सोमवार, 2 मार्च 2026

अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है ? | कर्मों का गहन रहस्य |

 

अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है ? | कर्मों का गहन रहस्य |


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0:03 — (कीर्तन) “हरि ओम हरि ओम हरि ओम हरि ओम, हरि बोल हरि बोल…”

0:09 — (कीर्तन) “हरि ओम हरि बोल, जय राम राम…”

0:21 — भगवान श्री कृष्ण ने अपनी समता का परिचय दिया।

0:28 — चित्त की समता ही प्रसाद की जननी है।

0:34 — हजार वर्ष नंगे पैर घूमने की तपस्या भी चित्त की दो क्षण की समता के बराबर नहीं।

0:49 — चित्त को सम करना आपके हाथ की बात है।

0:54 — “समत्व योग” सब योगों में शिरोमणि है।

1:04 — (गीता उक्ति) “समत्वं योग उच्यते।”

1:11 — दुख के समय सम रहो तो दुख का उपयोग करके दुखहारी हरि की ओर बढ़ोगे।

1:19 — सुख में सम रहो तो सुख स्वरूप चैतन्य में विश्रांति पाओगे।

1:35 — सुख-दुख, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जीवन-मरण — सब माया के द्वैत हैं।

1:42 — (ग्रंथ संदर्भ) समर्थ रामदास ने “दासबोध” में कहा।

1:48 — (दृष्टांत) एक अजात पुरुष ने स्वप्न देखा।

1:55 — स्वप्न में पिता ने राज्य तिलक किया।

2:09 — भोगते-भोगते मृत्यु समीप आई; वह सत्कर्म में लगा।

2:16 — सत्पुरुषों ने बंधन काट दिए; वह मुक्त हो गया।

2:31 — अजात (जन्मा नहीं) पुरुष को राज्य, भोग और मुक्ति — सब स्वप्न में।

2:43 — ऐसे ही हम भी स्वप्न देख रहे हैं।

2:51 — वास्तविक रूप में हमारा जन्म नहीं; यह “मैं” भी स्वप्न है।

3:05 — “मैं धनवान हूं, आश्रम वाला हूं, झोपड़ी वाला हूं” — यह स्वप्न की पहचानें हैं।

3:10 — (रामचरितमानस उक्ति) तुलसीदास — “मोह निशा सब सोवन हारा, देखहिं स्वप्न अनेक प्रकारा।”

3:24 — जो हम हैं उसका पता नहीं; जो नहीं हैं उसे “मैं” मान बैठे हैं।

3:36 — (लीला) संत कबीर ने शिष्यों हेतु एक लीला रची।

3:51 — शिष्यों ने देखा: कबीर छाती कूटकर रो रहे हैं।

4:05 — बोले: “मेरा सब कुछ चला गया।”

4:41 — शिष्य व्याकुल हुए; सहायता का आग्रह किया।

5:08 — कबीर बोले: “मैंने स्वप्न देखा कि मैं चिड़िया बन गया।”

5:28 — “अब मुझे पता नहीं कि मैं कबीर हूं या चिड़िया।”

5:41 — स्वप्न में चिड़िया सत्य लग रही थी; अब यह सत्य लग रहा है — सच्चा कौन?

6:02 — अंतर यह कि अब चिड़िया की स्मृति है; तब कबीर की स्मृति नहीं थी।

6:17 — मिथ्या में स्मृति थोपकर शरीर को “मैं” मान लेते हैं।

6:24 — सत्य में स्मृति टिके तो परमात्मा में जागरण और मुक्ति।

6:35 — (उक्ति) “नुक्ते की हेरफेर में खुदा से जुदा हुआ…”

6:50 — ईंट-चूना का घर संसार नहीं; देह को “मैं” मानना ही संसार है।

7:03 — “संसारती इति संसार” — जो सरकता जाए वही संसार।

7:14 — जो देख रहा है वह अचल आत्मा है।

7:23 — (भागवत प्रसंग) भीष्म ने अचल आत्मा में “मैं” टिकाया।

7:30 — श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा: धर्म-रहस्य जानने हेतु भीष्म के पास चलो।

8:25 — भीष्म बाणों की शय्या पर देह त्याग की प्रतीक्षा में थे।

8:38 — वशिष्ठ, अंगीरस, गौतम आदि ऋषि उपस्थित थे।

9:08 — भीष्म ने तकिए हेतु कहा; कोमल तकिया अस्वीकार किया।

9:20 — अर्जुन से तीन बाण सिर की ओर लगवाकर वही तकिया बनाया।

9:33 — देह को खिलौना, आत्मा को सत्य मानने वाले महारथी।

9:43 — (दृष्टांत) अष्टावक्र को पिता का श्राप — आठ बांक वाला शरीर।

10:01 — उत्तर: “शरीर टेढ़ा हो जाए तो क्या? मैं अमर आत्मा हूं।”

10:23 — (दृष्टांत) मदालसा अपने शिशु को ब्रह्मज्ञान की लोरी देती थी।

10:31 — “शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरंजनोऽसि…”

11:03 — प्रत्येक पुत्र को आत्मसाक्षात्कार कराया।

11:15 — आज व्यक्ति “मैं कौन हूं?” नहीं जानता।

11:24 — हड्डी-मांस-रक्त-पित्त-कफ के ढांचे को “मैं” मान बैठा।

12:00 — नाम जन्म के बाद रखा गया; यह थोपा हुआ व्यवहारिक नाम है।

12:28 — व्यवहार को व्यवहार में रखो; परमार्थ को हृदय में प्रकट होने दो।

13:09 — देह-अभिनय निभाओ; पर स्वरूप परमात्मा को जानो।

13:29 — भीष्म के पास श्री कृष्ण और पांडव पहुंचे।

13:48 — भीष्म ने नेत्रों से प्रणाम किया।

14:01 — श्री कृष्ण ने कहा: “पितामह, युधिष्ठिर को उपदेश दीजिए।”

14:08 — भीष्म बोले: “कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है।”

14:28 — अंतर्यामी परमात्मा सब देख रहा है — न्याय या अन्याय।

15:03 — दूसरों को दुख देकर लिया सुख भारी मूल्य चुकवाएगा।

15:32 — ईमानदारी से कर्तव्य निभाओ; नहीं तो प्रकृति पीस डालेगी।

15:46 — भीष्म बोले: “72 जन्म तक कोई घोर पाप नहीं दिखा, फिर बाण शय्या क्यों?”

16:21 — श्री कृष्ण समाधि में स्थित होकर देख रहे हैं।

16:49 — उत्तर: “72 नहीं, 73वां जन्म देखो।”

17:02 — 73वें जन्म में एक हरे पंख वाले जंतु को शूल से भोंका था।

17:15 — वही कर्म चक्रवृद्धि ब्याज से फल दे रहा है।

17:20 — कर्म करने में स्वतंत्रता है; फल भोगने में परतंत्रता।

17:32 — फल तुरंत मिले या युगों बाद; कर्ता होकर कर्म किया तो भोगना ही पड़ेगा।

17:45 — (प्रसंग) बंगाल के कलकत्ते के प्रसिद्ध संत की कथा आरंभ।

17:51 — (जीवन प्रसंग) रामकृष्ण परमहंस के कुल का वर्णन।

17:58 — हुगली जिले के देरे गांव में खुदीराम नामक किसान रहते थे।

18:06 — गांव का मुखिया अत्यंत बदमाश और प्रभावशाली था।

18:24 — उसने खुदीराम से झूठी गवाही देने को कहा कि एक किसान ने 5 लाख लिए।

18:45 — खुदीराम ने कहा: “मैंने देखा नहीं, झूठी गवाही नहीं दूंगा।”

19:02 — मुखिया ने धमकी दी: “मेरी पहुंच है, खबर ले लूंगा।”

19:15 — खुदीराम बोले: “मुसीबत शरीर पर पड़ेगी, पर झूठ से 84 लाख जन्मों की मुसीबत नहीं लूंगा।”

19:45 — “अंतरात्मा के विरुद्ध पाप मार्ग पर नहीं जाऊंगा।”

20:05 — मुखिया ने अपमान का बदला लेने की ठानी।

20:19 — खुदीराम ने दृढ़ इंकार किया।

20:25 — झूठे केस, गुंडे, षड्यंत्र रचे गए।

20:38 — खुदीराम को 100 बीघा भूमि छोड़कर प्राण बचाकर भागना पड़ा।

20:58 — प्रतीत हुआ कि बदमाश जीत गया और सज्जन हार गया।

21:04 — पर ईश्वर की सृष्टि में ऐसा अंतिम रूप से कभी नहीं होता।

21:17 — बदमाश की संतान कुमार्गगामी हुई, शरीर रोगग्रस्त हुआ।

21:29 — सत्यनिष्ठ खुदीराम के घर ईश्वर ने प्रेममय आत्मा को जन्म दिया।

21:38 — उस आत्मा का नाम पड़ा रामकृष्ण परमहंस।

21:48 — “धर्मो रक्षति रक्षितः” — धर्म की रक्षा करने वाला धर्म से रक्षित होता है।

22:11 — अच्छे कर्म का फल अच्छा, बुरे कर्म का फल बुरा।

22:23 — अच्छे कर्म भी भगवान को अर्पित करो ताकि हृदय में स्वरूप प्रकट हो।

22:37 — (गीता उक्ति) “ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे…” — परमात्मा सबके हृदय में।

23:02 — वासना और कुकर्मों का पर्दा प्रभाव को ढक देता है।

23:17 — नम्रता, सात्विकता, दैवी गुण विकसित करो; देव हृदय में प्रकट होगा।

23:30 — (महाभारत प्रसंग) भीष्म को श्री कृष्ण ने 73वें जन्म का कर्म बताया।

23:43 — भीष्म बोले: “सृष्टि का नियम अकाट्य है।”

23:49 — युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश।

24:06 — राजा गुप्तचर से हाल ले पर विवेक से निर्णय करे।

24:15 — दुष्टों की शक्ति नियंत्रित, सज्जनों को प्रोत्साहन।

24:29 — दीन-हीन, वृद्ध, मोहताज की सेवा से राजा स्वर्ग अधिकारी।

24:42 — विलासी राजा का पुण्य नष्ट और सत्ता क्षीण।

24:53 — स्त्री पति के अंतर की आवश्यकता समझे; यह उत्तम नारी।

25:19 — पुरुष स्त्री को भोग की वस्तु न माने; योग मार्ग में सहायक बने।

25:37 — गर्भाधान शुद्ध भाव से हो; संतान दिव्य होगी।

25:59 — उपदेश देते-देते भीष्म मौन हो गए।

26:07 — श्री कृष्ण से प्रेमपूर्वक शर्त की।

26:28 — “प्रयाण तक मुस्कुराते हुए सामने खड़े रहना।”

27:22 — भीष्म बोले: “मैं उस परमात्मा की शरण हूं जो हृदय में है।”

27:36 — ज्ञान लोप पर कपिल, प्रेम लोप पर कृष्ण, मर्यादा लोप पर राम अवतार लेते हैं।

27:58 — करुणा लोप पर बुद्ध अवतरित होते हैं।

28:29 — यशोदा द्वारा बंधे, उखली घसीटने वाले कृष्ण की शरण।

28:51 — राधा रमण कृष्ण को नमस्कार।

29:06 — आरोपों का खंडन: भीष्म अंत समय कृष्ण को प्रणाम करते हैं।

29:36 — “अपनी शुद्ध बुद्धि रूपी पुत्री तुम्हें अर्पित करता हूं।”

30:06 — भक्त प्रतिज्ञा हेतु कृष्ण ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ी।

30:27 — युद्ध में बाणों से कृष्ण का कवच और अंग लहूलुहान।

30:46 — धूलि, पसीना, मटमैले बालों में भी दिव्य तेज।

31:14 — मित्र देकर भी, शत्रु देकर भी कल्याण करने वाले गोपाल की शरण।

31:42 — पसीने की बूंदें मोती समान चमकतीं।

32:01 — बार-बार चरणों में नमस्कार।

32:07 — स्तुति करते-करते प्रयाण क्षण आया।

32:22 — सामान्य जीव वासना अनुसार भटकता है।

32:35 — भीष्म योगेश्वर थे; सीधे परमब्रह्म में लीन हुए।

32:48 — (ग्रंथ महिमा) श्रीमद्भागवत महापुराण जीना और मरना सिखाता है।

32:54 — मरना निश्चित है; मरने की कला सीखो ताकि अमर हो सको।

 

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