आश्रम संध्या सत्संग 06-03-2026 शाम | Surat 1990
TIME STAMP INDEX
0:02 (तत्वज्ञान) भक्ति मार्ग में तीन प्रकार के साधक – तामसी, राजसी, सात्विक
0:09 (तत्वज्ञान) तामसी भक्त – भेदभाव, दंभ, हिंसा और द्वेष के साथ भक्ति
0:31 (तत्वज्ञान) दूसरे के नुकसान के लिए मनौती मानना तामसी प्रवृत्ति
1:02 (तत्वज्ञान) राजसी भक्त – सुख, यश और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए भक्ति
1:28 (तत्वज्ञान) सात्विक भक्त – नश्वर भोगों को त्यागकर भगवान को ही मांगना
1:59 (तत्वज्ञान) सात्विक भक्तों का भाव – “हम तुझसे तुझ ही को मांगते हैं”
2:09 (तत्वज्ञान) ब्रह्मज्ञानी गुरु मिलने पर भेद दृष्टि का समाप्त होना
2:26 (तत्वज्ञान) भगवान सर्वत्र व्यापक हैं – प्रेम से प्रकट होते हैं
2:40 (कथा) देवसभा में चर्चा – भगवान विष्णु कहाँ निवास करते हैं
3:14 (कथा) भगवान शिव का उत्तर – हरि सर्वत्र व्यापक हैं
3:28 (तत्वज्ञान) प्रेम से भगवान के प्रकट होने का सिद्धांत
3:35 (उदाहरण) लकड़ी में आग और पृथ्वी में जल का उदाहरण
4:02 (उदाहरण) बोरिंग से जल प्रकट होने का उदाहरण – संत कृपा का महत्व
4:19 (तत्वज्ञान) संत कृपा से साधक हरि रस पिलाने योग्य बनता है
4:49 (कथा) श्रीराम द्वारा श्राद्ध निमित्त साधु संतों के भोजन का आयोजन
5:20 (कथा) शिवजी का फक्कड़ साधु वेश में अवधपुरी पहुँचना
6:22 (कथा) शिवजी का साधुओं के बीच बैठकर भोजन करना
7:00 (कथा) शिवजी का अत्यधिक भोजन करना – सबको आश्चर्य
5:37 (तत्वज्ञान) शिवजी के गले का सर्प – आत्ममस्ती का प्रतीक
5:57 (तत्वज्ञान) आत्माभिमुख होकर संसार करने से संसार गहना बनता है
7:09 (तत्वज्ञान) प्राचीन युगों में मनुष्यों की शक्ति और कद का वर्णन
7:41 (तत्वज्ञान) समय के साथ प्रकृति और मनुष्य की शक्ति में परिवर्तन
8:04 (उपदेश) आधुनिक भोजन और खेती में कृत्रिमता
8:30 (उदाहरण) अमेरिका के गुलाब – बड़े लेकिन बिना सुगंध के
8:49 (उपदेश) बाहरी भव्यता के बावजूद हृदय में आनंद का अभाव
9:03 (शास्त्र) गीता वचन – प्रसन्नता से दुखों का नाश
9:19 (तत्वज्ञान) धारा राधा बनने से जीवन में आनंद
9:31 (उदाहरण) मीरा, सुलभा, चैतन्य आदि की राधामय भक्ति
9:45 (उपदेश) विदेशों में सुविधाएं अधिक लेकिन आंतरिक शांति कम
10:00 (तत्वज्ञान) समय के साथ कृत्रिमता बढ़ना और रस कम होना
10:17 (उपदेश) बाहरी साधनों से अधिक आंतरिक शांति का महत्व
10:26 (उदाहरण) शबरी की झोपड़ी – आंतरिक प्रेम का महत्व
10:35 (उपदेश) संसार के साधन तभी शोभा देते हैं जब अंदर रस हो
10:53 (उपदेश) मृत्यु से पहले जीवन की धारा को राधा बनाने की प्रेरणा
11:20 (शास्त्र) तुलसीदास का वचन – हृदय में राम दर्शन बिना जीवन व्यर्थ
11:41 (उपदेश) बाहरी विद्या और प्रसिद्धि बिना आंतरिक शांति व्यर्थ
11:59 (तत्वज्ञान) साधारण गायन और मीरा के पदों में अंतर
12:18 (उपदेश) आयोजन का उद्देश्य – हृदय मंदिर का उद्घाटन
12:32 (कथा) शिवजी का भोजन करते रहना – रसोई संकट
13:04 (कथा) भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण की चिंता
13:19 (कथा) रामजी का आना और शिवजी को पहचानना
13:52 (कथा) रामजी द्वारा पार्वती (अन्नपूर्णा) का स्मरण
14:07 (कथा) अन्नपूर्णा के आने पर शिवजी का तृप्त होना
14:23 (कथा) शिवजी को उठाने का प्रयास – भरत और शत्रुघ्न असफल
14:40 (कथा) लक्ष्मण को बुलाया जाना
14:54 (उपदेश) भगवान की कृपा से ही कार्य सिद्ध होना
15:02 (उपदेश) भगवान की शक्ति से सेवक को यश मिलना
15:16 (कथा) शिवजी का लक्ष्मण से नम्रता पर प्रसन्न होना और उठना
15:23 (कथा) शिवजी का रामजी से शयन कक्ष में ले जाने का आग्रह
15:30 (कथा) सीताजी द्वारा स्वर्ण कलश में जल लाना
15:44 (कथा) शिवजी का कुल्ला करना और जल सीताजी पर पड़ना
16:00 (कथा) रामजी का समभाव और प्रतिक्रिया न होना
16:07 (संवाद) शिवजी द्वारा रामजी की समता की प्रशंसा
16:14 (संवाद) शिवजी का रामजी को वरदान मांगने को कहना
16:22 (संवाद) रामजी का सांसारिक वस्तुएं न मांगना
16:34 (संवाद) रामजी का वरदान – शिवजी एक वर्ष अयोध्या में रहकर सत्संग करें
17:04 (तत्वज्ञान) राम और शिव दोनों को सत्संग प्रिय
17:11 (तत्वज्ञान) शिवजी के सत्संग से अयोध्यावासियों का अज्ञान दूर होना
17:29 (तत्वज्ञान) उस सत्संग का आंशिक ग्रंथ – शिव गीता
17:43 (उपदेश) महान संवाद – शिव-राम, वशिष्ठ-राम, कृष्ण-अर्जुन
18:06 (तत्वज्ञान) भारत भूमि – ज्ञान में रत रहने वालों की भूमि
18:14 (उपदेश) भारत में शांति से बैठकर सत्संग सुनने की परंपरा
18:37 (उपदेश) हरिनाम में बैठना – जैसे भगवान की गोद में बैठना
18:46 (उपदेश) सत्संग प्रचार करने वालों को आध्यात्मिक अनुभव की प्राप्ति
19:04 (उपदेश) सत्संग के प्रति आभार और नमस्कार
19:39 (उपदेश) आज का मनुष्य कहता है समय नहीं है
19:54 (उपदेश) प्राचीन समय में साधन कम होने पर भी सत्संग होता था
20:08 (शास्त्र) अर्जुन का युद्धभूमि में गीता सुनना
20:23 (तत्वज्ञान) गीता – संसार से पार कराने वाला अमृत
20:33 (उपदेश) प्राचीन राजाओं के पास भी समस्याएं थीं
20:51 (कथा) भगवान राम का गुप्तचरों से व्यक्तिगत मिलना
21:06 (उपदेश) लौकिक उन्नति के साथ आध्यात्मिक उन्नति
21:15 (कथा) राजा जनक का आत्मविचार सभा करना
21:32 (तत्वज्ञान) आत्मलाभ सर्वोच्च लाभ
21:46 (उपदेश) शरीर नश्वर है – सब यहीं छूट जाएगा
21:53 (उपदेश) “मेरा-मेरा” करने वाले अंत में चले जाते हैं
22:03 (दृष्टांत) राजाओं की वैभवशाली जिंदगी अंत में समाप्त
22:25 (उपदेश) धन और राज्य भी नश्वर
22:34 (उपदेश) सत्संग करने की प्रेरणा
22:41 (उपदेश) शरीर भी अंत में अग्नि में जलना है
22:57 (उपदेश) सांसारिक सुख होने पर भी आत्मशांति जरूरी
23:11 (तत्वज्ञान) वर्तमान सुख स्थायी नहीं
23:25 (प्रसंग) राजस्थान में आदिवासियों के बीच हरिनाम प्रचार
23:41 (दृष्टांत) तालाब के सूखने का उदाहरण – धीरे धीरे समाप्ति
23:57 (दृष्टांत) मनुष्य का मरना – जन्म से ही मृत्यु की ओर
24:17 (तत्वज्ञान) जीवन में निश्चित संख्या के श्वास
24:34 (तत्वज्ञान) श्वास की गति से आयु का संबंध
24:49 (तत्वज्ञान) सत्संग से श्वास की गति संतुलित होना
25:05 (कथा) योगियों की दीर्घायु – चांगदेव 1400 वर्ष
25:23 (कथा) चांगदेव का ज्ञानेश्वर के पास जाना
25:32 (तत्वज्ञान) भारत की परंपरा – ज्ञान को महत्व
25:50 (शास्त्र) गुरु वाणी – संत शरण का महत्व
26:07 (शास्त्र) ब्रह्मज्ञानी की महिमा
26:24 (तत्वज्ञान) गीता में ब्रह्मज्ञान का वर्षा
26:34 (तत्वज्ञान) ब्रह्मज्ञानी की स्थिति – कमल समान निर्लेप
26:40 (शास्त्र) गुरु ग्रंथ साहिब – समता का उपदेश
26:57 (तत्वज्ञान) हर्ष-शोक से परे स्थिति
27:13 (तत्वज्ञान) मान-अपमान समान समझना
27:22 (तत्वज्ञान) धन और पद अस्थायी
27:31 (तत्वज्ञान) बचपन, जवानी और बुढ़ापा सब नश्वर
27:48 (तत्वज्ञान) ब्रह्मज्ञान के बिना जीव संसार में बहता है
28:06 (तत्वज्ञान) गीता का उपदेश – बहने वाली और रहने वाली वस्तु
28:14 (तत्वज्ञान) परमात्मा स्थायी है, संसार अस्थायी
28:23 (तत्वज्ञान) संसार का सदुपयोग और परमात्मा का साक्षात्कार
28:32 (शास्त्र) गीता वचन – अनन्य चिंतन करने वालों का योगक्षेम भगवान वहन करते हैं
28:52 (दृष्टांत) गवार जमाई और घोड़े का उदाहरण
29:17 (दृष्टांत) घोड़े पर बोझ रखकर भी स्वयं बोझ उठाना
29:42 (दृष्टांत) मूर्खता से स्वयं को कष्ट देना
30:08 (दृष्टांत) ससुराल पहुंचने से पहले ही जमाई की हालत खराब
30:23 (तत्वज्ञान) जीवन का बोझ भगवान के हाथ में है
30:36 (उपदेश) मनुष्य अनावश्यक चिंता करता है
30:41 (प्रसंग) मैसाना के अमथा काका की घटना शुरु
31:04 (प्रसंग) अमथा काका की अर्धचेतन अवस्था में परिवार की चिंता
31:13 (प्रसंग) काका का खेत, लड़के और रसोई की चिंता करना
31:21 (उपदेश) मरते समय भी मनुष्य की सांसारिक चिंता
31:30 (उपदेश) जीवन परमात्मा के लिए मिला है, पर मनुष्य संसार में उलझ जाता है
31:55 (शास्त्र) गीता वचन – “अनन्य चिंतयन्तो मां…”
32:11 (तत्वज्ञान) भगवान भक्त की आवश्यकता पूरी करते हैं और उसकी रक्षा करते हैं
32:19 (उपदेश) प्रयास करो लेकिन भीतर टेंशन मत रखो
32:27 (उपदेश) संसार में हर व्यक्ति किसी न किसी कारण से दुखी
32:52 (उपदेश) धन, नौकरी, विवाह आदि सभी स्थितियों में दुख
33:08 (शास्त्र) गुरु नानक वचन – “नानक दुखिया सब संसार”
33:16 (दृष्टांत) दुखी व्यक्ति का ब्रह्मज्ञानी के पास जाना
33:32 (दृष्टांत) ब्रह्मज्ञानी की शर्त – सुखी आदमी का जूता लाना
33:50 (दृष्टांत) नगर सेठ भी अपने दुख बताता है
34:21 (दृष्टांत) कलेक्टर भी अपने दुख बताता है
34:37 (दृष्टांत) सभी लोगों का अपने दुखों का वर्णन
35:03 (दृष्टांत) गांव में कोई भी पूर्ण सुखी व्यक्ति न मिलना
35:11 (दृष्टांत) गांव के बाहर फकीर को सोता देखना
35:34 (दृष्टांत) फकीर का कहना – मैं पूर्ण सुखी हूं
35:43 (दृष्टांत) पता चलता है वही ब्रह्मज्ञानी बाबा हैं
35:51 (तत्वज्ञान) निष्कर्ष – संसार में कोई पूर्ण सुखी नहीं
35:58 (तत्वज्ञान) शरीर-मन से जुड़कर जगत को सत्य मानने से दुख
36:11 (उपदेश) स्थायी दुख नाश का उपाय – आत्मज्ञान
36:20 (उपदेश) आत्माराम को जानने से सच्चा सुख
36:37 (उपदेश) मनुष्य जीवन भर सुख के पीछे भटकता है
36:52 (शास्त्र) कबीर वचन – “एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न हो”
37:01 (कथा) जनक, अष्टावक्र, शुकदेव और परीक्षित का उदाहरण
37:24 (उपदेश) सच्चा गुरु या पीर मिलने से भवसागर पार
37:31 (उपदेश) धन, सत्ता और नशे की शराब अहंकार बढ़ाती है
37:44 (उपदेश) हरिनाम की “शराब” से अहंकार और पाप मिटते हैं
37:53 (शास्त्र) संत की अवस्था – सदा आनंद
38:05 (तत्वज्ञान) गीता का ज्ञान – इंद्र से भी श्रेष्ठ सुख
38:12 (उपदेश) युद्धभूमि में भी ब्रह्मविद्या संभव
38:21 (उपदेश) संसार का व्यवहार और आत्मशांति साथ-साथ संभव
38:29 (कथा) कबीरदास का उदाहरण – काम करते हुए भी ब्रह्मज्ञान
38:54 (तत्वज्ञान) गीता नगद धर्म सिखाती है
39:04 (कथा) गीता महात्म्य का प्रसंग आरंभ
39:12 (कथा) तुंगभद्रा नदी के किनारे वैश्य का जीवन
39:27 (उपदेश) एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या के नियमों की अवहेलना
39:45 (उपदेश) पवित्र दिनों में संयम का महत्व
40:02 (तत्वज्ञान) असंयम से जीवन शक्ति का ह्रास
40:17 (कथा) उस व्यक्ति की मृत्यु और अगले जन्म में बैल बनना
40:34 (कथा) भिखारी द्वारा बैल खरीदना
40:53 (कथा) बैल का कष्टपूर्ण जीवन
41:08 (कथा) बूढ़ा बैल भटकता हुआ दलदल में फंसना
41:25 (कथा) लोगों का बैल को निकालने का प्रयास
41:41 (कथा) बैल का न जी पाना न मर पाना
41:49 (कथा) गणिका का वहां से गुजरना
41:58 (कथा) गणिका द्वारा अपना पुण्य बैल को अर्पित करना
42:05 (कथा) बैल की मृत्यु और सद्गति
42:14 (कथा) ब्राह्मण के घर पुत्र रूप में जन्म
42:23 (तत्वज्ञान) योग साधना से पूर्व जन्म का ज्ञान होना
42:38 (कथा) ब्राह्मण पुत्र का गणिका के पास जाना
43:06 (संवाद) गणिका का अपने को पापिनी कहना
43:14 (संवाद) ब्राह्मण पुत्र का कहना – आप मेरी तारणहार हैं
43:23 (कथा) गणिका को कारण याद करना
43:39 (कथा) चोरों द्वारा लाया गया तोते का पिंजरा
43:48 (कथा) तोते द्वारा गीता का पाठ
44:03 (कथा) गणिका द्वारा गीता श्रवण का पुण्य बैल को अर्पण करना
44:20 (तत्वज्ञान) गीता सुनने से जीवन परिवर्तन
44:29 (उपदेश) संत के मुख से गीता सुनने का महत्व
44:44 (शास्त्र) गीता – विरले ही लोग ईश्वर मार्ग पर चलते हैं
45:02 (शास्त्र) उनमें भी विरले को सत्संग में रुचि
45:09 (उपदेश) सत्संग सुनने वालों की प्रशंसा
45:25 (उपदेश) भगवान की कृपा से ही सत्संग प्राप्त होता है
45:32 (कथा) गोपियों और ग्वालों की प्रार्थना – आत्मसुख की कामना
45:49 (कथा) कृष्ण का शरद पूर्णिमा की रात बंसी बजाने का वचन
46:05 (कथा) केवल अधिकारी गोप-गोपियों का कृष्ण के पास पहुँचना
46:12 (तत्वज्ञान) माखनचोरी लीला का आध्यात्मिक अर्थ – आत्मप्रसाद की ओर आकर्षण
46:22 (उपदेश) कृष्ण की गोपी लीला पर आरोपों का खंडन
46:29 (तत्वज्ञान) कृष्ण की बाल अवस्था और उनकी निष्कलंकता
46:38 (तत्वज्ञान) कृष्ण के जीवन की पवित्रता से गीता की सार्वभौमिकता
46:46 (कथा) ब्रह्मा जी का कृष्ण लीला पर संदेह और ग्वाल-बछड़े चुराना
46:55 (तत्वज्ञान) भगवान का छोटे के साथ छोटा बनकर उसे महान बनाना
47:02 (दृष्टांत) अकबर का प्रश्न – हिंदुओं का भगवान स्वयं क्यों अवतरित होता है
47:27 (दृष्टांत) बीरबल का प्रयोग द्वारा उत्तर देने का विचार
47:34 (दृष्टांत) यमुना में नौका विहार का कार्यक्रम बनाना
47:50 (दृष्टांत) मोम का नकली राजकुमार बनवाना
48:07 (दृष्टांत) नकली बच्चे के गिरने पर अकबर का स्वयं कूदना
48:24 (दृष्टांत) बीरबल का उत्तर – पुत्र संकट में हो तो पिता स्वयं जाता है
48:43 (तत्वज्ञान) भगवान भी अपने भक्तों के लिए स्वयं अवतरित होते हैं
48:51 (तत्वज्ञान) भगवान विभिन्न रूपों में मार्गदर्शन के लिए आते हैं
49:07 (तत्वज्ञान) राम और कृष्ण अवतार का उद्देश्य
49:16 (तत्वज्ञान) भगवान अपने भक्त को मोह-माया से बचाने आते हैं
49:23 (संवाद) अकबर का स्वीकार – ईश्वर एक ही है
49:40 (शास्त्र) “एक नूर ते सब जग उपजा” – सबमें एक ही परमेश्वर
49:54 (उपदेश) गीता के वचनों में परिवर्तन नहीं किया जा सकता
50:02 (दृष्टांत) गीता के अर्थ को बदलने की असंभवता
50:21 (कथा) संत श्रीधर स्वामी का प्रसंग आरंभ
50:28 (कथा) श्रीधर स्वामी द्वारा गीता पर टीका लिखना
50:36 (कथा) “अनन्य चिंतयन्तो माम…” श्लोक पर रुक जाना
50:43 (तत्वज्ञान) “योगक्षेमं वहाम्यहम्” का अर्थ
51:00 (दृष्टांत) श्रीधर स्वामी का “वहामि” शब्द बदलकर “ददामि” लिखना
51:34 (कथा) श्रीधर स्वामी का स्नान के लिए समुद्र तट जाना
51:49 (कथा) पाँच वर्ष का बालक खिचड़ी की गठरी लेकर घर आना
52:03 (संवाद) बालक और श्रीधर स्वामी की पत्नी का संवाद
52:19 (कथा) खिचड़ी से डिब्बा भर जाना
52:27 (संवाद) बालक का अपना नाम किसी भी नाम से बताना
52:35 (संवाद) राम, कृष्ण, हरि, नारायण – सब एक ही
52:44 (संवाद) बालक का कहना – मैं सब जगह रहता हूँ
53:00 (संवाद) माता-पिता के बारे में रहस्यमय उत्तर
53:22 (संवाद) “सबके दिल में मेरा घर है”
53:45 (कथा) बालक का कहना – मैंने वचन दिया है कि मैं बोझा वहन करता हूँ
53:58 (तत्वज्ञान) भगवान भक्तों की व्यवस्था स्वयं करते हैं
54:14 (संवाद) बालक के होंठ पर चोट का कारण
54:23 (कथा) श्रीधर स्वामी के काटे गए शब्द का संकेत
54:45 (कथा) बालक का अचानक चले जाना
54:54 (संवाद) श्रीधर स्वामी की पत्नी द्वारा घटना बताना
55:12 (तत्वज्ञान) श्रीधर स्वामी का समझना – भगवान स्वयं आए थे
55:19 (तत्वज्ञान) गीता का वचन अक्षरशः सत्य है
55:35 (शास्त्र) “अनन्य चिंतयन्तो माम…” का वास्तविक अर्थ
55:52 (तत्वज्ञान) सभी संबंधों में परमात्मा का निवास
56:06 (शास्त्र) कबीर वचन – परमात्मा सबमें व्याप्त
56:21 (भजन) कबीर का पद – हर जगह वही परमात्मा
56:42 (तत्वज्ञान) देने वाले, लेने वाले और मांगने वाले में वही
56:58 (तत्वज्ञान) जल, थल और सभी जीवों में वही
57:06 (तत्वज्ञान) गुरु और शिष्य दोनों रूपों में वही
57:14 (तत्वज्ञान) सुनने वाले और सुनाने वाले में भी वही परमात्मा
57:21 (तत्वज्ञान) जो अनेक में एक परमात्मा को देखता है वही सच्चा ज्ञानी
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