धन के स्वामी बनें, चौकीदार नहीं !
0:02 अमेरिका के तत्व चिंतक ने लिखा कि भारत की संस्कृति और धर्म आध्यात्मिक जगत में अरबपति है, जिसने भी पूर्वाग्रह छोड़कर गीता और योग का अध्ययन किया वह भारतीय संस्कृति का हो गया।
18:03 — 10 ग्राम तेल की मालिश 80 ग्राम घी पचाने की ताकत देती है, पर तेल को बाद में साबुन से धोकर निकालना पड़ता है।
18:08 — जीभ पर रोज 25-50-100 ग्राम चिकनाहट (घी-तेल) लगती है, पर उसे कभी साबुन से नहीं धोते; क्यों?
18:15 — रचना में ऐसा अंदरूनी रस है कि घी-तेल की चिकनाहट जीभ पर चिपकती नहीं।
18:21 — यदि हृदय में भगवत-रस आ जाए तो संसार की चिकनाहट (मोह-दुख-चिंता) भी नहीं चिपकेगी।
18:28 — मन का प्रसाद प्रकट हो जाए तो हृदय में दुख-चिंता ठहर नहीं सकती।
18:35 — (दोहा) “तुलसी जग में यूं रहो…” — संसार में रहते हुए भी भीतर अलिप्त रहो।
18:50 — (दोहा) “जो रसना मुख माही, खाती घी और तेल नित…”
18:57 — (दोहा) “खाती घी और तेल नित, फिर भी चिकनी नाही…”
19:02 — (कीर्तन) “हरि हरि ओम” — भगवन्नाम से मन की शुद्धि का संकेत।
19:12 — (कीर्तन) “राम… हरि हरि ओम…” — नामस्मरण से चित्त की प्रसन्नता।
19:37 — प्रश्न: मन का प्रसाद (प्रसन्नता) कैसे पाएँ?
19:44 — उत्तर: मन की प्रसन्नता पूर्ण भाग्य-उदय की निशानी है।
19:52 — व्यक्ति या वस्तु से राग न करें; नहीं मिले तो अप्रसन्नता होगी।
20:03 — जो आए उसे स्वीकारें, न आए तो उसकी मर्जी समझें।
20:08 — उदाहरण: आज करेले की इच्छा थी, पर बाजार में न मिले तो दुख क्यों?
20:14 — कुदरत ने छह रस बनाए: खट्टा, खारा, मीठा, तीखा, तुरा, कड़वा।
20:29 — हम पाँच रस तो खाते हैं, पर कड़वा रस से बचते हैं।
20:35 — करेला और नीम में कड़वा रस स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है; पहले लोग स्वस्थ रहते थे।
20:45 — आजकल करेला का कड़वापन निकालकर खाते हैं, जिससे लाभ घट जाता है।
21:01 — छह रस का संतुलन आवश्यक है; असंतुलन से रोग बढ़ते हैं।
21:12 — संतुलन न हो तो छोटी-छोटी बातों से रोग व अशांति घेर लेती है।
21:26 — आग्रह न रखें कि रोज यही खाएँगे; जो मिले स्वास्थ्य हेतु ग्रहण करें।
21:39 — वस्त्र, व्यक्ति, परिस्थिति जो मिले, आदरपूर्वक व्यवहार करें पर आसक्ति न रखें।
21:52 — तुलना (दो फ्लैट, शेयर मार्केट) से जलन होगी तो प्रसन्नता चली जाएगी।
22:04 — संसार की दौड़ में मन भी घूमता रहेगा; जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा।
22:16 — घूमते धन को मत देखो, उस परमात्मा को देखो जो सबको घुमा रहा है।
22:23 — संसार को सच्चा मानने वाला मन भी शेयर मार्केट की तरह चंचल रहता है।
22:38 — व्यक्ति-वस्तु से राग-द्वेष त्यागने से मन प्रसन्न रहता है।
22:43 — स्वार्थ और अभिमान त्यागने से प्रसन्नता टिकती है।
22:49 — पक्षपात न रखने से मन स्थिर रहता है।
22:56 — दया, उदारता, क्षमा से प्रसन्नता आती है।
23:02 — प्राणी मात्र का हित चाहने से मन निर्मल रहता है।
23:09 — उचित आहार, एकांत, दुर्गुणों से दूरी प्रसन्नता में सहायक है।
23:16 — सत्संग और महापुरुषों के दीदार से मन स्वतः प्रसन्न होता है।
23:33 — भगवान के पाँच साधन: मन-प्रसाद, मौन, आत्मनिग्रह, भाव-शुद्धि, एकाग्रता-तप।
23:57 — राग-द्वेष त्याग पहला साधन है।
24:06 — स्वार्थ, अभिमान, पक्षपात का त्याग दूसरा साधन है।
24:12 — दया, उदारता, क्षमा तीसरा साधन है।
24:19 — प्राणी मात्र का हित-भाव चौथा साधन है।
24:26 — समता: दुख आए तो घबराएँ नहीं, सुख आए तो अहंकार न करें।
24:47 — अभिमान-स्वार्थ त्याग से भाव-शुद्धि होती है।
24:54 — संसार का सहारा छोड़ भीतर से भगवान का सहारा लें।
25:08 — जितना संसार का सहारा, उतनी अशांति; जितना भगवान का सहारा, उतनी प्रसन्नता।
25:22 — (प्रसंग) मीराबाई पर विक्रम राणा तलवार लेकर आए, फिर भी मीरा की प्रसन्नता अडिग रही।
25:34 — मीरा की एकाग्रता और भगवान-आश्रय से संकट टल गया।
25:46 — जो भगवान का दृढ़ आश्रय लेता है वह निर्भय और प्रसन्न रहता है।
25:59 — संसार का आश्रय रखने वाला खिन्न और भयभीत रहता है।
26:07 — भीतर से भगवान को अपना मानना ही प्रसन्नता का आधार है।
26:25 — (कीर्तन) “हरि ओम… राम…” — नामस्मरण से चित्त की स्थिरता।
27:10 — (भजन) “पावन पावन नाम हरि हरि ओम…”
27:39 — (भजन) “मोह निवारक सब सुखकारक हरि हरि ओम…”
27:45 — (भजन) “कलिमल हारण भव जग तारण…”
28:27 — प्रश्न: मन प्रसन्न हो रहा है न? — स्वभाव सौम्य बनाओ।
28:50 — (कीर्तन) “जय सियाराम जय जय सियाराम…”
29:33 — (भजन) “जो कोई गाए प्रसन्नता पाए…”
29:47 — (भजन) “जो कोई गाए आनंद पाए…”
30:06 — (कीर्तन) “हरि ओम हरि ओम…”
30:36 — (कीर्तन) “जय सियाराम जय जय मेरे राम…”
30:52 — (समापन-कीर्तन) “हरि ओम…” — नाम में ही आनंद और प्रसन्नता का निष्कर्ष।
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