शनिवार, 5 मार्च 2016

ईश्वर दर्शन कैसे हो ?









ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कैसे हो ?
     संतों की ऐसी मान्यता है की ' विशुद्ध प्रेम ' ही ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन का प्रधान उपाय है | यह प्रेम किस प्रकार होता है , इसका विवेचन करना चाहिए |
       सबसे प्रथम यह विस्वास होना आवश्यक है की ईश्वर है और वह सुहृद , सर्वशक्तिमान , सर्वान्तर्यामी , परम दयालु , प्रेममय , आनंददाता , सर्वत्र साक्षात विराजमान है | जब तक इस प्रकार का विश्वास नहीं होता , तब तक मनुष्य परमात्मा से मिलने का अधिकारी ही नहीं हो सकता | पवित्र अंत:करण होने पर ही मनुष्य अधिकारी हो सकता है | निष्काम भाव से किये हुए भजन , ध्यान ,सेवा , सत्संग मनुष्य के हृदय को पवित्र करते हैं और हृदय पवित्र होने से मनुष्य अधिकारी बनता है | ईश्वर का ज्ञान भी उसके अधिकारी बनने के साथ- ही -साथ बढता रहता है |
      इस प्रकार जब मनुष्य को ईश्वर का भली प्रकार ज्ञान हो जाता है और जब वह ईश्वर को तत्त्व से जान लेता है तब ईश्वर से वह जिस रूप में मिलना चाहता है , भगवान उसी रूप में उसको दर्शन देते हैं | भगवान सर्वव्यापी परमात्मा सचिदानान्द् रूप से तो सर्वदा वर्तमान हैं ही , पर भगवान के रहस्य का ज्ञाता भगवद्भक्त जिस सगुण , साकार , चेतनमय मूर्ति में उनसे मिलने की इच्छा करता है , वह नटवर उसी मोहिनी मूर्ति में अपने प्रेमी भक्त से मिलता एवं बातें करता है |


       इसमें प्रधान कारण प्रेम और पूर्ण विस्वाश है , जिसको विशुद्ध श्रधा भी कहा जाता है , इसीकी भगवान ने गीता में जगह - जगह प्रशंसा की है
योगिनामपि सर्वेषाम मद्गतेना मद्गतेनान्तरात्मना
श्रद्धावान भजते यो मां स में युक्ततमो मतः |   [ श्लोक ६ / ४७ ]
      | ' सम्पूर्ण योगियों में भी जो श्रधावान योगी मुझमें लगे हुए अंतरात्मा से मुझको निरंतर भजता है , वह योगी मुझे परम श्रेष्ट मान्य है |'


मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मैं युक्ततमा मता: [ श्लोक १२ / २ ] |'
' मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन - ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रधा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं , वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं|
      भजन , ध्यान , सेवा , सत्संग आदि से पवित्र अंत:करण होने के साथ ही साथ ज्ञानरूपी सूर्य का प्रकाश मनुष्य के हृदयाकाश में चमकने लगता है | उस परम प्यारे परमात्मा की मोहिनी मूर्ति का साक्षात दर्शन करनेवाले एवं उसके तत्व को जानने वाले पुरुषों द्वारा ईश्वर के गुण , प्रेम और प्रभाव की बातों को प्रेम से सुनने एवं समझने से ईश्वर में तर्क रहित विशुद्ध श्रधा उत्पन्न होती है | यदि महात्मा न मिले तो साधकों का सत्संग करना चाहिए एवं उनसे ईश्वर - विषयक गुण , प्रेम और प्रभाव की चर्चा करनी चाहिए | यदि साधक भी न मिले तो सत- शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए |
   यदि इसको भी समझने की बुद्धि न हो तो परम पिता परमात्मा से नित्य प्रति एकांत में , सचे हृदय से , प्रेम सहित विशुद्ध श्रधा होने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए | श्रधा से ही तत्त्व ज्ञान होकर परम शांति प्राप्त होती है [ श्लोक ४ / ३९ ] |

श्रधा की वृद्धि से परमेश्वर में सर्वदा दृढ भावना बढती है , भावना के दृढ होने से सर्वत्र ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन होने लगता है | वो साकार इच्छा रखनेवालोको साकार ,और निराकार रखनेवालों को निराकार तत्व रूप में प्रत्यक्ष्य  होते हैं |

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