधा देखकर किसान कहता है गेहूं है। दाना नहीं दिखता पर मूल गेहूं है। वैसे ही सृष्टि परमात्मा रूप है।

18:17 [उदाहरण] कपड़े का दोनों छोर हाथ में है तो बीच भी कपड़ा ही है। पहले भी परमात्मा, बाद में भी परमात्मा, अभी भी वही।

19:10 तपस्या से इच्छित वस्तु मिलती है पर भगवत प्राप्ति अलग बात है। वासना पूरी कर के भी जन्म मरण चलता रहता है।

19:59 [कथा] इंद्र ने बृहस्पति से पूछा। गुरु ने पूर्व इंद्रों को कीड़ों की योनि में दिखाया। कई बार इंद्र बनकर भी पतन हुआ। जन्म मरण चलता रहा।

22:09 जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति आती जाती हैं पर जानने वाला आत्मा अविनाशी है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा बदलते हैं पर जानने वाला नहीं बदलता।

22:52 भगवान कहते हैं उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और अविनाशी बीज मैं हूं। जैसे गन्ने में रस तुम नहीं भर सकते वैसे मूल शक्ति मेरी है।

24:46 शरीर का व्यय होता है, विचारों का व्यय होता है पर आत्मदेव का व्यय नहीं होता।

26:10 आदि भौतिक और आदि दैविक से ऊपर अध्यात्म है। अध्यात्म ज्ञान से देह में रहते हुए भी देहातीत दशा आती है।

27:23 तीन ऊंचे भाव हैं। सब में भगवान है, सब भगवान में है या सब वासुदेव है। इनमें से कोई भी भाव पकड़ लो।

27:59 [कथा] अर्जुन विराट रूप देखकर भयभीत हुए। दधीचि ऋषि हंसे और बोले मैं अर्जुन नहीं हूं, वासुदेव सर्वमिति जानता हूं।

29:00 संत संग का महत्त्व है। तीर्थ और मूर्ति से समय लगता है पर महापुरुषों के सत्संग से अज्ञान शीघ्र मिटता है। सतगुरु मिल जाए तो अनंत फल मिलता है।

 

आश्रम संध्या सत्संग 21-02-2026 शाम | Pitampura 1997

 

आश्रम संध्या सत्संग 21-02-2026 शाम |  Pitampura 1997


0:00 अहंकार त्यागकर महफिल में प्रवेश, मूलाधार केंद्र के अनुभव

0:20 ध्यान में दृश्य दर्शन और आध्यात्मिक अनुभव

0:27 स्वाधिष्ठान केंद्र जागरण से शास्त्र रहस्य प्रकट होना

0:33 नानक, तुकाराम, कबीर द्वारा वेदज्ञान बिना अध्ययन (उदाहरण)

0:56 सहज ज्ञान का उदय, वेद पढ़े बिना अनुभूति

1:15 सहज स्वभाव से जीवन परिवर्तन

1:49 तीसरे चौथे सहित सातों केंद्रों की उपलब्धि

2:01 जंजीर की कड़ी उदाहरण द्वारा केंद्र यात्रा समझाना

2:12 ज्ञानेश्वरी गीता में योग मार्ग का वर्णन (संदर्भ)

2:25 सिद्ध योग, सहज योग, कुंडलिनी योग का उल्लेख

2:45 मूलाधार में कुंडलिनी शक्ति, मंत्र और सांभवी दीक्षा

2:59 ध्यान में भाव-दर्शन पर आश्चर्य न करना

3:13 संत द्वारा मंत्र दीक्षा में आध्यात्मिक कुंजी देना

3:19 सेठों द्वारा जेल में दान और संत द्वारा मुक्ति की कुंजी देना (कहानी)

4:50 सद्गुरु द्वारा मंत्र दीक्षा से मुक्ति की कुंजी, 84 लाख योनि से मुक्ति

5:16 मानव जन्म, कंठ और बुद्धि का सदुपयोग

5:31 शरीर की अनिश्चितता और नाम कमाई का आग्रह

5:41 कबीर वाणी द्वारा जीवन की अस्थिरता संकेत (संदर्भ)

6:27 सच्चे हृदय से प्रार्थना आरंभ

6:50 सुख-दुख में सम रहने की प्रार्थना

7:16 संसार स्वप्न और प्रभु अपना लगे ऐसी कामना

7:23 मृत्यु पूर्व ध्यान और अंतर्दृष्टि की साधना

7:40 अंतर में प्रभु दर्शन की प्रार्थना

8:02 संसार देखकर हंसने की स्थिति

8:10 काम, क्रोध, लोभ, मोह को गुलाम बनाने की प्रार्थना

8:29 विकारों के अधीन जीवन की स्वीकारोक्ति

8:37 प्रभु रस से पावन होने पर विकार वश में होना

8:52 माता देवहूति और भगवान कपिल संवाद आरंभ (कथा प्रसंग)

9:06 इंद्रिय भोगों में जीवन नष्ट होने की स्वीकारोक्ति

9:13 कपिल भगवान से उद्धार उपाय की प्रार्थना

9:27 कपिल उपदेश – मन ही बंधन और मोक्ष का कारण (कथा प्रसंग)

10:04 विषय-विकारों में आसक्त मन बंधन का कारण, परमात्मा में अनुरक्त मन मुक्ति का कारण (कथा प्रसंग)

10:24 वासना रूपी पाश और आसक्ति की दृढ़ता

10:40 संत संग में वही आसक्ति मुक्ति दायी होना

10:45 ब्रह्मज्ञानी संत संग को मोक्ष द्वार बताना (शास्त्र वचन संदर्भ)

11:17 संत वचन में आसक्ति सुखदायी

11:24 नजर बदले तो नजारे बदले उदाहरण

11:32 दो पुत्रों का भिन्न संग से भिन्न परिणाम (उदाहरण)

11:51 दो पुत्रियों का आचरण अनुसार जीवन परिवर्तन (उदाहरण)

12:17 छोटी गलतियों से अधःपतन, धीरे-धीरे निर्माण

12:29 नानक, कबीर, ध्रुव, प्रह्लाद एक दिन में न बनना (उदाहरण)

12:35 दोष त्याग और सद्गुण भरने की साधना

12:48 लोभ त्यागकर सत्कर्म का अभ्यास

12:55 पान मसाला त्याग और उसकी हानिकारकता (उदाहरण)

13:30 पवित्र विकल्प द्वारा आदत सुधार

14:03 धन लोभ और कफन में जेब नहीं होती उदाहरण

14:52 लौकिक चतुराई त्यागने की शिक्षा

15:12 हरि भजन बिना जीवन व्यर्थ (संदर्भ वचन)

15:26 ऊंचे कर्म करने का आह्वान

15:52 छल कपट छोड़कर निश्चल नारायण में स्थित होना

16:08 सत्य स्वरूप परमात्मा का रसपान

16:52 गीता सत शास्त्र और पूर्ण ग्रंथ

17:17 पूर्ण परमात्मा के श्रीमुख से प्रकट गीता

17:22 ख्वाजा दिल मोहम्मद द्वारा गीता महिमा (उदाहरण)

17:47 रिहाना तैयब का गीता अनुभव (उदाहरण)

18:21 अकबर के महल में संत संग और दीक्षा (कहानी)

18:48 अकबर की बेगम द्वारा कृष्ण भक्ति कविता (कहानी)

19:25 निष्कपट भाव से गीता श्रवण का प्रभाव

19:42 उपनिषद और वेद पढ़कर भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा

19:55 एच एम मुलेम द्वारा भारतीय संस्कृति प्रशंसा (उदाहरण)

20:20 मिस्टर मार्क्स द्वारा भारत की आध्यात्मिक समृद्धि कथन (उदाहरण)

20:55 महात्मा थोर और गीता से निर्भयता (कहानी)

21:29 गांधी द्वारा महात्मा थोर का आदर (संदर्भ)

21:36 आइंस्टीन की खोज और चेतना पर विचार

21:43 गोलमेज सम्मेलन में गांधी–आइंस्टीन संवाद (कहानी)

22:08 राम तत्व की व्याख्या – जो समझ से परे है वही परम चेतना

22:20 भक्त उसे भगवान कहते हैं, राम तत्व की नित्य सत्ता

22:36 ट्रेन में गांधीजी और पादरियों द्वारा धर्म परिवर्तन का प्रयास (कहानी)

23:16 गांधीजी का उत्तर – गीता उपदेश की श्रेष्ठता और राम नाम की शक्ति (कहानी)

23:41 वैज्ञानिकों द्वारा राम नाम उच्चारण के लाभ का उल्लेख (उदाहरण)

24:16 तुलसीदास द्वारा राम नाम महिमा कथन (संदर्भ)

24:29 राम नाम से भीतर-बाहर प्रकाश और सात्विकता

25:04 दुखों का कारण अपनी वास्तविक संपदा से विमुख होना

25:21 रामतीर्थ द्वारा छाया और सूर्य का उदाहरण (उदाहरण)

25:46 मुसोलिनी द्वारा सत्ता लोभ और ओंकारनाथ की बात न मानना (कहानी)

26:06 मुसोलिनी का पलायन और मृत्यु (कहानी)

26:28 शव पर अपमान और नालायकता का परिणाम

26:34 अंतरात्मा की नालायकता से बचने की शिक्षा

27:00 सत्ता और धन के पीछे जीवन नष्ट करना

27:37 मुसोलिनी के खजाने की जांच और प्रेत कथा आरंभ (कहानी)

28:07 अधिकारियों की मृत्यु और प्रेत बाधा (कहानी)

28:29 मुसोलिनी प्रेत का प्रकट होना और अधूरी इच्छाओं की स्वीकारोक्ति (कहानी)

28:56 जीवन में धन का उपयोग न कर सकना, मृत्यु पश्चात व्यर्थता

29:03 बुद्धिमान होकर भी नालायक होने की चेतावनी

29:16 मानव जीवन की लायकात – स्वयं तरना और दूसरों को तारना

29:28 रावण द्वारा अहंकार से पतन (उदाहरण)

29:38 कंस का अहंकार और अधःपतन (उदाहरण)

29:50 हिरण्यकश्यप का मार्ग और पतन, राजा जनक का उच्च मार्ग (उदाहरण)

30:06 भारत के राजाओं में रामचंद्र और कृष्णचंद्र का स्थायी आदर (संदर्भ)

30:25 मानव ब्रह्म अंश है, आत्मस्वरूप स्मरण संदेश

30:47 बाह्य संग्रह की व्यर्थता

31:01 नारायण वचन – अनेक भूपति आए गए, कुछ साथ न ले गए (संदर्भ)

31:09 नश्वर वस्तुओं के पीछे जीवन नष्ट न करने की शिक्षा

31:15 गीता का संदेश आरंभ

31:22 लक्ष्मी द्वारा नारायण से प्रश्न – आलस्य और योगनिद्रा का अंतर (कहानी)

31:49 नारायण का उत्तर – आत्मज्ञान में निमग्न होना ही योगनिद्रा

32:14 गीता ज्ञान से कल्याण का प्रश्न

32:27 लक्ष्मी को घटित घटना सुनाने का प्रारंभ

32:32 पार्वती द्वारा शिव से महादेवत्व का प्रश्न (कहानी)

33:07 शिव द्वारा नारायण-लक्ष्मी संवाद का उल्लेख

33:20 सत्य एक, व्याख्या अनेक – कबीर, नानक, विवेकानंद, वल्लभाचार्य, रामानुजाचार्य, कवर राम संदर्भ

34:03 कबीर वचन – साधु देह में अलख पुरुष दर्शन

34:20 परम स्नेही संत महिमा

34:46 संत मिलन से पाप नाश

34:53 तुंगभद्रा तट के बनिये की कथा आरंभ (कहानी)

35:07 लोभी बनिया और अज्ञानपूर्ण आचरण

35:47 मृत्यु के बाद जड़ योनि – बैल जन्म

35:59 भिखारी द्वारा बैल का उपयोग

36:26 बैल की दयनीय अवस्था

36:47 लावारिस होकर दलदल में फंसना

37:14 लोगों का प्रयास पर बैल न निकलना

37:46 मानव जीवन व्यर्थ कर दलदल में पीड़ा

38:30 वैश्या का आगमन और दया (कहानी)

38:57 पुण्य संकल्प से बैल की सद्गति

39:12 गेहूं के माध्यम से ब्राह्मण घर में जन्म

39:32 सुशर्मा नाम और संस्कार

39:55 संत सत्संग से योग त्रय – कर्म, भक्ति, ज्ञान

40:22 मंत्र दीक्षा और पूर्व जन्म जानने की इच्छा

40:44 रिवर्स ध्यान से बैल जन्म का ज्ञान

40:57 वैश्या से सद्गति का कारण पूछना

41:15 तोते द्वारा गीता श्लोक श्रवण और पुण्य अर्पण

41:35 गीता प्रागट्य का युद्धभूमि प्रसंग

42:09 सारथी रूप में भगवान और करुणा

42:29 अकबर–बीरबल संवाद आरंभ (कहानी)

43:05 यमुना विहार योजना

43:49 दासी द्वारा मोम शिशु गिराना

44:11 अकबर का जल में कूदना बालक बचाने हेतु (कहानी जारी)

44:25 अकबर को मोम का बच्चा दिखा और बीरबल की लीला समझी (कहानी जारी)

44:39 बीरबल का उत्तर – प्रश्न के अनुसार उत्तर

44:47 अकबर का गोता – पिता का हृदय समझाना

45:13 परमात्मा पिता समान, स्वयं अवतार लेते हैं

45:38 सत्संग में कृष्ण, राम, बुद्ध, कबीर की कथा और तुम्हारी कथा

46:07 पाश्चात्य प्रभाव पर प्रश्न

46:20 मां, पिताश्री, धर्मपत्नी जैसे शब्दों की सौम्यता

47:10 भारत में विवाह धर्मप्रधान, देवत्व जागरण

47:43 फार्म हाउस के स्थान पर गीता, राम, कृष्ण वाटिका नामकरण

48:45 जापानी उदाहरण – अपनी भाषा का सम्मान

49:03 पाश्चात्य अनुकरण से सामाजिक पतन के उदाहरण

49:54 ऋषियों और महापुरुषों की भूमि का स्मरण

50:07 गुरु तेग बहादुर का धर्म न छोड़ने का संदेश

50:29 भारतीय संस्कृति विस्मरण से अस्तित्व संकट

50:48 पवित्र नामों का महत्व

51:08 उच्चारण और आकृति का संबंध

51:28 राम नाम से सद्गुण जागरण, रावण नाम से दुर्गुण स्मरण

52:11 राम वाटिका जैसे नाम से पवित्र स्मृति

52:35 जन्मदिन मनाने की वर्तमान पद्धति की आलोचना

53:03 भारतीय रीति से जन्मदिवस उत्सव का आग्रह

53:27 सात केंद्र, पंचभूत और रंगों का संबंध

54:01 स्वस्तिक, दीप और आयु अनुसार दीप प्रज्ज्वलन विधि

54:20 अंधकार से प्रकाश की ओर संदेश

55:04 अधिक प्रकाश, ज्ञान और सामर्थ्य की कामना

55:17 पंचमहाभूत और संबंधों के मंगलकामना मंत्र

55:47 दिल्ली में विशेष जोर से संदेश देना

56:05 डांट भी प्रेम का रूप

56:18 प्रेम और बंदगी की गहराई

56:46 मंत्र दीक्षा और माला की महिमा

57:04 बेंगलुरु के बसंती साधक की रक्षा (कहानी)

57:43 लदाणा रियासत और मुस्लिम व्यक्ति का अनुभव (कहानी)

58:18 जमदूत दर्शन और नियत मृत्यु प्रसंग

59:07 युवक की बैलगाड़ी दुर्घटना और मृत्यु

59:47 तुलसी के प्रभाव से भगवान के पार्षद द्वारा उद्धार

1:00:00 भगवान धाम गमन का निष्कर्ष





बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

आश्रम संध्या सत्संग 17-02-2026 सुबह - (सिद्धांत ग्रन्थ और प्रक्रिया ग्रन्थ , षडूर्मियाँ )

 

आश्रम संध्या सत्संग 17-02-2026 सुबह 


TIME STAMP INDEX 

0:06 प्रक्रिया ग्रंथों का परिचय
0:32 राजा इक्ष्वाकु की वैराग्य भावना (कथा प्रसंग)
2:44 जगत की नश्वरता पर जिज्ञासा
3:48 मनु महाराज का उपदेश
5:09 षडूर्मियाँ और आत्मचैतन्य
6:23 अविकंप योग और अंतर्मुखता
7:52 गीता का अष्टधा प्रकृति विवेक
9:35 एकांत, मौन और शक्ति संचय
10:43 गोविंद और आत्मविश्रांति का रहस्य
12:43 स्वामी रामतीर्थ और नास्तिक बाई (कथा प्रसंग)
15:24 कर्म, उपासना और तत्वज्ञान का भेद
17:49 गुरु कृपा और आत्मसाक्षात्कार
18:15 वासना क्षय, मनोनाश और बोध
19:54 राम स्वभाव और राजविद्या
21:26 भगवान परीक्षा नहीं, शिक्षा देते हैं
23:12 बुराई रहित जीवन और बुद्धियोग
24:26 भजन का लक्षण और भगवत रस
26:01 नौ रस और परमात्मा रस
27:53 ईश्वर हृदय में कैसे?
29:48 सर्वव्यापक ईश्वर और अनुभूति


 इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:  

0:06 विचार चंद्रोदय, विचार सागर, पंचदशी आदि ग्रंथ प्रक्रिया ग्रंथ हैं जो पंचमहाभूत, प्रकृति पुरुष विवेक और तत्व की ओर संकेत करते हैं।

0:32 राजा इक्ष्वाकु ने राजसुख भोगे पर अंत में विवेक जागा कि जीवन व्यर्थ जा रहा है। उन्होंने मनु महाराज को स्मरण किया और उनसे उपदेश माँगा। (कथा प्रसंग)

2:44 राजा ने कहा कि जगत बदल रहा है, इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, जो भाता है वह टिकता नहीं। जन्म मरण से छूटने का सार तत्व क्या है?

3:48 मनु महाराज ने कहा जो भोजन मिले उसे लो, इंद्रिय भोग में मत फँसो। अंतर्यामी का अनुसंधान करो और प्रणव का जप करो।

5:09 जन्म, वृद्धि, क्षय, रोग, वार्धक्य और मृत्यु शरीर की षडूर्मियाँ हैं। आत्मा इनसे न्यारा शुद्ध चैतन्य है।

6:23 ध्यान में ही नहीं, व्यवहार में भी परमात्मा शांति लक्ष्य रहे। काम ऐसा करो कि अंत में परमात्मा में विश्रांति मिले।

7:52 गीता में कहा पाँच भूत, मन, बुद्धि और अहंकार अष्टधा प्रकृति है। आत्मा इनसे भिन्न और सनातन है।

9:35 आदि शंकराचार्य ने एकांत, लघु भोजन और मौन का उपदेश दिया। मौन से शक्ति संचय होता है और अंतःकरण निर्मल होता है।

10:43 गहरी नींद में हम भगवान में ही विश्रांति पाते हैं। वही गोविंद है जिसमें इंद्रियाँ थक कर लौटती हैं।

12:43 एक नास्तिक बाई स्वामी रामतीर्थ को हराने आई पर उनकी शांति देख हार गई। स्वामी जी ने कहा मैं ईश्वर को मानता नहीं, मैं ही आत्मा हूँ। (कथा प्रसंग)

15:24 कर्मकांड और उपासना चित्त शुद्धि और एकाग्रता के लिए हैं। तत्वज्ञान साक्षात्कार के लिए है।

17:49 गुरु कृपा से आत्मज्ञान सहज होता है। समर्थ रामदास की कृपा से शिवाजी को आत्मसाक्षात्कार हुआ।

18:15 वासना क्षय, मनोनाश और बोध ये तीन कदम हैं। पहले वासना मिटे, फिर मन शांत हो और फिर ज्ञान प्रकट हो।

19:54 राम स्वभाव जिसने जाना वह भजन से अलग नहीं रहता। यही राजविद्या है जो पवित्र और उत्तम है।

21:26 भगवान परीक्षा नहीं लेते। वे विवेक देते हैं। दुख से आसक्ति छुड़ाते हैं और सुख से उदारता सिखाते हैं। संसार ईश्वर प्राप्ति की पाठशाला है।

23:12 बुराई छोड़ो, प्राणायाम से रोग रहित बनो, ईश्वर को अपना मानो तो बुद्धियोग मिलेगा।

24:26 भजन का लक्षण भगवत रस है। जब यह रस आ जाता है तो विषय रस फीके लगते हैं।

26:01 छह रस और नौ रस सब फीके पड़ जाते हैं जब परमात्मा रस मिल जाता है। वही अमृत की ओर ले जाता है।

27:53 ईश्वर सर्वव्यापक हैं पर अनुभूति हृदय में होती है। जैसे स्वाद जीभ में अनुभव होता है वैसे ही परमात्मा का अनुभव अंतःकरण में होता है।

29:48 ईश्वर सबके हृदय में हैं पर हृदय तक सीमित नहीं। जैसे घटाकाश महाकाश से अलग नहीं वैसे ही आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं। वही कर्मों के नियामक और फलदाता होकर भी सबसे न्यारे हैं।



अभ्यास से आत्मबोध. - आश्रम संध्या सत्संग 16-02-2026 सुबह

 

अभ्यास से आत्मबोध. - आश्रम संध्या सत्संग 16-02-2026 सुबह


TIME STAMP INDEX 

0:06 – अभ्यास के लिए एकांत का महत्व
0:35 – भैंसा उठाने वाले पहलवान का उदाहरण (कहानी)
1:43 – अभ्यास से सुगमता
2:37 – बेईमानी छोड़ने का अभ्यास
3:42 – शरीर कंपनी और हम मैनेजर
5:06 – वेदांत का उद्देश्य
6:28 – मनुष्य जन्म का महत्व
9:10 – बड़े विचार से महानता
10:22 – ज्ञानवानों की विभिन्न अवस्थाएं
11:51 – नाम और पहचान अभ्यास से
12:50 – परमात्मा चिंतन का अभ्यास
13:36 – उल्टा अभ्यास और रस
14:51 – संसार सागर और गोपद उदाहरण
15:22 – परमात्मा में विश्रांति
16:17 – ब्रह्मविद्या का चमत्कार
17:42 – अभ्यास की शक्ति
19:30 – परमात्मा से अपरिचय का कारण
21:06 – ध्यान और अंतःकरण निर्माण
25:20 – आत्मविचार के प्रश्न
27:00 – स्वार्थ, ममता और वासना त्याग
28:38 – निष्काम भाव से अंतःकरण शुद्धि
29:05 – साक्षी भाव का अभ्यास
30:22 – मृत्यु भय और आत्मज्ञान
31:12 – अभ्यास और वैराग्य की आवश्यकता


 इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:  

0:06 शरीर और संसार का व्यवहार इतना न बढ़ाओ कि परमात्मा में जगने का अवसर ही न मिले। थोड़ा समय बचाकर एकांत में बैठो, अभ्यास करो और फिर व्यवहार में साक्षी भाव लाओ।

0:35 एक पतला दुबला व्यक्ति बड़ा भैंसा उठाता था। उसने बताया कि जब भैंसा छोटा था तभी से रोज उठाता आया, इसलिए अभ्यास से सामर्थ्य बढ़ गया।

1:43 वशिष्ठ जी कहते हैं अभ्यास से कठिन वस्तु भी सुगम हो जाती है। आत्मभाव का अभ्यास करो और जगत के परिवर्तन को साक्षी होकर देखो।

2:37 साधक होकर बेईमानी रखना उचित नहीं। ईश्वर की वस्तु को अपनी मानना ही बेईमानी है। इसे छोड़ने का अभ्यास करो।

3:42 शरीर एक कंपनी है और हम उसके मैनेजर हैं। अनुकूलता प्रतिकूलता में राग द्वेष न रखें, कुशलता से संभालें।

5:06 वेदांत स्वास्थ्य, धन या व्यवहार से मना नहीं करता, पर बदलने वाली वस्तुओं से चिपककर आत्मा को भूलना यह मूर्खता है।

6:28 मनुष्य जन्म आत्मज्ञान का अधिकारी है। देवता भी मोक्ष के लिए मनुष्य जन्म चाहते हैं। यह ईश्वर की कृपा है।

9:10 बड़े महल या बड़े साधन से महानता नहीं आती। बड़े विचार से महानता आती है। मैं कौन हूं, यह विचार करो।

10:22 ज्ञानवान अलग अलग प्रकार से रहते हैं। कोई समाधि में, कोई उपदेश में, कोई विनोद में, पर भीतर से स्वरूप में स्थित रहते हैं।

11:51 जैसे नाम बार बार सुनकर पक्का हो जाता है वैसे ही मैं देह हूं यह भी अभ्यास से माना गया है।

12:50 जैसे भंवरा पुष्प के इर्द गिर्द मंडराता है वैसे ही चित्त परमात्मा चिंतन में मंडराए, यही अभ्यास है।

13:36 शराब या विषयों में भी उल्टा अभ्यास से रस आता है। तो परमात्मा चिंतन में अभ्यास से क्यों नहीं रस आएगा।

14:51 जिनको सत्संग और अभ्यास है उनके लिए संसार सागर तरना गोपद के समान है। जिनको रुचि नहीं उनके लिए संसार गंभीर सागर है।

15:22 हम अपने उद्गम स्थान अंतर्यामी परमात्मा में विश्रांति पा सकते हैं। वही प्रेम स्वरूप है।

16:17 ब्रह्मविद्या का अभ्यास कुरूप को भी पूज्य बना देता है। अष्टावक्र जैसे महापुरुष इसका उदाहरण हैं।

17:42 अभ्यास में बड़ी शक्ति है। जिस विषय का अभ्यास करो वह सरल हो जाता है। ईश्वर पाना कठिन नहीं, ध्यान की दिशा चाहिए।

19:30 परमात्मा दूर नहीं, पर अभ्यास न होने से पराया लगता है। वह सबका परम सुहृद है।

21:06 ध्यान में अंतःकरण का निर्माण करना पड़ता है। सुन सुनकर जैसे देह की पहचान बनी वैसे ही आत्मज्ञान से नया निर्माण करो।

25:20 मैं कौन हूं, जगत क्या है, ईश्वर क्या है, मुक्ति क्या है ऐसे प्रश्न उठाओ और गुरु से तत्वज्ञान लेकर ध्यान में स्थिर करो।

27:00 अपने विषय में स्वार्थ त्यागो, कुटुंब में ममता त्यागो और ईश्वर के प्रति वासना त्यागो। इससे अंतःकरण निर्मल होगा।

28:38 निष्काम भाव से भजन करने पर देने वाले की शक्ति हमारी हो जाती है और आत्मबल बढ़ता है।

29:05 जैसे रोटी बनाना अभ्यास से आता है वैसे ही साक्षी होने का अभ्यास करो। सुख दुख में मन से पृथक रहो।

30:22 मृत्यु का भय आत्मज्ञान की कमी से है। आत्मा को जान लिया तो मृत्यु शरीर की है, आत्मा की नहीं।

31:12 बिना अभ्यास और वैराग्य के ज्ञान टिकता नहीं। वैराग्य के साथ अभ्यास करो तो आत्मज्ञान सिद्ध हो जाता है।



मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

आश्रम संध्या सत्संग 13-02-2026 सुबह (satsang )

 


आश्रम संध्या सत्संग 13-02-2026 सुबह 


TIME STAMP INDEX 

0:02 – सत्संग का आनंद और तत्व में टिकना
0:24 – सुख दुख की अस्थिरता
0:38 – साधक की डामाडोल स्थिति
1:14 – अच्युत तत्व की ओर दृष्टि
1:28 – सत्व रज तम की अवस्थाएँ
2:15 – अच्युत सनातन अंश
2:56 – अनुभव और फरियाद
3:24 – सत्संग में मन न लगने की शंका
4:01 – सत्संग का महत्व स्व में टिकना
4:24 – (उद्धरण) कबीर जी की वाणी
5:15 – जप की अवस्थाएँ
5:54 – स्थिति और स्थिर तत्व का भेद
6:11 – (उद्धरण) तुलसीदास जी
6:27 – समर्थ रामदास और अद्वैत ज्ञान
6:58 – इंद्रियों में एक ज्ञान तत्व
8:05 – देह और असली स्वरूप
9:23 – आत्मदेव में टिकना
10:01 – भक्ति योग कर्म योग ज्ञान योग
11:27 – स्थिति बनाए रखने का आग्रह
12:44 – अभ्यास और संस्कार
13:31 – जगत की सत्यता और माया
13:46 – पतंगे का उदाहरण
15:23 – दीक्षा और मोक्ष
16:01 – ब्राह्मी स्थिति
17:13 – मन बुद्धि से परे अवस्था
18:03 – (प्रश्न) शरीर हल्का या ऊपर उठना
19:48 – ध्यान में कुछ न सूझना
21:09 – साधना में विक्षेप
22:21 – शरीर और संस्कार की शुद्धि
23:05 – ध्यान योग की अवस्था
24:34 – स्थिति से असंग रहना
25:42 – तड़प और वातावरण का प्रभाव
26:57 – (महाभारत प्रसंग) नारद जी और युधिष्ठिर
27:17 – पाप और अंत समय का नाम
29:11 – (भागवत कथा) अजामिल प्रसंग
29:44 – माया का स्वरूप और भगवान की शरण


इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:02 सत्संग का आनंद लेना आरंभिक साधक का लक्षण है, पर सत्संग के तत्व में टिकना ऊंची समझ का फल है।

0:24 आनंद सदा नहीं रहता, दुख भी सदा नहीं रहता, सुख भी स्थायी नहीं है।

0:38 साधक सत्संग में ऊंची स्थिति अनुभव करता है, पर संसार में जाकर डगमगा जाता है। ध्यान में शांति मिलती है, पर वह भी बदलती रहती है।

1:14 इन बदलती स्थितियों के पार अच्युत तत्व ज्यों का त्यों है, उसी की ओर दृष्टि करनी चाहिए।

1:28 अंतःकरण में कभी सात्विक, कभी राजसी, कभी तामसी वृत्ति आती है। कुसंग से तामस बढ़ता है, पर सदा सात्विक रहने का आग्रह भी बाधा बनता है।

2:15 एक ऐसा तत्व है जो एकरस और अच्युत है। हम उसी के सनातन अंश हैं, उसी में जागना है।

2:56 साधकों को उच्च अनुभव होते हैं, फिर भी फरियाद रहती है क्योंकि अच्युत में स्थिरता नहीं हुई।

3:24 लोग कहते हैं सत्संग में मन नहीं लगता, पर यदि मन न लगता तो फिर आते क्यों? मन लगता है पर टिकता नहीं।

4:01 सत्संग का महत्व यह है कि स्व में टिक जाए। सुनो, विचार करो और उसे अपने जीवन में उतारो।

4:24 (उद्धरण) कबीर जी ने कहा सत्संग की आधी घड़ी भी अनेक वर्षों के तप से श्रेष्ठ है। सुमिरन से सुख मिलता है और दुख मिटता है।

5:15 जप के आरंभ में होंठ हिलते हैं। ह्रस्व जप से पाप नाशिनी शक्ति बनती है, दीर्घ से कार्य सिद्धि शक्ति, और प्लुत से गहरी शांति की स्थिति आती है।

5:54 स्थिति बनती है पर वह बदलती है। स्थिर तत्व और बदलती स्थिति का भेद समझना गुरु कृपा से होता है।

6:11 (उद्धरण) तुलसीदास जी ने कहा बिना विचार के वासना नहीं मिटती। केवल तप से नहीं, ज्ञान से शुद्धि होती है।

6:27 समर्थ रामदास ने कहा मोक्ष के लिए अद्वैत ज्ञान का आश्रय लो। अनेक दिखते हुए भी एक तत्व में जागो।

6:58 आंख अनेक रूप देखती है, कान अनेक शब्द सुनते हैं, पर जानने वाला ज्ञान तत्व एक है।

8:05 शरीर बदलता रहता है। सात वर्षों में कण बदल जाते हैं, तो शरीर मैं कैसे हुआ?

9:23 बुद्धि के निर्णय बदलते हैं पर जानने वाला आत्मदेव वही रहता है। उसी में टिकना है।

10:01 भक्ति योग, कर्म योग और ज्ञान योग तीनों मार्ग अंततः उसी सत्य चेतन स्वरूप में पहुंचाते हैं।

11:27 स्थिति बनाए रखने का आग्रह और विक्षेप बढ़ाता है। बदलने वाली अवस्था को महत्व मत दो, शास्त्र मर्यादा रखो।

12:44 साधन का अभ्यास आवश्यक है। जन्मों के संस्कार हटते हैं तो भीतर हलचल होती है।

13:31 यह जगत न पूर्ण सत्य है न पूर्ण असत्य। बदलता रहता है, इसलिए माया का खेल है।

13:46 जैसे पतंगे प्रकाश में आकर्षित होकर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही क्षणिक सुख के पीछे भागने वाला दुख पाता है।

15:23 दीक्षा से लाभ होते हैं, पर सबसे बड़ा लाभ मोक्ष है, जहां परिस्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता।

16:01 ब्राह्मी स्थिति में इच्छा लवलेश नहीं रहती। बाहरी सुख आकर्षित नहीं करते।

17:13 एक अवस्था ऐसी आती है जहां मन बुद्धि का आश्रय छूट जाता है और आत्म तत्व में विश्रांति होती है।

18:03 (प्रश्न) साधना में शरीर हल्का लगे या ऊपर उठता अनुभव हो तो यह सिद्धि के बीज रूप संस्कार हैं, आग्रह न करें, तत्व में टिकें।

19:48 ध्यान में कुछ न सूझे तो चिंता न करें। जैसे गहरी नींद में भी हम सुरक्षित रहते हैं, वैसे ही यह अवस्था स्व की पुष्टि करती है।

21:09 साधना में विक्षेप हों तो होने दें। उनसे लड़ो मत, सजग होकर ऊपर के केंद्र में टिक जाओ।

22:21 शरीर और इंद्रियों में शक्ति जागती है तो भीतर के संस्कार उभरते हैं। यह शुद्धि की प्रक्रिया है।

23:05 ध्यान योग में प्रारंभ में भय या विलक्षण अनुभव हो सकते हैं, पर वे अस्थायी हैं।

24:34 स्थिति रहे या न रहे, जो कभी नहीं बदलता उसी में सजग रहो।

25:42 तड़प वातावरण से बढ़ती या घटती है। संग, आहार, साहित्य का प्रभाव पड़ता है।

26:57 (महाभारत प्रसंग) नारद जी ने युधिष्ठिर को कहा कि वर्ष में कुछ समय सत्पुरुषों का संग अवश्य करो।

27:17 यदि किसी ने जीवन में पाप किए पर अंत समय हरि नाम लिया तो सामान्य जन को भ्रम नहीं करना चाहिए कि पाप करते रहें और अंत में नाम ले लेंगे।

29:11 (भागवत कथा) अजामिल ने अंत समय भाव से नारायण नाम लिया और उद्धार हुआ। भाव मुख्य है।

29:44 माया वह है जो हो नहीं और दिखे। भगवान की शरण में जाने से माया से पार हुआ जा सकता है। बार-बार नाम स्मरण ही रक्षा है।





संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था सत्संग के मुख्य अंश : राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है । करने, जानने और मानने की शक्ति...