सोमवार, 19 जनवरी 2026

ईश्वर का खेल जो समझ गया, तर गया |

 



 ईश्वर का खेल जो समझ गया, तर गया | 

 Index

0:02 – 0:26 : ईश्वर का हितैषी, रक्षक और पोषक स्वरूप

0:26 – 4:19 : [कथा] साई टेव राम जी – चोरी के बाद भोजन की लीला
4:19 – 12:35 : [घटना] गंगोत्री में महापुरुष चेतनानंद गिरी द्वारा भोजन
12:35 – 14:59 : ईश्वर अंतर्यामी है – चित्रबाज़ी से चेतावनी
15:02 – 17:16 : [कथा] गरीब ब्राह्मणी और दुकानदार
17:23 – 19:18 : [घटना] नर्मदा तट पर स्वप्न से भोजन व्यवस्था
19:26 – 22:10 : [घटना] स्वामी राम तीर्थ और विवाह की अलौकिक लीला
22:10 – 27:16 : [घटना] मोटेरा आश्रम – एक देह अनेक स्थान
27:16 – 30:11 : [कथा] संयम, अंतर्यामी और काम-विजय
30:11 – 31:16 : [उपदेश] साधना, संयम और कृपा का चमत्कार

 अनुच्छेद 

0:02हमारे ईश्वर कितने हितैषी, रक्षक और पोषक हैं। वे अनुशासन शक्ति से हमारी गलतियाँ दिखाते हैं और प्रीति शक्ति से हमारे विवेक और आत्मबल को बढ़ाते हैं। वे सबके नियामक हैं और अंतरात्मा के माध्यम से एक-दूसरे के द्वारा सबका विकास कराते हैं।

0:26[कथा – साई टेव राम जी]
साई टेव राम जी बालू के टीलों पर रहते थे। कोई स्थायी स्थान नहीं था। भक्त दर्शन को आते थे और वहीं प्रसाद बनता था। एक रात चोर सारे बर्तन चुरा ले गए। सेवक चिंतित हुए, पर साई जी ने कहा – “तुम बैठकर देखो ईश्वर की लीला।” समय बीतता गया, और ठीक भोजन से पहले एक ब्राह्मणी भोजन लेकर पहुँची। उसने कहा – “मुझे भीतर से प्रेरणा हुई।” भोजन कभी कम नहीं पड़ा। साई जी बोले – जो चोर को प्रेरणा देता है, वही भक्त को भी प्रेरित करता है।


4:19 [घटना – गंगोत्री]
32–33 वर्ष पूर्व गंगोत्री में एकांत में यात्रा करते हुए एक महापुरुष मिले, जिनकी जटाएँ थीं। उन्होंने संकेत से भोजन कराया। गरमागरम भोजन तैयार था। वे मौनी संत चेतनानंद गिरी थे। उन्होंने बताया कि ध्यान से उठकर भोजन बनाते-बनाते अधिक बन गया। उन्हें पता ही नहीं था किसके लिए है, पर परमात्मा ने पहले से व्यवस्था कर दी थी।


12:35 ईश्वर कितना सुहृद है। माँ के गर्भ में नाभि से जोड़ता है और जन्म होते ही दूध की व्यवस्था कर देता है। गीता कहती है – सुहृदं सर्वभूतानाम्। जो इस सत्य को जानता है, वही शांति पाता है। जो इंद्रिय सुख में भटकता है, वह स्वयं का शत्रु बनता है।


15:02 [कथा – गरीब ब्राह्मणी]
एक गरीब स्त्री ने मेहमानों के लिए उधार लिया। दुकानदार ने गलत शर्त रखी। स्त्री ने पति को बताया। पति ने कहा – “जाओ, ईश्वर रक्षा करेंगे।” जब दुकानदार ने अंतर्यामी को भी छुपाने की बात कही, तो उसका विवेक जाग उठा। वह गिर पड़ा और स्त्री को प्रणाम किया। संयम ने काम को पराजित कर दिया।


17:23 [घटना – नर्मदा तट]
नर्मदा किनारे बैठे साधक के पास गाँव के किसान फल-दूध लेकर पहुँचे। उन्होंने कहा – “रात को स्वप्न में मार्ग दिखाया गया।” संकल्प से पहले ही परमात्मा ने व्यवस्था कर दी।


19:26 [घटना – स्वामी राम तीर्थ]
गोपीनाथ स्वामी राम के सत्संग में बैठे रहे। उधर भतीजी का विवाह था। तिजोरी की चाबी उनके पास थी। फिर भी विवाह सम्पन्न हो गया। सबने कहा – “आप आए थे।” यह ईश्वर की अद्भुत लीला थी – भक्त के कार्य स्वयं ईश्वर संभालते हैं।


22:10[घटना – मोटेरा आश्रम]
एक ही व्यक्ति कई स्थानों पर दिखाई दिया। शास्त्रों में इसे अनेक जीववाद कहते हैं। जब मन दृढ़ चिंतन करता है, ईश्वर उसी अनुरूप व्यवस्था कर देता है। शरीर एक स्थान पर और मन दूसरे स्थान पर होने से ऐसी घटनाएँ घटती हैं।


27:16[कथा – संयम और अंतर्यामी]
कामना के क्षण में अंतर्यामी का स्मरण ही रक्षा करता है। जिस क्षण भीतर से दृष्टि जागती है, पतन रुक जाता है। यही कथा बार-बार हमें चेताती है।


30:11[उपदेश]
यदि मन, बुद्धि और बल बढ़ाना हो तो परमात्मा के नाम का स्मरण करें, इंद्रियों को गलत दिशा में जाने से रोकें। विफल होने पर कातर प्रार्थना करें, त्रिबंध प्राणायाम करें और दृढ़ निश्चय रखें। जब हृदय से निश्चय होता है, तब भगवान की कृपा का चमत्कार निश्चित मिलता है।

 



साई टेव राम जी की लीला

साई टेव राम जी बालू के टीलों पर ही रहते थे। मरुभूमि के उन टीलों पर कोई पक्का ठिकाना, कोई बाड़ या आश्रम जैसा स्थान नहीं था। वहीं लोग दर्शन के लिए आते थे और उन्हीं के लिए प्रसाद बनता था। प्रसाद बनाने के लिए कुछ बर्तन इकट्ठे किए गए थे, पर रहने का कोई स्थायी स्थान नहीं था, खुला मैदान ही उनका निवास था।

एक रात चोर आए और सारे बर्तन तथा सामान उठाकर चले गए। सुबह जब सेवकों ने देखा तो पूरा स्थान बिल्कुल साफ हो चुका था। सेवकों ने कहा कि खुले मैदान में भक्त भी सोए थे और रसोई के लोग भी अपनी-अपनी जगह पर सो रहे थे, फिर भी सारा सामान चोर ले गए। उन्होंने साई जी से निवेदन किया कि आज्ञा दें तो चोरों के पदचिह्न देखकर खोज करें या पुलिस में फरियाद करें।

साई टेव राम जी ने शांत भाव से कहा, “तुम सब बैठे रहो, देखो क्या होता है।” सेवक मन ही मन सोचने लगे कि अब क्या होगा, भोजन कैसे बनेगा, बर्तन कहाँ से आएँगे, सामग्री कहाँ से मिलेगी। समय बीतता गया, आठ बज गए, नौ, दस और फिर ग्यारह भी बज गए, पर कोई उपाय दिखाई नहीं दे रहा था।

तब साई जी बोले, “तुम उस लीलाधर की लीला देखते रहो। जिसने बर्तन चुराने वाले को सत्ता दी है, उसी की जिम्मेदारी है कि वह खिलाने वालों और खाने वालों की व्यवस्था भी करे। तुम व्यर्थ चिंता मत करो, तुम तो भजन और मस्ती में रहो।” वे समझा रहे थे कि संसार को भगवान की सत्ता का पता नहीं होता।

लगभग बारह बजे का समय होने लगा। पंगत का समय था और सबके पेट में हलचल होने लगी। यह एकांत टिला था, चारों ओर मरुभूमि, अब भोजन कहाँ से आएगा, यही चिंता थी। तभी बारह बजने से कुछ ही मिनट पहले एक ब्राह्मणी माता वहाँ आई। उसके साथ कुछ और लोग भी थे, जो भोजन का सामान उठाए हुए थे।

उस माता ने कहा, “आप सब बैठिए, भोजन कीजिए।” सेवकों ने पूछा, “माता जी, हम आपको पहचानते नहीं, आप कौन हैं और कहाँ से आई हैं?” उन्होंने उत्तर दिया, “पहले भोजन कर लो, बाद में पूछ लेना।” फिर उन्होंने बताया कि वे ब्राह्मणी हैं और उन्हें भीतर से बार-बार प्रेरणा हो रही थी कि इस टीले की ओर इतने लोगों का भोजन बनाकर ले जाना है। यह प्रेरणा उन्हें सुबह ध्यान-भजन के समय मिली और बार-बार उठती रही।

उन्होंने बताया कि उन्होंने भोजन बनाया और अपने साथ काम करने वालों को भी साथ ले आईं। सबको भरपेट भोजन कराया गया और भोजन कभी कम नहीं पड़ा। तब साई टेव राम जी ने कहा, “देखो, जो बर्तन चुराने वाले को प्रेरित करता है, वही भक्तों को भी प्रेरणा देता है कि भोजन बनाओ और यहाँ ले आओ। यही है ईश्वर की लीला, यही है उसका अद्भुत खेल।”

  4:19 – 12:35 : [घटना] गंगोत्री में महापुरुष चेतनानंद गिरी द्वारा भोजन

इसी आश्रम में शिवलाल रहते थे, जो आज भी जीवित हैं। शंकर भाई भी वहीं रहते थे और एक मंत्री भी सेवा में लगे रहते थे। वे रेवेन्यू मंत्री रह चुके थे, वकील भी थे, फिर भी सप्ताहों तक झाड़ू, बुहारी और लिपाई जैसे सेवाकार्य करते थे। वे गुजरात में कन्हैया ओझा की सरकार में मंत्री रहे थे, फिर भी उनका जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था।

लगभग बत्तीस–तैंतीस वर्ष पहले हम गंगोत्री गए थे। उस समय गंगोत्री के कपाट बंद होते तो वहाँ कोई आता-जाता नहीं था। गिने-चुने दो-चार साधु रहते थे, बाकी पूरा क्षेत्र पूर्ण सन्नाटे में डूबा रहता था। उत्तरकाशी के बाद बस भी थोड़ी दूर तक ही जाती थी, आगे पैदल ही जाना पड़ता था। हम लोग भी पैदल ही गए थे।

हमारे साथ चंदी राम, शंकर, कृष्ण भाई चौधरी मंत्री, मैं स्वयं और सामान ढोने वाला एक मजदूर था। कुल मिलाकर हम पाँच–छह लोग थे। दोपहर लगभग तीन से साढ़े तीन बजे हम गंगा जी के मंदिर के पास पहुँचे। मंदिर तक पहुँचने से पहले ही एक लंबी जटाओं वाले साधु आए और संकेत से हमें अपने साथ ले चले।

उन्होंने इशारे से बैठने को कहा और भोजन करने का संकेत दिया। हमने देखा कि भोजन गरमागरम था—सीरा, सब्जी, पहाड़ी चावल और रोटियाँ। यह मुझे आज भी स्पष्ट याद है। वह भोजन उसी महापुरुष ने अपने हाथों से बनाया था। हमने भोजन किया और फिर आश्चर्य से पूछा कि इतनी दुर्गम जगह पर उन्होंने यह भोजन कैसे बनाया।

वे मौनी संत थे और अत्यंत ऊँची अवस्था में स्थित थे। किसी के मन की बात जानना उनके लिए सहज था। गर्मियों में कई साधु उनके दर्शन करना चाहते थे—किसी को दर्शन होते, किसी को नहीं। ऐसे महापुरुष ने हमारे लिए भोजन बनाया और स्वयं अपने हाथों से परोस-परोस कर खिलाया, यह सचमुच आश्चर्यजनक था।

मैंने उनसे पूछा कि क्या कोई सेवक उनकी सहायता करता है, क्योंकि वहाँ तो बर्फ पड़ती है, बड़े-बड़े ग्लेशियर हैं और गंगोत्री से आगे गोमुख तक अत्यंत कठिन मार्ग है। उन्होंने कहा कि वे सुबह ग्यारह बजे ध्यान से उठकर भोजन बनाने लगे। चावल साफ करते-करते छह लोगों के लिए चावल हो गए, सब्जी बनाते-बनाते सब्जी अधिक बन गई और आटा गूंथते-गूंथते आटा भी बहुत हो गया।

उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि यह भोजन किसके लिए बन रहा है। महापुरुषों को अपने शरीर और मन से ममत्व नहीं होता, उनका ममत्व उस परम तत्व में होता है जो शरीर और मन को चलाता है। जो बनता गया, वे बनाते गए—चावल बने, सब्जी बनी, रोटियाँ बनीं और भोजन तैयार हो गया।

जब वे बाहर आए तो उन्होंने हमें देखा और समझ गए कि यह भोजन हमारे लिए ही बना है। उन्होंने हमें बैठाकर भोजन कराया। मैं उनसे प्रश्न लिखकर करता था और वे लिखकर उत्तर देते थे। इस प्रकार प्रश्न–उत्तर में हमारी आत्मीयता बढ़ी। बाद में मैंने कहा कि लिखने में समय लगता है, आप बोलकर बात करें। मेरे आग्रह पर उन्होंने मौन खोल दिया।

उनका नाम चेतनानंद था, जैसा उन्होंने स्वयं बताया। उस समय भी वे मेरी उम्र से बड़े थे, साधना और एकांत सेवन में भी मुझसे वरिष्ठ थे। फिर भी वे मेरा बहुत आदर करते थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं कोई साधु नहीं हूँ, गृहस्थ हूँ, आश्रम में सात वर्ष रहा हूँ और अब परिवार है।

उन्होंने चंदी राम और अन्य साथियों के पूर्व जीवन और स्वभाव के विषय में भी बताया। उनकी अंतर्यामी स्थिति ऐसी थी कि उनके लिए भूत, भविष्य और वर्तमान का भेद नहीं था। वे सदा उसी वर्तमान में स्थित थे, जिसकी सत्ता से सब कुछ परिवर्तित होता है।

मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने मेरे लिए इतना क्यों किया, जबकि मेरा उनसे कोई परिचय भी नहीं था। उन्होंने कहा कि बाहर से तुम संसारी दिखते हो, फिर भी उन्होंने मेरी पूर्व साधना और संस्कारों की बात कही। तब मेरे मन में प्रश्न उठा कि वह कौन सा परमात्मा है, जो मेरे जाने से पहले ही ऐसे उच्च कोटि के संत को प्रेरित कर भोजन बनवा देता है।

मैं सोचने लगा कि मैं अपने बल, धन या प्रभाव से उस महापुरुष से भोजन नहीं बनवा सकता था, लेकिन परमात्मा की प्रेरणा से उन्होंने न केवल मेरे लिए, बल्कि मेरे साथ आए मजदूर तक के लिए भोजन बनाया और अपने हाथों से परोसकर खिलाया। ऐसा सुहृद ईश्वर ही सच्चा पालनकर्ता है।

परमात्मा का सुहृद और अंतर्यामी स्वरूप

चोर सामान ले जाते हैं, और उसी समय टेराम जी तथा उनके सेवकों के लिए एक ब्राह्मणी माता अपनी सहायिकाओं के साथ भोजन बनाकर टीलों पर पहुँचा देती है। यह देखकर मन में प्रश्न उठता है कि यह कैसा सृष्टिकर्ता है, जो एक ओर जाने देता है और दूसरी ओर पहुँचाने की पूरी व्यवस्था भी स्वयं करता है। यही उसकी लीला है और यही उसका करुणामय खेल है।

ध्यान देकर देखो, वह कैसा दीनबंधु है और कैसा प्राणी मात्र का हितैषी है। वह केवल दूर बैठा शासक नहीं है, बल्कि हर जीव के भीतर बैठा हुआ परम सुहृद और अंतर्यामी है, जो प्रत्येक की आवश्यकता को समय से पहले जान लेता है और उसी के अनुसार व्यवस्था करता है।

वह कितना उदार है और कितना ख्याल रखने वाला है। माँ की नाभि और गर्भ के साथ हमारी नाभि जोड़ने वाला वही परमात्मा है। जैसे ही हमारा जन्म होता है, वह माँ के शरीर में अपने आप दूध की व्यवस्था कर देता है। बिना किसी मांग के, बिना किसी आग्रह के, वह पहले से ही सब कुछ सँवार देता है।

शास्त्रों में कहा गया है— “सुहृदं सर्वभूतानाम्”— मैं प्राणी मात्र का सुहृद हूँ। जो इस सत्य को जान लेता है, जो इस भाव में स्थित हो जाता है, वही शांति को प्राप्त करता है। ईश्वर को जानना कोई दर्शन मात्र नहीं, बल्कि उसकी इस करुणामय व्यवस्था को अनुभव करना है।

12:35 – 14:59 : ईश्वर अंतर्यामी है – चित्रबाज़ी से चेतावनी

उस परमेश्वर को छोड़कर जो इधर-उधर की वस्तुओं से सुख लेना चाहता है, वह वास्तव में अपने आप का शत्रु बन जाता है। प्रभु स्वयं सुखरूप हैं, चैतन्यरूप हैं। जो व्यक्ति बाहरी दृश्यों और भोगों में सुख खोजता है, वह अपने वास्तविक आनंद से दूर चला जाता है।

चित्रबाज़ों को यह पता ही नहीं होता कि वे पिक्चर देखकर ईश्वर की सत्ता, उसकी महत्ता और उसके आनंद से दूर होते जा रहे हैं। वे समझते हैं कि यह केवल मनोरंजन है, पर वास्तव में यह मन को नीचे की ओर खींचने वाला बंधन बन जाता है।

चाहे कोई देखने वाला न हो, चाहे व्यक्ति एकांत में हो, बंद कमरे में हो, तब भी वह जो करता है वह अंतर्यामी से छिपा नहीं रहता। कोई बताए या न बताए, लेकिन भीतर बैठा हुआ अंतर्यामी परमात्मा सब जानता है।

मैं उन स्थानों पर नहीं गया जहाँ लोग पिक्चर देखते थे, और किसी ने मुझे यह बताया भी नहीं कि कौन क्या करता है। फिर भी अंतर्यामी की प्रेरणा से मैंने सामने से उस व्यक्ति से कहा कि तुम एकांत का बहाना बनाकर टिफिन खाते हो और पिक्चर देखते हो। सुनते ही उसने तुरंत स्वीकार कर लिया।

हाँ कहलवाने वाला और प्रश्न करवाने वाला जो है, वह गहराई में बैठा परमात्मा है। उसी से प्रीति करो, उसी को स्मरण रखो। हम हाथ जोड़ते हैं, पिक्चरबाज़ों को भी हाथ जोड़ते हैं, पर एक बात स्पष्ट है— अंतरात्मा को धोखा नहीं दिया जा सकता

 15:02 – 17:16 : [कथा] गरीब ब्राह्मणी और दुकानदार

मेरे गुरुदेव की एक छोटी-सी प्रवचन पुस्तक है — “निरोग का साधन”। उसी में एक कथा आती है, जिसे गुरुदेव ने अपने प्रवचनों में कहा था। यह कथा केवल घटना नहीं है, बल्कि ईश्वर की अंतर्यामी कृपा और वचन की महिमा को प्रकट करने वाली है।

एक गरीब ब्राह्मण की पत्नी थी। निर्धनता थी, पर स्त्री चरित्र से अत्यंत पवित्र थी। भीतर से उसका चरित्र सुंदर था और बाहर से भी उसका रूप-लावण्य अत्यंत शुद्ध और आकर्षक था। गरीबी के बावजूद उसमें कोई मलिनता नहीं थी।

एक दिन उसके पति के यहाँ मेहमान आ गए। घर में अन्न नहीं था। वह पास के दुकानदार के पास गई और हाथ जोड़कर उधार सामान माँगा। दुकानदार ने साफ मना कर दिया और कहा कि उधार नहीं मिलेगा।

फिर उसने एक शर्त रख दी। बोला — यदि आज रात तुम मेरे बिस्तर पर आ जाओ, तो मैं अभी सीधा सामान उधार दे सकता हूँ। उस ब्राह्मणी ने बिना किसी छल के कहा — ठीक है, मैं आपकी शर्त मानती हूँ। वह सामान ले आई और पति के मेहमानों को भोजन बनाकर खिला दिया

शाम को उसने अपने पति को सारी बात बता दी कि उसने किस वचन के बदले सामान लिया है और अब उसे अपना वचन निभाना होगा। पति ने कहा — जाओ, मुझे तुम्हारी पवित्रता पर पूरा भरोसा है। भगवान तुम्हारी रक्षा करेंगे।

पति ने आगे कहा — जब जीव अपना कर्तव्य निभाने निकलता है, तब ईश्वर अपने कर्तव्य निभाने में न सुस्ती करते हैं, न देर करते हैं और न भूलते हैं। हम मनुष्य तो कह कर भूल जाते हैं, पर परमात्मा भूलने वालों को भी स्मरण करवा देते हैं

जैसे माता-पिता को बच्चे की रक्षा की प्रेरणा वही परमात्मा देता है, वैसे ही वह बूढ़ी ब्राह्मणी को भी प्रेरित करता है — भोजन बनाओ। वही चेतनानंद गिरी महाराज को प्रेरणा देता है कि बनाते जाओ, बनाते जाओ। ग्यारह बजे शुरू हुआ भोजन साढ़े तीन बजे पूरा होता है, और तभी बाहर देखा जाता है कि पाँच-छह अतिथि स्वयं चलकर आ रहे हैं

यह कथा बताती है कि परमात्मा हर वचन का ध्यान रखता है, हर प्राणी की रक्षा करता है और समय आने पर स्वयं व्यवस्था कर देता है।

17:23 – 19:18 : [घटना] नर्मदा तट पर स्वप्न से भोजन व्यवस्था

और वही परमात्मा सुनने की सत्ता दे रहा है। इतना नज़दीक, इतना निकटवर्ती है कि हरे-हरे करते हुए आज तो मैं इसी बात पर भगवान से बोलने लगा — तू कैसा है प्रभु! ब्राह्मणी को प्रेरणा देता है कि टिल्ले पर भोजन ले जाओ, और वही व्यवस्था कर देता है।

ऐसे ही एक बार हम नर्मदा किनारे बैठे थे। तभी दूर गाँव से दो किसान फल और दूध लेकर आ पहुँचे। मैंने कहा — भाई, न आपका मेरा परिचय है, न बुलाया है, फिर आप यहाँ कैसे आए? उन्होंने कहा — रात को स्वप्न में हमें रास्ता दिखा। सफेद कपड़े, खुले बालों वाला एक व्यक्ति दिखा — वही आप थे।

उन्होंने बताया कि उनके गाँव में पहले अनाज के बदले फल का लेन-देन होता था। उस समय केले सस्ते थे। एक तरफ केले, दूसरी तरफ अनाज — चावल, गेहूँ, मूंग, मटर। फल-फ्रूट वाले बड़ी तकलीफ से गाँव तक आते थे। उस दिन भी गाँव में फल पड़ा था।

उसी रात उन्हें स्वप्न आया — रास्ता दिखा दिया गया कि जहाँ आप बैठे हैं, वहीं जाना है। सुबह-सुबह वे फल और दूध लेकर सीधे पहुँच गए। जबकि मेरे मन में तो यह संकल्प था कि सूर्योदय के बाद कहीं नहीं जाऊँगा, यहीं बैठकर खाऊँगा। जिसे आवश्यकता होगी, वही आएगा। सृष्टिकर्ता स्वयं लेकर आएगा।

पर उस सृष्टिकर्ता ने यह कैसे जान लिया कि मेरे मन में यह संकल्प आने वाला है? इसलिए कि मेरे संकल्प करने से पहले ही उसने गाँव वालों को रात में रास्ता दिखा दिया। अरे प्रभु! तू कैसा है — मेरे मन में विचार उठे, उसके पहले ही तूने पूरा आयोजन कर लिया

 19:26 – 22:10 : [घटना] स्वामी राम तीर्थ और विवाह की अलौकिक लीला

कैसी अद्भुत लीला है ईश्वर की। एक बार गोपीनाथ जी अपने कुछ साथियों के साथ स्वामी राम तीर्थ के दर्शन करने गए। योजना यह थी कि दर्शन कर के शाम तक लौट आएँगे, क्योंकि भतीजी का विवाह था। सात बजे बरात आनी थी और वे सोचकर आए थे कि पौने छह तक घर पहुँच जाएँगे।

स्वामी जी गंगा किनारे ठहरे थे। दर्शन हुए, सत्संग चला, और स्वामी जी वहाँ से चले गए। गोपीनाथ जी और उनके चार साथी वहीं बैठे रह गए। ध्यान ऐसा लगा कि समय का भान ही नहीं रहा। ये सभी लोग कानपुर शाखा के रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में कोषाधिकारी थे।

जब आँख खुली तो रात के नौ बज चुके थे। गोपीनाथ जी घबरा गए और स्वामी जी से बोले — बाबा, बड़ा अनर्थ हो गया। मेरी भतीजी की शादी थी। सात बजे बरात आनी थी। मैं तो पौने छह तक पहुँचने का सोचकर आया था। और सबसे बड़ी चिंता यह थी कि जेवर और मंगलसूत्र उनकी तिजोरी में थे, जिसकी चाबी उन्हीं के पास थी।

स्वामी जी मुस्कराए और बोले — जब तुम भगवान के ध्यान में थे, तो फिर चिंता क्यों करते हो? क्या भगवान समर्थ नहीं हैं? भक्तों के कार्य तो वही सँवारते हैं। चिंता मत करो, सब ठीक हुआ होगा।

लेकिन गोपीनाथ जी आधुनिक मन के थे। संत की बात तुरंत गले नहीं उतरी। घर पहुँचे तो पत्नी से पूछा — क्या हुआ? बारात लौट तो नहीं गई? कहीं फंगा तो नहीं हुआ? तिजोरी की चाबी तो मेरे पास थी।

पत्नी बोली — शादी तो ठीक से हो गई। तिजोरी की चाबी तो आपके पास थी, लेकिन आप ही ने तो तिजोरी खोलकर सारा सामान दिया था। गोपीनाथ जी चौंक गए — अरे! चाबी तो मेरे पास है। फिर यह कैसे हुआ?

तभी उन्हें स्मरण हुआ — स्वामी राम तीर्थ। वही तत्वज्ञान का उपदेश देने वाले महापुरुष, जिनकी लीला से ईश्वर स्वयं कार्य कर देता है। एक नहीं, दो स्वामी राम तीर्थ हुए — एक वे, जो देहरादून और टीरी क्षेत्र में साधना करते थे। दोनों ही अपने-अपने समय में ब्रह्म में विलीन हो गए।

यह घटना बताती है कि जब मन ईश्वर में लीन हो जाता है, तब संसार के काम भी ईश्वरीय व्यवस्था से अपने आप पूरे हो जाते हैं।

22:10 – 27:16 : [घटना] मोटेरा आश्रम – एक देह अनेक स्थान

स्वामी राम ने पहले ही कहा था — तुम चिंता मत करो। लेकिन गोपीनाथ जी ने घर पहुँचते ही पत्नी से पूछा — शादी कैसे हो गई? मंगलसूत्र मेरे पास था, जेवर मेरे पास थे। फिर विवाह कैसे संपन्न हुआ? पत्नी बोली — शादी तो पूरी विधि से हो गई। बराती आए, भोजन किया, और आप ही ने तिजोरी खोलकर सारा सामान दिया।

गोपीनाथ जी चकित रह गए। बोले — मेरे साथ तो चार आदमी गवाह हैं कि मैं यहाँ आया ही नहीं था। पत्नी बोली — मेरे पास तो सारे बराती गवाह हैं कि आप आए थे, आपने ही जेवर दिए, और विवाह सम्पन्न हुआ। तब गोपीनाथ जी सोच में पड़ गए — क्या रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया का गोपीनाथ दो है?

उन्हें तब समझ में आया कि ईश्वर की लीला कैसी होती है। अहमदाबाद के मोटेरा आश्रम में, जहाँ सत्संग चल रहा था, वहाँ भी लोग बैठे थे और दूसरी ओर संसार का काम भी पूरा हो रहा था। ऐसे ही एक व्यक्ति थे मंगणमल, जिन्हें जानने वाले आज भी होंगे।

मंगणमल अपने बड़े दादा की सेवा करते थे। उनकी साली का निधन हुआ था और तीसरे दिन जाना आवश्यक था। वे तीन भाषाएँ बोलते थे — सिंधी, हिंदी और गुजराती। नदी के उस पार भी पैदल निकल जाते थे। लेकिन उसी दिन बुधवार का सत्संग मोटेरा आश्रम में चल रहा था।

सत्संग शुरू हुआ। मंगणमल सामने बैठ गए। वे उठना चाहते थे, खिसकना चाहते थे, लेकिन उठ ही नहीं पाए। सत्संग चलता रहा। आठ बजे समाप्त हुआ। इसके बाद वे सीधे अपने साडू भाई के पास पहुँचे और बोले — मुझे आना चाहिए था, पर साईं के सामने बैठा था, उठ नहीं पाया।

साडू भाई बोले — आप तो आए थे। आपने ऐसा सत्संग सुनाया कि किसी को रोने या शोक करने का अवसर ही नहीं मिला। आपने बताया कि जन्म-मृत्यु शरीर की है, सुख-दुख मन के हैं, और आत्मा अमर है। यह सुनकर मंगणमल चकित रह गए — मैं तो अभी-अभी आया हूँ।

फिर गवाह बुलाए गए। कुछ बोले — आप इधर थे। कुछ बोले — आप उधर थे। मोटेरा आश्रम के लोगों ने कहा — आप तो हमारे बीच बैठे थे। साडू भाई बोले — आप हमारे बीच थे। तब समझ में आया कि यह देह की नहीं, मन की लीला है।

तब कहा गया — तुम इधर भी थे और उधर भी थे। शरीर यहाँ था, मन वहाँ था। जब मन से दृढ़ चिंतन होता है, तब परमात्मा उसी आकृति में व्यवस्था कर देता है। जैसे एक दीपक से अनेक दीप जल जाते हैं, वैसे ही एक चेतना से अनेक स्थानों पर कार्य संपन्न हो जाता है।

हमारे शास्त्रों में इसे अनेक-जीव-वाद सिद्धांत कहा गया है। योग वशिष्ठ में भी प्रसंग आता है कि एक ही तपस्वी कहीं ध्यान कर रहा है, कहीं कार्य कर रहा है, और कहीं अन्य लीला प्रकट हो रही है। यही है ईश्वर की अद्भुत व्यवस्था

27:16 – 30:11 : [कथा] संयम, अंतर्यामी और काम-विजय  

उस आत्मा–परमात्मा का सामर्थ्य बड़ा ही विलक्षण है। मनुष्य चाहे स्वयं को कितना ही बुद्धिमान और विकसित क्यों न माने, ईश्वर की अंतर्यामी शक्ति के सामने सब तुच्छ है। उसी कथा में उस माई ने अपने पति को बताया कि उसने दुकानदार को वायदा दे दिया है। पति ने कहा — मुझे तुम्हारे संयम पर पूरा विश्वास है। तुमने मेहमानों को भोजन कराने के लिए जो वचन दिया है, उसे निभाओ। तुम्हारे रक्षक तो स्वयं भगवान हैं।

वह पत्नी दुकानदार के घर पहुँची। दुकानदार ने देखा — इतनी सुंदर स्त्री, बिना किसी आग्रह के स्वयं सामने आ गई! उसकी पत्नी मायके गई हुई थी, वह घर में अकेला था। उसने उस स्त्री को भीतर ले जाकर कमरा बंद किया, खिड़कियाँ बंद कीं। पर वह स्त्री अपने जगतपति पर पूर्ण भरोसा किए शांत खड़ी रही।

तभी उस स्त्री ने कहा — देखिए, आप मेरे साथ जो भी कर्म करेंगे, कोई देखे नहीं — यही तो आप चाहते हैं न? दुकानदार ने कहा — हाँ। स्त्री बोली — तो फिर मेरी बदनामी और आपकी बदनामी — यह आप नहीं चाहते होंगे? उसने कहा — नहीं, बिल्कुल नहीं।

स्त्री बोली — तो फिर ऐसा कीजिए कि कोई देखे ही नहीं। दुकानदार ने कहा — खिड़कियाँ बंद हैं, दरवाज़ा बंद है, अब कौन देखेगा? तब स्त्री ने गंभीर स्वर में कहा — खिड़की और दरवाज़ा तो बंद हो गया, लेकिन अंतर्यामी परमेश्वर तो देख रहे हैं। कुछ ऐसा कीजिए कि वे भी न देखें।

उस वाक्य में इतनी सच्चाई थी, इतना अंतरात्मा का प्रभाव था कि उस कामी व्यक्ति की बुद्धि जैसे ठहर गई। वह कामचेष्टा में आगे बढ़ ही रहा था, छूने ही वाला था, तभी स्त्री ने कहा — जो हमारे भीतर-बाहर सब देख रहा है, उसकी भी खिड़की बंद कर दीजिए।

इतना सुनते ही उस व्यक्ति की मूढ़ता का पर्दा हट गया। वह धरती पर बैठ गया, उस स्त्री के चरणों में गिर पड़ा और बोला — बहन, आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं। यह काम-विजय थी — न किसी शस्त्र से, न उपदेश से, बल्कि संयम और सत्य से।

यह कथा “निरोग का साधन” नामक पुस्तक में मेरे गुरुदेव द्वारा कही गई है। यह मेरी अपनी रचना नहीं है। गुरुदेव ने इसे सत्संग में कहा था, वही छपी हुई है, उसमें गुरुदेव का फोटो भी है। ऐसे ही ईश्वर कब, कैसे और किस ढंग से एक कामी व्यक्ति को बदल देता है — यह केवल भगवानी लीला ही जानती है।

30:11 – 31:16 : [उपदेश] साधना, संयम और कृपा का चमत्कार

वह माई की कथा — कहाँ घटी, कैसे चली, और आज आप तक कैसे पहुँची — यह अपने आप में ईश्वरीय यात्रा है। जो घटना एक स्थान पर हुई थी, वही आज पुस्तक, वेबसाइट और माध्यमों के द्वारा दुनिया के अनेक देशों तक पहुँच गई है। इसलिए यह पुस्तक “निरोग होने का साधन” अवश्य पढ़ने योग्य है।

इस पुस्तक में संयम को विशेष महत्व दिया गया है। यदि आप अपना मनोबल और बुद्धिबल बढ़ाना चाहते हैं, तो परमात्मा के नाम-स्मरण में लगिए और अपनी इंद्रियों को गलत दिशा में जाने से रोकने का अभ्यास कीजिए।

कई बार हम रोकने का प्रयास करते हैं, फिर भी विफल हो जाते हैं। कारण यह है कि यह फिसलन कई जन्मों के संस्कारों से बनी होती है। ऐसे समय निराश न हों, बल्कि कातर भाव से भगवान से प्रार्थना करें।

उसके साथ त्रिबंध प्राणायाम करें और बार-बार दृढ़ निश्चय दोहराएँ कि फिसलना नहीं है। जब हृदय से सच्चा निश्चय बन जाता है, तो अकेले पुरुषार्थ नहीं, बल्कि भगवान की कृपा भी साथ आ जाती है।

और जब पुरुषार्थ और कृपा मिलते हैं, तब जीवन में सचमुच ईश्वरीय चमत्कार प्रकट होता है।


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