index
परिचय और मंगलाचरण: (0:05-0:59)
प्रारंभिक मंत्र और पाठ (0:05-0:59)
भजन और कीर्तन: (1:09-2:07)
आध्यात्मिक जप और प्रभु के नाम का स्मरण (2:08-2:56)
प्रवचन का परिचय: (3:01-3:16)
नाम जप के लाभ और दिशाओं में मंगल (3:07-3:16)
ज्ञान पर कथा प्रसंग: (3:18-4:39)
काशी की घटना: रामदत्त और गुरुजी का संवाद (3:30-4:39)
अहंकार और भगवत मिलन का महत्व: (4:50-7:40)
'मैं' की समस्या और भगवान में विलय से कल्याण (5:34-6:30)
रावण, हिरण्यकश्यप, शबरी, मीरा, रविदास और जनक राजा के उदाहरण (6:02-7:40)
आध्यात्मिक सत्ता और साधना का उद्देश्य: (7:05-8:23)
आदि भौतिक, आदि दैविक और अध्यात्मिक सत्ता (7:05-7:26)
वेद पुराणों का वास्तविक उद्देश्य और प्रेम का महत्व (7:27-8:23)
हरिहर बाबा की कथा (क्रमशः):
रामदत्त विद्यार्थी का रूपांतरण (कहानी): (8:29-13:59)
राघवानंद जी द्वारा माधवानंद जी और रामदत्त को भगवत ज्ञान की दीक्षा (9:36-12:50)
मृत्यु काल से मुक्ति और रामानन्द स्वामी के रूप में प्रसिद्धि (12:51-13:59)
हरिहर बाबा का परिचय और समकालीन संत: (14:02-19:10)
हरिहर बाबा की अलौकिक रिद्धि-सिद्धि और उनका प्रभाव (14:48-16:11)
जन्म, परिवार और नामकरण की कहानी (16:31-19:10)
दुख से मुक्ति और भक्ति का मार्ग: (19:14-20:20)
भगवान की भक्ति से दुख का निवारण (19:43-20:20)
हरिहर बाबा के दिव्य दर्शन और काशी यात्रा (कहानी): (20:44-21:19)
राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान जी का प्रकट होना और काशी जाने का आदेश (20:44-21:19)
सार्थक चिंतन और आध्यात्मिक साधना: (22:01-23:57)
व्यर्थ चिंतन से बचाव और नाम जप का महत्व (22:04-22:36)
ओम और शिवाय मंत्र के उच्चारण से मन की शांति (22:47-23:57)
हरिहर बाबा के चमत्कार और लीलाएँ (कथा प्रसंग):
काशी विश्वविद्यालय की घटना (कहानी): (23:57-32:11)
छात्रों द्वारा बजरे पर पत्थरबाजी और बाबा की नाराजगी (24:02-26:47)
ब्रिटिश शासन का नोटिस और बाबा के आशीर्वाद से समस्या का समाधान (26:55-32:11)
देवरह बाबा प्रसंग - शिष्य का सोना बनाना प्रसंग (३०-10--२३.०६ ०)
बाढ़ में नाव का चमत्कार (कहानी): (32:42-35:16)
बाढ़ के दौरान गंगा पार करना और ब्रिटिश अधिकारियों का नतमस्तक होना (32:42-35:16)
शिष्य का उपचार (कहानी): (35:27-36:50)
बुखार से पीड़ित शिष्य का गंगाजल और मिट्टी से इलाज (35:33-36:50)
आध्यात्मिक जीवन के सिद्धांत: (38:18-39:00)
समता और सार्थक चिंतन का महत्व (38:18-39:00)
सोने से पहले के आध्यात्मिक अभ्यास: (40:12-43:02)
सही दिशा में सोना और श्वासों-श्वास में नाम जप (40:20-41:04)
प्राणायाम और ओमकार मंत्र के जप का अभ्यास (41:39-43:02)
संकल्प शक्ति और योग सामर्थ्य: (44:03-48:38)
दशहरा उत्सव में अस्सी घाट से दशाश्वमेध घाट का दिव्य दर्शन (44:43-45:54)
यज्ञ में बारिश को नियंत्रित करने का चमत्कार (46:40-47:50)
आत्म-संकल्प की शक्ति और ओमकार मंत्र का प्रभाव (48:00-48:38)
संत श्री आशारामजी बापू ने देवरा बाबा के जीवन की घटनाओं का उल्लेख किया है, बताते हैं कि वे स्वयं उनसे दो बार प्रेम से मिले थे और उन्हें देवरा बाबा के बजरे में अंदर जाने का भी अवसर मिला था। देवरा बाबा, जिन्हें लोग जानते हैं, काशी में अपने बजरे में रहते थे और सोना बनाना जानते थे। हालाँकि, उस महापुरुष ने यह ज्ञान अपने लिए उपयोग नहीं किया, बल्कि एक स्वार्थी शिष्य को इसका उपाय बता दिया, जो प्रसिद्ध हो गया लेकिन बाद में पकड़ा भी गया। जॉर्ज पंचम के एक विश्वासु कलेक्टर ने उस शिष्य पर दबाव डालकर लगभग एक क्विंटल सोना बनवाया। कलेक्टर ने जॉर्ज पंचम को बताया कि यहाँ के साधु बूटी खाकर उपवास करते हैं और एक दिन वह बूटी उनके शरीर में रहती है, जिसके बाद वे तांबे को पिघलाकर उसमें पेशाब करते हैं तो सारा पीतल सोना बन जाता है। इस पर जॉर्ज पंचम ने उस साधु को बुलाने को कहा। जब कलेक्टर ने साधु को जॉर्ज पंचम के यहाँ यूरोप आने के लिए मजबूर किया, तो वह घबरा गया और देवरा बाबा से प्रार्थना की। देवरा बाबा ने उसे डांटा, याद दिलाया कि उन्होंने उसे इस माया में पड़ने से मना किया था, और कहा कि अब वह रोज सोना नहीं बनाएगा या भंडार नहीं करेगा और न ही कोलकाता तक यश भोगेगा। शिष्य ने माफी मांगी और देवरा बाबा ने जॉर्ज पंचम को संदेश भेजा कि उनका शिष्य वहाँ सोना नहीं बनाएगा क्योंकि उन्होंने ही उसे यह उपाय बताया था और यह भी कहा कि उसे सताना नहीं चाहिए क्योंकि इसी में उनका भला है। जॉर्ज पंचम ने देवरा बाबा की आज्ञा का पालन किया, लेकिन हरि बाबा का भी रुतबा कुछ और ही था।
quotes
"भगवान के नाम से दशों दिशाओं में मंगल होता है। मधुरम मधुरे भपि मंगलेभ्यप मंगलम पावनम पावने भपि हरे नामव केवलम।"
"मैं मैं विद्वान मैं धनी मैं पापी मैं पुण्य आत्मा ये मैं जो है ना बड़ी मुसीबत पैदा करता है। मैं तो भगवान में मिल जाए बस। तब होता है कल्याण।"
"भगवान को अपना मानने से अपना मैं भगवान में आसानी से मिल सकता है। और भगवान से अलग मैं रावण का भी ठीक नहीं रहा। भगवान से अलग मैं हिरण्यकश्यप का भी ठीक नहीं रहा।"
"मुझे वेद पुराण कुरान से क्या मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई। प्रभु प्रेम का मुझे मंदिर मस्जिद जाना नहीं। मुझे हरि रस का प्याला पिला दे कोई।"
"दुखी आदमी का दुख तब तक रहता है जब तक संसार के सुख से वह दुख को मिटाना चाहता है। यह दुखी आदमी की बड़ी भारी भूल है।"
"दुख आए तो संसार के सुख से दुख को मत भगाओ। दुख हारी श्री हरि के सुमिरन से हरि की प्रीति से हरि की व्यवस्था में हां मिलाने से दुख सदा के लिए मिट जाता है।"
"व्यर्थ चिंतन से साधक की शक्तियों का ह्रास होता है। व्यर्थ मनोराज से भी शक्तियों का ह्रास होता है। ध्यान के बहाने मनोराज्य व्यर्थ चिंतन रसास्वाद निद्रा तंद्रा ये दोष आ ही जाते हैं।"
"इसलिए, बीच-बीच में भगवान का नाम इस निद्रा, तंद्रा, व्यर्थ चिंतन से सुरक्षा का एकदम अद्भुत साधन है। ओम नमः शिवाय। यह प्लुत उच्चारण शिव जी के नाम का मनोराज को व्यर्थ चिंतन को निगल जाएगा।"
"संत सताए तीनों जाए तेज बल और वंश। ऐसे ऐसे कई गए रावण कौरव जैसे कंस।" यह उद्धरण संतों को सताने के गंभीर परिणामों को चेतावनी देता है, जिसमें तेज (प्रभाव), बल (शक्ति) और वंश का विनाश शामिल है, जिसके उदाहरण रावण, कौरव और कंस हैं।
"सार्थक चिंतन से व्यर्थ चिंतन में जो ऊर्जा नाश होती है उसकी रक्षा बाबा जी करने में समर्थ हो गए थे। आप लोगों को भी मैं बोलता हूं आप रात्रि को सार्थक चिंतन करतेकरते सुनो।"
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