रविवार, 8 फ़रवरी 2026

ब्रह्माकार वृत्ति | आश्रम संध्या सत्संग 29-01-26 सुबह



ब्रह्माकार वृत्ति | आश्रम संध्या सत्संग 29-01-26 सुबह 

 TIME STAMP INDEX 

0:02 चाणक्य बाल्यकाल और सामुद्रिक लक्षण प्रसंग

1:06 राजा बनने की भविष्यवाणी और पिता की चिंता

1:41 दांत घिसने का निर्णय और गुरु बनने का फल

2:02 राजा नहीं गुरु बनने का उपदेश

2:39 धुली शाह संत और राजा की सवारी प्रसंग (कहानी)

3:35 ब्रह्माकार वृत्ति की शक्ति

4:06 दुर्वासा ऋषि और श्राप का रहस्य (कहानी)

5:59 ब्रह्मज्ञानी की करुणा और दृष्टि

6:14 धुली शाह और राजा संवाद विस्तार (कहानी)

8:43 राजा की दृष्टि परिवर्तन

9:02 श्रीकृष्ण अर्जुन युधिष्ठिर और फकीर प्रसंग (कहानी)

11:14 तीनों के रोने का कारण

12:59 कलियुग और ब्रह्माकार वृत्ति की कमी

14:49 तुच्छ भोग और जीवन की भूल

15:07 ब्रह्माकार वृत्ति और सिद्धि का अंतर

16:18 साधना की तीन पद्धतियां

17:00 भक्तों की साधना पद्धति

17:44 दैनिक जीवन में ब्रह्मभाव अभ्यास

18:48 कर्म और निवृत्ति का रहस्य

20:10 निरंतर सावधानी से जीवन परिवर्तन

22:02 धार्मिक और अधार्मिक दुख का कारण

23:32 ब्रह्माकार वृत्ति का महात्म्य

24:50 भजन का वास्तविक अर्थ (भजन)

25:46 कर्मयोग और शांति

27:31 दृष्टि की स्वतंत्रता

28:18 मनुष्य की विशेष स्वतंत्रता

29:26 परमेश्वर को अपना बनाने का बोध


 इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:  

0:02 चाणक्य बालक थे और उनके घर एक सामुद्रिक लक्षण जानने वाले ज्योतिषी आए जिन्होंने चाणक्य के लक्षण देखकर हर्ष प्रकट किया।

1:06 ज्योतिषी ने बताया कि चाणक्य राजा बनेगा यह सुनकर पिता दुखी हो गए क्योंकि राजभोग के बाद पतन का भय था।

1:41 पिता ने चाणक्य के लंबे दांत की नोक घिस दी जिससे भविष्य बदल जाए।

1:55 ज्योतिषी ने कहा अब चाणक्य राजा नहीं बल्कि राजाओं का गुरु बनेगा।

2:02 सत्संग का संदेश दिया गया कि राजा बनने से श्रेष्ठ अपने मन का गुरु बनना है।

2:39 धुली शाह नामक संत और राजा की सवारी का प्रसंग बताया गया जहां संत डटे रहे (कहानी)।

3:35 समझाया कि जिसकी ब्रह्माकार वृत्ति होती है उस पर किसी का शासन नहीं चलता।

4:06 दुर्वासा ऋषि के श्रापों का उदाहरण देकर बताया कि ब्रह्मज्ञानी का कठोर व्यवहार भी कल्याण के लिए होता है (कहानी)।

5:59 मां के समान ब्रह्मज्ञानी की करुणा का वर्णन किया गया जो डांट में भी प्रेम रखता है।

6:14 धुली शाह और राजा के संवाद में सच्चे वैराग्य और ऐश्वर्य का अर्थ समझाया गया (कहानी)।

8:43 राजा ने देखा कि संत के पास बाहरी वैभव नहीं पर भीतर पूर्ण सुख है।

9:02 श्रीकृष्ण अर्जुन युधिष्ठिर का एक ब्रह्माकार वृत्ति वाले फकीर से मिलना और चारों का रोना बताया गया (कहानी)।

11:14 युधिष्ठिर ने अपने व्यर्थ जीवन पर रोने का कारण बताया और फकीर ने प्रसिद्ध लोगों के आने से समय नष्ट होने का दुख कहा।

12:59 श्रीकृष्ण ने कहा कि कलियुग में ब्रह्माकार वृत्ति को समझने वाले बहुत कम होंगे।

14:49 तुच्छ भोगों के पीछे भागने को जीवन की बड़ी भूल बताया गया।

15:07 ब्रह्माकार वृत्ति और उड़ने जैसी सिद्धियों में अंतर समझाया गया।

16:18 साधना की तीन पद्धतियां बताई गई सन्यास योग और भक्ति।

17:00 भक्तों के लिए हर कर्म को भगवान को अर्पित करने की विधि समझाई गई।

17:44 स्नान भोजन और दिनचर्या में ब्रह्मभाव रखने का अभ्यास बताया गया।

18:48 कर्म का उद्देश्य निवृत्ति और उपरामता लाना बताया गया।

20:10 निरंतर सावधानी से मनुष्य का व्यवहार मधुर और जीवन ऊंचा होता है।

22:02 धार्मिक और अधार्मिक दोनों दुखी क्यों रहते हैं इसका कारण मन से जुड़ाव बताया गया।

23:32 ब्रह्माकार वृत्ति करने वाले ही धन्य और वंदनीय बताए गए।

24:50 शंकराचार्य और आचार्यों के अनुसार ब्रह्माकार वृत्ति ही सच्चा भजन है (भजन)।

25:46 कर्मयोग का श्लोक समझाकर फल त्याग से शांति का मार्ग बताया गया।

27:31 दृष्टि के अनुसार संसार बनने और बिगड़ने का सिद्धांत बताया गया।

28:18 मनुष्य की स्वतंत्रता को उसकी सबसे बड़ी शक्ति कहा गया।

29:26 वस्तुओं को अपना मानने की शक्ति जिस मन में है उसी से परमेश्वर को भी अपना बनाया जा सकता है।



Manual Transcription

चाणक्य बालक थे, उस समय चाणक्य के घर, एक सामुद्रिक लक्षण जानने वाला ज्योतिषी पहुंचा। चाणक्य के पिता ने उसकी आगता स्वागता की। ज्योतिषी ने चाणक्य को देखकर लंबी सांस ली। हां, खुशी व्यक्त की। अरे वाह! क्या शुभ लक्षण है। सामुद्रिक लक्षण जानने वाला है। जैसे भाई नाक लंबा हो, आंखें अंदर हो, तो ढी इस प्रकार के हो, कान बड़े हों, ललाट उस प्रकार का, वो आदमी जालिम होता है, ना होता है। गर्दन टूंकी हो, कान टूंके हो, आंखें अंदर हो और अंगूठा थोड़ा नाहटा हो, आदमी मीठा होता है। तो इस प्रकार के लक्षण होते हैं। अमुक दांत ऐसा हो निकला हो, तो आदमी राजा होता है। तो वह दांत चाणक्य का निकला हुआ था। तो सामुद्रिक लक्षण वालों ने कहा कि ब्रह्मदेव! तुम्हारा पुत्र तो राजा बनेगा, राजा। 


बाप रोया कि यह क्या खुशखबरी सुना रहे हो? यह तो म्हारा दुख की बात है। म्हारो दीकरो राजा थसे। 


अरे रे रे रे रे! तो सारू ना केवा है। 


क्यों राजा तो कोई पहले का पुण्य किया है तभी तो राजा 


बोले, पहले का पुण्य किया है। तपेश्वरी, राजेश्वरी, राजेश्वरी, भोगेश्वरी राजा बनेगा, फिर भोग भोगेगा, मजा लेगा, पुण्य नाश होगा, फिर नरक में पड़ेगा। यह तो अच्छा नहीं हुआ। चाणक्य के बाप, चाणक्य को कमरे में ले गए और कानस लेकर उनका जो लंबा दांत का नोक थी ना, वो घिस डाली। 


फिर शास्त्री जी के पास लाया कि महाराज अब! शास्त्री जी कहा, अब राजा नहीं बनेगा, लेकिन राजाओं का गुरु बनेगा, चाणक्य जरूर। चाणक्य नीति बनाई। 


तो आज का सत्संग तुम्हें राजा बनाने की सलाह नहीं दे रहा है। राजा भी जिसके आगे नतमस्तक हो जाते हैं, ऐसा ब्रह्माकार वृत्ति बनाकर औरों के गुरु बनो, चाहे न बनो, कम से कम अपने मन के तो गुरु बनो। और जो मन का गुरु बन गया उसको लोग पहचानें, चाहे ना पहचानें, वो जगत का गुरु हो गया। वन्दे कृष्णं जगतगुरु। कृष्ण से किसी ने थोड़े कान फुकवाया थे। दीक्षा सबको थोड़ी दी थी, लेकिन श्री कृष्ण ब्रह्म स्वरूप में रहते थे ना। अपन देह भाव में रहते हैं और वो निज ब्रह्म भाव में रहते थे। 


मैं कथा कह रहा था धुली शाह की। वो धुली शाह रास्ते में बैठे थे। राजा की सवारी जा रही थी। तो आए सिपाही आरटीओ डिपार्टमेंट। अभी आरटीओ नाम पड़ा, पहले तो वैसे ही भालाधारी आए। 


महाराज हट जाओ। क्यों कि राजा की सवारी आ रही है। 


वो तो राजा है, हम महाराज हैं। वो राजा है, हम महाराज हैं। उसको बोलो दबके सुकड़ के यहां से निकल जाओ। 


बोले महाराज, अकेले राजा होते ना तो निकल जाते, लेकिन उनके साथ, बड़ा लंबा चौड़ा सरकस है। उनका जन्मदिन है, उत्सव है। 


बोले तो उसको बोलो कोई दूसरे रास्ते से निकल जाए। इधर महाराज बैठे हैं। और धुली शाह नाम के संत हैं। 


उनकी ब्रह्माकार वृत्ति थी, मनोबल में ताकत थी। सिपाही कुछ कर नहीं सके। जिसके ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो गई है, वो अगर अड़ जाए तो उसके ऊपर किसी की हुकूमत नहीं चल सकती। अड़ जाए तो, नहीं तो सह ले, उसकी मर्जी की बात है। यूं करके मिल लेता है, यह उसकी करुणा है। बाकी अड़ जाए, उसको, उसको कोई डांट नहीं सकता, उसके ऊपर किसी का प्रभाव नहीं चल सकता। अहमद का टोपा तो पता है ना? श्री कृष्ण भी ऐसे ब्रह्माकार वृत्ति वाले अहमद से मिलने को आ जाते हैं। दुर्वासा ऋषि को रथ में बैठाकर श्री कृष्ण रथ खींच लेते थे। श्राप तो देते हैं, वैसे श्राप देने से तप नाश हो जाता है। लेकिन दुर्वासा ऋषि आत्मवेत्ता थे, ब्रह्माकार वृत्ति कर चुके थे। फिर दे मारे, ।


ऐ! कहां जाता है, इधर आओ। एक माइल से दूर से जा रहा था, बुलाया। कि महाराज मैं तप करने गया था और देवी ने आशीर्वाद दिया, मुझे पुत्र प्राप्ति हो जाएगी। 


जाओ, देवी का वरदान कैंसिल। बेवकूफ कहीं का, दुर्वासा इधर बैठा और प्रणाम किए बिना चला गया। जाओ, देवी का वरदान कैंसिल। ऐसे खतरनाक श्राप दे देते थे। 


फिर भी दुर्वासा का तप क्षीण नहीं हुआ। क्यों? कि उनकी ब्रह्माकार वृत्ति हुई। उसको जो होने वाला था, ऐसा दुर्वासा से निकल आया, केवल। वो कहीं पुत्र, पुत्र में कहीं फंस जाता और संत की नजर पड़ी है, वो फंसने की जगह उसकी काट दी, श्राप देकर। उसको तो लगता है कि बाबा जी खतरनाक है लेकिन खतरनाक है, उसकी मुसीबत हटाने के लिए खतरनाक। डॉक्टर मरीज को खतरनाक लगे, नादान बच्चे को खतरनाक लगे तो डॉक्टर खतरनाक थोड़े होते हैं। तुम्हारे रोग निवृत्ति करते हैं। ऐसे ही दुर्वासा आदि जो श्राप आदि दे देते थे, वो हकीकत में भविष्य में होने आ रही उसकी जो घटना है, वो बोल देते अथवा तो वो ही बोलते जिससे उनका मंगल होता है। ब्रह्म ज्ञानी ते कछु बुरा न भया। जैसे मां अपने बच्चे का बुरा नहीं कर सकती, तमाचा तो मार सकती है, कान भी खींच सकती है, भूखा भी रख सकती, आंख भी दिखा सकती, चॉकलेट भी दे सकती। जो भी करेगी, जितना प्यार चॉकलेट देने में है, शीरा खिलाने में है, उतना ही प्यार कड़वी दवा पिलाने में भी तो भरा है ना! जिसको ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न होती है, उनके द्वारा जो भी व्यवहार होता है।... नानक जी ने कहा, ब्रह्म ज्ञानी ते कछु बुरा न भया। ब्रह्म ज्ञानी की सब ऊपर दया। 


धुली शाह ने डांट दिया कि राजा को बोलो उधर से चला जाए। 


महाराज, एक फकीर है, धुली शाह बोलते हैं, राजा साहब! वह तो राजा है। प्रोसेसन है तो दूसरी जगह से निकल जाए। हम तो राजा, राजाओं के राजा हैं, महाराज हैं, चक्रवर्ती हैं। साधु कैसे लगे उन्हें महाराज? उनकी वाणी में कुछ था, इसलिए हम दम दांती नहीं दे पाए उनको। 


राजा ने रथ रुकवाया, आगे आया, बोले महाराज प्रणाम हो! बेटा सुखी भव। बाबा जी, आप जरा किनारे हो जाते हैं, हमारे को। बोले किनारे, हम तो किनारे हैं ही, तुम किनारे हो जाओ अब। हम तो किनारे हैं, तुम किनारे हो जाओ। 


बोले, आप किनारे कहां? आप तो बीच में बैठे हैं। अरे, बीच में जो बैठा है, वो बैठा है। हम तो अपने किनारे हैं। तू बीच में बैठा है, इधर की थप्पड़ खा रहा है, उधर की मान की, अपमान की, सुख की, दुख की, मेरे की, तेरे की। तू थप्पड़ खा रहा है। हम तो किनारे बैठे हैं। 


महाराज आप, आप बोलते हैं, हम राजाओं के राजा हैं तो आपके पास तो कोई जमीन जागीर तो है नहीं। आप राजाओं के राजा कैसे? 


बोले, हमारी जमीन जागीर, हमारा राज्य तुमको नहीं दिखता है। 


बोले, राज्य नहीं दिखे तो सेना तो होनी चाहिए। बोले, मेरे पास वह नश्वर संपत्ति नहीं है, जो सैनिकों को पगार देकर संपत्ति की सुरक्षा करनी पड़े। मेरे पास वह शाश्वत संपत्ति है, जिसको रखने के लिए सैनिकों की जरूरत नहीं पड़ती। अपने आप संपत्ति टिकी रहती है, वो मेरे पास है। 


बोले महाराज, आपकी भूमि, इलाका। बोले, इलाका जहां जाऊं, वहां तक का इलाका, जहां तक नजर पड़ती है, वो सब मेरा इलाका है। 


तो राजा के पास तो महाराज फौज होती है। फौज नहीं है, आपके पास तो खजाना कहां है? 


बोले, मेरा कोई व्यक्तिगत खर्च ही नहीं है। भूख लगती तो तेरे जैसे कई सेवक आकर खिला देते तो फिर खजाना रखने की जरूरत क्या है?


बोले, मेरा कोई व्यक्तिगत खर्च ही नहीं है। भूख लगती तो तेरे जैसे कई सेवक आकर खिला देते तो फिर खजाना रखने की जरूरत क्या है?


 बोले महाराज, मेरे तो नौकर चाकर हैं, आपको तो कोई कहां है नौकर चाकर? 


बोले, तेरे नौकर चाकर तो इस राज्य में तेरी चाकरी करेंगे और पगार लेंगे। मैं तो जहां भी जाता हूं, मनुष्य नहीं तो देव, गंधर्व, किन्नर एक दूसरे को प्रेरित करके मेरी सेवा करते रहते हैं। आज तक एक दिन भी भूखा नहीं रहा हूं। तू तो कभी भूखा भी रहा होगा, कभी चिंतित भी रहा होगा। 


राजा पर एक मधुर निगाह पड़ी। राजा ने देखा कि बाहर से तो हमारे ताज हैं, सुवर्ण है, यह है, वो है हमारी छड़ी पुकारने वाले, लेकिन इनके आंखों में जो मस्ती है, इनके चेहरे पर जो निश्चिंतता है, वो सुख मेरे को कहां? 


ऐसी घटना एक बार घटी थी श्री कृष्ण, युधिष्ठिर, अर्जुन के साथ। अर्जुन, कृष्ण, युधिष्ठिर गए जंगल में घूमने को। घूमते घामते श्री कृष्ण वहीं ले गए, जहां एक फकीर, एक संत ब्रह्माकार वृत्ति में मस्त रहने वाले मिले। श्री कृष्ण ने उनको देखा, युधिष्ठिर ने देखा, अर्जुन ने देखा। देखते देखते चारों के चार रोना शुरू कर दिया। चारों रोए। रोते रोते, रोते रोते, रोने का भी अंत होता है, हंसने का भी अंत होता है। रोते रोते महाराज रुदन चुप हुआ। शांत जंगल में चारों के चार रोए, कुछ विचित्र लग रहा था। 

जब रुदन शांत हुआ तो अर्जुन पूछता है श्री कृष्ण से धीरे से कि प्रभु, आप क्यों रोए? 


अर्जुन, अर्जुन! मैं क्यों रोया? लेकिन तू क्यों रोया, तू बता? 


बोले, बाबा जी रो रहे थे, बड़े भाई रो रहे थे, आप रो रहे थे तो फिर मैं कैसे चुप रहूं? मेरे को भी रोना आ गया। मैंने कंपनी दे दिया आपको। महाराज! चारों के चार रोए। अर्जुन कहता है कि आप तीन रोने लगे, उसके प्रभाव से मैं रो पड़ा। 


अच्छा तो बाबा जी क्यों रोए? 


बाबा जी से पूछा, बाबा जी बोलते हैं, मैं क्यों रोया, वह बताऊंगा लेकिन इससे युधिष्ठिर से पूछो। 


युधिष्ठिर सोचते हैं कि महाराज मैं तो इसलिए रोया कि कहां तो आपका मधुर जीवन, शांत जीवन, दो रोटी के टुकड़े टुकड़े बनाए खाए और परमात्मा स्वरूप में ब्रह्माकार वृत्ति में मस्त। और कहां हमने मनुष्य जन्म, यह मेरा, यह तेरा लड़ाई झगड़ा और एकत्रित करके फिर छोड़ के मर जाने में गंवाया। आज तक उस ब्रह्म परमात्मा को नहीं जाना, जहां से हमारी बुद्धि को सत्ता मिलती है, जहां से हमारी आंख देखती है, जहां से कान सुनते हैं, जहां से मन सोचता है। अरे उस परमात्मा के लिए हमने समय नहीं निकाला। हमारा समय मेरे तेरे में बर्बाद हो गया। कहां आपका मधुर पवित्र जीवन और कहां हमारा राजसी जीवन? हम अपने बीते हुए समय पर रो रहे हैं कि हमने जिंदगी कहां बर्बाद कर दी महाराज, इसलिए मुझे रोना आता है। लेकिन आप क्यों रोए प्रभु बताइए? 


महाराज कहते हैं, मैं इसलिए रोया कि कृष्ण जैसे अवतारी पुरुष, साक्षात नारायण और युधिष्ठिर जैसे धर्मात्मा लोग, अर्जुन जैसा वीर, ऐसे प्रसिद्ध आदमी अगर मेरे पास आने लग गए तो अब साधारण आदमियों की भीड़ बढ़ जाएगी और मेरी ब्रह्माकार वृत्ति जो दिन दिन बढ़ाना चाहिए, वह बढ़ाने का समय नहीं मिलेगा। समय लोग, लोग हमारा खा जाएंगे। ऐसा कोई पाप उदय हुआ है कि तुम्हारे जैसे प्रसिद्ध आदमी आए, ताकि मेरा समय चला जाएगा। कौन सा पाप का फल है कि आज तुम लोगों को विधाता ने इधर प्रेरणा की? इसलिए मैं रो रहा हूं कि मेरा समय बर्बाद हो जाएगा। 


अर्जुन को लगा कि लो, हमारा आना भी बाबा जी को पाप का फल लगता है। कितना कीमती टाइम होगा? जिनकी ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो गई है ना, उनको अगर लोग।... 


लोगों का मान, धन, वैभव, वस्तु, सुविधाएं मिलती हैं, उनका चित्त इतना प्रसन्न नहीं होता। उनको एकांत मिलती है तो चित्त प्रसन्न होता है। अनजानी जगह में जितना खुश रहते हैं, उतना जान जानी हुई जगह में वो मजे में नहीं रहते। क्योंकि फिर वो ये आया, वो आया, ये लेना, वो देना, उसको संभालें, ये आ जाता है। फिर व्यवहाराकार वृत्ति, ब्रह्माकार वृत्ति बढ़ाने का समय उधर खर्च हो जाता है। हालांकि एक बार साक्षात्कार हो जाए तो उनकी मुक्ति में तो कोई बाधा नहीं। लेकिन यह प्रेम रस ऐसा है कि जितना पियो उतना कम, जितना पियो उतना कम। 


महाराज अर्जुन कहता है कि भगवन! ऋषि का कहना भी सच्चा है, भैया का कहना भी सच्चा है और मेरा रोना भी सच्चा है। हमारा तीनों का तो ऑफिशियल है, लेकिन आप क्यों रोए? 


कृष्ण कहते हैं कि मैं इसलिए रोया, कि कलजुग आ रहा है। ऐसी ब्रह्माकार वृत्ति को महत्व देने वाले महात्मा नहीं के बराबर हो जाएंगे। कहीं, कभी, कोई कोई होगा और महात्मा कभी कोई, कोई होगा। लेकिन उस महात्मा को देखकर राजा अपने तुच्छ जीवन पर ग्लानि करके रोए और राजा भी ब्रह्माकार वृत्ति के लिए छटपटाए, ऐसे अभागे राजा भी नहीं। राजा भी भोग मिले, यश मिले, देश परदेश में डॉलर की थप्पी हो जाए बस, लेकिन ब्रह्माकार वृत्ति का तो ख्याल ही नहीं। मैं इसलिए रोया और अगर ऐसे कोई विरले संत होंगे तो उन संतों को पहचानने वाले युधिष्ठिर जैसे राजा नहीं होंगे। ऐसा कलजुग आ रहा है। मैं इसलिए रोया कि हाय रे हाय! जो ब्रह्म परमात्मा अपना आत्मा है, उसके लिए वृत्ति पैदा नहीं करेंगे और लोग छोटी छोटी बातों में उलझेंगे, लड़ेंगे, झगड़ेंगे। जैसे कुत्ता मांस के लिए लड़ता है, पशु घास के पुडे के लिए एक दूसरे को सींग ठोकते हैं। ऐसे आदमी तुच्छ नश्वर भोगों के लिए एक दूसरे से लड़ेंगे, जुल्म से ऐसा युग आएगा। कहां तो सब छोड़ छाड़ के ब्रह्म परमात्मा में लगे हैं और राजा युधिष्ठिर जैसा भी ऐसी वांछा करता है और कहां लोग तुच्छ भोग, जिनसे कोई अर्थ सिद्ध ही नहीं होता है। आप जो खा रहे हैं, पी रहे, अगर गहराई से सोचें कि आप कर क्या रहे हैं? खाया पिया, खाद बन गया। खाद फिर उभर के आया और फिर खाया पिया। फिर चाहे पशु का खाद हो, चाहे मनुष्य का खाद, आप खाद ही तो घुमा रहे हैं और क्या कर रहे हैं? मैंने तो दो बेटे पैदा किए, दो बेटे पैदा किए लेकिन अनाज में से खाद बनाने की फैक्ट्री तो पैदा की और क्या किया? अगर ब्रह्माकार वृत्ति बेटे को नहीं करा रहे हैं तो बेटे पैदा करके क्या किया आपने? ब्रह्माकार वृत्ति जो लोग करते हैं, वे धन्य हैं, वे बड़भागी हैं। 


ब्रह्माकार वृत्ति और उड़ने की वृत्ति में फर्क है। पानी पर चलने की सामर्थ्य आ जाती है। आप प्राण को जितने अंश में वश करते हैं, यह जो कुछ महापुरुष दिखाई देते हैं, यहां दुनिया में ऊंचे दिखाई देते हैं, उन्होंने जितने जितने अंश में अपने प्राणों को, अपने मन को केंद्रित किया है, वश किया, उतनी उतनी उनकी आभा, उतना उतना उनकी मस्ती, उतना उतना उनकी योग्यता बढ़ी है। अगर आप प्राण को और मन को ठीक से वश कर लेते, प्राण को वश कर लेते हैं तो आपको त्रिभुवन में कोई असाध्य काम नहीं, असंभव नहीं है। आप सूर्य की गति को रोक सकते हैं। तारों की और चंद्रमा की गति को रोक सकते हैं, इतनी प्राण शक्ति बीज रूप में आपके पास होती है। आप मरे हुए आदमी को जीवन दे सकते हैं और गुलाब के पौधे से आप मोतिया के पुष्प बरखा सकते हैं और मोतिया से गुलाब पैदा करा सकते हैं। आपके संकल्प में इतनी शक्ति है और तो क्या? आप चाहे तो दूसरी सृष्टि भी बना सकते हैं। बीज रूप में आपके पास ऐसी शक्ति पड़ी है, लेकिन आपकी वृत्तियां बिखरी हुई है। वृत्ति एकाग्र नहीं होती। 


तीन प्रकार की साधना की पद्धति होती है। संन्यास की साधना की पद्धति होती है। निषेध आत्म, सब मिथ्या, मिथ्या, मिथ्या, मिथ्या, नश्वर, नश्वर करते हुए, बाकी जो बचता है, वह ब्रह्म। वहां ब्रह्माकार वृत्ति करने की पद्धति होती है। 


दूसरी होती है योगियों की दुनिया की पद्धति। निषेध भी नहीं करो और चिपको भी नहीं, वृत्ति को निरोध कर दो। वृत्तियां खाली करते जाओ। वृत्ति का पेट खाली करते, करते एकाग्र करके परमात्मा में लगाओ। तीसरी होती है संसारी भक्तों के लिए साधना की पद्धति। वह पद्धति होती है कि वृत्ति जहां भी जाए, वह भगवान का है, ठाकुर जी का है, प्रभु जी का है, ब्रह्म का है। तो ब्रह्म का, परमात्मा का समझ के तुम्हें अगर सुगंधी लेनी है तो कोई बात नहीं। फूल ले लो, ठाकुर जी को चढ़ा दो और फिर सूंघो। ये ठाकुर जी का प्रसाद है। भोजन तुम्हें खीर, रबड़ी, पौरी, पकोड़ा खाना है। आज तो ठाकुर जी, मेरे ठाकुर जी को पूरी खानी है। ठाकुर जी के लिए बनाया, अर्पण कर दिया तो हृदय में ठाकुर जी! इस प्रकार की वृत्ति मजबूत हो जाएगी तो देर सबेर वह ठाकुर जी ही चैतन्य ब्रह्म है, ऐसा उपदेश देने वाले ज्ञानी महापुरुष की चाबी लग जाएगी और तुम्हारी ब्रह्माकार वृत्ति हो जाएगी। नहा रहा हूं तो मैं नहा रहा हूं नहीं, ठाकुर जी को स्नान कराता हूं, क्योंकि है तो सब ठाकुर ही ठाकुर है। तत्त्व से तो देखा जाए तो सब अभिन्न तत्त्व है। तो ठाकुर जी से ठाकुर जी को स्नान करा रहा हूं कि जल भी तू ही है और जल में स्नान करने वाला भी तू ही है, मैं बीच में कौन होता हूं? गंगे हर यमुने हर। सुबह स्नान करो ना, आपकी भावना से स्नान मधुर हो जाएगा।... सुबह तो नींद में से उठकर पहले बैठो कि मैं शांत आत्मा, ब्रह्म चैतन्य ओम नारायण, नारायण, नारायण! बिस्तर छोड़ने के पहले गंगा, यमुना, गोदावरी के जल को मन से कल्प के स्नान कर लो। फिर मन को भी अपने में में स्नान करा लो। फिर महाराज, कोई सुंदर सुहानी पुस्तक हो, उसके विचार थोड़े पढ़ो। ब्रह्माकार वृत्ति जगाने में जो मदद देती है, वो आत्मज्ञान उन्हीं विचारों, विचारों में फिर अपना दिनचर्या चालू करो। ब्रह्माकार वृत्ति होने में मदद मिल जाएगी। कार्य करने के पहले, कार्य करने के बाद, काम करने के पहले आराम होता है, काम करने के बाद भी आराम होता है तो कार्य भी आराम करने के लिए ही होते हैं। ऐसा कर्म हम करते हैं कि जो करते ही रहें हैं, थकू रे! नहीं, कर्म, कर्म का फल क्या है कि जो कर्म करें, उन कर्मों से आप निवृत्त हो जाएं, आपके चित्त में निवृत्ति आ जाए, आपके चित्त में उपरामता आ जाए भोग भोगने की। तब तो भोग सार्थक हो गया। लेकिन वो भोग भोगते, भोगते, भोगते अपने को सता-सता के खपा दे तो भोग को आपने नहीं भोगा, भोग ने आपको खत्म कर दिया। महाराज फिर अपना दिनचर्या का काम करें। कार्य करने के पहले मन बुद्धि में जो विचार उठते हैं, उस मुच चैतन्य आत्मा से सो हम फिर कार्य करते-करते बीच में एकाध मिनट चले गए। ब्रह्म परमात्मा कार्य फिनिश हुआ तो कार्य का परिणाम होगा धन, यश, सफलता, असफलता। सफलता आए तो भी समझ लो कि आई हुई चीज है और विफलता आए तो समझ लो आई हुई चीज है। मान आए तो समझ लो आई हुई चीज है, अपमान आए तो समझ लो आई हुई चीज है। 


 *यह भी देख, वह भी देख।* 

 *देखत देखत ऐसा देख,* 

 *मिट जाए धोखा और रह जाए एक।* 


वह ब्रह्माकार वृत्ति पैदा करने का तरीका है। इस प्रकार बार बार अगर सावधान रहे और आदमी में सातत्य हो, संसारी व्यवहार करने वाले में अगर उस प्रकार की वृत्ति बनाने का सातत्य हो तो थोड़े ही महीनों में बहुत उसका जीवन ऊंचा आ जाएगा। उसका व्यवहार भी मधुर होने लगेगा, सफलता भी होगी। कभी विफलता भी होनी है तो पहले जितनी चोट नहीं लगेगी। सफलता भी होगी तो पहले जितना राग नहीं होगा। जिसका राग कम होता जा रहा है, द्वेष कम होता जा रहा है। 


तमु आगे वधी रह्या छो के पाछड जई रह्या छो। आपकी प्रगति हो रही है कि पतन हो रहा है, वो कैसे जानें? क्या आपका आनंद बढ़ता हो, निर्भयता बढ़ती हो, साहस बढ़ता हो, खुशी बढ़ती हो। बिना विषय के, बिना वस्तुओं के, बिना परिस्थिति के भी आप आनंदित रहने के रास्ते पर बढ़ते हो तो समझ लो आप आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन मोह बढ़ रहा है, भय बढ़ रहा है, चिंता बढ़ रही है, भोग वासना बढ़ रही है। समझ लो कि आपकी गाड़ी कहीं रॉंग साइड जा रही है। विधेयात्मक विचार हो रहे हैं, समझो आप आगे बढ़ रहे हैं। निषेधात्मक विचार आ रहे हैं। ये ऐसा है, ये ऐसा है। कोई का दोष दिखे, गुण दोष तो दिखना ही, दिखेंगे ही। व्यवहार करना है तो। लेकिन गुण पर भी ज्यादा नजर न रखो, दोष पर भी ज्यादा नजर रखो। अगर रखना ही पड़ता है तो थोड़ी गुण पर रख लो, दोष पर नहीं रखो। गुण दोष की तो सृष्टि है। किसी के दोष की दृष्टि आप पक्की करते जाएंगे, आपका अंतःकरण मलिन होता जाएगा। किसी के गुण पर दृष्टि रख पक्की करते जाएंगे, आपका अंतःकरण स्वच्छ होता जाएगा। लेकिन गुण और दोष जो मन में आते हैं, मन जहां से उठता है, उस परमात्मा पर दृष्टि रखते जाएंगे तो आपकी वृत्ति ब्रह्माकार होने लगेगी। आज के जगत में धार्मिक आदमी भी अपने को दुखी मानता है और अधार्मिक आदमी भी दुखी मानता है। धार्मिक आदमी क्यों दुखी मानता है कि जितना चाहता है, धर्म के पथ पर चलना उतना चल नहीं सकता। सीता जी की कथा सुनी, राम जी की कथा सुनी, कृष्ण जी की कथा सुनी, सती अनुसुया की सुनी, लेकिन वो हम बन नहीं पाते हैं। काही न काही कुणवत सतत स्मरण नहीं होता, सतत ध्यान नहीं होता, सतत सच्चाई पर नहीं चल सकते इसलिए धार्मिक आदमी को भी डंक लगता रहता है और अधार्मिक आदमी को भी डंक लगता रहता है कि सतत वो भोग चाहता है और भोग सतत किसी को मिलता नहीं और मिलता है तो टिकता नहीं। जो भाता है, जो चाहता है, वो होता नहीं। जो होता है, वो टिकता नहीं और जो, जो, जो चाहते हैं, वो होता नहीं। जो होता है, वो भाता नहीं। जो भाता है, वो टिकता नहीं। इसलिए उसकी भी फरियाद है। जब तक मन के साथ जुड़ेंगे, तब तक धार्मिक हो, चाहे अधार्मिक हो, कुछ न कुछ कमी खटकती रहेगी, कमी खटकती रहेगी। 


सतत जप करूं, सतत ध्यान करूं, सतत आं करूं, पण सतत नहीं थाये। मन तू कोई ऊंच जसे, नीच जसे नीच न जाए, काजी राखो। पण नीच गए हुय नु चिंतन करके तुम नीचा जसो नहीं। तुम तुरंत ब्रह्माकार वृत्ति करो। ऊंच और नीच जनाथी दिखाई दे, एमा पहुंच जाओ। मतलब वांधा नहीं। पछी भले नी डरो ऊंचा जाए के नीचे जाए। तो वे लोग धन्य यही वृत्ति जानती। 


 *ज्ञातमऽपि वर्ध्यंती ये ते ते पुरुष धन्य वंद्यस्ते भुवनत्रय।* 


अपरोक्ष अनुभूति का श्लोक है, जो इस प्रकार की वृत्ति को जानते हैं और जानकर उसे बढ़ाते हैं, वे सत्पुरुष धन्य हैं। वे ही तीनों लोकों में वंदनीय हैं। ब्रह्माकार वृत्ति जाहिर सभा में माइक में बैठकर बोलकर आपको सुनाई, यह केवल उसकी महिमा का एक अंश है। अगर ब्रह्मा का वृत्ति आपको दो मिनट के लिए भी हो गए तो दोबारा गर्भवास नहीं होता है।... दो मिनट के लिए भी ब्रह्माकार वृत्ति हुई तो यह देह मैं हूं और संसार सच्चा है, ऐसी भूल नहीं हो सकती और इस तुच्छ नालियों से सुख लेने की आसक्ति नहीं होगी। आप खाएंगे, लेकिन भोग बुद्धि से नहीं, औषध बुद्धि से। आप देखेंगे लेकिन आकर्षित होकर नहीं, व्यवहार। आप सुनेंगे, लेकिन जिससे सुना जाता है, उसका बोध आपको पक्का होगा। जैसे आप सिनेमा देखते हैं न समझदारी से, लोग तो सिनेमा को भी सच्चा मानकर वहां भी उछल कूद कर लेते हैं और बाहर आते हैं आंसू सारते हैं, हालांकि होता कुछ नहीं होता। उमा कहौं मैं अनुभव अपना, सत्य हरि भजन जगत सब सपना। तो शंकराचार्य ने कहा भजन क्या कि ब्रह्माकार वृत्ति करना ही भजन है। और रामानुजाचार्य रामाकार रामाकार वृत्ति करना ही भजन है। दूसरे आचार्य ने कहा श्री कृष्णाकार वृत्ति करना ही भजन है। कृष्णाकार वृत्ति करो तो दूसरी आकार की वृत्ति बंद हो जाएगी, शांति। भगवताकार वृत्ति में देवाकार वृत्ति बनो, लेकिन यह वृत्तियां जहां से निकलती है, जिससे श्री कृष्ण, श्री राम, श्री देव, देवी देवता हैं, वह ब्रह्म परमात्मा का ज्ञान पाकर अगर ब्रह्माकार वृत्ति करते हो तो जो कृष्ण को मस्ती है, वह तुमको मस्ती है। जो राम को रस है, वह तुमको रस है। जो शिवजी समाधि करते हैं, लाख वर्ष की समाधि करो, चाहे दो क्षण के लिए अनुभव करो, अनुभव वही का वही होगा। तो ज्ञानी साक्षात नारायण रूप होता है, शिव स्वरूप होता है। आज का श्लोक ऐसा है 


 *"युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।" (गीता 5.12)* 


जो कर्म युक्ति युक्त करता है, जो कर्म योगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत प्राप्ति रूप शांति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बंध जाता है। कर्म तो सब करते हैं। बेटा बेटी ज्ञानी को भी होता है, अज्ञानी को भी होता है। राज्य ज्ञानियों को भी हो सकता है, अज्ञानियों को भी हो सकता है। भूख ज्ञानी को भी लगती है, अज्ञानी को भी लगती है। कांटा ज्ञानी को भी चुभ सकता है, अज्ञानी को भी चुभ सकता है। यात्रा ज्ञानी भी करता है, अज्ञानी भी करता है। थकान ज्ञानी के शरीर को भी होती है, अज्ञानी को भी होती है। लेकिन अज्ञानी समझता है, मैं थका हूं, ज्ञानी समझता है, यह थका है। अज्ञानी समझता है कि मुझे कांटा चुभा और ज्ञानी समझता है कि इसे कांटा चुभा। अज्ञानी समझता है, मैं बूढ़ा हुआ हूं और ज्ञानी समझता है कि यह बूढ़ा हुआ है। बस समझ फेरनी है और कुछ करना नहीं है। कोई युद्ध के मैदान में भात भिड़ानी नहीं है, कोई कारतूस के आगे खड़ा होना नहीं है, केवल युक्त होकर कर्म करना है। युक्त होकर जीना है, और कुछ करना नहीं है। 


 *युक्ता इति उच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः* 


गुलाब का फूल और गेंदे का फूल बाहर से विषम दिखते हैं, लेकिन प्रकृति के कारण को देखो तो सम है। ऐसे ही लोहा और सोना बाहर से अलग दिखता है। लेकिन पांच भूतों के मेटल जगत में जाओ तो धातु जगत में जाओ तो थोड़ा फेर पड़ेगा, लेकिन पांच भूतों के जगत में जाओ तो दोनों एक। नजर अपनी-अपनी है। चाहे तू बंदा बना के देख ले, चाहे खुदा बना के देख ले, चाहे बेईमान बना के देख ले, चाहे ईमानदार बना के देख ले, चाहे अपना बना के देख ले, चाहे पराया बना के देख ले, चाहे सर्व में अपने को देख ले, चाहे सर्वेश्वर को सब में देख ले, नजर तेरी है, तू स्वतंत्र है भैया। आप इतने स्वतंत्र हैं कि आप दुख बनाना चाहते तो तैयार हैं, सुख बनाना चाहते तो तैयार हैं, मित्र बनाना चाहते तो तैयार हैं, शत्रु बनाना चाहते तो तैयार हैं और बने बनाए से उपराम होकर अपने आप में आराम पाना चाहते हो, तभी भी सामान तैयार है यार। तुम्हारी इतनी स्वतंत्रता है। मनुष्य चौरासी-चौरासी लाख प्राणियों से मनुष्य श्रेष्ठ इसलिए माना गया कि यह मन से जैसा चाहे, ऐसा संबंध जोड़ सकता है। इंसान पानी से संबंध जोड़ता है, अपना पानी, अपना कुआं, ईंट चूने से संबंध जोड़ता है, अपना मकान, अपना पंखा, अपना फ्रिज। फ्रिज ने तो नहीं कहा, मैं तुम्हारा हूं। स्कूटर ने कभी नहीं कहा, मैं तुम्हारा हूं। खांड की बोरियों ने कभी नहीं कहा कि मैं तुम्हारी हूं, लेकिन तुम्हारे में इतनी ताकत है ना कि ये खांड हमारी है। यह फैक्ट्री हमारी है, यह कपड़े की दुकान हमारी है, यह हीरे हमारे हैं, यह मोती हमारे हैं, यह कुकर हमारा है, यह प्राइम्स हमारा है। तुम प्राइम्स को अपना बना सकते हो तो परमेश्वर को अपना बनाने में तुम्हारे को क्या मेहनत पड़ती है यार!  यह कपड़ा हमारा है, यह लकड़ा हमारा है, यह खेत हमारा है, यह पेड़ और पौधा हमारा है तो क्या परमेश्वर किसी गैर का है? 

 *इंसान की बदबख्ती अंदाज से बाहर है।* 

 *कमबख्त खुदा होकर बंदा नजर आता है।*


ॐ गुरु ॐ🙏

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