बड़ी तपस्या के बाद जो पाया है अब मैं तुमको देना चाहता हूँ
INDEX (TIME STAMP KE SAATH)
0:02 भगवान के स्वरूप, स्वभाव और गुण का बोध
1:03 भगवान की विश्रांति में बैठने का प्रयोग
1:27 इंद्रदेव और आत्मरस का उपनिषदिक दृष्टांत (कथा)
2:30 नीरसता ही अपराध और विकार का मूल कारण
3:19 परमात्मा रस लाने का व्यावहारिक प्रयोग
3:21 शयन दिशा, वायु, धूप और घर की शुद्धि
4:35 श्वास की शुद्धि और स्वास्थ्य का रहस्य
5:28 हरिनाम और ओमकार जप का प्रभाव (भजन कीर्तन)
6:41 विषय रस बनाम भगवत रस का विवेक
7:08 ओमकार मंत्र की महिमा और चिकित्सा अनुभव
8:09 आत्म पहचान और माधुर्य भाव (भजन)
9:38 रात्रि कीर्तन से जीवन परिवर्तन
11:24 श्वेत कण, स्वास्थ्य और नाम जप
12:17 निद्रा को भक्ति में बदलने की साधना
13:18 ओमकार मंत्र का ऋषि देवता छंद विनियोग
14:02 ओम जप के तीन प्रयोग
15:06 40 दिन की साधना और शक्ति संचय
16:02 परमात्मा रस और नीरसता का नाश
17:03 होठ जप और हृदय जप का अभ्यास
19:32 विश्रांति योग की दुर्लभ साधना
20:00 रावण हिरण्यकश्यप और शबरी मीरा का विवेक (कथा)
21:01 विशुद्धा केंद्र और कृष्ण यशोदा तत्व
23:16 ओम नाम में रास और माधुर्य (भजन)
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0:02 भगवान के स्वरूप को जानने से भगवान से मिलन होता है, उनके स्वभाव को जानने से भजन सहज हो जाता है और उनके गुण जानने से वही गुण साधक में उतरने लगते हैं। भगवान वही अंतर्यामी सत्ता है जिसकी शक्ति से जीवन, गमन, वाणी और चेतना चलती है।
1:03 साधक को भगवान की विश्रांति में बैठाने का एक सरल प्रयोग बताया गया है, जो स्वयं अनुभव से सिद्ध है। यह प्रयोग बिना कठिन तप के जीवन में शांति और रस लाने वाला है।
1:27 इंद्रदेव का उदाहरण देकर बताया गया है कि बाहरी ऐश्वर्य और पद आत्मरस के सामने तुच्छ हैं। उपनिषद का भाव है कि जिस आत्मपद को पाकर योगी अहंकार नहीं करता वही सर्वोच्च स्थिति है। (कथा)
2:30 मनुष्य नीरस होने पर ही अपराध, व्यसन और विकारों की ओर जाता है। नीरसता मिटते ही व्यक्ति स्वतः ऊंचा उठने लगता है। परमात्मा का रस ही नीरसता का वास्तविक उपचार है।
3:19 जीवन में परमात्मा का रस आए इसके लिए एक छोटा लेकिन प्रभावी प्रयोग सिखाया गया है, जिससे साधक का मन शुद्ध और स्थिर होता है।
3:21 सोते समय दिशा, वायु और वातावरण का ध्यान रखने का उपदेश दिया गया है। देसी गाय के गोबर का धुआं, हवन सामग्री और प्राकृतिक उपाय घर की नकारात्मकता को दूर करते हैं।
4:35 श्वास की शुद्धि को स्वास्थ्य का मूल बताया गया है। भोजन से अधिक ऊर्जा श्वास से मिलती है, इसलिए शुद्ध वायु और सही श्वसन से स्वास्थ्य और तेज बढ़ता है।
5:28 हरिनाम और ओमकार जप से जीवन की नीरसता समाप्त होती है और आनंद बढ़ता है। नाम कीर्तन बाहरी नहीं, अंतरात्मा को रस से भर देता है। (भजन कीर्तन)
6:41 विषय रस क्षणिक है और नीरसता बढ़ाता है, जबकि भगवत रस स्थायी आनंद देता है और विकारों को शांत करता है।
7:08 ओमकार मंत्र की शक्ति पर अनुभव आधारित बात कही गई है कि बिना औषधि कई रोग शांत हुए हैं। ओमकार और नाम कीर्तन की महिमा शास्त्रों में विस्तृत रूप से वर्णित है।
8:09 साधक को स्मरण कराया गया है कि वह भगवान का है और भगवान उसके हैं। आत्मा ही भगवान का निवास है और वही सत, चित और आनंद स्वरूप है। (भजन)
9:38 रात्रि में थोड़ी देर कीर्तन करने से घर का वातावरण और जीवन दोनों बदल जाते हैं। हरि गुण गान से आनंद और माधुर्य बढ़ता है।
11:24 नाम जप और भक्ति से शरीर का स्वास्थ्य, मन की प्रसन्नता और जीवन की ऊर्जा बढ़ती है। श्वेत कणों की वृद्धि को इसका संकेत बताया गया है।
12:17 सोते समय जप और ध्यान से पूरी नींद भक्ति में बदल जाती है। सुबह उठकर शांत बैठना दिन को सात्त्विक बनाता है।
13:18 ओमकार मंत्र का ऋषि, देवता, छंद और विनियोग बताया गया है। जप जिस उद्देश्य से किया जाता है, उसी के अनुसार उसका फल मिलता है।
14:02 ओम जप के तीन प्रयोग बताए गए हैं जिससे पाप नाश, कार्य सिद्धि और शांति की शक्ति जागृत होती है।
15:06 नियमित 40 दिन की साधना से चंचलता मिटती है, भाग्य रेखाएं बदलती हैं और शक्ति का संचय होता है।
16:02 परमात्मा रस के आने से जीवन की नीरसता समाप्त होती है और विकार अपने आप कम हो जाते हैं।
17:03 पहले होठों से और फिर हृदय से जप कराने का अभ्यास बताया गया है, जिससे साधक को शीघ्र शांति और आनंद की अनुभूति होती है।
19:32 विश्रांति योग को दुर्लभ साधना बताया गया है जो सहज रूप से प्राप्त हो रही है और जीवन को शीघ्र कल्याण की ओर ले जाती है।
20:00 रावण और हिरण्यकश्यप के उदाहरण से स्पष्ट किया गया है कि बाहरी सुख संतोष नहीं दे सकते, जबकि शबरी, मीरा और संत गुरु मार्ग से आत्मसंतोष पाते हैं। (कथा)
21:01 विशुद्धा केंद्र में समता और सरसता का विकास होता है। कृष्ण और यशोदा का उदाहरण देकर बुद्धि और अंतर्यामी के संबंध को समझाया गया है।
23:16 अंत में बताया गया है कि ओम नाम में ही रास, माधुर्य और आनंद छिपा है और वही साधक के हृदय में दिव्य लीला रचाता है। (भजन)
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