शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

गीता सार - भाग-2 | आश्रम संध्या सत्संग 02-02-2026 सुबह

 




गीता सार - भाग-2 | आश्रम संध्या सत्संग 02-02-2026 सुबह

index 

0:00 साधक के गुण और एकांत का महत्व

0:52 अकेले घूमने और स्वयं से प्रश्न करने की सीख

0:57 केशवानंद स्वामी और घसियान की घटना (कहानी)

1:53 भगवान के लिए तड़प का अभाव

2:03 सुख को बाहर खोजने की भूल

2:48 मन का स्वभाव और जीवन की अटकल

3:03 विवाह और लैला का उदाहरण (कहानी)

4:34 संयोग जन्य सुख और परमात्मा की उपेक्षा

5:29 जो सदा मौजूद है उसे जानने का फल

6:10 परमात्मा का सुलभ और कठिन दोनों होना

6:58 पीठ देकर भागने और मुख फेरने का रहस्य

7:25 कोटि पाप नाश और सत्संग का प्रभाव

7:51 सही मार्ग पर चलने से सामाजिक विरोध

8:54 ईश्वर मार्ग पर चलने से संबंधों की प्रतिक्रिया

9:21 बहुमति और श्रेष्ठ मति का भेद

10:36 अष्टधा प्रकृति और अहंकार

10:51 संयोग जन्य सुखों की श्रृंखला

11:32 परमात्मा की सुलभता और दरिद्रता का भ्रम

12:50 हजारों में कोई विरला तत्व से जानता है

13:00 नारद और मोहिनी प्रसंग (कहानी)

13:30 योग, विकार और तत्व ज्ञान

14:03 अंतःकरण शुद्धि और तत्व जिज्ञासा

15:14 स्वल्प पुण्य और अविश्वास

16:27 तत्व बिना राजा भी कंगाल

16:39 राजा और फकीर की कथा आरंभ (कहानी)

19:26 सोना बनाने की चाह और भ्रम

21:31 उठ बैठ और अहंकार की परीक्षा

24:10 खिलौने से शाश्वत की ओर मोड़

25:09 देह और जगत की निस्सारता (भजन)

26:06 चक्रवर्ती सुख का भ्रम

27:29 मन का गंदा स्वभाव

28:06 आत्म रस तत्व का ज्ञान

29:05 राज्य अर्पण और कृतज्ञता

29:47 राजाओं द्वारा तत्व को अर्पण की परंपरा

30:00 खिलौनों से बहलाने से इंकार

Index Anusaar Description 

0:00 कबीर जी कहते हैं कि साधक ऐसा होना चाहिए जिसमें काम क्रोध लोभ मोह न हो और वह सिंह की तरह अकेला रहने का साहस रखे।

0:08 जैसे सिंह अकेला घूमता है वैसे ही साधक को भी कभी कभी अकेले बैठना और अकेले जीना सीखना चाहिए।

0:15 अंत में सबको अकेले ही जाना है इसलिए अभी से अकेले बैठकर स्वयं को जानना चाहिए।

0:23 अकेलापन भय देता है लेकिन एकांत वह है जहां मन का अंत हो जाए।

0:28 जब एकांत का रस नहीं आता तब मन रेडियो टीवी और व्यर्थ क्रियाओं में उलझता है।

0:46 अकेले बैठो चुपचाप बैठो और घूमने जाओ तो अकेले जाओ और अपने से पूछो कि कौन घूम रहा है।

0:57 केशवानंद स्वामी गुफा से निकलकर टहलने गए और एक घसियान ने पूछा तुम कौन हो जिससे उन्हें आत्म प्रश्न की प्रेरणा मिली (कहानी)।

1:29 उन्होंने समझा कि समाधि की लेकिन तत्व को नहीं जाना और पुनः साधना में बैठ गए।

1:46 शुद्ध बुद्धि वाले से आया उपदेश भी गुरु वचन बन जाता है।

1:53 भगवान के लिए प्यास नहीं है यही सबसे बड़ी कठिनाई है।

1:59 हम सुख और भगवान को कहीं और समझते हैं और बाहर खोजते रहते हैं।

2:17 जो है उसमें तृप्ति नहीं और जो नहीं है उसकी खोज में जीवन निकल जाता है।

2:48 मन मौजूद की फिक्र नहीं करता और जो नहीं है उसी को इकट्ठा करता रहता है।

3:03 विवाह में वर का मुख उतर गया क्योंकि जो चाह थी वह मिलते ही रसहीन हो गई (कहानी)।

4:13 मन का स्वभाव है कि जो नहीं है उससे मोह और जो है उससे उपेक्षा।

4:34 संसार नश्वर है इसलिए उसमें तड़प बनी रहती है और परमात्मा सदा है इसलिए उसकी ओर मन नहीं जाता।

5:29 जो सदा मौजूद तत्व को जान लेता है उसके लिए सब भूमि काशी और सब दिन पर्व बन जाते हैं।

6:10 परमात्मा सरल है क्योंकि सदा साथ है और कठिन है क्योंकि हम पीठ देकर बैठे हैं।

6:58 युगों से भागते हुए भी वह इतना निकट है कि मुंह फेरते ही सामने है।

7:25 उसके प्रति जरा सा मुंह करने से करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं।

7:51 सही सत्संग में आने पर संसार का आकर्षण टूटता है।

8:04 तब संबंधों में खलबली मचती है क्योंकि अहंकार को चोट लगती है।

8:54 जब स्त्री पुरुष दोनों ईश्वर मार्ग पर चलते हैं तो कुटुंब और समाज विचलित हो जाता है।

9:21 अष्टधा प्रकृति की ओर बहुमति है लेकिन तत्व की ओर चलने वालों की श्रेष्ठ मति है।

10:11 अहंकार को बचाने के लिए मनुष्य सब कुछ सह लेता है।

10:36 भगवान कहते हैं यह मेरी अष्टधा प्रकृति है और मैं इससे भिन्न हूं।

10:51 संयोग जन्य सुख इंद्रियों के मेल से पैदा होता है और उसी में मन उलझ जाता है।

11:24 इसलिए तत्व ज्ञान की इच्छा नहीं रहती।

11:32 परमात्मा इतना सुलभ है कि दरिद्र से दरिद्र के पास भी वह मौजूद है।

12:10 तत्व बिना सब अभागे हैं और तत्व मिलने पर सब सौभाग्यशाली।

12:50 हजारों में कोई यत्न करता है और विरला तत्व से जानता है।

13:00 नारद ने अहंकार से कहा मैंने काम को जीत लिया और मोहिनी को देखकर गिर गए (कहानी)।

13:30 योग से विकार शांत होते हैं लेकिन तत्व में विकार होते ही नहीं।

13:48 तत्ववेता न स्वयं को पुण्यात्मा मानता है न पापी।

14:03 शुद्ध अंतःकरण से तत्व जिज्ञासा उठती है लेकिन लोग वहीं रुक जाते हैं।

15:14 जिनके पुण्य कम हैं उन्हें शास्त्र और संत वचन में विश्वास नहीं होता।

16:27 तत्व बिना विश्व का राज्य भी कंगाल है और तत्व से झोपड़ी वाला भी विश्वात्मा है।

16:39 राजा और फकीर की कथा में राजा फकीर को कंगाल समझ बैठा (कहानी)।

17:45 फकीर ने कहा कि मैं ब्रह्म बनाना जानता हूं।

19:26 राजा सोना बनाने की लालसा में आ गया।

21:31 कान पकड़ उठ बैठ से अहंकार की परीक्षा हुई।

24:10 फकीर खिलौने के बहाने शाश्वत देना चाहता था।

25:09 देह मिथ्या है और जगत निस्सार है (भजन)।

26:06 चक्रवर्ती बनने पर भी अहंकार तृप्त नहीं होता।

27:29 मन का स्वभाव है मौजूद की उपेक्षा और अभाव की चाह।

28:06 गुरु कृपा से राजा को आत्म रस तत्व का ज्ञान हुआ।

29:05 राजा ने राज्य पुत्र और पुण्य कर्म गुरु चरणों में अर्पित किए।

29:47 दशरथ और जनक जैसे राजाओं ने भी तत्व के आगे ऐसा ही अर्पण किया।

30:00 संत कहते हैं हम खिलौनों से नहीं शाश्वत से तृप्त करना चाहते हैं।


Manual Transcription 

...कबीर जी कहते हैं 

काम न, क्रोध न, लोभ न, मोह कछु एकल भला अनीह। 

साधक ऐसा चाहिए जैसा बन का सिंह। 

जैसे सिंह अकेला घूमता है, ऐसे ही साधक को भी अकेला-अकेला कभी होना चाहिए। अंत में तो अकेला मरना है। जब अंत में अकेला होना है तो अभी अकेला होकर बैठो। अकेलापन खटकता है, एकांत नहीं खटकता है। एक में ही तुम्हारे मन का अंत हो जाए, वह एकांत है, लेकिन एकांत का मजा नहीं आया तब तक अकेलापन में भय लगेगा। रेडियो चालू करेगा, टीवी चालू करेगा, छापू पढ़ेगा, छापा पढ़ेगा, नहीं तो क्या करेगा? जोड़ा बदलेगा, ये करेगा, वो करेगा, शु बोट करेगा नहीं तो नाक में उंगली घुमाना चालू कर देगा।  कृपा चालू श्री राम!, नहीं, अकेले बैठो, चुपचाप बैठो। घूमने जाओ तो अकेले जाओ और अपने को पूछो कौन घूम रहा है? 

केशवानंद स्वामी सुबह सुबह अपनी गुफा से निकलकर टहलने को निकल गए और किसी खेत में पहुंचे। कोई घसियारण थी, अपने खेत में काम कर रही थी। देखा कि दूर से कोई खेत में घुसा है और जोर से चिल्लाया, 

"अरे कौन हो? कौन हो? कौन हो?"

 केशवानंद ठहरा के अरे! ये पूछ रही कौन हूँ?

 मैंने अपने को पूछा नहीं, मैं कौन हूँ? 

 बोले माँ, तेरा भला! गुफा में समाधि तो किया, लेकिन तत्वों से अभी जाना नहीं। अभी जाता हूँ, जाके बैठता हूँ। कौन हूँ, मैं पूछ के आता हूँ। घसियारण तो अपने ढंग से पूछा, लेकिन बुद्धि शुद्ध थी, पवित्र बुद्धि थी। तो उस घसियारण के उपदेश को भी गुरु के उपदेश का सत् उपयोग करके वो अपने तत्वों को पा लिया। तड़प होना मुश्किल है। भगवान के लिए प्यास नहीं, एक और दूसरा बड़े में बड़ा विघ्न है कि हम भगवान को या सुख को कहीं और जगह समझते हैं। बंबई वाला कलकत्ता में ढूंढता है, कलकत्ता वाला काशी में ढूंढता है, काशी वाला दिल्ली में ढूंढता है, दिल्ली वाला कश्मीर में ढूंढता है, कश्मीर वाला अहमदाबाद खोजता है, अहमदाबाद वाला और कहीं खोजता है। हम समझते हैं कि सुख कहीं और जगह बरस रहा है। अभी जो है, इतने से कुछ नहीं। जिसके पास जो है, उसमें वो तृप्त नहीं है। जो नहीं है, उसकी खोज में है और जो अभी नहीं है, वो बाद में आएगा तो भी नहीं हो जाएगा, ये समझ लेना चाहिए। जे अत्यारे नथी अन पच्छी आवसे, ए पच्छी पाछु कायम ही रहसे नहीं। तो मन की अटकल समझो। मन जो मौजूद होता है, उसकी फिक्र नहीं करता और जो नहीं मौजूद होता है, उसको एकत्रित करने में लगता है और वो हो गया तो फिर दूसरा, तीसरा। ऐसे करते-करते अपना जीवन खत्म कर देता है। 

एक सज्जन की शादी हो रही थी। ब्राह्मण मंत्रोच्चार कर रहे थे। मंगलम भगवानम मंगलम गरुड़ध्वज मंगलम पुंडरिकाक्ष सर्वमंगलायतनो हरि। हस्तमिलाप करा रहे थे। हस्तमिलाप के बाद देखा कि वरराजा का चेहरा उतर गया। ब्राह्मण कुशल था। मुख की आकृति भांप लिया उसने। फेरे वेरे फेरे। बताओ जवान, तुम जब वरघोडा में आए थे, वरघोडा लेकर, उस समय तुम्हारे चेहरे पर जो उत्साह था, जो रौनक थी, जो खुशखबरी थी, जो आनंद लहलहा रहा था, हस्तमिलाप करते ही तुम्हारा चेहरा मुरझा गया। उदास हो गए। बोले, बस ऐसा ही है। जब तक नहीं मिली थी लैला, तब तक लैला, लैला, लैला के चिंतन में मजा आ रहा था। जब मिल गई लैला, तो कुछ नहीं। हस्तमिलाप हो गया ना! लैला मिल गई तो जो नहीं मिलने में जो रुकावटें डाल रहे थे, जो नक्षत्र नहीं मिला रहे थे, वो ब्राह्मण अच्छे थे। तुम कैसे थे कि तुमने मिला दिया? मिला दिया तो मोहब्बत का मजा गायब हो गया। श्री राम। 

तो जो चीजें मन का स्वभाव है, जो चीजें नहीं होती, उसके लिए मोहब्बत होती है और जो चीजें होती है, उसकी फिर कुछ नहीं। तो परमात्मा ऐसा है कि सदा के लिए, इसलिए परमात्मा के तत्वों के लिए तड़प नहीं है और संसार सदा रहता नहीं। इसलिए सुबह से शाम तक धे धमाधम, आटलाई थप्पड़ खा दी, आटली अशांतियों सहन करके आ बदू छोड़ी-छोड़ीन, केटला काका वइज्ञा न दादा वइज्ञा न अपने जावा माटे तैयार छे, तोए एनु ए करिये छे। चाहे सौ-सौ जूता खाएं, लेकिन तमाशा घुस के देखेंगे।  सौ-सौ लफाड़ा पड़े, लेकिन ए दुनिया तू हमारी हो जा, हम हैं तुम्हारे, तुम हो हमारे। परदेसी साथ निभाना, वादा किया है, छोड़ न जाना। केटला वायदा करिया न केटला छोड़ि मरिया छे, कोई साथे लइग्यु नथी कोई नहीं। ओम, ओम, ओम, ओम! लेकिन जो चीजें लामौजूद हैं, जो अभी नहीं हैं, वो बाद में नहीं रहेगी। ऐसा आप समझ लें और जो सदा मौजूद है, उसको जानने के बाद आप सदा के लिए स्वतंत्र सुख के दरिया हो जाते हैं। आप तो धन्य-धन्य हो जाते हैं, लेकिन आपकी जिस पर मीठी नजर पड़ती है, वो निष्पाप हो जाएगा। आप जिस वस्तु को छुएंगे, वो वस्तु प्रसाद बन जाएगी। आपके लिए सब जल गंगाजल हो जाएगा और तुम्हारे लिए सब भूमि काशी हो जाएगी और तुम्हारे लिए सब दिन पूनम के हो जाएंगे। तुम्हारी हर घड़ी दिवाली हो जाएगी, यदि तुमने भगवान के उस तत्व को जान लिया।...आसान में आसान, सरल में सरल और कठिन में कठिन भी है। सरल में सरल इसलिए है कि सदा मौजूद है। हर वक्त, हर हाल में है, हर देश में है, हर घड़ी में है, हर श्वास में उसकी चेतना है, इसलिए सरल है और कठिन इसलिए है कि हम पीठ दिए बैठे हैं। एना सिवा बीजू बदू जोईए! मकान खपे, दुकान खपे, घोट खपे, पुट्ट खप्पन पुटरों खपे, कांच की मस्जिद में नमाज खपे, स्टील के बर्तन खपे, वो खपे, लेकिन खपे, खपे में जीवन खपा देंगे। जिससे खपे, वो उसका कोई पता ही नहीं। श्री राम! इसलिए कठिन है। पीठ दिए भागे जा रहे हैं और सदियों से भागे जा रहे हैं, फिर भी वो इतना नजदीक है कि जब मुंह घुमा लो तो वहीं वहां खड़ा है। हम युगों से उसको पीठ दिए भागे हुए हैं, लेकिन जरा सा फिर उसके तरफ निहारो तो वहीं का वहीं मौजूद है, क्योंकि वो सर्वत्र है। कितना तुम भागोगे? इसलिए करोड़ों जन्म के संस्कार है, करोड़ों जन्म के कर्म है, करोड़ों जन्म के पाप है और आदमी भगवान को पीठ दिए भागे जा रहा है। जब भगवान की तरफ जरा सा मुंह करता है, तो 

कोटि अघ नासहिं तबहि। 

सन्मुख होहिं जीव मोहि जबहि, 

कोटि अघ नासहिं तबहि। 

जब मुझे सन्मुख हो जाता है तो करोड़ों उसके अघ माने पाप नाश हो जाते हैं। क्यों? कि वो इतना साथ में है कि केवल उसके तरफ मुंह कर लिया तो तुम्हारा संसार का आकर्षण खत्म हो जाता है। तुम्हारा संसार का सुख, तुम्हारा संसार की मान्यता, कल्पना की जो भ्रांति है, टूट जाती है। जो सही सत्संग में आ जाता है, जो सही तत्व के रास्ते पर आ जाता है, कोई सही संत के पास पहुंच जाता है, पुरुष, तो स्त्री परेशान होने लगती है कि अरे! बगड़ी गया। बाबा पास्से गया, त्याथी बगड़ी गया। क्योंकि जो अष्टधा शरीर में जो मोह था, अष्टधा शरीर को जो नोच-नोच के जो सुख ले रहे थे, अब वो प्रीति रही नहीं। अगर स्त्री आती है तो पुरुष बोलता है कि मारू बयरू बगड़्यु और पुरुष आता है तो स्त्री बोलती है, मेरा पति बिगड़ा। जब दोनों आने लगते हैं तो कुटुंबी समझते हैं कि ये दोनों बिगड़ गए, क्योंकि पहले तो हमारी गिड़गिड़ाहट करते थे, खुशामद करते थे, हमारे अनुकूल चलते थे, अब इनको कोई परवाह ही नहीं। तुम ज्यों ज्यों सच्चा सुख लेने लगते हो, त्यो-त्यो बाह्य की लापरवाही होने लगती है और लापरवाही होने लगती है तो जिनके साथ तुम्हारा संबंध है, उनके अहंकार को चोट लगती है। अहंकार चाहता है कि हमारे कहने में चले। हमारे अधीन हो, हमारी, हमारे तरफ देखें, हमारे तरफ गिड़गिड़ाहट करें।  स्त्री यदि ईश्वर की तरफ चल पड़ी तो पुरुष को खलबलाहट हो जाएगा। पुरुष चल पड़ा तो स्त्री को खलबलाहट और दोनों चल पड़े तो कुटुंब को खलबलाहट और कुटुंब चल पड़ा तो उनकी जाति वाले, नाते वाले संबंधियों को खलबलाहट और पूरी जाति चल पड़ी तो दूसरी जाति वाले बोले कि आ तो छे जेरा बधा बुगला खातु चले। ओम, ओम, ओम! तो अष्टधा प्रकृति की तरफ भागने वाले अरबों-अरबों लोग हैं, बहुमत उनकी है और इन विचारों के, तत्व की तरफ चलने वालों की बहुमत तो नहीं, श्रेष्ठ मति है। तो श्रेष्ठ मति यदि अपने को बहुमत से मापने जाते हैं, तो भी उनका उत्साह भंग हो जाता है। आटला बधा करे छे, चलो अबे अपने करो दियो। एवे थई जतु छे, एटले के तत्व-वत्व रेवा दो, बापजी नी बात तो साची छे, पण अबे अपने तो लगन में आइसक्रीम खरावो भी पड़े न, कर्जो करी न खरावन तारे बीजू शु सारु ना लागे, नहीं तो के इज्जत रखवी पड़े न समाज में कोनी इज्जत राखो जो केओ नी। और जिसकी इज्जत रखने की कोशिश करते हैं, उसकी तो मौत में बड़ी बेइज्जती हो जाएगी और कर्जा सिर पर चढ़ जाएगा, उसकी चिंता-चिंता में जीवन खराब। लाखों मारे, गाल लाल, छोड़कर इन समाज में फरूज कारण कि आपे तो बैठा न समाज में। तो ये सब सहन कर लेते हैं, क्योंकि अष्टधा प्रकृति का जो अहंकार है, हमारा अहंकार न मरे, पैसा मर गया तो कोई हरकत नहीं। मित्र, हमारा जो पुराना मित्र अहंकार है, वो परमात्मा को पीठ दे तो हरकत नहीं, लेकिन ये अहंकार न मरे। आघात कर लेते हैं, शरीर मर जाए तो वांधा नहीं, लेकिन ईगो न मरे, क्योंकि इस इज्जत से बेइज्जती होती है, इससे तो मर जाना अच्छा है। भगवान बोलते हैं, ये मेरी अष्टधा प्रकृति है। इस अष्टधा प्रकृति से मैं भिन्न हूं। ऐसे मेरे भिन्न तत्व को कोई जान ले। वाह, वाह! ओम, ओम, ओम, ओम। संयोगजन्य जो भी सुख हैं, वो आते तो चैतन्य की सत्ता से हैं, लेकिन हम संयोग से मान लेते हैं तो संयोगजन्य सुख में हमारी रुचि हो जाती है। आंख का और रूप का संयोग, जीभ का और मिठाई का संयोग, शरीर का और शरीर का संयोग, कान का और गीत का संयोग, गंध का और नाक का संयोग, बुद्धि का और बुद्धि के अनुकूल विचारों का संयोग। तो संयोग जन्य सुख में हम इतने उलझ जाते हैं कि वास्तविक तत्व ज्ञान पाने की इच्छा ही नहीं रखते। इसलिए कठिन है, वरना परमात्मा जैसा सुलभ दुनिया में और कोई प्रोग्राम नहीं और परमात्मा को, परमात्मा तुम्हारे पास कुछ भी न हो। दुनिया के सबसे निकम्मे में निकम्मे आदमी को ले आओ, जिसके पास पहनने को कपड़ा न हो, खाने को रोटी न हो, रहने को झोपड़ा न हो, सिर ढंकने तक का एक चीथड़ा न हो। ऐसे आदमी के पास भी इतना मौजूद है कि वो इंद्र को आशीर्वाद कर सकता है। ऐसे आदमी के पास इतना मौजूद है कि सारे विश्व को चेतना दे रहा वो चैतन्य परमात्मा उसके पास मौजूद है। इसलिए दुनिया में दरिद्र खोजना मुश्किल है तत्वरूप से और दुनिया में दुखी खोजना मुश्किल है। सच बात तो यह है कि परमात्मा इतना सुलभ है कि सब लोग परमात्मा पा लेते हैं।...कोई एकाध अभागा रह जाता। बात तो यूं है, क्योंकि उसके पाने के बिना सब अभागे हैं। उस परमात्मा तत्व को पाने के बिना सब अभागे हैं और संसार बड़ा कठिन है। तो कठिन चीज को कौन पाए? जो सुलभ है और सौभाग्यशाली है, तो उसको पा लेना चाहिए। तो सच बात तो यह है कि करोड़ों मनुष्य तो परमात्मा को पा लेते और कोई विरला रह जाता। भगवान बोलते हैं, कोई विरला पाता और करोड़ों रह जाते हैं। जय जय! 

हजारों में कोई यत्न करता है और यत्न करने वालों में कोई विरला मुझे तत्व से जानता है। कृष्ण जान लिया, आशीर्वाद मांग लिया। नारद ने जान लिया, मैंने काम को जीता है। भगवान ने कहा, ठीक है। फिर नारद लौट के आया। विश्वमोहिनी का रूप देखकर, शीलनिधि राजा की बच्ची को देखकर उसका हाथ देखा कि आहा! तेरे को जो वरेगा तो वह त्रिलोकीपति हो जाएगा। इधर हाथ ला, देखें, कैसा? ज्योतिष मारने लगा वहाँ और गया भगवान के पास। भगवान का तत्व नहीं जाना, तभी तो। तत्व नहीं जाना, तभी काम को जीतने का काम को जीता मन ने और मैंने काम को जीता अहंकार ने आरोप लिया। योग करने से, एकाग्रता करने से ये विकार शांत हो जाते हैं। विकार शांत हुए तो मन के हुए। तत्वों में तो विकार है ही नहीं, तो शांत क्या होंगे? उसी लिए तत्ववेत्ता का मन शांत हो, तो अपने को बड़ा नहीं मानते और मन विकसित हो तो अपने को छोटा नहीं मानते। मन से अनुकूल हो जाए तो अपने को पुण्यात्मा नहीं मानते और मन से प्रतिकूल हो जाए तो अपने को पापी नहीं मानते। जो तत्ववेत्ता महापुरुष है। श्लोक को समझ लें कि यतन करने वाले सिद्धि को पाते हैं। अंतःकरण की शुद्धि को काशी में, मिंद्रावन में, मथुरा में, द्वारका में, पंढरपुर में और स्थानों में या घरों में शुद्ध दिल वाले तो होंगे, लेकिन भगवान को तत्व से जानने वाले सब नहीं होते। क्यों नहीं होते? कि लोग वहीं रुक जाते हैं, वहीं संतुष्ट हो जाते हैं और शुद्धि जो है वो सब अष्टधा प्रकृति में है। शुद्धि, अशुद्धि प्रकृति में है। शुद्ध अंतःकरण वाले को तत्वज्ञान की जिज्ञासा हो सकती है। वो तत्वों में प्रवीण हो सकता है, प्रवेश कर सकता है, लेकिन शुद्ध अंतःकरण वाले भी वहीं रुक जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों के संग में आ जाते हैं कि जो अपने से छोटे हैं, वाहवाह करने लग जाते हैं तो उनकी साधना वहां रुक जाती है। तो संयोग जन्य सुख हमें रोक देता है। लोगों की वाहवाह हमें रोक देती है अथवा आहार व्यवहार की लालच और हल्के आहार व्यवहार से हमारी बुद्धि पुण्य वाली नहीं होती। 

स्वल्प पुण्यवतां राजन विश्वासो नैव जायते। 

जिसके पुण्य कम है, उसका तो विश्वास ही नहीं होता। अभागे आदमी को भगवान के वचनों में, संतों के वचन में, शास्त्र में रुचि नहीं होती, विश्वास नहीं होता। संत के करीब बैठकर ध्यान करने की इच्छा ही नहीं होगी। संत के करीब बैठकर भगवान के तत्वों को जानने का मौका ही नहीं मिलेगा। 

स्वल्प पुण्यवतां राजन विश्वासो नैव जायते। 

तो जिनके थोड़े पुण्य हैं, तो थोड़े पुण्य किसके हैं? जो ईंट चूना के मकानों में, घर में, गहनों में, बाहर की वस्तुओं में उलझ गए और बाहर की वस्तुओं को ही सार समझते हैं। हीरा, माणिक, मोती अब क्या है कि जंतुओं की विष्ठा है, देखा जाए तो। और शरीर का सुख क्या है कि माता-पिता का रज वीर्य, अति अत्यंत मलिन चीजें। अब इन मलिन चीजों में आसक्ति होती है तो बुद्धि फिर सुयोग्य नहीं बनती। बुद्धि शुद्ध हो और शुद्ध बुद्धि में 'मैं कौन हूँ?' यह प्रश्न उठे और बुद्धिमान महापुरुष जो हैं, बुद्ध पुरुष, उनका संग हो, तभी तो आदमी तत्व को पाता है। तत्व को जाने बिना सारे विश्व का राज्य किसी के पास है, फिर भी वह कंगाल है, कुछ भी नहीं। और दो टाइम खाने की रोटी नहीं, पहनने को एक चीथड़ा नहीं, रहने को झोंपड़ा नहीं और अगर तत्वों को जानता है तो वो विश्वात्मा है। उसको भगवान राम और लक्ष्मण ऐसे लोगों की पैर चम्पी करते हैं। 'विश्वस्य मित्र इति विश्वामित्र'। एक छोटी सी कहानी है। राजा किसी जंगल में घूमने गया। संध्या के समय लौट रहा था तो देखा कि ओ एक पर्णकुटीर। ऐसे पर्णकुटीर के इसमें फानुस जलाने की जरूरत नहीं पड़ती। चंद्रमा की चांदनी पर्णकुटीर में अपना चमक डाल रही। ढंकने की भी क्षमता नहीं, पर्णकुटीर में रहना है। कौन रह रहा है, इतना दरिद्र! राजा ने घोड़ा खड़ा किया, देखा, आवाज लगाया कौन है? अंदर से एक आया, चीथड़ा पहना हुआ बूढ़ा सा। राजा को दया आई। 

बोला, "ए बूढ़ा फकीर, तू मेरे को माफ करना। मेरे राज्य के जंगल में रहता है ब्राह्मण, गौ ब्राह्मण, पतिपाल राजा होते हैं, प्रजा के रक्षक होते हैं। मैं तेरी रक्षा न कर सका। तेरे खाने पीने की व्यवस्था न कर सका। यह ले कंगन मैं तेरे को देता हूँ। बाकी कुछ चाहिए तो आ जाना राज्य में।" 

तब उस बूढ़े फकीर ने कहा कि जा, किसी कंगाल को दे देना। 

बोलता है, महाराज! मैं देर से तुम्हारी खबर ली, इसलिए तुम नाराज हो रहे हो। अच्छा, यह अंगूठी भी देता हूँ, यह कंगन भी देता हूँ। पैसे नकद पैसे चाहिए तो वहाँ आकर ले जाना। 

बोले नकद पैसे और यह कंगन और अंगूठी और किसी कंगाल को दे देना। 

राजा बोलता है, तुमसे बढ़कर और कोई कंगाल कौन मिलेगा? खाने को तुम्हारे पास मुट्ठी भर आटा नहीं, रहने को एक ठीक से झोपड़ा नहीं, टूटा फूटा झोपड़ा भी ठीक से नहीं, पहनने को वस्त्र नहीं, ओढ़ने को चादर नहीं, बिछाने को बिस्तरा नहीं। तुमसे बढ़कर मैं कंगाल कहाँ खोजने जाऊं?... 

तब उस फकीर ने गहरी आवाज से कहा कि राजा, तू मेरे को कंगाल समझता है? मैं तो सोना बनाना जानता हूं, सोना! सारे विश्व के जो सम्राट हैं ना, वो मेरे आगे कुछ नहीं हैं, बड़े भिखारी हैं। हीरे-जवाहरात क्या हैं? मैं तो ब्रह्म बना देता हूं, जीव में से ब्रह्मा। मैं सोना बनाना जानता हूं। लटकता आए गर्भ में और भगवान के छाती पर खेले, ऐसा बनाना जानता हूं। व्हाट आर यू थिंकिंग अबाउट मी? तू मेरे लिए क्या सोचता है? 

राजा तो वो सूक्ष्म भाषा न समझ सका। लटकता हुआ आवे माता के गर्भ में, भगवान की छाती पर खेलने वाला बनाना जानता हूं लेकिन राजा ये माप गया कि सोना बनाना जानते होंगे, तभी तो इतना नहीं लेते और भाषा में ज्यादा ताकत है। 

राजा गया बोले, हो न हो, लौट के आया। बोले महाराज अच्छा सोना बनाना जानते हैं, तुम मेरे पर कृपा करिए दास पर। 

संत ने देखा कि ये दास अब काम में आ जाएगा, अब काम में आ जाएगा ईश्वर के तरफ चलने के लिए। 

बोले सुबह चार बजे नहा धो के स्वच्छ वस्त्र पहन के आ, तो तुझे सिखाऊंगा सोना बनाना। 

तो राजा गया, रात्रि को नींद कहां आती है? तत्त्व के लिए तड़प नहीं है, सुवर्ण के लिए तड़प है। जय जय! कब सुबह हो, कब सुबह हो, फकीर के दर्शन हो, सोना बनाना सीख लूंगा। फिर क्या करूंगा कि राज्य भर के लोहे को सोना बना दूंगा, पड़ोसी के राज्यों को खरीद कर लूंगा और चक्रवर्ती सम्राट बनूंगा। जब तक सूरज चांद रहेंगे, तब तक हमारे नाम रहेंगे, हमारे कुल की शान रहेगी, आबादी रहेगी, इज्जत रहेगी। 

लेकिन अष्टधा प्रकृति की है ना। न जाने क्या-क्या सोच रहा है, क्या-क्या कल्पनाएं कर रहा है, क्या-क्या संकल्प कर रहा है, करवटें ले रहा है। रात लंबी हो गई। इंतजार होती है ना तो रात लंबी हो जाती है और जहां मन को हर्ष आता है, वहां रात टूंकी हो जाती है। अभी यहां पौने तीन घंटे हुए, लेकिन अभी लंबे नहीं हो रहे हैं। पौने तीन क्लाक को इंटरवल नहीं पड़ा। क्यों? जहां मन को सुख मिलता है, वहां समय फास्ट चलता है और जहां मन को प्रतिकूल लगता है, वहां समय स्लो चलने लगता है। मानो घड़ी मर रही है, अब घड़ी चल ही नहीं रही। 

करवटें लेता-लेता, सपने देखता-देखता क्या हा! मैं गया हूं सोना बनाने को। बाबा जी ने सिर पर हाथ रखा दिया है, कोई पारसमणि दिखा दिया है। सोना आ ढंगले बनाए। आह ये और बनाना और बना, इतना हुआ, इतना हुआ। फिर मैं इतना राज्य लूंगा, फिर मैं यह करूंगा, फिर ये करूंगा, फिर ऐसा करूंगा। क्या-क्या कल्पनाएं करता-करता, खैर रात बिताई। उसने सुबह को स्नान करके और पौने चार बजे बाबा जी के चरणों में पहुंच गया। 

बाबा जी बैठे थे ध्यान में। ध्यान-ध्यान की, पवित्र, शांत वातावरण की लहरें उसको लग रही थी। राजा इंतजार करते-करते एक आध डेढ़ घंटा बैठा। सुबह फूट निकलने को थी। 

उस फकीर ने भी बाहर की आंख खोली। राजा के तरफ मीठी नजर से निहारा। बोले, अच्छा! कल वाला ही है। 

बोले, हां महाराज, पाय लागू हूं। 

क्यों आया बेटा? महाराज, सोना बनाने को आपने कहा था ना, सीखने को। सोना बनाना सीखने को आया हूं। 

बोला, अब ऐसा कर, दोनों कान पकड़। दाएं से, दाएं हाथ से बाया कान पकड़ और बाएं हाथ से दाया कान पकड़ और उठ बैठ कर जितने साल तेरी उम्र है, उतने उठ बैठ कर कि मैं मंगता और तू दाता, मैं भिखारी और तुम शहंशाह। सोना बनाना सीखना है तो पहले ये नियम है। 

राजा ने सोचा मेरी पैंतालीस साल की उम्र है। पैंतालीस उठ बैठ कान पकड़ के किया और सोना बनाना सीख गया तो सौदा तो सस्ता ही है।  

कान पकड़ के उठ बैठ की, मैं मंगता, तुम दाता, मैं भिखारी, तुम सम्राट। 

कल तो उल्टा सूत्र था कि तेरे जैसा दरिद्र मिलना मुश्किल है और अब कह रहा है कि महाराज, तुम स्वामी, तुम सम्राट और मैं दरिद्र। ये किसलिए कर रहा है? तत्त्वों के लिए नहीं कर रहा है, सोना के लिए कर रहा है। उठ बैठ कर रहा है, जरूर कर रहा है, श्रद्धा दिखा रहा है। विश्वास तो है, लेकिन तत्त्वों के लिए नहीं है, पारसमणि के लिए है और जो साथ में परमात्मा है, उसके लिए नहीं। 

पैंतालीस उठ बैठ सुबह के समय शुद्ध हवा में, खुले वातावरण में और फकीर के कुटियाओं के इर्द गिर्द श्वासोंश्वास की प्रक्रिया हो गई। प्राणायाम हो गए महाराज! 

बोले, बैठ बेटा, मैं सोचता हूं, तुझे आज सिखाऊं कि कल सिखाऊं। 

बोले धत महाराज। थोड़ी देर बैठा। 

बोले, आज दिन उग गया। कोई आ जाए, मजा नहीं आएगा। अगर तुझे जरूरत है तो कल सोचेंगे। राजा ने सोचा, महाराज को सताना ठीक नहीं। फकीरों के आगे जिद्द करना अच्छा नहीं होता। इसमें भी कोई भलाई, गए। किसी को कहा नहीं, दूसरे दिन भी आ गए। दूसरे दिन भी बाबा ने बिठाया, उठ बैठ कराई। तीसरे दिन आए। ऐसे करते-करते चार पांच दिन बाबा ने उसको लेफ्ट-राइट कराई। तत्त्वों के लिए तो नहीं कर रहा था, आया था तो खिलौना लेने के लिए, आया था तो कंकड़ लेने के लिए। लेकिन सम्राट को कंकड़ से राजी न रखकर उसको कोहिनूर देना चाहते थे। नश्वर चीज के बहाने बुलाकर उसको शाश्वत के गीत सुनाना चाहते थे। कितने दयालु रहे होंगे वो फकीर!... आ जाना, पांच इतवार बड़ को फेरा फिरना। बाबाजी नौकरी में जरा प्रमोशन नहीं हो रहा है। अच्छा, सात इतवार बड़ को फेरा फिरना। अब प्रमोशन के लिए सात इतवार की जरूरत नहीं, सात सेकंड भी काफी हो जाता है लेकिन इस प्रमोशन में कहीं जीवन न बर्बाद कर ले, इसलिए वो प्रमोशन दिलाना है। सात इतवार बड़ के आएगा तो इधर भी आएगा। श्री राम! पुण्य बढ़ जाएंगे, ज्ञान बढ़ जाएगा, समझ बढ़ जाएगी। ऐसे ऐसे ढंग से तुम लोगों को इकट्ठा किया। बाकी तुम तत्वज्ञान पाने के लिए आए हो, मैं जानता हूँ। 

देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ नीसार। रे गुरु और जगत हुआ निस्सार, 

हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार। हुआ आत्मा से तभी अपना साक्षात्कार। जानने को साधक की कोटी, 

सत्तर दिन तक हुई कसौटी। 

कंचन को अग्नि में तपाया, 

गुरु ने आसुमल बुलवाया। 

ओम, ओम, ओम! ये बाद में करेंगे। 

महाराज दो बार, चार बार आते धीरे धीरे उसका मन थोड़ा सात्विक हुआ। बोले, "तेरे को मैं बनाना तो सिखाऊंगा सोना, लेकिन अब तू थोड़ी देर ध्यान कर।" 

ध्यान करते-करते उसकी थोड़ी बुद्धि विकसित हुई। पूछा कि सोना बनाना समझो मैंने तुझे सिखा लिया, फिर क्या? 

महाराज, फिर मैं पूरे लोहे को सोना कर दूंगा। 

अच्छा हो गया, फिर क्या? 

ये अड़ोस-पड़ोस के राज्यों को अपने अंतर्गत कर दूंगा। चक्रवर्ती बनूंगा। 

समझो, तू चक्रवर्ती हो गया, फिर क्या? 

बोले, महाराज, फिर मजा आएगा, सुखी रहूंगा। 

बेटा, इतना करने के बाद भी तुझे सुखी रहना है। संयोगजन्य सुख है, मैं तुझे असली सुख दे देता हूँ, तू बैठ। इतना मेरा चक्रवर्ती राज इसकी स्मृति करके ये अहंकार को सुख होता है। और अहंकार कभी तृप्त नहीं होगा। चक्रवर्ती नहीं है, तभी तक चक्रवर्ती होने की इच्छा और चक्रवर्ती हो गए तो? दांत जहां नहीं है, वहां जीभ जाएगी। आ गया तो फिर क्या, मजा गया? लैला मिल गई तो फिर क्या?  वरराजा का मुंह उतर गया। 

बोले, क्यों? 

बोले, नहीं मिली थी तब तक लैला के लिए तड़प थी, जो तड़प का सुख था, महाराज बढ़िया था। मैं तो सोचता हूं कि जिनको लैला नहीं मिली है, वो सब भाग्यशाली हैं। मैं भागा, अब मजा चला गया। मेरा मुंह इसलिए उतर गया। और जिनको लैला मिलती है ना, उनके मुंह उतर जाते हैं। हाँ, फिर और औरों की लैला की तरफ भले ताकते रहे, ऐसे-ऐसे करके, लेकिन अपनी लैला उनकी नजर में कुछ नहीं। श्री राम! 

तो मन का एक बड़े में बड़ा, गंदे में गंदा स्वभाव है कि जो मौजूद है, उसकी बेपरवाही और जहां नहीं है, उसको एकत्रित करने लगता है। तो परमात्मा सदा मौजूद है, इसलिए उस तत्व के तरफ मन की... आहा! अभिरुचि नहीं होती। इसलिए भगवान को कहना पड़ा:

 मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। 

बाबाजी ने कृपा करके उसको आत्मरस का, तत्व का ज्ञान दिया। फिर पूछा, बोल बेटा! सोना बनाना चाहता है कि जवाहरात? 

बोले, महाराज, अब तो यह राज्य भी बोझ लगता है, तुच्छ लगता है। अब तो वजीरों से बातचीत करता हूं, तो भी समय खराब होता है, ऐसा लगता है। चक्रवर्ती कई मर गए, मिट गए और मैं भी मरने मिटने की चीजें मांग रहा था। महाराज! तुमने जो कुछ किया, बढ़िया किया। 

उस समय तो तू मेरे को दरिद्र समझता था। बोल, अब तेरे जैसे सम्राटों को महासम्राट बनाने की फैक्ट्री है मेरे पास। 

बोले, बाबा है बाबा, वही कह ल्यो। 

बोले, अब क्या देना चाहता है? पहले तो कंगन दिया, अंगूठी दिया, अब क्या देना चाहता है? 

बोले, महाराज! अब मेरे जो तीन पुत्र हैं, वे, मेरा परिवार, मेरा राज्य और मैं। महाराज, एक बात बोलता हूं कि आप अस्वीकार मत करना, मेरी मजाक मत उड़ाना और क्रोध मत करना, क्योंकि तुमने जो दिया है, वह शाश्वत है, वह तत्व है और मैं जो दे रहा हूं, वह नश्वर है और अतत्व है, अष्टधा प्रकृति है महाराज, इसका मेल नहीं। फिर भी दिए बिना नहीं रहता चित्त। कुछ न कुछ कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए। आंखों में आंसू लाकर, हृदय में भाव लाकर कंठ भर गया है और राजा दंडवत करता हुआ चरणों पर गिर पड़ा कि महाराज! यह राज्य, पुत्र, ऐहिक लोक के शुभ कर्म, परलोक के स्वर्ग के पुण्य कर्म सब आपके चरणों में अर्पित हैं। फिर भी इस तत्व का बदला मैं नहीं चुका सकता। मैं तुम्हारा ऋणी हूं नाथ। ऐसा तत्व है। 

ऐसा का ऐसा वशिष्ठ जी के चरणों में दशरथ राजा ने किया था। जनक राजा ने अष्टावक्र और याज्ञवल्क्य मुनि के चरणों में ऐसा अर्पण किया था। हम वो चीज देना चाहते हैं और तुम बोलते हो कि साईं आजकल मिलते नहीं, बातचीत नहीं करते। हमने जिन-जिन से बात की, उन्होंने खिलौने मांगे। हम खिलौनों से तुमको बहलाना नहीं चाहते।

ॐ गुरु ॐ 🙏

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