रविवार, 1 फ़रवरी 2026

ब्रह्म साक्षात्कार | आश्रम संध्या सत्संग 27-01-26 सुबह

 


ब्रह्म साक्षात्कार | आश्रम संध्या  सत्संग 27-01-26 सुबह 

TIME STAMP INDEX

0:02 सर्वात्मभाव और अहं का विस्तार
1:00 अनादि लीला और आत्म विस्मृति
1:09 बीज से फल तक अद्वैत दृष्टि
1:52 जड़ चेतन एकता
1:54 अग्नि जल सूर्य में ब्रह्म सत्ता
2:18 सर्व देह एक चैतन्य
2:40 स्वप्न दृष्टांत और अनेक रूप (कथा)
3:20 चैतन्य की अनेक लीलाएं
3:47 सूक्ष्म और स्थूल स्वरूप
3:50 बंधन और मुक्ति का भ्रम
3:59 इंद्रिय संयम और आत्म साक्षात्कार
4:16 स्वप्न और अद्वैत बोध (कथा)
4:33 एकमात्र अद्वैत का प्रतिपादन
4:36 दैनिक जीवन और अद्वैत उदाहरण
5:39 नियम बनाने और फल भोगने की सत्ता
5:45 सर्वहम ब्रह्मोहम उद्घोष
6:08 प्रकृति चक्र और जल तत्व
6:22 मंत्र उच्चारण और स्तुति (भजन)
6:32 राग द्वेष का लय
7:23 वैदिक चिंतन का अभाव
8:06 खेल और परमानंद
8:12 दक्ष यज्ञ और शिव तत्व (कथा)
8:52 जीवाणु दृष्टांत (कथा)
9:34 विविधता में एकता
10:04 ब्रह्मवेत्ता की महिमा
10:32 गुरु तत्व और सर्वात्मभाव
10:47 लीलाएं और कलाएं
11:30 शत्रु मित्र स्वप्न दृष्टांत (कथा)
12:21 मृत्यु और जीवन का अद्वैत
12:51 सुख दुख वृत्ति विवेचन
13:32 अहं पहचान और अज्ञान
14:04 श्री कृष्ण और गीता उद्गम (कथा)
14:47 विश्वरूप दर्शन (कथा)
15:13 सर्व धर्म एक आत्मा
15:52 फल श्रुति और उपदेश
16:09 ज्ञान दृष्टि और भगवान दृष्टि
16:49 रामकृष्ण परमहंस प्रसंग (कथा)
17:00 नामदेव और विट्ठल प्रसंग (कथा)
17:42 नारायण तत्व
18:01 वैद्य औषधि रोगी अद्वैत
18:16 तनाव और स्वप्न उपमा
18:54 ब्रह्मविद्या सूर्य उदय
19:00 तृप्ति और चाह का त्याग
19:53 साधक के लिए मनन
20:02 सदाचार और संयम
20:44 सत्य और तरंग सागर दृष्टांत (कथा)
21:10 जानने वाला ब्रह्म हो जाता है
22:16 मधुरम स्तुति (भजन)
23:20 कृष्ण माधुर्य और आकर्षण
23:38 आसक्ति त्याग
24:11 निष्काम कर्म और भरोसा
24:33 सर्व का भला
25:14 साक्षी और पर्दा दृष्टांत (कथा)
25:44 ज्ञान से मुक्ति
26:02 ज्ञान की पवित्रता
26:40 ईश्वरीय धर्म
27:12 दया और ज्ञान
27:36 विश्व कल्याण दृष्टि
28:09 एक आत्म दृष्टि से दुख नाश
29:05 अद्वैत और अखा भगत वचन (कथा)


INDEX KE ANUSAAR MEANINGFUL PARAGRAPHS

0:02 वक्ता सर्वात्मभाव प्रकट करते हैं कि सूर्य चंद्र वनस्पति किसान पशु पक्षी शत्रु मित्र सब मैं ही हूं और यह अहं का नहीं बल्कि ब्रह्म का उद्घोष है।

1:00 अनादि काल से यही खेल चल रहा है कि आत्मा अपने को भूलकर अनेक रूपों में खेलती रहती है।

1:09 बीज फूटने से फल बनने तक वही सत्ता है जो उगाने वाली भी है और खाने वाली भी।

1:52 जड़ और चेतन का भेद मिथ्या है क्योंकि दोनों में एक ही चैतन्य कार्य कर रहा है।

1:54 अग्नि जल सूर्य में जो शक्ति है वह ब्रह्म सत्ता है जो न जलती है न डूबती है।

2:18 सब हाथ पैर दिल एक ही चैतन्य के हैं ऐसा अनुभव अद्वैत दृष्टि है।

2:40 जैसे स्वप्न में एक व्यक्ति अनेक पात्र बन जाता है वैसे ही आत्मा अनेक रूपों में खेलती है। (कथा)

3:20 चैतन्य अनेक भावों सुख दुख रंग राग और विपदाओं में लीला करता है।

3:47 वही सत्ता सूक्ष्म भी है और स्थूल भी।

3:50 बंधन और मुक्ति आत्म अज्ञान से उत्पन्न भ्रम मात्र हैं।

3:59 इंद्रियों को मन में और मन को स्व में लीन करने से आत्म साक्षात्कार होता है।

4:16 स्वप्न में वस्तुएं भी मैं और गिड़गिड़ाने वाला भी मैं होता है जागने पर अद्वैत दिखता है। (कथा)

4:33 पूरे ब्रह्मांड में एक ही अद्वैत सत्ता है।

4:36 जहाज यात्री परिचारिका सभी रूपों में वही चैतन्य कार्य करता है।

5:39 नियम बनाने वाला नियम से लाभ पाने वाला और नियम का फल भोगने वाला भी वही है।

5:45 सर्वहम ब्रह्मोहम का उद्घोष पूर्ण तृप्ति का भाव है।

6:08 नदी मेघ वर्षा जल के रूप में वही ब्रह्म लीला कर रहा है।

6:22 ओम आनंदम सर्वम एक रसोहम शुद्धोहम का उच्चारण हुआ। (भजन)

6:32 जब दूसरा है ही नहीं तो राग द्वेष मोह काम का आधार नहीं रहता।

7:23 वैदिक अद्वैत चिंतन भूलने से ही व्यक्तिगत और सामाजिक दुख उत्पन्न होते हैं।

8:06 खेल को समझने पर वही खेल परमानंद बन जाता है।

8:12 दक्ष यज्ञ सती शिव प्रसंग में शिव सहज स्वरूप में स्थित रहते हैं क्योंकि सब वही हैं। (कथा)

8:52 जैसे शरीर में अनेक जीवाणु होते हुए भी देह एक रहती है वैसे ही ब्रह्म में सब समाहित हैं। (कथा)

9:34 विविध अंग निराले होते हुए भी सत्ता एक है।

10:04 ब्रह्मवेत्ता जहां जाते हैं वहां तीर्थ बन जाता है।

10:32 गुरु वही है जो अपने स्वरूप को जानता है।

10:47 नर्तक नृत्य दर्शक वाद्य सब एक ही चैतन्य की लीला हैं।

11:30 शत्रु मित्र का भेद स्वप्न की तरह है जागने पर सब मिट जाता है। (कथा)

12:21 मृत्यु और जीवन दोनों ही उसी एक सत्ता के नाम हैं।

12:51 सुख दुख मन की वृत्तियां हैं जैसे जल में तरंग।

13:32 अहं की पहचान बदलने से भय और वासना उत्पन्न होती है।

14:04 श्री कृष्ण ने इसी अद्वैत भाव में रहकर गीता का प्राकट्य किया। (कथा)

14:47 विश्वरूप दर्शन में मारने वाला मरने वाला सभी वही हैं। (कथा)

15:13 कृष्ण शिव अल्लाह बंदा सब नाम उसी एक के हैं।

15:52 इस ज्ञान से भय मिटता है दोष दर्शन समाप्त होता है।

16:09 यही दृष्टि शिव राम कृष्ण जगदंबा की है।

16:49 रामकृष्ण परमहंस को यही अद्वैत दृष्टि प्राप्त हुई। (कथा)

17:00 नामदेव विट्ठल और शिवोबा खेचर प्रसंग इसी सत्य की पुष्टि है। (कथा)

17:42 नारायण शब्द चैतन्य समूह का बोध कराता है।

18:01 वैद्य औषधि रोगी और आरोग्य सभी एक ही सत्ता के रूप हैं।

18:16 जैसे स्वप्न टूटने पर भय मिट जाता है वैसे ही ज्ञान से तनाव मिटता है।

18:54 ब्रह्मविद्या सूर्य की तरह अविद्या रात्रि को मिटा देती है।

19:00 तृप्त आत्मा को किसी चाह की आवश्यकता नहीं रहती।

19:53 साधक को इस सत्य का मनन करना चाहिए।

20:02 संयम सदाचार ब्रह्म निष्ठा में स्थिर करते हैं।

20:44 तरंग नश्वर है सागर शाश्वत है वैसे ही आत्मा शाश्वत है। (कथा)

21:10 ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।

22:16 मधुरम मधुरम की स्तुति में सर्वत्र माधुर्य दिखाया गया। (भजन)

23:20 कृष्ण के माधुर्य से ग्वाल गोपी पशु सब मोहित हो जाते हैं।

23:38 आसक्ति हटने से जीवन स्वतः संतुलित हो जाता है।

24:11 निष्काम प्रयत्न और परिणाम में भरोसा रखने की शिक्षा दी गई।

24:33 सर्व का भला और सर्व में एक की भावना प्रकट हुई।

25:14 पर्दा सत्य है दृश्य मिथ्या है साक्षी ही सत्य है। (कथा)

25:44 ज्ञान से उसी क्षण मुक्ति का अनुभव होता है।

26:02 आत्मज्ञान सबसे पवित्र है और सबको पवित्र करता है।

26:40 यह ईश्वरीय धर्म है जो सबका कल्याण करता है।

27:12 ज्ञानवान सभी दया स्थलों की खान होता है।

27:36 यह ज्ञान हर देश हर काल में हितकारी है।

28:09 एक आत्म दृष्टि से शोक मोह तनाव नष्ट हो जाते हैं।

29:05 अखा भगत कहते हैं कि द्वैत अंधेरा है और अद्वैत से ही शांति और मुक्ति संभव है। (कथा)


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