शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026

अनहद की हद क्या ? 06-02-2026 सुबह (पढ़ने की हद समझ है, समझने की हद ज्ञान,)

 

अनहद की हद क्या ?. - आश्रम संध्या सत्संग 06-02-2026 सुबह


इंडेक्स  

0:01–0:17 पढ़ने, समझने, ज्ञान और हरि नाम की सीमा
0:26–1:12 कबीर जी और जिज्ञासु का संवाद (कथा)
1:36–2:10 पढ़ने की हद, समझ की हद और ज्ञान की हद का अर्थ
2:15–2:58 नित्य और अनित्य का विवेक
3:07–3:56 स्वतः प्राप्त तत्व और ‘मैं’ का बोध
4:02–4:52 शक्कर और खिलौने का दृष्टांत (उदाहरण)
5:01–5:56 जीवन की अवस्थाएँ और परिवर्तन
6:02–6:59 शरीर, मृत्यु और चेतन तत्व का विवेचन
7:06–7:55 परिवर्तन, निवृत्ति और चिंता का कारण
8:04–8:20 हरि नाम की आंतरिक यात्रा
8:27–9:13 जो सदा है और जो छूटता है उसका विवेक
9:48–10:39 सेठ और चौकीदार का प्रसंग (कहानी)
11:05–11:36 हरि नाम रूपी मानसिक चौकीदार
11:43–12:37 सुख‑दुख का आना‑जाना
12:45–13:57 जीव और ब्रह्म की एकता का बोध
14:04–14:30 दृष्टि दोष और नाम कमाई
14:51–15:59 अनुष्ठान और अहंकार की भ्रांति
16:07–16:45 स्वतः निवृत्ति का क्रम
16:54–17:35 क्रोध, वृत्ति और साक्षी भाव
17:48–18:33 देखने वाला कभी नहीं जाता
19:00–19:52 स्वतः सिद्ध आत्मा और प्रकृति
21:02–22:55 बहू और सास का उदाहरण (कहानी)
23:01–24:32 अनुमता भाव और साक्षी अवस्था
24:49–25:28 संतुलित जीवन की सीख
26:03–26:45 भावना और विचार का संतुलन (कथा)
27:01–27:27 कर्म, प्रवृत्ति और निवृत्ति
27:40–28:20 आकाश और मेघ का उदाहरण
28:35–29:13 स्वतः सिद्ध और स्वतः निवृत्त तत्व
29:20–30:57 आत्मा‑परमात्मा की पहचान और निष्कर्ष

पैराग्राफ  इंडेक्स अनुसार 

0:01–0:17 सत्संग में कहा गया कि पढ़ने की एक सीमा है, समझने की भी सीमा है, और जब समझ परिपक्व होती है तो वही ज्ञान बनती है। ज्ञान की अंतिम सीमा हरि नाम है, जहाँ बौद्धिक यात्रा पूर्ण होती है।

0:26–1:12 काशी गंगा तट पर कबीर जी के पास एक जिज्ञासु आता है और अनहद ज्ञान की चर्चा करता है। कबीर जी बताते हैं कि अनुभवी पुरुष अनहद की सीमा को प्रत्यक्ष अनुभव से जानते हैं। (कथा)

1:36–2:10 कबीर जी स्पष्ट करते हैं कि पढ़ने की हद समझ है, समझ की हद ज्ञान है और ज्ञान की हद हरि नाम है। यही साधना का क्रम है।

2:15–2:58 संसार में जो नित्य है वह सदा प्राप्त है और जो अनित्य है वह स्वतः निवृत्त हो रहा है। नित्य में जाग जाना ही साधना की सिद्धि है।

3:07–3:56 ‘मैं हूँ’ इसमें कभी संदेह नहीं होता। शरीर और पहचान बदलती है, पर ‘हूँ’ का बोध स्वतः सिद्ध रहता है।

4:02–4:52 शक्कर और उसके खिलौने का उदाहरण देकर बताया गया कि रूप टूटते हैं पर मूल तत्व बना रहता है। (उदाहरण)

5:01–5:56 जीवन की सभी अवस्थाएँ आती‑जाती हैं। बाल्य से वृद्धावस्था तक सब परिवर्तनशील है।

6:02–6:59 मृत्यु के बाद शरीर रूप बदलता है, पर चेतन तत्व नष्ट नहीं होता। परिवर्तन माया का है, चेतना शाश्वत है।

7:06–7:55 जो छूट रहा है उसी को पकड़े रहने से चिंता है। जो कभी नहीं छूटता उसी में टिकना शांति है।

8:04–8:20 हरि नाम पहले जिह्वा पर, फिर हृदय में और अंत में अर्थ में रम जाता है। यही नाम की पूर्ण यात्रा है।

8:27–9:13 जो सदा है उसकी उपेक्षा और जो जा रहा है उसकी पकड़ ही दुख का कारण है।

9:48–10:39 सेठ और चौकीदार की कथा में बताया कि बाहरी धन की रक्षा है पर भीतर के गुणों की नहीं। (कहानी)

11:05–11:36 हरि नाम ही भीतर का चौकीदार है, जो सद्गुणों की रक्षा करता है।

11:43–12:37 सुख‑दुख दोनों आते‑जाते हैं। देखने वाला सदा स्थिर रहता है।

12:45–13:57 जीव और ब्रह्म अलग नहीं हुए, केवल भ्रांति से अलग माने गए।

14:04–14:30 दृष्टि के दोष से दूरी प्रतीत होती है। नाम कमाई से दैवी गुण जागते हैं।

14:51–15:59 अहंकार से किए अनुष्ठान जीवभाव को मजबूत करते हैं।

16:07–16:45 प्रकृति स्वतः निवृत्त हो रही है, उसे छोड़ने का प्रयास नहीं करना पड़ता।

16:54–17:35 ज्ञानी साक्षी भाव में रहकर क्रोध भी करे तो वह हितकारी होता है।

17:48–18:33 वृत्तियाँ आती‑जाती हैं, पर देखने वाला नहीं जाता।

19:00–19:52 आत्मा स्वतः सिद्ध है और प्रकृति प्रवृत्ति‑निवृत्ति में है।

21:02–22:55 बहू‑सास की कथा से समझाया कि संसार के काम कभी पूरे नहीं होते, केवल बदलते हैं। (कहानी)

23:01–24:32 अनुमता भाव में टिकना ही सच्ची साधना है।

24:49–25:28 न अधिक प्रवृत्ति, न आलस्य — संतुलन आवश्यक है।

26:03–26:45 केवल भावना अंधी है और केवल विचार रूखा। दोनों का संतुलन चाहिए। (कथा)

27:01–27:27 कर्म चाहे जैसे हों, अंत में निवृत्ति निश्चित है।

27:40–28:20 आकाश और मेघ के उदाहरण से आत्मा की अछूती अवस्था समझाई गई।

28:35–29:13 स्वतः निवृत्त प्रकृति और स्वतः सिद्ध परमात्मा का भेद स्पष्ट किया गया।

29:20–30:57 निष्कर्ष यह कि आत्मा और परमात्मा एक हैं। इस बोध में टिकना ही ईश्वरत्व, संतत्व और शांति है।


MANUAL TRANSCRIPTION 

पढ़ने की हद समझ है। 

पढ़ने की हद समझ है, समझने की हद ज्ञान, 

ज्ञान की हद हरि नाम है, यह सिद्धांत उर आन। 


काशी गंगा किनारे, कबीर जी के चरणों में एक साधक आ गया, जिज्ञासु। 

जिज्ञासु ने कहा, "महाराज! ज्ञान का तो कोई अंत नहीं है, ज्ञान तो अनहद है। अब अनहद की कोई हद कोई नहीं बता पाता है।" 

कबीर ने कहा, "भाई! विद्वान भले अनहद की हद न बता पाए, लेकिन अनुभवी पुरुष अनहद की हद बताने में देर भी नहीं करते।

हद तपे सो ओलिया, बेहद तपे सो पीर। 

हद बेहद मैदान में सोया दास कबीर।" 

"महाराज, हम समझे नहीं। कृपा कीजिए, अपने ज्ञान के रहस्य को हम समझ पाएं, उस ढंग से वर्णन करने की विशेष कृपा करिए।" 


बोले, पढ़ने की हद समझ है। तुम सब भी पढ़ो तो उसकी हद क्या है कि समझ आ जाए, जो पढ़े हो, समझे विषय को, उस सिद्धांत को। 

पढ़ने की हद समझ है। समझ की हद ज्ञान, 

समझ की हद है कि जहां से समझ आती है, उसका ज्ञान हो जाए। 

ज्ञान की हद हरि नाम है, यह सिद्धांत उर आन। 

ज्ञान हो जाए कि यह प्रकृति है, यह अनित्य है और यह नित्य है। तो जो नित्य है, सदा प्राप्त है, स्वतः प्राप्त है, सबको प्राप्त है, सदा के लिए प्राप्त है, जो नित्य है और जो अनित्य है, उसकी स्वतः निवृत्ति है, सदा निवृत्ति और सबके यहां से निवृत्ति है। अनित्य निवृत्त हो रहा है और नित्य सदा प्राप्त है। इस हरि के नाम में, हरि की निष्ठा में, नित्य में जग जाए तो हो गया सब काम। 


एक है स्वतः प्राप्त तत्व, सदा प्राप्त है परमात्मा, आत्मा, स्वतः प्राप्त तत्व और दूसरा है सहज निवृत्त तत्व। तो सहज में निवृत्त तत्व जो है, वो प्रकृति का है। और स्वतः प्राप्त तत्व जो है, वो परमात्मा है। मैं हूं कि नहीं, ऐसा कभी नहीं होता। फलाना है कि नहीं, संदेह होगा। फलाना देवता था कि नहीं या है कि नहीं, संदेह होगा, लेकिन मैं हूं कि नहीं, संदेह नहीं होगा, मैं हूं। तो मैं, मैं मनुष्य हूं, यह प्रकृति है, लेकिन हूं, वो स्वतः पुरुष प्राप्त है। यह पृथ्वी है, तो पृथ्वी प्रकृति है, लेकिन उसमें जो 'है' पना है, वो स्वतः चैतन्य है। यह शक्कर का खिलौना है और शक्कर को तोड़ फोड़ दिया तो खिलौना टूट गया। चाशनी बना दी तो शक्कर भी हट गई लेकिन शरबत है, चाशनी है, 'है' पना। खा लिया तो पेट में, खुराक है तो रक्त है। इसका हिस्सा त्याग दिया तो खाद है, कचरा है। तो है जो है, स्वतः रहता है। तो एक है स्वतः प्राप्त जो अपना आत्मा परमात्मा और दूसरा है प्रकृति। उसमें प्रवृत्ति होती है और निवृत्ति भी होती जाती है। जैसे बालक जन्मा... दो वर्ष तक उसे शिशु कहते हैं, पांच वर्ष तक वो कुमार है। दस वर्ष का हुआ, पौंगड हुआ। पंद्रह वर्ष का हुआ, दस से पंद्रह वर्ष तक किशोर हो गया। पंद्रह से तीस वर्ष की उम्र तक वो युवा माना जाता है। कोई पच्चीस, पैंतीस भी मान लेते हैं। तीस से पचास तक प्रौढ़ माना जाता है। पचास के बाद बुढ़ापा माना जाता है। तो यह शिशु है, यह कुमार है, पौंगड है, किशोर है, युवा है, प्रौढ़ है। बोले मर गया, तो मर गया है, तो स्वर्ग में है, नर्क में है। ...... उसका शरीर मर गया तो मुर्दा है। मुर्दे को जला दिया तो हड्डियां है, राख है। राख और हड्डियों को कहीं गाड़ दिया तो खाद है। तो उसमें जो अस्ति तत्व है, वह चेतन का है और परिवर्तन जो है, वो ऊपर से माया का है। 

तो ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' (बृहदारण्यक 4। 4। 6)। 

वृहदारण्यक उपनिषद में लिखा है। ये ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म स्वरूप। 

"ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।" मुण्डकोपनिषद् (3.2.9)। 

तो जो सदा है, स्वतः प्राप्त है परमात्मा, आत्मा लेकिन चिंतन होता है, जो परिवर्तन है, उसमें सत्य बुद्धि है और जो स्वतः सदा है, उसमें प्रीति अथवा सजगता नहीं है। लहरों पर लहरें हैं, सारा परिवर्तन हो रहा है। कितना भी संभाल के रखो, ये फूलों की माला को संभाल के रखो, परिवर्तन होगा। मकान को, घर को, शरीर को, बाल्यकाल को सबको संभाल के रखो, नहीं परिवर्तन होता है। जिसका परिवर्तन होता है, वह निवृत्त भी हो रहा है। मैं ये कैसे छोडू? मेरे को छूटता नहीं है। अरे तुम छोड़ो नहीं, छूटता जा रहा है। जो नहीं छूटता उसको याद नहीं करते। जो नहीं छूटता उसको जानते नहीं है। इसीलिए चिंता है, परेशान है कि ये मेरा तकलीफ कैसे छूटे, ये फलाना कैसे छूटे। जो छूट रहा है वो छूट रहा है और जो कभी नहीं छूटता है वो आनंद स्वरूप है, प्रेम स्वरूप है, ज्ञान स्वरूप है, शांत स्वरूप है, स्वतःसिद्ध है। इस प्रकार के ज्ञान में निष्ठा आ जाए तो:

पढ़ने की हद समझ है, समझ की हद ज्ञान, 

ज्ञान की हद हरि नाम है। 

शुरू में हरि नाम उच्चारण करते, फिर होठों में चलता है, फिर हृदय में ओमकार अथवा राम, फिर उसके अर्थ में मन रमण करने लग जाता है। ये हरि नाम की यात्रा पूरी हुई। तो जो है वो है और जो निवृत्त हो रहा है, वो निवृत्त हो रहा है। तो 'है' में टिक जाए। 'है' सदा है, सदा था, सदा है, सदा रहेगा। 'है' में टिकते नहीं। और जो सहज निवृत्त हो रहा है, उसकी सत्य बुद्धि मिटाते नहीं। अरे ये चला गया, अरे ये आ जाए, यो हो जाए। जो चला गया वो चला जाएगा। आ जाएगा, वो भी चला जाएगा। लेकिन जो सदा है, उसकी प्रीति, उसकी जानकारी नहीं है। 

सो साहिब सद सदा हजूरे। गुरुवाणी में लिखा है।

सो साहिब सद सदा हजूरे 

अंधा जानत ताको दूरे।

सो प्रभु दूर नहीं, प्रभु तू है। जो 'है' वही प्रभु है, वही चैतन्य है, विमल है, सहज सुखराशि है, वही शाश्वत है और वही सभी में मैं, मैं, मैं, मैं। मैं मोहन, मैं कन्हैया, मैं मोड़ासा वाला, मैं मधुसूदन, मैं गोपीचंद, मैं फलाना ये गोपीचंद, ये फलाना ये माया के शरीर का नाम है। लेकिन जहां से 'मैं' उठता है, 'मैं' हूं, हूं तत्व चैतन्य। एक सेठ को हुआ कि बाबाजी को कैसे भी करके घर में पदचिन्ह पड़वा दो। बाबाजी को रिझाया और संत महाराज, इतना मकान ये वो!


बोले, इतना सारा तुम्हारी जायदाद है तो कोई चौकीदार-वौकीदार है कि नहीं? 

बोले महाराज, देखो ये सब चौकीदार रखे हैं। चौकीदार नहीं हो तो इतनी मिलकत की रखवाली कौन करेगा महाराज। चौकीदार के सिवाय तो लोग दिन दहाड़े उठाकर ले जाएंगे। 

बोले, ये बाहर के धन जो निवृत्त हो रहे हैं, उसको संभालने के लिए चौकीदार रखे हैं और जो सदा रहे, उस धन के तरफ लुटेरे लगे हैं, उस धन का तुमको पता नहीं चलने देते। उधर कोई चौकीदार नहीं रखा क्या? 

महाराज मैं समझा नहीं 

तो बोले, तुम्हारी शांति चुरा के ले जाते, तुम्हारी सज्जनता चुरा के ले जाते, तुम्हारा स्नेह चुरा के ले जाते, तुम्हारा रस चुरा के ले जाते, तुम्हारा आनंद चुरा के ले जाते, तुम्हारा माधुर्य चुरा के ले जाते। उनको भगाने के लिए तुमने हरि नाम का, राम नाम का चौकीदार नहीं रखा क्या? भगवनंनाम स्मरण नहीं होगा तो ये सद्गुण चुराकर ले जाएगा अहंकार, अज्ञान। इसलिए सतत मानसिक चौकीदार अर्थात् भगवन्नाम का स्मरण, ताकि तुम्हारे सद्गुणों की सुरक्षा रहे। जैसे धन, धान्य, माल, मिलकत की रक्षा करने के लिए चौकीदार रखते हैं, ऐसे ही सजग अंदर से रहने के लिए हल्के विचारों के द्वारा जो परिवर्तित हो रहा है, उसमें मन चला जाए तो जो सदा रहता है, उसमें कैसे टिके? तो सावधानी रखें। सुख आता है तो आता है तो जाता नहीं कि अरे, जब आता है तभी से जाना शुरू होता है और दुख आता है तो नहीं जाता। जब दुख भी आता है तो जाना शुरू होता है। पति मर गया। उस समय जो दुख हुआ, दो घंटे के बाद वैसा दुख नहीं रहता और दो महीने के बाद तो बेटे की शादी में दुल्हा की मां होकर नाच रही है। मिठाई खा रही है, बांट रही है, बधाइयां ले रही, दे रही है। तो सुख आता है तो जाता है, आता नहीं है, सुख पसार होता है, आता नहीं है। दुख आता नहीं है, पसार हो रहा है तो दुख भी पसार हो रहा है। ऑल इज पासिंग थ्रू। तो सुख भी पसार होता है, जीवन में से दुख भी पसार होता है, चिंता भी पसार होती है। हम देखने वाले हैं और यह जाने वाले जाते हैं तो सतत निवृत्त हो रहे हैं। सुख भी निवृत्त हो रहा है, दुख भी निवृत्त हो रहा है। पुण्य का फल भी निवृत्त हो रहा है, पाप का फल भी निवृत्त हो रहा है क्योंकि पुण्य और पाप प्रकृति में है, अपने जीवात्मा के शुद्ध स्वरूप में नहीं। तो बोले जीवात्मा और परमात्मा, जीव और ब्रह्म की एकता हो जाती है महाराज । समझाने के लिए कहा जाता है। वास्तव में जीव और ब्रह्म की एकता नहीं होती। तो चलो जैसे भाई, पति-पत्नी गले लग गए अथवा दूध और पानी एक हो गए। ऐसा नहीं कि जीव और ब्रह्म, जीव और ईश्वर एक हो जाते हैं। हकीकत में जीव का जो अलग दिखना था, अलग मान्यता थी, वो मिट गई। एक तो पहले थे, बोले सागर और तरंग एक हो गए। तो जब तरंग थे, तभी भी तो सागर में ही थे और सागर का ही स्वरूप है। बोले तरंग और समुद्र का पानी एक हो गया। अरे भैया, समुद्र का पानी और तरंग का पानी एक हो गया, ये तुम्हारी नजरों में है। बाकी समुद्र और तरंग दोनों एक ही तो थे। ऐसे ही जीवात्मा और परमात्मा एक ही थे, एक ही हैं, एक ही रहेंगे लेकिन शरीर को 'मैं' मानकर बदलने वाली चीजों से मेरापन मानकर जीवात्मा भूल बैठा है। इसीलिए वह जीवात्मा बन गया। जीने की इच्छा, उसकी धीरे धीरे अज्ञान से बेवकूफी हटेगी तो बोलेगा अरे! वो थे, न मुझसे दूर, न मैं उनसे दूर था। आता न था नजर तो नजर का कसूर था। नजर नहीं थी, सूझबूझ नहीं थी। तो नाम कमाई सद्गुण भरती है। दैवीय गुण भरती हैं तो उस देव की यात्रा में सफल होता है जी। तो यह बात पक्की हो जाए, काम बन जाए, कल्याण हो जाए। अब अपने मन में जैसा आया, ऐसे अनुष्ठान करने बैठ जाएंगे, मूंग खाएंगे अथवा फलाना खाएंगे या फलाना खाएंगे। ये सब जानकार हैं। देश विदेश में जाते हैं, लेकिन जैसा मन में आता है, ऐसे ही अनुष्ठान करते रहते हैं। तो क्या होगा कि अपने को थोड़ा विशेष जानकार मानेगा। जीवत्व की भ्रांति बनी रहेगी। मैंने इतने अनुष्ठान किए, मैं बापूजी के साथ पंद्रह साल पहले हरिद्वार से वो बद्रीनाथ की यात्रा मैंने की थी। आज मैंने बहुत याद किया था देखो, तो अपने को बापूजी की बात आ गई, वो भी हो गई। तो यह चतुराई और व्यक्तित्व जब तक ज्ञानी महापुरुषों का संपर्क नहीं होता, तब तक शरीर की आकृति और परिच्छिन्नता मिटती नहीं। जो बदल रहा है, उसको याद करके पक्का कर रहे हैं और जो अब बदल है, उसका स्मृति ही नहीं कर पाते हैं। तो स्वतः प्राप्त है परमात्मा और स्वतः निवृत्त है प्रकृति, स्वतः निवृत्त है सुख, स्वतः निवृत्त है दुख, स्वतः निवृत्त है बाल्य अवस्था, स्वतः निवृत्त है शिशु अवस्था, स्वतः निवृत्त है कुमार अवस्था, पौंड अवस्था। फिर दस से पंद्रह साल किशोर अवस्था, वो भी निवृत्त हो गई। आप निवृत्त करने थोड़े बैठते हैं और तीस के बाद पचास वर्ष वो प्रौढ़ अवस्था, पचास के बाद पचास वर्ष आपने बिताए क्या बीत रहे हैं? तो ऐसे ही पचास वर्ष बीत गए। तीस वर्ष बीत गए, ऐसे सुख बीत गए, दुख बीत गए सब। 

तो पढ़ने की हद समझ है, समझ की हद ज्ञान, 

ज्ञान की हद हरि रस है, हरि की अनुभूति है यह सिद्धांत उर जान। 

अर्थात् जो स्वतः सिद्ध तत्व है, उसमें टिक गये, उसमें सावधान रहे हैं। और क्रोध आ जाए तो उस समय देखो कि क्रोध आया है, आया है। अब कितना करो, आपके हाथ की बात। उसमें सजाग रहो। भले क्रोध आया, आपको करना है तो कर भी दिया, लेकिन उस समय देखे भी रहे कि यह स्वतःसिद्ध में देखने वाला और यह आया है तो जाने वाला है तो क्रोध में अनर्थ नहीं होगा। जिस पर करोगे, उसका भी हित होगा और आपका भी होगा। लेकिन आप स्वतःसिद्ध तत्व में नहीं टिके तो क्रोध की तपन आई। आपको हानि हुई तो उसको भी हानि होगी। ज्ञानी का क्रोध तो दूसरे के हित के लिए होता है। ऐसे ही चिंता आई और गई, दुख आया गया। किसी ने ऐसा कह दिया और वह तो कहीं गपशप लगाता है और अपने याद करते-करते हश करते रहे। तो जो सदा टिका है, उसमें नहीं टिकते। जो आई थी बात दो दिन पहले, पांच दिन पहले उसको याद करके अभी जो सदा है, उसका अनादर कर रहे हैं। ऐसा हो गया..ओह... तो स्वतः तित, स्वतःसिद्ध है परमात्मा, स्वतःसिद्ध है मैं। मैं हूं, अब मैं काला हूं, मैं गजानन हूं, मैं फलाना हूं। ये, ये बदलने वाले शरीर का नाम है। अब मैं जवान हूं, मैं बूढ़ा हूं। हूं तो पक्का है, लेकिन बूढ़ा और जवान है परिवर्तित। हूं तो पक्का है, लेकिन दुखी हूं तो दुखाकार वृत्ति आई तो गई, सुखाकार वृत्ति आई तो गई, शांत वृत्ति आई तो गई, विक्षिप्त वृत्ति आई तो गई लेकिन उसको देखने वाला कब गया? तो स्वतः प्राप्त जो है वह परमात्मा है आत्मा और सहज में जो प्रकृति में प्रवृत्ति हो रही है और प्रवृत्ति में निवृत्ति हो रही है। सहज जो प्रवृत्ति हो रही है, सब में रक्त में, इसमें, उसमें, प्रकृति में तो प्रवृत्ति है ही और जो प्रवृत्ति हो रही है तो प्रवृत्ति हो हो के निवृत्ति भी हो रही है। जो फला सो झरा, जो जन्मा सो मरा, जो मिला सो बिछड़ा। कितना भी लाख संभालो, लेकिन जो मिला है वो बिछड़ेगा। जो फला है, वो झरेगा, फल गिरेगा। जो आया है वो जाएगा, लेकिन स्वतः सिद्ध जो तत्व है, आत्मदेव 'मैं' वो सदा रहता हूं। इसलिए ईश्वर पाना तो इतना सरल है। वशिष्ठ जी कहते हैं कि फूल, पत्ते और टहनी को तोड़ने में परिश्रम है। अपने आत्मदेव को जानने में क्या परिश्रम? जान तो लेते हैं उपदेश मात्र से, लेकिन उसमें टिकने का सात्विक बुद्धि, दृढ़ निश्चय, सजगता, ऐसी प्यास । तो सुनते-सुनते, विचार करते-करते, जग-जगत की थप्पड़ खाते, खाते लगता है कि तत्वज्ञान के बिना परमात्मा ज्ञान के बिना भगवत प्रीति, भगवत जप, भगवत ध्यान, भगवान के लिए सत्कर्म ये साधना है लेकिन सिद्ध अवस्था है कि जो स्वतः प्राप्त तत्व है वो है और जो सहज निवृत्त तत्व है, वो प्रवृत्त होते होते निवृत्त होता रहता है। यह सिद्ध अवस्था में चले गए। 

शूरमा होकर युद्ध करो, लेकिन हृदय से शिला कि नाईं रामजी दृढ़ रहो। जो जो स्वतः तत्व सिद्ध है, वो है। कितनी ऊंची बात कह दी वशिष्ठ महाराज ने। अष्टावक्र कहते हैं कि जनक जो धन मिल गया, सो मिल गया। जो खो गया सो खो गया। तो आने जाने वाली चीज है तो अभी स्वतः- ऐसा दुनिया में कौन है कि जिसके सारे कार्य पूरे हो गए। हे राजा जनक! ऐसा कौन है जिसके सब काम पूरे हो गए। और बहूरानी सासू की चरणचंपी कर रही हैं। बेटा सब काम पूरे हो गए, बोले सासू जी! आज तो मैंने भोजन बनाया ना और सबको खिला भी दिया, कुछ बचा भी नहीं और बर्तन भी मांज दिए। अच्छा बेटी, अच्छा किया। और बबू के बापू को खांसी हो गई थी तो मैंने थोड़ा सा गुड़ और जरा सा दो चार काली मिर्च का काढ़ा बनाकर आज रविवार है ना, इसलिए तुलसी के पत्ते तो नहीं देने चाहिए रविवार को, तो ऐसे ही काढ़ा दे दिया। वो काढ़ा दिया और उनकी खांसी में भी शांति है, वो भी सो गए। अच्छा तो काढ़े की तपेली भी, अरे! वो भी मांज कर रख दी तो कोई काम बाकी नहीं है। अच्छा बेटा जाके सो। 

बोले, नहीं सासू जी, थोड़ा पैर चंपी करें। 

अच्छा तो पैर चंपी भी करती जाओ और आराम भी करती जाओ। झोंके आए तो अच्छा जा सो जा, कोई काम बाकी तो नहीं। 

बोले, नहीं। 

सुबह उठी सासू जी । बहू से पूछा, बेटा कोई काम बाकी तो नहीं है।

बोले, सासू जी सब बाकी है। बच्चों को नहलाना, स्कूल में भेजना, गाय दुहना, चराना, रसोई बनाना, आपके सुपुत्र के कपड़े अभी प्रेस करना बाकी है, सब काम बाकी है। 

अब रात को तो सारा काम पूरा करके सोई, सुबह सब काम बाकी है। अखो कहे अंधारो कुओ झगड़ो मटाड़ी कोई न होउ। जगत के कार्य कोई पूरे हो गए क्या सबके? निवृत्त हो रहे हैं, पूरे नहीं हो रहे हैं। निवृत्त हो रहे हैं। हो होके निवृत्त हो रहे हैं, हो होके निवृत्त हो रहे हैं। कोई कैसे, कोई कैसे निवृत्त हो रहे हैं। तो स्वतः सिद्ध है आत्मा और स्वतः प्रवृत्त में से निवृत्त हो रहा है प्रकृति। 


प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। 

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते॥ (गीता 3.27)


देह को मैं मानकर जो अहंकार हो गया, वो अपने इंद्रियों के शरीर की प्रवृत्ति-निवृत्ति को अपना प्रवृत्ति, अपना कर्ता, भोक्ता मानता है, अहंकार से विमूढ़ हो गया, अपने को कर्ता मान रहा है। हकीकत में कर्ता नहीं है, कर्ता भी नहीं, भोक्ता भी नहीं। कुछ लोग अपने को भोग्य बना लेते हैं। ऐसा रूप, ऐसा आराम, रोगन करके घूमे तो लोगों का हमारे तरफ ध्यान जाए। तो लोग हो गए भोक्ता और हम हो गए उनके भोग्य। ना आप किसी के भोक्ता बनो, न आप किसी के भोग्य बनो, आप अनुमंता रहो। जो सहज निवृत्त एक रस तत्व है, शाश्वत तत्व है। अनुमंता स्वतः प्राप्त तत्व, अनुमंता। इसमें सजाग रहा बड़ा बहादुर। इसमें टिक गया, टिकने का अभ्यास करता है। जैसे एक श्वास लिया और वापस आया तो बीच की जो... एक जरा सी सेकंड आधी सेकेंड क्षण है, वह स्वतः 'है' तत्व है, वो परमात्मा हैं, परम आत्म अवस्था। ये सदा प्राप्त तत्त्व है। जो बदल रहा है, वो सदा निवृत्त तत्व है। इसका अभ्यास करें दीर्घकाल। बुद्धि थोड़ी सूक्ष्म हो, पवित्र हो। आहार व्यवहार सात्त्विक होता है, पवित्र होता तो कोई कठिन नहीं है, इतनी प्रवृत्ति न करें संसारी कि अपने को थका दे और इतना आलसी न हो कि तत्व के विचार करने की योग्यता ही मर जाए। सजाग। इतना भावुक न रहे कि भाई ऊंची बात समझने की घड़ियां आए तो भावना में बैठ जाए और इतना खाली रूखा भी न रहे कि भाव रस से कंगाल रह जाए। एक माई थी बड़ी भावना वाली, गुरुजी कब आए, घर कब आए, कब आएं? पति पत्नी ने गुरू को रिझाते रिझाते हां भरवा दी, गुरुजी घर पधारे। आए,  क्या-क्या व्यंजन बने गर्मी के दिन! गुरूजी को भोजन परोस रही है कि अब मैं अपने हाथ से गुरु जी को पंखा । गुरुजी खीर कैसी? बोले बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया हुई। गुरुजी ये कैसा हुआ, सब भोजन भी अच्छा बना है। गुरुजी भी संतोष हैं, मैं कैसी भाग्यशाली। ऐसे करते-करते भाव भाव में मैं कैसे भाग्यशाली हूं। भाव में ऐसा भाव चढ़ गया कि धपाक से गिर पड़ी थाली में। गुरुजी की दाढ़ी में खीर लग गई और धोती तो....और कोई पूड़ी उधर गई तो सब्जी उधर गिरी, यह हो गया। अब गुरुजी को भोजन कराया कि मुसीबत कर दी। भावना तो ठीक है लेकिन भावना के साथ-साथ विचार शक्ति भी होगी। अकेला विचार रूखा हो जाएगा, अकेली भावना अंधी हो जाएगी। भावना के साथ विचार, विचार के साथ भावना और उसमें फिर सावधानी से सत्कर्म । सत्कर्म भी निवृत्ति के लिए है। सत्कर्म करके अपना फायदा लेने की वासना होगी तो प्रवृत्ति बढ़ेगी। सत्कर्म करके जो सदा निवृत्ति है, प्रवृत्ति करके भी निवृत्ति हो जाएगी और एकदम निवृत्त हो गए तब भी निवृत्त हो जाए。 कितने ही कर्म करेंगे, प्रवृत्ति करेंगे, तभी भी आखिर तो निवृति आएगी और निवृत्ति के लिए करेंगे, तब भी निवृति आएगी। बहुत ऊंची बात है। 

पंचदशीकार ने लिखा है: ऐसा ज्ञान हो गया तो फिर कैसा अनुभूति होगी अंदर में? 

'माया मेघो जगन्नीरम'

माया रूपी मेघ है और जगत रूपी जल है जैसे तैसे बरसे, मेरे को क्या है? 

'महाकाश टिका हानि लाभं अपिका विद्यते। 

माया रूपी मेघ कैसे भी बरसो, जगत रूपी पानी महाकाश को क्या हानी, क्या लाभ? फलानी जगह बाढ़ आ गई, तापी के पानी बढ़ गए, साबरमती में पूर आ गया फलाना लेकिन आकाश को कौन डुबा सका? ऐसे ही प्रलय में भी जो नहीं मिटता वो हम हैं। प्रलय हो जाए, बारह सूरज टपके जाए, शरीर जल के खाक हो जाए, धरती पर हाहाकार अग्नि, अग्नि, अग्नि हो जाती है। कुछ नहीं रहता ऐसा भी समय आता है और ऐसा एक बार नहीं आया। कई बार ऐसी सृष्टियां हुई और लीन हो गईं। तुम कौन सी चीज को संभाल के रखना चाहते हो? तो सब निवृत्त हो रही है प्रवृत्ति होकर।


देखत नैन चलो जग जाई का मा,गु कछु थिर ना रहई। 

आँखों के देखते-देखते जगत बीत रहा है, सब पसार हो रहा है। प्रवृत्ति, प्रवृत्ति में से निवृति, निवृत्ति में स्वतःसिद्ध और स्वत निवृत्ती दो तत्व हैं। स्वतः निर्वृत्ति प्रकृति है और स्वतःसिद्ध परमात्मा है। तो यह प्रकृति आपका शरीर है, मन है, बुद्धि है और उसको देखने वाला आपका परमात्मा आप हो। तो खुला बोल दें हिम्मत करके तो आप हो परमात्मा और शरीर है माया आपकी। स्वतः सिद्ध और स्वतः निवृत्त दो तत्व हैं। स्वत: निवृति प्रकृति है और स्वत सिद्ध परमात्मा हैं । तो यह प्रकृति आपका शरीर है, मन है, बुद्धि है और उसको देखने वाला आपका परमात्मा आप हो। तो खुला बोल दें हिम्मत करके तो आप हो परमात्मा और शरीर है माया आपकी। महाराज हम परमात्मा हैं!भगवान ने तो दुनिया बना दी, हम तो चिड़िया भी नहीं बना सकते। 

अरे तो भगवान ने बना दी, ये तुमने देखा क्या? 

बोले नहीं सुना है। 

कहाँ से सुना?

कि शास्त्र से। 

शास्त्र से तो यह भी बात तो शास्त्र कहता है ना कि आत्मा और परमात्मा एक है। बाकी संत जिससे संत है, उसी से आप हुए हैं। वो जानते हैं संत जिसे संत हैं, इसीलिए वह संत हैं, बड़े हैं और आपने सुना है, आप अभी जानते नहीं, इसलिए आप अपने को छोटा जानते हैं छोटे जगह पर । इसमें पहुंचने से ही बड़प्पन आ जाता है। तत्व सदा सबसे सदा, उससे बड़ा कोई है नहीं। तो इस तत्त्व में टिकना ही ईश्वरत्व में टिकना है, संत्तत्त्व में टिकना है, दुखों के पार में टिकना है।

COMPARE 

 पढ़ने की हद समझ है,

सत्संग सार 

  1. पढ़ाई → समझ, समझ → ज्ञान, और ज्ञान की अंतिम हद → हरि नाम।

  2. संसार और शरीर बदलते रहते हैं – यह प्रकृति है, इसकी स्वतः प्रवृत्ति और निवृत्ति होती रहती है।

  3. आत्मा–परमात्मा नित्य, शाश्वत और अचल है, वही असली "मैं" है।

  4. हरि नाम ही चौकीदार है, जो मन को सजग रखकर हमारे सद्गुणों की रक्षा करता है।

  5. साधना का लक्ष्य है – बदलती चीज़ों को देखते हुए टिकना उस "सदा है" तत्व में।


सत्संग - 

पढ़ने की हद समझ है, समझन की हद ज्ञान,

 ज्ञान की हद हरि नाम है, यह सिद्धांत उर आन 


 काशी गंगा किनारे कबीर जी के चरणों में एक साधक आ गया जिज्ञासु।  जिज्ञासु ने कहा महाराज ज्ञान का तो कोई अंत नहीं है ज्ञान तो अनहद है अब अनहद की कोई हद कोई नहीं बता पाता । कबीर जी  ने कहा भाई विद्वान भले अनहद की हद ना बता पाए लेकिन अनुभवी महापुरुष अनहद की हद बताने में देर भी नहीं करते 

हद टपे सु ओलिया बेहद टपे सु पीर 

हद बेहद मैदान में सोया दास कबीर

 महाराज हम समझे नहीं कृपा कीजिए अपने ज्ञान के रहस्य को हम समझ पाए उस ढंग से वर्णन करने की विशेष कृपा कर।  बोले पढ़ने की हद समझ है तुम सब भी पढ़े तो उसकी हद क्या है, कि समझ आ जाए जो पढ़े हो समझे विषय को उस सिद्धांत को

 पढ़ने की हद समझ है , समझ की हद ज्ञान

 समझ की हद है कि जहां से समझ आती है उस का ज्ञान हो जाए

 ज्ञान की हद हरि नाम है, यह सिद्धांत उर आन।

 ज्ञान हो जाए कि यह प्रकृति है यह अनित्य है और यह नित्य है तो जो नित्य है सदा प्राप्त है स्वतः प्राप्त है सबको प्राप्त है सदा के लिए प्राप्त है जो नित्य है।  और जो अनित्य है उसकी स्वतः निवृत्ति है सदा निवृत्ति और सबके यहां से निवृत्ति अनित्य निवृत हो रहा है। और नित्य सदा प्राप्त है। इस हरि के नाम में हरि की निष्ठा में नित्य में जग जाए तो हो गया सब काम । एक है स्वतः प्राप्त तत्व सदा प्राप्त है । परमात्मा आत्मा स्वतः प्राप्त तत्व।  और दूसरा है सहज निवृत तत्व तो सहज में निवृत तत्व जो है वह प्रकृति का है और स्वतः प्राप्त तत्व जो है वह परमात्मा है । मैं हू कि नहीं ऐसा कभी नहीं  होता फलाना है कि नहीं संदेह होगा।  फलाना देवता था कि नहीं या है कि नहीं संदेह होगा।  लेकिन मैं हूं कि नहीं संदेह नहीं होगा।  मैं हूं तो मैं मैं मनुष्य हूं यह प्रकृति है लेकिन हूं वो स्वतः पुरुष प्राप्त है । यह पृथ्वी है तो पृथ्वी प्रकृति है लेकिन उसमें जो है पना है वह स्वतः चैतन्य यह शक्कर का खिलौना है अब शक्कर को तोड़ फोड़ दिया तो खिलौना टूट गया चासनी बना दी तो शक्कर भी हट गई लेकिन शर्बत है चासनी है है पना खा लिया तो पेट में खुराक है रक्त है हिस्सा त्याग दिया तो खाद है कचरा है तो है जो है स्वतः रहता है तो एक है स्वतः प्राप्त जो अपना आत्मा परमात्मा और दूसरा है प्रकृति उसमें प्रवृत्ति होती है और निवृत्ति भी होती जाती है जैसे बालक जन्मा दो वर्ष तक उसे शिशु कहते हैं पाच वर्ष तक व कुमार है 10 वर्ष का हुआ पंड हुआ 15 वर्ष का हुआ 10 से 15 वर्ष तक किशोर हो गया 15 से 30 वर्ष की उम्र तक को युवा माना जाता है कोई 25 35 भी मान लेते हैं 30 से 50 तक पॉड माना जाता है 50 के बाद बुढ़ापा माना जाता है तो यह शिशु है यह कुमार है ंड है किशोर है युवा है प्राउड है। बोले मर गया तो मर गया है तो स्वर्ग में है नरक में है उसका शरीर जल ग मर गया तो मुर्दा है मुर्दे को जला दिया तो हड्डियां है राख है राख और हडिया को कहीं गाड़ दिया तो खात है उसमें जो अस्ति तत्व है वह चेतन का है और परिवर्तन जो है ऊपर से माया का है। तो ब्रह्म  वसन ब्रह्म पति धारण 6.32++++++

बृहद आरण्यक उपनिषद में लिखा है ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्मस्वरूप हो जाता है | 

ब्रह्म वेता ब्रह्म वित भवति तो जो सदा है स्वतः प्राप्त है परमात्मा आत्मा लेकिन चिंतन होता है जो परिवर्तन है उसमें सत्य बुद्धि है और जो स्वतः सदा है उसमें प्रीति अथवा सजगता नहीं है लहरों पर लहर सारा परिवर्तन हो रहा है कितना भी संभाल के रखो य फूलों की माला को संभाल के रखो परिवर्तन मकान को घर को शरीर को बाल्यकाल को सबको संभाल के रखो नहीं परिवर्तन होता है जिसका परिवर्तन होता है वह निवृत भी हो रहा है मैं यह कैसे छोडू मेरे को छूटता नहीं है अरे तुम छोड़ो नहीं छूटता जा रहा है जो नहीं छूटता उसको याद नहीं नहीं करते जो नहीं छूटता उसको जानते नहीं है इसीलिए चिंता है परेशान है कि यह मेरा तकलीफ कैसे छूटे य फलाना कैसे छूटे जो छूट रहा है वह छूट रहा है और जो कभी नहीं छूटता है वह आनंद स्वरूप है प्रेम स्वरूप है ज्ञान स्वरूप है शांत स्वरूप है स्वतः सिद्ध है इस प्रकार के ज्ञान में निष्ठा आ जाए तो पढ़ने की हद समझ है समझ की हद जञा ज्ञान की हद हरि नाम है शुरू में हरि नाम उच्चारण करते फिर होठों में चलता है फिर हृदय में ओमकार अथवा राम फिर उसके अर्थ में मन रमण करने लग जाता है हरि नाम की यात्रा पूरी ई तो जो है वह है और जो निवृत हो रहा है वो निवृत हो रहा है तो है में टिक जाए है सदा है सदा था सदा है सदा रहेगा है में टिकते नहीं और जो सहज निवृत हो रहा है उसकी सत्य बुद्धि मिटाते नहीं अरे यह चला गया अरे यह आ जाए य हो जाए जो चला गया वह चला जाएगा आ जाएगा वह भी चला जाएगा लेकिन जो सदा है उसकी प्रीति उसकी जानकारी नहीं है सो साहिब सद सदा हजूर गुरुवाणी में

लिखा है सो साहिब सद सदा हजूर अंधा जानत ता को दूरे सो प्रभ दूर नहीं प्रबत है जो है वही प्रभु है वही चैतन्य है विमल है सहज सुख राशि है वही शाश्वत है और वही सभी में मैं मैं मैं मैं मैं मोहन मैं कन्हैया मैं मोडासा वाला मैं मधुसूदन मैं गोपीचंद में फला यह गोपी चंद य फलाना यह माया के शरीर का नाम है लेकिन जहां से मैं उठता है मैं हूं हं तत्व चैतन्य एक सेठ को हुआ के बाबा जी को कैसे भी करके घर में पद चिन्ह पढवा द बाबा जी को रिझाया और संत महाराज इतना मकान यह वो बोले इतना सारा तुम्हारी जायदाद है तो कोई चौकीदार बगदार है कि नहीं बोले महाराज को ये सब चौकीदार रखे हैं चौकीदार नहीं हो तो इतनी मिल्कत की रखवाली कौन करेगा महाराज चौकीदार के सिवाय तो लोग दिन दाड़े उठाकर ले जाए बोले यह बाहर के धन जो निवृत हो रहे हैं उसको संभालने के लिए चौकीदार रखे और जो सदा रहे उस धन के तरफ ले जा लुटेरे लगे हैं उस धन का तुमको पता नहीं चलने देते उधर के कोई चौकीदार नहीं रखा क्या महाराज मैं समझा नहीं तो बोले तुम्हारी शांति चुरा के ले जाते तुम्हारी सज्जनता चुरा के ले जाते तुम्हारा स्नेह चुरा के ले जाते तुम्हारा रस चुरा के ले जाते तुम्हारा आनंद चुरा के ले जाते तुम्हारा माधुर्य चुरा के ले जाते उनको भगाने के लिए तुमने हरि नाम का राम नाम का चौकीदार नहीं रखा क्या भगवन नाम सुमर नहीं होगा तो य सदगुण चुराकर ले जाएगा अहंकार अज्ञान इसीलिए सतत मानसिक चौकीदार अर्थात भगवन नाम का स्मरण ताकि तुम्हारे सद्गुणों की सुरक्षा रहे जैसे धन धान्य माल मिल्कत की रक्षा करने के लिए चौकीदार रखते ऐसे सजग अंदर से रहने के लिए हल्के विचारों के द्वारा जो परिवर्तित हो रहा है उसमें मन चला जाए तो जो सदा रहता उसमें कैसे ठीक तो सावधानी ही रख सुख आता है तो आता है तो जाता नहीं क्या अरे जब आता है तभी से जाना शुरू होता है और दुख आता है तो नहीं जाता दुख भी आता है तो जाना शुरू होता है पति मर गया उस समय जो दुख हुआ दो घंटे के बाद वैसा दुख नहीं रहता और दो महीने के बाद तो बेटे की शादी में दुल्हा की मां होकर नाच रही मिठाई खा रही बांट रही है बधाइयां ले रही दे रही सुख आता है तो जा आता है आता नहीं है सुख पसार होता है आता नहीं है दुख आता नहीं है पसार होरहा है तो दुख भी पसार हो रहा है ल इज पासिंग थ्रू तो सुख भी पसार होता है जीवन में से दुख भी पसार होता है चिंता भी पसार होती है हम देखने वाले हैं और यह जाने वाले जाते तो सतत निवृत हो रहे हैं सुख भी निवृत हो रहा है दुख भी निवृत हो रहा है पुण्य का फल भी निवृत हो रहा है पाप का फल भी निवृत हो रहा है पुण्य और पाप प्रकृति में है अपने जीवात्मा के शुद्ध स्वरूप में नहीं तो बोले जीवात्मा और परमात्मा जीव और ब्रह्म की एकता हो जाती महारा समझाने के लिए कहा जाता है वास्तव में जीव और ब्रह्म की एकता नहीं होती चलो जैसे भाई पति पत्नी गले लग गए अथवा दूध और पानी एक हो गए ऐसा नहीं कि जीव और ब्रह्मा जीव और ईश्वर एक हो जाते हकीकत में जीव का जो अलग दिखना था अलग मान्यता थी वह मिट गई एक तो पहले थे बोले सागर और तरंग एक हो गए तो जब तरंग थे तभी भी तो सागर में ही थे और सागर का ही स्वरूप है बोले तरंग और समुद्र का पानी एक हो गया तो अरे भैया समुद्र का पानी और तरंग का पानी एक हो गया यह तुम्हारी नजरों में है बाकी समुद्र और तरंग दोनों एक ही तो थे ऐसे जीवात्मा और परमात्मा एकही थे एक ही है एक ही रहेंगे लेकिन शरीर को मैं मानकर बदलने वाली चीजों से मेरा पन मानकर जीवात्मा भूल बैठा इसीलिए वह जीवात्मा बन गया जीने की इच्छा उसकी धीरे-धीरे अज्ञान कि से बेवकूफी हटेगी तो बोलेगा अरे वो थे ना मुझसे दूर ना मैं उनसे दूर था आता ना था नजर तो नजर का कसूर नजर नहीं थी सूझबूझ नहीं ी तो नाम कमाई सदगुण भरती है देवी गुण भरती है तो उस देव की यात्रा में सफल होता है तो यह बात पक्की हो जाए काम बन जाए कल्याण हो जाए अब अपने मन में जैसा आया ऐसे अनुष्ठान करने बैठ जाएंगे मुंग खाएंगे अथवा फलाना खाएंगे या फलाना खाएंगे य जानकार है देश विदेश में जाते लेकिन जैसा मन में आता है ऐसे ही अनुष्ठान करते रहते हैं तो क्या होगा कि अपने को थोड़ा विशेष जानकार माने का जीव की भ्रांति बनी रहेगी मैंने इतने अनुष्ठान किए मैं बापू जी के साथ 15 साल पहले हरिद्वार से बद्रीनाथ की यात्रा मैंने की थी आज मैंने बहुत याद किया था देखो तो अपने को बापू जी की बात आ गई य हो गया तो ये चतुराई और व्यक्तित्व जब तक ज्ञानी महापुरुषों का संपर्क नहीं होता तब तक शरीर की आकृति और परिछन मिटती नहीं जो बदल रहा है उसको याद करके पक्का कर रहे हैं और जो अब बदल है उसका स्मृति ही नहीं कर पाते तो स्वतः प्राप्त है परमात्मा और स्वतः निवृत है प्रकृति स्वतः निवृत है सुख स्वतः निवृत है दुख स्वतः निवृत है बाल्यावस्था स्वत निवृत है शिशु अवस्था स्वत निवृत है कुमार अवस्था पंड अवस्था फिर 10 से 15 साल किशोर अवस्था वह भी निवृत हो गई आप निवृत करने थोड़ी बैठते और 30 के बाद 50 व प्रौढ अवस्था 50 के बाद 50 अवस्था वर्ष आपने बिताया क्या बीत रहे तो ऐसे ही 50 वर्ष बीत गए 30 वर्ष बीत गए से सुख बीत गए दुख बीत गए तो पढ़ने की हद समझ है समझ की हद ज्ञान ज्ञान की हद हरि रस है हरि की अनुभूति है यह सिद्धांत ऊर्जा अर्थात जो सिद्ध तत्व है उसमें टिक गए उसमें सावधान रहे क्रोध आ जाए तो उस समय देखो कि क्रोध आया है आया है अब कितना करूं आपके हथ की बात उसमें सजा भले क्रोध आया आपको करना है तो कर भी दिया लेकिन उस समय देखे भी रहोगे ये सत सिद्ध में देखने वाला और ये आया है तो जाने वाला तो क्रोध में अनर्थ नहीं होगा जिस पर करोगे उसका भी हित होगा और आपका भी हित होगा लेकिन आप स्वतः सिद्ध तत्व में नहीं टिके तो क्रोध के तपन आई आपका हानि हुई तो उसको भी हानि होगी ज्ञानी का क्रोध तो दूसरे के हित के लिए होता ऐसे चिंता आई और गई दुख आया गया किसी ने ऐसा कह दिया अब वो तो कहीं गप सप लगाता है और अपने याद करते करते जी सर कते तो जो सदा टिका है उसमें नहीं टिकते जो आई थी बात दो दिन पहले पाच दिन पहले उसको याद करके अभी जो सदा है उसका अनादर कर रहे ऐसा हो गया तो स्वत स्वतः सिद्ध है परमात्मा स्वतः सिद्ध है मैं मैं हूं अब मैं काला हूं मैं गजा हूं मैं फलाना हूं ये ये बदलने वाले शरीर का नाम अब मैं जवान हूं मैं बुड्ढा हूं हूं तो पक्का है लेकिन बूढा और जवान है परिवर्तित हूं तो पक्का है लेकिन दुखी हूं तो दुखा का वृति आई हो तो गई सुखा आकार वृत्ति आई तो गई शांत शांत वृति आई तो गई विक्षिप्त वृत्ति आई तो गई लेकिन उसको देखने वाला कब गया तो स्वतः प्राप्त जो है वह परमात्मा है आत्मा और सहज में जो निवृत प्रकृति प्रवृत्ति हो रही है और प्रवृत्ति में निवृत्ति हो रही है सहज जो प्रवृत्ति हो रही है सब में रक्त में इसमें उसमें प्रकृति में तो प्रवृत्ति है ही और जो प्रवृति हो रही तो प्रवृत हो हो के निवृत भी हो रही है जो फरा सो झरा जो जन्मा सो मरा जो मिला सो बिछड़ा कितना भी लाख संभालो लेकिन जो मिला है वह बिछड़े जो फला है वह रेगा फल गिरेगा जो आया है वह जाएगा लेकिन स्वतः सिद्ध जो तत्व है आत्मा देव मैं व सदा रहता हूं इसलिए ईश्वर पाना तो इतना सरल है वशिष्ठ जी कहते हैं कि फूल टहनी को तोड़ने में परिश्रम है अपने आत्मा देव को जानने में क्या परिश्रम जान तो लेते उपदेश मात्र से लेकिन उसमें टिकने का सात्विक बुद्धि दृढ़ निश्चय सजगता ऐसी प्यास तो सुनते सुनते विचार करते करते जगत की थपेड़े खाते खाते लगता है कि तत्व ज्ञान के बिना परमात्मा ज्ञान के भगवत प्रीति भगवत जप भगवत ध्यान भगवान के लिए सत्कर्म यह साधना है लेकिन सिद्ध अवस्था है कि जो स्वतः प्राप्त तत्व है व है और जो सहज निवृत तत्व है व प्रवृत होते होते निवृत होता रहता य सिद्ध अवस्था में सूरमा होकर युद्ध करो लेकिन हृदय से शीला किना राम जी दृढ़ रहो स्वत तव सिद्ध है व है कितनी ची बात कह दी वशिष्ठ महाराज अष्टा वकर कहते हैं कि जनक जो धन मिल गया सो मिल गया जो खो गया सो खो गया तो आने जाने वाली चीज तो अभी स्वत ऐसा दुनिया में कौन है कि जिसके सारे कार्य पूरे होगए हे राजा जनक ऐसा कौन है जिसके सब काम पूरे हो गए और बाहु रानी सासु की चरण चंपी कर रही बेटा काम पूरे हो गए बोले सासू जी आज तो मैंने भोजन बनाया ना सबको खिला भीदिया कुछ बचा भी नहीं और बर्तन भी मार दिए अच्छा बेटे अच्छा और बबू के बाप को खांसी हो गई थी तो मैंने थोड़ा सा गुर और जरा सा दो चार काली मिर्च का काढ़ा बना के आज इतवार है इसलिए तुलसी के पत्ते तो नहीं देने चाहिए इतवार को वैसे काढ़ा दे दिया व काढ़ा दिया और उनको खांसी में भी शांति है वो भी सो गए अच्छा तो काढ़े की तपेली भी अरे वो भी माज के रख दी तो कोई काम बाकी नहीं बो अच्छा बेटा जाकर सो बोले नहीं सासू जीी थोड़ा पैर चंपी कर अच्छा तो पैर चंपी भी करती जा और आराम भी करती जा जोके खा अच्छा जा सो जा कोई काम बाकी तो नहीं बोले नहीं सुबह उठी सासू जी बहु से पूछा बेटा कोई काम बाकी तो नहीं है बोले सासू जी सब बाकी है बच्चों को लाना घरका स्कूल में भेजना गाय दोना लाना रसोई बनाना आपके सुपुत्र के कपड़े अ प्रेस करना बाकी सब काम बाकी अब रात को तो सारा काम पूरा करके सोई सुबह सब काम बाकी आखों काहे अंधार को झगड़ो मटा कोई नाम जगत के कार्य कोई पूरे हो गए क्या सबके निवृत हो रहे पूरे नहीं हो रहे निवृत हो रहे व हो के निवृत हो रहे हो के निवृत हो रहे कोई कैसे कोई कैसे से निवृत हो र तो स्वतः सिद्ध है आत्मा और स्वतः प्रवृत में से निवृत हो रहा है प्रकृति प्रकृति क्रिय मानी गुण कर्माणि सर्वस अहंकार विमु आत्मा करता आति मन देखो मैं मानकर जो अहंकार हो गया व अपने के इंद्रियों के शरीर की प्रवृत्ति निवृत्ति को अपना प्रवृत्ति अपना करता भुगता मानता है अहंकार से विमु हो गया अपने को करता मान रहा है हकीकत में करता नहीं करता भी नहीं भोगता भी नहीं कुछ लोग अपने को भोग्य बना लेते हैं ऐसा रूप ऐसा राम रोगन करके घूमे तो लोगों का हमारे तरफ ध्यान जाए तो लोग हो गए भोक्ता और हम हो गए उनके भोग्य ना आप किसी के भोक्ता बनो ना आप किसी के भोग्य बनो आप अनुमता रहो जो सहज निवत एक रस तत्व है शाश्वत तत्व अनुमंथाई एक जैसे एक शवास लिया वापस आया तो बीच की जो एक जरा सी सेकंड आधि सेकंड वो स्वत है तत्व है वो परमा परमात्मा अवस्था सदा प्राप्त तत्व बदल रहा है व सदा निवृत तत्व इसकाअभ्यास करे बुद्धि थोड़ी सूक्ष्म हो पवित्र हो आ व्यवहार सात्विक होता है पवित्र होता तो कोई कठिन नहीं इतनी प्रवृत्ति ना करें संसारी के अपने को थका दे और इतना आलसी ना हो कि तत्व के विचार करने की योग्यता ही मर जाए सज इतना भावुक ना रहे कि भाई ऊंची बात समझने की घड़िया आए तो भावना में बैठ जाए और इतना खाली रूखा भीना रहे के भावर रस से कंगाल रह जाए एक मायती बड़ी भावना वा गुरुजी कब आए घर कब आए कब आए पति पत्नी ने गुरु को रि जाते रि जाते हां भरवा दी गुरु जी घर पधारे आय क्या क्या व्यंजन बने गर्मी के दिन गुरु जी को भोजन परोस रहे कि अब मैं अपने हाथ से गुरु जी को पंखा गुरु जी खीर कैसी ई बोले ब बहुत बढ़िया हु गुरुजी एक ऐसा भजन भी अच्छा बनाया गुरुजी भी संतोष है मैं कैसी भागली ऐसे करते करते भाव भाव में मैं कैसी भाग्यशाली हूं भाव में ऐसा भाव चढ़ गया दबाक से गिर पड़ी थाली गुरु जी के दाढ़ी में खीर लग गई और ती कोई पूड़ी उधर गई तो सबजी उधर ग गुरुजी भजन कराया कि मुसीबत कर दी भावना तो ठीक है लेकिन भावना के साथ-साथ विचार शक्ति भी अकेला विचार रूखा हो जाएगा अकेली भावना अंधी हो जाएगी भावना के साथ विचार विचार के साथ भावना उसमें फिर सावधानी से सत करो सत्कर्म भी निवृत्ति के लिए है सत्कर्म करके अपना फायदा लेने की वासना होगा तो प्रवृत्ति बढ़ेगी सत कर्म करके जो सदा निवृत्ति है प्रवृत्ति करके भी निवृत्ति हो जाएगी और एकदम निवृत हो गए तब भी भी निवृत हो जाए कितने भी कर्म करेंगे प्रवृत्ति करेंगे तभी भी आखिर तो निवृत्ति आ और निवृति के लिए करेंगे तो भी निवृति आएगी बहुत ऊंची बात है पंचदशी का ने लिखा है ऐसा ज्ञान हो गया तो फिर क्या कैसा अनुभूति होग अंदर में माया मेघो जगन नीरम माया रूपी मेघ है और जगत रूपी जल है जैसे तैसे बरसे मेरे को क्या है महाकाश तिका हानि लाभ पिका विद्यते माया रूपी मेघ कैसे भी बरसो जगत रूपी पानी महाकाश को क्या आनी क्या लाभ फलानी जगह बाढ़ आ गई तापी के पानी बढ़ गए साबरमती में पूरा आ गया फलाना लेकिन आकाश को कौन डुबा सका ऐसे ही प्रलय में भी जो नहीं मिटता वह हम है प्रलय हो जाए बारा सूरज तप जाए शरीर जल के खाक हो जाए धरती पर हाहाकार अग अगनि अग्नि हो जाती कुछ नहीं रहता ऐसा भी समय आता है और ऐसा एक बार नहीं आया कई बार ऐसी सृष्टि हुई और लीन हो गई तुम कौन सी चीज को संभाल के रखना चाहते सब निवृत हो रही प्रवृत होके देखत नैन चलो जग जाई का मागू कछु थिर न राई आंखों के देखते देखते जगत बत रहा है सब पसार हो रहा है प्रवृत्ति प्रवृत्ति में से निवृति निवृति तो स्वत सिद्ध और स्वतः निवृत दो तत्व स्वत निवृत प्रकृति है और स्वत सिद्ध परमात्मा है य प्रकृति आपका शरीर है मन है बुद्धि है और उसको देखने वाला आपका परमात्मा आप हो तो खुला बोल दे हिम्मत करके तो आप हो परमात्मा और शरीर है माया आपकी स्वत सिद्ध और स्वतः निवृत दोत स्वत निवृत प्रकृति है और स्वत सिद्ध परमात्मा है तोय प्रकृति आपका शरीर है मन है बुद्धि है और उसको देखने वाला आपका परमात्मा आप हो तो खुला बोल दे हिम्मत करके तो आप हो परमात्मा और शरीर है माया आपकी मराज हम परमात्मा भगवान ने तो दुनिया बना दी हम तो चिड़िया भी नहीं बना सकते अरे तो भगवान ने बना दी ये तुमने देखा क्या बोले नहीं सुना है कहां से सुना के शास्त्र से शास्त्र से तो यह भी बात तो शास्त्र कहता है ना कि आत्मा और परमात्मा एक है बाकी संत जिससे संत है उसी से आप हु है वो जानते हैं संत जिससे संत है इसीलिए वह संत है बड़े हैं और आपने सुना है आप अभी जानते नहीं इसलिए आप अपने को छोटा जानते छोटे जगाते इसमें पहुंचने से बड़पन आ जाता है तत्व सदा सबसे सदा उससे बड़ा कोई है नहीं इस तत्व में टिकना ही ईश्वर तोव में टिकना है सं तत्व में टिकना है दुखों के पार में टिकना है है


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था सत्संग के मुख्य अंश : राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है । करने, जानने और मानने की शक्ति...