गीता सार - भाग -1 आश्रम संध्या सत्संग 01-02-2026 सुबह
वीडियो टाइम-स्टैम्प इंडेक्स
0:00 मंगलाचरण, श्लोक पाठ (गीता 7.3)
1:30 श्लोक 7.3 का अर्थ और हजारों में कोई विरला साधक
4:30 ईश्वर की निकटता और मछली-सागर उदाहरण (दृष्टांत)
8:30 अभाव की ओर भागता मन और मौजूद की उपेक्षा
12:30 दरिद्रता की वास्तविक परिभाषा और तृप्ति का अभाव
16:30 दुर्योधन और युधिष्ठिर प्रसंग (कहानी)
19:30 अष्टधा प्रकृति का विवेचन (गीता 7.4)
22:30 परा और अपरा प्रकृति का भेद (गीता 7.5)
25:30 मनुष्य की परिभाषा (वल्लभाचार्य व शंकराचार्य संदर्भ)
28:30 निष्कर्ष परमात्मा की सहज उपलब्धता
इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:
0:00 श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय का तीसरा श्लोक पाठ किया गया है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हजारों मनुष्यों में कोई एक सिद्धि के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वालों में भी कोई विरला ही मुझे तत्व से अर्थात् यथार्थ रूप में जान पाता है। यहां यह बात स्पष्ट की गई कि संसार में मनुष्य बहुत हैं, पर वास्तविक साधक बहुत कम हैं। अधिकांश लोग जीवन को केवल शरीर, परिवार, धन और मान-प्रतिष्ठा तक सीमित मान लेते हैं। भगवान की प्राप्ति का विचार ही उनके जीवन का लक्ष्य नहीं बन पाता, इसीलिए हजारों में कोई एक ही उस दिशा में प्रयत्न करता है।
1:30 इस श्लोक का भावार्थ समझाते हुए कहा गया कि ईश्वर की प्राप्ति वास्तव में कठिन नहीं है, कठिनाई केवल मन की दिशा में है। मन बाहर की उपलब्धियों, सुख-सुविधाओं और अभावों में उलझा रहता है। लोग भजन, जप और पूजा करते हुए भी ईश्वर को पाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए करते हैं। इसलिए प्रयत्न होते हुए भी तत्वज्ञान नहीं हो पाता।
4:30 यहां ईश्वर की निकटता को समझाने के लिए मछली और सागर का उदाहरण दिया गया है (दृष्टांत)। जैसे मछली चारों ओर पानी में रहती है, पानी में ही जीती है और पानी में ही चलती है, फिर भी उसे पानी की अलग से अनुभूति नहीं होती, वैसे ही मनुष्य परमात्मा में पूर्ण रूप से ओतप्रोत है। परमात्मा इतना निकट है कि उससे बाहर जाना संभव ही नहीं, फिर भी उसकी अनुभूति नहीं हो पाती क्योंकि जो सदा मौजूद है, उसकी ओर मन नहीं जाता।
8:30 मन के स्वभाव पर विस्तार से प्रकाश डाला गया कि मन हमेशा अभाव की ओर भागता है। जो मौजूद है उसकी कीमत नहीं समझता और जो नहीं है उसी की चाह करता रहता है। जैसे दांत टूटने पर जीभ बार-बार उसी स्थान पर जाती है, वैसे ही मन अभाव को पकड़ लेता है। इसी कारण परमात्मा सदा उपस्थित होते हुए भी अनुभव में नहीं आता और मनुष्य दुखी बना रहता है।
12:30 दरिद्रता की सही परिभाषा बताई गई कि दरिद्र वह नहीं है जिसके पास धन नहीं है, बल्कि वह है जिसके पास तृप्ति नहीं है। किसी के पास हजार नहीं, किसी के पास लाख नहीं, किसी के पास करोड़ नहीं, इस तरह अभाव की श्रृंखला कभी समाप्त नहीं होती। मनुष्य के पास आत्मधन, जीवन, श्वास और चेतना होते हुए भी वह स्वयं को गरीब मानता है और सुख के लिए भीख मांगता रहता है।
16:30 दुर्योधन और युधिष्ठिर का प्रसंग सुनाया गया है (कहानी)। दुर्योधन को सज्जन खोजने भेजा गया तो उसे कोई सज्जन नहीं मिला और युधिष्ठिर को दुर्जन खोजने भेजा गया तो उसे कोई दुर्जन नहीं मिला। इस प्रसंग से यह समझाया गया कि जैसी दृष्टि होती है, वैसा ही संसार दिखाई देता है। दोष बाहर नहीं, देखने वाली दृष्टि में होता है।
19:30 गीता के सातवें अध्याय के चौथे श्लोक के द्वारा अष्टधा प्रकृति का विवेचन किया गया जिसमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार को भगवान की अपरा प्रकृति कहा गया। यह सारी प्रकृति जड़ है और परिवर्तनशील है। मनुष्य प्रायः इसी अष्टधा प्रकृति को ही अपना स्वरूप मान लेता है और यहीं उलझ कर रह जाता है।
22:30 पांचवें श्लोक के माध्यम से परा और अपरा प्रकृति का भेद बताया गया। अपरा प्रकृति से भिन्न जीव रूपा परा प्रकृति चेतन है और उसी से यह संपूर्ण जगत धारण होता है। यही चेतन शक्ति वास्तविक स्वरूप है, लेकिन मनुष्य जड़ में उलझकर चेतन को भूल जाता है।
25:30 वल्लभाचार्य और शंकराचार्य के अनुसार मनुष्य की परिभाषा बताई गई। वल्लभाचार्य कहते हैं कि जो मन, बुद्धि और शरीर भगवान की सेवा और तत्वज्ञान के योग्य हो, वही मनुष्य है। शंकराचार्य के अनुसार जिसमें सच्चिदानंद परमात्मा की अभिव्यक्ति की संभावना हो, वही सच्चा मनुष्य है। केवल दो पैर होना मनुष्य होने की पहचान नहीं है।
28:30 अंत में निष्कर्ष दिया गया कि परमात्मा को पाना कठिन नहीं है, बल्कि सबसे सरल है। कठिनाई केवल मन की दिशा में है जो सदा मौजूद परमात्मा को छोड़कर अभाव और कल्पनाओं की ओर दौड़ता रहता है। जब मन मौजूद को देखने लगता है, तभी परमात्मा का साक्षात्कार सहज रूप से हो जाता है।
Manual Transcription -
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।7.3।।
यह भगवदगीता सातवां अध्याय का तीसरा श्लोक है। हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात् यथार्थ रूप से जानता है।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7.4।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7.5।।
“पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के वेदों वाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो! इससे दूसरी को, जिससे यह संपूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीव रूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति तू जान।” भगवदगीता के सातवें अध्याय का चौथा और पांचवां श्लोक का अर्थ है।
तीसरे श्लोक का अर्थ है कि हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात् यथार्थ रूप से जानता है। हजारों में कोई विरला ही ईश्वर के लिए प्रयत्न करता है, ऐसा क्यों?
सही बात तो है कि ईश्वर को पाना इतना सुगम, इतना सहज है, इतना वह निकट है कि... उसके लिए कुछ कहा नहीं जा सकता। इतना वह निकट है और फिर भी कोई प्रयत्न नहीं करता क्यों? उसको पाने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करता। लाखों लोग भजन तो करते दिखते हैं, जप करते हुए दिखते हैं, पूजा करते हुए दिखते हैं, आराधना करते हुए दिखते हैं और यहां कहते हैं कि हजारों में एक, आधा हजार नहीं, हजारों के बहुवचन है। कम से कम तीन हज़ार से ज्यादा। हजारों में कोई विरला यत्न करता है और कोई यत्न करने वालों में विरला सिद्धि को पाता है और सिद्धों में भी कोई विरला ही मुझे तत्व से जानता है। सही बात तो यह है कि ईश्वर ऐसे ओतप्रोत भरपूर है, इतने नजदीक है। जैसे मछली सागर में रहती है तो इधर सागर के अगल पानी, बगल पानी, मछली के ऊपर पानी, नीचे पानी। मछली को कभी पानी का अभाव दिखता ही नहीं। इतना पानी में वो ओतप्रोत है कि जीती पानी में है, उठती पानी में है, बैठती पानी में है, हंसती पानी में होगी, रोती भी पानी में ही होगी। आखिर सब पानी में ही उसका जीवन हो जाता होगा। हो सकता है कि मछली तो कभी पानी के बाहर भी आ जाए, लेकिन हम ईश्वर के बाहर नहीं आ सकते। हम इतना ईश्वर में ओतप्रोत हैं। ईश्वर हमारे, ईश्वर का वास्तविक स्वरूप तो हमारे इतना निकट है कि शायद मछली के इतना निकट पानी नहीं। सागर में रहने वाली मछली भी शायद घड़ी भर के लिए पानी से बाहर हो जाए, लेकिन हम ईश्वर से बाहर नहीं हो सकते। मछुआ मछली को पकड़कर किनारे फेंक दे, नाव में डाल दे। नाव है सागर में, लेकिन सागर से बाहर मछली को एहसास हो जाएगा पानी का। लेकिन हमें, हमें ईश्वर से बाहर, ईश्वर से अलग कोई नाव में कोई डाल दे अथवा ईश्वर से अलग कोई किनारे पर रख दे, ऐसी संभावना नहीं है। तो ईश्वर इतना निकट, इतना ओतप्रोत और जो चीज ओतप्रोत होती है, निकट होती है, उसको जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती और उसका अभाव भी नहीं दिखता। ओतप्रोत है ना!
जैसे हमारे हाथ ठीक हैं तो कोई पता नहीं, लेकिन जब पीड़ा होती है, किसी उंगली में तो मन वहां जाता है। मुंह में दांत हैं, पिछले बयालीस साल से दांत थे। कोई खास उनका विश्लेषण नहीं, खास कोई उनकी तरफ चित्त गया नहीं। एक दांत टूट गया तो जीभ बार बार वहीं जाएगी। जीभ ने देख लिया, एक बार नहीं है तो नहीं है नहीं, फिर वहीं जाएगी। तो हमारे मन का स्वभाव है, जो चीज नहीं है, उसके तरफ बार बार जाती है और जो है मौजूद।... उसके लिए लापरवाही होती है। तो परमात्मा इतना मौजूद है, इतना मौजूद है, कि सागर की मछली को इतना पानी मौजूद नहीं, नजदीक नहीं जितना हमारे नजदीक परमात्मा है। इसलिए शायद हम परमात्मा के वास्तविक तत्व के तरफ नहीं जा पाते। भजन तो करते लोग भगवान का। मजे की बात है कि परमात्मा इतना नजदीक होते हुए भी परमात्मा का तत्व जानने की हमको तड़फ नहीं है। इसलिए परमात्मा के सिवा और सब कुछ जानते हैं, बाकी परमात्मा तत्व को नहीं जानते। और सब कुछ जाने तो उसकी एक कौड़ी की भी कीमत नहीं और सब कुछ पा लिया तो उसकी एक अधेले की भी कीमत नहीं। जिससे पाया जाता है, उसको नहीं पाया, जिससे जाना जाता है, उसको नहीं जाना। जिसको एक बार पाने के बाद आदमी महान धनवान हो जाता है, महान ऐश्वर्यवान हो जाता है, महान सत्तावान हो जाता है और उसको पाए बिना जो कुछ है, कितना भी कुछ है, वो महान दरिद्र है।
दरिद्र वो नहीं कि जो सड़कों पर भीख मांगता है। दरिद्र वो है कि जिसके पास तृप्ति नहीं है। सड़कों पर भीख मांगता है, उसको धन की तृप्ति नहीं है। उसके पास हजार, दो हजार नहीं है। किसी के पास लाख, दो लाख नहीं है, किसी के पास करोड़, दो करोड़ नहीं है, किसी के पास अरब, दो अरब नहीं है। जो है उसकी लापरवाही है और जो नहीं है उसके लिए भीख मांगना चालू है। भिखारी के पास पैसा नहीं है, इसलिए भीख मांगता है। कोई खुलेआम भीख मांगता है, कोई और अटकल से भीख मांगता है, लेकिन सब भीख मांग रहे हैं, सुख की। धन हो तब सुखी होऊं, सत्ता हो तब सुखी होऊं, सौंदर्य आए तब सुखी होऊं, अमुक व्यक्ति मिले तब सुखी होऊं, अमुक जगह पर जाऊं तभी सुखी होऊं, अमुक अवस्था पाऊं तभी सुखी होऊं। ये सब केवल उस परमात्मा तत्व की प्यास न होने के कारण, उस परमात्मा तत्व का साक्षात्कार न होने के कारण भीख मंगापना चलता रहता है और यह भीख एक जन्म नहीं, सदियों से यह जीव मांगता आया है। कुछ हो जाए, कुछ पा लूं, कुछ कर लूं। अभी जो है उसकी कोई कीमत नहीं। जहां पर है, जैसे है, उस अवस्था का सदुपयोग नहीं, लेकिन जहां नहीं है उसकी इच्छा होती है। दांत हैं तो उसका कोई गिनती नहीं, अब नहीं है तो जीभ वहीं जाती है बार बार। तो जो चीज नहीं है, उधर मन भागता है, मन अभाव में जाता है। विधेयक में मन जाए, एक होता है विधेयक, दूसरा होता है निषेधात्मक। तो जो मौजूद है, उधर हमारा मन नहीं जाता। मन का जैसे पानी का स्वभाव है, नीचाई को बहना, खड्डों की तरफ बहना, ऐसे ही मन का स्वभाव और वृत्तियों का स्वभाव है अभाव के तरफ। ऑडिट करने वाले लोग क्या करते हैं? क्या बढ़िया लिखा है, उधर उनकी नजर नहीं जाएगी, कहां गलती है? ऐसे ही हमारा मन अभाव के तरफ जाता है। जो मौजूद है उसका पता नहीं। जो मौजूद है उसकी कीमत का पता नहीं। संत तो यूं कहते हैं कि दुनिया में दुखी आदमी खोजना असंभव है, गरीब आदमी खोजना असंभव है। हर इंसान के पास इतना खजाना भरा है, इतना वो धनवान है कि सारे विश्व को चलाने वाला चैतन्य परमात्मा उसके दिल की धड़कनें चला रहा है। इतना वो आनंद स्वरूप है कि सारे ब्रह्मांड को आनंदित करने वाला परमात्मा उसके पास है तो फिर आदमी दुखी मिलना मुश्किल ही है। बात तो सही है कि कोई दुखी नहीं, कोई कंगाल नहीं।
सुन्या सखना कोई नहीं सबके भीतर लाल ।
भीतर, लाल तो है, लेकिन उस लाल के सद्भाव का हमको ख्याल नहीं। मौजूदगी का हम उपयोग नहीं करते और लामौजूदगी के तरफ मन भागता जाता है। एक हाथ में चोट लगी है, चिल्ला रहा है, हाय रे हाय! मैं तो मर गया, मेरी उंगली कट गई। इतने दिन थी तो उसका इतना आदर न था, अब कट गई तो उधर चिल्ला रहा है। अब दूसरी मौजूद है, सामने वाले की दो कटी है। वो देखकर बोले, "ऐसा सोचे कि हे भगवान! तेरी कृपा है, उसके तो दो हाथ कट गए, मेरे तो एक हाथ की खाली उंगली कटी है। वाह, वाह!" धन्यवाद करके भी वो जी सकता है। नहीं, हाय रे हाय, मेरी उंगली कट गई।
निषेधात्मक वाले व्यक्ति का जीवन कैसा होता है? पूछो तो क्या हाल है? बोले, क्या भगवान ने दुनिया बनाई है? दो लंबे लंबे दिन के बीच एक छोटी सी रात, दो लंबे लंबे बीच दिन प्रकाशमय विधायक मन ऐसा बोलेगा। दो सुहावने सुंदर दिनों के बीच जरा सी रात बनाई। क्या भगवान की दया है, कितना प्रकाश है, कितना उजाला है जीवन में! और निषेधात्मक होगा तो, अरे क्या दुनिया है, अंधेरा ही अंधेरा। दो लंबी रातों के बीच एक छोटा सा दिन, दो लंबी रातों के बीच एक जरा सा दिन। तो जो दुख खोजता है, उसको दुख ही दुख मिलेगा। मैंने सुनाई थी वो बात। कौरवों को, कौरवों के बड़े भ्राता दुर्योधन को भेजा कि जा सज्जन को खोज कर आ।
सारा दिन खोजतान करते-करते, छानबीन करते और शाम को गुरु के द्वार पर पहुंचा के, "गुरुजी सज्जन आदमी कोई मिलता ही नहीं, सब लुच्चे, बदमाश, बेकार आदमी हैं।"
दूसरे दिन युधिष्ठिर को भेजा गया कि जाओ, दुर्जन आदमी को खोज कर लाओ।
युधिष्ठिर गए, वे भी छानबीन करते शाम को लौटे। बोले “दुर्जन तो कोई है ही नहीं, मैं पूरा गांव ढूंढ के आया हूँ।”
तो आदमी की जैसी जिस प्रकार की दृष्टि होती है, उस प्रकार की सज्जनता या दुर्जनता वो मान लेता है, लेकिन मान्यताएं मन की हैं, बुद्धि की हैं, अष्टधा प्रकृति में है। मैं क्या हूँ, उसकी उसको खोज नहीं।... और वह अपने आप में इतना पूरा है, अपने आप में इतना महान है कि उसके पास कुछ न हो, खाने को रोटी न हो, पहनने को कपड़ा भी न हो, फिर भी उसके पास इतना कुछ है, इतना कुछ है कि वह गरीब तो नहीं कहा जा सकता, दरिद्र तो नहीं कहा जा सकता, दुखी तो नहीं कहा जा सकता, अभागा तो नहीं कहा जा सकता। जिसके हृदय में अनंत ब्रह्मांड का स्वामी धड़कनें दे रहा है, वह अभागा कैसे? जिसके साथ परब्रह्म परमात्मा अठखेलियां कर रहा है, वह दुखी कैसे? और जिसके पास आत्मधन है, वह निर्धन कैसे? लेकिन जो चीज मौजूद है, उसका पता नहीं और जो लामौजूद है, मेरा छोटा मकान है तो बड़े मकान वाले को देख के बोलूंगा कि मैं गरीब हूं। मेरे पास कम पढ़ी पढ़ाई लिखाई है। मेरी बुद्धि में एसएससी तक का ज्ञान है तो एमए वाले को देखूंगा कि इसमें ज्यादा ज्ञान है, मेरे पास कुछ नहीं। हकीकत में यह अष्टधा प्रकृति के अंदर है। बुद्धि में कम सूचनाएं हैं, किसी के पास ज्यादा सूचनाएं हैं। किसी को अष्टधा प्रकृति के शरीर को ज्यादा सहूलियत है, किसको कम सहूलियत है लेकिन हमारा असली स्वरूप तो इतना महान है, इतना गौरवान्वित है, इतना महिमाशील है कि इसकी बराबरी अष्टधा प्रकृति की कोई चीज से की नहीं जा सकती। लेकिन यह यहां बड़ी विडंबना है। बड़ी मुश्किल यह है कि जो मौजूद है, उसका हमको पता नहीं।
एक माई आई थी कि बाबाजी मैं जाती हूं कांकरिया में आपघात करने को, अब मेरे से सहा नहीं जाता। गरीबी है, मिलें भी बंद हो गई। लड़के मांगते हैं खाना-पीना और पठानी ब्याज वाले ब्याज के लिए तंग करते हैं। अब तो बस मैं मरूं, बस मेरे पास और कुछ नहीं। और पति नौकरी ढूंढ रहा है। मैं भी काम तो कर सकती हूं, लेकिन मिलता नहीं। अब मैं जाती हूं कांकरिया। पुरानी बातें आई थी एक माई। अब कांकरिया जाती हूं, आशीर्वाद लेने आई हूं।
मत जाना, ऐसा मैंने नहीं कहा। मैंने कहा जाओ जरूर, लेकिन कब जाओगी?
बोले, अभी जाती हूं।
मैंने कहा, अच्छा जाओ तो सही, लेकिन कांकरिया में जाने से दरिद्रता मिटती हो तो चले जाओ।
बोले, मर जाऊंगी, आराम हो जाएगा।
मरने के बाद आराम नहीं होता और जो आदमी आपघात करता है, वह आवेश की घड़ियों में करता है और उसको बोलो नहीं तो उसका आवेश बढ़ेगा। उसको बोलो, करो जरूर, लेकिन ऐसा दो मिनट के बाद जरा करना। आवेश खत्म हो जाएगा तो आपघात नहीं कर सकता। उसको प्रसाद-व्रसाद दिया।
मैंने कहा, अच्छा जाती हो तो जाओ कांकरिया, लेकिन कांकरिया में आपघात करने से नौकरी मिल जाए तो ठीक है। आपघात करने से दुखों से छूट जाए तो ठीक है।
बोले, बाबाजी! वैसे विचार तो जाने का था, लेकिन अब आप.. तुम जो कहो वैसा करती हूं। ओम ओम…
हमारी इस अष्टधा प्रकृति के शरीर को कोई चीजें कम मिलती है अथवा कोई तकलीफ आती है तो हम बेचैन हो जाते हैं, परेशान हो जाते हैं, अपने को अभागा और पापी और दुखी, दीन-हीन मानते हैं और उस वक्त भी हमारे पास कितना कुछ भरा पड़ा है। उस महिला को कहो कि चलो, तेरे पास कुछ नहीं, तू दरिद्र है, तेरे पास कुछ नहीं, इसलिए मरती है तो फलाना सेठ आया है। अब मैं उससे बातचीत करता हूं।
सेठजी बोलता है कि माई दो आंखें दे दे तो एक लाख रुपया मिलेगा।
बोल देगी, बाबाजी, लाख रुपए में अपनी आंखें! मैं तो दस लाख में भी नहीं दूंगी।
अच्छा तो आंखें तो खैर तुम्हारे काम में आएगी। कांकरिया जाते-जाते कूदका मारने में आंखें तो काम आएगी, इसलिए नहीं देती। ठीक है तो अपने हाथ दे दे, कान दे दे। ले ले पच्चीस-पच्चीस हज़ार रुपए।
नहीं।
अरे तो उस परमात्मा ने ऐसी ऐसी चीजें दे रखी है, जिसके आगे दो लाख, दस लाख कुछ नहीं और उससे भी अधिक वो स्वयं तुम्हारे साथ है, उसकी तुमको फिक्र ही नहीं। श्री कृष्ण बोलते हैं:
मनुष्याणां सहस्त्रेषु ।
मनुष्यों में, मनुष्य तो बहुत हैं। वल्लभाचार्य कहते हैं, दो पैर वाले पशु का नाम मनुष्य नहीं है। मनुष्य वो है जो मन से भगवान के साथ संबंध जोड़ सके।
मनसा सीवति इति मनुष्याः।
वल्लभाचार्य कहते हैं कि जो शरीर भगवान की भक्ति करने के काम आए, जो, जो बुद्धि भगवान तत्व के समझने में काम आए, जो वस्तु भगवान के काम आए, जो बुद्धि भगवान के काम आए, जो देह भगवान के काम आए, भगवान के योग्य जो तन, बुद्धि, मन है, वो मनुष्य है। भगवान को पाने के योग्य, भगवान की सेवा के योग्य जो नहीं है, वह मनुष्य नहीं है।
स्वल्पपुण्यवतां राजन् विश्वासो नैव जायते।
अल्प पुण्य वाले व्यक्ति का भगवान में, शास्त्र में, गुरु के वचनों में विश्वास नहीं होता। पुण्य यदि जोर मारते हैं, तभी भगवान में विश्वास होता है। तो दो पैर वाले पशु का नाम मनुष्य नहीं। जिसका भगवान में, शास्त्र में, संतों में श्रद्धा है, विश्वास है, ऐसे लोग मनुष्य हैं। फिर चाहे उनका शरीर कागभुषंड का हो, चाहे गरुड़ का हो, चाहे जटायु का हो, वे सब भगवत सेवा के अधिकारी हैं। जो भगवत सेवा के अधिकारी हैं, वह सब मनुष्य हैं।
आद्य शंकराचार्य मनुष्य की भाषा और ढंग से करते हैं परिभाषा। वो कहते हैं परमात्मा सच्चिदानंद है। नाम रूप ये अष्टधा प्रकृति का है, माया का है। सच्चिदानंद परमात्मा की अभिव्यक्ति जिस नाम रूप धारी में हो सके। सच्चिदानंद परमात्मा की अभिव्यक्ति, जिस व्यक्ति में हो सके, वे सब मनुष्य हैं। परमात्मा सत है, सत वस्तु तो सब है, किसी का नाश नहीं होता, लेकिन चेतनता नहीं, जड़ वस्तुओं में। पशु, पक्षी आदियों में चेतनता तो दिखती है, लेकिन सात्त्विक आनंद नहीं दिखता। मनुष्य है, जो श्रद्धालु हो, सत्संगी हो, सत्शास्त्रों को समझने की उसके पास क्षमता हो तो उसके अंदर सत्-चित्-आनंद स्वरूप परमात्मा की अभिव्यक्ति होती है। है तो परमात्मा सर्वत्र है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति होने की संभावना जिनके पास है, वो सब मनुष्य हैं।
है तो बड़ी जाति का, बड़ा बुद्धिमान, लेकिन सच्चिदानंद परमात्मा की अभिव्यक्ति की क्षमता नहीं है, नास्तिकता है, विश्वास नहीं है, अपने जीवन को बाह्य चीजों से ही सजाने में जीवन बर्बाद करने की रुचि है, ऐसा व्यक्ति शंकराचार्य की नजरों से मनुष्य नहीं है।
श्री कृष्ण कहते हैं :
मनुष्याणां सहस्रेषु।
हजारों मनुष्यों में कोई! बहुधा तो व्यक्ति ईंट, चूना, लोहा, लक्कड़ के मकान बनाने में, फैक्ट्री बनाने में, किताबी ज्ञान, ज्ञान को, पुस्तकीय ज्ञान को खोपड़ी में भरने में अपना जीवन पूरा कर देते हैं। दो पांच बच्चों की एक पलटन घर में तैयार हो गई, बहू आ गई, ननद आ गई, देराणी आ गई, जेठानी आ गई, गहने आ गए, दो तीन सेट आ गए गहनों के, आ हा हा! संतुष्ट हो गए। लेकिन वह संतोष सतत नहीं रहेगा।
संतुष्ट सततम योगीः, यतात्मा दृढ निश्चयाः।
जो यतात्मा है, दृढ निश्चय है और भगवान में मन बुद्धि को अर्पित कर चुका है, वह सतत संतुष्ट रहता है। बाकी के लोग तो थोड़ी थोड़ी चीजों में संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन उनका संतोष सतत कभी नहीं टिक सकता है। मकान पाकर संतोष हुआ, नहीं था तो खटकता था। मकान जब तक नहीं है, तब तक तो अपना दिमाग आर्किटेक्ट हो जाता है कि ऐसा बनाऊंगा, ऐसा बनाऊंगा, ऐसा करूंगा, ऐसा करूंगा, ऐसा खिड़की रखूंगा, इतना दीवार लंबी करूंगा, ये करूंगा, वो करूंगा। जहां-जहां मकान दिखते हैं, वहां तुम्हारा मन काम करने लग जाता है कि हां मैं ऐसा मकान बनाऊंगा। बच्चे, बच्ची की शादी करानी है, मंगनी करानी है तो जहां जहां जवान लड़का जाता है, वहां वहां मन जाता है। कितना पढ़ा होगा, किसका होगा, कैसा है, क्या है, क्या है? मन घूमता है। जब काम हो गया, नहीं है तब तक जमाईराज नहीं है, तब तक मन तो न जाने क्या क्या... जैसे मकान में आर्किटेक्ट बन जाता है मन, ऐसे जमाई खोजने में भी जो चीज नहीं है, उसको खोजने में जहां-जहां नजर जाएगी, लगाएगा लेकिन जो चीज मौजूद है, फिर उसकी लापरवाही करेगा। यह मन का स्वभाव है। ऐसे ही परमात्मा सतत मौजूद है, इसलिए उसकी लापरवाही है और जो चीजें लामौजूद है, उसके लिए तुम भागे दौड़े जा रहे हो। लामौजूद है, उसको तुम मौजूद करके सदा रख नहीं सकते हो और जो सदा मौजूद है, उस परमात्मा का कभी त्याग नहीं हो सकता है। एक ईश्वर है, जिसका हम त्याग नहीं कर सकते। संसार को पूरा परिश्रम करने के बाद भी हम सदा के लिए रख नहीं सकते और ईश्वर को हम छोड़ नहीं सकते। अब जिस चीज को छोड़ नहीं सकते और जो सदा मौजूद है, तो हमारे मन की कमजोरी यह है कि जो मौजूद है, उसके तरफ उसकी नजर नहीं और जो लामौजूद है, उसकी तरफ वो भागता है। यह बड़ी में बड़ी कठिनाई है, इसीलिए परमात्मा साक्षात्कार नहीं होता। इसीलिए परमात्मा साक्षात्कार कठिन-सा हो रहा है वरना ईश्वर को पाना, आत्मा को पाना कठिन नहीं, इससे बढ़कर कोई जगत में सरल काम नहीं है। परमात्मा का दर्शन करने से बढ़कर दुनिया में और कोई सरल काम नहीं है और उसकी प्राप्ति के बाद जो कुछ मिलता है, जो वह प्राप्त हो गया तो आदमी निहाल हो जाता है। जीने का ढंग बाद में ही आता है। सचमुच में मनुष्यता तो बाद में ही चमकती है, जब उस तत्व को जानता है। उस तत्व को जाने बिना जो कुछ पाया, उसकी कोई दो कौड़ी की भी कीमत नहीं। अपने जीवन की दो कौड़ी की भी कीमत नहीं।
यदि उसको नहीं पाया तो और पाना इतना आसान है कि वशिष्ठ जी कहते हैं कि रामजी, फूल, पत्ती और टहनियां तोड़ने में परिश्रम है, लेकिन अपने परमात्मा तत्व को जानने में क्या परिश्रम? इतना सुगम है। चाय का कप बनाना कठिन है। दूध लाना पड़ेगा, चाय लानी पड़ेगी, स्टोव्ह जलाना पड़ेगा। मात्राओं को याद रखना पड़ेगा, कितनी मात्रा चाय की डालें। सीआईडी जैसा नहीं। किसी के लिए बनाया वो काढ़ा तो चलो चाय डाल देते हैं तो चम्मच भर के चाय डाल दी। श्री राम!
नहीं, मात्राएं होती हैं ना। तो चाय में चाय कितनी डालें, पानी कितना डालें? एक कप पानी हो, एक कप दूध हो, आधा चम्मच चाय का हो और आधा किलो खांड डालो तो वो तो महाराज चाय नहीं बनेगी, चाशनी बन जाएगी। तो इनमें तो थोड़ा बहुत मात्राएं चाहिए, पदार्थ चाहिए, स्टोव्ह चाहिए और थोड़ा वेट करना पड़ेगा, तब चाय बनेगी।
ऐसा नहीं है कि परमात्मा की कुछ मात्राएं चाहिए। परमात्मा बनाना है तो उसका ऐसा ऐसा मिश्रण होगा, तब परमात्मा बनेगा। कुछ देर रखेंगे किसी पर, तभी परमात्मा पैदा होगा, प्रगट होगा। जैसे चाय प्रगट हो जाती है चीजों के मिश्रण से ऐसा तो नहीं।
नानक देव ने कहा :
थाप्या न जाइ कीता न होई।
उसकी स्थापना नहीं होती और किये से बनता नहीं।
थाप्या न जाइ कीता न होई,
आपे आप निरंजन सोई।
जिन सेवा तीन पाया मान।
जिन्होंने उसका सानिध्य लिया, जिन्होंने उनकी तरफ मुंह किया, उन्होंने मान पाया।... हम ईश्वर को छोड़कर और बहुत सब कुछ करते हैं। ईश्वर हमारे बहुत नजदीक है, लेकिन हम ईश्वर को पीठ देकर अपने अभाव के तरफ दौड़ते हैं, मन की कल्पनाओं के तरफ और युगों से यह दौड़ चालू है। इतने दौड़ते, इतने दौड़ते, दौड़ते, दौड़ते, दौड़ते, दौड़ते बुढ़ापा हो जाता है। बहुत कुछ इकट्ठा किया, उसकी कोई गिनती नहीं। जो नहीं है वो खटकता है कि मूलो को न आयो। श्री राम!
मेरा जो पौत्र था ना मूला, वो मूला नहीं दिखता है, लेकिन टेऊंटोपन बसर ये बैठे हैं, पौत्र के बाप बैठे हैं, पौत्र के भाई बैठे हैं, लेकिन उसका मुंह देखने की इच्छा है।
मूला का मुंह देखा तो बोला, "मूला की पत्नी मिसेस मूला कहाँ है?"
और मिसेस मूला आई तो बेटा तेरी गोद नहीं भरी। मेरे को बड़ा दुख है।
जो नहीं है, उस पर रो रहा है। जो मौजूद है, उसकी कोई गिनती नहीं। ये मन का स्वभाव है, इसीलिए कठिन हो गया।
तो हजारों मनुष्य लोहा-लक्कड़, मूला-मूली, चुली-चूला उसी में अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं। कोई, कोई विरला ईश्वर के रास्ते चलता है। मंदिर में भी जाएंगे तो क्या करेंगे?
भगवान से मांगेंगे, "भगवान, तुम्ही माता हो, तुम्ही पिता हो, तुम ही बंधु हो, तुम ही सखा हो। देवों के देव, मैं कुछ नहीं, हे नाथों के नाथ! तुम मेरे सहारे, लेकिन ऐसे दया करना जरा आज उगराणी पट जाए।
बं भोले -गिरा दे सोने चांदी के गोले।
हमें तो अपने लिए कुछ नहीं चाहिए, लेकिन मेरा जो छोकरा है ना, कहना नहीं करता, वो मेरे कहने में चले और उसकी जिंदगी सुधर जाए। भगवान और कुछ नहीं मांगते।"
तो हमने भगवान के लिए मंदिर के दर्शन नहीं किए, भगवान के लिए संतों के पास नहीं गए। गए किसके लिए? कि जो नहीं है, उसके लिए गए और जो नहीं है वो नहीं हो जाएगा। जो चीज तुम्हारे पास अभी नहीं है, जो चीज अभी नहीं है, पहले नहीं थी, अभी नहीं है, वो आएगी तो भी बाद में रहेगी नहीं। श्री राम!
परमात्मा पहले था, अभी है और बाद में भी रहेगा। देह पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा तो अभी भी नहीं के तरफ जा रहा है। सुबह सात बजे जो ये देह का आयुष्य था, वो अभी नहीं है। सुबह सात बजे इस देह में जो माल-मसाला था, अभी वो नहीं है, बदल गया। अभी आते समय, स्टेज पर आते समय जो शरीर में था, उसमें से कितने ही कण बदल गए। तो ये सब नहीं की तरफ जा रहा है। जो नहीं के तरफ जा रहा है, उसी की मौजूदगी और उसी की सुविधाओं के लिए इसको जो नहीं है, उसको प्राप्त करना चाहता है। देह की मान्यता के अनुसार जो हमारे पास नहीं है, उसके लिए फिर मन भाग रहा है। इसीलिए भगवत् प्राप्ति कठिन है, वरना भगवान को पाना कठिन? अरे राम!
मछली के लिए शायद हो सकता है कि सागर से रत्तीभर कहीं बाहर चली जा सके, लेकिन हम परमात्मा से एक इंच के लिए, एक क्षण के लिए, एक इंच परमात्मा से हम दूर नहीं हो सकते। इतना परमात्मा भरपूर है, हमारे ओतप्रोत। फिर भी हमारा मन जो है ना अभाव के तरफ भाग रहा है तो मौजूद का कोई पता नहीं और लामौजूद की मजूरी कर-कर के जीवन बीत गए।
कबीर ने कितना सुंदर कहा :
भटक मुआ भेदु बिना पावे कौन उपाय
खोजत खोजत जुग गए, पाँव कोस घर आय
इस भेद को जानने वालों के सिवाय, महापुरुषों के संकेत के सिवाय हम सुख के लिए युगों से भटकते हैं और सुख उसमें मानते, जो नहीं है, वो चीज आ जाए तो सुख। सही बात तो यह है कि संयोगजन्य जो सुख है, वो सुख नहीं है, वो हर्ष है। रुपए का और हमारा संयोग, मिठाई का और जीभ का संयोग, आंख का और फिल्म का संयोग, कान का और गीतों का संयोग, शरीर-शरीर का संयोग, ये संयोगजन्य जो भी सुख हैं, वे वास्तविक में हमको भ्रमित करने वाले हैं और संयोगजन्य सुख इस देह को मिलते हैं और यह देह है अष्टधा प्रकृति की। आगे के श्लोक में कहते हैं:
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7.4।।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ये पांच भूत, मान, बुद्धि और अहंकार, ये तीन सूक्ष्म भूत अथवा तो स्थूल, सूक्ष्म, कारण, ये तीनों से मैं परे हूं। मैं परे का मतलब है भगवान का जो वास्तविक स्वरूप है, वो इनसे पर है, किंतु उस वास्तविक स्वरूप को हम नहीं जान पाते। उस वास्तविक स्वरूप के लिए हमारे अंदर तड़प नहीं, इसलिए नहीं जान पाते और जब तक उस वास्तविक स्वरूप को नहीं जाना, तब तक दुनिया का सब कुछ जान लें, फिर भी हम भिखारी रहेंगे। इसको, वास्तविक तत्व को नहीं जाना, तो दुनिया का सब कुछ जान लें, फिर भी हम अज्ञानी रहेंगे। इस आत्मदेव से न मिले तो दुनिया के सब मित्रों से मिले, फिर भी हमारा मिलना बाकी रह जाएगा ।
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