शनिवार, 21 मार्च 2026

संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था



 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

सत्संग के मुख्य अंश :

  • राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है ।
  • करने, जानने और मानने की शक्ति जन्मजात सबके पास है उसका सदुपयोग कैसे करें ?
  • कूटस्थ कौन है उसे कैसे पहचानें ? 
  • भगवान जीव का हाथ कब पकड़ लेते हैं ?
  • भक्ति में सफलता देने के लिए कलियुग इस प्रकार सहायरूप है ।
  • ज्ञान और वैराग्य पुष्ट होने पर कैसे भक्ति चमचम चमकती है ।
  • भगवान की शरण कैसे जाना चाहिए ?
  • भगवान के भेद को संतशरण जाकर इस प्रकार प्राप्त करें ।

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 00:03 (भजन) ओम नमो भगवते वासुदेवा

00:11 (संवाद) हाय क्या हाल चाल है मौज

00:21 (प्रसंग) हर हाल में प्रसन्न रहने वाले ही सच्चे मर्द हैं, परिस्थितियों की शिकायत करने वाला जीवन का रस नहीं ले सकता
00:28 (प्रसंग) हर हाल में प्रसन्न रहना बहादुरों का काम है

00:36 (भजन) कभी चना चबीना, कभी खीरा, फकीर हर स्थिति में मौज में रहता है
00:45 (भजन) कभी अच्छे दिन, कभी कठिन दिन, फिर भी फकीर मौज में रहता है
00:52 (भजन) मंगकर खाकर भी सियाराम का स्मरण करते हुए अमीरों जैसी चाल चलता है

00:59 (प्रसंग) फकीर वह नहीं जो लाचार और मोहताज है, फकीर वह है जिसने चिंता और संशय छोड़ दिए
01:07 (प्रसंग) जिसने भगवान में संदेह समाप्त कर दिया वही सच्चा फकीर है
01:14 (प्रसंग) संशय सबका शत्रु है, जो संशय को त्याग दे वही फकीर है

01:21 (दृष्टांत) हद और बेहद के पार जो स्थिति है उसमें संत और पीर स्थित होते हैं
01:30 (प्रसंग) हद बेहद के मैदान में विश्राम करने वाला सच्चा दास है

01:34 (भजन) संगीत

01:40 (प्रसंग) परमात्मा में विश्रांति ही सच्ची निश्चिंता है
01:48 (प्रसंग) भगवत विश्रांति से सभी शक्तियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं
01:57 (प्रसंग) भटकने की आवश्यकता नहीं, राम में विश्रांति पाने की कला सीखनी चाहिए

02:03 (प्रसंग) विश्रांति ही भगवत शांति, सुख और आनंद का स्वरूप है
02:10 (प्रसंग) नि:संकल्प अवस्था कुछ मिनट भी आ जाए तो सिद्धि प्राप्त होती है
02:16 (प्रसंग) ऐसी विश्रांति साधना का उच्चतम फल है

02:24 (प्रसंग) प्रातःकाल उठकर शांत बैठने से विश्रांति में सहायता मिलती है
02:31 (प्रसंग) आसन और प्राणायाम के बीच का समय विश्रांति के लिए उपयोगी है
02:39 (प्रसंग) सत्संग सुनते हुए अहोभाव में शांत होना विश्रांति को बढ़ाता है
02:48 (प्रसंग) सभी भजनों का फल चित्त की परमात्मा में विश्रांति है

03:32 (प्रसंग) नाम जप के बाद का अंतराल विश्रांति के लिए होता है
03:42 (दृष्टांत) तरंगों के बीच का अंतर समुद्र की स्थिति को दर्शाता है
03:49 (भजन) संगीत
03:51 (प्रसंग) चित्त में संकल्प-विकल्प चलते रहते हैं

03:59 (प्रसंग) सात्विक आहार और सत्कर्म चित्त को स्थिर करते हैं
04:06 (प्रसंग) भगवत अर्पण बुद्धि से किए कर्म चित्त को निर्मल बनाते हैं
04:15 (प्रसंग) मंत्र जप में दो उच्चारणों के बीच का अंतर विश्रांति देता है
04:23 (प्रसंग) यह अंतर संकल्प-विकल्प से मुक्त अवस्था है

04:32 (प्रसंग) विश्रांति का अर्थ आलस्य या निद्रा नहीं है
04:40 (प्रसंग) इस विश्रांति से सभी दुखों का अंत होता है
04:48 (प्रसंग) वासनाओं और कर्म बंधनों से मुक्ति मिलती है

04:56 (प्रसंग) दृष्टि को स्थिर रखने से विश्रांति मिलती है
05:02 (प्रसंग) भगवान के विग्रह या प्रेम में चित्त स्थिर करने से शांति मिलती है
05:12 (प्रसंग) चित्त की विश्रांति प्रसाद की जननी है

05:21 (प्रसंग) दुखी चित्त बाहर सुख खोजता है
05:30 (प्रसंग) भोगों से स्थायी सुख नहीं मिलता
05:39 (प्रसंग) परम लाभ वही है जिसके बाद और कुछ पाने की इच्छा न रहे

05:57 (प्रसंग) जिसमें स्थित होकर बड़े दुख का भी प्रभाव नहीं पड़ता वही परम लाभ है
06:05 (प्रसंग) श्वास की गति में आत्मा की उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है

06:10 (प्रसंग) श्वास लेने पर ठंडक और छोड़ने पर गर्मी अनुभव होती है
06:19 (प्रसंग) श्वास के बीच की अवस्था आत्मा परमात्मा की उपस्थिति है

06:25 (प्रसंग) भगवान श्रीकृष्ण सभी के हृदय में स्थित हैं
06:31 (प्रसंग) उन्हें केवल अर्जुन तक सीमित समझना भूल है

06:37 (प्रसंग) ईश्वर सबके हृदय में स्थित होकर सबको आकर्षित करते हैं
06:46 (प्रसंग) उनकी सत्ता में विश्रांति पाने से चित्त शुद्ध होता है

06:56 (प्रसंग) पाप संस्कारों से मुक्ति मिलती है
07:03 (प्रसंग) जीवन सफल हो जाता है

07:12 (प्रसंग) मनुष्य जन्म की सफलता का मापदंड तीन शक्तियों का उपयोग है
07:17 (प्रसंग) करने, जानने और मानने की शक्ति जन्मजात होती है

07:23 (प्रसंग) बचपन से ही मनुष्य में जिज्ञासा और क्रिया की प्रवृत्ति होती है
07:31 (प्रसंग) वृद्धावस्था में भी जानने की इच्छा बनी रहती है

07:40 (प्रसंग) यदि करने योग्य कर्म कर लिए तो मृत्यु का भय नहीं रहता
07:47 (दृष्टांत) जैसे विद्यार्थी पढ़ाई पूरी कर ले तो प्रश्न से नहीं डरता

07:57 (प्रसंग) मृत्यु का भय समाप्त होने पर आनंद आता है

08:05 (प्रसंग) कबीर जी ने मृत्यु को आनंद का अवसर बताया है
08:14 (प्रसंग) मृत्यु से पूर्ण परम आनंद की प्राप्ति होती है

08:23 (प्रसंग) शरीर की उपाधि समाप्त होने पर आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है
08:31 (दृष्टांत) जैसे तरंग शांत होकर सागर बन जाती है

08:40 (प्रसंग) आत्मज्ञान से जन्म-मृत्यु का भ्रम समाप्त होता है
08:47 (प्रसंग) जन्म-मृत्यु आत्मा का धर्म नहीं है

08:57 (प्रसंग) पाप और पुण्य वृत्तियों से उत्पन्न होते हैं
09:03 (प्रसंग) वृत्तियाँ आती-जाती रहती हैं

09:11 (प्रसंग) आत्मा इन सबके पार स्थिर रहती है
09:18 (प्रसंग) आत्मा का स्वभाव आनंद और आकर्षण है

09:30 (प्रसंग) करने की शक्ति का सही उपयोग मृत्यु भय को मिटाता है
09:37 (प्रसंग) जानने की शक्ति आत्मज्ञान देती है

09:46 (प्रसंग) मानने की शक्ति से आत्मा को अपना स्वरूप मानने पर राग-द्वेष समाप्त होता है

09:56 (प्रसंग) संसार मन की कल्पना मात्र है

10:04 (भजन) संगीत

10:10 (प्रसंग) आत्मा कूटस्थ है, जैसे सोने में गहने बदलते रहते हैं
10:18 (दृष्टांत) वृत्तियाँ बदलती रहती हैं पर आत्मा स्थिर रहती है

10:25 (प्रसंग) साधक आरती में आंतरिक ज्योति को जागृत करने की प्रार्थना करता है

10:53 (प्रसंग) भगवान आत्मा को सभी ज्योतियों की ज्योति बताते हैं
11:00 (प्रसंग) सूर्य, चंद्र, अग्नि आदि सभी बाहरी ज्योतियाँ हैं

11:08 (प्रसंग) इंद्रियों की ज्योति से संसार का अनुभव होता है
11:15 (प्रसंग) मन की ज्योति इंद्रियों को संचालित करती है

11:22 (प्रसंग) बुद्धि की ज्योति मन को देखती है
11:30 (प्रसंग) जीव ज्योति बुद्धि को अनुभव करती है

11:38 (प्रसंग) आत्म ज्योति सबको प्रकाशित करती है

11:46 (प्रसंग) जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं को आत्मा जानती है
11:54 (प्रसंग) आत्मा कभी नहीं बदलती

12:02 (प्रसंग) आत्मा को पहचानने से तीनों शक्तियों का सदुपयोग होता है
12:10 (प्रसंग) भगवत भक्ति इसमें बड़ी सहायक है

12:18 (प्रसंग) आत्म स्वभाव कूटस्थ है, जैसे सोने में गहने बनते बिगड़ते रहते हैं
12:25 (दृष्टांत) वृत्तियाँ बदलती रहती हैं पर आत्मा ज्यों की त्यों रहती है

12:44 (भजन) सतगुरु अंतर का अंधकार मिटाओ
12:53 (भजन) सोहम नाद सुनाओ

13:00 (प्रसंग) भगवान कहते हैं मैं सभी ज्योतियों की ज्योति हूँ
13:08 (प्रसंग) सूर्य, चंद्र, अग्नि आदि बाहरी ज्योतियाँ हैं
13:15 (प्रसंग) इनको देखने के लिए नेत्र ज्योति की आवश्यकता होती है

13:22 (प्रसंग) सुनने, स्वाद, गंध और स्पर्श के लिए अलग-अलग इंद्रिय ज्योतियाँ होती हैं
13:30 (प्रसंग) इन सभी को मन की ज्योति संचालित करती है

13:38 (प्रसंग) मन सो जाए तो इंद्रियाँ होते हुए भी अनुभव नहीं होता
13:46 (प्रसंग) गहरी नींद में सुख-दुख का अनुभव नहीं होता

13:54 (प्रसंग) मन को देखने वाली बुद्धि ज्योति है
14:01 (प्रसंग) बुद्धि को जानने वाली जीव ज्योति है
14:09 (प्रसंग) जीव को प्रकाशित करने वाली आत्म ज्योति है

14:16 (प्रसंग) आत्म ज्योति ही परम ज्योति है
14:23 (प्रसंग) वह अज्ञान से परे है

14:29 (प्रसंग) आत्मा जानने और न जानने दोनों को जानती है
14:39 (प्रसंग) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति बदलते हैं, आत्मा नहीं बदलती

14:47 (प्रसंग) आत्म देव सदा एक समान रहता है
14:55 (प्रसंग) आत्मा को पहचानने से जीवन सफल होता है

15:03 (प्रसंग) करने, जानने, मानने की शक्तियों का सदुपयोग होता है
15:10 (प्रसंग) भगवत भक्ति इसमें अत्यंत सहायक है

15:38 (प्रसंग) इन तीनों शक्तियों के सही उपयोग से साधक आत्मा में स्थिर होकर परम शांति प्राप्त करता है

15:48 (प्रसंग) योग, कर्म और तप सब कर्ता को ही करना पड़ता है और इनमें जीव के बल की प्रधानता होती है
15:56 (प्रसंग) सभी प्रवृत्तियों में कर्ता का अहं और प्रयास मुख्य रहता है

16:04 (प्रसंग) लेकिन जब भक्त भगवान के लिए, उनकी प्रसन्नता हेतु कर्म करता है तो उसमें अहं नहीं रहता
16:14 (प्रसंग) उसमें भक्त की नहीं, भगवत कृपा की प्रधानता होती है

16:21 (दृष्टांत) जैसे बच्चा अपने बल से चलता है तो गिरता है, पर पिता की उंगली पकड़ ले तो संभलता है
16:28 (दृष्टांत) और जब पिता स्वयं हाथ पकड़ ले तो बच्चा तेज़ी से और सुरक्षित चलता है

16:37 (प्रसंग) इसी प्रकार निर्मम और निरंकार भाव से भक्ति करने पर मन पवित्र होता है
16:44 (प्रसंग) सत्य आचरण और संयम से जीवन शुद्ध बनता है

16:50 (प्रसंग) तब भगवान स्वयं भक्त के मन, बुद्धि और जीव को पकड़ लेते हैं
17:00 (प्रसंग) और उसे सहज ही परम पद तक पहुँचा देते हैं

17:09 (प्रसंग) परा भक्ति प्राप्त होने पर जीवन की तीनों शक्तियों का पूर्ण सदुपयोग हो जाता है
17:17 (प्रसंग) तब मृत्यु का भय, सुख की लालसा और दुख का प्रभाव समाप्त हो जाता है

17:27 (प्रसंग) ऐसा व्यक्ति मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूरा कर लेता है और मुक्त हो जाता है
17:33 (प्रसंग) उसके संपर्क में आने वाले भी मुक्ति मार्ग में आगे बढ़ते हैं

17:42 (प्रसंग) जीव ने अनगिनत जन्मों में भटककर दुख भोगे हैं

17:50 (कथा) देवर्षि नारद विशाला पुरी की ओर जा रहे थे
17:59 (संवाद) सनकादि ऋषियों ने पूछा कि आप इतनी शीघ्रता और व्याकुलता से क्यों जा रहे हैं

18:08 (प्रसंग) नारद जी ने कहा कि कलयुग ने धर्म और शांति को विकृत कर दिया है
18:16 (प्रसंग) तीर्थ स्थानों में भी अधर्म और अशुद्धता फैल गई है

18:26 (प्रसंग) उन्होंने काशी, मथुरा, द्वारका आदि अनेक स्थानों का भ्रमण किया
18:32 (प्रसंग) पर कहीं भी परमात्मा की विश्रांति का वातावरण नहीं मिला

18:39 (प्रसंग) अंततः वे वृंदावन पहुँचे

18:46 (कथा) वहाँ उन्होंने एक युवती को देखा जो अपनी सखियों से घिरी थी
18:54 (कथा) दो वृद्ध पुरुष मूर्छित पड़े थे और युवती विलाप कर रही थी

19:01 (संवाद) उस स्त्री ने नारद जी से अपनी चिंता दूर करने की प्रार्थना की

19:09 (संवाद) नारद जी ने पूछा कि यह कौन हैं
19:19 (प्रसंग) उसने कहा कि मैं भक्ति हूँ और ये मेरे पुत्र ज्ञान और वैराग्य हैं

19:26 (प्रसंग) भक्ति ने बताया कि वह द्रविड़ में उत्पन्न हुई, कर्नाटक में बढ़ी और महाराष्ट्र में सम्मानित हुई
19:34 (प्रसंग) लेकिन गुजरात में पाखंडियों ने उसे क्षीण कर दिया

19:41 (प्रसंग) वृंदावन आने से वह तो युवा हो गई पर उसके पुत्र मूर्छित हो गए

19:50 (प्रसंग) कलयुग ने ज्ञान और वैराग्य को दुर्बल कर दिया है

19:59 (प्रसंग) लोगों में धन और भोग की प्रवृत्ति बढ़ गई है

20:07 (प्रसंग) त्यागी भी भोगी बन गए और धर्म का पतन हो गया

20:16 (प्रसंग) भक्ति ने प्रश्न किया कि भगवान ने ऐसा कलयुग क्यों बनाया

20:24 (प्रसंग) उत्तर दिया गया कि जैसे माता-पिता बच्चे को गिरकर सीखने देते हैं
20:31 (प्रसंग) वैसे ही कलयुग में जीव को अपने प्रयास से उठने का अवसर मिलता है

20:38 (प्रसंग) और यदि वह न उठे तो भगवान को पुकारे

20:45 (प्रसंग) इस प्रकार कलयुग शीघ्र फल देने वाला युग है

20:51 (प्रसंग) राजा परीक्षित ने कलयुग के अनेक दोष बताए

21:01 (प्रसंग) परंतु एक महान गुण यह है कि नाम स्मरण से ही मुक्ति संभव है

21:09 (प्रसंग) जो फल तप, योग और समाधि से नहीं मिलता, वह नाम जप से मिल जाता है

21:17 (प्रसंग) श्री हरि के नाम कीर्तन से भगवत विश्रांति सहज प्राप्त होती है

21:26 (प्रसंग) भक्ति ने नारद जी से अपने दुख दूर करने की प्रार्थना की

21:33 (प्रसंग) नारद जी ने उसे आश्वासन दिया कि वह चिंता न करे

21:40 (प्रसंग) उन्होंने ज्ञान और वैराग्य को जगाने का प्रयास किया

21:47 (प्रसंग) पर वे गहरी मूर्छा में ही रहे

21:55 (प्रसंग) तब आकाशवाणी हुई कि प्रयास करने से सफलता मिलेगी

22:02 (प्रसंग) नारद जी ने विभिन्न आश्रमों में उपाय खोजे

22:10 (प्रसंग) अंततः उन्होंने बद्री आश्रम जाकर तप करने का निश्चय किया

22:18 (प्रसंग) सनकादि ऋषियों ने उन्हें भागवत कथा का उपाय बताया

22:27 (प्रसंग) भागवत श्रवण से ज्ञान और वैराग्य जागृत होते हैं

22:33 (प्रसंग) और भक्ति का दुख समाप्त होता है

22:41 (प्रसंग) यह कथा साधारण जन के लिए अत्यंत उपयोगी है

22:47 (प्रसंग) इससे कलयुग के दोष दूर होते हैं

22:56 (प्रसंग) नारद जी ने समझाया कि भक्ति को सफल करने के लिए ज्ञान और वैराग्य आवश्यक हैं

23:03 (प्रसंग) यदि ज्ञान नहीं होगा तो भक्ति अधूरी रह जाएगी

23:10 (प्रसंग) ज्ञान से ईश्वर का वास्तविक स्वरूप समझ में आता है

23:18 (प्रसंग) तभी भक्ति पूर्ण और स्थिर होती है

23:26 (प्रसंग) इस प्रकार भक्ति, ज्ञान और वैराग्य तीनों का संतुलन आवश्यक है

23:35 (प्रसंग) तभी साधक आत्मा में स्थिर होकर परम शांति प्राप्त करता है

23:30 (प्रसंग) कलयुग में अनेक दोष होते हुए भी भगवान नाम स्मरण का महान गुण है
23:34 (प्रसंग) नाम जप से शीघ्र भगवत कृपा और विश्रांति प्राप्त होती है

23:42 (प्रसंग) तप, योग और समाधि से जो फल कठिनता से मिलता है वह नाम स्मरण से सहज मिलता है
23:48 (प्रसंग) श्री हरि की कीर्तन भक्ति से जीवन धन्य हो जाता है

23:55 (प्रसंग) भक्ति ने नारद जी से अपने दुख और शोक को दूर करने की प्रार्थना की

24:04 (प्रसंग) नारद जी ने भक्ति को धैर्य दिया और उसे आश्वस्त किया

24:11 (प्रसंग) उन्होंने ज्ञान और वैराग्य को जागृत करने का प्रयास किया
24:18 (प्रसंग) वेद पाठ, गीता पाठ और शंखनाद आदि से उन्हें जगाने की कोशिश की

24:28 (प्रसंग) फिर भी ज्ञान और वैराग्य गहरी मूर्छा में ही रहे
24:36 (प्रसंग) कभी-कभी थोड़ी चेतना आती और फिर पुनः लीन हो जाते

24:42 (प्रसंग) यह देखकर नारद जी को आश्चर्य हुआ

24:52 (प्रसंग) तभी आकाशवाणी हुई कि उचित प्रयास करने से सफलता मिलेगी

25:09 (प्रसंग) नारद जी ने विचार किया कि कौन सा उपाय करें

25:16 (प्रसंग) वे अनेक आश्रमों और संतों के पास समाधान पूछने गए
25:22 (प्रसंग) कई संतों ने उत्तर टाल दिया और कुछ ने स्थान ही छोड़ दिया

25:30 (प्रसंग) तब नारद जी ने निश्चय किया कि बद्री आश्रम जाकर तप करेंगे

25:38 (प्रसंग) भगवान नारायण से ही उपाय पूछने का संकल्प लिया

25:44 (प्रसंग) उन्होंने भक्ति को वचन दिया कि चिंता न करे

25:52 (प्रसंग) ज्ञान, वैराग्य और मुक्ति उसके साथ रहेंगे

26:01 (प्रसंग) कलयुग के प्रभाव से मुक्ति कभी-कभी ही प्रकट होती है

26:10 (प्रसंग) पर भक्ति को पृथ्वी पर स्थिर रहकर कार्य करना है

26:17 (प्रसंग) भगवान की कृपा से भक्ति पर विशेष अनुग्रह है

26:26 (प्रसंग) नारद जी ने कहा कि वे भक्ति को घर-घर और हृदय-हृदय में स्थापित करेंगे

26:35 (प्रसंग) और उसके पुत्रों को पुनः जागृत करेंगे

26:43 (प्रसंग) उन्होंने पुनः प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली

26:49 (प्रसंग) ज्ञान और वैराग्य मूर्छा में ही पड़े रहे

26:56 (प्रसंग) कभी थोड़ी चेतना आती पर फिर लीन हो जाते

27:05 (प्रसंग) उन्हें देखकर ऐसा लगता मानो गहरे अज्ञान में डूबे हों

27:14 (प्रसंग) आकाशवाणी से प्रेरित होकर नारद जी पुनः प्रयास में जुटे

27:22 (प्रसंग) उन्होंने संतों, ऋषियों और मुनियों से उपाय पूछे

27:31 (प्रसंग) पर स्पष्ट समाधान नहीं मिला

27:40 (प्रसंग) तब उन्होंने बद्री आश्रम जाकर तप करने का दृढ़ निश्चय किया

27:47 (प्रसंग) वे भगवान नारायण से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहते थे

27:57 (प्रसंग) इस संकल्प के साथ वे आगे बढ़े

28:04 (प्रसंग) नारद जी ने सनकादि ऋषियों से भी इस विषय में चर्चा की

28:11 (प्रसंग) सनकादि ऋषियों ने कहा कि भागवत कथा इसका समाधान है

28:17 (प्रसंग) चतुर श्लोकी भागवत का रहस्य अत्यंत गूढ़ है

28:26 (प्रसंग) इसे समझने के लिए वैराग्य और तीव्र श्रद्धा चाहिए

28:33 (प्रसंग) साधारण जन के लिए विस्तृत भागवत श्रवण उपयुक्त है

28:43 (प्रसंग) सप्ताह श्रवण से ज्ञान और वैराग्य जागृत होते हैं

28:49 (प्रसंग) भक्ति का दुख दूर होता है

28:56 (प्रसंग) और जीवन में आध्यात्मिक जागरण होता है

29:03 (प्रसंग) नारद जी ने इस उपाय को स्वीकार किया

29:11 (प्रसंग) उन्होंने भक्ति के पुत्रों की स्थिति पर ध्यान दिलाया

29:20 (प्रसंग) ज्ञान और वैराग्य मूर्छित हैं, इसलिए भक्ति भी दुखी है

29:28 (प्रसंग) यदि ज्ञान और वैराग्य जागृत होंगे तभी भक्ति पूर्ण होगी

29:35 (प्रसंग) भक्ति को सफल बनाने के लिए ज्ञान और वैराग्य आवश्यक हैं

29:45 (प्रसंग) जैसे कोमा में पड़े व्यक्ति को जागृत करना आवश्यक होता है

29:53 (प्रसंग) वैसे ही ज्ञान और वैराग्य को जगाना आवश्यक है

30:00 (प्रसंग) यह मूर्छा कलयुग के प्रभाव के कारण है

30:09 (प्रसंग) आज लोग ज्ञान और वैराग्य को महत्व नहीं देते

30:18 (प्रसंग) केवल भक्ति का बाहरी रूप रह गया है

30:26 (प्रसंग) वृंदावन में भक्ति तो पुष्ट हुई पर ज्ञान और वैराग्य दुर्बल रहे

30:35 (प्रसंग) इससे यह समझना चाहिए कि भक्ति के साथ ज्ञान भी जरूरी है

30:43 (प्रसंग) ईश्वर का स्वरूप और तत्व समझना आवश्यक है

30:53 (प्रसंग) तभी भक्ति स्थिर और फलदायी होती है

31:00 (प्रसंग) ज्ञान से ईश्वर तत्व का अनुभव होता है

31:09 (प्रसंग) और उसी से भक्ति पूर्ण होकर साधक को परम शांति मिलती है

 31:09 (प्रसंग) संसार की वासनाओं और आसक्ति से वैराग्य होना आवश्यक है ताकि जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिले

31:15 (प्रसंग) संसार में सत बुद्धि रखने के लिए आसक्ति का त्याग जरूरी है

31:21 (प्रसंग) ज्ञान और वैराग्य पुष्ट होंगे तो भक्ति भी प्रसन्न और स्थिर होगी
31:29 (कथा) नारद जी ने कथा करवाई जिससे ज्ञान और वैराग्य की मूर्छा दूर हुई और भक्ति पुष्ट हुई

31:39 (प्रसंग) इससे सीख मिलती है कि जीवन में ज्ञान और वैराग्य की वृद्धि आवश्यक है
31:48 (प्रसंग) मन स्वभाव से रस और शांति चाहता है

31:58 (प्रसंग) यदि एक सांसारिक रस छोड़ा तो मन दूसरा ढूंढता है
32:04 (प्रसंग) मन को किसी न किसी रस की आवश्यकता रहती है

32:12 (प्रसंग) यदि सत्संग और ध्यान से आत्मिक रस मिल जाए तो बाहरी रस छूट जाते हैं
32:19 (प्रसंग) आत्मिक आनंद मिलने पर विषयों का आकर्षण समाप्त होने लगता है

32:27 (प्रसंग) “यह मिलेगा तो सुखी हो जाऊँगा” यह भ्रम समाप्त करना आवश्यक है
32:34 (प्रसंग) अपने भीतर के सुख को पहचानना ही मानने की शक्ति का सदुपयोग है

32:41 (प्रसंग) अपने को जानना ही जानने की शक्ति का सही उपयोग है
32:49 (प्रसंग) करने, मानने और जानने की शक्ति का समन्वय आवश्यक है

32:56 (प्रसंग) उस सच्चिदानंद में विश्रांति करो जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता
33:03 (प्रसंग) विश्रांति का अभ्यास ही साधना का सार है

33:12 (प्रसंग) विश्रांति के लिए सरल उपाय हैं जैसे आकाश की ओर एकटक देखना
33:20 (प्रसंग) सोहम नाद का अभ्यास भी सहायक है

33:27 (प्रसंग) ध्यान योग से भीतर का रस प्रकट होने लगता है
33:35 (प्रसंग) तब बाहरी विषयों के रस से मन स्वतः हट जाता है

33:42 (प्रसंग) भगवान शिव ने कहा कि ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं है

33:49 (प्रसंग) बाहरी तीर्थ शरीर को शुद्ध करते हैं परन्तु आज उनमें भी अशुद्धि आ गई है

33:59 (प्रसंग) तीर्थ तीन प्रकार के होते हैं – भू तीर्थ, सदाचार तीर्थ और आत्म तीर्थ

34:06 (प्रसंग) भू तीर्थ जैसे काशी, द्वारका, अयोध्या, गंगा, यमुना आदि

34:11 (प्रसंग) सदाचार तीर्थ में सत्य, दया, क्षमा और पवित्र आचरण आते हैं
34:20 (प्रसंग) सात्विक जीवन ही वास्तविक तीर्थ है

34:26 (प्रसंग) तीसरा और सर्वोच्च तीर्थ आत्म तीर्थ है
34:33 (प्रसंग) आत्म तीर्थ में स्नान करने से आंतरिक शुद्धि होती है

34:42 (प्रसंग) आत्मा में कोई कलुष प्रवेश नहीं कर सकता, वह सदा शुद्ध है

34:52 (प्रसंग) प्रातःकाल उठकर आत्म तीर्थ में स्थित होने का अभ्यास करना चाहिए

35:01 (प्रसंग) तिलक स्थान पर स्पर्श कर गुरु मंत्र का जप करना चाहिए
35:08 (प्रसंग) भगवान की शरणागति में सिर झुकाना चाहिए

35:15 (प्रसंग) प्रतिदिन कुछ समय शांत होकर समर्पण भाव से बैठना चाहिए
35:23 (प्रसंग) यह साधना अत्यंत सरल है और सभी कर सकते हैं

35:31 (प्रसंग) शरीर को ढीला रखकर शांति में बैठना ही विश्रांति का अभ्यास है
35:40 (प्रसंग) मन को चिंतन से मुक्त करके प्रभु में समर्पित करना चाहिए

35:49 (प्रसंग) “मैं प्रभु का हूँ” यह भावना ही समर्पण का सार है
35:56 (भजन) जेडो डो मातु जोया मेरी आया मंदी आया

36:04 (भजन) साईं तुम ही सब कुछ हो

36:10 (प्रसंग) हम कहते हैं “तुम ही माता पिता हो” पर उसे हृदय से जीना आवश्यक है

36:18 (प्रसंग) सच्चे समर्पण से जीवन सफल हो जाता है

36:27 (प्रसंग) संतों ने भगवान की शरण का रहस्य जानने का प्रयास किया

36:34 (प्रसंग) उन्होंने भगवान से पूछा कि सच्ची शरण क्या है

36:41 (प्रसंग) क्या बाहरी क्रियाएं ही शरण हैं या आंतरिक स्थिति

36:50 (प्रसंग) खोज करते-करते संत अंतर्मुख हो गए

36:59 (दृष्टांत) जैसे नमक की गुड़िया समुद्र में घुल जाती है

37:09 (प्रसंग) वैसे ही संत आत्मा में लीन हो जाते हैं

37:16 (प्रसंग) उन्होंने भगवान से शरण का वास्तविक स्वरूप पूछा

37:25 (प्रसंग) क्या मूर्ति पकड़ना या बाहरी साधना ही शरण है

37:33 (प्रसंग) या आंतरिक विश्रांति ही सच्ची शरण है

37:41 (प्रसंग) अंत में उत्तर मिला कि जहां संकल्प-विकल्प समाप्त हों वही शरण है

37:48 (प्रसंग) वही परम विश्रांति की अवस्था है

37:56 (प्रसंग) सुबह नींद से उठते समय यह शांति सहज मिलती है

38:04 (प्रसंग) उसी समय विश्रांति का अभ्यास करना चाहिए

38:12 (प्रसंग) दिनभर के कार्यों से अधिक लाभ इस साधना से मिलता है

38:21 (प्रसंग) इससे भगवत प्राप्ति संभव है

38:28 (प्रसंग) यह साधना सभी के लिए सरल और सुलभ है

38:36 (प्रसंग) विश्रांति से सभी समस्याओं का समाधान संभव है

38:44 (प्रसंग) इसे भगवान ने “प्रसाद” कहा है

38:53 (प्रसंग) प्रसाद से सभी दुखों का नाश होता है

39:01 (प्रसंग) आलस्य और निद्रा से बचने के लिए आसन और प्राणायाम करना चाहिए
39:10 (प्रसंग) फिर विश्रांति का अभ्यास करना चाहिए

39:18 (प्रसंग) नियमित अभ्यास से भीतर का रस प्रकट होने लगता है
39:26 (प्रसंग) तब बाहरी विषयों का आकर्षण समाप्त हो जाता है

39:36 (प्रसंग) संसार में भटकने से थकान ही मिलती है

39:43 (प्रसंग) परमात्मा की विश्रांति में ही सच्चा सुख है

39:51 (दृष्टांत) कबीर जी ने कहा कि बिना रहस्य जाने भटकते रहोगे

39:59 (प्रसंग) महापुरुषों की कृपा से ही यह ज्ञान मिलता है

40:07 (प्रसंग) मनुष्य सुख के लिए भटकता रहता है

40:17 (प्रसंग) विवाह आदि में भी प्रारंभ में सुख का भ्रम होता है

40:25 (प्रसंग) बाद में वास्तविकता का अनुभव होता है

40:32 (प्रसंग) प्रारंभिक आकर्षण एक प्रकार का मोह है

40:40 (प्रसंग) यह मन का भ्रम है

40:48 (प्रसंग) संसार में सुख का बाहरी आडंबर है

40:55 (प्रसंग) भीतर दुख छिपा होता है

41:01 (प्रसंग) लोग एक-दूसरे को सुखी समझते हैं

41:09 (प्रसंग) परंतु सभी किसी न किसी रूप में दुखी हैं

41:17 (प्रसंग) विवाह और संसार में भी स्थायी सुख नहीं मिलता

41:25 (प्रसंग) अनुभव के बाद यह सत्य स्पष्ट होता है

41:31 (प्रसंग) संसार का सुख क्षणिक और भ्रममय है

41:41 (प्रसंग) लोग एक-दूसरे को भ्रम में रखते हैं

41:49 (प्रसंग) जीवन की वास्तविकता समझने पर वैराग्य उत्पन्न होता है

41:57 (प्रसंग) संसार में मोह और आकर्षण का जाल है

42:05 (दृष्टांत) जैसे गुलाम नबी का उदाहरण – पहले उत्साह, बाद में संघर्ष

42:12 (प्रसंग) प्रारंभिक आकर्षण बाद में बोझ बन जाता है

42:20 (प्रसंग) जीवन की जिम्मेदारियाँ बढ़ती जाती हैं

42:30 (प्रसंग) पहले का आनंद धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है

42:39 (प्रसंग) वास्तविकता में जीवन संघर्षमय प्रतीत होता है

42:49 (प्रसंग) इससे स्पष्ट होता है कि संसार स्थायी सुख नहीं दे सकता

42:59 (प्रसंग) संयम और समझदारी से ही जीवन सफल हो सकता है

43:07 (प्रसंग) अन्यथा व्यक्ति दुखों में उलझ जाता है

43:14 (प्रसंग) संसार में सुख का आभास है पर वास्तविकता भिन्न है

43:20 (प्रसंग) विवेक से ही सच्चाई समझ में आती है

43:26 (प्रसंग) मनुष्य को सत्य का चिंतन करना चाहिए

43:35 (प्रसंग) तभी जीवन का सही मार्ग मिलता है

43:43 (प्रसंग) अन्यथा मोह और भ्रम में जीवन व्यर्थ जाता है

43:52 (प्रसंग) विवाह का उद्देश्य सहयोग और संतुलन होना चाहिए

43:59 (प्रसंग) अन्यथा जीवन कठिन हो जाता है

44:07 (प्रसंग) संसार का सुख क्षणिक है

44:15 (प्रसंग) विवेक से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है

44:23 (प्रसंग) विचार करने से सच्चाई सामने आती है

44:31 (प्रसंग) संसार धोखे का जाल है

44:40 (प्रसंग) बाहर सुख दिखाई देता है पर भीतर दुख होता है

44:48 (प्रसंग) हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में दुखी है

44:55 (प्रसंग) नानक जी ने कहा – राजा, प्रजा सब दुखी हैं

45:06 (प्रसंग) कबीर जी ने कहा – जो दूसरों को सुख देने का प्रयास करता है वही सच्चा है

45:13 (प्रसंग) संसार में कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है

45:22 (प्रसंग) इसलिए आत्मा को परमात्मा में मिलाना चाहिए

45:32 (प्रसंग) पूर्ण प्रभु की प्राप्ति से ही पूर्णता आती है

45:40 (प्रसंग) जीव परमात्मा का अंश है

45:49 (प्रसंग) बाहरी उपलब्धियों से स्थायी सुख नहीं मिलता

 

 


बुधवार, 18 मार्च 2026

ब्रह्मज्ञान - आश्रम संध्या सत्संग - 14-03-2026 सुबह

 ब्रह्मज्ञान - आश्रम संध्या सत्संग - 14-03-2026 सुबह

Time stamp index 

0:03 (सम्वाद) कृष्ण, राम, ईसा, कबीर के दर्शन से भी यात्रा अधूरी, परमेश्वर का साक्षात्कार आवश्यक
0:11 (सम्वाद) परमेश्वर का तीन मिनट का साक्षात्कार अद्वैत अनुभव देता है
0:17 (सम्वाद) आत्मा और परमात्मा का भेद समाप्त होने की स्थिति

0:28 (दृष्टांत) तीन मिनट के शुद्ध ज्ञान का महत्व
0:36 (दृष्टांत) गुलाब के ज्ञान का उदाहरण — ज्ञान स्थायी रहता है
0:45 (दृष्टांत) विस्मृति हो सकती है, पर ज्ञान नष्ट नहीं होता
0:53 (सम्वाद) परमात्मा का ज्ञान एक बार हो जाए तो अज्ञान नहीं रहता

1:00 (सम्वाद) स्मृति होने पर दुख मिटता है
1:07 (सम्वाद) सुख अनुभव के बाद मन स्वतः परमात्मा में जाता है
1:17 (दृष्टांत) दुख से बचने हेतु मन का परमात्मा की ओर जाना
1:26 (दृष्टांत) जंगल की आग में प्राणी का जल की ओर जाना
1:35 (दृष्टांत) अभ्यास से परमात्मा में मन की स्थिरता

1:43 (सम्वाद) ज्ञानी सदा आनंद में, अज्ञानी दुख में
1:52 (सम्वाद) अधिक पाने की इच्छा से दुख बढ़ता है
1:59 (सम्वाद) जो मिला है वह अवश्य छूटेगा

2:09 (दृष्टांत) सब वस्तुएं समयानुसार नष्ट होती हैं
2:14 (सम्वाद) राजा, रंक, संत सबको सब छोड़ना पड़ता है
2:21 (सम्वाद) सर्वस्व छोड़ने का नियम सार्वभौमिक
2:28 (सम्वाद) सर्वस्व के स्वामी परमात्मा को जानना आवश्यक

2:37 (सम्वाद) भूमा (व्यापक ब्रह्म) में ही पूर्ण सुख
2:47 (सम्वाद) सीमित वस्तुओं में सुख नहीं
2:55 (सम्वाद) इंद्रिय सुख अल्पकालिक
3:02 (सम्वाद) व्यापक ब्रह्म में ही पूर्ण आनंद

3:11 (सम्वाद) इंद्रिय और मन के सुख अस्थायी
3:21 (सम्वाद) प्रशंसा और निंदा दोनों स्वप्न समान
3:29 (दृष्टांत) इंद्रिय, शरीर, जगत सब स्वप्न समान
3:38 (सम्वाद) सबका आधार चैतन्य परमात्मा

3:44 (सम्वाद) सकाम तप, यज्ञ, व्रत करने वालों की संगति से बचना
3:53 (दृष्टांत) यज्ञ का खंभा — दिखने में बड़ा पर छाया नहीं देता
4:03 (सम्वाद) स्वार्थी साधना से आत्मशांति नहीं मिलती
4:12 (सम्वाद) केवल परमात्मा की चाह रखने वालों की संगति श्रेष्ठ
4:21 (सम्वाद) फल देने वाली संगति ही उपयोगी

4:28 (दृष्टांत) दिखावटी साधना व्यर्थ
4:35 (सम्वाद) आत्मसुख न देने वाली संगति त्याज्य
4:44 (सम्वाद) सकाम यज्ञ करने वालों की संगति निष्फल
4:52 (सम्वाद) आत्मशांति का अभाव होने पर साधना व्यर्थ

5:04 (सम्वाद) हजारों यज्ञ भी आत्मज्ञान के बराबर नहीं
5:11 (सम्वाद) यज्ञों की तुलना में ज्ञान श्रेष्ठ
5:19 (सम्वाद) सत्संग का महत्व अत्यधिक
5:26 (सम्वाद) ज्ञान कथा का पुण्य सर्वोच्च

5:33 (सम्वाद) यज्ञ से सीमित सुख, सत्संग से गहरा आनंद
5:42 (सम्वाद) सत्संग आत्मशुद्धि करता है
5:49 (सम्वाद) संत संग से हृदय उज्जवल होता है

5:59 (दृष्टांत) यज्ञ का धुआँ बनाम सत्संग का प्रकाश
6:04 (सम्वाद) सत्संग से हरि रस प्राप्त होता है
6:13 (सम्वाद) संतों के पास बैठने का लाभ

6:22 (सम्वाद) राजाओं का भी गुरु द्वार पर जाना
6:30 (सम्वाद) गुरु कृपा से ज्ञान प्राप्ति
6:38 (सम्वाद) सत्संग में आने का कारण लाभ और ज्ञान

6:49 (सम्वाद) संसार स्वप्न समान
6:56 (सम्वाद) धन, व्यक्ति, घटनाएं सब स्वप्न
7:04 (सम्वाद) समय के साथ सब स्मृति बन जाता है

7:15 (दृष्टांत) घटनाएं बाद में स्वप्न जैसी लगती हैं
7:22 (सम्वाद) जन्माष्टमी आदि उत्सव भी स्वप्न समान
7:31 (सम्वाद) संपूर्ण संसार स्वप्न स्वरूप

8:05 (सम्वाद) संसार में आसक्ति व्यर्थ
8:11 (सम्वाद) सबको सब छोड़ना है
8:20 (सम्वाद) अज्ञानता से दुख उत्पन्न

8:28 (सम्वाद) लोग एक-दूसरे को ठग कर सुखी होना चाहते हैं
8:34 (सम्वाद) असली सुख का विस्मरण
8:44 (भजन) नारायण हरे नारायण हरे
8:52 (भजन) तीन लोक चौदा भुवन में भ्रमण

9:02 (सम्वाद) संत संग में ही सुख
9:09 (सम्वाद) सादगी और संतों का महत्व
9:16 (सम्वाद) संतों के हृदय में सुख

9:24 (दृष्टांत) संगीत सीखने के लिए गुरु आवश्यक
9:32 (दृष्टांत) कला बिना गुरु के नहीं सीखी जा सकती
9:39 (सम्वाद) गुरु के बिना आत्मज्ञान कठिन

9:47 (सम्वाद) अनुभव से ही ज्ञान प्राप्त होता है
9:56 (सम्वाद) गुरु ज्ञान को अनुभव बनाना चाहिए

10:03 (सम्वाद) संत संग से निर्भय सुख
10:12 (सम्वाद) बाहरी सुखों से श्रेष्ठ संत संग
10:22 (दृष्टांत) भौतिक सुखों की सीमितता

10:32 (सम्वाद) संत संग से हृदय शुद्धि
10:38 (सम्वाद) आत्मसुख प्रकट होता है
10:46 (सम्वाद) बाहरी सुख स्वतः प्राप्त होते हैं

10:56 (दृष्टांत) सुख ज्ञानी के पीछे चलता है
11:04 (सम्वाद) अज्ञानी सुख के पीछे भागता है
11:10 (सम्वाद) इच्छा ही दुख का कारण

11:20 (सम्वाद) इच्छा निवृत्ति से मुक्ति
11:28 (दृष्टांत) इच्छा समाप्त होने पर संसार पार
11:35 (सम्वाद) वासना रहते दुख

11:42 (सम्वाद) नो डिजायर नो प्रॉब्लम सिद्धांत
11:50 (सम्वाद) अधिक इच्छा अधिक समस्या

12:06 (सम्वाद) इच्छा मुक्त व्यक्ति ईश्वर तुल्य
12:13 (सम्वाद) आत्मसुख प्राप्त व्यक्ति भोग नहीं चाहता
12:22 (दृष्टांत) जाल से मुक्त पक्षी पुनः नहीं फंसता

12:31 (सम्वाद) तृष्णा समाप्ति से शांति
12:41 (सम्वाद) संतोष से ईश्वरत्व
12:49 (सम्वाद) असंतोषी धनी भी गरीब

12:57 (सम्वाद) संतोषी निर्धन भी ईश्वर
13:04 (सम्वाद) आत्मसंतोष का महत्व

13:13 (सम्वाद) हर व्यक्ति में ईश्वर
13:23 (सम्वाद) संतोष अमृत समान
13:30 (सम्वाद) संतोष सर्वोत्तम रसायन

13:37 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी की विशेषताएं
13:46 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी की महिमा अवर्णनीय

14:05 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी अद्वैत भाव में स्थित
14:15 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी को शरीर मानना अपराध

14:24 (सम्वाद) मूर्ति, प्रसाद, तुलसी, गाय का आदर
14:30 (सम्वाद) ज्ञानवान को परमात्मा रूप मानना

14:37 (सम्वाद) ज्ञानवान को पहचानने का महत्व
14:46 (सम्वाद) गलत दृष्टि से बंधन

15:03 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी का वास्तविक स्वरूप
15:10 (सम्वाद) योग वशिष्ठ का संदर्भ
15:15 (सम्वाद) मनुष्य जन्म का उद्देश्य आत्मज्ञान

15:25 (सम्वाद) साधु संग का महत्व
15:33 (सम्वाद) मूर्ख संग से बचना

15:40 (सम्वाद) श्रद्धाहीन व्यक्ति अधिकारी नहीं
15:49 (सम्वाद) संत वचन के अधिकारी भाग्यशाली

16:01 (सम्वाद) जप, तप, संयम की आवश्यकता
16:09 (सम्वाद) आत्मज्ञान के गुण

16:17 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी निर्लेप
16:26 (भजन) ब्रह्मज्ञानी दी महिमा

16:30 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी को परमेश्वर स्वरूप
16:37 (सम्वाद) दुर्लभ पहचान

16:43 (सम्वाद) जन्म-मरण के दुख
16:53 (सम्वाद) अज्ञानता से कष्ट

17:01 (सम्वाद) आत्मज्ञान से मुक्ति
17:07 (सम्वाद) सुमिरन और चिंतन का महत्व

17:18 (सम्वाद) सत्संग के लिए कष्ट भी स्वीकार्य
17:26 (सम्वाद) ऐश्वर्य त्यागकर ज्ञान प्राप्ति

17:37 (सम्वाद) प्रमाद सबसे बड़ा शत्रु
17:44 (सम्वाद) आत्मज्ञान का अभाव दुख का कारण

17:53 (दृष्टांत) मेंढक का उदाहरण — संसार में फंसा व्यक्ति
18:01 (सम्वाद) अभ्यास की आवश्यकता

18:09 (दृष्टांत) पेट्रोल से आग बुझाने का उदाहरण
18:17 (सम्वाद) भोग से दुख नहीं मिटता
18:26 (सम्वाद) आसक्ति बढ़ती है

18:32 (सम्वाद) संसार का अंत दुख में
18:40 (सम्वाद) मृत्यु के बाद सब समाप्त

18:46 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञान के बिना जीवन व्यर्थ
18:56 (सम्वाद) संसार में अज्ञान का प्रभाव

19:03 (सम्वाद) अच्छे कर्म से आसक्ति घटे
19:12 (सम्वाद) आसक्ति बढ़े तो कर्म गलत

19:18 (सम्वाद) सामान्य, श्रेष्ठ, उत्तम व्यक्ति का भेद
19:27 (सम्वाद) सुख-दुख को स्वप्न मानना श्रेष्ठ

19:36 (सम्वाद) आत्मचिंतन का महत्व
19:44 (सम्वाद) “मैं कौन हूँ” का विचार

19:52 (सम्वाद) दुख और क्रोध से ऊपर उठना
20:00 (सम्वाद) विचार शक्ति का महत्व

20:09 (सम्वाद) विचार परम मित्र
20:18 (सम्वाद) श्रद्धा और ज्ञान का संतुलन

20:25 (सम्वाद) निर्णय शक्ति आवश्यक
20:32 (सम्वाद) विचार से सफलता

20:41 (सम्वाद) संशय से असफलता
20:47 (सम्वाद) दृढ़ निश्चय से सफलता

20:56 (दृष्टांत) नेपोलियन उदाहरण — दृढ़ विचार
21:04 (सम्वाद) विचारवान व्यक्ति सक्षम

21:12 (सम्वाद) इतिहास में विचारवानों की महिमा
21:19 (सम्वाद) महान संतों का उदाहरण

21:27 (सम्वाद) विचार की शक्ति से महानता
21:34 (सम्वाद) आत्मज्ञान का विचार श्रेष्ठ

21:42 (सम्वाद) भोग से विरक्ति आवश्यक
21:50 (सम्वाद) परमात्मा प्राप्ति का दृढ़ विचार

22:00 (सम्वाद) भोग स्वयं पीछे आते हैं
22:09 (सम्वाद) विचार से कार्य सिद्ध

22:18 (सम्वाद) बिना विचार के कर्म दुखद
22:27 (सम्वाद) दान भी विचारपूर्वक

22:36 (सम्वाद) विचार ही धर्म
22:44 (सम्वाद) जीवन के हर क्षेत्र में विचार आवश्यक

22:00 (सम्वाद) भोग अपने आप ज्ञानी के पीछे चलते हैं, उन्हें पाने की दौड़ आवश्यक नहीं
22:09 (सम्वाद) दृढ़ विचार और आत्मनिष्ठा से सभी कार्य सिद्ध होते हैं

22:18 (सम्वाद) बिना विचार के किया गया हर कर्म अंत में दुखद होता है
22:27 (सम्वाद) दान, सेवा, निर्णय — सब विचारपूर्वक ही करने चाहिए

22:36 (सम्वाद) सच्चा धर्म वही है जिसमें विवेक और विचार जुड़ा हो
22:44 (सम्वाद) जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विचार की आवश्यकता अनिवार्य है

23:00 (सम्वाद) मनुष्य को हर परिस्थिति में जागरूक और सजग रहना चाहिए
23:09 (सम्वाद) अज्ञानता और लापरवाही जीवन को नीचे गिराती है

23:18 (सम्वाद) विचारवान व्यक्ति ही सही मार्ग चुन पाता है
23:27 (सम्वाद) बिना सोचे समझे चलना पतन का कारण बनता है

23:36 (सम्वाद) आत्मचिंतन से ही जीवन की दिशा स्पष्ट होती है
23:45 (सम्वाद) “मैं कौन हूँ” का विचार सर्वोच्च साधना है

24:00 (सम्वाद) संसार के भोग आकर्षक हैं पर अंत में दुख देते हैं
24:09 (सम्वाद) भोगों की आसक्ति मनुष्य को बंधन में डालती है

24:18 (सम्वाद) त्याग और विवेक से ही आत्मिक उन्नति संभव है
24:27 (सम्वाद) आत्मज्ञान के बिना जीवन अधूरा है

24:36 (सम्वाद) सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, भीतर है
24:45 (सम्वाद) मन को बाहर से हटाकर भीतर लगाना आवश्यक है

25:00 (सम्वाद) सत्संग और संतों का मार्ग जीवन को ऊँचा उठाता है
25:09 (सम्वाद) संत वचन जीवन के अंधकार को दूर करते हैं

25:18 (सम्वाद) गुरु की कृपा से ही ज्ञान का प्रकाश होता है
25:27 (सम्वाद) बिना गुरु के आत्मज्ञान प्राप्त करना कठिन है

25:36 (सम्वाद) अभ्यास और निरंतरता से ही मन स्थिर होता है
25:45 (सम्वाद) साधना में धैर्य और दृढ़ता आवश्यक है

26:00 (सम्वाद) इच्छा और वासना ही दुख का मूल कारण हैं
26:09 (सम्वाद) इच्छा समाप्त होते ही मन शांति अनुभव करता है

26:18 (सम्वाद) संतोष ही सबसे बड़ा धन है
26:27 (सम्वाद) असंतोषी व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता

26:36 (सम्वाद) आत्मसंतोष से ही जीवन में पूर्णता आती है
26:45 (सम्वाद) जो भीतर संतुष्ट है वही वास्तव में धनी है

27:00 (सम्वाद) संसार में सब कुछ नश्वर और परिवर्तनशील है
27:09 (सम्वाद) जो आज है वह कल नहीं रहेगा

27:18 (सम्वाद) शरीर, धन, संबंध — सब क्षणिक हैं
27:27 (सम्वाद) केवल आत्मा ही शाश्वत और सत्य है

27:36 (सम्वाद) इस सत्य को जानने वाला ही ज्ञानी है
27:45 (सम्वाद) ज्ञान से ही जीवन का उद्देश्य पूर्ण होता है

28:00 (सम्वाद) समय बहुत मूल्यवान है, इसे व्यर्थ न गँवाएँ
28:09 (सम्वाद) हर क्षण आत्मउन्नति के लिए उपयोग करें

28:18 (सम्वाद) मृत्यु निश्चित है, इसलिए जीवन का सही उपयोग करें
28:27 (सम्वाद) आत्मज्ञान के बिना मृत्यु व्यर्थ है

28:36 (सम्वाद) परमात्मा को जानना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है
28:45 (सम्वाद) इसी से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है

29:00 (सम्वाद) जब तक “मैं” का रहस्य नहीं समझा, तब तक अज्ञान बना रहता है
29:09 (सम्वाद) “मैं कौन हूँ” का समाधान ही मुक्ति का द्वार है

29:18 (सम्वाद) आत्मज्ञान से द्वैत समाप्त हो जाता है
29:27 (सम्वाद) सबमें एक ही परमात्मा का अनुभव होता है

29:36 (सम्वाद) यही अद्वैत स्थिति परम शांति देती है
29:45 (सम्वाद) यही जीवन का परम सत्य और सार है

30:00 (सम्वाद) आत्मज्ञान ही सर्वोच्च उपलब्धि है
30:06 (सम्वाद) यही मनुष्य जन्म का सच्चा उद्देश्य है




ब्रह्मज्ञान - आश्रम संध्या सत्संग - 13-03-2026 सुबह

 ब्रह्मज्ञान - आश्रम संध्या सत्संग - 13-03-2026 सुबह


Time stamp index 

0:00 (सम्वाद) मित्र को शत्रु भाव से देखने पर दुख, जगत भावना मात्र है
0:10 (सम्वाद) जैसी भावना वैसा जगत अनुभव होता है
0:16 (सम्वाद) परमात्मा का भाव करने से जगत की सत्यता मिटती है
0:25 (सम्वाद) दृष्टि और विचार के अनुसार जगत दिखाई देता है

0:32 (दृष्टांत) जगत का अंत जानना असंभव, वैज्ञानिक भी असफल
0:39 (दृष्टांत) प्रकृति अनंत का अंश है, उसका अंत नहीं
0:46 (दृष्टांत) अनंत को जानो तो प्रकृति तुच्छ लगती है
1:01 (कथा) विपश्चित राजा ने जगत का अंत जानने का प्रयास किया
1:17 (कथा) चार शरीर बनाकर चारों दिशाओं में खोज की
1:33 (कथा) स्थूल और सूक्ष्म शरीर से भी अंत नहीं मिला
1:42 (कथा) अंततः थककर निष्कर्ष — माया का अंत नहीं

2:06 (दृष्टांत) अनेक ग्रह और अनेक ब्रह्मांड हैं
2:12 (दृष्टांत) सृष्टि अनंत है, कोई सीमा नहीं

2:20 (कथा) विपश्चित राजा का हिरण रूप में जन्म
2:35 (कथा) वशिष्ठ जी द्वारा पुनः राजा रूप में प्रकट
3:06 (कथा) पूर्व संस्कार से अग्नि में कूदना और रूप परिवर्तन
3:29 (कथा) राजा विपश्चित ने अपने अनुभव बताए

3:53 (कथा) लीलावती और राजा पदम का प्रसंग
4:08 (कथा) अमरता हेतु सरस्वती उपासना
4:36 (कथा) वरदान — मृत्यु के बाद भी उसी मंडल में रहना
5:00 (कथा) राजा पदम युद्ध में मृत्यु
5:22 (कथा) सरस्वती द्वारा सूक्ष्म यात्रा
5:48 (कथा) पति को दूसरे लोक में राजा रूप में देखना
6:06 (दृष्टांत) वासना अनुसार मृत्यु के बाद अनुभव
6:31 (दृष्टांत) जैसे स्वप्न में वासना अनुसार दृश्य

6:48 (कथा) अन्य सृष्टियों में प्रवेश
7:03 (कथा) पूर्व जन्म का घर और पुत्र देखना
7:19 (कथा) पूर्व जन्म — अरुंधति और वशिष्ठ ब्राह्मण
7:43 (कथा) वासना से जन्म परिवर्तन और भोग

8:07 (दृष्टांत) अलग-अलग सृष्टियों में समय का भेद
8:31 (दृष्टांत) कहीं आयु बहुत छोटी, कहीं बहुत बड़ी
8:54 (दृष्टांत) मनुष्य आयु ब्रह्मा के सामने क्षण समान

9:03 (सम्वाद) कल्पनाओं में मनुष्य दुखी होता है
9:17 (सम्वाद) आत्मा को जानने से दुख का अंत
9:24 (सम्वाद) आत्मज्ञान ही सार है
9:38 (दृष्टांत) चैतन्य को जानने से ब्रह्मांड का ज्ञान
9:55 (दृष्टांत) मिट्टी और सोना उदाहरण — मूल जानो

10:10 (सम्वाद) देवताओं की भावना से आगे ब्रह्म को जानो
10:34 (सम्वाद) “मैं” का स्रोत जानना आवश्यक
10:49 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी करता हुआ भी अकर्ता

11:13 (दृष्टांत) पिता का बालक के साथ व्यवहार
11:26 (दृष्टांत) ज्ञानी संसार में रहते हुए भी अलग
11:58 (दृष्टांत) श्रीकृष्ण आदि का व्यवहार और अकर्ता भाव

12:21 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी को समझना कठिन
12:36 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी की स्थिति वही जानता है
12:55 (सम्वाद) ज्ञान प्राप्ति के बाद व्यक्ति छुपा रहता है

14:01 (सम्वाद) भगवान भी अपने को साधारण बताते हैं
14:33 (सम्वाद) ज्ञानी विभिन्न भूमिकाएँ निभाता है
15:04 (दृष्टांत) ज्ञानी में संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित

15:44 (सम्वाद) एक बार ब्रह्म अनुभव से सब रहस्य स्पष्ट
16:00 (सम्वाद) भावना अनुसार सुख-दुख अनुभव
16:27 (सम्वाद) धर्म — आत्मा की ओर ले जाए
16:43 (सम्वाद) अधर्म — आसक्ति और दुख बढ़ाए

17:09 (सम्वाद) इंद्रिय नियंत्रण ही धर्म मार्ग
17:24 (दृष्टांत) सृष्टि का आधार क्रम — पृथ्वी से परमात्मा
17:54 (दृष्टांत) जैसे जल में लील, वैसे ब्रह्म में सृष्टि

18:18 (दृष्टांत) ब्रह्म से जीव उत्पन्न, सबमें वही ब्रह्म
18:45 (सम्वाद) आत्मज्ञान से जगत ब्रह्म रूप दिखता है

18:53 (दृष्टांत) शक्कर के खिलौनों का उदाहरण
19:33 (सम्वाद) ब्रह्म दृष्टि से सब ब्रह्म ही है

19:57 (सम्वाद) आत्मज्ञान दुर्लभ है, साधना चाहिए
20:12 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञान सर्वोच्च पद

20:30 (सम्वाद) ज्ञानी प्रवृत्ति में भी निवृत्ति देखता है
20:54 (सम्वाद) कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म

21:19 (सम्वाद) ब्रह्म सुख और ज्ञान आवश्यक
21:37 (सम्वाद) गुरु कृपा से ही रुचि होती है

21:52 (सम्वाद) मनन और ध्यान से ज्ञान स्थिर
22:09 (सम्वाद) एकांत और साधना आवश्यक
22:31 (सम्वाद) ज्ञान के लिए संयम और तत्परता

22:47 (सम्वाद) मनुष्य जन्म का उद्देश्य आत्मज्ञान
23:04 (सम्वाद) भौतिक वस्तुएं अंत में व्यर्थ

23:23 (कथा) नचिकेता और यमराज संवाद
23:45 (कथा) नचिकेता ने भोग अस्वीकार किए
24:23 (कथा) ब्रह्मज्ञान ही सर्वोत्तम वरदान

25:03 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञान से स्थायी सुख
25:44 (सम्वाद) दृढ़ संकल्प से ही प्राप्ति

26:06 (सम्वाद) ब्रह्मज्ञानी न पाप से गिरता न पुण्य से उठता
26:30 (सम्वाद) मृत्यु में भी ज्ञानी शांत रहता

26:50 (सम्वाद) संसार की वस्तुएं नश्वर
27:12 (दृष्टांत) बच्चा चॉकलेट को ही मूल्यवान समझता

27:34 (सम्वाद) जीवन व्यर्थ न गँवाओ
28:05 (सम्वाद) नाम और शरीर दोनों मिथ्या

28:30 (सम्वाद) असली “मैं” को जानना आवश्यक
28:46 (सम्वाद) तीन मिनट का आत्मज्ञान भी मुक्ति दे सकता

29:13 (सम्वाद) परमात्मा को जानने से द्वैत समाप्त
29:31 (दृष्टांत) गुलाब के ज्ञान का उदाहरण

29:49 (सम्वाद) परमात्मा का ज्ञान स्थायी होता है

30:06 (सम्वाद) स्मृति होने पर दुख मिट जाता है 



 


आपके अपने ही बेवफाई करेंगे…पक्की बात है, इसलिए सम्हल जाओ तो अच्छा है

  

 आपके अपने ही बेवफाई करेंगे…पक्की बात है, इसलिए सम्हल जाओ तो अच्छा है

Time stamp index

0:03 (भजन) संसार की नश्वरता और स्थिर वस्तु की खोज
0:09 (प्रसंग) जीवात्मा और कर्म का साथ

0:17 (कथा) सत्संग और गुरु कृपा से भगवत धाम प्राप्ति
0:24 (कथा) जन्म-मरण का चक्र और गर्भ की अवस्था
0:31 (कथा) अनेक जन्मों का दुख

0:39 (कथा) विदुर-धृतराष्ट्र संवाद
0:48 (संवाद) पुत्र शोक और विलाप
0:55 (उपदेश) शोक से दुख नहीं मिटता
1:04 (उपदेश) दुख रहित स्थान की प्राप्ति
1:10 (उपदेश) गुरु कृपा का महत्व
1:18 (संवाद) धृतराष्ट्र का आत्मविलाप
1:25 (संवाद) कर्म और दुख का कारण
1:33 (कथा) 100 पुत्रों की मृत्यु का दुख

1:45 (प्रसंग) संसार में नाश का नियम
1:54 (प्रसंग) रोग और मृत्यु की अनिवार्यता
2:01 (प्रसंग) जन्म से मृत्यु तक नाश
2:08 (प्रसंग) बुढ़ापा और विनाश
2:16 (प्रसंग) ईश्वर के अलावा सब नश्वर
2:25 (भजन) देह-धन सब छोड़ जाना

2:33 (प्रसंग) धनवान व्यक्ति का दुख
2:41 (प्रसंग) आत्महत्या का प्रसंग
2:49 (प्रसंग) सत्संग से समाधान
2:57 (प्रसंग) आत्महत्या के बाद की स्थिति
3:06 (प्रसंग) दुख को बढ़ाना नहीं
3:15 (उपदेश) आत्महत्या से जुड़े पाप
3:23 (उपदेश) कंधा देने का निषेध
3:31 (प्रसंग) लक्ष्मी का नाश और अशांति

3:37 (प्रसंग) सत्संग का महत्व
3:47 (प्रसंग) सत्संग से उन्नति
3:56 (कथा) छोटे व्यक्ति की उन्नति
4:04 (कथा) 8000 कर्मचारियों वाला उद्योग
4:14 (कथा) व्यापार विस्तार
4:24 (कथा) छोटी नौकरी से बड़ी स्थिति

4:33 (प्रसंग) धन से दुख दूर नहीं
4:39 (प्रसंग) गुरु वचन से शांति
4:47 (प्रसंग) संकट में गुरु स्मरण
4:54 (प्रसंग) आत्महत्या का कारण

5:02 (प्रसंग) फिल्म का दुष्प्रभाव
5:09 (प्रसंग) भोग और भ्रम
5:15 (प्रसंग) पिक्चर का प्रभाव
5:25 (उपदेश) सत्संग vs पिक्चर
5:32 (उपदेश) सत्संग ईश्वर की ओर
5:38 (भजन) जीवन की क्षणभंगुरता

5:50 (भजन) राम-रावण उदाहरण और नश्वरता

6:00 (प्रसंग) सत्संग की महिमा
6:07 (प्रसंग) मौन साधना का लाभ
6:21 (प्रसंग) शांति का अनुभव
6:28 (संवाद) शांति की पुष्टि

6:40 (प्रसंग) धन और परिवार का व्यवहार
6:48 (प्रसंग) अगली पीढ़ी की लापरवाही
6:58 (प्रसंग) ममता का परिणाम
7:07 (प्रसंग) बेवफाई का नियम
7:14 (प्रसंग) संसार का स्वभाव
7:22 (उपदेश) ईश्वर के सिवाय प्रेम = घाटा

7:31 (दृष्टांत) मधुमक्खी और शहद
7:40 (उपदेश) संसार से भक्ति लेना
7:50 (भजन) संसार अस्थायी निवास

7:58 (प्रसंग) बुढ़ापे की बेवफाई
8:07 (प्रसंग) शरीर की निर्भरता
8:14 (प्रसंग) अपने लोगों का बदलना
8:21 (प्रसंग) पीड़ा का कारण
8:30 (उपदेश) पहले से सावधानी
8:37 (प्रसंग) आत्मसुरक्षा
8:46 (प्रसंग) वैराग्य का अभ्यास

9:04 (प्रसंग) परिवार के लिए परिश्रम
9:11 (प्रसंग) कदर का अभाव
9:19 (प्रसंग) धन का दुरुपयोग
9:26 (प्रसंग) शरीर पर आधारित संबंध
9:36 (उपदेश) बुढ़ापे से पहले ईश्वर प्राप्ति
9:45 (उपदेश) परमात्मा में शरण

10:02 (प्रसंग) अनुभव से कथन
10:09 (प्रसंग) भाषण नहीं सत्य अनुभव
10:16 (प्रसंग) जीवन की चेतावनी

10:23 (भजन) देह-धन सब नाशवान
10:32 (प्रसंग) संग्रह का व्यर्थ प्रयास
10:43 (प्रसंग) रावण-हिरण्यकश्यप उदाहरण

11:00 (कथा) धनवान व्यक्ति का दुख
11:10 (प्रसंग) गुरु स्मरण का लाभ
11:17 (प्रसंग) संपत्ति और सन्मति
11:26 (उपदेश) सन्मति से संपत्ति
11:32 (प्रसंग) सत्संग का त्याग
11:42 (प्रसंग) आध्यात्मिक कमाई का महत्व

11:58 (प्रसंग) दुख में करुणा
12:05 (प्रसंग) दुख में सहानुभूति
12:15 (प्रसंग) आत्महत्या का प्रभाव
12:23 (प्रसंग) परिवार की पीड़ा

13:00 (प्रसंग) मृत्यु का सार्वभौमिक नियम
13:09 (प्रसंग) संसार दुखालय
13:20 (दृष्टांत) मधुमक्खी का सार ग्रहण
13:27 (उपदेश) भक्ति और पुण्य संचय
13:34 (उपदेश) बाकी सब त्याज्य

13:49 (प्रसंग) संग्रह का अंत विनाश
13:56 (उपदेश) विदुर नीति
14:04 (प्रसंग) भौतिक उन्नति का पतन
14:13 (प्रसंग) धनवानों का पतन उदाहरण

14:28 (प्रसंग) भविष्य का पतन
14:35 (प्रसंग) संग्रह का नियम
14:44 (प्रसंग) अस्थायी प्रसिद्धि

15:07 (प्रसंग) प्रकृति का नियम
15:13 (प्रसंग) संग्रह की सीमा
15:20 (प्रसंग) उन्नति का अंत पतन

15:30 (प्रसंग) धन विवाद उदाहरण
15:37 (प्रसंग) परिवारिक झगड़े
15:43 (प्रसंग) सब छोड़ जाना
15:53 (उपदेश) नश्वर वस्तु से वैराग्य

16:00 (उपदेश) ईश्वर प्रेम ही बुद्धिमानी
16:11 (प्रसंग) भक्ति और धर्म का महत्व

16:20 (प्रसंग) गौ सेवा उदाहरण
16:31 (प्रसंग) बिना मांग के सेवा
16:42 (प्रसंग) सेवा में संतोष

17:00 (प्रसंग) गौशाला व्यवस्था
17:07 (प्रसंग) संसाधन प्रबंधन
17:13 (प्रसंग) सेवा कार्य
17:20 (प्रसंग) गरीब सहायता

17:28 (प्रसंग) बोझ रहित जीवन
17:37 (प्रसंग) मृत्यु की तैयारी

17:58 (प्रसंग) आयु और निवृत्ति
18:07 (प्रसंग) नानक जी उदाहरण
18:15 (प्रसंग) जीवन का अंत निकट

18:32 (प्रसंग) शरीर की अस्थिरता
18:41 (प्रसंग) मृत्यु अज्ञान
18:50 (प्रसंग) अज्ञान में जीवन

19:07 (प्रसंग) सब छोड़ जाना
19:16 (प्रसंग) धन संग्रह की व्यर्थता
19:23 (प्रसंग) स्पष्ट उपदेश

19:31 (भजन) नारायण हरि

19:39 (प्रसंग) जप यज्ञ और सेवा
19:47 (प्रसंग) विभिन्न स्थानों पर कार्य
19:56 (प्रसंग) सेवा विस्तार

20:03 (प्रसंग) कार्यक्रम और सेवा
20:12 (प्रसंग) बाल संस्कार केंद्र
20:22 (प्रसंग) नि:शुल्क शिक्षा
20:29 (प्रसंग) संगठन विस्तार

20:45 (प्रसंग) सेवा का परिणाम

21:02 (प्रसंग) असली बात – भगवान हमारा
21:09 (प्रसंग) शरीर और संसार अस्थायी
21:16 (प्रसंग) परमात्मा का स्वरूप
21:22 (प्रसंग) आत्मा में स्थित परमात्मा

21:29 (प्रसंग) भगवान प्राप्ति का संकल्प
21:36 (प्रसंग) आध्यात्मिक यात्रा

22:00 (प्रसंग) शरीर का असत्य स्वामित्व
22:10 (प्रसंग) संसार की बेवफाई
22:16 (प्रसंग) रिश्तों का स्वभाव
22:24 (प्रसंग) चेतावनी

22:37 (संवाद) श्रोता से पुष्टि
22:46 (प्रसंग) अपनापन और उपदेश
22:54 (प्रसंग) सावधानी का निर्देश

23:00 (उपदेश) पहले से तैयार रहना
23:09 (प्रसंग) आत्मसुरक्षा
23:27 (भजन) नारायण हरि

23:34 (प्रसंग) गुरु का अपनापन
23:44 (प्रसंग) सच्चा प्रेम
23:51 (प्रसंग) गुरु की करुणा

23:59 (उपदेश) गुरु की वास्तविक भूमिका
24:09 (प्रसंग) दूरदर्शिता
24:18 (प्रसंग) शिष्य की रक्षा

24:26 (प्रसंग) माया vs गुरु
24:33 (प्रसंग) बाहरी प्रेम का भ्रम

24:41 (प्रसंग) गुरु कृपा का प्रभाव
24:48 (प्रसंग) त्याग की शक्ति

25:03 (प्रसंग) वैराग्य की शक्ति
25:12 (उपदेश) होशपूर्वक त्याग

25:21 (प्रसंग) गुरु कृपा का कार्य
25:28 (प्रसंग) जीवन विस्तार
25:35 (प्रसंग) गुरु की योजना

25:47 (प्रसंग) शिष्यों पर कृपा

26:04 (संवाद) शिष्य परिचय
26:13 (कथा) फैक्ट्री और सत्संग संबंध
26:20 (कथा) सेवा का अवसर
26:29 (कथा) साधकों का निवास
26:36 (कथा) भजन साधना प्रभाव
26:43 (कथा) व्यवसाय वृद्धि

26:52 (कथा) 350 कर्मचारियों तक वृद्धि
26:59 (कथा) गुरु कृपा का अनुभव

27:08 (संवाद) प्रार्थना
27:17 (कथा) बिरला उदाहरण
27:27 (कथा) सत्कर्म और उन्नति
27:39 (कथा) दान का महत्व
27:49 (कथा) कमाई का दशांश

27:58 (प्रसंग) धर्म का सिद्धांत

28:32 (संगीत) समाप्ति


हे मेरे मन - आश्रम संध्या सत्संग

  हे मेरे मन - आश्रम संध्या सत्संग

TIME STAMP INDEX 

 0:02 (प्रसंग) मन अर्पण न होने से विकार और उद्वेग

0:10 (प्रसंग) मन का रिवर्स में आना और अशांति

0:17 (कथा) शास्त्र आचरण और धर्म का फल वैराग्य
0:25 (कथा) वैराग्य न आए तो धर्म अधूरा
0:35 (कथा) शास्त्र का सही अर्थ समझना
0:46 (कथा) धर्म से वैराग्य, योग से ज्ञान, ज्ञान से मोक्ष
0:56 (कथा) साधना का क्रम
1:03 (कथा) ज्ञान से मोक्ष और जन्म-मरण से मुक्ति
1:12 (कथा) मनुष्य जन्म का सच्चा फल

1:19 (प्रसंग) शरीर का नाश और व्यर्थता
1:26 (प्रसंग) परमात्मा ज्ञान ही उद्देश्य
1:34 (प्रसंग) संसार में आसक्ति ठगने का व्यवहार
1:42 (प्रसंग) ईश्वर के अलावा प्रेम का दुख
1:49 (प्रसंग) संसार से प्रीति का पश्चाताप
1:59 (प्रसंग) ईश्वर ही सच्चा प्रेम

2:08 (प्रसंग) व्यवहार संसार से, प्रेम परमात्मा से
2:17 (प्रसंग) वस्तुएं प्रेम के योग्य नहीं
2:27 (प्रसंग) हर भाव परमात्मा से जोड़ना
2:34 (प्रसंग) परमात्मा में ही सर्व संबंध
2:42 (प्रसंग) शिकायत भी परमात्मा से
2:48 (प्रसंग) हृदय में संवाद

2:56 (संवाद) करुणा के लिए पुकार
3:03 (संवाद) प्रार्थना और गुनगुनाहट
3:10 (संवाद) फरियाद करना
3:19 (प्रसंग) जीवन की क्षणभंगुरता
3:27 (प्रसंग) मृत्यु से पहले शरण
3:36 (प्रसंग) मृत्यु से पहले मुक्ति
3:43 (प्रसंग) अर्थी से पहले अर्थ समझना
3:52 (संवाद) हृदय से प्रार्थना

3:58 (भजन) ओम जप

4:08 (कथा) स्वर्ग भी अंतिम नहीं
4:19 (कथा) वैभव और सौंदर्य व्यर्थ
4:28 (कथा) भोग का निष्फल परिणाम
4:35 (कथा) अप्सरा सुख क्षणिक
4:44 (कथा) इंद्रलोक भी नश्वर
4:53 (कथा) पुनर्जन्म चक्र
5:01 (कथा) विभिन्न योनियाँ
5:10 (कथा) राज-पद व्यर्थ

5:18 (प्रसंग) मृत्यु अनिश्चित
5:28 (कथा) भोग के बाद शून्यता
5:35 (प्रसंग) संपत्ति व्यर्थ
5:43 (प्रसंग) भूमि पर अस्थायी अधिकार

5:54 (कथा) स्वामित्व का भ्रम
6:03 (कथा) दावों का अंत
6:10 (कथा) सत्ता परिवर्तन
6:20 (प्रसंग) “हमारा” का भ्रम

6:30 (दृष्टांत) शतरंज का खेल
6:37 (दृष्टांत) खिलाड़ी का अंत

6:47 (कथा) राजाओं के दावे
6:54 (कथा) सबका अंत
7:02 (प्रसंग) पृथ्वी स्थिर, मनुष्य नश्वर
7:10 (प्रसंग) जीवन क्षणिक

7:20 (प्रसंग) मृत्यु से पहले सत्य समझना
7:26 (प्रसंग) शाश्वत सत्य का बोध
7:36 (प्रसंग) शरीर का अंत और श्मशान सत्य
7:43 (प्रसंग) मौन और निसंकल्प अवस्था का महत्व
7:52 (प्रसंग) चित्त की शांति और श्रेष्ठ अवस्था

8:00 (प्रसंग) जीते जी मोह त्याग का महत्व
8:08 (प्रसंग) मृत्यु से पहले भगवान की ओर चलना
8:17 (प्रसंग) ममता त्याग का अभ्यास
8:25 (प्रसंग) स्वयं से दान करने का महत्व

8:39 (प्रसंग) ईश्वर के अलावा आसक्ति = धोखा
8:46 (प्रसंग) मन लगाना ही बंधन
8:54 (प्रसंग) धर्म से वैराग्य की पहचान
8:59 (प्रसंग) धर्म बढ़े तो वैराग्य बढ़े
9:06 (प्रसंग) पाप से विषयों में रुचि
9:15 (प्रसंग) वासना अंधा बनाती है
9:30 (प्रसंग) ज्ञान से पहले जागृति
9:36 (प्रसंग) मृत्यु से पहले अमरता का अनुभव
9:44 (प्रसंग) कुटुंब से पहले मन हटाना
9:53 (प्रसंग) मन को परमात्मा में लगाना

10:11 (प्रसंग) भोग में गिराने वाले पापी
10:18 (प्रसंग) वासना और भोग की प्रवृत्ति
10:26 (प्रसंग) ईश्वर मार्ग से भटकाना
10:34 (प्रसंग) आध्यात्मिक हानि का बड़ा पाप
10:43 (प्रसंग) धन हानि से बड़ा धर्म हानि
10:50 (प्रसंग) भगवान मार्ग छीनना महापाप
10:59 (प्रसंग) भक्त को भटकाना बड़ा अपराध

11:08 (प्रसंग) संत की क्षमा और कर्मफल
11:17 (प्रसंग) ईश्वर मार्ग से हटने का परिणाम
11:29 (प्रसंग) संत समय का महत्व
11:38 (कथा) ओमकारेश्वर नामक साधक का प्रसंग

11:52 (कथा) भजन में तल्लीनता से सांसारिक हानि
12:02 (कथा) घर में दरिद्रता
12:10 (कथा) सज्जनता और पवित्रता
12:21 (कथा) युवराज द्वारा धन प्रस्ताव
12:29 (कथा) मित्रता का आधार
12:37 (कथा) धन स्वीकार करने का आग्रह
12:46 (कथा) साधक का इंकार

12:54 (कथा) मित्रता केवल भगवान के नाते
13:02 (कथा) धन लेन-देन से इंकार
13:10 (कथा) भक्ति का मूल्य न लगाना
13:18 (कथा) गुरु और भगवान का सम्मान

13:27 (संवाद) पुत्र का प्रश्न
13:35 (संवाद) परिवार की आवश्यकता
13:42 (संवाद) भगवान पर विश्वास
13:49 (संवाद) भगवान सब जानता है
13:58 (संवाद) भक्ति को न बेचना

14:06 (प्रसंग) ईश्वर से प्रेम, व्यापार नहीं
14:14 (कथा) अशर्फियां लौटाना
14:21 (कथा) मित्रता का आध्यात्मिक आधार
14:31 (प्रसंग) सत्संग से संबंध

14:40 (प्रसंग) ईश्वर मार्ग से हटने पर दूरी
14:47 (प्रसंग) आध्यात्मिक पहचान
14:55 (प्रसंग) ईश्वर नाते का महत्व

15:03 (प्रसंग) ईश्वर के लिए त्याग
15:13 (प्रसंग) संसार के लिए त्याग न करें
15:23 (प्रसंग) लोभ और भय से बचना
15:32 (प्रसंग) ईश्वर त्याग का परिणाम

15:40 (प्रसंग) ईश्वर के लिए त्याग = विजय
15:48 (प्रसंग) संसार के लिए त्याग = पतन
15:57 (प्रसंग) अंत में दुखद स्थिति

16:08 (प्रसंग) ईश्वर से सब प्राप्त
16:15 (प्रसंग) संसार से कुछ स्थायी नहीं
16:22 (दृष्टांत) एक साधे सब सधे
16:32 (प्रसंग) परमात्मा की सर्वशक्ति
16:40 (प्रसंग) परमात्मा की अनंतता
16:47 (प्रसंग) आत्मा की शक्ति

16:56 (प्रसंग) परमात्मा से संबंध का महत्व
17:04 (प्रसंग) संबंध टूटे तो सब व्यर्थ
17:12 (प्रसंग) मृत्यु अनिवार्यता
17:20 (प्रसंग) सबको मृत्यु

17:28 (प्रसंग) जीते जी ममता त्याग
17:37 (प्रसंग) सेवा करें, ममता नहीं
17:43 (प्रसंग) अपरिचित को दान
17:54 (प्रसंग) संबंध का बंधन

18:01 (प्रसंग) ईश्वर से संबंध
18:09 (प्रसंग) ईश्वर नाते व्यवहार
18:17 (प्रसंग) इसी जन्म में कल्याण

18:28 (प्रसंग) सवासन में समर्पण
18:34 (प्रसंग) अहं का त्याग
18:48 (प्रसंग) शांति का अनुभव
18:55 (प्रसंग) पंचभूत शरीर

19:04 (प्रसंग) आत्मा में स्थित होना
19:10 (प्रसंग) साक्षी भाव ही मुक्ति
19:19 (प्रसंग) जगत स्वप्न समान
19:27 (प्रसंग) जगत को सत्य मानना दुख
19:34 (प्रसंग) मोह का कारण

19:43 (दृष्टांत) स्वप्न का उदाहरण
19:53 (प्रसंग) अतीत का मिथ्यात्व

20:02 (प्रसंग) 100 वर्ष का परिवर्तन
20:08 (प्रसंग) पीढ़ियों का अंत
20:15 (प्रसंग) वर्तमान भी अस्थायी
20:22 (प्रसंग) भविष्य में सब स्वप्न

20:31 (प्रसंग) स्वप्न का स्वभाव
20:39 (प्रसंग) भ्रांति से सत्य प्रतीत

20:50 (प्रसंग) सांसारिक लक्ष्य की सीमितता
20:58 (प्रसंग) परमात्मा साक्षात्कार का लक्ष्य

21:05 (प्रसंग) विदेश का आकर्षण
21:14 (प्रसंग) अमेरिका का उदाहरण
21:22 (प्रसंग) परमात्मा का गर्व
21:32 (प्रसंग) भोगवादी जीवन की आलोचना
21:39 (प्रसंग) शरीर केंद्रित जीवन
21:47 (प्रसंग) जीवन की व्यर्थता
21:56 (प्रसंग) आत्मदेश का महत्व

22:05 (प्रसंग) स्वर्ग भी अंतिम नहीं
22:13 (प्रसंग) भटकाव का परिणाम

22:22 (प्रसंग) ज्ञान का अहंकार
22:31 (प्रसंग) सूक्ष्म ज्ञान की सीमाएं
22:38 (प्रसंग) परमात्मा को न जानना

22:50 (प्रसंग) ज्ञान का स्रोत
22:59 (प्रसंग) आत्मा की समानता
23:05 (प्रसंग) जन्म-मरण से परे आत्मा
23:13 (प्रसंग) आत्मज्ञान का महत्व

23:21 (प्रसंग) ईश्वर मार्ग का मापदंड
23:28 (प्रसंग) बाहरी मापदंड व्यर्थ
23:39 (प्रसंग) हृदय में परमात्मा

23:48 (प्रसंग) जन्म-मरण चक्र
23:55 (प्रसंग) संबंधों की अस्थिरता

24:04 (प्रसंग) नियम उल्लंघन का फल
24:10 (प्रसंग) कर्म और पुनर्जन्म

24:20 (प्रसंग) पितृ दोष और परिणाम
24:34 (प्रसंग) पाप का प्रभाव

24:37 (प्रसंग) भोग का दुख
24:47 (प्रसंग) भोग में सुख नहीं
24:50 (प्रसंग) शरीर की दुर्बलता
24:59 (प्रसंग) परमात्मा ध्यान श्रेष्ठ

25:07 (प्रसंग) आत्मकल्याण और पितृ कल्याण
25:14 (प्रसंग) परमात्मा का स्वरूप

25:21 (प्रसंग) परमात्मा निराकार
25:33 (प्रसंग) नेति नेति विचार
25:40 (प्रसंग) परम सत्ता का वर्णन
25:48 (प्रसंग) सबका आधार

25:57 (प्रसंग) महापुरुषों का एकत्व
26:09 (प्रसंग) आत्मज्ञान का परिणाम

26:30 (प्रसंग) निसंकल्प शांति
26:39 (प्रसंग) मौन और महानता
26:47 (प्रसंग) चंचलता से पतन
26:57 (प्रसंग) अशांति का कारण

27:04 (प्रसंग) चतुराई का बंधन
27:12 (प्रसंग) जन्म चक्र
27:20 (प्रसंग) सीमित संबंध

27:30 (प्रसंग) संतुलित जीवन
27:37 (प्रसंग) संयम का महत्व
27:47 (प्रसंग) साधना में लगना
27:56 (प्रसंग) साक्षी भाव

28:02 (प्रसंग) समय का सदुपयोग
28:11 (प्रसंग) आयु का क्षय
28:19 (प्रसंग) आत्मा और आवरण
28:26 (प्रसंग) अज्ञान का अंत

28:33 (प्रसंग) देहाभिमान का त्याग
28:41 (प्रसंग) आत्मस्वरूप का बोध
28:48 (प्रसंग) ब्रह्मभाव

28:55 (भजन) ओम शांति
29:03 (भजन) शांति का आह्वान
29:10 (भजन) ईश्वरीय शांति
29:20 (भजन) अद्वैत शांति
29:32 (भजन) चित्त शांति
29:52 (भजन) ओम शांति

30:08 (प्रसंग) चित्त की शांति का महत्व
30:17 (प्रसंग) मन की चंचलता दुख
30:30 (प्रसंग) मन उपशम
30:40 (प्रसंग) संकल्प-विकल्प से मुक्ति
30:53 (प्रसंग) श्वास में परमात्मा शांति

 

सोमवार, 16 मार्च 2026

आश्रम संध्या सत्संग 08-03-2026 शाम | Surat 1990 ( Einstien dhyan , kendra... )


 आश्रम संध्या सत्संग 08-03-2026 शाम |   Surat 1990

TIME STAMP INDEX 

0:02 (प्रसंग) चार वेद और चार उपवेद श्रीकृष्ण के हस्तगत होने का वर्णन
0:10 (प्रसंग) युद्धभूमि में गीता में चारों वेदों का सार प्रकट होना
0:19 (प्रसंग) युद्ध के भयंकर वातावरण में भी कृष्ण द्वारा ज्ञान देना
0:29 (प्रसंग) गीता का सनातन महत्व और अमर ग्रंथ होना
0:37 (प्रसंग) विश्व में गीता जयंती का महत्व

0:45 (दृष्टांत) कनाडा के राष्ट्रपति ट्रेडो पर गीता का प्रभाव
0:52 (दृष्टांत) ट्रेडो का वृंदावन आना और एकांत जीवन अपनाना
1:02 (दृष्टांत) गीता और उपनिषद को आध्यात्मिक आहार बनाना
1:10 (प्रसंग) गीता मानवता का ग्रंथ है यह विचार

1:25 (श्लोक) तेषाम सततयुक्तानाम का उच्चारण
1:40 (श्लोक) भजताम प्रीति पूर्वकम का जप
1:58 (श्लोक) ददामि बुद्धियोगं तम का जप
2:14 (श्लोक) येन मामुपयान्ति ते का जप

2:27 (प्रसंग) गीता के दशम अध्याय के श्लोक का अर्थ
2:36 (प्रसंग) प्रेमपूर्वक भजन करने वालों को भगवान बुद्धियोग देते हैं
2:45 (प्रसंग) कर्म को भगवान को अर्पण करने का संदेश

2:53 (प्रसंग) इन्द्रियों द्वारा किए जाने वाले कर्मों का वर्णन
3:01 (प्रसंग) आंख, कान, जिह्वा, त्वचा द्वारा संसार का अनुभव
3:13 (प्रसंग) इन्द्रियों द्वारा जगत का ज्ञान
3:20 (प्रसंग) आंख और कान को जगत की ज्योति बताना
3:27 (प्रसंग) स्वाद और गंध की ज्योति का वर्णन
3:34 (प्रसंग) स्पर्श की ज्योति त्वचा होना
3:42 (प्रसंग) सभी ज्योतियों के मूल में परमात्मा का प्रकाश

3:49 (प्रसंग) सूर्य, चंद्र और अग्नि की ज्योति का उदाहरण
3:59 (प्रसंग) मन और बुद्धि की ज्योति का वर्णन
4:07 (प्रसंग) चैतन्य आत्मा को अंतिम ज्योति बताना

4:17 (प्रसंग) दृश्य संसार के बदलने का वर्णन
4:26 (प्रसंग) देखने और सुनने वाले परमात्मा का वर्णन

4:34 (प्रसंग) बचपन, मित्र और यौवन के बदलने का उदाहरण
4:42 (प्रसंग) बुढ़ापा और मृत्यु के परिवर्तन का वर्णन
4:49 (प्रसंग) जन्म-मृत्यु के अनेक परिवर्तन
4:55 (प्रसंग) आत्मा और परमात्मा का कभी न बदलना

5:03 (प्रसंग) जन्म-जन्म के संबंध बदलने का उदाहरण
5:09 (प्रसंग) परमात्मा का हर जन्म में साथ रहना
5:15 (प्रसंग) सत स्वरूप परमात्मा का हृदय में होना

5:24 (प्रसंग) सुबह उठकर परमात्मा का स्मरण करने का संदेश
5:31 (प्रसंग) कर्म के बाद भगवान को अर्पण करने का उपदेश
5:40 (प्रसंग) कर्ता भाव छोड़कर भगवान को समर्पण

5:49 (प्रसंग) अहंकार त्याग और भगवान की कृपा का स्मरण
5:56 (प्रसंग) भगवान की कृपा से प्रेम का अनुभव

6:02 (दृष्टांत) अमृत की एक बूंद का उदाहरण
6:10 (दृष्टांत) दूध की बूंद और गिलास का अंतर
6:17 (दृष्टांत) अमृत की बूंद और सरोवर का उदाहरण

6:26 (प्रसंग) हर कर्म से पहले भगवान को प्रेम अर्पित करना
6:35 (प्रसंग) कर्तापन छोड़ने का उपदेश

6:44 (प्रसंग) प्रभु की सत्ता से सेवा प्रारंभ करना
6:50 (प्रसंग) हृदय में प्रेम उत्पन्न होने का वर्णन

6:59 (उद्धरण) कबीर का प्रेम पर कथन
7:07 (प्रसंग) अहंकार रोग मिटाने के लिए ईश्वर प्रेम

7:16 (प्रसंग) परमात्मा प्रेम से जीवन की बंदगी होना
7:25 (प्रसंग) धन प्रेम से उत्पन्न तनाव का वर्णन
7:34 (प्रसंग) धन से उत्पन्न चिंता का उदाहरण

7:42 (दृष्टांत) काम सुख की क्षणिकता का उदाहरण
7:51 (दृष्टांत) सरोवर की सतह और तले का उदाहरण

8:00 (प्रसंग) काम और क्रोध में अधिक देर टिकना संभव नहीं होना
8:08 (प्रसंग) झगड़ा थोड़े समय में समाप्त होना और मनुष्य का शांत होना
8:17 (प्रसंग) क्रोध के बाद मनुष्य की ऊर्जा नष्ट होना
8:25 (प्रसंग) काम विकार के बाद शक्ति का नाश होना
8:34 (प्रसंग) भगवान के प्रेम से ऊर्जा उत्पन्न होना

8:42 (प्रसंग) भगवान को भोग अर्पण करना सबके बस की बात नहीं
8:50 (प्रसंग) भगवान गहनों या पकवानों के भूखे नहीं
8:56 (प्रसंग) भगवान केवल प्रेम के भूखे हैं

9:05 (प्रसंग) भगवान का प्रेम सभी के लिए संभव होना
9:13 (श्लोक) तेषाम सततयुक्तानाम भजताम प्रीति पूर्वकम का संदर्भ
9:20 (प्रसंग) सेवा पूजा में सच्चे प्रेम की आवश्यकता

9:26 (दृष्टांत) तुच्छ वस्तु के लिए पूजा करने वाले का नुकसान
9:42 (दृष्टांत) चक्रवर्ती सम्राट और दुआनी का उदाहरण
9:49 (दृष्टांत) महान अवसर छोड़कर छोटी चीज लेने का उदाहरण

9:58 (प्रसंग) भगवान की प्रीति प्राप्ति के लिए कर्म करना
10:06 (प्रसंग) भगवान के लिए रोने का महत्व

10:15 (प्रसंग) मृत्यु की अनिवार्यता का प्रश्न उठाना
10:22 (प्रसंग) हर घर में मृत्यु का सत्य होना
10:31 (प्रसंग) अंतिम यात्रा का निश्चित होना

10:40 (प्रसंग) जन्म के समय भविष्य पूछना
10:49 (प्रसंग) पुत्र के भविष्य के प्रश्न
10:57 (प्रसंग) चार प्रकार के पुत्र का उल्लेख

11:06 (प्रसंग) मृत्यु के विषय में कोई प्रश्न न करना
11:13 (प्रसंग) मृत्यु का निश्चित होना
11:20 (प्रसंग) बाकी सब अनिश्चित लेकिन मृत्यु निश्चित

11:29 (प्रसंग) मृत्यु से पहले अहंकार भगवान में डुबोने का संदेश
11:39 (प्रसंग) अहंकार का त्याग अमरता का द्वार खोलना

11:47 (उद्धरण) मरने के आध्यात्मिक अर्थ पर दोहा
11:54 (प्रसंग) अहंकार को मारने का संदेश

12:01 (प्रसंग) प्रशंसा से अहंकार न बढ़ाने का उपदेश
12:08 (प्रसंग) निंदा और प्रशंसा को सही दृष्टि से देखना
12:17 (प्रसंग) दूसरों की कमजोरी को अपना गुण न मानना
12:23 (प्रसंग) निर्धनता या दुर्बलता को अपना बल न मानना
12:30 (प्रसंग) परमात्मा से अपना संबंध समझना

12:36 (प्रसंग) भगवान को प्रसन्न रखने का महत्व
12:45 (प्रसंग) युद्ध में भी भगवान की बंदगी संभव होना
12:54 (प्रसंग) भगवान को प्रेम करने का उपदेश

13:01 (दृष्टांत) मृत्यु के घर में मजा पूछने का उदाहरण
13:11 (प्रसंग) अनुचित प्रश्न से लोगों का क्रोधित होना

13:17 (प्रसंग) ध्यान और कीर्तन में रोने का अनुभव
13:26 (प्रसंग) सत्संग में भाव विभोर होकर रोना
13:33 (प्रसंग) सत्संग का शांत वातावरण

13:41 (प्रसंग) भगवान के लिए रोने में आनंद होना
13:49 (प्रसंग) संसार के सुख में भी दुख होना

13:59 (भजन) नारायण नारायण स्मरण
14:07 (भजन) राम गुण गाने का संदेश

14:14 (प्रसंग) तुलसीदास का बांके बिहारी मंदिर जाना
14:21 (संवाद) तुलसीदास के ज्ञान और भक्ति पर प्रश्न

14:30 (प्रसंग) तुलसीदास द्वारा कृष्ण से राम रूप मांगना
14:38 (उद्धरण) तुलसीदास का प्रसिद्ध पद

14:47 (भजन) तुलसी मस्तक तब नमे पद का गायन
14:52 (भजन) कृष्ण रूप और राम रूप का वर्णन

15:00 (प्रसंग) तुलसीदास के ज्ञान का प्रश्न
15:08 (संवाद) प्रश्न का उत्तर और प्रेम की परीक्षा

15:17 (प्रसंग) राम और कृष्ण एक होने का विचार
15:25 (प्रसंग) प्रेम की महिमा दिखाने के लिए घटना

15:32 (भजन) तुलसी मस्तक तब नमे पद का पुनः गायन
15:42 (भजन) श्रीकृष्ण के रघुनाथ बनने का वर्णन
15:52 (भजन) राम रूप दर्शन का वर्णन

15:59 (भजन) राम नाम और सीता-लक्ष्मण का स्मरण
16:09 (भजन) ध्यान और कल्याण का वर्णन
16:15 (भजन) नील सरोवर और घनश्याम का वर्णन

16:24 (प्रसंग) भक्तों के लिए कृष्ण का राम बनना
16:30 (प्रसंग) प्रेम के लिए कृष्ण का लीला रूप बदलना
16:39 (प्रसंग) भक्तों के लिए सेवक रूप धारण करना

16:45 (श्लोक) तेषाम सततयुक्तानाम भजताम प्रीति पूर्वकम
16:53 (श्लोक) ददामि बुद्धियोगं तम का पुनः स्मरण

17:02 (प्रसंग) बुद्धि सबके पास होना
17:11 (दृष्टांत) मच्छर की बुद्धि का उदाहरण
17:19 (दृष्टांत) मच्छर का सही जगह बैठना
17:27 (दृष्टांत) मच्छर की व्यवहारिक बुद्धि

17:36 (प्रसंग) सामान्य बुद्धि और बुद्धियोग का अंतर
17:45 (प्रसंग) भगवान की कृपा से बुद्धि का प्रकाश

17:53 (प्रसंग) बुद्धि के दुरुपयोग का परिणाम
17:59 (प्रसंग) बुद्धि के सदुपयोग का मार्ग

18:08 (प्रसंग) प्रेम से ज्ञान, क्रिया और नियंत्रण प्राप्त होना
18:17 (प्रसंग) ज्ञान, प्रेम और क्रिया का संतुलन

18:25 (प्रसंग) कर्म करते समय भगवान भाव रखना
18:32 (प्रसंग) पुत्र को कन्हैया मानकर सेवा करना

18:42 (प्रसंग) दान देते समय भगवान भाव रखना
18:48 (प्रसंग) भिखारी के रूप में भगवान का अवसर

18:58 (प्रसंग) देने से अपना कल्याण होना
19:04 (प्रसंग) भगवान सेवा का अवसर देते हैं

19:12 (दृष्टांत) स्वामी अखंडानंद के शिष्य को दान की घटना
19:21 (संवाद) शिष्य का दान अस्वीकार करना
19:29 (संवाद) महिला का भावपूर्ण उत्तर

19:39 (प्रसंग) देने की भावना का महत्व
19:48 (प्रसंग) सेवा से आत्म कल्याण होना

19:57 (प्रसंग) भगवान को प्रेम की आवश्यकता
20:06 (प्रसंग) प्रेम मांगने का उद्देश्य भक्त का कल्याण

20:15 (प्रसंग) प्रेम का सार्वभौमिक महत्व
20:23 (प्रसंग) प्रेम से सभी आकर्षित होना

20:32 (प्रसंग) प्रेम से पशु, मनुष्य और देवता वश होना
20:40 (प्रसंग) प्रेम से परमात्मा भी वश होना

20:48 (प्रसंग) प्रेम के विकृत रूप काम और लोभ
20:56 (प्रसंग) परमात्मा प्रेम से बंदगी होना

21:04 (प्रसंग) प्रेम का सांसारिक वस्तुओं में बिखरना
21:12 (प्रसंग) बाहरी रूपों से प्रेम का उदाहरण

21:21 (प्रसंग) दिल को सजाने का संदेश
21:30 (भजन) मत कर रे गर्व गुमान पद

21:36 (भजन) संसार की नश्वरता का वर्णन
21:42 (भजन) पतंग के रंग का उदाहरण

21:50 (प्रसंग) मकान और धन को अपना कहना
21:56 (प्रसंग) वस्तुएं मालिक को नहीं पहचानती

22:05 (प्रसंग) वस्तुओं को अपना कहने की आदत
22:15 (प्रसंग) जीवन की छोटी वस्तुओं को अपना कहना

22:24 (प्रसंग) भगवान को अपना बनाने का संदेश
22:32 (प्रसंग) भगवान मेरे हैं मैं भगवान का हूं

22:38 (प्रसंग) यज्ञ, दान और पुण्य का महत्व
22:45 (प्रसंग) भगवान से संबंध की भावना

22:54 (प्रसंग) अंतरंग साधना का महत्व
23:03 (प्रसंग) भगवान भाव से दान का फल

23:12 (प्रसंग) अनंत भाव से दान का अनंत फल

23:19 (दृष्टांत) चपरासी को चाय देने का उदाहरण
23:29 (दृष्टांत) कलेक्टर को चाय देने का उदाहरण
23:37 (दृष्टांत) राष्ट्रपति को जल देने का उदाहरण

23:46 (प्रसंग) परमात्मा को प्रेम देने का महत्व
23:53 (प्रसंग) परमात्मा कृपा से कुल का कल्याण

24:02 (श्लोक) भजताम प्रीति पूर्वकम ददामि बुद्धियोगं तम
24:09 (प्रसंग) बुद्धि और बुद्धियोग का अंतर

24:19 (दृष्टांत) आइंस्टीन का उदाहरण
24:27 (संवाद) आइंस्टीन से सफलता का रहस्य पूछना
24:34 (दृष्टांत) ध्यान साधना का रहस्य बताना

24:43 (प्रसंग) ध्यान से बुद्धियोग की प्राप्ति
24:51 (प्रसंग) सात केंद्रों का वर्णन

24:58 (प्रसंग) मूलाधार से अनाहत केंद्र तक का वर्णन
25:09 (प्रसंग) केंद्र के अनुसार विचार बदलना

25:17 (प्रसंग) सज्जन से गलती होने का कारण
25:26 (प्रसंग) दुर्जन से भी अच्छे कर्म होना

25:34 (प्रसंग) नीचे केंद्र में नकारात्मक भाव
25:44 (प्रसंग) ऊपर केंद्र में सद्गुणों का उदय

25:52 (प्रसंग) क्रोध में हाथ नीचे जाना
26:00 (प्रसंग) प्रेम में हाथ ऊपर उठना

26:08 (प्रसंग) भगवान स्मरण में हाथ ऊपर जाना
26:15 (श्लोक) ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति

26:23 (प्रसंग) परमात्मा का हृदय में निवास
26:30 (प्रसंग) नश्वर वस्तुओं में उलझना

26:37 (प्रसंग) प्रेम स्वरूप परमात्मा से वंचित होना
26:46 (प्रसंग) सत्संग का स्मरण संदेश

26:52 (प्रसंग) भगवान में प्रेम न लगने की समस्या
27:00 (दृष्टांत) सूखा रोग और मिश्री का उदाहरण

27:08 (दृष्टांत) मिश्री चूसने से रोग मिटना
27:15 (दृष्टांत) भगवान नाम से हृदय का सूखापन मिटना

27:23 (प्रसंग) भगवान नाम से प्रेम जागना
27:34 (प्रसंग) भजन को टालने की प्रवृत्ति

27:44 (दृष्टांत) अंग्रेज तहसीलदार और घोड़े की कथा
27:53 (दृष्टांत) घोड़े का खटखट से डरना

28:02 (दृष्टांत) पानी पिलाने की घटना
28:11 (संवाद) किसान और तहसीलदार का संवाद

28:20 (संवाद) खटखट बंद करने की मांग
28:29 (संवाद) किसान का उत्तर

28:37 (दृष्टांत) खटखट चालू होने पर पानी मिलना
28:44 (प्रसंग) कार्य करते हुए ही साधना करना

28:51 (प्रसंग) जीवन के बीच भजन करने का संदेश

29:00 (प्रसंग) साधकों को नाम स्मरण का संदेश
29:09 (कीर्तन) कृष्ण कन्हैया की जय

29:17 (कीर्तन) कथा में आनंद का वर्णन
29:24 (कीर्तन) हरि हरि बोल का उच्चारण

29:34 (प्रसंग) हरि बोल से चेतना ऊपर उठना
29:41 (प्रसंग) गौरांग महाप्रभु का कीर्तन

29:47 (दृष्टांत) मीरा के कीर्तन में अकबर का जाना

29:58 (प्रसंग) प्रेम की एक बूंद का महत्व
30:07 (प्रसंग) बाहरी सुख से आंतरिक तृप्ति न होना
30:16 (प्रसंग) प्रेम प्रसाद के बिना जीवन में अधूरापन

30:16 (प्रसंग) संसार में घूमने के बाद भी प्रेम की आवश्यकता का वर्णन
30:24 (प्रसंग) विदेशों से घूमकर अंत में साईं प्रेम की प्याली की आवश्यकता
30:31 (प्रसंग) परमात्मा प्रेम की सबको आवश्यकता — धनी, निर्धन, स्त्री, पुरुष

30:39 (दृष्टांत) अमेरिका में लोग बिल्ली-कुत्तों को प्रेम से खिलाते हैं
30:48 (प्रसंग) भारतवासियों का राम-कृष्ण को मक्खन-मिश्री अर्पण करने का सौभाग्य
30:56 (प्रसंग) भगवान को अर्पण किए बिना खाने की प्रवृत्ति पर संकेत
31:04 (प्रसंग) जो भगवान को प्रेम नहीं करते वे संसार में आसक्ति करते हैं
31:12 (प्रसंग) स्वार्थपूर्ण प्रेम और पवित्र प्रेम का अंतर
31:19 (प्रसंग) स्वार्थ के कारण प्रेम का विकृत रूप

31:29 (भजन) नारायण नारायण का उच्चारण

31:35 (प्रसंग) व्यवहार में धैर्य और समझ जोड़ने का उपदेश
31:45 (प्रसंग) संसार की वस्तुओं की क्षणभंगुरता पर चिंतन

31:53 (काव्य) संसार की नश्वरता पर काव्यात्मक पंक्तियाँ
32:00 (काव्य) महलों और वैभव के नष्ट होने का वर्णन
32:08 (काव्य) यश और वैभव के न टिकने का संकेत
32:17 (काव्य) संसार के दृश्य नज़ारों की नश्वरता
32:23 (काव्य) मानव को मिले तन रूपी रत्न का स्मरण

32:31 (प्रसंग) मनुष्य का अहंकार और अपनेपन का भ्रम
32:38 (प्रसंग) घर, मकान, दुकान, धन को अपना मानने की भूल
32:48 (प्रसंग) सब कुछ भगवान का है यह सत्य
32:56 (प्रसंग) यह समझ आने पर प्रेमपूर्ण व्यवहार का आरंभ

33:06 (प्रसंग) “हमारा-हमारा” भाव से आत्मा का नुकसान
33:12 (काव्य) मानव की भूल पर पुनः चेतावनी
33:19 (काव्य) संसार के मोह में उलझने का वर्णन
33:26 (काव्य) अंत में मृत्यु और कफ़न का अनिश्चित होना

33:32 (प्रसंग) मृत्यु की अनिश्चितता का स्मरण
33:40 (प्रसंग) जीवन की यात्रा का अचानक समाप्त होना

33:49 (प्रसंग) ट्रेन और यात्रा के उदाहरण से जीवन की अनिश्चितता
33:58 (प्रसंग) बस और विमान के निश्चित समय का उदाहरण
34:06 (प्रसंग) मनुष्य जीवन के प्रस्थान का अनिश्चित होना
34:16 (प्रसंग) शरीर की यात्रा कब समाप्त हो जाए पता नहीं

34:25 (दृष्टांत) बस से उतरते ही मृत्यु का उदाहरण
34:34 (दृष्टांत) बीमार व्यक्ति के अचानक मृत्यु का उदाहरण
34:43 (दृष्टांत) कथा में मिले व्यक्ति की अचानक मृत्यु

34:49 (प्रसंग) जीवन का अचानक समाप्त होना
34:58 (प्रसंग) मृत्यु की अनिवार्यता

35:06 (प्रसंग) मृत्यु निश्चित है इसलिए प्रेम करना आवश्यक
35:13 (प्रसंग) शरीर के चलने से पहले आत्मिक यात्रा प्रारंभ करने का उपदेश
35:21 (प्रसंग) आत्मा की अचल अवस्था प्राप्त करने का संदेश

35:29 (श्लोक) तेषाम सततयुक्तानाम का उच्चारण
35:45 (श्लोक) भजताम प्रीति पूर्वकम का जप
36:00 (श्लोक) ददामि बुद्धियोगं तम का जप
36:20 (श्लोक) येन मामुपयान्ति ते का जप

36:36 (प्रसंग) मंदिर में जाते समय अहंकार छोड़ने का उपदेश
36:48 (प्रसंग) मंदिर में खाली मन से प्रवेश करने का संदेश
36:58 (प्रसंग) “मैं भगवान का हूँ” ऐसा भाव रखने का निर्देश

37:06 (प्रसंग) मूर्ति दर्शन के तीन स्तरों का वर्णन
37:13 (प्रसंग) भौतिक दृष्टि से मूर्ति पत्थर लगना
37:23 (प्रसंग) दैविक दृष्टि से भगवान का रूप देखना

37:31 (प्रसंग) सनातन धर्म की अद्भुत परंपरा का वर्णन
37:37 (प्रसंग) गणपति या शिव की मूर्ति बनाकर पूजा करने की परंपरा
37:47 (प्रसंग) पूजा के बाद मूर्ति का विसर्जन

37:55 (दृष्टांत) गुड़ के गणपति बनाने वाले भक्त की कथा
38:04 (दृष्टांत) पत्नी के न होने पर ब्राह्मण का उपाय
38:11 (दृष्टांत) गुड़ से भगवान को भोग लगाने का उपाय
38:20 (दृष्टांत) गणपति के पेट से गुड़ निकालकर भोग लगाना

38:27 (मंत्र) पानाय स्वाहा आदि मंत्रोच्चार
38:33 (मंत्र) पूजा मंत्रों का उच्चारण

38:42 (प्रसंग) भगवान को बुलाने-विदा करने की अज्ञानता का स्वीकार
38:51 (प्रसंग) अहंकार मिटाने के लिए मूर्ति पूजा की व्यवस्था

39:00 (प्रसंग) सुपारी या गुड़ के भगवान में भी भगवद्-भाव
39:07 (प्रसंग) पूजा से अहंकार ढीला करना

39:14 (प्रसंग) मूर्ति विसर्जन के बाद भी भगवान का न नाराज़ होना
39:22 (प्रसंग) भगवान और भक्त के बीच प्रेम का महत्व
39:30 (प्रसंग) ईगो हटाने के लिए पूजा की परंपरा

39:39 (प्रसंग) पुजारी और भक्त दोनों का भाव
39:46 (प्रसंग) भगवान का भाव प्रधान होना

39:54 (कथा) युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण की कथा प्रारंभ
40:03 (कथा) युद्ध के बाद युधिष्ठिर का राजगद्दी से विरक्ति
40:10 (कथा) तप करने जाने की इच्छा
40:17 (कथा) श्रीकृष्ण का समझाना

40:25 (कथा) कलियुग आने की चेतावनी
40:32 (कथा) युधिष्ठिर को समझाने का प्रयास

40:39 (कथा) पाँचों पांडवों को वन में अनुभव करने भेजना
40:48 (कथा) पांडवों के अलग-अलग अनुभव

40:55 (दृष्टांत) युधिष्ठिर द्वारा दो सूंड वाला हाथी देखना
41:05 (दृष्टांत) भीम द्वारा गाय का बछड़े को अत्यधिक चाटना
41:14 (दृष्टांत) अर्जुन द्वारा शास्त्र लिखे पंखों वाला पक्षी देखना
41:23 (दृष्टांत) पक्षी का मांस खाना

41:32 (दृष्टांत) चारों ओर कुएँ और बीच का सूखा कुआँ
41:40 (दृष्टांत) पाँचवें भाई द्वारा पहाड़ से लुढ़कती चट्टान

41:48 (दृष्टांत) चट्टान का पेड़ों से टकराना
41:56 (दृष्टांत) चट्टान का दूसरी चट्टानों से टकराना
42:04 (दृष्टांत) चट्टान का छोटे पौधे से रुक जाना

42:13 (प्रसंग) पाँचों पांडवों का कृष्ण के पास लौटना
42:22 (प्रसंग) आश्चर्यों का वर्णन

42:29 (प्रसंग) दो सूंड वाले हाथी का अर्थ — भ्रष्ट शासक
42:37 (प्रसंग) नौकरी और रिश्वत दोनों से कमाई

42:45 (प्रसंग) गाय-बछड़े का अर्थ — अति मोह में फँसा मनुष्य
42:58 (प्रसंग) बच्चों के प्रति अत्यधिक मोह

43:07 (प्रसंग) बच्चों पर निर्भरता का खतरा
43:13 (प्रसंग) परमात्मा पर भरोसा रखने का उपदेश
43:22 (प्रसंग) धन-कमाई पर अधिक भरोसा न रखने का संदेश

43:30 (प्रसंग) शरीर से सेवा और मन से भक्ति का उपदेश

43:40 (प्रसंग) दिखावे में धन खर्च करने की प्रवृत्ति
43:49 (प्रसंग) पड़ोसी की भूख की उपेक्षा

43:58 (प्रसंग) कलियुग के मनुष्य के लक्षण

44:06 (प्रसंग) शास्त्र बोलने वाले लेकिन स्वार्थी लोग
44:15 (प्रसंग) पंडित-मौलवी का स्वार्थी आचरण

44:23 (प्रसंग) विरले संतों का मिलना
44:29 (प्रसंग) कलियुग में धर्म का पतन

44:36 (प्रसंग) चट्टान का अर्थ — मनुष्य का पतन
44:45 (प्रसंग) धन और सत्ता का रोक न पाना

44:53 (प्रसंग) भगवान के नाम का छोटा पौधा ही रोकता है

45:02 (कथा) रावण और कुंभकर्ण संवाद
45:08 (कथा) सीता हरण की चर्चा
45:17 (कथा) राम का रूप धारण करने की सलाह

45:26 (कथा) रावण का राम चिंतन अनुभव
45:36 (कथा) राम का चिंतन करने से दृष्टि बदलना

45:44 (प्रसंग) भगवान के चिंतन से विकार का परिवर्तन

45:51 (प्रसंग) भारत में जन्म का सौभाग्य
46:00 (प्रसंग) सनातन धर्म में जन्म का महत्व

46:08 (प्रसंग) श्रद्धा का दीप जलना
46:16 (प्रसंग) ठाकुर जी के दर्शन का सौभाग्य

46:23 (प्रसंग) सत्संग से अंतःकरण की यात्रा

46:32 (कथा) ब्रह्मज्ञानी संत और रोहित की कथा प्रारंभ
46:41 (कथा) रोहित का पिता के साथ संत के पास जाना
46:50 (कथा) पिता के देहांत के बाद रोहित का न आना

46:58 (प्रसंग) संत का संसार में पड़ने और प्रेम में तरने का अंतर

47:08 (प्रसंग) विवेकपूर्वक संसार में रहने का संदेश
47:16 (प्रसंग) विवाह और धन कमाने की अनुमति

47:24 (प्रसंग) विकारों पर अधिकार रखने का उपदेश

47:32 (प्रसंग) भगवान के प्रेम से बुद्धियोग मिलना

47:39 (दृष्टांत) वल्लभाचार्य और श्रीनाथजी की कथा
47:47 (दृष्टांत) भगवान द्वारा दूध स्वीकार करना

47:56 (दृष्टांत) नरो नाम की लड़की का प्रेम

48:04 (दृष्टांत) भगवान द्वारा उसका दूध स्वीकार करना

48:13 (प्रसंग) प्रेम से पत्थर में भी भगवान प्रकट होना

48:21 (प्रसंग) भगवान को प्रतिमा में देखने का सौभाग्य

48:30 (प्रसंग) सुबह-शाम भगवान से संबंध जोड़ने का उपदेश

48:39 (प्रसंग) रात को भगवान के चरणों में सोने का भाव

48:47 (प्रसंग) वैकुंठ भाव में सोने का संदेश

48:55 (प्रसंग) भगवान को माँ की गोद जैसा मानना

49:04 (प्रसंग) बुद्धियोग प्राप्त होने का संकेत

49:14 (कथा) रोहित की शादी और संत की याद
49:22 (कथा) विवाह के तीन फेरे के बाद रुकना
49:29 (कथा) विवाह स्थगित कर संत के पास जाना

49:35 (कथा) यात्रा में धर्मशाला में रुकना
49:44 (कथा) वासना का प्रलोभन

49:51 (कथा) कमरे के बाहर पहरेदार का दर्शन

50:00 (कथा) बार-बार पहरेदार का दिखना

50:08 (प्रसंग) सूर्य नमस्कार से बुद्धि का विकास

50:17 (कथा) गुरु के पास पहुँचना

50:25 (कथा) गुरु को पूरी घटना बताना

50:35 (कथा) गुरु का रात को पहरेदार बनकर रक्षा करना

50:42 (प्रसंग) संत-प्रेम से रक्षा होना

50:49 (प्रसंग) वस्तुओं से प्रेम करने का निष्फल होना

50:57 (प्रसंग) भगवान और संत से प्रेम का महत्व

51:13 (भजन) अब प्रभु कृपा करो यही भाँति

51:39 (भजन) अब मोहे भाव भरोस हनुमंता

51:54 (भजन) जय सियाराम जय जय सियाराम

52:04 (भजन) एक घड़ी आधी घड़ी

52:13 (भजन) तुलसी संगत साध की

52:31 (भजन) राम परवाना भेजिया

52:49 (भजन) वैकुंठ में साध संगत का महत्व

52:57 (भजन) जय सियाराम जय जय सियाराम



रविवार, 15 मार्च 2026

07-03-2026 शाम | Surat 1990 ( परमात्मा का क्षीण घन स्वप्न और जाग्रत अवस्था )

 आश्रम संध्या सत्संग 07-03-2026 शाम |  Surat 1990 Ashram Sandhya

TIME STAMP INDEX 

00:02 (प्रसंग) सौराष्ट्र में प्रवचन के बाद प्रोफेसर का प्रश्न – सब में एक परमात्मा होने पर शंका
00:11 (संवाद) प्रोफेसर का प्रश्न कि यदि सब में एक आत्मा है तो एक के मरने पर सब मर क्यों नहीं जाते
00:19 (संवाद) प्रोफेसर होने से आध्यात्मिक समझ होना आवश्यक नहीं
00:27 (संवाद) एक आत्मा होने पर एक के सुख-दुख सबको होने का तर्क
00:35 (संवाद) स्वामीजी द्वारा प्रोफेसर के तर्क पर दया और हंसी

00:59 (दृष्टांत) बिजली और बल्ब का उदाहरण – बल्ब अलग पर करंट एक
01:08 (दृष्टांत) अलग-अलग कमरों के बल्ब पर एक ही बिजली का प्रवाह
01:17 (दृष्टांत) पौधा छोटा और वृक्ष बड़ा पर सूर्य की किरण एक
01:26 (दृष्टांत) शरीर और बुद्धि अलग लेकिन प्रेरक चैतन्य एक

01:43 (उपदेश) “एक नूर ते सब जग उपजा” का सिद्धांत
01:50 (उपदेश) अनन्य भावना से भगवान की पूजा करने वाला शीघ्र भगवत पद पाता है

02:05 (उपदेश) सात्विक, राजसी और तामसी भोजन का वर्णन
02:12 (उपदेश) बासी या अपवित्र भोजन तामसी भोजन
02:19 (उपदेश) अत्यधिक मसालेदार और तला भोजन राजसी भोजन
02:28 (उपदेश) प्रसन्न चित्त से बनाया गया भोजन सात्विक भोजन
02:37 (प्रसंग) पहले माताएं प्रभात में भगवान का नाम लेकर आटा पीसती थीं
02:47 (उपदेश) भोजन बनाते समय चित्त प्रसन्न और पवित्र होना चाहिए
02:54 (उपदेश) टीवी या अशांत वातावरण में भोजन बनाने का दुष्प्रभाव

03:03 (उपदेश) कलह देखने और सुनने से जीवन में कलह बढ़ती है
03:12 (उपदेश) झगड़ों से पार कराने वाला ज्ञान आवश्यक
03:20 (उपदेश) अशांति और पाप मिटाने वाला सत्संग प्राप्त करने का प्रयास
03:30 (उपदेश) जीवन समाप्त होने से पहले जीवनदाता परमात्मा में विश्राम पाने का प्रयास
03:38 (उपदेश) बाहरी आराम से बड़ा आत्मा से मिलन का आनंद

03:59 (तत्वज्ञान) आंख, कान, वाणी, मन और बुद्धि परमात्मा की शक्ति से कार्य करते हैं
04:08 (तत्वज्ञान) दृश्य और विचार बदलते हैं पर देखने वाला आत्मा अचल है
04:24 (शास्त्र) आत्मा ब्रह्म स्वरूप है – “अय आत्मा ब्रह्म”

04:32 (दृष्टांत) बल्ब और पंखे बदलने पर भी पावर हाउस एक
04:39 (दृष्टांत) सूर्य एक और पौधे अनेक
04:46 (दृष्टांत) सब जीव एक ही चैतन्य परमात्मा से जुड़े

05:02 (उपदेश) ऐसे चिंतन से मनुष्य शीघ्र धर्मात्मा बनता है

05:10 (उपदेश) दान के प्रकार – ध्रुव दान का वर्णन
05:19 (उपदेश) ध्रुव दान – जिसमें सब प्राणियों को लाभ और बदले की अपेक्षा नहीं
05:36 (उपदेश) चल दान – सीमित लाभ और फल की अपेक्षा
05:50 (उपदेश) भयजनक दान – डर के कारण किया गया दान
06:04 (उपदेश) राजनैतिक स्वार्थ से किया गया दान
06:21 (उपदेश) श्रेष्ठ दान हृदय और धन दोनों को शुद्ध करता है
06:35 (उपदेश) दान करते समय अहंकार नहीं रखना चाहिए
06:43 (उपदेश) भगवान की वस्तु भगवान के कार्य में लगाना ही सात्विक दान

07:07 (उपदेश) सब कुछ संसार में छूटने वाला है
07:14 (उपदेश) बहुजन हिताय के लिए त्याग करना दान है
07:24 (शास्त्र) कलियुग में दान का विशेष महत्व
07:33 (उपदेश) सांत्वना देना और विद्या देना भी दान है
07:41 (उपदेश) सर्वोत्तम दान – भगवान के प्रेम और भक्ति का दान

07:59 (उपदेश) सात्विक, राजस और तामस कर्म का फल
08:06 (उपदेश) कर्म भगवान को अर्पण करने से भगवान की प्राप्ति
08:13 (उपदेश) अपने और दूसरों में भगवान देखने वाला अनन्य भक्त
08:22 (शास्त्र) भगवान भक्त के योग-क्षेम का भार उठाते हैं

08:36 (दृष्टांत) लोभी आदमी का कुएं में गिरने का प्रसंग
08:44 (दृष्टांत) “हाथ दो” कहने पर भी लोभी का हाथ न देना
08:52 (दृष्टांत) साधु द्वारा “मेरा हाथ ले लो” कहने पर बाहर आना
09:09 (दृष्टांत) लोभी का जीवन और मृत्यु का प्रसंग
09:24 (दृष्टांत) लोभी का सेवक और धन के प्रति आसक्ति
09:40 (दृष्टांत) लोभी का मरते समय भी त्याग न करना

09:49 (उपदेश) भगवान का भक्त अहंकार और कर्तापन छोड़ देता है
09:57 (उपदेश) बच्चा जैसे मां की गोद में निश्चिंत होता है वैसे भक्त भगवान में निश्चिंत
10:07 (शास्त्र) “करण करावनहार स्वामी” – परमात्मा ही कर्ता

10:22 (उपदेश) दिन के कर्मों का रात को भगवान को समर्पण
10:29 (उपदेश) गलती के लिए क्षमा और अगले दिन सुधार की प्रार्थना
10:38 (उपदेश) भगवान की गोद में सोने जैसा भाव लेकर सोना
10:47 (उपदेश) ऐसा चिंतन करने से नींद भी बंदगी बन जाती है

11:04 (उपदेश) सुबह उठकर शरीर को खींचना और ढीला छोड़ना
11:12 (उपदेश) प्राणशक्ति को संतुलित करना
11:20 (उपदेश) दिन प्रसन्नता से बिताने का संकल्प

11:28 (दृष्टांत) गुजराती कहावत – दाल बिगड़ी तो दिन बिगड़ा
11:37 (दृष्टांत) समझ बिगड़ी तो जीवन बिगड़ता है
11:46 (दृष्टांत) सोक्रेटिस और उसकी पत्नी का प्रसंग
12:04 (दृष्टांत) पत्नी द्वारा सोक्रेटिस को अपमानित करना
12:21 (दृष्टांत) सोक्रेटिस का शांत और विचारशील स्वभाव
12:37 (दृष्टांत) पत्नी द्वारा गंदा पानी सिर पर डालना
13:01 (दृष्टांत) सोक्रेटिस का हंसकर प्रतिक्रिया देना

13:17 (उपदेश) परिवार में सभी की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए
13:26 (उपदेश) घर में तनाव का कारण अहंकार
13:34 (उपदेश) कलियुग में परिवारों में कलह

13:58 (उपदेश) सत्संग से मन की शांति
14:05 (उपदेश) भगवान के नाम और संतों के सानिध्य का प्रभाव
14:23 (उपदेश) काम, क्रोध, लोभ, मोह से गिरता मन
14:39 (उपदेश) सत्संग मन को संभालता है

14:54 (उपदेश) गीता सुनने और समझने वालों का सौभाग्य
15:01 (उपदेश) गीता के प्रसाद से दुखों का नाश
15:10 (उपदेश) हरिनाम कीर्तन से हृदय में प्रसाद जागृत होता है

15:42 (शास्त्र) गुरु नानक वचन – सतगुरु मिलने से जन्मों की मल धुलती है

15:49 (उपदेश) संतों के साथ हरि जस गाने का महत्व
16:05 (उपदेश) संतों के साथ कीर्तन और भक्ति का महत्व

16:31 (उपदेश) संत निंदा का दुष्परिणाम
16:39 (उपदेश) संत निंदा से कुल का नाश
16:47 (उपदेश) राम नाम और सत्संग से जीवन का कल्याण

17:03 (शास्त्र) संत निंदक पर नानक का वचन
17:13 (प्रसंग) प्राचीन काल में राजाओं द्वारा ब्रह्मज्ञान का प्रचार
17:20 (प्रसंग) यमराज का ब्रह्मा जी के पास जाना
17:28 (प्रसंग) ब्रह्मज्ञानी संतों के कारण नरक खाली होना
17:36 (प्रसंग) ब्रह्मा जी का समाधान

18:00 (प्रसंग) ब्रह्मज्ञानी संतों के निंदक और प्रशंसक का परिणाम
18:17 (उपदेश) संत निंदक का पतन और संत भक्त का उत्थान

19:30 (उपदेश) आत्मस्वरूप में स्थित होने का मार्ग
19:37 (शास्त्र) गीता ज्ञान की महिमा
19:44 (उपदेश) अर्जुन का मोह नष्ट होना

20:01 (उपदेश) भगवान कृष्ण का जीवन उदाहरण
20:09 (उपदेश) हृदय में भगवान की उपस्थिति

20:24 (तत्वज्ञान) वेदांत का सूक्ष्म ब्रह्मज्ञान
20:31 (शास्त्र) योग वशिष्ठ में परमात्मा की चार अवस्थाएं

20:49 (तत्वज्ञान) घन सुषुप्ति – जड़ जगत की अवस्था
21:03 (तत्वज्ञान) क्षीण सुषुप्ति – वृक्ष आदि की अवस्था
21:17 (तत्वज्ञान) स्वप्न अवस्था – चलने-फिरने वाले जीव
22:47 (तत्वज्ञान) जागृत अवस्था – भगवान का पूर्ण प्रकट स्वरूप

23:01 (प्रसंग) ब्रह्मा जी की सभा में भगवान के निवास पर चर्चा
23:10 (शास्त्र) “हरि व्यापक सर्वत्र समाना”

23:20 (उपदेश) विभिन्न अवतारों का उद्देश्य
23:30 (उपदेश) मत्स्य, कच्छप, वामन अवतार का वर्णन
24:04 (उपदेश) राम अवतार – मर्यादा और प्रेम का संदेश
24:25 (उपदेश) दत्तात्रेय और कपिल अवतार – ब्रह्मज्ञान प्रचार

24:48 (उपदेश) कृष्ण अवतार – प्रेम का अवतार
25:10 (उपदेश) कृष्ण द्वारा प्रेम और व्यवहार की शिक्षा

25:28 (प्रसंग) राधाष्टमी और राधा का महत्व
25:45 (तत्वज्ञान) राधा – प्रेम धारा का प्रतीक

26:01 (दृष्टांत) प्रेम अवतार के प्रकट होने का उदाहरण
26:10 (प्रसंग) राधा और कृष्ण का प्रेम प्रसंग
26:24 (दृष्टांत) तोते को “धारा” सिखाने का प्रसंग

26:30 (भजन) प्रेम का संदेश – वेद पुराण से बढ़कर प्रेम

27:14 (उपदेश) परमात्मा सबके भीतर पूर्ण रूप से विद्यमान
27:23 (उपदेश) संतों और भक्तों में वही परमात्मा

27:44 (शास्त्र) “जिन खोजा तिन पाया”

28:01 (तत्वज्ञान) बाह्य विषयों में जाने पर प्रेम काम में बदल जाता है

28:09 (उपदेश) जड़ वस्तुओं में प्रेम एकांगी होता है
28:16 (उपदेश) धन, गाड़ी, मकान को चाहो लेकिन वे तुम्हें नहीं चाहते
28:25 (उपदेश) जड़ वस्तुओं में घन सुषुप्त अवस्था का भाव
28:34 (उपदेश) परमात्मा को चाहने पर परमात्मा भक्त को संतों और मंदिर तक पहुंचाता है

28:41 (प्रसंग) कम्युनिस्ट पिता और आस्तिक बेटे का प्रसंग
28:51 (संवाद) पिता का कहना कि मंदिर जाना समय की बर्बादी है
28:59 (संवाद) बेटे का उत्तर कि सत्संग से प्रसन्नता और सफलता मिलती है

29:13 (उपदेश) जीवन में आध्यात्मिकता न हो तो प्रेम सरिता नहीं खुलती
29:20 (उपदेश) प्रेम सरिता न खुले तो व्यवहार विष हो जाता है

29:30 (उपदेश) हरि नाम कीर्तन से मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर केंद्रों पर प्रभाव

29:44 (कीर्तन) संत नानक – संत जना मिल हरि जस गाइए
29:52 (कीर्तन) तुलसीदास – हरि व्यापक सर्वत्र समाना
30:01 (कीर्तन) ऋषि वचन – हरे नामव केवलम

30:10 (कीर्तन) हरे राम हरे कृष्ण महा मंत्र कीर्तन

30:24 (उपदेश) हरि नाम कीर्तन से सुषुप्त शरीर में चेतना का प्रसार
30:32 (उपदेश) भाव और क्रिया की शुद्धि
30:38 (उपदेश) भाव और क्रिया शुद्ध होने पर ज्ञान का प्रकाश

30:45 (उपदेश) सिख धर्म का पहला ग्रंथ जप जी का महत्व

31:00 (कथा) गुरु नानक का नदी में लीन होना
31:08 (कथा) तीन दिन तक नानक जी का अदृश्य रहना
31:18 (कथा) भीतर की सरिता में आत्मानुभव का संकेत
31:31 (कथा) नानक जी का प्रकट होकर “एक ओंकार” का उपदेश देना

31:57 (उपदेश) ओंकार परमात्मा की स्वाभाविक ध्वनि है
32:14 (उपदेश) जन्म लेते समय बच्चे की ध्वनि ओंकार से मिलती है
32:30 (उपदेश) ओंकार और परमात्मा की शांति से रोगी को राहत मिलती है

32:45 (उपदेश) आत्मा के जितने निकट रहोगे उतनी सफलता और प्रसन्नता
33:01 (उपदेश) बाहरी आसक्ति से तनाव और अशांति बढ़ती है

33:09 (दृष्टांत) सुकरात और सूअर का उदाहरण
33:26 (उपदेश) जीवन केवल पेट भरने के लिए नहीं, सत्य अनुभव के लिए है
34:08 (संवाद) मित्रों का कहना कि निश्चिंत सूअर होना बेहतर है
34:18 (संवाद) सुकरात का उत्तर कि विचारक होकर परम पद पाना श्रेष्ठ है

34:27 (उपदेश) चिंतन अंत में पूर्ण निश्चिंतता देता है
34:36 (उपदेश) धन, सत्ता, सौंदर्य की शराब से नहीं हरि नाम से निश्चिंतता

35:11 (प्रसंग) कम्युनिस्ट पिता और बेटे की दूसरी चर्चा
35:19 (संवाद) पिता का कहना कि भगवान नहीं है
35:28 (संवाद) बेटे का तर्क कि सृष्टि में व्यवस्था संचालक का संकेत देती है

36:00 (संवाद) पिता का तर्क कि संसार गति और गर्मी से चलता है

36:34 (दृष्टांत) बेटे का युक्ति से पिता को समझाने का विचार
37:03 (दृष्टांत) बेटे का चित्र बनाकर उदाहरण देना
37:20 (संवाद) पिता को चित्र से तर्क समझाना
38:10 (संवाद) पिता का मानना कि बनाने वाला कोई होगा
38:33 (प्रसंग) पिता का बेटे की बात से प्रभावित होकर मंदिर जाने की अनुमति देना

39:03 (उपदेश) कृष्ण अवतार प्रेम प्रकट करने का विशेष अवतार है
39:25 (उपदेश) राम नाम और कृष्ण नाम का वैदिक महत्व
39:42 (उपदेश) कृष्ण का अर्थ – आकर्षित करने वाला

39:52 (कथा) कृष्ण की गोपियों के साथ प्रेम लीला

41:10 (कथा) वृंदावन की नाटक कंपनियों में कृष्ण मुकुट पर विवाद
41:35 (प्रसंग) मुकुट दाईं या बाईं ओर झुका होने पर मुकदमा
41:49 (प्रसंग) न्यायाधीश का निर्णय कि मुकुट सीधा बांधा जाए
42:04 (उपदेश) कृष्ण की पूजा न्यायालय से नहीं प्रेम से चलती है

42:28 (कथा) गोपी का कृष्ण से प्रेमपूर्ण उलाहना
42:52 (कथा) कृष्ण का गोपी के तगारे उठवाना
43:31 (संवाद) कृष्ण का मक्खन के बदले तगारा उठाने की लीला
43:57 (कथा) गोपी का कृष्ण को गोबर के टिल्ले लगाने का प्रेम प्रसंग

44:12 (उपदेश) कृष्ण प्रेम अवतार का अद्भुत उदाहरण
44:30 (प्रसंग) कृष्ण का अर्जुन का सारथी बनना

45:01 (उपदेश) कृष्ण जीवनभर मुस्कुराने का आदर्श
45:24 (उपदेश) सुबह कुछ समय हंसने से स्वास्थ्य और प्रसन्नता
45:30 (उपदेश) प्रसन्नता से बुद्धि में प्रकाश

45:42 (उपदेश) यश और प्रेम बांटने की चीज हैं
45:52 (उपदेश) दुख को पैरों तले कुचलना चाहिए

46:01 (उपदेश) अपनी परेशानी से दूसरों का मूड खराब नहीं करना चाहिए
46:33 (उपदेश) दुख सुनाना हो तो ज्ञान से और सुख सुनाना हो तो प्रेम से

46:49 (उपदेश) व्यवहार में कुशलता भी एक प्रकार का यज्ञ है
46:58 (उपदेश) किसी के दिल को चोट कम पहुंचे ऐसा व्यवहार भी यज्ञ है
47:07 (उपदेश) किसी की खुशी बढ़ाने वाला व्यवहार भी यज्ञ है
47:14 (उपदेश) सब यज्ञों में जप यज्ञ श्रेष्ठ है

47:23 (दृष्टांत) दुर्घटना की खबर समझदारी से सुनाने का उदाहरण

48:17 (कथा) कृष्ण का मक्खन खाने का प्रसंग
48:35 (संवाद) घंटियों से कृष्ण का प्रश्न
48:44 (संवाद) घंटियों का उत्तर कि भगवान स्वयं भोग लगाएं तो घंटी बजती है

49:18 (प्रसंग) मदन मोहन मालवीय और उनकी माता का आशीर्वाद प्रसंग
50:22 (प्रसंग) मालवीय जी द्वारा हनुमान प्रसाद पोद्दार को दी गई कुंजी

51:08 (उपदेश) किसी से मिलने से पहले चार बार नारायण स्मरण का मंत्र
51:34 (उपदेश) हर व्यक्ति में नारायण को देखकर व्यवहार करना

52:08 (उपदेश) व्यवहार से पहले नारायण स्मरण का अभ्यास
52:47 (उपदेश) घर के झगड़े को नारायण स्मरण से शांत करना

53:03 (उपदेश) हरि नाम से घर का झगड़ा भी भक्ति बन सकता है
53:23 (उपदेश) हरि नाम सरल और सबके लिए सुलभ साधना है
53:38 (उपदेश) हरि नाम से भाव केंद्र विकसित होता है

53:47 (उपदेश) रावण में क्रिया शक्ति अधिक लेकिन भाव शुद्ध नहीं
54:06 (उपदेश) राम और कृष्ण में भाव, ज्ञान और क्रिया का संतुलन

54:13 (उपदेश) भाव और ज्ञान शक्ति से क्रिया भगवान की सेवा बनती है
54:22 (उपदेश) भाव शुद्ध न हो तो क्रिया शक्ति नुकसान करती है

55:04 (उपदेश) शिक्षा और दीक्षा का अंतर
55:21 (उपदेश) दीक्षा जीवन की दिशा तय करती है
55:38 (उपदेश) सही दिशा हो तो थोड़ी शक्ति भी लोकहित करती है

56:01 (उपदेश) कृष्ण को जगतगुरु के रूप में स्वीकार

56:26 (प्रसंग) उद्धव का वृंदावन से लौटकर कृष्ण से संवाद
56:45 (दृष्टांत) कृष्ण के हृदय में राधा प्रेम का अनुभव

57:03 (उपदेश) राधात्व देखने से प्रेम शुद्ध होता है
57:12 (उपदेश) संयमित जीवन से तेजस्वी संतति और समाज का कल्याण




परमात्म तत्व का गूढ़ ज्ञान सरल से सरल शब्दों में

 

परमात्म तत्व का गूढ़ ज्ञान सरल से सरल शब्दों में

 0:03 (उपदेश) चार वेद और चार उपवेद — असली स्वरूप के ज्ञान और अनुभव का उद्देश्य

0:09 (उपदेश) असली स्वरूप का व्यवहारिक आनंद
0:15 (उपदेश) ज्ञान, कर्म, भक्ति, दान, पुण्य, सेवा से आत्मज्ञान
0:24 (उपदेश) वेदों के अनुसार चिंतन करने से दुख का अभाव
0:36 (उपदेश) शास्त्रानुसार जीवन से दुख नहीं मिलता
0:43 (उपदेश) असली स्वरूप में दुख का अभाव
0:54 (उपदेश) दुख का मूल कारण — असली स्वरूप की पहचान का अभाव

1:01 (उपदेश) असली स्वरूप में दुख नहीं मिलता
1:11 (उपदेश) असली स्वरूप की पहचान और प्रेम का अभाव
1:16 (उपदेश) नकली स्वरूप को ‘मैं’ मानने की भूल
1:22 (उपदेश) शरीर को ‘मैं’ और वस्तुओं को ‘मेरा’ मानना

1:40 (शास्त्र वचन) श्रीकृष्ण — अज्ञान से ज्ञान ढक जाता है
1:48 (शास्त्र वचन) अज्ञान से मनुष्य मोहित हो जाता है
1:56 (उपदेश) अज्ञान से उल्टा ज्ञान और भटकाव

2:01 (उपदेश) तीर्थों में भटकना — ब्रह्मज्ञान के बिना समाधान नहीं
2:13 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान असली वस्तु को प्रकट करता है
2:26 (उपदेश) जगत का ज्ञान नकली वस्तुओं का ज्ञान है
2:31 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान की महिमा

2:43 (उपदेश) भगवान के दर्शन से भी दुख नहीं मिटते
2:53 (उपदेश) भगवान के स्वरूप और अपने स्वरूप का ज्ञान — ब्रह्मज्ञान
3:00 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान से दुख टिक नहीं सकता
3:07 (उपदेश) संसार का ज्ञान मृत्यु और राग-द्वेष से नहीं बचाता
3:14 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान के आगे राग-द्वेष और मृत्यु का प्रभाव नहीं
3:25 (उपदेश) मृत्यु शरीर की होती है
3:34 (उपदेश) सुख-दुख मन में होते हैं

4:02 (उपदेश) सबको जानने वाला आत्मा ज्योति स्वरूप है
4:13 (उपदेश) शरीर, मन और बुद्धि का साक्षी आत्मा

4:22 (उपदेश) श्वास और शरीर के परिवर्तन का साक्षी आत्मा
4:29 (उपदेश) सब बदलता है पर आत्मा अमिट है
4:39 (उपदेश) बचपन की अवस्थाएँ मिट गईं
4:48 (उपदेश) बचपन को जानने वाला आत्मा वही है
4:54 (उपदेश) चैतन्य ‘सोहम’ स्वरूप का बोध
5:01 (उपदेश) दुख-सुख और अवस्थाएँ बदलती हैं
5:08 (उपदेश) जो नहीं बदलता वही असली ‘मैं’ है
5:18 (उपदेश) श्वास में ‘सो-हम’ आत्मचिंतन

5:39 (शास्त्र वचन) गुरु नानक — नाम रस में स्थित रहना
5:47 (उपदेश) आत्मा में स्थित रहने से दुख नहीं दिखता
5:57 (उपदेश) आत्मज्ञान और उसकी स्मृति का महत्व

6:05 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान का भाषण करना महापुरुष का लक्षण नहीं
6:15 (उपदेश) विद्वान लोग भाषण कर सकते हैं
6:24 (उपदेश) वेदांत भाषण करने वाले अनेक हैं
6:31 (उपदेश) सच्चे ब्रह्मज्ञानी दुर्लभ होते हैं
6:42 (उपदेश) नानक जैसे ब्रह्मज्ञानी दुर्लभ

6:57 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान का भाषण और कथा करना अच्छा है

7:05 (उपदेश) ब्रह्मस्वरूप में तृप्ति प्राप्त करना दुर्लभ
7:11 (शास्त्र वचन) नानक वचन — करोड़ों में कोई एक जानने वाला
7:17 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान अत्यंत ऊँची वस्तु
7:24 (उपदेश) कठिन नहीं, उसकी भूख लगना कठिन

7:31 (उपदेश) विवेक से आत्मज्ञान की भूख जागती है
7:39 (उपदेश) जो पाया है वह छूट जाएगा
7:48 (उपदेश) मृत्यु सबको छीन लेती है

7:55 (शास्त्र वचन) “आद सत, जुगाद सत…” परमात्मा की नित्य सत्ता

8:04 (उपदेश) परमात्मा सदा सत्य है
8:11 (उपदेश) शरीर मरने के बाद भी परमात्मा सत्य
8:20 (उपदेश) संसार परिवर्तनशील है
8:30 (उपदेश) प्राण और शरीर छूट जाएंगे
8:39 (उपदेश) आत्मा और परमात्मा का संबंध नहीं टूटता
8:48 (उपदेश) परमात्मा में शांति पाना
8:56 (उपदेश) इस चिंतन का अभ्यास करने का लाभ

9:05 (उपदेश) ब्रह्मज्ञान का चिंतन कठिन नहीं
9:13 (उपदेश) संसार स्वप्न समान है
9:22 (उपदेश) जो हो चुका, जो हो रहा और जो होगा — सब स्वप्न
9:30 (उपदेश) चेतन आत्मा साक्षी है
9:39 (उपदेश) संसार मिथ्या है
9:48 (उपदेश) परमात्मा ही सत्य है
9:57 (उपदेश) आत्मा-परमात्मा का संबंध पक्का करना

10:05 (उपदेश) दृढ़ निश्चय — मैं शरीर नहीं हूँ
10:13 (उपदेश) शरीर के बाद भी आत्मा का अस्तित्व
10:21 (उपदेश) चेतन आत्मा परमात्मा का अंश

10:32 (उपदेश) चेतन आत्मा सबको जानने वाली है
10:39 (उपदेश) अंग स्वयं को नहीं जानते
10:47 (उपदेश) चेतन आत्मा सबको जानती है
10:55 (उपदेश) आत्मा सत और चेतन है

11:05 (उपदेश) परमात्मा सत-चित-ज्ञान स्वरूप
11:14 (भजन) ओम, हरि ओम, आनंद ओम जप

11:28 (उपदेश) संसार और शरीर स्वप्न समान
11:33 (उपदेश) सत्य स्वरूप आत्मा अचल है
11:40 (उपदेश) संसार की वस्तुएँ जड़ हैं
11:48 (उपदेश) गलत मान्यताओं से दुख

12:00 (उपदेश) “मैं दुखी, मैं सुखी” — शरीर की पहचान
12:09 (उपदेश) जाति और पहचान शरीर की है
12:16 (उपदेश) शरीर को ‘मैं’ मानने की भूल
12:22 (उपदेश) आत्मा अमृत पुत्र है
12:29 (उपदेश) परमात्मा का अमृत पुत्र
12:36 (उपदेश) आत्मा ज्योति स्वरूप

12:43 (उपदेश) संसार में रहकर आत्मस्वरूप भूलना
12:50 (उपदेश) उम्र की पहचान भी काल्पनिक
12:59 (उपदेश) संसार नाटक समान

13:07 (उपदेश) संसार और शरीर मिथ्या
13:14 (उपदेश) परिवर्तनशील जगत का साक्षी आत्मा
13:20 (उपदेश) बचपन, जवानी, दुख-सुख बदलते हैं
13:30 (उपदेश) जानने वाला आत्मा स्थिर

13:45 (उपदेश) आत्मा ज्ञान स्वरूप
13:51 (उपदेश) आत्मा आनंद स्वरूप

14:03 (भजन) नारायण हरि परमात्मा स्मरण

14:13 (उपदेश) स्थान और प्रदेश की पहचान शरीर की
14:21 (उपदेश) असली पहचान आत्मा की
14:28 (उपदेश) शरीर संबंध अस्थायी

14:32 (उपदेश) आत्मा परम सत्य की संतान
14:42 (उपदेश) आत्मा अमर स्वरूप
14:48 (उपदेश) इस चिंतन से दुख मिटता है

15:01 (उपदेश) एकांत साधना का महत्व
15:12 (प्रसंग) नानक जी का 60 वर्ष में निवृत्ति उदाहरण
15:20 (प्रसंग) मिलना-जुलना कम करने की घोषणा
15:29 (उपदेश) अंतिम उपदेश — भीतर डूबने की प्रेरणा
15:39 (उपदेश) बाहरी व्यवहार कम करना
15:48 (उपदेश) सत्संग का उद्देश्य आत्मानुभव

16:04 (प्रसंग) बाहरी मिलन से अधिक भीतर मिलन
16:13 (उपदेश) सतस्वरूप में मिलन का संदेश
16:20 (उपदेश) भीतर के परमात्मा से मिलना
16:29 (उपदेश) बाहरी मुलाकात का आग्रह छोड़ना
16:36 (उपदेश) भीतर से मिलने की प्रेरणा
16:44 (उपदेश) भीतर का मिलन कभी नहीं टूटता

17:05 (उपदेश) शरीर बदलने वाला है
17:14 (उपदेश) आत्मा साक्षी स्वरूप
17:21 (उपदेश) मान्यताओं का बोझ छोड़ना
17:31 (उपदेश) जाति और अहंकार का त्याग
17:37 (उपदेश) संसार स्वप्न समान

17:45 (शास्त्र वचन) “राम गयो रावण गयो…” संसार की नश्वरता

17:57 (उपदेश) संसार अस्थायी स्वप्न है
18:07 (उपदेश) संसार को दिल में मत बसाओ
18:20 (उपदेश) परमात्मा में विश्राम

18:28 (उपदेश) आत्मविश्राम से शक्ति का संचय
18:37 (उपदेश) कल्पना और आलस्य से अलग चिंतन
18:47 (उपदेश) शांत होकर आत्मचिंतन

18:54 (उपदेश) अहंकार का त्याग
19:04 (उपदेश) समय बहुत कम है
19:12 (उपदेश) शरीर का भरोसा नहीं
19:21 (उपदेश) आत्मा अमर है

19:29 (उपदेश) जो मरेगा वह शरीर है
19:38 (उपदेश) दुख शरीर और मन में होता है
19:46 (उपदेश) आत्मा साक्षी है
19:53 (उपदेश) आत्मा दुख से अछूती है

20:00 (उपदेश) दुख को महत्व देने से वह बढ़ता है
20:08 (उपदेश) सत्य की शक्ति से दुख हटता है
20:17 (उपदेश) विकारों को महत्व देने से वे हावी होते हैं

20:27 (दृष्टांत) कुत्ते का उदाहरण — महत्व देने से पीछा करता है
20:34 (दृष्टांत) फिल्म का उदाहरण — महत्व देने से प्रभाव

20:42 (उपदेश) महत्व परमात्मा को देना
20:48 (उपदेश) संसार को अधिक महत्व देने से दुख
20:56 (उपदेश) सतस्वरूप परमात्मा को महत्व देना
21:03 (उपदेश) अकाल पुरुष को महत्व देना
21:11 (उपदेश) जो कभी साथ नहीं छोड़ता वही परमात्मा

21:18 (उपदेश) जो छूट जाएगा उसे सिर पर मत बैठाओ
21:28 (उपदेश) संसार का केवल उपयोग करो
21:36 (उपदेश) संसार क्षणिक है

22:01 (उपदेश) परमात्मा में डूबने से दूसरों का भी मंगल
22:10 (उपदेश) दर्शन से भी दूसरों का भला
22:19 (उपदेश) परमात्मा मंगलों का मंगल है
22:29 (उपदेश) परमात्मा ज्ञान तीर्थों को भी तीर्थ बनाता है

23:00 (उपदेश) परमात्मा महापुरुषों को महापुरुष बनाता है
23:09 (उपदेश) परमात्मा में प्रेम बढ़ाओ
23:18 (उपदेश) छल-कपट छोड़ो
23:30 (उपदेश) स्वयं सुखी रहो और दूसरों को सुख दो
23:39 (उपदेश) प्रेम और सूझबूझ से जीवन

23:47 (उपदेश) झगड़े छोड़कर आत्मा में स्थित होना
23:59 (भजन) ओम हरि हरि सच्चे साईं

24:55 (संवाद) “भगवान में मन नहीं लगता” प्रश्न

25:03 (उपदेश) पाँच मिनट भगवान के लिए बैठने का अभ्यास
25:12 (उपदेश) अकेले बैठकर रोना, हँसना या प्रार्थना
25:19 (उपदेश) परमात्मा से सच्चे मन की पुकार
25:28 (उपदेश) पाँच मिनट की सच्ची साधना से परिवर्तन
25:35 (उपदेश) घर में एक कमरा साधना के लिए

25:42 (उपदेश) अकेले होकर परमात्मा से मिलना
25:51 (उपदेश) सच्चे दिल की पुकार से कृपा

26:06 (उपदेश) संसार का बोझ मत उठाओ
26:15 (उपदेश) भगवान का रस पीने के लिए मानव जन्म
26:22 (उपदेश) भगवान का ज्ञान और आनंद पाना
26:31 (उपदेश) संसार में डूबना व्यर्थ

26:53 (संवाद) बाबा का संबोधन — बेटियों और बेटों को उपदेश

26:59 (उपदेश) संसार को स्वप्न मानो
27:11 (उपदेश) आत्मा को याद करो
27:21 (उपदेश) सच्चिदानंद को भूलना ही पतन

27:28 (उपदेश) सत्य को छोड़कर असत्य को ‘मैं’ मानना
27:40 (उपदेश) संसार मोह का प्रभाव
27:48 (उपदेश) गुरु के ज्ञान से कल्याण

28:03 (उपदेश) ब्रह्मज्ञानी गुरु की बात पकड़ना
28:13 (उपदेश) दृढ़ संकल्प करना
28:23 (उपदेश) उसी को पाना जो कभी न छूटे
28:29 (उपदेश) परम साथी परमात्मा को पाना
28:37 (उपदेश) दृढ़ इरादा करने से मार्ग मिलता है

28:56 (उपदेश) विचार के बाद मौन होना
29:16 (उपदेश) परमात्मा में डूबने की प्रार्थना

29:53 (प्रार्थना) चेतन देव और आत्म देव को संबोधन
30:02 (प्रार्थना) ज्ञान स्वरूप परमात्मा से शांति प्रार्थना

30:10 (उपदेश) ऐसा सुमिरन करना कठिन नहीं
30:19 (उपदेश) सात्त्विक आहार से शरीर स्वस्थ
30:28 (उपदेश) भारी और बासी भोजन से बचना

30:38 (उपदेश) वृद्धावस्था में आहार का प्रभाव
30:48 (उपदेश) फल और प्राकृतिक आहार हितकारी
30:57 (उपदेश) स्वास्थ्य और शांति

31:05 (उपदेश) बीमारी आए तो साक्षीभाव रखना

31:19 (शास्त्र वचन) “राम गयो रावण गयो…” संसार की नश्वरता
31:25 (उपदेश) सब नश्वर है — परमात्मा को स्मरण

31:33 (भजन) शांति स्मरण

31:39 (उपदेश) कलियुग के दोष दूर करने वाला मंत्र
31:48 (शास्त्र प्रसंग) शास्त्रों में युगानुसार मंत्र
31:55 (उपदेश) कलियुग का सरल मंत्र

32:05 (उपदेश) नारद जी का प्रश्न

32:13 (शास्त्र प्रसंग) हरे राम हरे कृष्ण मंत्र का उपदेश

32:24 (कीर्तन) हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
32:31 (कीर्तन) हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
32:38 (कीर्तन) शांत मन से नामस्मरण
32:43 (कीर्तन) हरे राम हरे राम जप

32:49 (कीर्तन) हरे कृष्ण हरे कृष्ण जप
33:00 (उपदेश) कलियुग के दोषों को हरने वाला नाम
33:09 (उपदेश) राम, गोविंद, माधव — सब परमात्मा के नाम
33:20 (भजन) हरि नारायण ओम जप

33:28 (कीर्तन) राम नाम जप

33:57 (कीर्तन) प्रेम से नाम जप

34:06 (कीर्तन) हरे राम राम राम हरे

34:16 (उपदेश) मशीन मत बनो — भक्त बनो
34:26 (उपदेश) कंप्यूटर या टेप रिकॉर्डर नहीं, प्रेमी भक्त बनो
34:34 (उपदेश) भीतर प्रेम से डूबना
 

संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था सत्संग के मुख्य अंश : राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है । करने, जानने और मानने की शक्ति...