सोमवार, 2 मार्च 2026

धन के स्वामी बनें, चौकीदार नहीं !

 धन के स्वामी बनें, चौकीदार नहीं !



 

 0:02 अमेरिका के तत्व चिंतक ने लिखा कि भारत की संस्कृति और धर्म आध्यात्मिक जगत में अरबपति है, जिसने भी पूर्वाग्रह छोड़कर गीता और योग का अध्ययन किया वह भारतीय संस्कृति का हो गया।

0:51 पश्चिमी संस्कृति कहती है जिसकी लाठी उसकी भैंस, दुर्बल को छीन लो, पर भारतीय संस्कृति कहती है दुर्बल का पोषण करो, अमीर गरीब का, भाई बहन का, मां बच्चे का पोषण करे, शोषण से अशांति और पोषण से शांति मिलती है।

1:31 तुझ में राम मुझ में राम सब में राम समाया है कर लो सभी से प्यार जगत में कोई नहीं पराया है नारायण हरे नारायण हरे। (भजन)

1:46 मन प्रसाद सौम्यत्वम मौनम आत्मविनिग्रह भाव संशुद्धि तपो मानस समुच्चते यह मानसिक तप है, जिसके पास जितना मानसिक तप है वह उतना महान है।

2:26 धन अधिक होना महानता नहीं है, इटली के मुसोलिनी ने अरबों खरबों की ज्वेलरी और विदेशी करेंसी इकट्ठी की थी। (प्रसंग)

3:25 युद्ध में हारकर वह ट्रक भरकर हीरे मोती लेकर भागा पर उसे शांति नहीं थी क्योंकि मन प्रसाद और गुरु कृपा नहीं थी।

4:24 शत्रुओं ने पकड़कर गोली मार दी, नगर में शव घुमाया गया, लोगों ने जूते पत्थर फेंके, जीते जी शोषण किया इसलिए अंत में अपमान मिला।

5:09 उसका खजाना आज तक नहीं मिला, 75 अधिकारी और सैनिक उस खजाने को खोजते हुए मारे गए पर एक रुपया भी नहीं मिला।

6:32 कथा है कि जहां उसे गोली लगी वहां उसका प्रेत दिखा और बोला मैं मर गया पर वासनाएं नहीं मरी, धन की लालसा अभी बाकी है, ऐसे धन के पीछे जीवन और मृत्यु दोनों बिगड़ते हैं। (प्रसंग)

7:26 धन व्यवहार के लिए रखो, भजन, सेवा, दान के लिए रखो, जैसे रुमाल का उपयोग करो तो स्वामी हो, उपयोग न करो और केवल रखवाली करो तो चौकीदार हो। (दृष्टांत)

8:46 भगवान कृष्ण अर्जुन को धनंजय कहते हैं, मन का स्वामी बनो तो धन का स्वामी बनोगे, मन और धन का दास बनोगे तो शैतान बनोगे।

9:08 मन सदा प्रसन्न रहे, किसी के लिए बुरा भाव न आए, बीती बात न सोचो, भविष्य विकारों में मन न जाए, शुभ भावना रखो और मौन रहो इससे मानसिक तप सिद्ध होता है।

10:26 मन प्रसाद सौम्यत्वम मौनम आत्मविनिग्रह भाव संशुद्धि तपो मानस समुच्चते यह मन का तप यहां और परलोक दोनों में कल्याण करता है।

11:14 रावण राम के बाणों से मारा गया फिर भी लक्ष्मण से कहा राम जी को प्रणाम कहना क्योंकि राम का मन प्रसादयुक्त था। (कथा)

12:02 एक घंटा दो घंटा मौन का नियम लो, सप्ताह में एक दिन, महीने में कुछ दिन, वर्ष में एकांत व्रत लो इससे मन प्रसाद खिलेगा।

12:28 मौन से प्राण शक्ति बचती है, झूठ निंदा से बचते हैं, मूर्खता छिपी रहती है, चंचलता घटती है, इसलिए मौन में नौ गुण हैं।

13:31 चार मित्रों ने मौन रखा पर एक ने चाबी की बात की, दूसरे ने टोका, तीसरे ने डांटा, चौथे ने कहा हम नहीं बोले, सबका मौन टूट गया, मौन के लिए अभ्यास चाहिए। (प्रसंग)

14:40 वाणी का मौन अलग है, मन का मौन अलग है, मन तीन मिनट मौन हो जाए तो सत्यवचन सिद्धि आती है, बड़ी शक्तियां जागती हैं।

15:14 बोले तो मधुर और सारगर्भित बोलो नहीं तो चुप रहो, घर में झगड़ा हो तो मौन रखो देर सवेर विजय होगी।

15:40 नारायण हरि नारायण हरि। (कीर्तन)

15:52 तुलसी जग में यूं रहो जो रसना मुख माही खाती घी और तेल नित फिर भी चिकनी नाही। (भजन)

17:00 दस ग्राम तेल की मालिश से अस्सी ग्राम घी खाने की शक्ति आती है, शनिवार मंगलवार उचित दिन हैं, रविवार को गुलाब मिलाकर मालिश करो।

17:31 जैसे तेल मालिश का नियम है वैसे मन की मालिश कथा और सत्संग से करनी पड़ती है।

17:42 मालिश के बाद साबुन से स्नान करो नहीं तो रोमकूप बंद होंगे, किडनी पर लोड पड़ेगा, आंखों के नीचे सूजन आएगी और बुढ़ापा दिखेगा।

18:03 — 10 ग्राम तेल की मालिश 80 ग्राम घी पचाने की ताकत देती है, पर तेल को बाद में साबुन से धोकर निकालना पड़ता है।

18:08 — जीभ पर रोज 25-50-100 ग्राम चिकनाहट (घी-तेल) लगती है, पर उसे कभी साबुन से नहीं धोते; क्यों?

18:15 — रचना में ऐसा अंदरूनी रस है कि घी-तेल की चिकनाहट जीभ पर चिपकती नहीं।

18:21 — यदि हृदय में भगवत-रस आ जाए तो संसार की चिकनाहट (मोह-दुख-चिंता) भी नहीं चिपकेगी।

18:28 — मन का प्रसाद प्रकट हो जाए तो हृदय में दुख-चिंता ठहर नहीं सकती।

18:35 — (दोहा) “तुलसी जग में यूं रहो…” — संसार में रहते हुए भी भीतर अलिप्त रहो।

18:50 — (दोहा) “जो रसना मुख माही, खाती घी और तेल नित…”

18:57 — (दोहा) “खाती घी और तेल नित, फिर भी चिकनी नाही…”

19:02 — (कीर्तन) “हरि हरि ओम” — भगवन्नाम से मन की शुद्धि का संकेत।

19:12 — (कीर्तन) “राम… हरि हरि ओम…” — नामस्मरण से चित्त की प्रसन्नता।

19:37 — प्रश्न: मन का प्रसाद (प्रसन्नता) कैसे पाएँ?

19:44 — उत्तर: मन की प्रसन्नता पूर्ण भाग्य-उदय की निशानी है।

19:52 — व्यक्ति या वस्तु से राग न करें; नहीं मिले तो अप्रसन्नता होगी।

20:03 — जो आए उसे स्वीकारें, न आए तो उसकी मर्जी समझें।

20:08 — उदाहरण: आज करेले की इच्छा थी, पर बाजार में न मिले तो दुख क्यों?

20:14 — कुदरत ने छह रस बनाए: खट्टा, खारा, मीठा, तीखा, तुरा, कड़वा।

20:29 — हम पाँच रस तो खाते हैं, पर कड़वा रस से बचते हैं।

20:35 — करेला और नीम में कड़वा रस स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है; पहले लोग स्वस्थ रहते थे।

20:45 — आजकल करेला का कड़वापन निकालकर खाते हैं, जिससे लाभ घट जाता है।

21:01 — छह रस का संतुलन आवश्यक है; असंतुलन से रोग बढ़ते हैं।

21:12 — संतुलन न हो तो छोटी-छोटी बातों से रोग व अशांति घेर लेती है।

21:26 — आग्रह न रखें कि रोज यही खाएँगे; जो मिले स्वास्थ्य हेतु ग्रहण करें।

21:39 — वस्त्र, व्यक्ति, परिस्थिति जो मिले, आदरपूर्वक व्यवहार करें पर आसक्ति न रखें।

21:52 — तुलना (दो फ्लैट, शेयर मार्केट) से जलन होगी तो प्रसन्नता चली जाएगी।

22:04 — संसार की दौड़ में मन भी घूमता रहेगा; जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा।

22:16 — घूमते धन को मत देखो, उस परमात्मा को देखो जो सबको घुमा रहा है।

22:23 — संसार को सच्चा मानने वाला मन भी शेयर मार्केट की तरह चंचल रहता है।

22:38 — व्यक्ति-वस्तु से राग-द्वेष त्यागने से मन प्रसन्न रहता है।

22:43 — स्वार्थ और अभिमान त्यागने से प्रसन्नता टिकती है।

22:49 — पक्षपात न रखने से मन स्थिर रहता है।

22:56 — दया, उदारता, क्षमा से प्रसन्नता आती है।

23:02 — प्राणी मात्र का हित चाहने से मन निर्मल रहता है।

23:09 — उचित आहार, एकांत, दुर्गुणों से दूरी प्रसन्नता में सहायक है।

23:16 — सत्संग और महापुरुषों के दीदार से मन स्वतः प्रसन्न होता है।

23:33 — भगवान के पाँच साधन: मन-प्रसाद, मौन, आत्मनिग्रह, भाव-शुद्धि, एकाग्रता-तप।

23:57 — राग-द्वेष त्याग पहला साधन है।

24:06 — स्वार्थ, अभिमान, पक्षपात का त्याग दूसरा साधन है।

24:12 — दया, उदारता, क्षमा तीसरा साधन है।

24:19 — प्राणी मात्र का हित-भाव चौथा साधन है।

24:26 — समता: दुख आए तो घबराएँ नहीं, सुख आए तो अहंकार न करें।

24:47 — अभिमान-स्वार्थ त्याग से भाव-शुद्धि होती है।

24:54 — संसार का सहारा छोड़ भीतर से भगवान का सहारा लें।

25:08 — जितना संसार का सहारा, उतनी अशांति; जितना भगवान का सहारा, उतनी प्रसन्नता।

25:22 — (प्रसंग) मीराबाई पर विक्रम राणा तलवार लेकर आए, फिर भी मीरा की प्रसन्नता अडिग रही।

25:34 — मीरा की एकाग्रता और भगवान-आश्रय से संकट टल गया।

25:46 — जो भगवान का दृढ़ आश्रय लेता है वह निर्भय और प्रसन्न रहता है।

25:59 — संसार का आश्रय रखने वाला खिन्न और भयभीत रहता है।

26:07 — भीतर से भगवान को अपना मानना ही प्रसन्नता का आधार है।

26:25 — (कीर्तन) “हरि ओम… राम…” — नामस्मरण से चित्त की स्थिरता।

27:10 — (भजन) “पावन पावन नाम हरि हरि ओम…”

27:39 — (भजन) “मोह निवारक सब सुखकारक हरि हरि ओम…”

27:45 — (भजन) “कलिमल हारण भव जग तारण…”

28:27 — प्रश्न: मन प्रसन्न हो रहा है न? — स्वभाव सौम्य बनाओ।

28:50 — (कीर्तन) “जय सियाराम जय जय सियाराम…”

29:33 — (भजन) “जो कोई गाए प्रसन्नता पाए…”

29:47 — (भजन) “जो कोई गाए आनंद पाए…”

30:06 — (कीर्तन) “हरि ओम हरि ओम…”

30:36 — (कीर्तन) “जय सियाराम जय जय मेरे राम…”

30:52 — (समापन-कीर्तन) “हरि ओम…” — नाम में ही आनंद और प्रसन्नता का निष्कर्ष।



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था सत्संग के मुख्य अंश : राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है । करने, जानने और मानने की शक्ति...