संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था
सत्संग के मुख्य अंश :
- राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है ।
- करने, जानने और मानने की शक्ति जन्मजात सबके पास है उसका सदुपयोग कैसे करें ?
- कूटस्थ कौन है उसे कैसे पहचानें ?
- भगवान जीव का हाथ कब पकड़ लेते हैं ?
- भक्ति में सफलता देने के लिए कलियुग इस प्रकार सहायरूप है ।
- ज्ञान और वैराग्य पुष्ट होने पर कैसे भक्ति चमचम चमकती है ।
- भगवान की शरण कैसे जाना चाहिए ?
- भगवान के भेद को संतशरण जाकर इस प्रकार प्राप्त करें ।
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00:03 (भजन) ओम नमो भगवते वासुदेवा
00:11 (संवाद) हाय क्या हाल चाल है मौज
00:21 (प्रसंग) हर हाल में प्रसन्न रहने वाले ही सच्चे मर्द हैं, परिस्थितियों की शिकायत करने वाला जीवन का रस नहीं ले सकता
00:28 (प्रसंग) हर हाल में प्रसन्न रहना बहादुरों का काम है
00:36 (भजन) कभी चना चबीना, कभी खीरा, फकीर हर स्थिति में मौज में रहता है
00:45 (भजन) कभी अच्छे दिन, कभी कठिन दिन, फिर भी फकीर मौज में रहता है
00:52 (भजन) मंगकर खाकर भी सियाराम का स्मरण करते हुए अमीरों जैसी चाल चलता है
00:59 (प्रसंग) फकीर वह नहीं जो लाचार और मोहताज है, फकीर वह है जिसने चिंता और संशय छोड़ दिए
01:07 (प्रसंग) जिसने भगवान में संदेह समाप्त कर दिया वही सच्चा फकीर है
01:14 (प्रसंग) संशय सबका शत्रु है, जो संशय को त्याग दे वही फकीर है
01:21 (दृष्टांत) हद और बेहद के पार जो स्थिति है उसमें संत और पीर स्थित होते हैं
01:30 (प्रसंग) हद बेहद के मैदान में विश्राम करने वाला सच्चा दास है
01:34 (भजन) संगीत
01:40 (प्रसंग) परमात्मा में विश्रांति ही सच्ची निश्चिंता है
01:48 (प्रसंग) भगवत विश्रांति से सभी शक्तियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं
01:57 (प्रसंग) भटकने की आवश्यकता नहीं, राम में विश्रांति पाने की कला सीखनी चाहिए
02:03 (प्रसंग) विश्रांति ही भगवत शांति, सुख और आनंद का स्वरूप है
02:10 (प्रसंग) नि:संकल्प अवस्था कुछ मिनट भी आ जाए तो सिद्धि प्राप्त होती है
02:16 (प्रसंग) ऐसी विश्रांति साधना का उच्चतम फल है
02:24 (प्रसंग) प्रातःकाल उठकर शांत बैठने से विश्रांति में सहायता मिलती है
02:31 (प्रसंग) आसन और प्राणायाम के बीच का समय विश्रांति के लिए उपयोगी है
02:39 (प्रसंग) सत्संग सुनते हुए अहोभाव में शांत होना विश्रांति को बढ़ाता है
02:48 (प्रसंग) सभी भजनों का फल चित्त की परमात्मा में विश्रांति है
03:32 (प्रसंग) नाम जप के बाद का अंतराल विश्रांति के लिए होता है
03:42 (दृष्टांत) तरंगों के बीच का अंतर समुद्र की स्थिति को दर्शाता है
03:49 (भजन) संगीत
03:51 (प्रसंग) चित्त में संकल्प-विकल्प चलते रहते हैं
03:59 (प्रसंग) सात्विक आहार और सत्कर्म चित्त को स्थिर करते हैं
04:06 (प्रसंग) भगवत अर्पण बुद्धि से किए कर्म चित्त को निर्मल बनाते हैं
04:15 (प्रसंग) मंत्र जप में दो उच्चारणों के बीच का अंतर विश्रांति देता है
04:23 (प्रसंग) यह अंतर संकल्प-विकल्प से मुक्त अवस्था है
04:32 (प्रसंग) विश्रांति का अर्थ आलस्य या निद्रा नहीं है
04:40 (प्रसंग) इस विश्रांति से सभी दुखों का अंत होता है
04:48 (प्रसंग) वासनाओं और कर्म बंधनों से मुक्ति मिलती है
04:56 (प्रसंग) दृष्टि को स्थिर रखने से विश्रांति मिलती है
05:02 (प्रसंग) भगवान के विग्रह या प्रेम में चित्त स्थिर करने से शांति मिलती है
05:12 (प्रसंग) चित्त की विश्रांति प्रसाद की जननी है
05:21 (प्रसंग) दुखी चित्त बाहर सुख खोजता है
05:30 (प्रसंग) भोगों से स्थायी सुख नहीं मिलता
05:39 (प्रसंग) परम लाभ वही है जिसके बाद और कुछ पाने की इच्छा न रहे
05:57 (प्रसंग) जिसमें स्थित होकर बड़े दुख का भी प्रभाव नहीं पड़ता वही परम लाभ है
06:05 (प्रसंग) श्वास की गति में आत्मा की उपस्थिति का अनुभव किया जा सकता है
06:10 (प्रसंग) श्वास लेने पर ठंडक और छोड़ने पर गर्मी अनुभव होती है
06:19 (प्रसंग) श्वास के बीच की अवस्था आत्मा परमात्मा की उपस्थिति है
06:25 (प्रसंग) भगवान श्रीकृष्ण सभी के हृदय में स्थित हैं
06:31 (प्रसंग) उन्हें केवल अर्जुन तक सीमित समझना भूल है
06:37 (प्रसंग) ईश्वर सबके हृदय में स्थित होकर सबको आकर्षित करते हैं
06:46 (प्रसंग) उनकी सत्ता में विश्रांति पाने से चित्त शुद्ध होता है
06:56 (प्रसंग) पाप संस्कारों से मुक्ति मिलती है
07:03 (प्रसंग) जीवन सफल हो जाता है
07:12 (प्रसंग) मनुष्य जन्म की सफलता का मापदंड तीन शक्तियों का उपयोग है
07:17 (प्रसंग) करने, जानने और मानने की शक्ति जन्मजात होती है
07:23 (प्रसंग) बचपन से ही मनुष्य में जिज्ञासा और क्रिया की प्रवृत्ति होती है
07:31 (प्रसंग) वृद्धावस्था में भी जानने की इच्छा बनी रहती है
07:40 (प्रसंग) यदि करने योग्य कर्म कर लिए तो मृत्यु का भय नहीं रहता
07:47 (दृष्टांत) जैसे विद्यार्थी पढ़ाई पूरी कर ले तो प्रश्न से नहीं डरता
07:57 (प्रसंग) मृत्यु का भय समाप्त होने पर आनंद आता है
08:05 (प्रसंग) कबीर जी ने मृत्यु को आनंद का अवसर बताया है
08:14 (प्रसंग) मृत्यु से पूर्ण परम आनंद की प्राप्ति होती है
08:23 (प्रसंग) शरीर की उपाधि समाप्त होने पर आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है
08:31 (दृष्टांत) जैसे तरंग शांत होकर सागर बन जाती है
08:40 (प्रसंग) आत्मज्ञान से जन्म-मृत्यु का भ्रम समाप्त होता है
08:47 (प्रसंग) जन्म-मृत्यु आत्मा का धर्म नहीं है
08:57 (प्रसंग) पाप और पुण्य वृत्तियों से उत्पन्न होते हैं
09:03 (प्रसंग) वृत्तियाँ आती-जाती रहती हैं
09:11 (प्रसंग) आत्मा इन सबके पार स्थिर रहती है
09:18 (प्रसंग) आत्मा का स्वभाव आनंद और आकर्षण है
09:30 (प्रसंग) करने की शक्ति का सही उपयोग मृत्यु भय को मिटाता है
09:37 (प्रसंग) जानने की शक्ति आत्मज्ञान देती है
09:46 (प्रसंग) मानने की शक्ति से आत्मा को अपना स्वरूप मानने पर राग-द्वेष समाप्त होता है
09:56 (प्रसंग) संसार मन की कल्पना मात्र है
10:04 (भजन) संगीत
10:10 (प्रसंग) आत्मा कूटस्थ है, जैसे सोने में गहने बदलते रहते हैं
10:18 (दृष्टांत) वृत्तियाँ बदलती रहती हैं पर आत्मा स्थिर रहती है
10:25 (प्रसंग) साधक आरती में आंतरिक ज्योति को जागृत करने की प्रार्थना करता है
10:53 (प्रसंग) भगवान आत्मा को सभी ज्योतियों की ज्योति बताते हैं
11:00 (प्रसंग) सूर्य, चंद्र, अग्नि आदि सभी बाहरी ज्योतियाँ हैं
11:08 (प्रसंग) इंद्रियों की ज्योति से संसार का अनुभव होता है
11:15 (प्रसंग) मन की ज्योति इंद्रियों को संचालित करती है
11:22 (प्रसंग) बुद्धि की ज्योति मन को देखती है
11:30 (प्रसंग) जीव ज्योति बुद्धि को अनुभव करती है
11:38 (प्रसंग) आत्म ज्योति सबको प्रकाशित करती है
11:46 (प्रसंग) जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं को आत्मा जानती है
11:54 (प्रसंग) आत्मा कभी नहीं बदलती
12:02 (प्रसंग) आत्मा को पहचानने से तीनों शक्तियों का सदुपयोग होता है
12:10 (प्रसंग) भगवत भक्ति इसमें बड़ी सहायक है
12:18 (प्रसंग) आत्म स्वभाव कूटस्थ है, जैसे सोने में गहने बनते बिगड़ते रहते हैं
12:25 (दृष्टांत) वृत्तियाँ बदलती रहती हैं पर आत्मा ज्यों की त्यों रहती है
12:44 (भजन) सतगुरु अंतर का अंधकार मिटाओ
12:53 (भजन) सोहम नाद सुनाओ
13:00 (प्रसंग) भगवान कहते हैं मैं सभी ज्योतियों की ज्योति हूँ
13:08 (प्रसंग) सूर्य, चंद्र, अग्नि आदि बाहरी ज्योतियाँ हैं
13:15 (प्रसंग) इनको देखने के लिए नेत्र ज्योति की आवश्यकता होती है
13:22 (प्रसंग) सुनने, स्वाद, गंध और स्पर्श के लिए अलग-अलग इंद्रिय ज्योतियाँ होती हैं
13:30 (प्रसंग) इन सभी को मन की ज्योति संचालित करती है
13:38 (प्रसंग) मन सो जाए तो इंद्रियाँ होते हुए भी अनुभव नहीं होता
13:46 (प्रसंग) गहरी नींद में सुख-दुख का अनुभव नहीं होता
13:54 (प्रसंग) मन को देखने वाली बुद्धि ज्योति है
14:01 (प्रसंग) बुद्धि को जानने वाली जीव ज्योति है
14:09 (प्रसंग) जीव को प्रकाशित करने वाली आत्म ज्योति है
14:16 (प्रसंग) आत्म ज्योति ही परम ज्योति है
14:23 (प्रसंग) वह अज्ञान से परे है
14:29 (प्रसंग) आत्मा जानने और न जानने दोनों को जानती है
14:39 (प्रसंग) जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति बदलते हैं, आत्मा नहीं बदलती
14:47 (प्रसंग) आत्म देव सदा एक समान रहता है
14:55 (प्रसंग) आत्मा को पहचानने से जीवन सफल होता है
15:03 (प्रसंग) करने, जानने, मानने की शक्तियों का सदुपयोग होता है
15:10 (प्रसंग) भगवत भक्ति इसमें अत्यंत सहायक है
15:38 (प्रसंग) इन तीनों शक्तियों के सही उपयोग से साधक आत्मा में स्थिर होकर परम शांति प्राप्त करता है
15:48 (प्रसंग) योग, कर्म और तप सब कर्ता को ही करना पड़ता है और इनमें जीव के बल की प्रधानता होती है
15:56 (प्रसंग) सभी प्रवृत्तियों में कर्ता का अहं और प्रयास मुख्य रहता है
16:04 (प्रसंग) लेकिन जब भक्त भगवान के लिए, उनकी प्रसन्नता हेतु कर्म करता है तो उसमें अहं नहीं रहता
16:14 (प्रसंग) उसमें भक्त की नहीं, भगवत कृपा की प्रधानता होती है
16:21 (दृष्टांत) जैसे बच्चा अपने बल से चलता है तो गिरता है, पर पिता की उंगली पकड़ ले तो संभलता है
16:28 (दृष्टांत) और जब पिता स्वयं हाथ पकड़ ले तो बच्चा तेज़ी से और सुरक्षित चलता है
16:37 (प्रसंग) इसी प्रकार निर्मम और निरंकार भाव से भक्ति करने पर मन पवित्र होता है
16:44 (प्रसंग) सत्य आचरण और संयम से जीवन शुद्ध बनता है
16:50 (प्रसंग) तब भगवान स्वयं भक्त के मन, बुद्धि और जीव को पकड़ लेते हैं
17:00 (प्रसंग) और उसे सहज ही परम पद तक पहुँचा देते हैं
17:09 (प्रसंग) परा भक्ति प्राप्त होने पर जीवन की तीनों शक्तियों का पूर्ण सदुपयोग हो जाता है
17:17 (प्रसंग) तब मृत्यु का भय, सुख की लालसा और दुख का प्रभाव समाप्त हो जाता है
17:27 (प्रसंग) ऐसा व्यक्ति मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूरा कर लेता है और मुक्त हो जाता है
17:33 (प्रसंग) उसके संपर्क में आने वाले भी मुक्ति मार्ग में आगे बढ़ते हैं
17:42 (प्रसंग) जीव ने अनगिनत जन्मों में भटककर दुख भोगे हैं
17:50 (कथा) देवर्षि नारद विशाला पुरी की ओर जा रहे थे
17:59 (संवाद) सनकादि ऋषियों ने पूछा कि आप इतनी शीघ्रता और व्याकुलता से क्यों जा रहे हैं
18:08 (प्रसंग) नारद जी ने कहा कि कलयुग ने धर्म और शांति को विकृत कर दिया है
18:16 (प्रसंग) तीर्थ स्थानों में भी अधर्म और अशुद्धता फैल गई है
18:26 (प्रसंग) उन्होंने काशी, मथुरा, द्वारका आदि अनेक स्थानों का भ्रमण किया
18:32 (प्रसंग) पर कहीं भी परमात्मा की विश्रांति का वातावरण नहीं मिला
18:39 (प्रसंग) अंततः वे वृंदावन पहुँचे
18:46 (कथा) वहाँ उन्होंने एक युवती को देखा जो अपनी सखियों से घिरी थी
18:54 (कथा) दो वृद्ध पुरुष मूर्छित पड़े थे और युवती विलाप कर रही थी
19:01 (संवाद) उस स्त्री ने नारद जी से अपनी चिंता दूर करने की प्रार्थना की
19:09 (संवाद) नारद जी ने पूछा कि यह कौन हैं
19:19 (प्रसंग) उसने कहा कि मैं भक्ति हूँ और ये मेरे पुत्र ज्ञान और वैराग्य हैं
19:26 (प्रसंग) भक्ति ने बताया कि वह द्रविड़ में उत्पन्न हुई, कर्नाटक में बढ़ी और महाराष्ट्र में सम्मानित हुई
19:34 (प्रसंग) लेकिन गुजरात में पाखंडियों ने उसे क्षीण कर दिया
19:41 (प्रसंग) वृंदावन आने से वह तो युवा हो गई पर उसके पुत्र मूर्छित हो गए
19:50 (प्रसंग) कलयुग ने ज्ञान और वैराग्य को दुर्बल कर दिया है
19:59 (प्रसंग) लोगों में धन और भोग की प्रवृत्ति बढ़ गई है
20:07 (प्रसंग) त्यागी भी भोगी बन गए और धर्म का पतन हो गया
20:16 (प्रसंग) भक्ति ने प्रश्न किया कि भगवान ने ऐसा कलयुग क्यों बनाया
20:24 (प्रसंग) उत्तर दिया गया कि जैसे माता-पिता बच्चे को गिरकर सीखने देते हैं
20:31 (प्रसंग) वैसे ही कलयुग में जीव को अपने प्रयास से उठने का अवसर मिलता है
20:38 (प्रसंग) और यदि वह न उठे तो भगवान को पुकारे
20:45 (प्रसंग) इस प्रकार कलयुग शीघ्र फल देने वाला युग है
20:51 (प्रसंग) राजा परीक्षित ने कलयुग के अनेक दोष बताए
21:01 (प्रसंग) परंतु एक महान गुण यह है कि नाम स्मरण से ही मुक्ति संभव है
21:09 (प्रसंग) जो फल तप, योग और समाधि से नहीं मिलता, वह नाम जप से मिल जाता है
21:17 (प्रसंग) श्री हरि के नाम कीर्तन से भगवत विश्रांति सहज प्राप्त होती है
21:26 (प्रसंग) भक्ति ने नारद जी से अपने दुख दूर करने की प्रार्थना की
21:33 (प्रसंग) नारद जी ने उसे आश्वासन दिया कि वह चिंता न करे
21:40 (प्रसंग) उन्होंने ज्ञान और वैराग्य को जगाने का प्रयास किया
21:47 (प्रसंग) पर वे गहरी मूर्छा में ही रहे
21:55 (प्रसंग) तब आकाशवाणी हुई कि प्रयास करने से सफलता मिलेगी
22:02 (प्रसंग) नारद जी ने विभिन्न आश्रमों में उपाय खोजे
22:10 (प्रसंग) अंततः उन्होंने बद्री आश्रम जाकर तप करने का निश्चय किया
22:18 (प्रसंग) सनकादि ऋषियों ने उन्हें भागवत कथा का उपाय बताया
22:27 (प्रसंग) भागवत श्रवण से ज्ञान और वैराग्य जागृत होते हैं
22:33 (प्रसंग) और भक्ति का दुख समाप्त होता है
22:41 (प्रसंग) यह कथा साधारण जन के लिए अत्यंत उपयोगी है
22:47 (प्रसंग) इससे कलयुग के दोष दूर होते हैं
22:56 (प्रसंग) नारद जी ने समझाया कि भक्ति को सफल करने के लिए ज्ञान और वैराग्य आवश्यक हैं
23:03 (प्रसंग) यदि ज्ञान नहीं होगा तो भक्ति अधूरी रह जाएगी
23:10 (प्रसंग) ज्ञान से ईश्वर का वास्तविक स्वरूप समझ में आता है
23:18 (प्रसंग) तभी भक्ति पूर्ण और स्थिर होती है
23:26 (प्रसंग) इस प्रकार भक्ति, ज्ञान और वैराग्य तीनों का संतुलन आवश्यक है
23:35 (प्रसंग) तभी साधक आत्मा में स्थिर होकर परम शांति प्राप्त करता है
23:30 (प्रसंग) कलयुग में अनेक दोष होते हुए भी भगवान नाम स्मरण का महान गुण है
23:34 (प्रसंग) नाम जप से शीघ्र भगवत कृपा और विश्रांति प्राप्त होती है
23:42 (प्रसंग) तप, योग और समाधि से जो फल कठिनता से मिलता है वह नाम स्मरण से सहज मिलता है
23:48 (प्रसंग) श्री हरि की कीर्तन भक्ति से जीवन धन्य हो जाता है
23:55 (प्रसंग) भक्ति ने नारद जी से अपने दुख और शोक को दूर करने की प्रार्थना की
24:04 (प्रसंग) नारद जी ने भक्ति को धैर्य दिया और उसे आश्वस्त किया
24:11 (प्रसंग) उन्होंने ज्ञान और वैराग्य को जागृत करने का प्रयास किया
24:18 (प्रसंग) वेद पाठ, गीता पाठ और शंखनाद आदि से उन्हें जगाने की कोशिश की
24:28 (प्रसंग) फिर भी ज्ञान और वैराग्य गहरी मूर्छा में ही रहे
24:36 (प्रसंग) कभी-कभी थोड़ी चेतना आती और फिर पुनः लीन हो जाते
24:42 (प्रसंग) यह देखकर नारद जी को आश्चर्य हुआ
24:52 (प्रसंग) तभी आकाशवाणी हुई कि उचित प्रयास करने से सफलता मिलेगी
25:09 (प्रसंग) नारद जी ने विचार किया कि कौन सा उपाय करें
25:16 (प्रसंग) वे अनेक आश्रमों और संतों के पास समाधान पूछने गए
25:22 (प्रसंग) कई संतों ने उत्तर टाल दिया और कुछ ने स्थान ही छोड़ दिया
25:30 (प्रसंग) तब नारद जी ने निश्चय किया कि बद्री आश्रम जाकर तप करेंगे
25:38 (प्रसंग) भगवान नारायण से ही उपाय पूछने का संकल्प लिया
25:44 (प्रसंग) उन्होंने भक्ति को वचन दिया कि चिंता न करे
25:52 (प्रसंग) ज्ञान, वैराग्य और मुक्ति उसके साथ रहेंगे
26:01 (प्रसंग) कलयुग के प्रभाव से मुक्ति कभी-कभी ही प्रकट होती है
26:10 (प्रसंग) पर भक्ति को पृथ्वी पर स्थिर रहकर कार्य करना है
26:17 (प्रसंग) भगवान की कृपा से भक्ति पर विशेष अनुग्रह है
26:26 (प्रसंग) नारद जी ने कहा कि वे भक्ति को घर-घर और हृदय-हृदय में स्थापित करेंगे
26:35 (प्रसंग) और उसके पुत्रों को पुनः जागृत करेंगे
26:43 (प्रसंग) उन्होंने पुनः प्रयास किया पर सफलता नहीं मिली
26:49 (प्रसंग) ज्ञान और वैराग्य मूर्छा में ही पड़े रहे
26:56 (प्रसंग) कभी थोड़ी चेतना आती पर फिर लीन हो जाते
27:05 (प्रसंग) उन्हें देखकर ऐसा लगता मानो गहरे अज्ञान में डूबे हों
27:14 (प्रसंग) आकाशवाणी से प्रेरित होकर नारद जी पुनः प्रयास में जुटे
27:22 (प्रसंग) उन्होंने संतों, ऋषियों और मुनियों से उपाय पूछे
27:31 (प्रसंग) पर स्पष्ट समाधान नहीं मिला
27:40 (प्रसंग) तब उन्होंने बद्री आश्रम जाकर तप करने का दृढ़ निश्चय किया
27:47 (प्रसंग) वे भगवान नारायण से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहते थे
27:57 (प्रसंग) इस संकल्प के साथ वे आगे बढ़े
28:04 (प्रसंग) नारद जी ने सनकादि ऋषियों से भी इस विषय में चर्चा की
28:11 (प्रसंग) सनकादि ऋषियों ने कहा कि भागवत कथा इसका समाधान है
28:17 (प्रसंग) चतुर श्लोकी भागवत का रहस्य अत्यंत गूढ़ है
28:26 (प्रसंग) इसे समझने के लिए वैराग्य और तीव्र श्रद्धा चाहिए
28:33 (प्रसंग) साधारण जन के लिए विस्तृत भागवत श्रवण उपयुक्त है
28:43 (प्रसंग) सप्ताह श्रवण से ज्ञान और वैराग्य जागृत होते हैं
28:49 (प्रसंग) भक्ति का दुख दूर होता है
28:56 (प्रसंग) और जीवन में आध्यात्मिक जागरण होता है
29:03 (प्रसंग) नारद जी ने इस उपाय को स्वीकार किया
29:11 (प्रसंग) उन्होंने भक्ति के पुत्रों की स्थिति पर ध्यान दिलाया
29:20 (प्रसंग) ज्ञान और वैराग्य मूर्छित हैं, इसलिए भक्ति भी दुखी है
29:28 (प्रसंग) यदि ज्ञान और वैराग्य जागृत होंगे तभी भक्ति पूर्ण होगी
29:35 (प्रसंग) भक्ति को सफल बनाने के लिए ज्ञान और वैराग्य आवश्यक हैं
29:45 (प्रसंग) जैसे कोमा में पड़े व्यक्ति को जागृत करना आवश्यक होता है
29:53 (प्रसंग) वैसे ही ज्ञान और वैराग्य को जगाना आवश्यक है
30:00 (प्रसंग) यह मूर्छा कलयुग के प्रभाव के कारण है
30:09 (प्रसंग) आज लोग ज्ञान और वैराग्य को महत्व नहीं देते
30:18 (प्रसंग) केवल भक्ति का बाहरी रूप रह गया है
30:26 (प्रसंग) वृंदावन में भक्ति तो पुष्ट हुई पर ज्ञान और वैराग्य दुर्बल रहे
30:35 (प्रसंग) इससे यह समझना चाहिए कि भक्ति के साथ ज्ञान भी जरूरी है
30:43 (प्रसंग) ईश्वर का स्वरूप और तत्व समझना आवश्यक है
30:53 (प्रसंग) तभी भक्ति स्थिर और फलदायी होती है
31:00 (प्रसंग) ज्ञान से ईश्वर तत्व का अनुभव होता है
31:09 (प्रसंग) और उसी से भक्ति पूर्ण होकर साधक को परम शांति मिलती है
31:09 (प्रसंग) संसार की वासनाओं और आसक्ति से वैराग्य होना आवश्यक है ताकि जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिले
31:15 (प्रसंग) संसार में सत बुद्धि रखने के लिए आसक्ति का त्याग जरूरी है
31:21 (प्रसंग) ज्ञान और वैराग्य पुष्ट होंगे तो भक्ति भी प्रसन्न और स्थिर होगी
31:29 (कथा) नारद जी ने कथा करवाई जिससे ज्ञान और वैराग्य की मूर्छा दूर हुई और भक्ति पुष्ट हुई
31:39 (प्रसंग) इससे सीख मिलती है कि जीवन में ज्ञान और वैराग्य की वृद्धि आवश्यक है
31:48 (प्रसंग) मन स्वभाव से रस और शांति चाहता है
31:58 (प्रसंग) यदि एक सांसारिक रस छोड़ा तो मन दूसरा ढूंढता है
32:04 (प्रसंग) मन को किसी न किसी रस की आवश्यकता रहती है
32:12 (प्रसंग) यदि सत्संग और ध्यान से आत्मिक रस मिल जाए तो बाहरी रस छूट जाते हैं
32:19 (प्रसंग) आत्मिक आनंद मिलने पर विषयों का आकर्षण समाप्त होने लगता है
32:27 (प्रसंग) “यह मिलेगा तो सुखी हो जाऊँगा” यह भ्रम समाप्त करना आवश्यक है
32:34 (प्रसंग) अपने भीतर के सुख को पहचानना ही मानने की शक्ति का सदुपयोग है
32:41 (प्रसंग) अपने को जानना ही जानने की शक्ति का सही उपयोग है
32:49 (प्रसंग) करने, मानने और जानने की शक्ति का समन्वय आवश्यक है
32:56 (प्रसंग) उस सच्चिदानंद में विश्रांति करो जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता
33:03 (प्रसंग) विश्रांति का अभ्यास ही साधना का सार है
33:12 (प्रसंग) विश्रांति के लिए सरल उपाय हैं जैसे आकाश की ओर एकटक देखना
33:20 (प्रसंग) सोहम नाद का अभ्यास भी सहायक है
33:27 (प्रसंग) ध्यान योग से भीतर का रस प्रकट होने लगता है
33:35 (प्रसंग) तब बाहरी विषयों के रस से मन स्वतः हट जाता है
33:42 (प्रसंग) भगवान शिव ने कहा कि ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं है
33:49 (प्रसंग) बाहरी तीर्थ शरीर को शुद्ध करते हैं परन्तु आज उनमें भी अशुद्धि आ गई है
33:59 (प्रसंग) तीर्थ तीन प्रकार के होते हैं – भू तीर्थ, सदाचार तीर्थ और आत्म तीर्थ
34:06 (प्रसंग) भू तीर्थ जैसे काशी, द्वारका, अयोध्या, गंगा, यमुना आदि
34:11 (प्रसंग) सदाचार तीर्थ में सत्य, दया, क्षमा और पवित्र आचरण आते हैं
34:20 (प्रसंग) सात्विक जीवन ही वास्तविक तीर्थ है
34:26 (प्रसंग) तीसरा और सर्वोच्च तीर्थ आत्म तीर्थ है
34:33 (प्रसंग) आत्म तीर्थ में स्नान करने से आंतरिक शुद्धि होती है
34:42 (प्रसंग) आत्मा में कोई कलुष प्रवेश नहीं कर सकता, वह सदा शुद्ध है
34:52 (प्रसंग) प्रातःकाल उठकर आत्म तीर्थ में स्थित होने का अभ्यास करना चाहिए
35:01 (प्रसंग) तिलक स्थान पर स्पर्श कर गुरु मंत्र का जप करना चाहिए
35:08 (प्रसंग) भगवान की शरणागति में सिर झुकाना चाहिए
35:15 (प्रसंग) प्रतिदिन कुछ समय शांत होकर समर्पण भाव से बैठना चाहिए
35:23 (प्रसंग) यह साधना अत्यंत सरल है और सभी कर सकते हैं
35:31 (प्रसंग) शरीर को ढीला रखकर शांति में बैठना ही विश्रांति का अभ्यास है
35:40 (प्रसंग) मन को चिंतन से मुक्त करके प्रभु में समर्पित करना चाहिए
35:49 (प्रसंग) “मैं प्रभु का हूँ” यह भावना ही समर्पण का सार है
35:56 (भजन) जेडो डो मातु जोया मेरी आया मंदी आया
36:04 (भजन) साईं तुम ही सब कुछ हो
36:10 (प्रसंग) हम कहते हैं “तुम ही माता पिता हो” पर उसे हृदय से जीना आवश्यक है
36:18 (प्रसंग) सच्चे समर्पण से जीवन सफल हो जाता है
36:27 (प्रसंग) संतों ने भगवान की शरण का रहस्य जानने का प्रयास किया
36:34 (प्रसंग) उन्होंने भगवान से पूछा कि सच्ची शरण क्या है
36:41 (प्रसंग) क्या बाहरी क्रियाएं ही शरण हैं या आंतरिक स्थिति
36:50 (प्रसंग) खोज करते-करते संत अंतर्मुख हो गए
36:59 (दृष्टांत) जैसे नमक की गुड़िया समुद्र में घुल जाती है
37:09 (प्रसंग) वैसे ही संत आत्मा में लीन हो जाते हैं
37:16 (प्रसंग) उन्होंने भगवान से शरण का वास्तविक स्वरूप पूछा
37:25 (प्रसंग) क्या मूर्ति पकड़ना या बाहरी साधना ही शरण है
37:33 (प्रसंग) या आंतरिक विश्रांति ही सच्ची शरण है
37:41 (प्रसंग) अंत में उत्तर मिला कि जहां संकल्प-विकल्प समाप्त हों वही शरण है
37:48 (प्रसंग) वही परम विश्रांति की अवस्था है
37:56 (प्रसंग) सुबह नींद से उठते समय यह शांति सहज मिलती है
38:04 (प्रसंग) उसी समय विश्रांति का अभ्यास करना चाहिए
38:12 (प्रसंग) दिनभर के कार्यों से अधिक लाभ इस साधना से मिलता है
38:21 (प्रसंग) इससे भगवत प्राप्ति संभव है
38:28 (प्रसंग) यह साधना सभी के लिए सरल और सुलभ है
38:36 (प्रसंग) विश्रांति से सभी समस्याओं का समाधान संभव है
38:44 (प्रसंग) इसे भगवान ने “प्रसाद” कहा है
38:53 (प्रसंग) प्रसाद से सभी दुखों का नाश होता है
39:01 (प्रसंग) आलस्य और निद्रा से बचने के लिए आसन और प्राणायाम करना चाहिए
39:10 (प्रसंग) फिर विश्रांति का अभ्यास करना चाहिए
39:18 (प्रसंग) नियमित अभ्यास से भीतर का रस प्रकट होने लगता है
39:26 (प्रसंग) तब बाहरी विषयों का आकर्षण समाप्त हो जाता है
39:36 (प्रसंग) संसार में भटकने से थकान ही मिलती है
39:43 (प्रसंग) परमात्मा की विश्रांति में ही सच्चा सुख है
39:51 (दृष्टांत) कबीर जी ने कहा कि बिना रहस्य जाने भटकते रहोगे
39:59 (प्रसंग) महापुरुषों की कृपा से ही यह ज्ञान मिलता है
40:07 (प्रसंग) मनुष्य सुख के लिए भटकता रहता है
40:17 (प्रसंग) विवाह आदि में भी प्रारंभ में सुख का भ्रम होता है
40:25 (प्रसंग) बाद में वास्तविकता का अनुभव होता है
40:32 (प्रसंग) प्रारंभिक आकर्षण एक प्रकार का मोह है
40:40 (प्रसंग) यह मन का भ्रम है
40:48 (प्रसंग) संसार में सुख का बाहरी आडंबर है
40:55 (प्रसंग) भीतर दुख छिपा होता है
41:01 (प्रसंग) लोग एक-दूसरे को सुखी समझते हैं
41:09 (प्रसंग) परंतु सभी किसी न किसी रूप में दुखी हैं
41:17 (प्रसंग) विवाह और संसार में भी स्थायी सुख नहीं मिलता
41:25 (प्रसंग) अनुभव के बाद यह सत्य स्पष्ट होता है
41:31 (प्रसंग) संसार का सुख क्षणिक और भ्रममय है
41:41 (प्रसंग) लोग एक-दूसरे को भ्रम में रखते हैं
41:49 (प्रसंग) जीवन की वास्तविकता समझने पर वैराग्य उत्पन्न होता है
41:57 (प्रसंग) संसार में मोह और आकर्षण का जाल है
42:05 (दृष्टांत) जैसे गुलाम नबी का उदाहरण – पहले उत्साह, बाद में संघर्ष
42:12 (प्रसंग) प्रारंभिक आकर्षण बाद में बोझ बन जाता है
42:20 (प्रसंग) जीवन की जिम्मेदारियाँ बढ़ती जाती हैं
42:30 (प्रसंग) पहले का आनंद धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है
42:39 (प्रसंग) वास्तविकता में जीवन संघर्षमय प्रतीत होता है
42:49 (प्रसंग) इससे स्पष्ट होता है कि संसार स्थायी सुख नहीं दे सकता
42:59 (प्रसंग) संयम और समझदारी से ही जीवन सफल हो सकता है
43:07 (प्रसंग) अन्यथा व्यक्ति दुखों में उलझ जाता है
43:14 (प्रसंग) संसार में सुख का आभास है पर वास्तविकता भिन्न है
43:20 (प्रसंग) विवेक से ही सच्चाई समझ में आती है
43:26 (प्रसंग) मनुष्य को सत्य का चिंतन करना चाहिए
43:35 (प्रसंग) तभी जीवन का सही मार्ग मिलता है
43:43 (प्रसंग) अन्यथा मोह और भ्रम में जीवन व्यर्थ जाता है
43:52 (प्रसंग) विवाह का उद्देश्य सहयोग और संतुलन होना चाहिए
43:59 (प्रसंग) अन्यथा जीवन कठिन हो जाता है
44:07 (प्रसंग) संसार का सुख क्षणिक है
44:15 (प्रसंग) विवेक से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है
44:23 (प्रसंग) विचार करने से सच्चाई सामने आती है
44:31 (प्रसंग) संसार धोखे का जाल है
44:40 (प्रसंग) बाहर सुख दिखाई देता है पर भीतर दुख होता है
44:48 (प्रसंग) हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में दुखी है
44:55 (प्रसंग) नानक जी ने कहा – राजा, प्रजा सब दुखी हैं
45:06 (प्रसंग) कबीर जी ने कहा – जो दूसरों को सुख देने का प्रयास करता है वही सच्चा है
45:13 (प्रसंग) संसार में कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है
45:22 (प्रसंग) इसलिए आत्मा को परमात्मा में मिलाना चाहिए
45:32 (प्रसंग) पूर्ण प्रभु की प्राप्ति से ही पूर्णता आती है
45:40 (प्रसंग) जीव परमात्मा का अंश है
45:49 (प्रसंग) बाहरी उपलब्धियों से स्थायी सुख नहीं मिलता
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