सुरक्षा चक्र - अपने चारों ओर बनायें अभेद्य कवच
(0:03) प्राणायाम की अद्भुत शक्ति
(0:20) प्राणायाम से सुरक्षा कवच और संकल्प बल
(0:36) सीता का तिनका और लक्ष्मण रेखा का रहस्य
(1:13) नहुष प्रसंग और वासना से रक्षा
(2:03) सत्संग की ऊँचाई और संसार का प्रभाव
(2:59) बाहरी तरंगों से बचने का उपाय
(3:56) तन मात्राएँ और स्पर्श से सावधानी
(5:04) संतों की प्रबल आभा का प्रभाव
(6:09) रक्षा कवच बनाने की साधना विधि
(7:41) त्रिबंध प्राणायाम की प्रक्रिया
(9:28) प्राणायाम से सद्गुणों का विकास
(10:42) नियमित जप और साधना का महत्व
(12:50) जप के प्रकार और मन का लय होना
(13:33) भक्त का शरीर ही तीर्थ
(15:52) आंतरिक आनंद और विषय वैराग्य
(17:39) आनंद स्वरूप आत्मा में डूबना
(18:18) साधना से अंतःकरण की पवित्रता
(19:01) भक्ति का रंग और भव पार
(20:28) गुरु कृपा और भक्ति की प्रार्थना
(22:04) सत्पात्र शिष्यों के लिए अनामत प्रसाद
(23:52) चित्त में परमेश्वर की लीला
(25:31) गुरु की करुणा दृष्टि की महिमा
(26:19) गुरुदेव सभी तीर्थों से श्रेष्ठ
(27:39) सद्गति का मार्ग: दीक्षा और विनय
(28:32) गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता भाव
(29:15) सच्चे गुरुदेव की अद्वितीयता
(0:03) प्राणायाम में अद्भुत शक्ति है। यह साधारण श्वास-प्रश्वास नहीं बल्कि ऐसा साधन है जिससे मन, प्राण और चेतना एक दिशा में प्रवाहित होते हैं। जब व्यक्ति नियमित रूप से प्राणायाम करता है तो उसका आत्मबल बढ़ता है और भीतर स्थिरता आती है।
(0:20) प्राणायाम के द्वारा व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द एक सुरक्षा कवच बना सकता है। ऐसा कवच बनने के बाद कोई भी व्यक्ति उसके संकल्प को तोड़कर उस पर अपनी इच्छा थोप नहीं सकता। संकल्प शक्ति प्राणबल से सुरक्षित हो जाती है।
(0:36) सीता जी का तिनका रखना और लक्ष्मण जी द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा संकल्प की शक्ति का उदाहरण है। रावण चाहकर भी उसे पार नहीं कर सका। यह दर्शाता है कि दृढ़ संकल्प और साधना अधर्म को रोक देती है।
(1:13) नहुष इंद्रासन पर बैठा था और उसके भीतर वासना जागी। इंद्र की पत्नी ने उसकी कामना का शिकार बनने से बचने के लिए प्राणायाम द्वारा रक्षा कवच बनाया, जिससे काम-विकार पास नहीं आ सका।
(2:03) शिविर और सत्संग में आने से मन ऊँचा उठता है, दिव्य अनुभव होते हैं। पर जब साधक फिर संसार में लौटता है तो दूसरों की मानसिक तरंगें, वातावरण और विचार धीरे-धीरे उसकी ऊँचाई को कम करने लगते हैं।
(2:59) इन्हीं बाहरी प्रभावों से बचने के लिए रक्षा कवच बनाना आवश्यक है। यह कवच बहुत सरल साधना से बन जाता है और साधक को नकारात्मक प्रभावों से बचाता है।
(3:56) कई जानकार संत इन तरंगों से बचने के लिए अनावश्यक स्पर्श तक से बचते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी तन मात्राएँ होती हैं, जिनकी रक्षा आवश्यक है।
(5:04) संत हजारों लोगों के बीच रहते हुए भी नहीं फिसलते, क्योंकि उनकी आभा प्रबल होती है। उल्टा, उनकी आभा से लाखों लोग लाभान्वित होते हैं और झूमने लगते हैं।
(6:09) रक्षा कवच बनाने की विधि में मूलबंध लगाकर प्राणायाम करना, फिर जप करना और भगवान नाम का सुदर्शन अपने चारों ओर घूमने की भावना करना बताया गया है।
(7:41) त्रिबंध प्राणायाम में मूलबंध, उड्डियानबंध और जालंधरबंध लगाकर श्वास को भीतर और बाहर रोकने की प्रक्रिया बताई गई है, जिससे शरीर और मन की शुद्धि होती है।
(9:28) इस प्राणायाम से मनोबल बढ़ता है, आरोग्य आता है, क्षमा, शौर्य और अनेक सद्गुणों का विकास होता है। भजन और साधना में बरकत आती है।
(10:42) जप और प्राणायाम को नियमित करने की प्रेरणा दी गई है। सुबह-शाम या कम से कम दिन में एक बार इसका अभ्यास करने से जीवन में स्थिरता आती है।
(12:50) जप बाहर से हो, होंठों में हो या हृदय में—हर प्रकार से फलदायी है। धीरे-धीरे मन ईश्वर में लीन होने लगता है।
(13:33) भगवान की भक्ति करने वाले के शरीर में ही गंगा, काशी, प्रयाग जैसे सभी तीर्थ निवास करते हैं। ऐसे भक्त को बाहर तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं रहती।
(15:52) जब भीतर का आनंद प्रकट होता है तो बाहर के विषय-सुखों का आकर्षण कम होने लगता है और जीवन में शांति आने लगती है।
(17:39) साधक को संसार से विरक्ति लेकर आनंद स्वरूप आत्मा में डूबने की प्रेरणा दी गई है, जिससे मन शुद्ध और शांत होता है।
(18:18) साधना से हृदय, रक्त, मन, बुद्धि और चित्त पवित्र होते जाते हैं और आनंद व शांति का अनुभव होता है।
(19:01) भक्तों के लिए कहा गया है कि ईश्वर की भक्ति का रंग अवश्य चढ़ता है और साधक का बेड़ा पार हो जाता है।
(20:28) गुरु कृपा, प्रभु कृपा और भक्ति देवी के निवास की प्रार्थना की गई है, जिससे जीवन सुखद और मधुर बनता है।
(22:04) यह प्रसाद सत्पात्र शिष्यों के लिए अनामत रूप में बताया गया है, जो गुरु की विशेष कृपा से प्राप्त होता है।
(23:52) साधक अपने को भाग्यशाली मानता है कि उसका चित्त ही तीर्थ बन गया है और परमेश्वर उसमें लीला कर रहे हैं।
(25:31) गोपी गीत और शंकराचार्य के वचनों द्वारा गुरु की करुणा दृष्टि की महिमा बताई गई है, जो भवसागर से पार लगा देती है।
(26:19) गरुड़ पुराण के संदर्भ से कहा गया है कि करुणा से भरे गुरुदेव की प्राप्ति सभी तीर्थों से बढ़कर है।
(27:39) मृत्यु के बाद सद्गति के उपाय के रूप में मंत्र दीक्षा, गुरु व्रत पालन और अभिमान रहित जीवन बताया गया है।
(28:32) गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता और प्रेम व्यक्त करते हुए उन्हें जीवन का आधार बताया गया है।
(29:15) अंत में कहा गया है कि संत बहुत होते हैं, पर सच्चे गुरुदेव जैसा कोई नहीं होता।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें