बड़ी तपस्या के बाद जो पाया है अब मैं तुमको देना चाहता हूँ
INDEX (TIME STAMP KE SAATH)
0:02 भगवान के स्वरूप, स्वभाव और गुण का बोध 1:03 भगवान की विश्रांति में बैठने का प्रयोग 1:27 इंद्रदेव और आत्मरस का उपनिषदिक दृष्टांत (कथा) 2:30 नीरसता ही अपराध और विकार का मूल कारण 3:19 परमात्मा रस लाने का व्यावहारिक प्रयोग 3:21 शयन दिशा, वायु, धूप और घर की शुद्धि 4:35 श्वास की शुद्धि और स्वास्थ्य का रहस्य 5:28 हरिनाम और ओमकार जप का प्रभाव (भजन कीर्तन) 6:41 विषय रस बनाम भगवत रस का विवेक 7:08 ओमकार मंत्र की महिमा और चिकित्सा अनुभव 8:09 आत्म पहचान और माधुर्य भाव (भजन) 9:38 रात्रि कीर्तन से जीवन परिवर्तन 11:24 श्वेत कण, स्वास्थ्य और नाम जप 12:17 निद्रा को भक्ति में बदलने की साधना 13:18 ओमकार मंत्र का ऋषि देवता छंद विनियोग 14:02 ओम जप के तीन प्रयोग 15:06 40 दिन की साधना और शक्ति संचय 16:02 परमात्मा रस और नीरसता का नाश 17:03 होठ जप और हृदय जप का अभ्यास 19:32 विश्रांति योग की दुर्लभ साधना 20:00 रावण हिरण्यकश्यप और शबरी मीरा का विवेक (कथा) 21:01 विशुद्धा केंद्र और कृष्ण यशोदा तत्व 23:16 ओम नाम में रास और माधुर्य (भजन)
[00:00] – ॐकार उच्चारण और मंगल आरंभ [00:31] – गीता श्लोक, नाम कीर्तन और साधु दर्शन का महत्त्व [00:49] – प्रयाग संगम स्नान और पुण्य का महत्व [01:14] – सूर्य का उत्तरायण गमन और उसका आध्यात्मिक अर्थ [01:31] – उत्तरायण में संकल्प सिद्ध होने का रहस्य [01:40] – देव दर्शन, पूजन, दान और संत सत्कार [02:02] – भीष्म पितामह द्वारा उत्तरायण की प्रतीक्षा [02:23] – उत्तरायण को नैसर्गिक उत्सव बताया गया [02:57] – (भजन/कीर्तन) गीता श्लोक पाठ, गोविंद स्मृति कीर्तन [03:36] – गीता का श्लोक: उत्तरायण में मृत्यु और ब्रह्म प्राप्ति [04:24] – चंद्रलोक और सूर्य मार्ग का भेद [05:10] – चंद्रमा की किरणें और औषधियों का पोषण [05:51] – साधारण उपासक और कृत उपासक योगी का अंतर [06:53] – तत्वज्ञान का सत्संग, कथा नहीं [07:05] – परोक्ष ज्ञान और अपरोक्ष ज्ञान का भेद [08:00] – उत्तरायण में मृत्यु पाने वालों की गति [09:27] – मनुष्य देह की विशेषता और 84 लाख योनियाँ [10:27] – द्विपाद पशु और सच्चे साधक का अंतर [11:27] – उत्तरायण मार्ग से ब्रह्मलोक की यात्रा [13:00] – ब्रह्मलोक सुख और ब्रह्मा लोक की स्थिति [15:05] – अर्चि मार्ग और धूम्र मार्ग का विवेचन [17:29] – परोक्ष ज्ञान से ब्रह्मलोक, अपरोक्ष से मोक्ष [19:04] – साक्षात्कार की दुर्लभता और गुरु कृपा [21:52] – पर्वों से मिलने वाली आध्यात्मिक प्रेरणा [22:56] – ऊँचे संकल्प और आत्मपद की महिमा [24:28] – इंद्रिय आसक्ति और परमात्मा से दूरी [25:01] – (कहानी) दो अफीमचियों की दृष्टांत कथा [26:38] – कबीर साहब की वाणी और ब्रह्म दृष्टि [27:13] – मानव की दिव्यता और ब्रह्म वंश [28:39] – (भजन/उपदेश) निज स्वरूप में स्थित होने की प्रेरणा
0:04 – (संसार-यथार्थ उपदेश) जीवन की अनिवार्यता और संसार का स्वभाव
0:15 – (समत्व-योग उपदेश) अनुकूल-प्रतिकूल में समभाव की साधना
0:33 – (प्राण-आयु सिद्धांत) क्रिया अनुसार श्वास-व्यय और आयु
0:47 – (आहार-विहार उपदेश) मैथुन, मांसाहार और श्वास-गति
1:00 – (श्वास-गणना सिद्धांत) आयु वर्ष नहीं, श्वासों से निर्धारित
1:40 – (प्राणायाम-लाभ) संध्या व प्राणायाम से आयु-वृद्धि
1:54 – (स्वानुभव/दृष्टांत) रोग से मुक्ति और नया जीवन
2:39 – (योग-कला विनय) सीमित ज्ञान से भी महान लाभ
3:09 – (संयम-असंयम परिणाम) काम, क्रोध, हस्तमैथुन का प्रभाव
4:00 – (योगी-कथा/इतिहास) चांगदेव, च्यवन, वशिष्ठ, दत्तात्रेय
4:26 – (दिव्य-योगी अनुभव) हनुमान जी व दत्तात्रेय का साक्षात-भाव
4:54 – (अदृश्य-योग सिद्धि) पंचतत्त्व विजय और अदृश्यता
5:02 – (स्वानुभूति) अल्प साधना से दिव्य अनुभूति
5:27 – (ब्रह्मज्ञान उपसंहार) योग-सिद्धियाँ भी ब्रह्मज्ञान के आगे तुच्छ
🕉️ अर्थपूर्ण पैराग्राफ (टाइम-स्टैम्प अनुसार)
0:04 – (संसार-यथार्थ उपदेश)
मनुष्य जब संसार में आया है तो उसे जीवन जीना ही पड़ेगा। जैसे मृत्यु निश्चित है वैसे ही जीवन भी अनिवार्य है। संसार स्वभाव से ऐसा है कि यहाँ सब कुछ मन के अनुसार हो, यह संभव नहीं। इसलिए संसार को समझकर चलना ही विवेक है।
0:15 – (समत्व-योग उपदेश)
जहाँ मन की इच्छा पूरी हो, वहाँ भी सम रहना और जहाँ इच्छा पूरी न हो, वहाँ भी सम रहना—यही परमात्मा में टिकने का मार्ग है। सुख-दुःख, अनुकूल-प्रतिकूल दोनों में समभाव ही सच्चा योग है।
0:33 – (प्राण-आयु सिद्धांत)
मनुष्य बैठा रहता है तो 12 श्वास, चलता है तो 18 और सोता है तो 24 श्वास प्रति मिनट खर्च करता है। जो अधिक लेटे रहते हैं, वे अपनी आयु शीघ्र क्षीण करते हैं।
0:47 – (आहार-विहार उपदेश)
मैथुन, भारी आहार और मांस सेवन के समय श्वास की गति 30 प्रति मिनट तक पहुँच जाती है। इससे आयु शीघ्र खर्च होती है। मनुष्य की आयु वर्षों से नहीं, श्वासों से निर्धारित होती है।
1:00 – (श्वास-गणना सिद्धांत)
एक दिन में लगभग 21,600 श्वास हैं। कुल निश्चित श्वासों को कोई 40 वर्ष में खर्च कर देता है, कोई 60 में। पर यदि संध्या, प्राणायाम और संयम हो तो वही श्वास अधिक वर्षों तक चल सकती है।
1:40 – (प्राणायाम-लाभ)
नियमित संध्या और प्राणायाम करने से सामान्य 50 वर्ष की आयु 55–60 तक सहज बढ़ सकती है। मैथुन-संयम और प्राणायाम की विधि जानने से आयु और भी दीर्घ हो जाती है।
1:54 – (स्वानुभव/दृष्टांत)
वक्ता अपने जीवन का उदाहरण देते हैं कि कैसे मृत्यु के समीप पहुँचकर भी योग-बल से नया जीवन प्रारंभ हुआ। ज्योतिषीय रेखाएँ पूरी होने पर भी प्राणायाम से आयु बढ़ी।
2:39 – (योग-कला विनय)
सभी योग-कलाएँ न जानने पर भी केवल एक-दो प्राणायाम का अभ्यास करने से भी अद्भुत लाभ प्राप्त हो जाता है। गुरुजन 64 प्रकार के प्राणायाम जानते हैं।
3:09 – (संयम-असंयम परिणाम)
क्रोध, कपट और काम से श्वास की गति बढ़ती है। हस्तमैथुन से नाड़ियाँ विकृत होती हैं और आयु घटती है। संयम से वही श्वास 70, 80, 90甚至 100 वर्ष तक चल सकती है।
4:00 – (योगी-कथा/इतिहास)
चांगदेव योगी 1400 वर्ष जीवित रहे। च्यवन ऋषि ने च्यवनप्राश द्वारा शरीर नवजीवन दिया। वशिष्ठ महाराज ने डेढ़ लाख वर्ष तक और महर्षि दत्तात्रेय दीर्घकाल तक योगबल से आयु धारण की।
4:26 – (दिव्य-योगी अनुभव)
हनुमान जी और दत्तात्रेय जैसे सिद्ध योगी आज भी साधकों पर कृपा कर प्रकट होते हैं, संवाद करते हैं और फिर अदृश्य हो जाते हैं।
4:54 – (अदृश्य-योग सिद्धि)
पृथ्वी और जल तत्व पर विजय प्राप्त होने पर योगी अदृश्य हो सकता है। यह उच्च योग-साधना का फल है।
5:02 – (स्वानुभूति)
वक्ता बताते हैं कि थोड़ी-सी साधना और त्रिकाल संध्या के अभ्यास से शरीर में उड़ने-सी अनुभूति हुई और अल्प समय में बड़ा लाभ मिला।
5:27 – (ब्रह्मज्ञान उपसंहार)
अंत में कहा गया कि ये सभी योग-सिद्धियाँ भी ब्रह्मज्ञान के आगे स्वप्न समान हैं। वास्तविक लक्ष्य ब्रह्म की अनुभूति है।
0:02 – (दोहा/भक्ति-उपदेश) जिन हरिकथा को कानों से नहीं सुना और जिनकी जिह्वा ने राम-गुणगान नहीं किया, उनकी इंद्रियों की निष्फलता का वर्णन
0:12 – (उपदेश/दृष्टांत) भगवान नाम का कीर्तन न करने वाली जिह्वा की मेंढक से तुलना
0:22 – (उपदेश/दृष्टांत) भगवत कथा न सुनने वाले कानों की सर्प-बिल से तुलना
0:31 – (व्रत-महिमा/उपदेश) एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा जैसे पर्वों पर जप का सौ गुना फल
0:37 – (जप-फल गणना/उपदेश) जप संख्या और एकाग्रता का महत्व, एक करोड़ जप का तात्त्विक अर्थ
0:46 – (अनुभव-लक्षण) जप सिद्धि के संकेत – स्वप्न में भगवान, गुरु, देव दर्शन
0:54 – (साधना-निर्देश) एकाग्र जप की महत्ता, इधर-उधर न देखने की साधना
0:57 – (प्राणायाम सहित जप-विधि) श्वास-प्रश्वास रोककर जप करने की विधि
1:08 – (ध्यान-विधि) ललाट में मंत्र दर्शन की भावना और भाग्य निर्माण
1:12 – (उपदेश) पापक्षय, नरक-भय से मुक्ति और भगवत प्राप्ति का आश्वासन
1:28 – (भावना-साधना) ललाट में मंत्र लिखित देखने से भाग्य रेखाओं का परिवर्तन
1:40 – (अनुभूति-फल) भक्ति की दृढ़ता और भगवद् आनंद का प्राकट्य
1:42 – (जप-महिमा) जप से होने वाले चमत्कारी लाभों का वर्णन
1:48 – (नियम/अनुशासन) प्रतिदिन 10 माला जप और अवकाश के दिन अधिक जप की सलाह
1:55 – (जप से ध्यान की ओर) माला छोड़कर ध्यान में प्रवेश की विधि
1:58 – (प्रार्थना-भाव) भगवान से भक्ति-रस और प्रीति की याचना
2:06 – (चंचलता-निवारण विधि) जप की तीव्र, मध्यम और प्लुत गति का क्रम
2:19 – (मंत्र-विज्ञान) ह्रस्व जप से पापनाशिनी ऊर्जा का वर्णन
2:30 – (मंत्र-विज्ञान) दीर्घ जप से सफलता-दायिनी ऊर्जा की प्राप्ति
2:38 – (मंत्र-विज्ञान/अनुभूति) प्लुत जप से भगवत सत्ता में विश्रांति और सद्गुणों से संबंध
2:49 – (कीर्तन/जप संचालन) “हरि ओम” सामूहिक जप का प्रारंभ और निरंतरता
11:29 – 12:45 (कठोर परीक्षा) गुरु की आज्ञा, पानी का घड़ा और आत्म‑परिश्रम का संदेश
12:51 – 14:07 (कथा) भिक्षा परीक्षा, राजमहल, माता और पत्नी से भिक्षा
14:16 – 15:23 (उपदेश) तीन चावल का रहस्य, गुरु‑आज्ञा, संतोष और सहनशीलता
15:27 – 16:29 (कथा) बारह वर्ष की कठोर साधना, अमर जोगी गोपीचंद का निर्माण
16:36 – 17:29 (उपदेश / वैराग्य वाणी) दीर्घकालीन अभ्यास, सत्संग का फल और आत्मोन्नति
सत्संग ट्रांसक्रिप्ट: टाइम-स्टैम्प इंडेक्स एवं अर्थपूर्ण प्रस्तुति
0:02 – 0:29 (भजन / कबीर वाणी) कबीर साहेब स्वास-स्वास की माला का महत्व बताते हैं। नाम-स्मरण को सांसों से जोड़ने पर साधक की चेतना ऊँची होती है। गुरुमुख होकर जप करने से दसों दिशाओं में मंगल और कल्याण फैलता है। यह साधना आत्मा को महान बनाती है।
0:35 – 1:59 (कथा : राजा गोपीचंद का प्रसंग) बंगाल के युवा राजा गोपीचंद का विवाह हुआ। स्नान करते समय ठंडे जल के बीच एक गर्म बूंद गिरती है, जिससे उनका ध्यान ऊपर जाता है और वे अपनी माता मैनावती को रोते देखते हैं। यह दृश्य भोग-विलास को गंभीर वैराग्य में बदल देता है।
2:02 – 3:36 (संवाद : माता-पुत्र) गोपीचंद माता से उनके आँसुओं का कारण पूछते हैं। माता बार-बार टालती हैं, पर पुत्र का करुण आग्रह बना रहता है। यह संवाद माता-पुत्र के गहरे प्रेम और संवेदनशीलता को दर्शाता है।
3:40 – 6:32 (कथा : वैराग्य उपदेश) माता मैनावती अपने पति (गोपीचंद के पिता) के शरीर के नश्वर होने की कथा सुनाती हैं। राजवैभव, बल और सौंदर्य सब नष्ट हो गए। यही स्मरण उन्हें रुलाता है कि पुत्र का शरीर भी नश्वर है और काल से नहीं बच सकता।
6:36 – 7:21 (उपदेश : अमरत्व का उपाय) माता बताती हैं कि अमरत्व का उपाय गुरु-दीक्षा है। जालंधरनाथ सिद्ध योगी के पास जाकर दीक्षा लेने से मृत्यु से पहले परमात्मा का साक्षात्कार संभव है।
7:24 – 8:13 (कथा : जालंधरनाथ का प्रसंग) माता जालंधरनाथ योगी और राजा द्वारा दिए गए अन्यायपूर्ण मृत्युदंड की कथा सुनाती हैं। योगी के श्राप से राजा की मृत्यु हुई। वही सिद्ध गुरु अब गोपीचंद को तार सकते हैं।
8:21 – 9:21 (कथा : गुरु के द्वार पर परीक्षा) गोपीचंद जालंधरनाथ के पास पहुँचते हैं। तीन बार श्राप से बचते हैं और अंततः गुरु उनकी श्रद्धा देखकर संवाद करते हैं।
9:33 – 11:21 (संवाद : भोग बनाम योग) गुरु राजभोग की असारता बताते हैं। गोपीचंद कहते हैं कि भोग अंततः रोग और भय ही देते हैं। वे गुरु से आत्म-साक्षात्कार की कृपा माँगते हैं।
11:29 – 12:45 (कठोर परीक्षा : सेवा और आज्ञा) गुरु गोपीचंद की श्रद्धा परखते हैं। पानी का घड़ा लाने की आज्ञा देते हैं। दूसरों की सहायता लेने पर गुरु उन्हें डाँटते हैं और स्वयं के पुरुषार्थ का महत्व समझाते हैं।
12:51 – 14:07 (कथा : भिक्षा परीक्षा) गुरु राजमहल में भिक्षा माँगने भेजते हैं। फिर माता और पत्नी से भिक्षा माँगने की आज्ञा देते हैं। यह अहंकार त्याग की कठोर परीक्षा है।
14:16 – 15:23 (उपदेश : तीन चावल का रहस्य) माता तीन चावल भिक्षा में देती हैं। उनका अर्थ समझाया जाता है कि गुरु की आज्ञा में रहना, जो मिले उसे अमृत मानना, और जहाँ शयन मिले उसे सुख समझना।
15:27 – 16:29 (कथा : दीर्घ साधना) गोपीचंद बारह वर्ष तक गुरु के साथ कठोर योग-साधना करते हैं। वे अमर जोगियों में प्रसिद्ध होते हैं। महानता त्वरित नहीं, दीर्घ अभ्यास से आती है।
16:36 – 17:29 (उपदेश / वैराग्य वाणी) अंत में बताया जाता है कि सत्संग और दीर्घ अभ्यास से ही भ्रांति मिटती है। एक-दो दिन की साधना से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास से आत्मोन्नति होती है।
समापन यह सम्पूर्ण कथा भोग से योग, अहंकार से समर्पण और नश्वर देह से अमर आत्मा की यात्रा का जीवंत उदाहरण है।
31:33 13 दोषों से मुक्ति का उपाय – प्राणायाम व संकल्प
32:29 सच्चा आनंद बनाम क्षणिक सुख
34:01 त्रिबंध प्राणायाम और गुरु मंत्र साधना
35:12 अंतिम उपदेश – जीवन में वास्तविक उन्नति का मार्ग
0:02 – (कथा : महाभारत संदर्भ) बाणों की शय्या पर पड़े भीष्म पितामह के पास श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर को ले जाते हैं। उद्देश्य यह है कि धर्म से जुड़े दुर्लभ और गूढ़ प्रश्नों का उत्तर इस समय भीष्म से प्राप्त किया जाए।
0:24 – धर्म-जिज्ञासा की भूमिका युधिष्ठिर मानव जाति के दुःख, संघर्ष, मनमुटाव और अशांति के मूल कारणों पर प्रश्न करते हैं। भीष्म बताते हैं कि 13 प्रश्नों और 13 उत्तरों में समस्त दुःखों का समाधान समाया है।
0:57 – महानता के चार लक्षण महानता के चार गुण बताए गए—नम्रता, उदारता, प्रसन्नता और समता। श्रीकृष्ण को इन चारों का साक्षात उदाहरण बताया गया है।
1:29 – पद का गर्व नहीं, पद की गरिमा समिति, समाज या संस्था में रहते हुए अहंकार त्यागने और पद की गरिमा बढ़ाने का उपदेश। अहंकार मिटने से मालिक का आनंद प्रकट होता है।
2:22 – दोषों की भूमिका भीष्म बताते हैं कि सभी में योग्यता और श्रद्धा है, पर 13 दोष मनुष्य को ईश्वर, शांति और आनंद से दूर कर देते हैं।
प्रथम दोष – क्रोध
2:32 – क्रोध का कारण और निवारण क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है—धन, अधिकार या वाहवाही का लोभ। दोष-दर्शन से बढ़ता है और क्षमा व सर्वत्र परमात्मा दर्शन से शांत होता है।
द्वितीय दोष – काम (कामना)
3:40 – काम दोष का विवेचन कामना शांति को भंग करती है। कच्चे विवेक के कारण मनुष्य नश्वर वस्तुओं को महत्व देता है। विवेक से कामनाओं की निवृत्ति होती है।
तृतीय दोष – पराशुता (हिंसा)
5:29 – हिंसा का मूल क्रोध की अति और विवेक-नाश से हिंसा उत्पन्न होती है। दया, वैराग्य और शुद्ध विवेक से इसका नाश होता है।
चतुर्थ दोष – मोह
6:37 – मोह का स्वरूप अज्ञान और पाप-रुचि से मोह बढ़ता है। सत्संग, ज्ञान और ब्रह्मविद्या से मोह क्षीण होता है।
पंचम दोष – विदित्सा (शास्त्र-विरुद्ध कर्म)
8:02 – धर्म-विरोधी आचरण शास्त्र, नीति और न्याय के विरुद्ध कर्म करने से विदित्सा दोष उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान और विवेक से यह नष्ट होता है।
9:04 – (उपदेश : सामाजिक समरसता) जाति, संप्रदाय और वर्ग के आधार पर द्वेष को अधर्म बताया गया है। सभी ईश्वर की संतान हैं—यह गीता का सिद्धांत है।
षष्ठ दोष – शोक
11:18 – शोक का कारण प्रिय व्यक्ति या वस्तु के वियोग से शोक होता है। विवेक और संसार की अनित्यता से शोक की निवृत्ति होती है।
सप्तम दोष – मात्सर्य
12:34 – ईर्ष्याजन्य द्वेष सत्य-त्याग और दुष्ट-संग से मात्सर्य उत्पन्न होता है। सत्संग और श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा से यह नष्ट होता है।
अष्टम दोष – ईर्ष्या
14:38 – ईर्ष्या का शमन दूसरे के सुख में सुखी और दुख में दुखी होने की बुद्धि से ईर्ष्या समाप्त होती है।
नवम दोष – मद (अहंकार)
15:20 – मद का विवेचन धन, विद्या, पद और सौंदर्य का मद अज्ञान से टिकता है। यथार्थ ज्ञान से मद नष्ट हो जाता है।
दशम दोष – निंदा
16:36 – निंदा का भयावह पाप निंदा को महापाप बताया गया है। निंदा से पुण्य नष्ट होता है। भलाई की भावना से कहना अलग है, निंदा अलग।
18:10 – (कथा : ऋषि दयानंद प्रसंग) निंदा के उत्तर में प्रेम और सेवा से मन परिवर्तन की प्रेरक कथा।
एकादश दोष – असूया
24:22 – दोष-दर्शन की प्रवृत्ति बदला लेने के भाव से असूया उत्पन्न होती है। दया भाव से इसका नाश होता है।
द्वादश दोष – कंजूसी
25:04 – (कथा : कंजूस सेठ) कृपणता संग्रह की चिंता बढ़ाती है। दान और त्यागी-संग से कंजूसी का दोष मिटता है।
त्रयोदश दोष – लोभ
28:56 – लोभ का व्यापक रूप लोभ को पाप का मूल बताया गया है। विश्वास और संतोष से लोभ का शमन होता है।
30:52 – 13 दोषों का सार ये 13 दोष साधना, जप, तप और तीर्थ को भी निष्फल कर देते हैं यदि इन्हें न हटाया जाए।
31:33 – साधना-प्रयोग त्रिबंध प्राणायाम, गुरु-मंत्र जप और दैनिक संकल्प द्वारा दोषों की जड़ कमजोर करने का उपाय।
33:16 – शुद्ध आनंद का स्वरूप क्षणिक भोग का आनंद अस्थिर है। गुरु और ईश्वर से प्राप्त आनंद स्थायी है।
33:24 – (उपदेश) प्रतिशोध नहीं, प्रभु-प्रीति के लिए कर्म करने का संदेश।
34:01 – ध्यान और प्राणायाम विधि त्रिबंध सहित प्राणायाम और श्वास-रोध के साथ मंत्र-जप की विस्तृत विधि।
35:12 – समापन उपदेश अब तक किए गए अच्छे कार्यों से संतुष्ट न होकर और बेहतर बनने का संकल्प।
आध्यात्मिक जप और प्रभु के नाम का स्मरण (2:08-2:56)
प्रवचन का परिचय: (3:01-3:16)
नाम जप के लाभ और दिशाओं में मंगल (3:07-3:16)
ज्ञान पर कथा प्रसंग: (3:18-4:39)
काशी की घटना: रामदत्त और गुरुजी का संवाद (3:30-4:39)
अहंकार और भगवत मिलन का महत्व: (4:50-7:40)
'मैं' की समस्या और भगवान में विलय से कल्याण (5:34-6:30)
रावण, हिरण्यकश्यप, शबरी, मीरा, रविदास और जनक राजा के उदाहरण (6:02-7:40)
आध्यात्मिक सत्ता और साधना का उद्देश्य: (7:05-8:23)
आदि भौतिक, आदि दैविक और अध्यात्मिक सत्ता (7:05-7:26)
वेद पुराणों का वास्तविक उद्देश्य और प्रेम का महत्व (7:27-8:23)
हरिहर बाबा की कथा (क्रमशः):
रामदत्त विद्यार्थी का रूपांतरण (कहानी): (8:29-13:59)
राघवानंद जी द्वारा माधवानंद जी और रामदत्त को भगवत ज्ञान की दीक्षा (9:36-12:50)
मृत्यु काल से मुक्ति और रामानन्द स्वामी के रूप में प्रसिद्धि (12:51-13:59)
हरिहर बाबाका परिचय और समकालीन संत: (14:02-19:10)
हरिहर बाबा की अलौकिक रिद्धि-सिद्धि और उनका प्रभाव (14:48-16:11)
जन्म, परिवार और नामकरण की कहानी (16:31-19:10)
दुख से मुक्ति और भक्ति का मार्ग: (19:14-20:20)
भगवान की भक्ति से दुख का निवारण (19:43-20:20)
हरिहर बाबा के दिव्य दर्शन और काशी यात्रा (कहानी): (20:44-21:19)
राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान जी का प्रकट होना और काशी जाने का आदेश (20:44-21:19)
सार्थक चिंतन और आध्यात्मिक साधना: (22:01-23:57)
व्यर्थ चिंतन से बचाव और नाम जप का महत्व (22:04-22:36)
ओम और शिवाय मंत्र के उच्चारण से मन की शांति (22:47-23:57)
हरिहर बाबा के चमत्कार और लीलाएँ (कथा प्रसंग):
काशी विश्वविद्यालय की घटना (कहानी): (23:57-32:11)
छात्रों द्वारा बजरे पर पत्थरबाजी और बाबा की नाराजगी (24:02-26:47)
ब्रिटिश शासन का नोटिस और बाबा के आशीर्वाद से समस्या का समाधान (26:55-32:11)
देवरह बाबा प्रसंग - शिष्य का सोना बनाना प्रसंग (३०-10--२३.०६ ०)
बाढ़ में नाव का चमत्कार (कहानी): (32:42-35:16)
बाढ़ के दौरान गंगा पार करना और ब्रिटिश अधिकारियों का नतमस्तक होना (32:42-35:16)
शिष्य का उपचार (कहानी): (35:27-36:50)
बुखार से पीड़ित शिष्य का गंगाजल और मिट्टी से इलाज (35:33-36:50)
आध्यात्मिक जीवन के सिद्धांत: (38:18-39:00)
समता और सार्थक चिंतन का महत्व (38:18-39:00)
सोने से पहले के आध्यात्मिक अभ्यास: (40:12-43:02)
सही दिशा में सोना और श्वासों-श्वास में नाम जप (40:20-41:04)
प्राणायाम और ओमकार मंत्र के जप का अभ्यास (41:39-43:02)
संकल्प शक्ति और योग सामर्थ्य: (44:03-48:38)
दशहरा उत्सव में अस्सी घाट से दशाश्वमेध घाट का दिव्य दर्शन (44:43-45:54)
यज्ञ में बारिश को नियंत्रित करने का चमत्कार (46:40-47:50)
आत्म-संकल्प की शक्ति और ओमकार मंत्र का प्रभाव (48:00-48:38)
संत श्री आशारामजी बापू ने देवरा बाबा के जीवन की घटनाओं का उल्लेख किया है, बताते हैं कि वे स्वयं उनसे दो बार प्रेम से मिले थे और उन्हें देवरा बाबा के बजरे में अंदर जाने का भी अवसर मिला था। देवरा बाबा, जिन्हें लोग जानते हैं, काशी में अपने बजरे में रहते थे और सोना बनाना जानते थे। हालाँकि, उस महापुरुष ने यह ज्ञान अपने लिए उपयोग नहीं किया, बल्कि एक स्वार्थी शिष्य को इसका उपाय बता दिया, जो प्रसिद्ध हो गया लेकिन बाद में पकड़ा भी गया। जॉर्ज पंचम के एक विश्वासु कलेक्टर ने उस शिष्य पर दबाव डालकर लगभग एक क्विंटल सोना बनवाया। कलेक्टर ने जॉर्ज पंचम को बताया कि यहाँ के साधु बूटी खाकर उपवास करते हैं और एक दिन वह बूटी उनके शरीर में रहती है, जिसके बाद वे तांबे को पिघलाकर उसमें पेशाब करते हैं तो सारा पीतल सोना बन जाता है। इस पर जॉर्ज पंचम ने उस साधु को बुलाने को कहा। जब कलेक्टर ने साधु को जॉर्ज पंचम के यहाँ यूरोप आने के लिए मजबूर किया, तो वह घबरा गया और देवरा बाबा से प्रार्थना की। देवरा बाबा ने उसे डांटा, याद दिलाया कि उन्होंने उसे इस माया में पड़ने से मना किया था, और कहा कि अब वह रोज सोना नहीं बनाएगा या भंडार नहीं करेगा और न ही कोलकाता तक यश भोगेगा। शिष्य ने माफी मांगी और देवरा बाबा ने जॉर्ज पंचम को संदेश भेजा कि उनका शिष्य वहाँ सोना नहीं बनाएगा क्योंकि उन्होंने ही उसे यह उपाय बताया था और यह भी कहा कि उसे सताना नहीं चाहिए क्योंकि इसी में उनका भला है। जॉर्ज पंचम ने देवरा बाबा की आज्ञा का पालन किया, लेकिन हरि बाबा का भी रुतबा कुछ और ही था।
quotes
"भगवान के नाम से दशों दिशाओं में मंगल होता है। मधुरम मधुरे भपि मंगलेभ्यप मंगलम पावनम पावने भपि हरे नामव केवलम।"
"मैं मैं विद्वान मैं धनी मैं पापी मैं पुण्य आत्मा ये मैं जो है ना बड़ी मुसीबत पैदा करता है। मैं तो भगवान में मिल जाए बस। तब होता है कल्याण।"
"भगवान को अपना मानने से अपना मैं भगवान में आसानी से मिल सकता है। और भगवान से अलग मैं रावण का भी ठीक नहीं रहा। भगवान से अलग मैं हिरण्यकश्यप का भी ठीक नहीं रहा।"
"मुझे वेद पुराण कुरान से क्या मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई। प्रभु प्रेम का मुझे मंदिर मस्जिद जाना नहीं। मुझे हरि रस का प्याला पिला दे कोई।"
"दुखी आदमी का दुख तब तक रहता है जब तक संसार के सुख से वह दुख को मिटाना चाहता है। यह दुखी आदमी की बड़ी भारी भूल है।"
"दुख आए तो संसार के सुख से दुख को मत भगाओ। दुख हारी श्री हरि के सुमिरन से हरि की प्रीति से हरि की व्यवस्था में हां मिलाने से दुख सदा के लिए मिट जाता है।"
"व्यर्थ चिंतन से साधक की शक्तियों का ह्रास होता है। व्यर्थ मनोराज से भी शक्तियों का ह्रास होता है। ध्यान के बहाने मनोराज्य व्यर्थ चिंतन रसास्वाद निद्रा तंद्रा ये दोष आ ही जाते हैं।"
"इसलिए, बीच-बीच में भगवान का नाम इस निद्रा, तंद्रा, व्यर्थ चिंतन से सुरक्षा का एकदम अद्भुत साधन है। ओम नमः शिवाय। यह प्लुत उच्चारण शिव जी के नाम का मनोराज को व्यर्थ चिंतन को निगल जाएगा।"
"संत सताए तीनों जाए तेज बल और वंश। ऐसे ऐसे कई गए रावण कौरव जैसे कंस।" यह उद्धरण संतों को सताने के गंभीर परिणामों को चेतावनी देता है, जिसमें तेज (प्रभाव), बल (शक्ति) और वंश का विनाश शामिल है, जिसके उदाहरण रावण, कौरव और कंस हैं।
"सार्थक चिंतन से व्यर्थ चिंतन में जो ऊर्जा नाश होती है उसकी रक्षा बाबा जी करने में समर्थ हो गए थे। आप लोगों को भी मैं बोलता हूं आप रात्रि को सार्थक चिंतन करतेकरते सुनो।"