आश्रम संध्या सत्संग 28-02-2026 शाम | Surat Holi 2007
TIME STAMP INDEX
0:02 वशिष्ठ जी ने राम से कहा—मरुभूमि का मृग होना अच्छा, पर विषय-विकारों में रमने वालों का संग न करो (उपदेश)
0:09 इंद्रिय-विषयों में डूबे जीवों का संग बुद्धि को नीचे गिरा देता है (उपदेश)
0:24 तुलसीदास — “दुष्ट संग न दे विधाता” (उक्ति)
0:30 राग-द्वेष में उलझे जीवों का संपर्क साधकों को भी पतित कर देता है (उपदेश)
0:43 त्रिबंध करने से दोष-मुक्ति होती है (उपदेश)
0:53 विकारों पर विजय और ऊर्ध्वगमन की सिद्धि आती है (उपदेश)
1:06 तनाव-चिंता से रक्षा होती है; जालंधर बंध से टेंशन शांत (उपदेश)
1:19 हृदयगति और श्वास-प्रश्वास मंद होकर विकार शांत होने लगते हैं (उपदेश)
1:40 नाड़ी-शुद्धि से मन-बुद्धि शुद्ध होकर ब्रह्म में विश्रांति मिलती है (उपदेश)
1:47 शुकदेव जी ने पिता व्यास का आदरपूर्वक पूजन कर उपदेश ग्रहण किया (प्रसंग)
2:04 सात दिन में परीक्षित को भागवत पुराण सुनाकर ब्रह्मज्ञान कराया (प्रसंग)
2:22 उसके बाद वे कथा-प्रचार हेतु भटकने नहीं गए—स्थितप्रज्ञ रहे (उपदेश)
2:35 आजीविका हेतु कथा करने वाले रहस्य नहीं जानते (उपदेश)
2:53 भगवत-कथा भगवत-विश्रांति और स्वरूप-स्थिति के लिए है (उपदेश)
3:07 “हरी कथा ही कथा, बाकी जग की व्यथा” (उक्ति)
3:14 महामुनि शुकदेव जी वर्षों समाधि में रहे (प्रसंग)
3:25 त्रिबंध सहित 15 प्राणायाम करने का निर्देश (उपदेश)
3:32 मूलबंध, उड्डियान बंध, जालंधर बंध की विधि (उपदेश)
3:40 खाँसने पर कफ निगलना हानिकारक (उपदेश)
3:54 कफ बाहर निकालना चाहिए; अंदर न लें (उपदेश)
4:18 अधिक कफ वालों हेतु धानी-चना सेवन का सुझाव (उपदेश)
4:32 दाईं नासिका से श्वास लेकर “राम-राम” जप, बाईं से छोड़ना—कफ शुद्धि (उपदेश)
4:41 होली के बाद 15–25 दिन बिना नमक भोजन—रोग प्रतिकारक शक्ति वृद्धि (उपदेश)
4:54 15–20 नीम पत्ते व 2 काली मिर्च—त्वचा रोग शांति (उपदेश)
5:12 शरीर-मन स्वास्थ्य का उद्देश्य आत्मचिंतन और मुक्ति (उपदेश)
5:25 शरीर का अंत बुढ़ापा, रोग, मृत्यु से; पर आत्मा अमर (उपदेश)
5:51 बाल्य, यौवन, सुख-दुख बदलते हैं; जो अचल है उसमें टिकना ही वीरता (उपदेश)
6:07 यह विद्या गुरु-परंपरा से ही सुरक्षित रहती है (उपदेश)
6:20 केवल पुस्तक-पाठ या भाषण से अनुभव नहीं टिकता (उपदेश)
6:28 “गुरु कृपा ही केवल शिष्यस परम मंगलम्” (उक्ति)
6:37 घाट वाले बाबा के पास एक प्रोफेसर शांति माँगने आया (प्रसंग)
6:51 बाबा ने गीता पढ़ने को कहा; प्रोफेसर बोले—मैं गीता पर लेक्चर देता हूँ (संवाद)
7:12 बाबा—दूसरों हेतु नहीं, अपने कल्याण हेतु गीता पढ़ो (संवाद)
7:26 प्रवचन करना बड़ी बात नहीं; गुरु-प्रसाद आत्मसात करना बड़ी बात (उपदेश)
7:33 शुकदेव जी ने व्यास-प्रसाद से परीक्षित को साक्षात्कार कराया (प्रसंग)
7:49 वासना-रहित नारायण-पद में स्थिति—मनुष्य जीवन का फल (उपदेश)
7:56 इंद्र ने दैत्यराज से पूछा—राज्य गया, फिर भी प्रसन्न कैसे? (प्रसंग)
8:25 नमुचि दैत्यराज से प्रसन्नता का कारण पूछा (प्रसंग)
8:44 नमुचि बोले—राज्य पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा (उपदेश)
9:00 दुखी होना शत्रु की इच्छा पूरी करना है (उपदेश)
9:17 कुछ लोग हितैषी में भी फरियाद कर दुखी; कुछ शत्रु में भी समता रखते (उपदेश)
9:43 शत्रु शरीर को कष्ट देता; आत्मा अछूती रहती (उपदेश)
10:03 “कोऊ न काहू सुख-दुख करदाता, निज कृत कर्म भोग सब भ्राता” (उक्ति)
10:10 लक्ष्मण ने निषादराज को समझाया—कैकयी दोषी नहीं (प्रसंग)
10:54 दंडकारण्य में कुटिया निर्माण प्रसंग (प्रसंग)
11:25 लक्ष्मण को “जहाँ ठीक लगे बनाओ” सुनकर वैराग्य-पीड़ा (प्रसंग)
12:50 “आपने मुझे मन के हवाले कर दिया” — लक्ष्मण का करुण भाव (संवाद)
13:36 राम ने स्नेह से स्थान निर्देश कर बात संभाली (प्रसंग)
14:17 मन के अधीन होना पतन का कारण—लक्ष्मण की दूरदर्शिता (उपदेश)
15:04 नमुचि दैत्यराज की समता की विजय (उपदेश)
15:30 राज्य, अन्न, घर छिनने पर भी प्रसन्नता—आत्मस्वभाव (उपदेश)
15:51 जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति बदलती; आत्मा नित्य रहती (उपदेश)
16:20 वर्तमान में परमात्म-स्वभाव में स्थित रहना (उपदेश)
16:47 समता-शास्त्र में दैत्य की महिमा (उपदेश)
17:10 “मेरा मन नहीं लगता…” — आसक्ति का रोदन (उपदेश)
17:28 “जो हुआ अच्छा हुआ…” — ईश्वर-विश्वास का नियम (उक्ति)
17:49 संसार-सुधार का अहंकार मूर्खता (उपदेश)
18:14 महापुरुषों में सहज करुणा; ‘मैं सुधार रहा हूँ’ ऐसा भाव नहीं (उपदेश)
18:30 “आप हाथ-पैर धोते हैं तो क्या लगता है कि मैं सुधार रहा हूँ?” — सहज संस्कार, कर्तापन नहीं (उपदेश)
18:39 परिमार्जन और हीनांग-पूर्ति में ‘मैं कर रहा हूँ’ का अहंभाव नहीं होता (उपदेश)
18:57 ऐसे निष्काम पुरुषों से ही मंगल होता है; सुधार का ठेका लेने वाले वाहवाही के गुलाम बनते हैं (उपदेश)
19:12 जो अपना नहीं सुधारते, वे दूसरे का क्या सुधार करेंगे? (उपदेश)
19:20 पद, सत्ता, वाहवाही देह-अध्यास बढ़ाती है (उपदेश)
19:28 देह-अध्यास में ही नाम-यश की भूख रहती है (उपदेश)
19:34 नश्वर शरीर के नाम के पीछे मरना अज्ञान है (उपदेश)
19:42 पथिक जी महाराज की ऊँची समझ—शरीर के नाम का नाम होगा, आत्मा को क्या मिला? (दृष्टांत)
19:58 जलने वाले शरीर को आराम, अपने को क्या लाभ? (उपदेश)
20:15 समय अत्यंत कीमती है; व्यर्थ न खोओ (उपदेश)
20:22 करोड़ देकर भी एक मिनट आयु नहीं बढ़ा सकते (उपदेश)
20:35 इंद्रिय-संयम व मन-एकाग्रता से बुद्धि परमात्मा में लगाओ (उपदेश)
20:50 देखो बुद्धि सास-बहू या विषयों में भटकती है या आत्मा में? (उपदेश)
21:06 “प्रज्ञा अपराधो मूलं सर्वदुःखानां” — प्रज्ञा का अपराध सब दुखों का मूल (उक्ति)
21:25 प्रज्ञा को भगवत-प्रसाद बनाना चाहिए (उपदेश)
21:34 रजोगुण से तमोगुण हटाओ, सतोगुण बढ़ाकर रजोगुण जीतो (उपदेश)
21:42 फिर सतोगुण भी सत्स्वरूप भगवान में विश्रांति पाए (उपदेश)
21:53 बुद्धि भगवत-प्रसाद होने पर दुख पानी में लकीर समान (उपदेश)
22:06 यही साध्य है—बुद्धि का भगवत-प्रसाद (उपदेश)
22:14 गौतम बुद्ध ने नाम-प्रचार की इच्छा नहीं रखी (प्रसंग)
22:19 उन्होंने चित्र-प्रतिमा न रखने को कहा, फिर भी उनकी अनेक प्रतिमाएँ हैं (दृष्टांत)
22:46 नमूचि दैत्य समान शीलवान बनो (उपदेश)
22:54 शीलवान वह जो किसी का अहित न सोचे, न करे (उपदेश)
23:12 शील में महान शक्ति है (उपदेश)
23:21 प्रह्लाद शीलवान थे; इंद्र वेश बदलकर सेवा में आए (प्रसंग)
23:31 शील का दान स्वामी-प्रसन्नता से मिलता है (उपदेश)
23:41 किसी का बुरा न सोचना, न चाहना, न करना—यही शील (उपदेश)
23:54 माँ दवा दे तो अपराध नहीं; पिता ताड़न करे तो दोष नहीं—भाव शुद्ध हो (दृष्टांत)
24:16 “दुर्जन की करुणा बुरी…” — विवेक का संकेत (उक्ति)
24:29 अज्ञानवश बच्चे माता-पिता की ऊँचाई नहीं समझते (उपदेश)
24:42 अमेरिका में हर 10 सेकंड में एक छात्र स्कूल छोड़ता—दिशाहीनता (दृष्टांत)
24:56 नशा, अविवेक, अपराध से युवावर्ग पतित (दृष्टांत)
25:26 एक घंटे में 240 युवक भटकते—भविष्य संकट (दृष्टांत)
26:10 टीवी-अनुकरण से अपराध—विवेकहीनता (दृष्टांत)
26:33 बिल गेट्स से अमेरिका के भविष्य पर प्रश्न—नई पीढ़ी दिशाहीन (प्रसंग)
27:25 जॉर्ज डब्ल्यू. बुश का आह्वान—युवा विज्ञान में आगे बढ़ें (प्रसंग)
27:41 “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव” परंपरा से भारतीय युवाओं की उन्नति (उपदेश)
28:04 श्रम, संयम, सदाचार से ऊँचे पद मिलते हैं (उपदेश)
28:31 इंद्रिय-संयम और मनोनिग्रह से हर क्षेत्र में सफलता (उपदेश)
29:06 इंद्रिय-संयम बिना श्रम-रहित विश्राम नहीं (उपदेश)
29:11 अन्यथा आलस्य और निद्रा बढ़ती है (उपदेश)
29:25 “कुछ न करना—भगवत विश्रांति” (उपदेश)
29:35 भगवत-विश्रांति से भगवत-सामर्थ्य आता है (उपदेश)
29:52 नींद और श्वास सबका अधिकार; वैसे ही परमात्म-प्राप्ति सबका अधिकार (उपदेश)
30:14 विषयों में ‘मैं बड़ा हूँ’ का अहंभाव ही पतन का कारण (उपदेश)
30:21 देहाभिमान ने लोगों को तबाह कर दिया (उपदेश)
30:29 देह-अध्यास — आदि शंकराचार्य का कथन: “गलते देह्यासम्” — देह का अध्यास गलना चाहिए (उपदेश)
30:36 “विज्ञात-परमात्म यत्र-यत्र मनो याति तत्र-तत्र समाधि” — ज्ञानी का मन जहाँ जाए, वहाँ समता (उक्ति)
30:44 अध्यास भीतर से गल जाए, परमात्म-विश्रांति मिले; फिर जहाँ मन जाए वहाँ समाधि (उपदेश)
30:56 जब तक ब्रह्मवेत्ता गुरु गुणातीत न बनाएँ, तब तक मन के कहने में न चलें (उपदेश)
31:03 गुरु-आज्ञा का पालन—स्वेच्छाचार नहीं (उपदेश)
31:12 बाल/दाढ़ी बढ़ने पर गुरु को पत्र—मुंडन/छँटाई की आज्ञा माँगते (प्रसंग)
31:24 आज्ञा अनुसार ही मुंडन या कम कराते—स्वतंत्र मनमानी नहीं (प्रसंग)
31:43 यदि मन से करने लगें तो मन के गुलाम बनें (उपदेश)
31:50 कई शिष्य कहने को शिष्य, पर मन के ही गुलाम (उपदेश)
31:57 “गुलाम के गुलाम” न बनो—मन को गुरु का गुलाम बनाओ (उपदेश)
32:04 मन अपना सेवक है; मन के कहने में चलना दासता है (उपदेश)
32:09 सब मन के दास; कोई बिरला ही मुक्त (उपदेश)
32:17 (कथा) राजदरबार में मस्त संत राजा के सामने टांग पर टांग रखकर बैठे (प्रसंग)
32:41 मंत्री से विनती—राजदरबार की मर्यादा बताओ (प्रसंग)
33:12 संत का प्रश्न—राजा गुलाम के कहने में या गुलाम राजा के? (संवाद)
33:25 यदि गुलाम राजा के कहने में है तो राजा सचमुच राजा; अन्यथा दास (उपदेश)
33:56 राजा ने माना—मैं मन के अनुसार चलता हूँ (प्रसंग)
34:09 संत बोले—तब तुम गुलाम के गुलाम; मेरा हुक्म कैसे? (संवाद)
34:34 संत—मेरा मन मेरे कहने में; आप मन के कहने में (उपदेश)
34:39 राजा पुण्यात्मा—सुधार में तत्पर (प्रसंग)
34:47 वासनाओं का दास टिकता नहीं; वासना उड़ा ले जाती है (उपदेश)
35:06 राजा ने सिंहासन छोड़ा, दीक्षा माँगी, वन-गमन की प्रार्थना (प्रसंग)
35:15 इंद्रिय-संयम, मन-निग्रह सीखकर समता में स्थित होने का संकल्प (उपदेश)
35:38 श्रम-रहित, अहंकार-रहित पद—जन्म-मृत्यु से पार (उपदेश)
35:45 राजपाट की बलि दी, आत्मा की नहीं (प्रसंग)
36:07 आत्मा-परमात्मा बिना अन्य में लगना—आत्मा की बलि; 84 लाख योनियों में भटकना (उपदेश)
36:24 गुरुदेव की विशेषता—84 वर्ष की आयु (प्रसंग)
36:32 20 वर्ष में ईश्वर-साक्षात्कार (प्रसंग)
36:39 16 वर्ष में गहन समाधि (प्रसंग)
36:59 संकल्प-बल प्रबल; 20 में आत्म-साक्षात्कार (प्रसंग)
37:06 84 वर्ष में भी बिना सत्संग भोजन नहीं (प्रसंग)
37:16 नैनीताल के जंगल में एकांत-वास (प्रसंग)
37:25 शिष्य पढ़े, गुरु सुनें; फिर कृपा से व्याख्या (प्रसंग)
37:32 योग वशिष्ठ/उपनिषद का श्रवण (प्रसंग)
37:50 जैसे स्नान से शरीर शुद्ध, वैसे सत्संग से मन शुद्ध (उपदेश)
38:07 केवल सुनाकर आगे सुना देना—“गुड्स ट्रांसपोर्ट” नहीं (उपदेश)
38:14 गुरु सत्संग में विश्राम पाते (प्रसंग)
38:29 हरिद्वार में पंचदशी का सत्संग; गुरु स्वयं श्रोता बनकर बैठे (प्रसंग)
39:09 “मान पूरी है जहर की…”—मान-लालसा दुखद (उक्ति)
39:21 शरीर-मान की चाह बेईमानी कराती (उपदेश)
40:21 मनमानी भक्ति—क्लेश पर क्लेश (उपदेश)
40:37 शास्त्र-गुरु-अनुशासित भक्ति—क्लेश-नाशिनी (उपदेश)
40:49 पैदल-यात्रा, पर विचार-क्लेश; बाह्य भक्ति पर्याप्त नहीं (दृष्टांत)
41:33 गुरु-अनुशासन में रहने वाली भक्ति ही हितकारी (उपदेश)
41:41 “गुरु कृपा ही केवलम्, शिष्यस्य परम मंगलम्” (उक्ति)
41:57 बाल कटाने में भी गुरु-आज्ञा—मनमानी से बचाव (प्रसंग)
42:11 यह सबके लिए नियम नहीं; विशेष संबंध था (उपदेश)
42:38 मानसिक व पत्र-व्यवहारिक सीधा संबंध—शीघ्र लाभ (प्रसंग)
42:52 अपमान सहने का अभ्यास—गुरु-प्रसादी का भाव (प्रसंग)
43:04 संकट में भी समता; शत्रु भी शमित (दृष्टांत)
43:25 आध्यात्मिक जगत की महिमा अद्भुत (उपदेश)
43:32 “जब आत्म-हीरा मिल जाए, जगत तुच्छ” (उक्ति)
43:49 आत्म-हीरा सबके पास; कोई वंचित नहीं (उपदेश)
44:20 श्रम-साध्य सब नश्वर (उपदेश)
44:33 परमात्मा विश्राम से मिलते हैं—अविनाशी (उपदेश)
44:45 बुरी आदतें मिटाने को श्रम; परमात्मा पाने को श्रम नहीं (उपदेश)
45:01 शांति में बैठना—कौन-सा श्रम? (उपदेश)
45:12 मिठाई बनाने/पचाने में श्रम (दृष्टांत)
45:18 विवाह/भोग में श्रम; पश्चात जड़ता (दृष्टांत)
45:28 सत्संग में संभोग/शादी जैसा श्रम नहीं; जड़ता नहीं आती, चेतनता बढ़ती है—सर्वानुभव (उपदेश)
45:49 लोलक-सा हिलना—मन जिस बात में लगे, उसी में रमता रहता (दृष्टांत)
46:09 नाथ संप्रदाय की “टंक विद्या” का एक अंश (उपदेश)
46:23 एक प्रसिद्ध महिला—गले लगाते समय आगे हिलना; टंक विद्या का अंश (प्रसंग)
46:39 आत्मज्ञान अलग है; टंक विद्या का सीमित प्रभाव (उपदेश)
47:04 बिना हिले-डुले भी भीतर का खजाना खुल सकता है (उपदेश)
47:18 “जैसा ग्राहक वैसा माल”—उपदेश विधियाँ भिन्न (उक्ति)
47:28 “चारों मंगल” भी टंक/चमक विद्या का अंश (उपदेश)
47:45 मन में जप और हिलना—आनंद की कल्पना; ऐसा अनिवार्य नहीं (उपदेश)
48:20 इंद्रिय-मन संयम के अनेक उपाय—थोड़ी देर साधन ठीक (उपदेश)
48:39 अभी कुछ न करो—जप-ध्यान भी नहीं; श्रम-रहित विश्राम में बैठो (उपदेश)
49:24 आत्मसाक्षात्कारी के भीतर सारी दुनिया; वे दुनिया में नहीं, दुनिया उनमें (उपदेश)
49:46 जैसे आकाश में जगत, वैसे महापुरुष में ब्रह्मांड (दृष्टांत)
50:05 आदि शंकराचार्य का संकेत—“विभु, व्याप्त, सर्वत्र” (उक्ति)
50:20 “जय सतगुरु देवन देव…”—महापुरुष-स्तुति (भजन)
50:44 “हरे राम…” (कीर्तन)
50:56 “हरे कृष्ण…” (कीर्तन)
51:08 “प्यारे कृष्ण…” (कीर्तन)
51:26 “मेरे गुरु…” (भजन)
51:36 “प्यारे गुरु…” (भजन)
51:49 “ॐ…” (जप)
52:00 “आनंद देवा, शांति देवा”—डूबते जाओ; मजदूर नहीं, प्रेमी बनो (भजन)
52:13 इसमें श्रम नहीं, प्रेम है; कर्म नहीं, भाव है (उपदेश)
52:26 “ॐ शांति”—जितनी देर बोला, उतनी देर चुप; कुछ न किया (उपदेश)
52:40 ध्यान/चिंतन भी न करो—होने दो (उपदेश)
52:46 तिनका गंगा में बहता; यात्री जहाज/रेल में स्वयं चलता (दृष्टांत)
53:00 भगवत-भाव में यूँ ही लुढ़क जाओ (उपदेश)
53:07 “आनंद स्वरूपा, चिदानंद स्वरूपा…” (भजन)
53:35 “श्याम पिया, प्रभु पिया, गुरु पिया…” (भजन)
53:42 “मेरी रंग दे चुनरिया…” (भजन)
53:50 “नीली न रंग आऊंगी”—कोशिश नहीं (भजन)
54:02 जहाज में बैठकर प्रयत्न नहीं; प्रयास से कर्ता-अहं आता (दृष्टांत)
54:26 “प्रभु जी, मारा गुरु जी…”—डूबने की पुकार (भजन)
54:53 “हे भक्ति माता, हे रस रूपा…” (भजन)
55:14 “हे प्रेम स्वरूपा, हे सुख रूपा…” (भजन)
55:42 “आनंद देवा, माधुर्य देवा…” (भजन)
56:01 “घटाकाश-मठाकाश, रज्जु-सर्प, सीपी-चांदी”—सिद्धांत विद्वानों को (उपदेश)
56:15 सिद्धांतों के मूल में विश्राम—हमें रस चाहिए (उपदेश)
56:44 ईश्वर की गोद में हम; हमारी गोद में ईश्वर—तत्त्व-ज्ञान का रस (उपदेश)
57:02 तत्त्व-ज्ञान: श्रोत्रियता से ब्रह्मनिष्ठा, फिर जीवनमुक्ति—आनंद (उपदेश)
57:27 कुछ बनना नहीं; गोद में बैठना/बिठाना (उपदेश)
57:57 “मैं करूँ”—अहं का त्याग; ‘मैं’ मिटे (उपदेश)
58:11 वही गोद, वही बैठने वाला—दूर नहीं (उपदेश)
58:21 गद्गद वाणी, हँसी-रुदन—रस की अवस्थाएँ (दृष्टांत)
58:41 “इश्क इलाही”—भक्ति के भेद (उपदेश)
59:07 “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय…” (जप)
59:23 “माधुर्य देवाय…”—समर्पण (भजन)
59:29 “मैं भक्ति करता हूँ”—यह कर्म; भक्ति में कर्तृत्व नहीं (उपदेश)
59:45 ‘मैं’ कहाँ? तू ही है—अहं-त्याग (उपदेश)
59:53 ‘मुझे ऐसा होना चाहिए’—पूर्वाग्रह/उत्तराग्रह का ग्रहण (उपदेश)
1:00:04 चंद्र/सूर्य-ग्रहण जैसे ज्ञान-प्रेम ढकते हैं (दृष्टांत)
1:00:19 तबियत ठीक हो तब भजन—ऐसी शर्तें भी ग्रहण समान (उपदेश)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें