सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

ज्ञानी का स्वभाव - part 1

      


 16 5 1982 सत्संग

        परमात्मा का चिंतन करते करते तन के  विकार कम होते हैँ, रजो तमो गुण घटते जाते हैं, रजो और तमो गुण मे द्वेष रहता है, रजो और तमो गुण में खिन्नता रहती है। अशंतोश  रहता है, ज्यूँ ज्यूँ परमात्मा का चिंतन बढ़ जाता है, त्यु त्यु जीवन में संतोष बढ़ने लगता है। ज्यूँ ज्यूँ परमात्मा का ध्यान होता है, त्यु त्यु सत्व  गुण बढ़ता  जाता है, ज्यूँ ज्यूँ सत्व  गुण बढ़ता  है, ध्यान मे आनंद आने लगता है।


भगवान भागवत गीता के 12वां अध्याय में कहते हैं - अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।


अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।13।। 

 


ज्ञानी सब भूतों में द्वेष भाव से रहित,  स्वार्थ रहित,  सबका प्रेम और हेतु रहित दयालु है,  ममता तथा अहंकार से रहित है, सुख दुख में समय है और समाधान है। ज्ञानी क्षमा करने में वीर होता है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है।


भागवत गीता का 12 अध्याय 13 श्लोक है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

 

ज्यूँ परमात्मा का चिंतन बढ़ता है तो तमो और रजो गुण क्षीण होता जाता है, ये प्रारंभिक भक्त के स्वभाव है। रजो तमो गुण होने से मनुष्य देह में पाशवी वृत्तियां बनी रहती है। लेकिन जब प्रभु का चिंतन करता है प्रभु के प्यारों का संग करता है, प्रभु की आज्ञा जो शास्त्र उसका अवलोकन करता है सुनता है, वह सौभाग्यशाली व्यक्ति धीरे-धीरे ज्ञानवान के स्वभाव को प्राप्त होता है। 

अद्वेष्टा किसी में द्वेष न करना,  द्वेष तब होता है जब मन में कामनाएं होती है,  द्वेष तब होता है जब अहंकार होता है, भक्त का अहंकार भगवान में समर्पित होता जाता है। ज्ञानी का अहंकार अद्विता मे लीन होता जाता है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां  

  किसी भी भूत प्राणी से द्वेष नहीं करता, द्वेष नहीं करता तो राग करता होगा?  नहीं राग भी नहीं करता। राग भी नहीं करता है, द्वेष भी नहीं करता है। तो फिर उदासीन होगा? किसी से राग होता है तब प्रवृत्ति होती है, या तो द्वेष होता है तब प्रवृत्ति होती है।

राग से मोह जनित प्रवृत्तियां होती है, और द्वेष से ईर्ष्या जनित प्रवृतियां होती है। लेकिन ज्ञानी को तो राग द्वेष होता नहीं,  अब राग द्वेष नहीं होगा तो प्रवृत्ति कैसे  करते होंगे? बिना राग के हमारे संसारी लोगो मे प्रवृत्ति देखि नहीं जाती। बिना द्वेष के प्रवृत्ति होती नहीं। किसी वस्तु में राग है उसको पाने के लिए प्रयास है,  किसी वस्तु या व्यक्ति से द्वेष है उसको हटाने के लिए प्रयास है,  फिर चाहे वह सचमुच द्वेष करता हो, चाहे वह सचमुच राग करता हो, या न करता हो, वो बात अलग है। 

लेकिन हमारे चित्त मे झूठ मूठ भी आप बैठकर चिंतन करके फलाना व्यक्ति बड़ा दुष्ट है, बड़ा बदमाश है, मेरा शत्रु है, मेरे तरफ घूर के देखेगा, मेरे से एसा करेगा वैसा करेगा, 6:15  ऐसा है वैसा है आप थोड़ा सा उसके लिए सोचने लग जाए, धीरे-धीरे आपको लगेगा की सचमुच वो व्यक्ति हमारे से द्वेष करता है, मन का स्वभाव है जिधर का तुम मनन करते हो उधर का हो भागता है| 

 गर्मी में सोए हैं अचानक नींद टूट पड़ी और याद आ गया के फलाना व्यक्ति बड़ा खराब है न जाने मेरे लिए क्या क्या बोलता होगा। क्योंकि आपने दोहरा रखा उस के लिए। किसी के लिए रागाकार वृत्तियाँ दोहरा राखी है,  तो रागाकार घटनाएं घट सकती है, रागकार वृत्ति भी दौड़ती है लेकिन द्वेषकार घटना भी न घटने पर वृत्ति घटित हो सकती है,  रागाकार घटना ना घटने पर भी वृत्तियाँ घट सकती है|

एका एक स्वपने मे देखा ठुठ, भ्रान्ति हो गयी की ये तो चोर खड़ा है, द्वेष चालू हो गया की, ये तो बड़ा दुष्ट है 

मैंने उसका कुछ बिगड़ा नहीं घूर घूर के देख रहा है,  आप सोए हैं पलंग पर पंखा चल रहा है अंदर द्वेष की वृत्तियाँ चालू हो गई,  आपने डंडा उठाया अथवा घर की ओर भेज मित्रों को इकट्ठा किया इस्लाम खतरे में, धर्म खतरे में, माल मिलकत खतरे में, चोर आया चोर आया। आप तो शांत सुखरूप सोये हुए थे, लेकिन द्वेष की वृत्ति ने आपको परेशान कर दिया। 

आप सुखरूप सोये हुए हैं, और  आपने देखा कोई मित्र आ रहा है,  सपने में आप उठे जल्दी-जल्दी उसको मिलने गए, और रास्ते में टक्कर लग गई, गिर पड़े, पैर से खून बह चला, तो यह सब व्रतियों ने दिखा दिया तुमको, तुम सुखरूप  थे लेकिन राग की वृत्तियों ने भी तुमको वहां से हटा दिया  और द्वेष की वृत्त ने तुमको हटा दिया, लेकिन जो ज्ञानी है वह अपनी जगह से नहीं हटता है, राग की वृत्तियाँ द्वेष की वृत्तियाँ उसके चित्त में नहीं होती, और उसकी तो स्वाभाविक मैत्री होती है। तो मैत्री करने के लिए भी तो आदमी है हट जाता है, जय राम जी की, मैत्री की प्वृत्ति भी करनी पड़ती है,  भगवान कहते हैं - अद्वेष्टा सर्व भूतानाम.।…… ज्ञानी अद्वेष होता है, अद्वेष है तो अराग भी आगया, जहां द्वेष होता है वही राग होता है,  अथवा तो जहाँ राग होता है वही द्वेष होता है, ये आदमी बड़ा रागी है तो कहीं न कहीं द्वेष भी होगा, ये आदमी बड़े गुस्सैबाज है, तो कहीं न कहीं बड़ा प्यार भी करता होगा। एक छोर का कभी कुछ नहीं होता,  जब होती है घटना दो छोर की - every action create a reaction दो तरफ होता है,  राग है तो द्वेष भी है  अथवा द्वेष है तो राग भी है। ज्ञानी में राग भी नहीं होता है द्वेष भी नहीं होता है। 

जिसमे राग द्वेष नहीं होता, भगवान बोलते हैँ वो मेरा प्यारा भक्त है, मेरा आत्मा है, मेरा स्वरुप है। तो राग द्वेष नहीं होता, लेकिन फिर भी कुछ होता है। क्या होता है? - मैत्री होती है, करुणा होती है, निर्ममो होता है, निर अहंकारीता होती है, सामान्य मनुष्य को तो राग द्वेष हुआ - दो ही मुसीबत। और ज्ञानी में निर्मामोता, निरहंकार प्रेम और करुणा, - ज्ञानी को भी प्रवृत्ति करनी पड़ती की ज्ञानी में यह होता नहीं है,  उसको ममता करनी नहीं निर्ममोता करनी नहीं पड़ती है, करुणा करनी नहीं पड़ती है,  उसका स्वभाव होता है, 

जो किया जाता है उसमें गड़बड़ी होती है और जो स्वाभाविक होता है उसमें नहीं होती। जैसे बर्फ को शीतल होना उसके लिए कोई परिश्रम नहीं है। अग्नि को उष्ण होना उसका कोई परिश्रम नहीं है। सरिता का बहाना उसको कोई परिश्रम नहीं सरिता भला है अर्जुन कब सोचती है, की गाय आए तो मैं उसे शीतल पानी पीने दूँ और शेर आए तो जहर बना दूँ, नहीं उसका स्वभाव है करुणा बहाना शीतलता | ऐसे ज्ञानी का साधन काल में, मैत्री करुणा वाला जो स्वभाव था, वह ज्ञान होने के बाद जीवत्व तो बाधित हो गया फिर भी उसका मैत्री, जीव मात्र से मैत्री स्वभाव और जीव मात्र के लिए करुणा हृदय में ज्ञानी का स्वभाव होता है। करुणा होती है लेकिन ममता रहित करुणा होती है। अर्ध ज्ञानी यहां संसारी आदमी करुणा करेगा तो ममता सहित करुणा कर लेगा, लेकिन ज्ञानी की करुणा ममता रहित करुणा होती है। भरत ने करुणा की ममता की हिरन के बच्चे को बचाया, करुणा की लेकिन वो करुणा ममता सहित करुणा थी, हिरण के बच्चे में मोह हो गया। क्यों की सत्य का अनुभव जब तक नहीं होता है तब तक आकृति में पकड़ हो जाती है। आकृति में सत्यता रहती, जब सत्य की खबर नहीं है तो आकृति सत्य लगती है।

सेठ के पास दिल की कमाई आयी ₹200 के दो तोले सोना लेकर रामजी बना लिए, भगवान राम जी बना लिया। फिर तेजी मंदी आयी, बहुत पैसा कमा लिए, 500 रूपया लेकर राम जी का सेवक ले आया हनुमान जी, ₹500 का हनुमान जी बना पांच तोले का, दो तोले का राम जी बनाया, क्योंकि उस समय मुनाफा कम था तब दो तोले और बाद में पांच तोले फिर आया कोई मंदि का मौजा सेठ का दीवाल निकल गया और बड़ी तकलीफ हुई, पैसे पैसे के लिए मोहताज हो गया, थैली में डाल दिया हनुमान को और राम जी को और लगाया मानिक चौक, ज्वेलरी ने कहा की भाई देख साल पहले ₹200 तो भगवान राम के दे देंगे, ₹200 इसका  देंगे, (राम की तरफ इशारा करके) है और 500 उसके दास के देंगे। तो सेठ बोलता है दास का मूल्य ज्यादा और स्वामी का मूल्य कम, ये कैसे हो सकता है? जब दास के 500 देते हो तो स्वामी के 600 दो, सुनार बोलता है  स्वामी भी तुम ले जाओ और सेवक भी तुम ले जाओ, हमारी नजर सोने पर है आकृति पर नहीं। जो मूल को देखता है उसके आगे आकृति नहीं है और जो आकृति को देखता है उसके आगे मूल छुप जाता है|

13:51 तो ज्ञानी मैत्री करता है तो किस पर करता है? स्वर्ण पर करता है। जय राम जी की। ज्ञानी प्रेम करता है तो सोने पर करता है और हम प्रेम करते हैं तो दागिने पे करते हैं। ऐसा कौन सा सोने का दागिना है जो दगीना ले जाओ और सोना मेरे को दे दो, नहीं दे सकते हैं। पानी मेरे को दे दो और तरंग तुम ले जाओ, पानी के ऊपर जो तरंगे हैं तरंग तरंग तुम ले जाओ और पानी पानी मेरे को निकल कर दो, पानी के बिना तरंग नहीं रह सकती है, सूत के बिना कपड़ा नहीं रह सकता है। सोने के बिना गहना नहीं रह सकता है, मिट्टी के बिना घड़ा नहीं रह सकता। ऐसे चैतन्य के बिना तुम नहीं रह सकते हो, तो ज्ञानी ने अपने चैतन्य बपू अपने आप को अपने अंदर निहारा है उसे लिए भूत मात्र में अपने यार को निहारता है,  तो अपने आप से तो सदा प्रेम होता ही है।

स्वार्थ रहित प्रेम तो ज्ञानी कर सकता है।


गुरुजी नु स्नेह मने वार वार सांवरे, उतारे भवति पार जो……(भजन) 


मातृ जैसे ममता प्रेम, इस बात को श्री कृष्ण कहते हैं अद्वेष्टा सर्व भूतानाम, सर्व भुत प्राणी में द्वेष नहीं, जो उनका  जो बिगड़ता है, उनको गलियां देता है, उनके प्रति भी ज्ञानी का द्वेष नहीं होता है।करुणा स्वभाव होता है। 15:53

जिसने दिया दर्द दिल उसका खुदा भला करें

 जिसने दिया दर्द दिल उसका खुदा भला करें

आशिकों को वन्य की फिर से यही दुआ करें 

जिसने दिया दर्द दिल उसका खुदा भला करें


16:13 क्यों की आशिक जानते हैं कि दर्द तो उसके आसुरी राजसी तामसिक वृत्ति के द्वारा दिया गया है लेकिन दर्द देने वालों के पीछे भी उस चैतन्य तो अपना यार है। जैसे अपने दांत अपने जीव को दर्द दे देते फिर भी दांत का भला करते हैं हम लोग अपना नाक चमड़ी को कभी दर्द दे देता है फिर भी अपने उंगलियों को हम काट कर नहीं फेंक देते हैं, क्योंकि पता है की- सब हमारा है।

16:53 रात को मैंने स्वप्ना देखा, मेरा बच्चा कोई जरूरी चीज लेकर भागा, मैंने उसको बुलाया और रुका नहीं मैं उसके पीछे दौड़ा उसको पकड़ लिया पकड़ लिया तो उसने वो चीज झूठी कर ली, मुझे किसी को देनी थी प्रसाद में उसने झूठी कर ली, मैंने कहा बदतमीज यह क्या करा, उसने कहा कुछ भी करो, आई थी खाने के लिए, कोई भी खाएगा तो मैंने पहले खा ली, मैंने कहा तू अभी से वकील जैसा कुर कपट का जवाब देता है, ऐसा करके उसका कान पकड़कर जोर से तमाचा मारा,  आंख खुल गई, गाल मेरा ही था|

 सौ बार तेरा दामन मेरे हाथ में आया था

 मगर आंख खुली तो मेरा ही गरेवा था।

 ज्ञानी इस प्रकार समझता है की थप्पड़ भी मेरी है तो गाल भी मेरा ही है। लेकिन हम समझते हैँ थप्पड़ मेरा है गल उसका है। उसमें भी अपने को देखने वाला ज्ञानी बताओ किस से द्वेष करेगा?अद्वेष्टा सर्वभूतानां सर्व भूतों में द्वेष रहित वाला| 

 नदी में बारिश के कारण बाढ़ बह चला था। बाढ़ के पानी में एक बिच्छू भी बहा चला था, साधुनें देखा ये जंतु बेचारा बह चला है, उसको निकालू, हथेली पर उस जंतु को निकाला, और बिच्छू ने डंक मार लिया, साधु ने उछलकर दूसरे हाथ पर ले लिया,  वहां डंक मारा, साधु नदी से बाहर आ रहा,  लोगों ने कहा महाराज बिच्छू है। डंक मार रहा है। ये इसका स्वभाव है डंक मारना और ये मेरा स्वभाव है की इसे किनारे लगाना| 

 18:59 इसी प्रकार जो बुद्ध पुरुष समाज में आए हैं इस धरती पर आए हैं जब जब आए हैं तब तब समाज के लोगों ने और दुष्ट लोगों ने उन महापुरुषों को डंक मारे हैं लेकिन महापुरुषों ने उन्हें फिर भी किनारे लगाने का प्रयास किया है,  इसलिए भगवान ऐसे महापुरुषों के पीछे-पीछे घूमते हैं और भगवान ऐसे महापुरुषों के लिए बोलते हैं,अद्वेष्टा सर्वभूतानां सब भूतों के लिए,  सब भक्तों के लिए नहीं, भक्त शिष्यों के लिए नहीं, भक्त बिच्छुओं के लिए नहीं, लेकिन सब भूत प्राणियों के लिए जिसके चित में द्वेष नहीं है वो मुझे बहुत प्यारा है। “अर्जुन” में उन्हीं के चिंतन में मस्त रहता हूं। तो ऐसा मत समझना की मैं कोई और आनंद से आनंदित हूं, मैं गीता के ज्ञान से आनंदित हूं। ऐसा लक्ष्मी को श्री कृष्ण भगवान बैकुंठ में बता रहे थे। 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

जिसमें मैत्री भाव है, करुणा है। करुणा उनको करनी नहीं पड़ती है,  व्यापारी ग्राहक पर करुणा करता है, लेकिन वह करुणा नहीं लोभ है। ग्राहक व्यापारी पर करुणा करता है सेठ जी जो तुम्हे ठीक लगे कोई बांदा नहीं,दो पैसा ज्यादा ले लोग तो। उसके पीछे भी ग्राहक अपने अहंकार को पोषणा चाहता है। सेठ यदि नमता दे देता यहां फ्री दे देता है तो अच्छा कहलाने के लिए। बार का बाप यदि 25 50 शहनाइयों के ऊपर न्योछावर कर देता है  तो अपने अहंकार को पोषने के लिए, लेकिन ज्ञानी में ऐसा भी नहीं की लोग मुझे अच्छा कहे, लोग मेरी वाह-वा करें, अथवा में अच्छा देखूं इसलिए ज्ञानी कोई करुणा का काम करता है ऐसी बात नहीं है। 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। बाप कमा कमा के बच्चों को दे देता है, सेठ कमा कमा के सेठानी को दे देता है, दे नेता कमा कमा के कूटमी जनों को आगे बढ़ाया जाता है लेकिन इसके पीछे ममता छुपी है। तब संत कमा कमा के सारे विश्व के जीवों के लिए समर्पित कर देता है फिर भी कोई ममता नहीं।


21.17 निमोमो निरहंकार 

ज्ञानी हो, निर्मम है, निरंकार है, बरसता रहता है, फिर भी उसके ऊपर दुख तकलीफ  आ सकती है। क्यों? ऐसा देहधारी कोई नहीं जिस पर कष्ट न आए हो। पुत्र प्राप्ति पुत्र वियोग, धन प्राप्ति धन वियोग, यश प्राप्ति यश वियोग, तंदरुस्ती प्राप्ति तंदुरुस्ती वियोग  जिसकी प्राप्ति होती है उसका वियोग होता है, जो मिलता है वो बिछड़ता है, जो बनता है वो बिगड़ा रहता है, तो ज्ञानी के पास भी जो कुछ शिष्य आते हैं तो सब शिष्यत्व निभा सकते हैं ऐसी कोई जरूरी बात नहीं, सब वफादारी कर सके यह कोई जरूरी बात नहीं, तो ज्ञानी को भी बहुत बेवफा व्यक्ति मिल सकते हैं, बहुत बेवफा परिस्थितियों खड़ी हो सकती है, फिर भी ज्ञानी सुख दुख में सम रहता है, हमको सुख मिलता है तो हम चिपक जाते हैँ, दुख मिलता है तो खिन्न हो जाते हैं, लेकिन ज्ञानी समझता है कि सुख और दुख प्रकृति में हो रहा है। 22.25 

  प्राकृति क्रियमा….मन्येट श्लोक 

 प्रकृति में गुण और कर्म हो रहे हैं अहंकार से जो विमूढ़ हो गया वो समझता की इसने मुझे सुख दिया यह बहुत भला है, और ये जुडा रहे जहाँ में और ये भी जुडा रहे में जुडा रहूं ये बस मेरा यार है, 22.53 

 दुख मिला की यह बस मर जाए तो अच्छा, चला जाए तो अच्छा इसकी हानी हो जाए तो अच्छा, ऐसे करके शत्रु का चिंतन करते या तो मित्र का चिंतन करते हैं लेकिन जिससे चिंतन होता है उसे चैतन्य को छोड़कर चिंतन करके मरते हैं साधारण लोग, लेकिन ज्ञानी जिससे चिंतन होता है उसी में खड़ा है और जो चिंतन होता है वो समझता है की वृत्तियों का खेल है, तो इसलिए ज्ञानी उलझता नहीं सुख दुख में, और अपने जैसे लोग उलझ जाते हैं, खैर तुम तो ज्ञानी होंगे,  हमारे जैसे लोग उलझ जाते हैं,

 

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी। 

23.33 सुख दुख में समान रहे, क्योंकि सुख भी एक आने वाली चीज है, दुख भी एक आने वाले चीज है, हम बोलते हम मर गए, हम बहुत दुखी हैं। भले आदमी कैसे दुखी हो तुम बोले रात को खाया सुबह खाने का नहीं है, कल ₹10 जेब में थे आज चवन्नी है, 30 पैसा किराया भी नहीं है, में बहुत दुखी हूं, भाई ऐसे भी आदमी जिसके चार दिन से 30 पैसे का इंतजार है, ऐसे भी आदमी जिसने दो दिन से खाया नहीं, ऐसे भी आदमी है जो बेचारे पड़े हैं जेल में या रेल में या कहीं पड़े हैं, उनसे तो तुम और भी ठीक हो थोड़ा वह भी तो तुम्हारे स्वरूप हैं, लेकिन साधारण मनुष्य अपनी देह को ही सर्वस्व मानेगा। बाकी का जो होता है वह दुनिया के बच्चे मर जाएं तो कोई दुख नहीं, दुनिया के भाइयों को कुछ चोट लगे तो कोई दुख सुख नहीं लेकिन मेरे भाई को चोट लगी, मैं दुखी हो गया, मेरे बच्चे को चोट लगी मैं दुखी हो गया, तो हम लोगों के दुखी पना सुखी पना ममता से है, लेकिन ज्ञानी निर्मम है, ज्ञानी किसी को भी देखेगा सामने दुखी तो ज्ञानी का हृदय करुणा से भर जाएगा, हालांकि ज्ञानी को किसी ने पत्थर मारे हैं किसी ने मजाक की है, किसी ने लट्ठ मार दिया और ज्ञानी के ललाट से खून बहता है और सामने किसी ने पकड़ के उसे व्यक्ति को यदि दो चार डंडे मारा ज्ञानी की नजर पड़ेगी तो ज्ञानी अपना चोट भूलकर उसको बचाने दौड़ जाएगा। 25.13 


भगवान बुद्ध जा रहे थे एक अहीर बहुत सारे घेटे बकरे ले जा रहा था उसके कंधे पर एक छोटा सा बकरा था जिसकी टांग थोड़ी टूटी हुई थी, उसको भी उतार के जबरदस्ती चलवा रहा था, बुद्ध ने देखा, बुद्ध का हृदय भर गया उस भरवाड़ को हाथ जोड़ा के भाई कहां जाता है, अमुक राजा यज्ञ कर रहे हैं उसे यज्ञ में यह वली देने के लिए टाइम पर पहुंचना है, मैं थक गया हूं जल्दी से चला नहीं जाता इसलिए इसको उतार के घसीट के जल्दी जल्दी ले जा रहा हूं,  बुद्ध ने कहा क्षमा कर मेरे भाई, ये मेरे को दे दे, बुद्ध ने उस बकरे के बच्चे को कंधे पर उठा लिया|

 ऐसा नहीं सोचा की मैं बुद्धत्व उपलब्ध हूं मैं बड़ा आदमी हूं, लोग क्या कहेंगे मेरे को अपनी पर्सनैलिटी संभलनी है, मेरी इज्जत और आबरू संभलनी है, I am something, they are nothing,   ऐसा बुध पुरुष को नहीं होता, बुद्ध पुरुष  I और they नहीं  I  I  I+ I+I+I+I 26.35 all  I is we, ये में में में मिलाके हम तो ज्ञानी हम, तो ज्ञानी समझता है हम, जैसे अलग-अलग अंग है शरीर के, कान अलग काम करते हैं, आंख अलग कम करते हैं, नाक अलग काम करती है, जीवहा अलग काम करती है, शरीर की मांसपेशियां अलग-अलग अपना काम करती है, फिर भी इसको सबको तुम क्या बोलते हो “मैं”, जैसे पूरे शरीर के अलग-अलग अंग अलग-अलग काम करते हुए भी तुम्हारा मैं इसमें एक तत्व का अनुभव करता है, ठीक इसी प्रकार ज्ञानी का सारे विश्व में अलग-अलग देवी देवता यक्ष किन्नर गन्धर्व भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनी सब अलग अलग पार्ट को ज्ञानी अपना आपा समझता है, इसलिए सब भूत प्राणियों से ज्ञानी स्नेह करता है, इसलिए भूत भी ज्ञानी से नहीं डरते, भयभीत नहीं होते, भयभीत होने के लिए क्रूरता चाहिए, ज्ञानी में क्रूरता नहीं होती है, भगवान शंकर के पास भूत भी मजे से रहते हैं। श्री राम। 27.37

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।13।।

 उनको ममता नहीं होती, ज्ञान में ममता नहीं होती और अज्ञान में ममता बिना और कुछ नहीं होता।

  मैं और मेरे तेरे की माया, बस करदिनी जीवन काया।

ममता से शरीर में मैं बुद्धि होती है और शरीर को में मानकर दूसरों को तू माना जाता है, मैं और तु से सारा अविद्या का व्यवहार चलता है, और अविद्या के व्यवहार से कर्म बनते हैं, कर्मों से फिर जन्म बनते हैं, और जन्मों से फिर कर्म बनते हैं, ऐसा चक्र का ये चलता रहता है, ज्ञानी को ये अहंकार ममता चला गाया, उस लिए उसकी स्वाभाभिक चेष्टा है, जाइए नदी सोचती नहीं है में गौओं के लिए शीतल जल बाहऊं, शेर आजाए तो जहर बन जाऊं, सज्जन हो तो दूध का लोटा भर जाए और दुर्जन हो तो कीचड़ भर दूँ, नदी कभी नहीं सोचती स्वाभाभिक बहती रहती है, ऐसे कभी नहीं सोचते की अच्छो को साधु और बुरों को हैरान करूँ, संतों की नजर में अच्छा तो अपना आपा है, और बुरा भी अपना आपा है। क्योंकि अच्छाई और बुराई व्यक्तियों का खेल है, अंदर में सबका आधार….। 

बुद्ध ने उठा लिया बकरा कंधे पर गए उस सम्राट के द्वार पर, जो इंतजार कर रहा था बकरों का बली देने के लिए, बकरा उसके कदमों में रखकर अपुर के पैरों पर गिर पड़े, की भाई पहले इस शरीर की बली दे। क्योंकि मैंने अपने आप को जान लिया अब यह शरीर मेरा काम का नहीं है, लेकिन यह तो अपने शरीर को काम वाला मानते हैं 29.36  इसलिए इनको दुख ज्यादा होता है, इनको पीड़ा ज्यादा होती है, मेरे को इतनी पीड़ा नहीं होगी मैं पीड़ा का साक्षी होऊंगा, यह पीड़ा स्वयं बन जाएंगे। ऐसा करके बुद्ध का ह्रदय पिघला,  पिघले हुए हृदय का असर उस सम्राट पर पड़ा,और सम्राट बुद्ध के शरण को प्राप्त हुआ। और यज्ञ में बलि देने की गलती से रहित हो कर भगवान के रास्ते चला। सच्ची बली तो देना है अहंकार की, और हम अपने अहंकार को बचाकर पशुओं की बलि देते हैँ। श्री राम। 30.19 

तो ज्ञानी निर्मम होता है, निरहंकार होता है, और सुख दुख में सम होता है, ज्ञानी को ऐसा नहीं होता की - मैं कहीं झुक गया छोटा हो गया,

क्षमा बड़न को होत है,छोटन को उत्पाद,

 विष्णु को क्या घटि गयो जो भृगु ने मारी लात।

  जितना आदमी बड़ा उतनी सहन शक्ति बड़ी होती है,  जितना बड़ा उतनी समता ज्यादा होती है।

30.56 सुना था की श्री कृष्ण का जन्म होते ही पूतना ने अपना कम शुरू कर दिया था शिशुओं को पय पान कराते, कई सैकोडो बच्चे मार डाले थे, वह पूतना जैसी तैसी नहीं थी,  क्योंकि जैसे तैसे व्यक्ति के स्थान पर श्री कृष्ण के आधार पहुंचे ये बात हो नहीं सकती, बाली राजा की लड़की थी वो पूतना, भुत पूर्व बलिराजा वहां जब भगवान वामन का रूप लेकर आए, तो उसने मैन में इच्छा किया की इस छोटे से बालक को उठाउ और गोद में लेकर बस लगा लूं चिपका दूँ, इसको पय पान कराऊँ, इसकी माँ बन जाऊं तो कितना अच्छा, इसी भाव भाव उसकी आंखें भर आयी, आँखें बंद हो गई समाधिस्थ हो गयी, भगवान जब बाली से संकल्प कराये और एक पैर भले के भूमि पर रखा, दूसरा पद पर रखा, और तीसरा उसके सर पर रखा, गरुड़ को आदेश दिया गरुड़ ने अपनी पास में बलि को बांध लिया, तो हाहाकार मच गया, हाहाकार मची तो लड़की की ऑंखें खुली और ये लड़का इतना सा छोटा था इतना बड़ा हो गया और क्रूर होगया, और मेरे पिता को बंधवा दिया, इसको मैं दूध कैसे पीलाउ, इसको तो मैं जहर पिलाऊंगी जहर,  तो दूध पिलाने का संकल्प भी सच्चा हुआ और जहर पिलाने का भी संकल्प सच्चा हुआ, तो जीव

जैसा जैसा संकल्प करता है, ऐसा ऐसा समय पाकर उसको उस प्रकार की अनुकूलता प्रकृति दे देती है, तो उसके संकल्प के अनुसार फिर उनकी देह बनती है, ज्ञानी को इस संकल्प नहीं करता, स्वाभाविक काम करता है, इसलिए ज्ञानी निर्मम होता है, ज्ञानी में ममता नहीं होती, औरों मैं ममता होती है, वही पूतना आकर कृष्ण को पहले दूध पिलाया फिर बिष भी पिलाया, बिष पिलाया लेकिन विश्व नियता को पिलाया, जो मुक्ति देनी थी यशोदा को वही मुक्ति पूतना को दी, क्यों की अपना बिगड़ने वाले को भी उन्होंने दुख नहीं दिया, क्यों की कृष्ण ज्ञान की मूर्ति है, नहीं तो गला दबाकर नरक में भेज सकते थे, लेकिन उसकी आयुष पुरी हुई, निमित्त करके स्वधाम भेज दिया, 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।13।।



ज्ञानी का स्वभाव - part 2 ...contd



सोमवार, 7 सितंबर 2026

ब्रह्मज्ञानी की ज्ञानमयी दृष्टि| Brahmagyani ki Gyanmayi Drishti| Part-1|

 


सत्संग के मुख्य अंश:

क्या हम अपने प्रयास से जी रहे हैं, क्या हमारा आदि-अंत अपने हाथ में है? 

अज्ञानी जरा-सी बात में सुखी-दु:खी होता है पर बुद्ध पुरुष अपने स्वरूप में स्थित होता है। 

अभी जो हमारी वृत्तियाँ हमें नचा रही हैं उसका 100 साल बाद कोई मूल्य नहीं है... काल की धारा सुख-दुख खा जाती है !

अपने स्वरूप को पहचानने के लिए इस प्रकार के विचार बड़े ही अनुकूल हैं। 

हमारे मोह पर जब चोट लगती है तब हम सुखी-दु:खी होते हैं और कर्म के बंधन को बनाते हैं। 

पद्मासन पर बैठकर यह उपाय करने से बड़ा सामर्थ्य प्राप्त होता है। 

जब तक हम अपने आप को नहीं जानते तब तक सबकुछ व्यर्थ है। 


मैन्युअल ट्रांसक्रिप्शन

        00:01 जिसको ठीक से समझने वाला व्यक्ति संसार के जन्म मरण के  चक्कर से छूट सकता है। ओर तो रामायण है, लेकिन योग वशिष्ठ को महारामायण कहा है ,और तो पुराण है लेकिन भागवत को महापुराण कहा हैं, और तो सब पुरुष है लेकिन इनको समझने वाला महापुरुष कहा गया है, और तो सब देव है लेकिन उसमें डुबे रहने वाले का नाम महादेव कहा गया है, शंकर भगवान को महादेव। 00:44


चित्त का एक स्वभाव, चित्त कि एक कमजोरी कहो , मनुष्य की एक कम नस भी कहो, जो छोड़ना है उसके पीछे जीवन बिताता है, और जो जीवन का सार है उसके लिए उसको समय नहीं मिलता। जिसको पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता ,जिसको जानने के बाद कुछ जानना शेष नही रह जाता ,उसको पाना और जानना छोड़ कर जो जाना हुआ अनजाने में बदल जाता है पाया हुआ पराया हो जाता है ,उसके पीछे पूरा जीवन बर्बाद कर देता है, यह मनुष्य जीवन की कमनसीबी है। 01:36

  

        रहता था एक फकीर किसी गांव में लोग उसे पागल कहां करते थे, और ऐसे पुरुष करीब-करीब पागल जैसी होते हैं । जिन अर्थों में संसारी चतुर होते हैं जिन बातों में संसारी कुशल होते हैं उन बातों में वे संत पागल होते हैं, और जिन बातों में संत जगे होते हैं उन बातों की तो संसारियों को खबर भी नही होती । वो फ़क़ीर एक बोजका लिए घूमा करता था | कहि कोई बस्ती मिल जाए टोकरा रंगा हुआ लाल रंग का अंगूर खाकर लोग फेंक देते ऐसा कोई टुकड़ा मिल जाता कागज का,वो अपनी गठरी में डाल देता ,कहि चिकना चमाता पत्थर देख लेटा हूं अपनी गठरी में डाल देता,कहि गोल मटोल इट का रोड़ा देखता अपनी गठरी में डाल देता, रोज अपने गठरी में कुछ न कुछ डालता भर बाजार में। घूमता गठरी लेकर देखता कुछ पड़ा है कोई सुहावना पत्थर कोई सुहावना कागज उतरता गठरी जल्दी से भर देता की आआ आ हा हा क्या मेरी माया बड़ी । दिन दिन गठरी बढ़ती जाती थी मस्तक पर बोझ बढ़ता जाता था ,गर्दन टेढ़ी होने जा रही थी, लोग उसे समझाते थे कि बाबा तुम जरा सुधर जाओ, इस पागलपन से तुम जरा बाज आ जाओ , बोलता था क्या काहे का पागलपन, ऐसा करके छीनना चाहते हो मुझसे, लेना चाहते हो, यह मेरी माया है, गठरी पर लिखा रहता तो मेरी माया ,मेरा संसार, मेरी माया गठरी के एक तरफ लिखा रहता था दूसरे तरफ लिखा रहता मेरा संसार ,तीसरी तरफ लिखा था मेरा सर्वस्व ,चौथी तरफ से लिखा रहता दुनिया क्या जाने, लोगों को पक्का पक्का पागल लगता ,दुनिया क्या जाने पढ़ते थे माया, लोगों को हसी आती,मेरा संसार, हसी आती मेरा सर्वस्व लोग हँसते ओर चौथी बात दुनिया क्या जाने लोग उसे चिढ़ाते थे कोई पागल कहता ,कोई अलमस्त कहता,कोई मंजूर कहता, कोइ गधा कहता जैसी जिसकी दृष्टि होती वैसा कह लेते सोच लेते ,लेकिन उसका काम चालू ही रहा ।सुबह हो वो चादर को गठरी के रुप में बना देता सारा दिन ढोता फिरता रात को  कहीं रखता ,फिर सिरहाने रखता, उसको संभालता । दिन बीते ,सप्ताह बीते, महीने बीते। एक दिन उस गांव में कोई तत्ववेत्ता संत पसार हुए ,उसकी गठरी पर सुवाक्य लिखे थे पढ़े उन्होंने उसने, उसे बुद्ध पुरुष ज्ञानी पुरुष की नजर गई फकीर की आंखों में झाँका,उनको प्रणाम किया, लोगों को कहा की मूर्ख लोगो  उसको पागल मत कहो, मूर्ख लोगो इसको बेवकूफ मत कहो,ये तुम्हे उपदेश दिए जा रहा है । ये  गठरी में जो कंकर पत्थर और पत्ते कागज इकट्ठे करता है तुम्हें संदेश देता है, की तुम सारा दिन यही तो करते हो यही तो ढोते रहते हो बोझका का सफेद कागज सरकार के छपे कागज भी तो तुम इकट्ठा करते तिजोरी में रखते हो कल्पना 06:00 करते हो तो मेरा ये संसार, मैं ये महल बनाऊंगा मैं मकान लूंगा मैं यह दुकान लूंगा मैं यह शादी करूंगा मैं यह बारात निकलूंगा मैं यह करूंगा मैं वह करूंगा तुम्हारा भी अपना कूड़ा कर्कट के कल्पना का संसार है, ईट चुना बढ़ा दिया  की मेरा मकान हो गया, कंकर पत्थर का इकट्ठा करके अपने जीवन को धन्य मान रहे हो,अपने को सर्वस्व मान रहे हो,ये तुम्हे खबर देता है कि जिसे तुम सर्वस्व मान रहे हो वह कचरे का ठेर ही तो है,ये तुम्हारे साथ चलेगी भी नही ओर इसी के बोझ से तुम परेशान हो रहै हो,2 रोटी के टुकड़े खाने वो भी आराम से नही खा रहे हो,2 सांसे लेनी वो भी आराम से नही ले रहे हो कितने बोझीले जीवन से से गुजर रहे हो । 06:49


तब वह फकीर कहता है की महाराज चुप हो जाओ इन बेवकूफो को समझने से कुछ न होगा मैं पूरा जीवन इसी गांव में रहा कोई मिल जाए कोई जग जाए लेकिन कोई जगा नहीं | मेरे को सुनाने की कोशिश कर रहे हैं ,मेरे को अपनी तराजू में तोलने की कोशिश कर रहै है। मैंने सोचा की कोई आ जाए मेरे मेरे इस गठरी  के राज को समझ ले ताकि अपनी गठरी के बोझे वो ढोल सके ,लेकिन वो बोझा अपना वो नही फेकते मेरे को समजाते है कि फेक दे।


7.21 मेरा यह गठरी इनको बेवकूफी लगती है और स्वयं जो गठरी उठा कर भागे जा रहे हैं दिन रात, और परेशान भी है चिल्लाते भी हमें तो खुशी से विनोद मात्र उठाता हूं | मैं तो इनको समझने के लिए दिखाने के लिए जरा चेताने के लिए उठा रहा हूं और ये लोग तो सचमुच में उठा रहे हैं | मैं तो अभिनव मात्र कर रहा था, मैं तो विनोद मात्र कर रहा था, विनोद भी कर नहीं रहा था मेरे से विराट परमात्मा विनोद करवा रहा था, अभिनव करवा रहा था, लेकिन यह तो सचमुच में कर रहे हैं, उनके चेहरे पर देखो कहां है सहजता। इनके चेहरे में देखो, उनकी आंखों में झांको कहा है जीवन का संगीत। 07:58 इनके हिलचाल में झांको कहां है वह मस्ती, कहां है सहजता,कहा है वह निर्दोष बालक जैसा जीवन, महाराज इनको उपदेश देना व्यर्थ है इनके साथ बात करना व्यर्थ है,, मैंने पूरा जीवन खोया इनके पीछे लेकिन यह कल्पना के महल बाधते जाते हैं ।मेरा संसार सर्वस्व है, मेरा धन सर्वस्व है, मेरी इज्जत सर्वस्व है, अपनी कल्पनाओं की पोटली सर पर लिए भागे जा रहे हैं सारा दिन, और मैं भी इस बाजार में पिछले 32 साल से घूमता घुमा रहा हु महाराज ।


08:31 32 साल हो गए लेकिन कोई सत्य का खरीदार नहीं मिला। सब गठरियां बांध रहे है, बुद्ध पुरुषों के लिए बड़ी हैरानी है। बुद्ध पुरुष जो देना चाहते हैं वह तो हम नहीं लेते लेकिन हमारी वही शराबी हालत, वही जुआरी पने की हालत ,वही गंदी आदत है, हम छोड़ना नहीं चाहते, जब संत पुरुष बुद्ध पुरुष डांटते हैं तो हम कुछ का कुछ उनके लिए भी सोच लेते हैं उनके लिए भी कह लेते हैं कहला देते हैं  । |जय श्री राम ,,,,,,,,,,,,,,,,|


09:26 शास्त्र कहते है कि मूर्ख ह्रदय न चेत यद्यपि मिलाई गुरु विरंची सम | 

 

मूर्ख दिल जो है, वह फ़क़ीर कहता है, वह चेतसा नही है,ब्रह्माजी जैसा गुरु मिल जाये फिर भी भेस के आगे भागवत जेसी बात है । यह भागवत का श्लोक है, भगवान कृष्ण कहते हैं, भागवत का 11 स्कंद है अध्याय 28 वा श्लोक नंबर 25 वा ,,,,,,,,,,,,,, 09:50 जिसका चित समाजित हो गया, जिसने धारणा ध्यान द्वारा मेरे स्वरूप को पहचान लिया ,उसको कोई कर्तव्य नहीं है ,उसको कोई प्राप्तव्य  नही है,उसको कुछ खोना नहीं है उसको कुछ पाना नहीं फिर भी गठरी उठाये जा रहा है | उस फकीर को गठरी उठाकर संसार में घूमने से कुछ लाभ लेना नहीं था ,गठरी उठाने से उसका ज्ञान जा भी नहीं रहा था बाजार में घूमने से उसकी शांति भग भी नहीं हो रही थी ,गठरी उठाने से उसकी शांति भग भी नहीं हो रही थी | कंकड़ और पत्थर इकट्ठा करने से उसका मोह बढ़ भी नहीं रहा था, और कंकर पत्थर फेंकने से उसका मोह घटे, ऐसे अवस्था भी नही थी।

वह एक ऐसी जगह पर था की उसके लिए सारा का सारा व्यवस्था सब फेल हो गई । जिससे मेरे स्वरूप का भली भांति ज्ञान हो गया है उसकी वृति और इंद्रियां यदि समाहित रहती है तो, ऐसा बुद्ध पुरुष यदि एकांत में समाधि में बैठता है तो, और व्यवहार में आता है तो, उससे कोई लाभ और हानी नहीं होती क्योंकि उसने जान लिया। ओर अब आपने जान लिया 11:02 मैं कहता हूं तो मान लो यह गुलाब है मानोगे की नहीं ? मान लिया की यह गुलाब है, लेकिन तुमने यह जानकर माना है ।

लेकिन यह मान लो कि यह गुलाब है आप नहीं मानोगे क्योंकि आपकी जानकारी होती है गेंदा है, यह गुलाब है।

जानकर जो माना जाता है उसमें फिर भ्रांति नहीं होती है। केवल जैसे माना जाता है अंजान में जो माना जाता है वह बदल जाता है जान कर जो माना जाता है वह नही बदलता।

Sindhi line  आँख डीसी कन बुद्धि कड़े न विचार श्री राम,,,,

11:41 गांधी जी बोलते थे किसी सज्जन आदमी ,  दुष्ट आदमी को तुम अच्छा आदमी कहो तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा, लेकिन किसी सज्जन आदमी को तुमने बुरा आदमी सोच लिया तो तुम्हारे ऊपर कर्मों का असर होगा | श्री राम ,,,,,,,,,,,

12:01 जानकर मानोगे तो बदलेगा नहीं लेकिन सुनकर मानोगे तो आपके विचार बदलेंगे । मान लो, मान लो यह दुनिया है, लेकिन ठीक से तुम यदि जानोगे फकीर को तो फिर तुम्हारे चित में परिवर्तन नहीं होगा। तुमने यदि किसी को गुरु मान लिया है ,तुमने यदि किसी को भगवान मान लिया है, तुमने यदि किसी को अच्छा मान लिया है, तो तुम्हारी वो मान्यता बदलती रहती है, क्योंकि मान्यता मन की होती है | मान्यता कल्पना सापेक्ष होती है ,जानकारी वस्तु सापेक्ष होती मान्यता कल्पना सापेक्ष होती है।

तुम्हारी कल्पना है, तुम  मानते थे s sc पास हो जाऊं सुखी हो जाऊंगा, तुम मानते थे कि बस यह एग्जाम निपट जाए तो आराम से जियूँगा, लेकिंन वो आराम नही रहा क्योंकि तुम्हारी मान्यता थी तुमने जाना नही था माना था। तुम मानते थे कि बस नोकरी मिल जाए आराम मिल जाये आराम , धंधा हो जाए बस शांति , बस शादी हो जाए मजे की जिंदगी शुरू हो जाएगी , बच्चा आ जाए मजे  की जिंदगी शुरू हो जाएगी, तुमने माना था जाना ना था । ये सारी मान्यताएं तुम्हारी बदलती गई वह मान्यता है तुम्हारे लिए धोखा हो गई, तुम जब सातवी में कक्षा में थे पढ़ते थे तब तुम्हारा मान्यता थी कि बस फिर फाइनल हो जाए फिर आराम, ये जरा कठिन पेपर है मास्टर जी जरा ऐसा है इसमें से गुजर जाऊं बस , तुम जब s s c में थे तब भी तुम्हारी मान्यता रही होगी बस इतना कोर्स पूरा हो जाए ये पेपर अच्छा जाए फिर तो बस आ हा,,,,6 तो अच्छे गए सातवाँ जरा कुछ हो जाए ठीक हो जाए आ हा,,,,,,पूरा बोझ था पूरा जीवन उसी ढाल में ढल गया था,  मान्यता थी।


13:43 एसएससी पढे, BAपढ़े , B.Sc पढ़े जो कुछ पढ़े, उस समय जो तुम्हारी मान्यता थी कि इतना हो जाए तो शांति इतना हो जाए तो निराद, शादी हो जाए तो निराद, मकान हो जाए तो निराद, एलएलबी हो जाए तो निराद। ये सारे तुम्हारी मान्यताएं तुम अभी मन के चक्रराव में जी रहे हो जैसे और लोग मन के चक्कर में जीते हैं समाज के लोग, ऐसे हम लोग भी जी रहे हैं । वो बुद्ध पुरुष उस चक्रराव से पार हो जाते है | जो मानता है वह मरता है और जो जानता है वो तरता है । जो मानता है वो मरता है तो जानता है वह तरता है ।

14:33 मान लिया के सुख इसमें है, मान लिया की सुख उसमे है में है और सुख के पीछे दौड़ लगाए जा रहे हैं जीवन भर सुख को पकडते ओर हाथ में सुख आता ही नहीं । छुआ नहीं की गया नहीं ,,,,छुआ नहीं ,की गया नहीं उस सुख के साधनों के लिए प्रयास तो पूरा करते हैं और आ भी जाता है, थोड़ी देर के लिए सेल्फ हिप्नोटाइज हो जाते और हा हा हा हा   मैं बहुत सुखी हूं | उतना एहसास लेते-लेते वह सुख चिंता में,भय में ,शोक में ,अथवा वियोग में बदल जाता है ।मैं कई बार कहां करता हूं 

ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में तुम्हें रोना ही पड़ेगा।

15:24 भागवद में 12वे सकन्द में आता हैकि जो आदमी अद्वेत के विचार छोड़कर, है उद्धव द्वेत के विचार में बहेगा, जो किसकी निंदा या किसी की स्तुति का ख्याल करेगा, वह परमार्थ से तुरंत गिर जाएगा। किसी की अच्छाई या बुराई तोलने लगेगा, वह सत्य का घाट करके असत्य में गिरेगा। बुद्ध पुरुष जो है किसी की अच्छाई और बुराई तोलते नहीं लेकिन किसी की अच्छाई और बुराई मन की कल्पना समझकर उनके मन को मोडने के लिए नाटक किया करते है, अभिनव किया करते हैं | इसी प्रकार का अभिनव वह फ़क़ीर किया करते | मिल गया कोई टुकड़ाकागज का लाल रंगीन कोई जिलेटीन मिल गई, डाल दिया, मिल गया कोई पत्थर डाल दिया, लोग बोलते क्या करते हैं बोले महल बनाऊँगा, बगला बनाऊँगा उस पर मेरा झंडा लगाऊँगा, शादी करुगा,लाड़ी लाऊँगा बच्चो को जन्म दूँगा , बच्चे की शादी कराऊँगा , बच्चे का गोट पी थीडसफिर बहु आएगी मेरे बुढापे में सेवा करेगी, मेरे को खाँसी होगी तो वह मालपूए तल के दूध में डालकर मुझे चांदी के बर्तन में खिलाएगी। मैं थकुगा तो मेरा बेटा मेरे पैर दबाएगा, मुझे भूख लगेगी तो बहु मुझे खाना देगी , मेरे जीवन का अंतिम समय सुख से बीते इसलिए मैं यह सब महल की तैयारी कर रहा हूं , इस धन को इकट्ठा किये जा रहा हु, लोग बोलते थे महाराज तुम्हारी खिसक गई है, ….. उनको पता नहीं चलता की हमारी खिसकी हुई है हमें पता नहीं, और इनकी खिसकी नहीं तो इनकी खिसकी हुई हमें दिखती ।

17:07 फकीर हंस  लेता, लोगों को पक्का हो जाता कि बिल्कुल खिसकी हुई है। फ़क़ीर चल लेता गठरी उठाकर, गठरी वोही जिसके चारो तरफ लिखा हुआ होता क्या लिखा हुआ होता,,,,,मेरा सर्वस्व, मेरी माया, मेरा संसार ,दुनिया क्या जाने । हर आदमी जीता है अपने को श्रेष्ठ मानता है अपने को कुशल मानता है दूसरे को समझता की क्या जाने ,,,,हिनके केडी खबरसिन्धी लाइन दुनिया क्या जाने, यह क्या जाने, यह क्या जाने किसी लड़के को शादी की तैयारी हो रही थी, तैयारी में बड़ा उत्सुक था, ,,,,,शिवलाल का परिचित था ,खूब दौड़ भाग की बड़े उत्साह से कमाया हुआ धन खर्च करने को राजी था ,शिवलाल ने धीरे से कहा कि देख भाई बहुत उत्साह से तो शादी करता है, लेकिन इसमें कोई सार नहीं सार बेटे में नही मैंने पैदा किया इसमे सार नही, मुजे पता है , सार भजन में लगे , बोले काका तमे की खबर वह छोकरा बोलता है काका तमे छू ख़बर काका अर्ध कलाक समझाता है की कोई सार नही अभी जो इतना उत्साह लेता है शादी शादी कोई सार नही है हमारा अनुभव है बोलता है काका तमे की खबर,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुजराती लाईन है यहां



१८.३३ young person says life is full of joy  but wise person says life is full of sorrow   18:36 जवान बोलते हैं जिंदगी मजा लेने के लिए लेकिन बूढ़े समझते जिंदगी में कोई सार नहीं | कोई सार नहीं कहे जा रहे हैं, फिर भी वही पोटका बढ़ाये भी तो जा रहे हैं|   वही परिचय इसने क्या करा,  उसने क्या करा , उसने क्या दिया, उसने क्या दिया ,उसने क्या खाया ,उसने क्या छोड़ा।

१८.५८ भागवत में आता है यदि तुमने लोगों की कृति देखी, यह अपनी स्तुति सुनी, यदि अपनी निंदा को सच्चा माना यदि अपने को देह माना ,यदि संसार को सच्चा माना, तो तुम्हारा खैर नहीं। संसार को यदि सच्चा मानोगे परमार्थ से गिर जाओगे, संसार सापेक्ष है, काल्पनिक है | जैसे जिसकी दृष्टि होती है जैसी श्रद्धा होती है, तो पत्थर में भी भगवान दिखता है और जब शराब और कबाब से बुद्धि मंद हो जाती है, तो भगवान जिनके हृदय में नाचता ऐसे संत भी तुमको ढोगी दिखेगे,बेवकूफ दिखेगे पागल दिखेगे।


19:35 संत कैसा है उस बात का ज्यादा विचार नहीं, भगवान की मूर्ति कैसी है उसे बात का ज्यादा विचार नहीं, पूजा करने वाला कैसा है, वही मूर्तियां थी जिसके आगे हज़ारो हजारों लोगों ने सिर झुकाया होगा, लेकिन मूर्ति बोली नही हसी नही ,लेकि गोरांग ने जब सर झुकाया तो मूर्ति खिलखिलाने लगी,वही मूर्ति होगी जो मीरा के आगे मुस्कराने लगी ,और भी तो लोग गए होंगे । मूर्ति तो वही की वही ,मीरा के पास जो मूर्ति थी कइयो  ने देखी, होगी दुसरो को पत्थर की मूर्ति दिखी, मीरा को साक्षात कृष्ण दिखे , दुसरो को पत्थर की मूर्ति दिखी थी  और गौरांग को साक्षात ठाकूर जी दिखे | 20:15  ऐसे बुद्ध पुरुष को दूसरा बुद्ध पुरुष दिख जाएगा ,मुर्खो को ज्ञानी भी आने जैसा अज्ञानी दिखेगा ,उसको ऐसा करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए ,ऐसा है, ऐसा है,  उन मुर्खो को समझाने के लिए संतो को महामूर्ख का पार्ट अदा करना पड़ता है । पार्ट अदा करना जैसे आप सम्राट बन गए रंगमंच पर ,आपको अहंकार नहीं आएगा ,सम्राट बनेगा का। आप दरिद्र बन गए तो आपको विशाद नही होगा, आप थोड़ी देर में स्त्री का पार्ट अदा करते हैं थोड़ी देर में पुरुष का पार्ट अदा करते फिर भी आप अपने को जानते हैं。20:53 ऐसी कोनसी क्षण है की आप चले गए ? आप स्त्री बने - तभी भी आप थे, पुरुष बने - तभी भी आप थे , रंक बने तब भी आप थे, आप राय बने तब भी आप थे, पटावाला बने तब भी आप थे और कारटून बने तभी भी थे। ऐसे ज्ञानी समझता है की अनेक रूपरुरुपाय, ॐ ॐ श्री राम,,,,,


ज्ञानी सबका कारना,निर्लेपी  निजधाम,

  अपने भीतर बालका रहता सदा अकाम।


21.32 वह ऐसा अकाम पुरुष था, अपने भीतर बालक था, जैसे बालक स्वाभाविक हंस लेता है ,स्वाभाविक गुनगुना लेता है ,ऐसे ही उस ज्ञानी की स्वभाविक चेष्टा है लेकिन लोगों की नजरों में कोई कुछ समाझता है,कोई कुछ समझता है, कोई कुछ समझता है।


22:00 जब ज्ञानी को ज्ञानी ने निहारा तब वह ज्ञानी अपना स्वभाव खोलकर कहता है कि इनको मत समझाओ, हद हो गई पूरी हो गई,अब हम न कहेगे कुछ हम न समझायेंगे। न रोष करेंगे ना ममता देंगे ना कुछ करेंगे बस तुम्हारे कर्म अब तुम्हारे पर है, हमने समझाना था समझा दिया, कहना था कह दिया, सुनाना था सुना दिया, रोकना था रोक दिया, छोडना था छोड़ दिया , जो कुछ करना था हमने प्रयास अपना कर दिया अब तुम्हारे कर्म तुम्हारे जवाबदारी पर है ,  श्री राम,,,,,,, अब तुम स्वत्रत हो,तुम चाहे गठरी अपनी बढ़ाओ, चाहे घटाओ , चाहे नई गठरी ले आओ, मर्जी तुम्हारी है,तुम पूरे स्वतंत्र हो हमने अब छेड़ा अपना छोड़ दिया ,बचाने का, रखने का ,संभालने का, उठाने का ,जय  श्री राम….

सिंधी लाइन्स,,,,,,,,,,,,,,,  

22.४९ अब हम इनको कुछ न कहेगे, क्योंकि हमने अपनी गठरी इकट्ठा करके दिखाया इनको , लेकिन इन्होंने तो हमारे को बेवकूफ समझा , अपनी बेवकूफी की तरफ कभी निहारा ही नही | श्री राम । इनको पता ही नहीं चला की हम क्या ले रहे हैं, हम किस रास्ते जाते हैं, किस ढ़ग से फ़क़ीर की तरफ निहारते है, हमको क्या उनसे लेना है , उनके पास क्या-क्या खजाना है, वह मेरे पास से जो खजाना था वह तो उन्होंने लिया नहीं लेकिन मैंने जो कूड़ा करकट इकट्ठा किया था इनको समझाने के लिए उसको इन्होंने मेरा देखा उसी का चिंतन किया।

२३.24 बुद्ध के पास तो आदमी गए, दोनी मित्र थे, लगोटिया यार । मित्र ने कहा की महाराज तुम्हारे पास हम दो मित्र आए हैं, एक दूसरे की फरियाद ले आए है, मुझे यह महसूस होता है की मेरा मित्र कहीं बिल्ली न बन जाए, क्योंकि सारा दिन बिल्ली को साथ रखता है , बिस्तर में भी बिल्ली , भोजन करे तब भी बिल्ली, दुकान जाए तब भी बिल्ली साथ मे , मिनी, मिनी, मिनी कार में बैठे तो भी मिनी रथ में बैठे तो भी मिनी मिनी साथ में, तो दूसरे जन्म में मिनी होगा की नहीं।

दूसरे मित्र ने कहा की महाराज मेरी भी सुन लीजिए , क्योंकि मेरी फरियाद करने जो आया है वह साथ मे कुत्ता रखता है, ओर सारा दिन मोती , मोती,मोती करके उसको पुचकारता रहता है सारा दिन मोती का चिंतन करता है । सारा दिन कुत्ते का चिंतन करता है, पलँग में भी कुत्ता सो जाता है इसके, भोजन के समय भी होता है और रथ में भी कुत्ते को ले जाता हैं , ये कुत्ता होगा कि नही?


24.24 अब बुद्ध ने कहा कि नही ये कुत्ता नही होगा, ये कुत्ते का चिंतन करता है, कुत्ते का चिंतन करता है, ऐसा चिंतन तू कर रहा है, तेरे मस्तिष्क में कुत्ता है और उसके मस्तिष्क में बिल्ली है तो वह बिल्ली होगा और तू कुत्ता होगा।


24.४४ ऐसे गुरु के मस्तिष्क में तो परमानंद है, ब्रह्म है | लेकिन हमारे मस्तिष्क में गुरु की कृति है , हम गुरु की कृति है तो तुम्हारे जीवन में विकृति होगी और गुरु की निष्ठा यदि तुम्हारे अंदर निष्ठा आ जाएंगीतो मेरा बेड़ा पार हो जाएगा। फ़क़ीर की कृति को देख रहे हैं, फकीर की वृत्ति को नहीं देख रहे हैं। ज्ञानी बालवत  होता है, ज्ञानी का जीवन सहज होता है। हम लोगों का जीवन बोझिला होता है , हम लोग कृति में जीतें है और ज्ञानी वृति में जीते है।

25.21 कहते है मेरे स्वरूप का भली भांति ज्ञान हो गया है, उसकी वृत्तियां और इंद्रियां यदि समाहित है, यदि ध्यानस्त है, समाधी में है तो उसे उनसे लाभ क्या है और यदि वे विकसित रहती है तो उनसे हानी भी क्या है। आकाश में बादलों के छा जाने से अथवा बिखर जाने से सूर्य का क्या बनता या बिगड़ता है ? 25:54 यह श्लोक इसी प्रकार का श्लोक पंचदशी में आता है - 

माया मेघो जगत निरम बर्शेते यथा तथा

महाकाशेती का हानि लाभमपी विद्यते |  

 `

  माया रूपी मेघ कैसे भी बरसो बादल बने तो सूर्य का क्या हुआ,बादल बिखरे तो सूर्य का क्या घाटा। बादल खूब बरसे तो आकाश में थोड़े कीचड़ होगी और बदल बरसे बिना बिखर गए तो भी आकाश में कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं होगी। जो शुध्द आकाश है वह ऐसे का ऐसा है। ऐसे ही जिसने माना नही जिसने जाना है, जिसने जानकर अपने स्वरूप में संसार की मिथ्यात्व को जान लिया है, अपनी चेतना को जान लिया है, वो बुद्ध पुरुष कभी तो सर पर गठरी ले के कर चले तो क्या ,राज करें तो क्या, नृत्य करें तो क्या , समाधि करें तो क्या, क्योंकि उसने एक बात हकीकत जान ली है कि सारा विनोद है , सारा खेल है, खेल में तुम सम्राट बने तो अहंकार नहीं आएगा तुम भिखारी बने तो संसार नहीं आएगा क्योंकि तुम्हारी वहां कृति नहीं है केवल वृति है। वहाँ तुम कृत्य को सत्य नही मानते हों। अभिनव करते हो तो कभी कृत्य को सत्य मानते हो ?  कृति में और वृति में फेर है ,तुम्हारा जन्म तुम्हारे हाथ में नहीं है | ,तुम्हारा जन्म तुम्हारे करने से नहीं होता है , और मौत भी तुम नहीं करते हो , वह हो जाती हूं तो तुम्हारा आदि भी तुम्हारे हाथ में नहीं ,तुम्हारा अंत भी तुम्हारे हाथ में नहीं ,तो तुम्हारा मध्य तुम्हारे हाथ मे केसे।

क्या साँस तुम ले रहे हो तुम्हारी कोशिश से जी रहे हो तुम ??? नही तुम्हारे कोशिश की तो एक साँस ज्यादा लेकर दिखाना मौत के समय, नहीं होगा। तुम्हारी कोशिश से खून बह रहा है ? नही |  तुम्हारी कोशिश से प्रयास से बाल बढ़ रहे है, नही तुम्हारे प्रयास से साँस चल रहे है नही, जी आदि भी है, अंत का मालिक है तो मध्य  का मालिक भी वही तो हैं।






शनिवार, 5 सितंबर 2026

महासत्संग (लापरवाही) 06-03-2026

 



        नारायण नारायण नारायण ओम। जो बात करते हैं उनका कान पकड़ के बाहर ले जाओ सिक्योरिटी वाले कमांडो जाओ जल्दी। सुबह सुबह शोर करते हैं आश्रम में रहने के लायक नहीं है। जो भी आवाज करे कान पकड़ के एकदम बाहर आश्रम के इधर नहीं वहां इधर थोड़ी कर रहे हैं। चाहे माई हो चाहे माई का बाप हो बेशरम लोग सुबह सुबह इधर शोर मचाने आए। वही खड़ा रहो पीछे जहां भी चिल्लाए कान पकड़ के तुरंत बाहर आश्रम के गेट के बाहर।

        चलते चलते बोलने से भी ऊर्जा बहुत नाश होती है। दिमाग कमजोर होता है।

        अभी आरती करने का समय नहीं हुआ। सब लोग आरती जलाए तब करो। मेरे को एक की एक बात कई बार कहनी पड़ती क्योंकि मूर्खों की तादाद ज्यादा है।

        राजा का संदेश वाहक फौजी उसके घोड़े की नाल की कील निकल गई थी। तो पुराने फौजी ने कहा तू संदेश वाहक है कील निकल गई कील लगवा दे। बोले हां लगा दो। दो पांच दिन बीते पूछा कील लगवा दी? बोले एक पाई की कील है। एक पैसे  होती थी। लगवा दो। फिर पांच सात दिन बीते पूछा लगवाई? अबे एक दो पाई के लिए कील लगाने में क्या आप इतना रोज रोज चिंता करते मैं लगवा दूंगा।

        कुछ दिन बीते राज्य को पड़ोसी दो राज्यों ने घेर लिया। राजा तक खबर पहुंची राजा ने सेनापतियों को व्यूह रचना का आदेश दिया और जो भी जरूरी बातें थी वो लिख कर संदेश वाहक को चिट्ठी दी बोले जा घोड़े को उड़ा। वो गया घोड़े को उड़ा उड़ा आया।

        घोड़ा दौड़ा तो कील जो एक निकली थी तो दूसरी ऐसे करते नाल निकल गई और घोड़ा धड़ाक से गिरा। सैनिक सिर के बल से गिरा चिट्ठी हाथ में पड़ी रही जिन्होंने घेरा था वो देखा कि राजा भाग गया क्या हुआ इनको तो संदेशा ही नहीं आता तो चलो आगे बढ़े और राजा के महल को घेर लिया जब राजा बंदी बन गया तो सेनापति क्या करेगा?

        कहावत हुई

    कील ना ठोका है घोड़ा गिरा, सैनिक लापरवाह नीच मरा, देश हारा,

        संदेश - लापरवाह आदमी नीचों का शिरोमणि है। नीचों को गिनते जाओ तो लापरवाह से बड़ा कोई नीच होता ही नहीं है।

        कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा लापरवाह अभागा सैनिक मरा देश हारा

        आजकल लापरवाही सबके जीवन में घुस गई।अब ये व्हीलचेयर थी कल इसकी बैटरी डाउन हो गई। उसको बैटरी रिचार्ज करना था भूल गया लापरवाही तुम्हारे सामने उठ बैठ कर आई।

    आपने देखा? कहावत पक्की है जीभ तालू में लगाओ बहुत कुछ तुम्हारा व्यवहार बिगड़ता है लापरवाही से जीभ तालू में लगाओ मैं बोलता हूं उसको मन में रटो और अपने परिवार को लापरवाही की नीचता से ऊपर उठाओ।

        कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा सैनिक मरा देश हरा ये बहुत पुरानी कहावत है। घोड़े के पैर में नाल में कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा सैनिक मरा देश हारा

        मैं तो भूल गई मैं तो भूल गया मतलब ये लापरवाह नीच लोगों की बात है।

        इसीलिए उसको मैंने उठ बैठ कर आई तुम्हारे सामने उसकी कुछ और भी नालायकी थी तो मैंने निकाल दिया था। 

        भगवान राम के गुरुदेव बोलते थे वशिष्ठ मुनि हे विधाता मेरे ऐसे दिन कब आएंगे? उठूं तो सामने गाय दिखे पीछे देखूं तो गाय दिखे दाहे बाए देखूं तो गाय दिखे | ऐसी गौशाला में भी उसको मजा नहीं आया। माफीनामा भेजा ये वो फिर उसको बुलाया तो फिर वही अपनी दिखाई टोकेलेमें बोलना उसको असर नहीं करेगा यहां उसको अनुभव कराया नालायक को जाहिर करना पड़ता है कि सेवा में नालायक है।

        ऐसे ही एंपलीफायर का आवाज गाने वाले आवाज लापरवाही से रखते हैं तो उनको अभी खुलने में मैं टोकता हूं बोल बोल के तो थक गया। कुछ सुधार तो हो ही रहा है। सुन रहे हैं म्यूजिशियन वाले सुन रहे हैं लापरवाह

        मैंने रास्ता खोज लिया है जो लापरवाही किया और दो चार दिन में एक दो बार पकड़ा गया उसको घर भेज दूंगा। बड़े में बड़ी सजा है क्योंकि इधर ऐसे माहौल में रहे हुए हैं घर में तो आधा पौना किलो सब्जी में पूरा परिवार खाता है। यहां सब्जी खाते जो रहने वाले आधा किलो 400 ग्राम 500 ग्राम घर वाले तो एक दिन भी नहीं दे सकते बेचारे तो उनको घर भेजे तो एक ही कमरे में दो पांच रहते हैं कई जगह..यहां तो खुले में बड़ा हॉल है कोई कहीं कोई कहीं बड़े कमरे हैं दो दिन भी घर भेजो ना तो उनको पता चल जाता है क्या आश्रम की जिंदगी तो आश्रम की है। 15 दिन घर रहो सजा..एक महीना जाओ घर रहो उससे सुधार हुआ है.

        तो मेरी दयालुता का दुरुपयोग हुआ और अव्यवस्था..वर्षों तक एंपलीफायर संभालते हैं म्यूजिशियन संभालते हैं अभी भी मेरे को कहना पड़ता है तो मेरा कितना दुर्भाग्य है।

        अब मैंने अपना रुख बदला है। बोलते हैं दया धर्म का मूल है ये मैं जानता हूं। लेकिन दया डाकिन है ये भी मेरे को पता चलवा दिया लापरवाह कमीनों ने अनाधिकारी पर दया करना वो डाकिन है |

        कील ना ठोकाई तो देश कैसे हारा, लापरवाह नीच से अपने परिवार वालों को ये कथा सुनाना, लापरवाही छोड़ दे, चाहे खाना बनाने की लापरवाही हो चाहे झाड़ू की..राम कृष्ण परमहंस इतने भगवत ध्यान में मां के भाव में मस्त रहते कोई सोने की गिनिया भी रखता तो क्या करूं मैं, गंगा जी में फेंक देते |

        ध्यान समाधि से उठे आश्रम वासी सब्जी ले आया था क्या लाया है बोले बैंगन लाया हूं क्या भाव लाया बोले दो आने से हैं? डेढ़ आने से मिलता है तू दो आने कैसे लाया अच्छी तरह से उसको डांटा..झाड़ू लगाते लगाते कहीं कचरा रह गया अच्छी तरह डांट देते थे..

        लापरवाही जैसा दुर्गुण और कोई हो तो बताओ कील ना ठोकाई नालत है ऐसे लापरवाहों को सूरत आश्रम का सब्जी खरीदने में कोई गया हरी मिर्ची हम ₹2 ₹3 में खरीद लेते वो ₹50 में ₹70 में और ₹80 में खरीद के आया  आज सुबह उनसे पूछा सब उसको मैंने कहा आश्रम में रहने के लायक नहीं हो अपने घर चले जाओ आज सुबह की बात है 5:00 बजे की 5:30 की अच्छे पद वाला आदमी था मैंने कहा नहीं तुम जहां से आए वही जाओ दो चार पाच रपए में जो चीज मिलती है वो ₹50 ₹70 ₹80 खरीदे हरी मिर्ची ₹80 होती है क्या? ₹50 हरी मिर्ची होती है क्या?

        ₹2 ₹3 बहुत हो गया बोले फाफड़ा मिर्ची है र डेढ़ मिलते है, तो फाफड़ा मतलब फीकी फीकी मोटी मोटी 50 वाली बोले फाफड़ा मिर्ची है, तेरा मुंह काला, अभी उसका दिमाग चकरा रहा है। युवक नहीं है छोटा लड़का नहीं है तीन बच्चों का बाप है, वो भी इतना गलती करे तो आश्रम में कैसे रहेगा, कौन सा पद दे क्यों दे, धर्म की चीज का बिगाड़ करना, मेरी बिगाड़ हो तो मेरी जिम्मेदारी होती है। नारायण नारायण 

        अपना अपना जो पद है उसका अगर सही उपयोग नहीं किया तो आप उस पद के नालायक हो उस पद से हटाए जाओगे। ये कुदरत का नियम है। अगर मैं आध्यात्मिक रास्ते जाता हूं तो और मेरा पद चमकता है अगर मैं उस रास्ते के बहाने दूसरे रास्ते चलता हूं तो मेरे को खुद को भी संतुष्ट नहीं रहेगा लोगों को भी लोग आना ही बंद कर देंगे लोगों को फायदा नहीं होगा तो कैसे आएंगे?

        आज से 65 साल पहले 65 - 60 मैं डिसा में रहता था एकांत में ही रहता था साधना में लेकिन गुरु जी को लोगों ने प्रार्थना किया तो गुरु जी ने कहा थोड़ा बहुत सत्संग किया करो।

        डिसा के पास में किसी जगह पर मेरा सत्संग आयोजित हुआ जो भी वहां मैदान था वो भर गया उसमें एक साधु बैठा था आगे..मैं सत्संग करूं उसके आगे बड़ी उम्र का था वो इंतजार कर रहा था कि कब पूरा हो तो बाबा से मिलूं मेरे से आया अकेले में मिला

        मैं उस समय 23 -24 साल की उम्र का था वो होगा 70- 80 का 80 तो नहीं 65 से 75 के बीच का..रो पड़ा मैं क्या क्या बात है महाराज जी साधु वेश था बोले मैं आया तो लोग मानते थे बड़ा दुखड़ा रोया कभी कोई पूछता ही नहीं पूछता ही नहीं शब्द उसका नहीं है मेरे को बोलने में कोई शब्द अदल बदल हो जाता है। तो मैं सावधान तो रहता हूं लेकिन बोलने में होता है।

        मैंने उसके सामने देखा और उसका इतिहास उसको बता दिया। मैंने कहा तुम साधना करते थे एकाग्रता की साधना करते थे बोले हां..तो त्राटक से जो शक्ति पैदा हुई पानी को देख के देते थे लोगों को फायदा होता बहुत.. अभी नहीं होता है। मैंने कहा वो शक्ति खत्म हो गई। लोगों का काम नहीं होता। तो लोग क्यों आएंगे, क्यों पूछेंगे?

        उतना उसको नहीं बताया जो तुमको समझा रहा हूं। तो आप जिस ढंग से जिस पद का उपयोग करते हो पद तुम्हारे ही है। वही कीमत रखेगा। आपकी योग्यता नहीं है तो पद आपको पटक देगा। अभी मेरा कोई कार्यक्रम नहीं था। लेकिन आए होंगे और बिना मेरी उपस्थिति के थोड़े इधर थोड़े उधर गुड़गुड़ गुड़ करके प्रभात खराब कर रहे हैं।

        इसलिए मैं कहा हम जाए तो दुर्वचन कह दे बाद में मेरे को अपना नियम भी करना है आज जाना भी है। है ना खुशखबरी तालियां नहीं बजाते। बजा रहे हैं। जा रहा हूं तो तालियां बजा रहे हैं। खुशखबरी है। जान छूटी तुम्हारी। समझदारी है कि लापरवाही है?

                मूर्खों में हो कि अकल वालों में हो?

        कर ली तुम्हारी परीक्षा। मिल गया प्रमाण पत्र। आज जा रहा हूं खुशखबरी है ताली बजाओ खुशखबरी है। आज मैं जा रहा हूं ये खुशखबरी मान के ताली बजा दी। है कोई समझदारी से कोई है रिश्ता नाता? अकल से कोई है परिचय?

        अकल क्या होती है पता भी नहीं चल रहा है। ताली ठोकने वाले लगभग ऐसे ही होते हैं। बैठते भक्तों में साधकों के बीच में। पता ही नहीं ताली ठोकने से और कितना छूट जाता है कितना बिगड़ जाता है।

        work while you work play while you play , That is the way, to be happy

        वो रटे रटाए तो हो तुम लोग लेकिन अमल कौन करता है? अमल करे उसकी बलिहारी।

        चलो। नारायण हरि हरि ओम हरि। 19- 20- 21- 22 मोटेरा में शिविर भी दे दिया आज। अब ताली बजाने की है क्या जरूरत? मूर्ख लोग हैं खड़ा कर दो उनको बाहर भेज दो। ये तीन माईया,अभी-अभी तालियां बजाई। इनको बाहर भेजदो..

        बाहर अकल की दुश्मन बिन जरूरी ताली ठोकना जा के घर पे ठोको। अकल नाश करके इधर सर खपाने आती है। अब आपको भी ऐसे ही होगा। बिन जरूरी ताली ठोकी तो माइयो को हुआ ऐसा आपको होगा।

        मेरा स्वभाव इतना कड़क नहीं है। लेकिन आप लोग कृपा करके मजबूर कर देते हो। आई बात समझ में?

        किसके आगे परमात्मा की बात बोलूं? किसके आगे ध्यान भजन की बात करूं? इतनी अकल नहीं ताली नहीं ठोकना है तो ठोक रहे। किसके आगे बोलूं?

        मेरा समय बहुत कीमती है। मैं अकेले में बहुत काम कर लेता हूं। साक्षात्कार पार पुरुष बोलता है तो सामने होते उतने लोगों को ही फायदा होता है। वो भी ऐसों को नहीं जिनको निकाला ऐसे लोगों को फायदा नहीं होता। जो तत्परता से सुनते हैं उनको होता है। अकेले में बैठते तो ब्रह्म लोक तक के सत पात्रों को मदद मिलती है। क्या आप क्या समझते हो?

        कुछ बात समझ में आ रही है? आत्म साक्षात्कार पुरुष का समय कितना कीमती होता है कुछ दिमाग में आ रहा है?

        वो बोलते उतने लोगों को जो ग्रहण करता है फायदा होता है। उनकी दृष्टि पड़ती उनका फायदा होता है उनको। लेकिन एकांत में बैठते अपनी व्यापकता में ध्यानस्थ ये वो होते हैं। वो ध्यानस्थ में आंखें बंद ही करें वो कोई जरूरी नहीं।अविकंप योग होता है।

        आंखें बंद करके ध्यान समाधि लगी वो ध्यान योग है।

        खुल्ली आंख युद्ध में भी समाधि की मस्ती बंसी बज रही है,, उपदेश हो रहा है, और कृष्ण का समाधि है। इसको बोलते हैं अविकंप योग।उसका वर्णन भी है गीता में। तो हमारा रास्ता अविकंप योग का है। आई बात समझ में?

        आज डांट और गलतियां निकालना ये भी सत्संग है महा सत्संग है। मूर्खता निकालना भी महा सत्संग है। मूर्खता गई तो बुद्धिमत्ता है। लापरवाही गई तो समझदारी आई। हो गया ना सत्संग?

    अच्छा लगा कि ये जो डांटने वाला अच्छा नहीं लगा? बड़ा हितेषी है। खिल न ठुकाई..हां..

        आप बीमारी छोड़ दो तो स्वास्थ्य अपने आप हो जाता है। आप गलती छोड़ दो तो सही अपने आप हो जाएगा। हां अज्ञान छोड़ दो तो ज्ञान अपने आप होगा। अज्ञान छोड़ दिया तो क्या रहेगा?

        हे भगवान हमको मिलो ये करो वो करो। जल्दी हमारा कल्याण हो बापूजी ये कर दो। बापूजी जो बोल रहे वो करना नहीं है ऐसे ही सिर खपाते तो उनको मैं बस उनको सुना अनसुना करता हूं। वो मेरे नजर में ज्यादा वैल्यू वाले लोग नहीं होते। समझ गए? तभी काम चल रहा है।

        सभी की बात को ध्यान में सुनूं तो तुम्हारे लिए समय नहीं बचे। कई मूर्ख होते उनके भविष्य को तबाह होता हुआ देखता हूं तो उनको बोलता हूं फिर वो अपनी सफाई मारते में चुप हो जाता हूं। अच्छा अच्छा ठीक है जैसे तुमको ठीक लगे ऐसा करो।

        एक बार लक्ष्मण जी झाड़ियों में बड़े दुखद आवाज से रो रहे थे। सीता जी के कान पड़ी बात दौड़ के गई झाड़ियों में छुपे हुए देवर जी ऐसा रुदन..खूब प्रयत्न करके उनसे पूछ ही लिया इतना इतना क्या दुख हुआ? इतना क्या क्या पता क्या हुआ?

        बहुत मेहनत करके रोते रोते आवाज में लक्ष्मण ने कहा कि मैं अनाथ हो गया। कैसे? अनाथ कैसे? बोले मुझे मेरे स्वामी ने त्याग दिया। सीता समझ गई स्वामी तो इनके मेरे पति देव है। दौड़ी राम जी जहां थे लखन भैया बड़ा पीड़ित होकर आक्रांत कर रहे हैं। बहुत प्रयत्न किए बहुत बहुत मेरे को मश्कत करनी पड़ी तब बोले मैं अनाथ हो गया मेरे स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया। राम जी को आश्चर्य हुआ।

        सीता को बोले हट दिखा मेरे को दीखा । पहुंच गए अनुज अमित बड़ा छोटा भैया राम का आवाज सुनकर छोटे भैया को शांत होना ही पड़ा।

        तुम्हारा मैंने त्याग कर दिया? मुझे तो स्मरण नहीं है। कब त्याग किया मेरे को स्मरण नहीं.. राम जी भी द्रवित हो गए। और ये बात करते मैं भी द्रवित हो रहा हूं। बात ही ऐसी है। लखन जैसा बहादुर रोए और व्याख्या सत्संग करना कोई मजाक की बात नहीं। कथाकार भले ठोकम् ठोक कर दे लेकिन सच्चे हृदय से करेंगे तो अपना चित्त द्रवित तो हो ही जाएगा।

        प्रभु मैंने पूछा कुटिया कहां बनाए? आपने कहा तेरे को ठीक लगे। मेरे को मन के हवाले छोड़ दिया मैं अनाथ हो गया। राम जी बोले लखन मेरी गलती है। गलती है अच्छा अच्छा बताता हूं। उसके बाद राम जी ने शायद कभी नहीं कहा होगा कि तेरे को ठीक लगे.

        कैसे सूझबूझ के धनी हो गए अपने देश में लखन की बुद्धि कितनी बढ़िया थी। और राम जी का कौशल्य कितना बढ़िया था। आज तो मां कोई हित का को बोलती है तो थोबड़ा चढ़ जाता है। कोई हितेषी हित की बात बोलती है तो मूड बदल जाता है। कहीं घसीट के तो उनके साथ तबाही के रास्ते चल पड़ते हैं। पार्टनरशिप करते हैं फलाना करते हैं तबाह हो गया फिर तो। है ना एक से एक बार अनुभव

        तो क्या कर होती है? तू लखन है क्या बापू है?

        जप करो ध्यान करो चुप बैठो शोर नहीं करो बस।

        कील न  ठुकाई अच्छा लगा कि ये जो डांटने वाला अच्छा नहीं लगा? 







ज्ञानी का स्वभाव - part 1

          16 5 1982 सत्संग           परमात्मा का चिंतन करते करते तन के  विकार कम होते हैँ, रजो तमो गुण घटते जाते हैं, रजो और तमो गुण मे द्वे...