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[00:00:00] - सत्संग का शुभारंभ और 'हरि ओम' संकीर्तन।
[00:02:16] - हरि (ईश्वर) के समान जगत में कोई वस्तु नहीं है; नाम-जप की महिमा।
[00:03:33] - सतगुरु**** और गीता का महत्व: गुरु वह कुंजी देते हैं जिसे मृत्यु भी नहीं छीन सकती।
[00:04:20] - सच्चा प्रेम बनाम मोह: वासना, अहंकार और ईश्वर प्रेम में अंतर।
[00:05:26] - भगवद गीता केवल धर्म ग्रंथ नहीं, बल्कि 'कर्म दर्शन शास्त्र' है।
[00:08:40] - हमें वह ईश्वर चाहिए जो 'अभी' और 'यहीं' हमारे साथ है, मरने के बाद वाला नहीं।
[00:10:06] - सत्संग का पुण्य हजारों अश्वमेघ यज्ञों से भी बढ़कर है।
[00:13:04] - ओंकार (Omkar) मंत्र का जाप और विघ्न-विनाशक शक्ति।
[00:15:22] - 'हरि' शब्द का अर्थ: जो पाप और ताप को हर ले।
[00:17:32] - मंत्र शक्ति का विज्ञान: शब्द ब्रह्म और सूक्ष्म जगत से जुड़ाव।
[00:20:41] - गुरु मंत्र और दीक्षा का महत्व।
[00:22:00] - वैदिक मंत्र और शरीर की 72,000 नाड़ियों व ऊर्जा केंद्रों पर प्रभाव।
[00:25:26] - त्याग का सामर्थ्य: सच्चा भोग वही कर सकता है जिसमें त्याग की शक्ति हो।
[00:27:33] - रामकृष्ण परमहंस जी का उदाहरण: दूध, मक्खन और संसार रूपी पानी।
[00:00:00] सत्संग का शुभारंभ और 'हरि ओम' संकीर्तन — (भजन / संकीर्तन) सत्संग का शुभारंभ ‘हरि ओम’ और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ के मधुर संकीर्तन से होता है। नश्वर आश्रयों को छोड़कर शाश्वत आश्रय में प्रवेश करने का आह्वान किया जाता है। हरि ओम का निरंतर उच्चारण मन को शुद्ध कर, अंतःकरण में ईश्वर-स्मृति जाग्रत करता है।
[00:02:16] हरि (ईश्वर) के समान जगत में कोई वस्तु नहीं है; नाम-जप की महिमा — (भजन / दोहा) “हरि सम जग कछु वस्तु नहीं” — इस भाव से नाम-जप की महिमा प्रकट होती है। हरि के स्मरण से पाप, ताप और शोक का नाश होता है। संसार की कोई भी वस्तु, पद या प्रतिष्ठा हरि-नाम के समकक्ष नहीं है। प्रेम का मार्ग सर्वोच्च है।
[00:03:33] सतगुरु**** और गीता का महत्व — संसार में अनेक संबंध और आश्रय मिलते हैं, किंतु अंत समय में जीव स्वयं को अनाथ अनुभव करता है। सतगुरु**** वह अमूल्य कुंजी प्रदान करते हैं जिसे मृत्यु भी नहीं छीन सकती। गीता जीवन-मरण के भय से परे ले जाकर आत्मिक खजाने से जोड़ देती है।
[00:04:20] सच्चा प्रेम बनाम मोह — संसारी प्रेम बाहर की ओर भटकाता है, जबकि सच्चा प्रेम भीतर की यात्रा कराता है। जो कमजोर करे, थका दे या बिछड़ा दे वह प्रेम नहीं। शरीर से प्रेम काम है, धन से लोभ, परिवार से मोह और पद से वासना है; किंतु ईश्वर से प्रेम शाश्वत मिलन कराता है।
[00:05:26] भगवद गीता केवल धर्म ग्रंथ नहीं, बल्कि कर्म दर्शन शास्त्र है — गीता कर्म करते-करते ऐसा दर्शन करा देती है जो तप, जप और साधना से मिलता है। युद्ध जैसे घोर कर्म में भी भगवान की पूजा हो जाती है। गीता का ज्ञान और हरि-नाम सबके लिए सुलभ है।
[00:08:40] हमें वह ईश्वर चाहिए जो 'अभी' और 'यहीं' हमारे साथ है — परमात्मा सर्वत्र, सर्वदा और सबमें उपस्थित हैं। जो ईश्वर अभी नहीं और केवल मरने के बाद मिले, वह स्वीकार्य नहीं। ऐसा ज्ञान चाहिए जो अभी अनुभव कराए।
[00:10:06] सत्संग का पुण्य हजारों अश्वमेघ यज्ञों से भी बढ़कर है — ब्रह्म-ज्ञान का सत्संग हजारों अश्वमेघ और सैकड़ों वाजपेय यज्ञों से भी अधिक पुण्यदायक है। भागवत के अनुसार, सत्संग का पुण्य अन्य कर्मकांडों से सोलहवें भाग से भी श्रेष्ठ है।
[00:13:04] ओंकार (Omkar) मंत्र का जाप और विघ्न-विनाशक शक्ति — (मंत्र जप) ओंकार सर्व विघ्नों और दोषों का नाश करने वाला परम मंत्र है। उपनिषदों और सामवेद में इसकी महिमा वर्णित है। ‘ॐ’ परब्रह्म की स्वाभाविक ध्वनि है।
[00:15:22] 'हरि' शब्द का अर्थ: जो पाप और ताप को हर ले — ‘हरि’ वह है जो पाप, ताप और अयोग्यता को हर ले। भगवान ऐसा करुणामय है कि जीव को पता भी नहीं चलता और उसके पाप-दुख अंतःकरण से मिट जाते हैं।
[00:17:32] मंत्र शक्ति का विज्ञान: शब्द ब्रह्म और सूक्ष्म जगत से जुड़ाव — मंत्र शब्द-ब्रह्म है। शब्द-ब्रह्म के बिना परब्रह्म की प्राप्ति नहीं होती। मंत्र साधक को स्थूल शरीर में रहते हुए सूक्ष्म शक्तियों से जोड़ देता है।
[00:20:41] गुरु मंत्र और दीक्षा का महत्व — गुरु से प्राप्त मंत्र साधक को दिव्य सृष्टि से जोड़ देता है। मंत्र के भेद हैं—तांत्रिक, साबरी और वैदिक। वैदिक मंत्र सर्वोच्च हैं और शिवलोक तक की गति देते हैं।
[00:22:00] वैदिक मंत्र और शरीर की 72,000 नाड़ियों व ऊर्जा केंद्रों पर प्रभाव — वैदिक मंत्र सातों कोशों और ऊर्जा केंद्रों को जाग्रत करते हैं। शरीर की लगभग 72,000 नाड़ियों में ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में भक्ति, ज्ञान व आनंद का समन्वय होता है।
[00:25:26] त्याग का सामर्थ्य: सच्चा भोग वही कर सकता है जिसमें त्याग की शक्ति हो — जितना अधिक आसक्ति, उतना छोटा जीवन। मंत्र-जप से त्याग का सामर्थ्य विकसित होता है और सहज आनंद प्राप्त होता है।
[00:27:33] रामकृष्ण परमहंस जी का उदाहरण: दूध, मक्खन और संसार रूपी पानी — (कथा) रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं— संसार पानी है और परमात्मा का रस दूध। साधना से निकला मक्खन संसार रूपी पानी में भी तैरता है; वैसे ही साधक संसार में रहते हुए भी डूबता नहीं, आनंदित रहता है।
सच्चा प्रेम बनाम मोह: वासना, अहंकार और ईश्वर-प्रेम का अंतर
संसारी प्रेम मनुष्य को बाहर की ओर ले जाता है, जबकि वास्तविक और सच्चा प्रेम बाहर से भीतर की यात्रा कराता है। जो प्रेम भीतर से बाहर भटका दे, वही काम और वासना बन जाता है। जो संबंध मनुष्य को कमजोर कर दे, पराजित कर दे, थका दे या अंततः बिछड़ने की पीड़ा दे, वह प्रेम नहीं हो सकता।
सच्चे प्रेम का उद्देश्य जोड़ना है, मिलाना है और ऐसा मिलन कराना है जिसमें बिछड़ने का नाम ही न रहे। ऐसा प्रेम केवल भगवान से ही संभव है, क्योंकि वही प्रेम शाश्वत है, स्थायी है और अमर है।
शरीर से किया गया प्रेम वास्तव में काम है। धन से किया गया प्रेम लोभ कहलाता है। परिवार से किया गया प्रेम मोह है। शरीर के प्रति अत्यधिक आसक्ति अहंकार बन जाती है और पद या प्रतिष्ठा से किया गया प्रेम वासना का रूप ले लेता है। परंतु जब प्रेम भगवान से किया जाता है, तब साधक और भगवान अलग-अलग नहीं दिखते, बल्कि प्रेम में द्वैत मिटने लगता है।
प्रेम का मार्ग सबसे श्रेष्ठ मार्ग है, उसकी तुलना किसी अन्य पंथ से नहीं की जा सकती। सतगुरु के समान कोई सज्जन नहीं होता और गीता के समान कोई ग्रंथ नहीं होता। लोग गीता को केवल धर्म-ग्रंथ कहते हैं, पर वास्तव में गीता जीवन जीने की कला, कर्म का दर्शन और आत्मिक जागरण का शास्त्र है।
भगवद् गीता केवल धर्म-ग्रंथ नहीं, बल्कि कर्म-दर्शन शास्त्र है
यह मान लेना कि गीता केवल एक धर्म-ग्रंथ है, सही नहीं है। वास्तव में भगवद् गीता एक कर्म-दर्शन शास्त्र है। गीता ऐसा अद्भुत मार्ग दिखाती है कि कर्म करते-करते मनुष्य को वही दर्शन प्राप्त हो जाता है, जो योगियों, तपस्वियों और जप करने वालों को वर्षों की कठिन तपस्या के बाद मिलता है। यह दर्शन हँसते-खेलते, सहज रूप से जीवन में उतर आता है।
गीता सिखाती है कि कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्म को ही योग बना देना है। युद्ध जैसे घोर कर्म में भी भगवान की पूजा हो सकती है। यही गीता की महानता है। यह ग्रंथ अद्भुत है क्योंकि इसमें सभी को समान अधिकार मिलता है। यज्ञ और याग में तो कुछ विशेष लोगों को ही अधिकार होता है, पूजा-पाठ और विधि-विधान में भी पात्रता की सीमाएँ होती हैं, लेकिन गीता के ज्ञान और हरि-नाम में सभी का अधिकार है।
गीता का ज्ञान ऐसा है कि उसका लाभ तुरंत मिलता है। इस लोक में भी जीवन सँवर जाता है और परलोक में भी बेड़ा पार हो जाता है। यह परमात्मा की करुणा है कि वह अपने हिस्से का रस साधक को पिलाना चाहता है। प्रश्न केवल इतना है कि हम पीने को तैयार हैं या नहीं।
हरि-रस का ऐसा अद्भुत प्रवाह है कि जो इसे पी ले, उसके जीवन के सारे भय और दुर्बुद्धि नष्ट हो जाते हैं। कलियुग में हरि-नाम का जप करने से जीवन सफल हो जाता है। जो दिन-रात हरि का स्मरण करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
पहले मनुष्य यह मानता था कि मृत्यु के बाद ही भगवान मिलेंगे, किसी लोक या धाम में जाकर ही दर्शन होगा। परंतु सत्संग और गुरु-ज्ञान से यह बोध होता है कि ईश्वर कोई भविष्य का वादा नहीं है। ईश्वर सर्वत्र है, सर्वदा है, सर्वभूतों में स्थित है। वह हमारे साथ है, हमारे हृदय में ईश्वर बनकर विराजमान है।
जैसे कोई मनुष्य जिस यंत्र पर बैठता है, उसी गति और दिशा में चलता है—हवाई जहाज वाला हवाई जहाज की गति से, साइकिल वाला साइकिल की गति से—वैसे ही मनुष्य जिस वस्तु, मान्यता, बुद्धि और शरीर से स्वयं को जोड़ लेता है, उसी ओर भटकने लगता है। परंतु जो अपने हृदय में परमात्मा को बिठा लेता है, उससे ऐसा दाता जुड़ जाता है जिसे मृत्यु भी छीन नहीं सकती।
वही परमात्मा हमारे सच्चे साथी हैं, हमारे दिलबर हैं और हमारे हृदय-ईश्वर बनकर सदा हमारे साथ बैठे हैं।
हमें वह ईश्वर चाहिए जो ‘अभी’ और ‘यहीं’ हमारे साथ है
हमें वह ईश्वर नहीं चाहिए जो अभी उपलब्ध न हो और मरने के बाद मिलने का वादा करे। जो भगवान अभी नहीं है, जो यहाँ नहीं है और जिसे भविष्य में कहीं और मिलने की बात कही जाए, ऐसा भगवान हमें स्वीकार नहीं। हमें वही परमात्मा चाहिए जो इस क्षण उपस्थित हो, यहीं हो और हमारे जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव हो।
वह ईश्वर हाज़िर-हज़ूर, जाग्रत ज्योति के रूप में अभी है। वह सर्वत्र है, सदा है, सब में है और हमारे भीतर भी है। हमें किसी ऐसे सत्संग की आवश्यकता है जो हमें उसी दिलबर परमात्मा से मिला दे। बस कोई ऐसा ज्ञान का अंजन मिल जाए जो भीतर की आँखें खोल दे।
गुरु वही है जो अज्ञान रूपी अंधकार को मिटा दे। जैसे शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु ज्ञान-अंजन से साधक की दृष्टि खोल देता है, वैसे ही सच्चा गुरु कानों के माध्यम से ऐसे संस्कार भर देता है कि जीवन की दिशा ही बदल जाती है। ऐसे गुरु-कृपा के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम है।
यह ब्रह्म-ज्ञान ऐसा है कि यदि कोई इसे दो मिनट ध्यान से सुन ले और दो मिनट भीतर गोता लगा ले, तो उसे हजारों तीर्थों का फल और लाखों तप-जप का पुण्य प्राप्त हो जाता है। तराजू में यदि एक पलड़े में सारे कर्मकांड रखें जाएँ और दूसरे में यह ज्ञान, तो ज्ञान का पलड़ा भारी पड़ेगा।
ऐसा सत्संग और ऐसी कथा मिलना ही अश्वमेघ यज्ञ, हजार यज्ञ और सैकड़ों वाजपेय यज्ञों से भी अधिक पुण्यदायक है। क्योंकि यह ज्ञान ईश्वर को भविष्य का विषय नहीं बनाता, बल्कि उसे अभी और यहीं हमारे जीवन का सजीव अनुभव बना देता है।
सत्संग का पुण्य हजारों अश्वमेघ यज्ञों से भी बढ़कर है
सत्संग का पुण्य अत्यंत महान पुण्य है। एक अश्वमेघ यज्ञ करने में करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं। यदि हजारों अश्वमेघ यज्ञों का फल और सैकड़ों वाजपेय यज्ञों का फल एक तराजू के एक पलड़े में रख दिया जाए, और दूसरे पलड़े में ब्रह्म-ज्ञान के सत्संग का फल रखा जाए, तो वह सब मिलकर भी सत्संग के सोलहवें भाग के बराबर नहीं हो सकता।
यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि भागवत पुराण के प्रथम स्कंध में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हजारों अश्वमेघ और सैकड़ों वाजपेय यज्ञों का पुण्य भी भगवत-तत्त्व के सत्संग के सामने बहुत छोटा पड़ जाता है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि हम कितने पुण्यमय स्थान पर बैठे हुए हैं।
ऐसे ब्रह्म-ज्ञान के सत्संग में यदि कोई व्यक्ति बीच में उठकर चला जाए, तो वह केवल अपना ही नहीं, बल्कि दूसरों का भी पुण्य बाधित करता है। जो व्यक्ति बीच में उठता है या पीछे से आकर बीच में व्यवधान डालता है, उसके सिर पर विघ्न डालने का पाप लगता है। सत्संग में आया हुआ पुण्य फिर बँट जाता है और वह व्यक्ति खाली हाथ लौटता है।
संतों की यह भावना होती है कि जो एक बार सत्संग की दुकान पर आ जाए, वह खाली न जाए, बल्कि झोली भरकर जाए। इसलिए सत्संग में बैठे हुए साधकों का कर्तव्य है कि वे स्वयं भी स्थिर बैठें और दूसरों को भी सहयोग दें, ताकि किसी का पुण्य न टूटे और कोई दोष न लगे।
सत्संग में अनुशासन केवल डाँट नहीं, बल्कि करुणा है। बाहर से कठोर लगने वाले शब्द भीतर से कल्याण के लिए होते हैं। क्योंकि जहाँ हरि-नाम, हरि-तत्त्व और हरि ओम का स्मरण चल रहा हो, वहाँ चुप बैठना ही सबसे बड़ा लाभ है।
ओंकार (Omkar) मंत्र का जाप और विघ्न-विनाशक शक्ति
नारायण, नारायण, नारायण — यह ओंकार मंत्र सभी विघ्नों और दोषों का हरण करने वाला योग-तत्त्व है। उपनिषदों में ओंकार की महिमा अत्यंत गूढ़ और प्रभावशाली बताई गई है। यह मंत्र साधक के जीवन से बाधाओं को हटाकर उसे शुद्ध मार्ग पर स्थापित करता है।
ओंकार एक पाप-नाशक और पुण्यदायक मंत्र है। शास्त्रों में कहा गया है— “सर्व विघ्न हरो मंत्रः”। जो श्रद्धा और भाव से इस मंत्र का उच्चारण करता है, उसके जीवन के समस्त विघ्न शांत होने लगते हैं और साधना में स्थिरता आती है।
प्रणव अर्थात ॐ सर्व दोषों का नाश करने वाला है। अभ्यास-योग के द्वारा जब इस मंत्र का निरंतर जप किया जाता है, तो साधक को सिद्धि की प्राप्ति होती है। यह सिद्धि आकस्मिक नहीं, बल्कि निरंतर साधना से उत्पन्न होती है।
सामवेद में ओंकार को मांगल्यमय, पावन और धर्मस्वरूप बताया गया है। यह सर्व कामनाओं को प्रसन्न करने वाला और पूर्ण करने वाला मंत्र है। ओंकार को परब्रह्म का प्रतीक कहा गया है, जो समस्त मंगल का मूल है।
वही परब्रह्म परमात्मा है जिसकी सत्ता से ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं। फिर भी उस परम सत्ता पर कर्तृत्व का लेश मात्र भी भार नहीं होता। वही सर्वशक्तिमान होते हुए भी अकर्म भाव में स्थित है।
ओंकार को सर्व मंत्रों का नायक कहा गया है। यह उस परब्रह्म की स्वाभाविक ध्वनि है, जिससे समस्त मंत्र उत्पन्न होते हैं। इसकी शक्ति इतनी प्रबल है कि इसका जप साधारण रूप से नहीं, बल्कि गुरु-मार्गदर्शन और विधि-विधान के साथ किया जाना चाहिए, तभी इसका पूर्ण फल प्राप्त होता है।
‘हरि’ शब्द का अर्थ: जो पाप और ताप को हर ले
शास्त्रों में हरि शब्द का अर्थ बताया गया है—जो पाप, ताप और अयोग्यता को हर ले। अब ज़रा विचार करें, यदि कोई व्यक्ति आपका दुख मिटा दे, तो आप सुखी हो जाएँगे; यदि कोई आपका पाप मिटा दे, तो आप निष्पाप हो जाएँगे। लेकिन फिर भी उस व्यक्ति के प्रति मन में एहसानमंदी बनी रहेगी कि इसने मेरा दुख और पाप दूर किया।
परंतु भगवान का नाम ऐसा करुणामय है कि वह आपके दुखों और पापों को चुरा लेता है, इस तरह हर लेता है कि आपको पता भी नहीं चलता। न कोई एहसानमंदी रहती है, न कोई बोझ। वह अंतःकरण से पाप और ताप को मिटा देता है और बदले में आपको ओंकार-जप का पुण्य और आध्यात्मिक योग्यता प्रदान कर देता है।
इसी कारण हरि ओम शब्द से साधकों ने अपार लाभ उठाया है। बड़े-बड़े कथाकार कार्यक्रम की तिथि, तिथि-पक्ष, प्रतिपदा, एकादशी, अमावस्या और मुहूर्त सब देखते हैं, फिर भी कई बार उनके कार्यक्रम रद्द हो जाते हैं या सफल नहीं होते।
किन्तु जब मनुष्य हरि का चिंतन करके कार्य आरंभ करता है, तब शेष सब हरि स्वयं संभाल लेते हैं। वर्षों के अनुभव में यही देखा गया है कि हरि-स्मरण के साथ किए गए कार्यक्रमों में विघ्न नहीं आता। बस कभी-कभी किसी कारणवश स्थगन हो जाता है, पर असफलता नहीं मिलती।
इसलिए खुलकर नारायण हरि का स्मरण करो। मंत्र में कंजूसी क्यों? मंत्र-शक्ति अद्भुत है। उसकी महिमा का पूरा वर्णन संभव नहीं, क्योंकि सारा जगत उसी परमात्मा की शक्ति से संचालित हो रहा है।
मंत्र-शक्ति का विज्ञान: शब्द ब्रह्म और सूक्ष्म जगत से जुड़ाव
देवता मंत्र के आधीन हैं और स्वयं परमात्मा भी मंत्र के आधीन माने गए हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि यह समस्त जगत देवताओं के अधीन है और देवता मंत्र के अधीन हैं। मंत्र-जपक स्थूल शरीर में रहते हुए भी सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम शक्तियों से जुड़ने की एक दिव्य साधना विधि है, जो अंततः परमात्मा से मिलाने का मार्ग बनती है।
चाहे कोई इस्लाम, बौद्ध, जैन, यहूदी या ईसाई धर्म का अनुयायी हो, सभी ने किसी न किसी रूप में जप, प्रार्थना और मंत्र की महिमा को स्वीकार किया है। भगवान को मानने में मतभेद हो सकते हैं—किसी ने निराकार माना, किसी ने साकार, किसी ने पैगंबर को ईश्वर तुल्य माना, किसी ने आचार्य को—लेकिन मंत्र-जप की शक्ति पर सभी सहमत हैं।
मंत्र वास्तव में शब्द ब्रह्म है। शब्द ब्रह्म का आश्रय लिए बिना परब्रह्म की प्राप्ति संभव नहीं होती। यदि मनुष्य को अपने जीवन का वास्तविक मूल्य समझ में आ जाए, यदि वह दुखों से मुक्त होकर शाश्वत सुख पाना चाहता है, तो उसे भगवान के नाम के मंत्र का आश्रय अवश्य लेना चाहिए।
शब्दों में अद्भुत शक्ति है। “अंधे की औलाद अंधी” जैसे दो शब्दों ने महाभारत जैसे भयंकर युद्ध की भूमिका बना दी। वहीं ध्रुव ने भी दो शब्दों को पकड़कर तप किया और मंत्र-शक्ति के बल पर चतुर्भुज नारायण को प्रकट कर लिया।
“अंग्रेज भारत छोड़ो” जैसे शब्दों और नारे को मोहनदास करमचंद गांधी ने पकड़ लिया। निहत्थे होकर भी उन्होंने प्रार्थना, भगवान-नाम और मंत्र-बल से अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया। यह शब्द और मंत्र-शक्ति का ही प्रभाव था।
यदि संसार में सबसे सशक्त साधन कोई है, तो वह मंत्र-शक्ति है। एटमिक शक्ति, अणु शक्ति, विद्युत शक्ति और धन की शक्ति सभी अपनी-अपनी जगह महत्त्वपूर्ण हैं। धन-शक्ति से संसार की नश्वर वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, पर वह सीमित है।
मंत्र-शक्ति से तो ऐसी स्थिति बन सकती है कि अनेक धनवान स्वयं आपके दर्शन कर, आपकी सेवा कर, अपना भाग्य बना लें। मनुष्य इतना ऊँचा उठ सकता है। इसलिए शास्त्र कहते हैं—“गुरु मंत्रो मुखे यस्य, तस्य सिद्धिर्न अन्यथा”। गुरु से प्राप्त मंत्र ही सिद्धि देता है; गुरु-कृपा से ही सर्व लाभ होता है, गुरु के बिना साधना निष्फल हो जाती है।
गुरु मंत्र और दीक्षा का महत्व
शब्द हो, और उस शब्द में भी जब मंत्र समाहित हो जाए, विशेषकर गुरु मंत्र, तो वह साधक को सीधे सूक्ष्म जगत से जोड़ देता है। जैसे मोबाइल को सेल्यूलर सैटेलाइट से जोड़ दिया जाए, वैसे ही मंत्र साधक को दिव्य सृष्टि से जोड़ देता है और अदृश्य शक्तियों के साथ संपर्क स्थापित कर देता है।
मंत्र भी तीन प्रकार के होते हैं। एक होते हैं तांत्रिक मंत्र, जो भूत-भैरव आदि सूक्ष्म शक्तियों से जोड़ते हैं। उनसे साधक को सहायता भी मिलती है, प्रेरणा भी मिलती है, लेकिन उनका क्षेत्र सीमित और विशिष्ट होता है।
दूसरे होते हैं साबरी मंत्र। जैसे माणिकनाथ जोगी। आज भी अहमदाबाद के माणिक चौक में उनकी समाधि विद्यमान है। कथा आती है कि अहमद बादशाह ने उनसे अपराध किया, फिर क्षमा मांगी। माणिकनाथ जी ने आशीर्वाद दिया कि यह नगर तेरे नाम से बसेगा, फलेगा-फूलेगा और उसका नाम अहमदाबाद पड़ेगा।
अहमद ने भी वचन दिया कि वह उस स्थान को गुरु के नाम से रखेगा। आज भी वह स्थान माणिकनाथ जोगी के नाम से जाना जाता है और वहां उनकी समाधि और मंदिर हैं। साबरी मंत्र में शिवलोक तक गति कराने की शक्ति होती है और यह ऋद्धि-सिद्धियां भी प्रदान करता है।
तीसरा मंत्र होता है वैदिक मंत्र। वैदिक मंत्र शुद्ध, सात्त्विक और सीधे परब्रह्म से जोड़ने वाले होते हैं। ये मंत्र साधक के अंतःकरण को शुद्ध करते हैं, बुद्धि को प्रकाशित करते हैं और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं।
वैदिक मंत्र और शरीर की 72,602 नाड़ियों व ऊर्जा केंद्रों पर प्रभाव
वैदिक मंत्रों में समस्त मंत्रों का सेतु ओंकार है। गायत्री मंत्र, “ॐ भूर् भुवः स्वः”, “ॐ नमः शिवाय” और “हरि ओम” — ये सभी वैदिक मंत्र हैं। ये मंत्र जप करने वाले साधक के भीतर गहरे स्तर पर प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
मानव शरीर में सात कोष और सात प्रमुख ऊर्जा केंद्र माने गए हैं। वैदिक मंत्रों का जप इन सातों कोषों और केंद्रों को कंपनित करता है। जैसे डायनमो घूमने से विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है, वैसे ही मंत्र-जप से साधक के भीतर एक दिव्य शक्ति का संचार होता है। इस शक्ति के प्रभाव से शरीर की नाड़ियों में चेतना प्रवाहित होने लगती है।
प्रत्येक कोष से सैकड़ों नाड़ियाँ जुड़ी होती हैं और उनसे असंख्य सूक्ष्म नाड़ियाँ निकलती हैं। योगशास्त्र के अनुसार पूरे शरीर में लगभग 72,602 नाड़ियाँ हैं। योगियों ने बिना शरीर को चीर-फाड़ किए, गहन साधना और अनुभव के द्वारा इस नाड़ी-तंत्र का सूक्ष्म अध्ययन कर यह संख्या बताई। आधुनिक विज्ञान भी अनुमान की भाषा में ही बात करता है, जबकि योग परंपरा सटीक अनुभव पर आधारित है।
मानव मस्तिष्क में दो प्रमुख प्रवृत्तियाँ कार्य करती हैं—एक में भावना, प्रेम और स्नेह की प्रधानता होती है, और दूसरी में कर्म, विवेक और परिणाम को देखने की शक्ति होती है। इन दोनों के बीच एक सूक्ष्म अंतराल होता है। इन्हें जोड़ने वाली प्रधान नाड़ी सुषुम्ना कहलाती है। मंत्र विद्या को जानने वाले गुरु जब दीक्षा देते हैं, तो साधक को ऐसी साधना कराते हैं जिससे सुषुम्ना नाड़ी जाग्रत हो सके।
इस साधना से साधक के जीवन में कर्म करने की शक्ति भी आती है, कर्म के फल को उत्पन्न करने की क्षमता भी आती है, और साथ ही लिप्तता से रहित रहने का सामर्थ्य भी विकसित होता है। जीवन में रस भी रहता है, मुक्ति का अनुभव भी होता है और भक्ति की गहराई भी आती है। यह स्थिति ऐसी होती है मानो दो अलग-अलग सरोवरों की पाल टूट जाए और दोनों का जल एक हो जाए। तब प्रेम, आनंद, ज्ञान और सामर्थ्य — सब एक साथ जीवन में लहराने लगते हैं।
यही वैदिक मंत्र और वैदिक ज्ञान की विशेषता है। श्रीकृष्ण के जीवन में इसका पूर्ण उदाहरण दिखाई देता है। उनके जीवन में प्रेम भी भरपूर है, ज्ञान भी पूर्ण है, कर्म में कुशलता भी है, आनंद भी है, त्याग का सामर्थ्य भी है और भोग का सामर्थ्य भी है। वे समझने की शक्ति भी रखते हैं और आवश्यकता पड़ने पर सब कुछ भूलकर निश्चिंत होकर विश्राम करने की क्षमता भी रखते हैं।
संसार के अधिकांश लोग न तो त्याग का सामर्थ्य रखते हैं, न भोग का, न ही सही ढंग से बोलने और जीने की कला जानते हैं। वास्तव में उत्तम भोग वही कर सकता है जिसमें त्याग का सामर्थ्य हो। वस्तुओं का सही भोग वही कर पाता है जो उनसे बँधता नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उनका त्याग भी कर सकता है। संबंधों के मोह को छोड़े बिना जीवन में वास्तविक स्वतंत्रता और आनंद संभव नहीं है।
रामकृष्ण परमहंस जी का उदाहरण: दूध, मक्खन और संसार रूपी पानी
रामकृष्ण परमहंस जी कहते हैं कि मनुष्य को संसार में सब कुछ करते हुए भी जब चाहे तब चिपकान रहित हो जाना चाहिए। उनका यह अद्भुत उदाहरण जीवन की गहराई को सरल शब्दों में समझाता है।
रामकृष्ण परमहंस जी ने कहा कि संसार पानी के समान है और परमात्मा का रस दूध के समान है। यदि दूध को सीधे पानी में डाल दिया जाए तो उससे कभी मक्खन नहीं निकल सकता। मक्खन प्राप्त करने के लिए दूध में थोड़ा दही मिलाकर उसे कुछ समय के लिए एकांत में रखना पड़ता है। उसके बाद जब उसे मथा जाता है, तब जाकर मक्खन प्राप्त होता है।
जब यह मक्खन संसार रूपी पानी में डाला जाता है तो वह पानी में तैरता रहता है, डूबता नहीं। ठीक इसी प्रकार, यदि साधक अपने जीवन को मंत्र-जप, गुरु की कृपा और एकांत साधना से मथ ले, तो वह संसार में रहते हुए भी उसमें डूबता नहीं। वह भीतर से आनंदित, उल्लसित और सार-तत्व में जाग्रत रहता है।
ऐसा जीवन अत्यंत सुखद होता है। अन्यथा चाहे मनुष्य कितनी ही मेहनत और मजदूरी क्यों न करे, आज हर कोई दुखी दिखाई देता है। धनी भी दुखी है, निर्धन भी दुखी है। पढ़ा-लिखा भी दुखी है और अनपढ़ भी दुखी है। नेता भी दुखी है और जनता भी दुखी है। भ्रष्ट कहलाने वाले भी तनाव में हैं और ईमानदार कहलाने वाले भी चिंता से घिरे हुए हैं।
वास्तव में हम लोग जीवन जीने का ढंग भूल गए हैं। हमारी सोचने की पद्धति बदल गई है, और यही अधिकांश दुखों का मूल कारण बन गई है।
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