सतगुरु संग होली खेलिए… गुरु ज्ञान का पक्का रंग | Holi 2026 Special
TIME STAMP INDEX
01:08 — (विषय) बसंत उत्सव परिवर्तन का प्रतीक है।
01:13 — (विषय) उत्सव बाहरी नहीं, नजरिया परिवर्तन का है।
01:22 — (शास्त्र संदर्भ) भगवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 35 में भगवान ने कहा “ऋतूनां कुसुमाकरः”।
01:29 — (भाव) ऋतुओं में मैं वसंत हूं — ऐसा भगवान का वचन।
01:37 — (वर्णन) वसंत ऋतु में नृत्य, सत्य, राग, रागिनियां खिलती हैं।
01:54 — (सामाजिक भाव) गरीब की संकीर्णता और अमीर का अहंकार मिटे।
02:03 — (उत्सव भाव) मिलाप हो और खेलते-खेलते होली बने।
02:14 — (आंतरिक शुद्धि) दबी हुई अहंकारिता और संग की राधा बह जाए।
02:22 — (अर्थ) अतीत मिटे और नित्य नवीन प्रकाश प्रकट हो।
02:30 — (कबीर वाणी) कबीर ने होली पर तात्विक बात कही।
02:36 — (भजन) “सतगुरु संग होली खेलिए।”
02:43 — (भजन) “सतगुरु संग होली खेलिए।”
02:49 — (भजन) “जाते जरा मरण भ्रम जाए।”
02:54 — (भावार्थ) सतगुरु संग होली खेलने से जरा और मरण का भ्रम मिटता है।
03:02 — (ज्ञान) बुढ़ापा शरीर का है, मेरा नहीं।
03:10 — (ज्ञान) दुख-सुख, बाल्य-युवावस्था — ये सब शरीर-मन की दशाएं हैं।
03:17 — (भजन) “मैं नित्य नवीन चैतन्य हूं, सतगुरु संग होली खेलिए।”
03:22 — (भजन) “जाते जरा मरण भ्रम जाए।”
03:32 — (ज्ञान) “मैं बूढ़ा हो जाऊंगा, मैं मर जाऊंगा” — यह भ्रांति है।
03:40 — (भजन) “साहिब है मेरो रंगरेज।”
03:45 — (भजन) “चुनरी मोरी रंग डारी।”
03:51 — (भावार्थ) गुरु ने दिल की चुनरिया ज्ञान के रंग से रंग दी।
03:58 — (उदाहरण) सामान्य रंग धोने से फीका पड़ता है।
04:07 — (तत्व) परंतु गुरु का संस्कार-रंग स्थायी है।
04:14 — (भजन) “धोए से छूटे नहीं, दिन होत सुरंग।”
04:24 — (भाव) ज्ञान, ध्यान, समता, परोपकार का रंग निखरता जाता है।
04:33 — (भजन) “सतगुरु संग होरी खेलिए।”
04:42 — (भजन) “स्याही रंग छुड़ाए के, दे मजीठा रंग।”
04:50 — (अर्थ) संसार का स्याही रंग — मैं कामी, क्रोधी, धनी, निर्धन हूं।
05:00 — (ज्ञान) पास-नापास मन की दशा है।
05:08 — (ज्ञान) बीमारी-तंदुरुस्ती तन की दशा है।
05:15 — (ज्ञान) काला-गोरा चमड़े की दशा है।
05:22 — (ज्ञान) तू चैतन्य अमर आत्मा है।
05:30 — (भजन) “सतगुरु संग होरी खेलिए।”
05:46 — (भजन) “ध्यान जुगत की करी पिचकारी।”
06:05 — (भाव) आत्मा पर ध्यान की पिचकारी चलाओ।
06:12 — (भजन) “आत्म ब्रह्म जो खेलन लागे पांच पच्चीस मंझार।”
06:24 — (तत्व ज्ञान) पंच महाभूत, पंच कर्मेंद्रिय, पंच ज्ञानेंद्रिय, पंच प्राण आदि।
06:38 — (तत्व) इन सबका 26वां तत्व दृष्टा आत्मा है।
06:53 — (ज्ञान) पंच-25 प्रकृति खेल रही है, सत्ता आत्मा की है।
07:01 — (भजन) “ज्ञान गली में होली खेले, मची प्रेम की कीच।”
07:14 — (भाव) प्रेम की कीच में परमात्मा का कमल खिलता है।
07:30 — (भजन) “लोभ मोह दो कटी भागे।”
07:53 — (ज्ञान) लोभ विषय अनुकूलता है, मोह असत शरीर को मैं मानना है।
08:09 — (भजन) “सुन सुनि शब्द अतीत त्रिकुटी महल में बाजा बाजे।”
08:22 — (तत्व) ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय — यह त्रिपुटी है।
08:39 — (तत्व) शब्द, सुनना, सुनने वाला — यह भी त्रिपुटी है।
09:05 — (ज्ञान) पांचों इंद्रियों की त्रिकुटी में छत्तीस राग बजते हैं।
09:22 — (भजन) “सूरत सखी ज देखी तमाशा।”
09:33 — (ज्ञान) देखने के रूप अनेक, साक्षी एक।
09:50 — (भजन) “सतगुरु खेले फाग।”
10:08 — (योग ज्ञान) इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना नाड़ी।
10:25 — (तत्व) मध्य सुषुम्ना में आत्मानंद प्रकट होता है।
10:44 — (भजन) “अपने पिया संग होरी खेले।”
11:06 — (भाव) अपने चैतन्य आनंद स्वरूप संग होली खेलो।
11:21 — (भजन) “सुन शहर में होत कुतूहल।”
11:34 — (भाव) पूर्ण प्रेम सुहाग — अपने असंग पुरुष का दर्शन।
11:49 — (भजन) “सतगुरु मिले फगवा निज पायो।”
12:10 — (भजन) “कहे कबीर जो यह गति पावे।”
12:22 — (चेतावनी) निपट अनाड़ी होली का तत्व नहीं जानते।
12:34 — (आलोचना) रासायनिक रंग, नशा, गाली — मूर्खों की होली।
13:03 — (ज्ञान) पंच भूत, पंच इंद्रिय, पंच विषय की विवर्त लीला।
13:15 — (सार) जिसने गुरु संग होली खेली वह जन्म-मरण से पार।
13:38 — (भजन) “काम क्रोध लोभ मोह की सिर पर गठरी भारी।”
14:02 — (चेतावनी) हीन वृत्ति से होली खेलना अज्ञान है।
14:25 — (ज्ञान) विकारों की गठरी लेकर खेलने से थकान और खिन्नता।
14:48 — (तत्व) देह नगरी में पांच ज्ञानेंद्रियां और उनके विषय।
15:04 — (सार) विकार छोड़ पिया संग होरी खेलो।
15:27 — (भजन) “सखी रहूं न्यारी।”
15:41 — (भजन) “हाथ सुमति लिए पिचकारी।”
15:51 — (दृष्टि) जहां नजर जाए वहां अस्ति-भाति-प्रिय परमात्मा।
16:09 — (ज्ञान) पंचभूत राग-द्वेष रहित हैं।
16:32 — (उपदेश) अमीरी-गरीबी बाहरी लबास है, भीतर एक आत्म चैतन्य।
17:03 — (उपदेश) ऋतु की निंदा मत करो।
17:22 — (उपदेश) वर्षा, शीत, गर्मी — सब आवश्यक।
17:36 — (उपदेश) लोक, पशु, जीव की निंदा मत करो।
18:12 — (भाव) एक चैतन्य अनेक रूपों में बाजे बजाता है।
18:28 — (ज्ञान) बाहर-भीतर एक को जानो।
18:44 — (सार) ध्यान से शांति और योगियों की प्रसन्नता मिलती है।
18:59 — (ज्ञान) गोपियों का व्यवहार भी दिव्य था।
19:07 — (व्याख्या) गोपी अर्थात इंद्रियां जो खुली होकर भगवान के आनंद को याद करती हैं।
19:13 — (तत्व) शांति में समाधि का सुख है, निवृत्ति में एकांत का सामर्थ्य है।
19:18 — (ज्ञान) प्रवृत्ति में भी जहां-जहां नजर जाती है वहां परमात्मा की पंचभौतिक लीला का आनंद।
19:24 — (भाव) गहराई में वही परमात्मा सब खेल रहा है।
19:31 — (दृष्टांत) कहीं सासू, कहीं बहू, कहीं पोता बनकर वही खेल रहा है।
19:38 — (दृष्टांत) कहीं गुरु, कहीं चेला, कहीं मास्टर, कहीं विद्यार्थी बनकर वही।
19:43 — (भाव) परमात्मा की आनंदमय लीला अद्भुत है।
19:50 — (सार) ज्ञान दृष्टि से खुली आंखों की समाधि ही सच्ची होली है।
20:00 — (ज्ञान) इंद्रियों द्वारा भगवत आनंद पीने की कला जानने वाला ही गोपी है।
20:19 — (इतिहास) होली के दिन चैतन्य महाप्रभु का प्रागट्य हुआ।
20:27 — (उपदेश) इन दिनों हरिनाम कीर्तन करना चाहिए।
20:33 — (स्वास्थ्य) नाचना, कूदना, हो हल्ला करना शरीर के लिए हितकारी।
20:42 — (चिकित्सा भाव) जमा हुआ कफ और गांठें पिघलती हैं।
20:48 — (चेतावनी) जिससे ट्यूमर आदि रोग न बनें।
21:02 — (उपयोग) होली की अग्नि और धानी का भी लाभ लेना।
21:08 — (प्रकृति) केसूड़े के फूल और सुगंधित रंगों से आनंदित होना।
21:23 — (इतिहास) वैदिक काल से होली मनाई जाती है।
21:31 — (वैदिक संदर्भ) सोम यज्ञ होते थे, ऋषि सोमपान करते थे।
21:45 — (वनस्पति) अर्जुन वृक्ष हृदय को मजबूत करता है।
22:00 — (उपयोग) आंवले के रस के साथ औषधि दी गई।
22:23 — (इतिहास) 364 दिन यज्ञ और सोमरस सेवन की परंपरा।
22:37 — (वर्णन) सोम लता से रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती थी।
23:04 — (परिवर्तन) सोम लुप्त होने पर अर्जुन आदि वनस्पतियां प्रयोग में आईं।
23:19 — (सार) जीवन में आनंद और उत्साह बनाए रखने की व्यवस्था।
23:27 — (वेद भाव) जीवन बोझ ढोने के लिए नहीं है।
23:35 — (उद्देश्य) सुशुप्त आनंद, ज्ञान, समता और माधुर्य जगाने के लिए है।
23:49 — (सत्य) पीड़ित जीवात्मा बनने के लिए जन्म नहीं हुआ।
24:03 — (अनुग्रह) पर्वों द्वारा भगवान की शरण में आना सिखाया गया।
24:16 — (तत्व) तुच्छ याचना वासना बढ़ाती है।
24:22 — (ज्ञान) भगवान में शांत होने से वासना शांत होती है।
24:39 — (स्पष्टता) भगवत शरण पराधीनता नहीं, परम स्वाधीनता है।
24:54 — (चेतावनी) विषय-विकारों की शरण ही वास्तविक पराधीनता है।
25:08 — (तत्व) भगवत शरण जीव का ब्रह्म में एकाकार होना है।
25:17 — (उपदेश) रोज 5 या 15 मिनट शांत बैठो।
25:23 — (शास्त्र वचन) “तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत” — भगवद्गीता।
25:39 — (आदर्श) देवशयनी से देवउठी एकादशी तक भगवान विश्राम में।
25:52 — (अभ्यास) दिन में दो-चार बार अपने में स्थित हो जाओ।
26:00 — (सार) व्यर्थ चिंतन मिटाने का नाम भगवत चिंतन है।
26:15 — (भाव) भगवान सुख, शांति, मुक्त स्वरूप हैं।
26:22 — (ज्ञान) भूत का शोक, भविष्य का भय, वर्तमान में आसक्ति।
26:30 — (दृष्टांत) समय निरंतर बीत रहा है।
27:08 — (तत्व) काल के सामने जो है वह अकाल चैतन्य आत्मा है।
27:22 — (चेतावनी) किसी देश, काल, वस्तु से सुख मिलेगा — यह भ्रम।
27:37 — (सत्य) आत्मा अभी सुख स्वरूप है।
27:50 — (ज्ञान) सुख-दुख मन की कल्पना है।
27:59 — (भजन) “ओम आनंद ओम शांति ओम माधुर्य।”
28:13 — (सार) भगवत चिंतन से व्यर्थ चिंतन मिटता है।
28:28 — (लक्षण) गुरु ज्ञान की पिचकारी लगे तो सच्ची होली।
28:42 — (ज्ञान) पक्का रंग अमर आत्मा का है।
29:00 — (सत्य) घटनाएं स्वप्न समान हैं।
29:16 — (तत्व) आग्रह से दुख बनता है।
29:31 — (स्वतंत्रता) हम परम स्वतंत्र आत्मा हैं।
29:46 — (चिंतन) अभी भी हम मुक्त हैं।
30:08 — (सत्य) सुख-दुख आते जाते हैं, हम नहीं जाते।
30:43 — (ज्ञान) सुख-दुख को देखने वाला निरंजन आत्मा।
31:07 — (सत्य) सब बिछड़ता है, पर मैं स्वयं से कभी नहीं बिछड़ता।
31:22 — (ज्ञान) सुख-दुख को सत्ता मैं देता हूं।
31:34 — (दृष्टांत) स्वप्न का डाकू और रक्षक भी मेरे ही बनाए हुए।
31:54 — (सार) गुरु ज्ञान से पता चलता है सब मेरे ही उभारे थे।
32:01 — (प्रसंग) स्वामी रामतीर्थ श्रीकृष्ण से प्रेम करते थे।
32:07 — (प्रेम भाव) श्रीकृष्ण की मूर्ति को “गोलू” कहकर पुकारते।
32:22 — (भाव) प्रेम में शरारत का रूप।
32:28 — (प्रसंग) स्वप्न में कृष्ण से लुकाछिपी खेली।
32:48 — (प्रसंग) तीर्थराम छुपे, कृष्ण ने पकड़ लिया।
33:04 — (तत्व) भगवान छुपने में कलाकार हैं।
33:24 — (प्रसंग) खोजते-खोजते थक गए।
33:59 — (प्रसंग) पकड़कर थप्पड़ मारा तो अपना ही गाल था।
34:19 — (ज्ञान) भगवान और दास — दोनों भाव भी मेरे ही बनाए हुए।
34:33 — (सार) आंख खुली तो जाना सब मेरा ही विस्तार था।
34:36 — (प्रार्थना) “हे शालिग्राम दया कर दे।”
34:38 — (भजन) “हे मम्मा देवी तू मेहरबानी कर दे, हे शांता देवी तू मेहरबानी कर दे।”
34:47 — (कथा) एक पटेल पहली बार बंबई घूमने गए।
34:55 — (संवाद) रिश्तेदार बोले: “काका आओ, मुंबई में छोकरा है।”
35:03 — (कथा) रेलवे स्टेशन पर उतरे।
35:10 — (दृष्टांत) लाल डबल डेकर बस देखी।
35:16 — (कथा) बस में बैठे, पर भूल गए कहाँ जाना है।
35:21 — (प्रसंग) एक महिला ने “कालबा देवी” की टिकट ली।
35:28 — (प्रसंग) दूसरी ने “मम्मा देवी”, तीसरी ने “अंबा देवी” कहा।
35:42 — (हास्य) काका ने समझा कि अपने नाम की टिकट मिलती है।
35:50 — (संवाद) बोले: “एक टिकट शिवलाल काका।”
35:55 — (संवाद) कंडक्टर: “कहाँ जाना है?” काका: “मेरे नाम की टिकट।”
36:01 — (कथा) रुपए भर की टिकट लेकर जहाँ तक चली उतार दिया।
36:09 — (प्रसंग) आठ मंज़िला इमारत खोजते-खोजते पहुँचे।
36:22 — (दृष्टांत) एक बुढ़िया लिफ्ट में गई, ऊपर पहुँची।
36:35 — (दृष्टांत) थोड़ी देर बाद जवान कन्या उतरी।
36:43 — (हास्य) काका समझे बूढ़ी जवान बन गई।
36:53 — (हास्य-सार) मुंबई न जानने से भ्रम हुआ।
37:09 — (तत्वज्ञान) क्या आप इस संसार को जानते हैं?
37:15 — (तत्व) संसार कल्पना का खेल है।
37:22 — (भजन) “होली हुई तब जानिए, पिचकारी गुरु ज्ञान की लगे।”
37:31 — (भजन) “सतगुरु संग होरी खेलिए, जरा मरण भ्रम जाए।”
37:43 — (तत्व) “मैं जवान हूँ, मैं बूढ़ा हूँ, मैं बीमार हूँ” — यह सब भ्रम है।
37:51 — (ज्ञान) जिससे श्री कृष्ण प्रकट होते हैं, वही आत्मा हूँ।
38:05 — (दृष्टांत) खोजने वाला और छिपने वाला — दोनों मेरा ही खेल।
38:12 — (उपदेश) सतगुरु संग होली खेलो — आत्मा का खेल पहचानो।
38:30 — (भजन) “मम दिल मस्त सदा तुम रहना, आन पड़े सो सहना।”
38:39 — (भजन) “आतम नशे में देह भुलाकर साक्षी होकर रहना।”
38:47 — (भजन) “कोई दिन घी-गुड़, कोई दिन भूखा रहना।”
38:57 — (उपदेश) आनंद के लिए परिस्थिति की गुलामी मत करो।
39:11 — (दृष्टांत) हीरे-जवाहरात भी नींद से अधिक मूल्यवान नहीं।
39:41 — (ज्ञान) आत्मा का विश्राम सबसे बड़ा धन है।
39:58 — (चेतावनी) जो मिला है वह कम नहीं; फरियाद मत करो।
40:16 — (उपदेश) ध्यान की युक्ति की पिचकारी करो।
40:23 — (तत्व) क्रोध आया और तुम बह गए — तो वह स्वामी बन गया।
40:35 — (प्रश्न) क्या तुम तिनके हो जो कोई थप्पड़ मार जाए?
40:55 — (प्रसंग) एक संत ने मौन व्रत लिया — “सबमें तू ही है।”
41:13 — (इतिहास) 1942 के युद्ध में सैनिकों ने जासूस समझ पकड़ा।
41:54 — (प्रसंग) धमकाया गया, पर संत शांत रहे।
42:14 — (दृष्टांत) भाला कंठ पर रखा, फिर भी न डरे।
42:40 — (प्रसंग) भाला आर-पार कर दिया।
42:46 — (वचन) “जड़-चेतन सब तेरा खिलवाड़।”
43:04 — (तत्व) स्वप्न की तरह जड़-चेतन एक ही आत्मा से।
43:17 — (दृष्टांत) सूरत से हरिद्वार की यात्रा — सब कल्पना में।
44:31 — (दृष्टांत) रतलाम, सेव, गन्ने का रस — सब मन की रचना।
45:44 — (दृष्टांत) नागदा स्टेशन भी तुमने ही बनाया।
46:22 — (दृष्टांत) कोटा, मथुरा, दिल्ली, मेरठ, रुड़की — सब कल्पना से।
47:05 — (दृष्टांत) हरिद्वार पहुँचे — गंगा बहती दिखी।
47:27 — (तत्व) गंगा, स्नान, पुण्य — भीतर-बाहर की कल्पना।
48:46 — (उपदेश) होली का सत्संग — गुरु ज्ञान की पिचकारी।
49:02 — (ज्ञान) “एक देव सर्वभूतेषु” — एक परमात्मा अनेक रूप।
49:27 — (प्रसंग) हरिद्वार से लौटकर प्रसाद लाए।
50:22 — (दृष्टांत) बेटे ने प्रसाद खा लिया — क्रोध जागा।
50:52 — (ज्ञान) जैसे स्वप्न में पकड़ते-पकड़ते अपना ही गला।
51:08 — (तत्व) एक ही परमात्मा सत्ता सब रूपों में।
51:21 — (सार) इस ज्ञान में रमण से होली आनंदमय।
51:27 — (भजन) “पूर्ण गुरु कृपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।”
52:49 — (जप) “नारायण नारायण नारायण।”
53:04 — (जप) “ओम ओम।”
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