रविवार, 1 मार्च 2026

आश्रम संध्या सत्संग 26-02-2026 शाम | Surat Holi 2009

 

आश्रम संध्या सत्संग 26-02-2026 शाम |  Surat Holi 2009 

TIME STAMP INDEX

0:03 हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम (कीर्तन)
0:17 रात का सत्संग भगवान रामचंद्र के गुरुदेव वशिष्ठ जी महाराज के उपदेश पर था (उपदेश)
0:39 हम राम नहीं और हम वशिष्ठ नहीं, फिर भी वही उपदेश सुनने, विचारने और अनुभव करने का सौभाग्य मिला है (उपदेश)
1:43 वशिष्ठ जी कहते हैं कि सत्य शास्त्रों का श्रवण करो और ज्ञानवानों की संगति करो (उपदेश)
2:01 संगति से साधक आनंदित होते हैं, यह अनुभव स्पष्ट है (प्रशंसा)

2:18 यह आनंद पकोड़े, जलेबी या सुविधा का नहीं, आत्मरस का है (उपदेश)
2:38 असुविधाओं के बीच भी साधक आनंदित हैं, इसलिए बार-बार आते हैं (उपदेश)
3:35 वशिष्ठ और राम जिस रस को पाते थे वही रस यहां बरस रहा है (उपदेश)
3:52 श्री कृष्ण और उनके ग्वालबालों का रस भी यहां अनुभव हो रहा है (उपदेश)
4:15 सत्संग का लाभ स्वर्ग या करोड़ों की कमाई से भी बढ़कर है (उपदेश)

4:51 संसार का सुख दुख और विकार से जुड़ा है, आनंद दुख सहने और उखाड़ने की शक्ति देता है (उपदेश)
5:42 जैसे पतंगा दीये में जलता है, वैसे बाहरी सुख की लालसा जीव को फँसाती है (दृष्टांत)
6:28 माया, अविद्या, अस्मिता, राग और द्वेष जीव को भटकाते हैं (उपदेश)
6:57 जब दिल में ही दिलबर का रस है तो बाहर भटकना व्यर्थ है (उपदेश)

8:44 आत्मा का आनंद परमात्मा का स्वभाव है, नाम है सच्चिदानंद (उपदेश)
9:21 जो आदि में सत्य था, अभी भी सत्य है और बाद में भी रहेगा वही अकाल पुरुष आत्मदेव है (उपदेश)
10:04 परमात्मा सत, चेतन, ज्ञानस्वरूप और आनंदस्वरूप है (उपदेश)

11:29 हुक्के में तंबाकू की गंध जैसे रहती है वैसे आत्मरस से भरा व्यक्ति हर कर्म में ब्रह्मरस फैलाता है (दृष्टांत)
12:48 यहां हर दिशा में ब्रह्मरस है, प्रसाद में भी और विनोद में भी (उपदेश)

13:27 हरिद्वार नाम पर विवाद हुआ, न्यायाधीश ने उल्टा निर्णय दिया जिसे समाज ने अस्वीकार किया (प्रसंग)
14:46 यह ब्रह्मज्ञान और भारतीय संस्कृति की पद्धति है कि भलाई बांटो (उपदेश)
15:09 विरोधियों ने निंदा की पर हमने अपशब्द नहीं कहा, यही संस्कृति है (उपदेश)
15:38 भारतीय संस्कृति का संदेश है सर्वे भवंतु सुखिनः, दुर्जन भी सज्जन बनें (उपदेश)
16:01 यह शरीर और घर मेरा नहीं, मिला हुआ अस्थायी खोखा है (उपदेश)

16:08 शरीर का उपयोग करो मेरा करके, लेकिन यह आप नहीं हो यह समझो (उपदेश)
16:15 कई लोग शरीर को ही ‘मैं’ मान लेते हैं, यही मूल भूल है (उपदेश)
16:23 शरीर छूट जाता है, दुख आता-जाता है, सुख आता-जाता है, पर आप साक्षी रूप में रहते हैं (उपदेश)
16:36 चिंता और शरीर मर सकते हैं, पर आप नहीं मर सकते; भगवान भी आपको नहीं मार सकते (उपदेश)
16:49 भगवान साक्षी हैं, शरीर प्रकृति के अनुसार नष्ट होता है पर आत्मा नहीं (उपदेश)
17:06 भगवान में भी आत्मा को नष्ट करने का सामर्थ्य नहीं है (उपदेश)
17:21 अपने इष्टदेव से कह देना कि आत्मा अमिट है, भगवान प्रसन्न होंगे कि बच्चा शरीर को ‘मैं’ नहीं मानता (संवाद)
17:42 घड़ा, केबिन, मकान टूट सकते हैं पर उनमें व्याप्त आकाश नहीं टूटता (दृष्टांत)
18:11 व्यापक आकाश अलग नहीं होता, वैसे ही आत्मा सर्वव्यापक है (दृष्टांत)
18:20 भगवान भी आत्मा को नहीं मिटा सकते, आप अमिट चैतन्य हो (उपदेश)
18:38 जैसे शरीर में कीड़ी, कांटा, मक्खी का अनुभव साथ में होता है क्योंकि आप सर्वत्र व्याप्त हो (दृष्टांत)
19:08 तत्वरूप से आप सर्वव्यापक हो, केवल शरीर तक सीमित नहीं (उपदेश)
19:18 भगवान सत-चेतन हैं तो आपका आत्मा भी सत-चेतन है, वही जड़ शरीर को चेतना देता है (उपदेश)
19:32 भगवान ज्ञानस्वरूप और आनंदस्वरूप हैं, यह आनंद बाहर से नहीं लाया जाता (उपदेश)
20:06 जो कल नहीं आए वे हाथ कैसे उठाएँ, इस ज्ञान में भी आनंद है (संवाद)
20:21 ज्ञान का भी आनंद होता है क्योंकि परमात्मा ज्ञानस्वरूप और आनंदस्वरूप है (उपदेश)
20:35 परमात्मा सत, चेतन, ज्ञान और आनंद रूप है; वास्तव में वही आप हो (उपदेश)
20:50 “आपे लाडा आपे लाडी…” सबमें वही एक परमात्मा है (भजन)
21:06 “मैं दुखी, मैं भयभीत, मैं बीमार” कौन कहता है, खोजो; मन कहता है तो आप मन नहीं हो (उपदेश)
21:28 “जिन खोजा तिन पाया” आत्मखोज से सत्य प्रकट होता है (उक्ति)
21:37 काका के मरने पर रमण ने पूछा “कौन मरा?”, खोजते-खोजते वे रमण महर्षि बने (प्रसंग)
22:03 मोरारजी देसाई और Paul Brunton उनके चरणों में शांति पाते थे (प्रसंग)
22:22 एक पंडित दिखावा कर रहा था तो महर्षि ने डंडा उठाया, पर भीतर क्रोध नहीं था (प्रसंग)
23:17 अष्टावक्र कहते हैं ब्रह्मज्ञानी ऊपर से खिन्न दिखे पर भीतर शांति रहती है (उपदेश)
23:47 “ब्रह्म ज्ञानी सबका ठाकुर” – ऐसा कथन संतों ने कहा (उक्ति)
24:04 विनोबा भावे ने कहा “भगवान बिछड़ते तो मिले हैं, वे तो अपना आपा हैं” (संवाद)
24:29 उन्होंने कहा आत्मसाक्षात्कार चोरी का माल नहीं कि छुपाऊँ (संवाद)
24:49 संत को सताने से तेज, बल और वंश नष्ट होते हैं; रावण, कौरव, कंस उदाहरण हैं (उपदेश)
25:18 जुल्मी जुल्म करे, संत सहते जाए, पर प्रकृति माता न्याय करती है (उपदेश)
26:06 तुकाराम पर गर्म पानी डाला गया, पर प्रकृति ने दंड दिया (प्रसंग)
26:20 संतों की निंदा से शांति, सूझबूझ और खुशी नष्ट होती है, परिवार में कलह बढ़ता है (उपदेश)
27:06 प्रभु से प्रार्थना कि संगति से जीव आनंदित हों, यही चदरिया ओढ़ने का भाव है (प्रार्थना)
27:46 ज्ञान, ध्यान, भक्ति के रंग से अंतःकरण रंगे तो सहनशक्ति बढ़ती है (उपदेश)
28:12 लक्ष्य केवल सांसारिक लाभ नहीं, मोक्ष और परमात्म सुख है (उपदेश)
28:28 सब भगवान में हैं, भगवान में जीते और भगवान में ही शरीर मिटेगा (उपदेश)
28:42 “मेरा मुझ में कुछ नहीं…” सब कुछ भगवान का है (भजन)
28:59 संसार का प्रेम भी अपने सुख के लिए है क्योंकि आत्मा सुखस्वरूप है (उपदेश)
29:37 बाहर सुख खोजते-खोजते थक जाओगे, आत्मा के आनंद में आओ तो व्यवहार आदर्श होगा (उपदेश)
29:59 सुख लेने के बजाय सुख देना प्रारंभ करो, भीतर का आनंद जागेगा (उपदेश)

 30:07 संत सदा आनंद में रहते हैं, उनके लिए आठों पहर दिवाली है (उपदेश)

30:15 इंद्र के लोक में नर्तकी और गंधर्व गाते हैं, फिर भी इंद्र को बाहरी साधनों से आनंद चाहिए (दृष्टांत)
30:24 ब्रह्मज्ञानी जहां दृष्टि डालते हैं वहां लोग आनंदित हो जाते हैं, उन्हें अप्सराओं के नाच की आवश्यकता नहीं (उपदेश)
30:43 अखा भगत ने कहा “यह हो जाए फिर भजन करेंगे” इस भ्रम में मत पड़ो (उक्ति)
31:10 “अंधारो कु झगड़ो मटाड़ी कोई ना” अभी और यहीं ईश्वर का स्मरण करो (भजन)
31:31 अखा भगत ने कहा सजीव मनुष्य निर्जीव पत्थर को गढ़कर भगवान बनाता है और फिर उससे मांगता है (उपदेश)
32:26 अखा भगत पूछते हैं तुम्हारी एक आंख गई या दो, जो खुद बनाकर उससे मांगते हो (दृष्टांत)
32:58 भगवान से “यह दे, वह दे” मांगना आरंभिक भक्ति है (उपदेश)
33:27 सतगुरु मिलने पर भक्ति परा भक्ति बनती है, जहां भगवान से कुछ नहीं मांगते (उपदेश)
33:52 “तुर्क दुनिया तुर्क उकबा” न दुनिया चाहिए न स्वर्ग, केवल आत्मस्वरूप का बोध चाहिए (उपदेश)
34:37 परा भक्ति में रब सतगुरु बनकर जीवन को सींचता है (भजन)
35:00 सतगुरु को मत्था टेकने से अहंकार पिघलता है और आनंद प्रकट होता है (उपदेश)
35:34 भगवान शिव ने पार्वती को वामदेव से दीक्षा दिलाई (प्रसंग)
35:45 विठ्ठल की आज्ञा से नामदेव ने शिवोबा खेचर से दीक्षा ली (प्रसंग)
35:53 मां काली की आज्ञा से गदाधर ने तोतापुरी से दीक्षा ली और रामकृष्ण परमहंस बने (प्रसंग)
36:12 गुरु दीक्षा बिना आत्मा-परमात्मा का जोड़ नहीं होता (उपदेश)
36:18 Benito Mussolini और Abraham Lincoln के उदाहरण से बताया कि केवल बाहरी सफलता पर्याप्त नहीं (दृष्टांत)
37:12 काम, क्रोध, लोभ, मोह की धाराएं आती-जाती हैं, पर नित्य आत्मदेव शाश्वत है (उपदेश)
37:41 प्रह्लाद का वर्णन प्रेमभक्ति की महिमा बताने हेतु है (प्रसंग)
37:57 हिरण्यकश्यप के घर में प्रह्लाद जैसे भगवद्भक्त का जन्म हुआ (प्रसंग)
38:49 सच्चा प्रेम गुण, धन, रूप या सत्ता पर आधारित नहीं होता (उपदेश)
39:27 भगवान से कुछ पाने के लिए नहीं, उन्हें सुख देने के भाव से प्रेम करना श्रेष्ठ है (उपदेश)
40:07 दिव्य प्रेम लेने का नहीं, देने का भाव है जैसे मां बच्चे से करती है (दृष्टांत)
40:49 प्रेम बिना दिए मानता नहीं, अहंकार केवल लेने में लगा रहता है (उपदेश)
41:04 प्रेम की पहचान है गुणरहित, कामनारहित, प्रतिक्षण वर्धमान और अविछिन्न (उपदेश)
41:18 मीरा बाई की भक्ति कष्टों में भी नहीं टूटी (प्रसंग)
41:31 एकलव्य का गुरु प्रेम अडिग रहा (प्रसंग)
42:23 प्रेम से दुर्गुण मिटते और सद्गुण प्रकट होते हैं (उपदेश)
42:38 वर्षा की रात में बाबा के घर कब्जे की कल्पित कथा से समझाया कि प्रेम अहंकार को हटाकर घर का स्वामी बनता है (दृष्टांत)
44:01 प्रेमभक्ति के मधुमय प्रसाद से सारे दुख समाप्त होते हैं (उपदेश)
44:09 प्रह्लाद प्रेम से निश्चिंत रहते हैं, चाहे पिता शत्रु हो (प्रसंग)
44:23 मीरा बाई गिरधर के प्रेम में अडिग रहीं (प्रसंग)
44:49 मीरा का “निंदक जाए जल मरो” भजन प्रेम की निर्भीकता दिखाता है (भजन)
45:04 पतंगा, मछली, हाथी, भंवरा विषय प्रेम में फंसकर नष्ट होते हैं (दृष्टांत)
45:35 पांच विकारी प्रेम में फंसे लोगों की दुर्गति होती है (उपदेश)
45:54 दुर्गति से बचने के लिए प्रेम की धारा को परमात्मा की ओर मोड़ दो (उपदेश)

46:00 बाहर की वस्तुओं से सुख भरने की भूल मत करो, बाहरी चीजों और लोगों की सेवा में प्रेम लगाओ तो अंदर का औदार्य प्रकट होगा (उपदेश)
46:15 भगवान का नाम प्रीति पूर्वक जपो और एकटक प्रेम से भगवान को देखो, असली प्रेम जागेगा (उपदेश)
46:23 असली प्रेम का रस मिलने से नकली आकर्षण ढीले हो जाएंगे (उपदेश)
46:31 प्रेमी व्यवहार करता है, खाता-पीता है, परिवार निभाता है पर फंसता नहीं, मोह ही फंसता है (उपदेश)
46:42 काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य और अहंकार के घर में भगवान का नाम लेकर प्रवेश करो और धीरे-धीरे उन्हें हटाओ (दृष्टांत)
47:19 प्रह्लाद ने परम प्रेम पाने के दस साधन बताए (प्रसंग)
47:33 पहला साधन मौन, अधिक बोलने से ओज क्षीण होता है, सारगर्भित और सुखद वाणी बोलो (उपदेश)
47:58 दूसरा साधन संयम और ब्रह्मचर्य, काम विकार को राम प्राप्ति का साधन बनाओ (उपदेश)
48:36 तीसरा साधन शास्त्र श्रवण-पठन, “स्वाध्यायम प्रमादो न कुर्यात” लापरवाही मत करो (उपदेश)
49:19 चौथा साधन अविछिन्न धारा, एक बार भगवान से जुड़ो तो फिर टूटो मत (उपदेश)
50:01 पांचवां साधन तपस्या, सेवा और धर्म में कष्ट आए तो स्वीकार कर निभाओ (उपदेश)
50:35 छठा साधन स्वधर्म पालन, अपना कर्तव्य शास्त्रानुकूल और तत्परता से करो (उपदेश)
51:18 सातवां साधन युक्ति से सत्संग और शास्त्र की व्याख्या, ताकि दूसरों को भी मार्ग मिले (उपदेश)
52:04 वस्तुओं का उपयोग करो, प्रेम परमात्मा से करो, गहने-धन साथ नहीं जाते (दृष्टांत)
52:49 आठवां साधन एकांत सेवन, दिन में और रात्रि में आत्मचिंतन से आत्मरस बढ़ाओ (उपदेश)
53:38 नौवां साधन मंत्र जप, नियमपूर्वक जप किए बिना भोजन न करो (उपदेश)
54:04 दसवां साधन समाधि अभ्यास, दीर्घ प्रणव जप से शांति और प्रेम में स्थिरता आती है (उपदेश)

54:48 कर्तव्य वही जो आध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो, अधर्म में साथ देना कर्तव्य नहीं (उपदेश)
56:19 मौन, ब्रह्मचर्य, शास्त्र, तपस्या, स्वधर्म, युक्ति व्याख्या, एकांत, जप और समाधि ये दस साधन दोहराए (सार)
56:26 ओमकार जप से भ्रूमध्य में प्रकाश और संतुलन विकसित होता है (उपदेश)
56:48 “ॐ नमः शिवाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र से सूक्ष्म रंग और ऊर्जा विकसित होती है (उपदेश)
57:27 सूर्य नमस्कार और माता-पिता, गुरु का सम्मान स्वास्थ्य और कृतज्ञता बढ़ाता है (उपदेश)
58:04 केवल सुनकर चले जाने से अल्प लाभ, सेवा भाव से जुड़े रहने से प्रेम प्रसाद प्रकट होता है (उपदेश)
58:39 कबीर ने कहा “प्रेम न खेतों उपजे प्रेम न हट बिकाए” अहं समर्पण से प्रेम मिलता है (भजन)
59:05 “रब मेरा सतगुरु बनके आया” सतगुरु माली बनकर जीवन को सींचते हैं (भजन)





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