पूज्य बापूजी बोले
सुबह संध्या सत्संग
आज, 09-02-26
बोलते हैं स्वभाव नहीं बदलता। तुम्हारा तो स्वभाव पड़ी ग्यो छे, बदलातो नथी। स्वभाव कोई धड़े बदलाय नहीं। स्वभाव हो तो बदल नहीं सकता। अग्नि का स्वभाव उष्ण है। वो चाहे ब्राह्मण के घर में हो, चाहे चांडाल के घर में हो, चाहे हिमालय में हो। चाहे मरुभूमि में हो, अग्नि का स्वभाव उष्ण है। बर्फ का स्वभाव शीतल है। जल का स्वभाव द्रवीभूत है। स्वभाव नहीं बदलता और अगर स्वभाव नहीं बदलता तो फिर उपदेश की, मंत्रों की, अनुष्ठान की या शास्त्रों की आवश्यकता नहीं। अगर स्वभाव बदल नहीं सकता तो फिर उपदेश की जरूरत नहीं है, शास्त्रों की जरूरत नहीं है, आचरण, धर्म अनुष्ठान की जरूरत नहीं है और जो बदलता है, वह स्वभाव नहीं होता। श्री राम! जो बदलता है, वह स्वभाव नहीं होता। जैसे ब्रह्म का स्वभाव है, स्फुरणा। ब्रह्म का स्वभाव है सृष्टि को सत्ता देना और ब्रह्म का स्वभाव बदलता नहीं है। स्वभाव नहीं बदलता। जो बदलता है, वह स्वभाव नहीं होता है। यह बहुत सूक्ष्म बात है, ध्यान से आप सुनने की कृपा करना। स्वभाव बदलता नहीं और जो बदलता है, वह स्वभाव होता नहीं। बदलता है विचार, बदलती है कल्पनाएं, बदलती है मान्यताएं। हम बोलते हैं स्वभाव बदल गया। श्री राम! ध्यान से सुनना। बदलती है मान्यताएं, बदलती है कल्पनाएं, बदलते हैं विचार। हम समझते हैं स्वभाव बदला।
मध्य रात्रि को बिल में से चूहा निकला। शराबी शराब पीकर कुछ ढोल बैठे थे। चूहा निकला और उसने थोड़ी शराब चाट ली। नारंगी बारंगी होगी, शराब के कई नाम होते हैं। नारंगी छाप भी शराब होता है। शराब चाट ली और दो पैरों के बल खड़ा हो गया। चूहा बोले, बुलाओ बिल्ली-फिल्ली, शेर-बेर कौन होते हैं मेरे सामने? आज तक कई हमारे नाती गोतियों को उसने हजम किया, लेकिन अब मुझे पता चला, बुलाओ बिल्ली कहां रहती है, शेर कहां रहते हैं? दो पैरों के बल से खड़ा हो गया और छोटा छोटा तो उसका मुंह जरा सी मूंछ और दोनों हाथों से दोनों मूछों को फड़फड़ा रहा है। तो अब चूहा बिल्ली को चैलेंज कर रहा है। क्या उसका स्वभाव है? उसकी प्रकृति नहीं है तो स्वभाव नहीं बदला, उसकी मान्यता बदली। श्री राम! और मान्यता क्यों बदली कि जरा सी शराब आ गई और अपने को विशेष मानने लगा। ऐसे ही हम कई चूहों को जानते हैं। कोई बीए पढ़ा चूहा है, कोई एमए पढ़ा चूहा है, कोई कहीं किसी पद पर पहुंचा हुआ है तो यह धन की, पद की, सत्ता की शराब पीकर हम आ जाते हैं कि आय आप! तो ये उधारी चीजें जैसे चूहे ने शराब चाट ली, ऐसे ही हमारे मन ने उधारी बाहर की कोई मान्यता चाटकर और अपना मन आ गया कि आप आई एम सम थिंग लेकिन जब मौत आती है तो फिर देखो कहां जाता है वो। वो स्वभाव नहीं है। मैं कुछ हूं, यह आपका जो कहना है ना। धन को लेकर मैं कुछ बने, सत्ता को लेकर मैं कुछ बने, सौंदर्य को लेकर आप कुछ बने हैं, मित्र और परिवार को लेकर आप कुछ बने हैं तो यह आपका स्वभाव नहीं है नारायण। श्री राम! कृपानाथ, यह कृपा करना आप लोग। यह आपका स्वभाव नहीं है। यह पराई शराब चाटकर आपके मन की एक वृत्ति है। वृत्तियां बदलती रहती है, स्वभाव उसका साक्षी है। जब डर लगता है तब भी वृत्ति शराब नहीं चाटती, लेकिन और कोई कल्पना में फंसी और जब कोई सत्ता का, धन दौलत का कोई शराब पी लेते हो तो बिल्ली से तो चूहा डरता है, लेकिन अभी दो पैर पर खड़ा हो गया है लेकिन वो लंबा समय नहीं खड़ा रहेगा, क्योंकि बोतल के सहारे है वो। ऐसे ही हम लोग भी जो बोतलों के सहारे खड़े हो जाते हैं ना, हम भी जो दो पैर के बल पर खड़े हो जाते हैं, सीना फूलते हैं। ये हम कुछ वस्तुओं को अपने में जोड़कर अपना मन, इंद्रियां पदार्थों को देखती हैं और मन उसके साथ चिपकता है और फिर उसको अपना मानकर और कुछ भूलता है। श्री राम! आपका स्वभाव है कि इंद्रियां और मन अनुकूल चेष्टा करें तब भी आप देख रहे हैं, मिश्रित चेष्टा करें तब भी आप देख रहे हैं और प्रतिकूल चेष्टा करें, तब भी आप देख रहे हैं। आपका स्वभाव है, साक्षी स्वभाव। श्री राम! कृपानाथ, इस बात को आप अपनी बना लीजिए, मेरी मत रखिए। आपकी बात है, ऐसा समझिए। श्री राम।...आपका स्वभाव कभी नहीं बदलेगा और बदलने की इच्छा भी नहीं करना। आज तक जो स्वभाव आप मान बैठे हैं, वो आपका स्वभाव नहीं है, वो इंद्रियों का स्वभाव है। बीड़ी पिए बिना नहीं रह जाता क्योंकि मेरा स्वभाव पड़ गया लेकिन फिर उन आदमियों ने बीड़ी छोड़ी। दारू बिना, भोजन न मिले तो न मिले लेकिन बोतल मिले, ऐसे आदमियों ने दारू छोड़ दिया, झगड़ा छोड़ दिया। वालिया लुटेरा जैसा आदमी बोले स्वभाव बदल गया, स्वभाव नहीं बदला। उसके मन की वृत्तियां बदली, उसके इंद्रियों की दिशा बदली, उसके बुद्धि के निर्णय बदले और वो तो वही का वही था। श्री राम! तो यहां आज के श्लोक से हम इतना जरूर समझेंगे कि जैसे दरिया के किनारे आप खड़े हैं, तमाम लहरियां उठ उठकर लीन हो रही है। आपको कोई आपत्ति नहीं। लहरियां उठने का मजा ले सकते हैं, ठंडी हवाओं की खबरें सुन सकते हैं
लेकिन अगर दरिया में अपने आप को आपने उछेल दिया, फिर लहरियों के थप्पड़ आपको परेशान करती हैं। श्री राम। वो लहरियां तब तक आपके लिए दुखदायी नहीं है, जब तक अपने आप को आपने दरिया के हवाले नहीं किया। जो दरिया में प्रवेश किया तो वो जो सुंदर थी, सुखद थी, ठंडी खबरें देने वाली लहरियां थी, वे ही आपको छिन्न-भिन्न करने में काम आएंगी। ऐसे ही इंद्रियों की या चित्त की जो लहरियां हैं, उसको आप किनारे होकर द्रष्टा होकर देखें तो संसार में हंसने का मजा है, रोने का मजा है।
"नरो वा कुंजरो वा" कहने का मजा है, मक्खन चुराने का मजा है, चोटला तोड़ने का मजा है, बंसी बजाने का मजा है।
पूरे हैं वो मर्द, जो हर हाल में खुश हैं।
अगर तरंगों से थोड़ा अलग होकर आप कृपानाथ थोड़ा सा इस बात पर ध्यान दीजिए। अगर आप सागर की तरंगों से पृथक होकर तरंगों का मजा लेते हैं तो आप हैं कृष्ण। श्री राम! आप हैं क्राइस्ट, आप हैं बुद्ध, आप हैं नानक, आप हैं कबीर। अगर आप उन तरंगों में घुस जाते हैं, मजा लेने के लिए, किनारे खड़ा रहकर मजा नहीं लेते, मजा आया तो एकदम उनको बात भिड़ा के अंदर जाते हैं। तो मजा तो मजा गया, फिर जान छुड़ाना मुश्किल हो जाता है। श्री राम! ऐसे ही मन और इंद्रियों के तरंगों को देखकर अपने स्वभाव में आप खड़े हैं तो ठीक है, लेकिन आप अपने स्वभाव को छोड़ते नहीं हैं। अपने स्वभाव को बदलने की जरूरत नहीं। आप अपने स्वभाव को भूल जाते हैं और पर स्वभाव को अपने ऊपर हावी कर देते हैं। श्री राम। आप अपने असली स्वभाव को भूल जाते हैं और पर स्वभाव को हावी कर देते हैं। कैसे? जैसे महाराज आप बैठे हैं, सड़क के किनारे आपका फर्स्ट क्लास बंगला है। निकली गाड़ियां निकली बारात, आप देखकर खुश हो रहे हैं। निकले स्कूटर, निकली मोटरें। आप देखने वाले मजा ले रहे हैं। एक दिन बढ़िया बारात निकले और मोटर गाड़ी निकले और दूसरे दिन किसी की आखिरी बारात निकले और बैलगाड़ियां निकले। अब मोटर गाड़ियां देखकर आप खुश होकर उनमें चल बसे और बारात आए तो उसके साथ चल दें अथवा अर्थी आ जाए तो उसके साथ चिपक कर और लकड़ों में अपने को उलझा दें, तो आप जुड़ गए उस दृश्य के साथ। श्री राम! अगर आप अपने घर में हैं और आपको इतनी समझ है कि रास्ता है, सड़क है, यहां से सब पसार होने वाला है। बारात भी पसार होती है, अर्थी भी पसार होती है, कार भी पसार होती है, बस भी पसार होती है, स्कूटर भी पसार होती, बैलगाड़ियां भी पसार होती है, ऑटो रिक्शा भी पसार होती है, पैदल वाले भी पसार होते, कोई सज्जन भी पसार होते हैं, कभी दुर्जन भी पसार होते हैं, क्योंकि यह सड़क है। श्री राम! अब अच्छे आदमी पसार हों तो आप थोड़ी देर के लिए हां, धन्यवाद। हां, ठीक है, एक अच्छे पसार हुए तो अपने को अच्छा मानने लगे और डाकू पसार हुए तो अपने को डाकू मानने लगे और मुर्दा पसार हुआ तो अपने को मुर्दा मानने लगे और वरराजा पसार हुआ तो साठ बरस का डोहा अपने को वरराजा मानने लग जाए। तो उस आदमी पर जैसे आपको हंसी आती है, कृपानाथ ऐसे ही ज्ञानवानों को तुम्हारे पर हंसी आती है।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥ गीता 5.28॥
जिसकी इंद्रियां, मन और बुद्धि जीती हुई है। जीती हुई का मतलब यह नहीं कि तरंग उठे नहीं, मन से संकल्प हो नहीं अथवा इंद्रियों से कोई उपयोग न करें। इंद्रियों का उपयोग तो करें। अब एक बात फिर समझें। आप रूम में बैठे हैं और अंदर से कड़ी लगा दी। आप भले चार घंटे बैठे रहे, आप स्वतंत्र हैं, आपको दुख नहीं है। आप रूम में गए और किसी ने कुंडा लगा दिया। बाहर से होल्ड्रॉप लगा दिया। कड़ा लगा दिया। भले थोड़ी देर के लिए लगाया, लेकिन किसी ने लगाया तो आप पराधीन हो गए और आपने लगाया है तो आप स्वाधीन हैं। श्री राम! ऐसे ही अपनी सत्ता में रहकर आप युद्ध करते हैं, भोग भोगते हैं, बच्चे को जन्म देते हैं। इन इंद्रियों का आप उपयोग करते हैं तो आप रूम में अपनी सत्ता से बैठे हैं।...आप अपनी मर्जी से क्रिकेट खेलते हैं या बाजार में धंधा करते हैं, उसका अलग स्वाद है और वेट कोई करा दे उतने काम की तो अलग बात है। ऐसे इंद्रियों के और जगत को सत्य मानकर मन के बहाव में बह जाना, यह पशुता है और इंद्रियों को, मन को उचित जगह पर, स्टीयरिंग को उचित जगह पर घुमाते रहना और अपनी यात्रा जीवन की करना, यह वांछनीय है। श्री राम! ऐसा नहीं है कि आप भोग भोगते हैं और ज्ञान-वान कुछ नहीं करते होंगे। अरे तुमने जो सुख लिया ना, वो तो तुम्हारा तो सुख कुछ नहीं। ज्ञानी को तो ऐसे ऐसे सुख के प्रलोभन आते हैं कि उसके आगे आपका तो कुछ नहीं है। अपने लोगों को, संसारी लोगों को तो जो पत्नी, जो स्त्री लड़ती है, नाक सिकोड़ती है, बगासा खाती है, पसीना निकलता है, झुर्रियाँ पड़ जाती है, ऐसे भोगों से अपन लोग आकर्षित हो जाते हैं। ज्ञानवान के आगे योगी के आगे तो अप्सराएं आती हैं, जो कभी बगासा नहीं खाती, पसीना नहीं होता,
झुर्रियाँ नहीं पड़ती और भी क्या क्या उनमें वो होता है। तो ये चीजें उन लोगों के शरणागत हो जाती है और हम लोग तुच्छ चीजों के शरणागत हो जाते हैं। श्री राम! आप संसार के भोग नहीं चाहेंगे तो संसार के भोग आपके चरणों में आएंगे। उनका भी अनादर कर देंगे, अपने स्वरूप में मस्त रहेंगे तो देव देव योनि के भोग भी आपके आगे नहीं अच्छा होगा। अगर उनकी भी परवाह नहीं करेंगे तो ईश्वर स्वयं आ जाएगा। ईश्वर आ जाएगा, यह लौकिक भाषा में कहना पड़ता है। ईश्वर कभी गया ही नहीं तो आएगा क्या? अर्थात् अपने ईश्वरत्व का आपको बोध हो जाएगा, ज्ञान हो जाएगा। जिस चीज का बोध नहीं है, वह चीज होते हुए भी नहीं है और जिस चीज का पता चल गया, उसके होने का फायदा है। सदियों से परमात्मा आपके साथ है। अज्ञानी से अज्ञानी, मूढ़ से मूढ़, अनजान से अनजान व्यक्ति। भगवान उतना ही है उसके पास जितना बुद्ध के पास है। सदियों से आप नहीं जानते, तब भी परमात्मा तुम्हारा है और युगों से जगत को पकड़ते आए, तभी भी जगत की चीज तुम्हारी नहीं। जगत की चीज भी तुम्हारी नहीं है तो यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है। शरीर में रहने वाली इंद्रियां भी तुम्हारी नहीं है, मन भी तुम्हारा नहीं है, बुद्धि भी तुम्हारी नहीं है। यह प्रकृति की चीजें हैं और यह प्रकृति की चीजें इसलिए बदलती रहती हैं। श्री राम! प्रकृति में परिवर्तन है तो ये चीजें बदलती रहती हैं। फिर बदलने की स्पीड कम हो, चाहे ज्यादा हो, लेकिन बदलती जरूर है। जो बचपन में आंखें थी, जो जवानी में आंखों का रोशनी था, तेज था, वो बुढ़ापे में नहीं रहता। जो बचपन में इंद्रियों की चंचलता थी और जवानीयों में इंद्रियों के जो विकार थे, वो बुढ़ापे में नहीं रहता, लेकिन तृष्णा बुढ़ापे में जो बढ़ती है, वो बचपन में नहीं थी। श्री राम! वासनाएं और चिकास जो बढ़ जाती है, बुद्धि और मन में वो बचपन में नहीं होती, वो जवानी में नहीं होती। ईश्वर के सुख के बिना आरोपित सुख जो भी लोगे, उसको प्राप्त करने में परिश्रम, भोगते समय भय और जाने के बाद विषाद होता है। श्री राम! कितना सत्य है। ईश्वरीय सुख के बिना, आत्मा परमात्मा के सुख के बिना जो भी आप सुख लेंगे, उस सुख को लेने में परिश्रम होगा, भोगने में भय होगा और नाश में विषाद होगा और नाश जरूर होगा। श्री राम!
रूप दिसी मगरूर नथी,
एडो हुस्न ते नाज न कर।
रूप सबई रावल ते,
रूप है तो मगरूर मत हो, हुस्न पर नाज मत करो,
झुर्रियाँ आने को हैं। श्री राम! सौंदर्य है तो बुढ़ापे का भय रहेगा। सत्ता है तो पांच वर्ष के भीतर ही भीतर हिल जाए अथवा पांच वर्ष पूरा होते हिल जाए अथवा चालू पांच वर्ष में कितला फेंकाई गया और कितला लेवाई गया। ईश्वरीय सुख के बिना, आत्मा परमात्मा के सुख के बिना जो भी सुख है, वह चूहे की शराब जैसा है। श्री राम! चाहे फिर वो डेरी का सुख हो, डेरे का सुख हो, यह मठ, मंदिर, डेरा उसका सुख हो लेकिन समाज की बड़ी कमजोरी यह है कि जिस महात्मा का डेरा बढ़ा, जिसके शिष्य बढ़े, वह महात्मा बढ़ा। ऐसा नहीं है, सत्य के आगे यह चीज मूल्य नहीं रखती। हम तो वही के वही थे, लेकिन जब आर्च बनी और अमेरिका जाकर आए तो अब हम बड़े हो गए। राम राम, राम। इन तुच्छ चीजों के कारण हमारा मूल्य बढ़ा और ये तुच्छ चीजें चली जाए तो हमारा मूल्य घटे। हमारा मूल्य तो वही था जो पहले था, अब भी और बाद में रहेगा। वो हम आत्मा हैं। ऐसा महात्माओं को अनुभव होता है। चाहे लोग पूजा करें, सुवर्ण के बर्तनों में खिलाएं और बखमल बिछा दें, पुष्प बिछा दें, तभी भी महात्मा वहीं का वहीं होता है और चाहे लोग जूत्तियां उछाल दें और दुनिया भर का अपमान कर दे, तभी भी सच्चा महात्मा तो वही का वही होता है जहां उसको होना चाहिए। श्री राम!
हम लोग क्या है कि हम लोग परिस्थितियों में होते हैं, इसीलिए परिस्थितियां हमको दबा देती हैं। तो आप इंद्रियों में न रहिए, अंधाता, मन में मत रहिए, बुद्धि में मत रहिए। लेकिन इंद्रियों को, मन को और बुद्धि को जो सत्ता देता है, वो तुम्हारा असली स्वभाव है। आप अपने आप में रहिए। श्री राम! अपनी समझ इंसान को जब तक आती नहीं, दिल की परेशानी तब तक दुनिया से जाती नहीं। अपने आपका स्वभाव का जब तक पता नहीं चलता, तब तक बेचैनी नहीं जाती।... बेचैनी दब जाना एक बात है, बेचैनी भूल जाना दूसरी बात है। बेचैनी को विस्मृति के खाई में थोड़ी क्षणों के लिए डाल देना दूसरी बात है, लेकिन बेचैनी अलविदा हो जाना, बात निराली। तो बेचैनी अलविदा होने के लिए श्री कृष्ण का इस श्लोक को आप ठीक से समझेंगे, जिसकी इंद्रियां, मन और बुद्धि जीती हुई है, ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि, इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है।
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥ (गीता 5.28)
इसमें जब तक भीतर का रस आता नहीं, तब तक इंद्रियां और मन वश होते नहीं और जब तक मन वश होता नहीं, तब तक भीतर का रस आता नहीं। श्री राम! हम समझते हैं, भीतर का रस आए तब छोड़े, ऐसा नहीं है। और वो बोलता, भीतर वाला बोलता है कि बाहर का छोड़ो, तब मिलूं। अब क्या किया जाए? थोड़ा आप सरको, थोड़ा वो सरके तो हम सौदा बना दें। होता है ना वो दलाल लोग ! क्या करते हैं? वो बोलता है, हमको डेढ़ लाख चाहिए। वो बोले, हम लाख से एक पैसा भी ज्यादा नहीं दूंगा और लाख वाला सवा पे आवे और डेढ़ वाला थोड़ा नीचे आए, सौदा हो जाता है ना। ऐसे ही कुछ थोड़ा आप संयम करें और थोड़ा मैं उसको रिझा दूं, ले। जय जय! जैसे नाविक नाव को ले जाता है और नाव नाविक को ले भागती है। नाविक नाव को ले जाता है और नाव नाविक को ले जाती है, सापेक्ष है। ऐसे ही इंद्रिय और मन को थोड़ा सा अंतर्मुख करने से भीतर का सुख मिलता है और भीतर का सुख मिलने से वे अंतर्मुख होते हैं। एक दूसरे के पोषक हैं। इंद्रियां, मन अंतर्मुख हुए तो आनंद उसको पोषेगा। आनंद मिला तो वो और अंतर्मुख होंगे। इसलिए पहले त्याग करना पड़ता है, बाद में वैराग्य आता है। त्याग करना, मना हिम्मत करना है और फिर वैराग्य, माना वो ऐसा रस मिल गया कि अब राग रहा नहीं। त्यागी के अंदर में राग है, बाहर से त्याग है, लेकिन बाहर का त्याग जब उसका फलित होता है तो अंदर से वैराग्य पैदा होता है। राग चला गया, वस्तु रही तो कोई हरकत नहीं। तुम्हारे पास क्या है? एक, दो, चार छोटा, पांच बच्चा होगा, सात बच्चे होंगे और क्या होगा? वशिष्ठ के पास एक सौ लड़का और मुक्त है। भगवान राम का गुरु संसारी नहीं, सौ बच्चों का बाप। अपन संसारी और कृष्ण के कितने बच्चे थे? यदुकुल पूरा परिवार। विस्तार देखो, सोलह हज़ार एक सौ आठ तो खाली मिसेस थी। बोलते छियासी हज़ार तो खाली शिक्षक थे, बच्चों को पढ़ाने के लिए। तुम्हारे बच्चों को पढ़ाने के लिए एक शिक्षक, दो शिक्षक। सरोवर के किनारे रहकर लहरों को, लहरों का मजा ले सकते हैं, लेकिन सरोवर में जाकर लहरों का मजा लेना है तो थप्पड़ खानी।
देह छता जेनि दशा वर्ते देहातीत।
इसलिए अन्नदाता, ईश्वर को भविष्य में पाना या सुख को भविष्य में पाना, यह इच्छा छोड़ दो। ईश्वर आपसे दूर है, यह बेवकूफी को हटा दो और ईश्वर को आप नहीं पा सकते, इस कायरता को अलविदा दे दो। श्री राम! आप ईश्वरीय रस नहीं पा सकते, यह कायर कायरता के विचारों को अलविदा दे दो। ईश्वरीय रस भविष्य में मिलेगा, इस बेवकूफी को हटा दो और ईश्वर आपसे कहीं दूर है, इस भ्रमणा को भूल जाओ। जय श्री कृष्णा!
चार बातें बहुत जरूरी हैं। आप जो कुछ करते हैं, सुचारू रूप से करो। जो कुछ काम करते हैं, दर्दी की सेवा करते हैं, नर्स हैं तो नर्स की ड्यूटी उस समय बजाओ। रसोई करते तो रसोई प्रेम से करो। दुकान पर जाते, जो कुछ करते सुचारू रूप से करो, एक बात।
दूसरी बात, करने के बाद अपने को कर्ता मत मानो। मन, इंद्रियों ने और बुद्धि ने किया, हम उससे अलग। हरि ओम तत् सत् आबधु गप सब। जो करो, सुचारू रूप से करो और करने के बाद अपने इंद्रियां, मन और बुद्धि ने किया है, सत्ता मात्र साक्षी मात्र मैं हूं, बाकी सब स्वप्ना है। दो बात।
तीसरी बात, अपना व्यक्तिगत खर्च कम करो। व्यक्तिगत खर्च कम, मनोबल बढ़ेगा। आत्मरस के तरफ जाओगे।
तो तीन बातें हो गई ना। सुचारू रूप से करें, करने के बाद कर्ता न मानकर साक्षी भाव में आए, व्यक्तिगत खर्च कम करें। ये तीन बातें तो हो गई।
चौथी बात, सत्संग और स्वाध्याय को न छोड़ें। श्री राम! जैसे शिशु के लिए पैपान है, ऐसे साधक के लिए सत्संग है। किसी भी बल पर, किसी भी मूल्य पर सत्संग का घात न करें। सत्संग को जितना आप इस शरीर को स्नान कराने की आवश्यकता है, रोटी खिलाने की आवश्यकता है, उतना ही स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता है अंतःकरण को। हम लोग बड़ी गलती क्या करते हैं कि कहीं भी जाना आना है तो पहले तो सत्संग और साधना में ही धड़ाका करते, कटिंग कर देते हैं, आरा रख देते हैं वहां।... तो मानना पड़ेगा कि नश्वर व्यवहार को, नश्वर जगत को आपने जितना मूल्य दिया है, उतना भगवान को तुमने मूल्य नहीं दिया। और जो भगवान का समय निकाल कर संसार में लगाता है, संसार उसको तप्पे मारता है। ऐसा देखा गया है। बच्चा पैदा होता है, पढ़ेगा कि नहीं पढ़ेगा उसमें संदेह है। शादी करेगा कि नहीं करेगा उसमें संदेह है। घर में रहेगा कि बाप से जुदा हो जाएगा उसमें संदेह, लेकिन मरेगा कि नहीं मरेगा उसमें कोई संदेह नहीं है। मरना तो जरूर है, तो फिर मजूरी कर कर के क्या मरना, राम में आराम पाकर मरना है। श्री राम! इंद्रिय वश क्यों नहीं होती? मन वश क्यों नहीं होता कि हमने जिन चीजों को महत्व नहीं देना चाहिए, उन चीजों को महत्व दे रखा है। जिस कर्मों को महत्व नहीं देना चाहिए, उन कर्मों को महत्व दे रखा है। जिस व्यवहार को महत्व कम देना चाहिए, उसको हमने अधिक दे रखा है। इसलिए हमारा
इंद्रियां, मन और बुद्धि परमात्मा में स्थिर नहीं हो पाती।
आत्म साक्षात्कार करने में अथवा अपने हृदय में ईश्वर है, उसका अनुभव करने में तीन बातें अड़चन करती है बस, केवल तीन बातें।
पहली बात है जीने की इच्छा। आप जीने की इच्छा न करेंगे, तभी भी जिएंगे भैया। श्री राम। श्री राम।
एक तो जीने की इच्छा, दूसरा करने की इच्छा और तीसरा पाने की इच्छा। ये तीन चीजें जो है इंसान को ईश्वर, है तो इंसान ईश्वर, है तो आत्मा परमात्मा। नानक तुमसे बड़े नहीं थे, कृष्ण तुमसे बड़े नहीं थे, कबीर तुमसे बड़े नहीं थे, लीलाशाह साईं तुमसे बड़े नहीं थे और तुम उनसे छोटे नहीं हो, लेकिन छोटे तुम रह गए और वे बड़े हो गए। कारण एक ही है। इन तीन चीजों को वे लोग समझ गए और अपन लोग नहीं समझते हैं। जीने की इच्छा, शरीर में ममता, जीने की इच्छा, दूसरा करने की इच्छा, तीसरा पाने की इच्छा। यह जो तीन इच्छाएं हैं जीने की इच्छा, करने की इच्छा और पाने की इच्छा, इसी से आदमी अपने केंद्र से बाहर आ जाता है। श्री राम। श्री राम।
अगर ये तीन इच्छाएं जितने अंश में कम होगी, उतने अंश में आदमी महान हो जाएगा। और अगर ये इच्छाएं तीनों भीतर से चली गई तो आदमी, आदमी के रूप में तो दिखेगा, लेकिन उसके द्वारा परमात्मा अठखेलियां करेगा। बाहर से तो कार, कार दिखेगी, लेकिन अंदर इंजन बदल जाएगा। ऐसे ही वो आदमी तो आदमी दिखेगा, व्यक्ति तो व्यक्ति दिखेगा, लेकिन अंदर जीव की जगह पर ईश्वर अठखेलियां करेगा। नानक जब घर छोड़कर गए, साधन भजन करके आत्मज्ञान पाकर आए तो उसका बाप बोलता था कि इसको तो मैं जानता हूं, ये तो नानक है। मॉडल नानक का है, लेकिन अब वो नानक को नानक मत समझो, गुरु नानक समझो तो कल्याण होगा। देवहुति ने अपने पुत्र के अंदर, कपिल मुनि के अंदर भगवान के गीत सुने और उनका उपदेश सुनकर माता देवहुति गदगद हो गई। आत्माराम को प्राप्त हुई। उसके नेत्रों से जो जल चला, वो जल की बूंदें जहां पड़ी, जहां जल के बिंदु पड़े, वो सिद्धपुर में बिंदु सरोवर के नाम से प्रसिद्ध हुए। श्री राम। ये आत्म खजाना ऐसा है कि नहीं देखता है कि सामने वाला बेटा है कि बाप है, पापी है कि पुण्यात्मा है, पढ़ा लिखा है कि अनपढ़ है। इतना महापापी साढ़े सात बैलगाड़ियां भर जाएं, इतने जने वो द्विजातियों के उतरवा लिए थे। वालिया लुटारा। लूटा था लोगों को। जो मर जाते थे, उनके जनेऊ साढ़े सात बैलगाड़ियां भर जाए, उतने इकट्ठे हुए थे। साधु और ब्राह्मणों को भी छीन लेता था। दूजों को मार देता था। ऐसा वालिया लुटारा वाल्मीकि ऋषि बन सकता है, तो तुम्हारे घर का कोई कुटुंबी या तुम आत्मज्ञान पा लो, इसमें कोई कठिनाई नहीं है भैया। श्री राम। श्री राम। एक काम करिए कि मन को, इंद्रियों को श्री राम। श्री राम। और बुद्धि को तुम सत्संग के रस से थोड़ा भर दोगे ना, तो जीवन से दुख, चिंता और नरक चला जाएगा। और मनमानी करोगे तो जाना तो सबको है देर सबेर। मनुष्य जन्म का दुरुपयोग हो जाएगा। और मनुष्य जन्म का दुरुपयोग हुआ ना, तो समझो चौरासी लाख जन्म, कभी घोड़ा बनेंगे, कभी गधा बनेंगे, कभी पेड़ बनेंगे, कभी कुछ बनेंगे। तो हम लोगों को चौरासी, चौरासी लाख जन्म भोगना पड़ता है। अब मनुष्य जन्म में एक बात संत के हम सुन नहीं सकते हैं। जब घोड़ा बन गए और हंटर लगेंगे, गाली पर गाली बरसेगी तब, जब गधा बनेंगे और गाली पर गाली बरसेगी तब, जब खच्चर बनेंगे तब, बैल बनेंगे तब। श्री राम। श्री राम।
कबीर जी कहते हैं:
सांझ पड़ी दिन आतम्या दीनी चकवी रोय।
चलो चकवा वहां जाइए, जहां दिवस रैन न होय।
शाम पड़ी, चिड़िया रो पड़ी कि चलो चकवा ऐसी जगह जाएं कि रात न हो, क्योंकि रात को तुम अलग घोंसले में जाते हो, मैं अलग जाती हूं।
कबीर जी कहते हैं: रैन की बिछड़ी चकवी आन मिले प्रभात।
चकवा ने कहा, तू शाम को बिछड़ेगी तो सुबह मिलेगी आकर। लेकिन मनुष्य जन्म में जो परमात्मक ज्ञान से बिछड़ गया, वो फिर चौरासी लाख योनियों में न सुबह मिल सकता है, न शाम मिल सकता है, न दोपहर मिल सकता है, न रात मिल सकता है, न प्रभात मिल सकता है, न मध्यरात मिल सकता है। वो फिर एक मनुष्य जन्म है, जो अंदर ज्ञान की धारा बैठी है परमात्मा की, उसके साथ मनुष्य मिल सकता है। अगर मनुष्य जन्म गया तो सब कुछ गया। रुपए पैसों की एक थप्पी कम कर दे, नौकरी के एक साल कम कर दे। श्री राम! थाली में आई हुई दो रोटियां कम कर दे, लेकिन हमारे से हे भगवान सत्संग मत छीनना। सत्संग से वंचित रहना महान पापों का फल है। और सत्संग से करीब आना महान पुण्यों का द्योतक है ।
हम बोलते स्वभाव नहीं बदलता रा को स्वभाव पड़ी ग बदला तो नथी स्वभाव कोई दाड़े बदला नहीं स्वभाव हो तो बदल नहीं सकता अग्नि का स्वभाव उष्ण है व चाहे ब्राह्मण के घर में हो चाहे चांडाल के घर में हो चाहे हिमालय में हो चाहे मरुभूमि में हो अग्नि का स्वभाव उष्ण है बर्फ का स्वभाव शीतल है जल का स्वभाव द्र भूत है स्वभाव नहीं बदलता और अगर स्वभाव नहीं बदलता तो फिर उपदेश की मंत्र की अनुष्ठान की या शास्त्रों की आवश्यकता [प्रशंसा] नहीं अगर स्वभाव बदल नहीं सकता तो फिर उपदेश की जरूरत नहीं है शास्त्रों की जरूरत नहीं है आचरण धर्मा अनुष्ठान की जरूरत नहीं है और जो बदलता वह स्वभाव नहीं होता श्री राम जो बदलता है वह स्वभाव नहीं होता जैसे ब्रह्म का स्वभाव है स्पूर्ण ब्रह्मा का स्वभाव है सृष्टि को सत्ता देना अब ब्रह्म का स्वभाव बदलता नहीं है स्वभाव नहीं बदलता जो बदलता है वह स्वभाव नहीं होता है यह बहुत सूक्ष्म बात है ध्यान से आप सुनने की कृपा करना स्वभाव बदलता नहीं है और जो स्वभाव है वह बदला स्वभाव बदलता नहीं और जो बदलता है वह स्वभाव होता नहीं बदलता है विचार बदलती है कल्पनाएं बदलती है मान्यताएं हम बोलते हैं स्वभाव बदल गया श्री राम ध्यान से सुनना बदलती है मान्यताएं बदलती है कल्पनाएं बदलते हैं विचार हम समझते स्वभाव बदला
मध्यरात्रि को बिल में से चूहा निकला शराबी शराब पीकर कुछ ढोल बैठे थे चूहा निकला और उसने थोड़ी शराब चाट ली नारंगी बारंगी होगी शराब के कई नामहोते हैं नारंगी श्राप होता है श्राप चाट ली और दो पैरों के बल खड़ा हो गया चुआ बोले बुलाओ बिल्ली फिल्ली शेर बेर को कौन होते है मेरे सामने आज तक कई हमारे नाती गोतिया को उसने हजम किया अब मुझे पता चला बोला बिल्ली कहां रहती शेर कहां रहते हैं दो पैरों के बल्ब से खड़ा हो गया छोटा छोटा तो उसका मुंह जरा सी उसी मछ और दोनों हाथों से दोनों मूछों को फरफरा रहा है अब चूहा बिल्ली को चैलेंज कर रहा है क्या उसका स्वभाव है उसकी प्रकृति नहीं है तो स्वभाव नहीं बदला उसकी मान्यता बदली श्री राम श्रीराम मान्यता क्यों बदली कि जरा सी शराब आ गई और अपने को विशेष मानने लगा ऐसे ही हम कई चूहों को जानते हैं कोई बीए पड़ा चूहा है कोई एमए पढ़ा चूहा है कोई कहीं किसी पद पर पहुंचा हुआ है तो यह धन की पद की सत्ता की शराब पीकर हम आ जाते हैं कि हाय आप तो ये उधारी चीजें जैसे ने शराब चाट ली ऐसे ही हमारे मन ने उधारी बहार की कोई मान्यता चाट करर और अपना मन आ गया आप आई एम समथिंग लेकिन जब मौत आती है तो फिर देखो कहां जाता है वो वो स्वभाव नहीं है मैं कुछ हूं ये आपका जो कहना है ना धन को लेकर मैं कुछ बने सत्ता को लेकर मैं कुछ बने सौंदर्य को लेकर आप कुछ बने हैं मित्र और परिवार को लेकर आप कुछ बने हैं तो आपका स्वभाव नहीं है नारायण श्री राम कृपानाथ य कृपा करना आप लोग यह आपका स्वभाव नहीं है यह पराई शराब चाट करर आपके मन की एक वृति है वृतिया बदलती रहती है स्वभाव उसका साक्षी है जब डर लगता है तब भी वृति शराब नहीं चाटती लेकिन और कोई कल्पना में फसी और जब कोई सत्ता का धन का कोई शराब पी लेते हो तो बिल्ली से तो चूहा डरता है लेकिन अभी दो पैर पर खड़ा हो गया है इ लंबा समय नहीं खड़ा रहेगा क्यों कि बोतल के सहारे हैं वो ऐसे हम लोग भी जो बोतलों के सहारे खड़े हो जाते हैं ना हम भी जो दो पैर के बल पर खड़े हो जाते हैं सीना फूलते ये हम कुछ वस्तुओं को अपने में जोड़कर अपना मन इंद्रियां पदार्थों को देखती है और मन उसके साथ चिपकता है और फिर उसको अपना मानकर और कुछ फूलता है श्री राम आपका स्वभाव है कि इंद्रिया और मन अनुकूल चेष्टा करें तब भी आप देख रहे हैं मिश्रित चेष्टा करें तब भी आप देख रहे हैं और प्रतिकूल चेष्टा करें तब भी आप देख रहे हैं आपका स्वभाव है साक्षी स्वभाव श्री राम कृपानाथ इस बात को आप अपनी बना लीजिए मेरी मत रखिए आपकी बात है ऐसा समझिए श्री राम आपका स्वभाव कभी नहीं बदलेगा और बदलने की इच्छा भी नहीं करना आज तक जो स्वभाव आप मान बैठे हैं वह आपका स्वभाव नहीं है वह इंद्रियों का स्वभाव है बीड़ी पिए बिना नहीं रह जाता क्योंकि मेरा स्वभाव पड़ गया लेकिन फिर उन आदमियों ने बीड़ी छोड़ी दारू बिना भोजन ना मिले तो ना मिले लेकिन बोतल मिले ऐसे आदमियों ने दारू छोड़ दिया झगड़ा छोड़ दिया वालिया लुटारा जैसा आदमी बोले स्वभाव बदल गया स्वभाव नहीं बदला उसके मन की वृत्तियां बदली उसके इंद्रियों की दिशा बदली उसके बुद्धि के निर्णय बदले वह तो वही का वही था श्री राम तो यहां आज के श्लोक से हम इतना जरूर समझेंगे कि जैसे दरिया के किनारे आप खड़े तमाम लहरियां उठ उठ कर लीन हो रही है आपको कोई आपत्ति नहीं लहरियां उठने का मजा ले सकते हैं ठंडी हवाओं की खबरें सुन सकते लेकिन अगर दरिया में अपने आप को आपने उछल दिया फिर लहरियों की थप्पड़ आपको परेशान करती है श्रीराम वह लहरियां तब तक आपके लिए दुखदाई नहीं है जब तक अपने आप को आपने दरिया के हवाले नहीं किया जो दरिया में प्रवेश किया तो वो जो सुंदर थी सुखद थी ठंडी खबरें देने वाली लहरियां थी वही आपको छिन्न भिन्न करने में काम आएगी ऐसे ही इंद्रियों की या चित्त की जो लहरियां है उसको आप किनारे होकर दृष्टा होकर देखें तो संसार में हंसने का मजा है रोने का मजा है नरोवा कुंज रोवा कहने का मजा है मक्खन चुराने का मजा है चुटल तानने का मजा है बंसी बजाने का मजा है पूरे हैं वो मर्द जो हर हाल में खुश है अगर तरंगों से थोड़ा अलग होकर आप कृपानाथ थोड़ा सा इस बात पर ध्यान दीजिए अगर आप सागर की तरंगों से पृथक होकर तरंगों का मजा लेते हैं तो आप हैं कृष्ण श्री राम आप है क्राइस्ट आप है बुद्ध आप है नानक आप है कबीर अगर आप उन तरंगों में घुस जाते मजा लेने के लिए किनारे खड़ा रह के मजा नहीं लेते मजा आया तो एकदम उनको बात भिड़ा के अंदर जाते हैं व मजा तो मजा गया फिर जान छुड़ाना मुश्किल हो जाता है श्री रामम ऐसे ही मन और इंद्रियों के तरंगों को देखकर अपने स्वभाव में आप खड़े हैं तो ठीक है लेकिन आप अपने स्वभाव को छोड़ते नहींहै अपने स्वभाव को बदलने की जरूरत नहीं आप अपने स्वभाव को भूल जाते हैं और पर स्वभावको अपने ऊपर हावी कर देते श्री राम आप अपने असली स्वभाव को भूल जाते हैं और पर स्वभाव को हावी कर देते हैं कैसे जैसे महाराज आप बैठे हैं सड़क के किनारे आपका फर्स्ट क्लास बंगला है निकली गाड़ियां निकली बारात आप देख केर खुश हो रहेहैं निकले इसको स्टर निकली मोटर आप देखने वाले मजा ले रहे एक दिन बढ़िया बारात निकले और मोटर गाड़ी निकले और दूसरे दिन किसी की आखिरी बारात निकले और बैल गाड़िया निकले अब मोटर गाड़िया देखकर आप खुश होकर उनमें चल बसे और बारात आए तो उसके साथ चल दे अथवा अर्थी आ जाए तो उसके साथ चिपक के और लकड़ में अपने को उलझा दे तो आप जुड़ गए उस दृश्य के साथ श्री राम अगर आप अपने घर में हैं और आपको इतनी समझ है कि रस्ता है सड़क है यहां से सब पसार होने वाला है बारात भी पसार होती है अर्थी भी पसार होती है कार भी पसार होती है बस भी पसार होती है स्कूटर भी पसार होती है बेल गाड़िया भी पसार होती है ऑटो रक्षा भी पसार होती है पैदल वाले भी पसार होते हैं कोई सज्जन भी पसार होते हैं कभी दुर्जन भी पसार होते हैं क्योंकि सड़क है श्री राम अच्छे आदमी पसार हो तो आप थोड़ी देर के लिए हां धन्यवाद हा ठीक है अच्छे पसार हुए तो अपने को अच्छा मानने लगे और डाकू पसार हुए तो अपने को डाकू मानने लगे मुर्दा पसार हुआ तो अपने को मुर्दा मानने लगे और वर राजा पसार हुआ तो 60 वर्ष का डो हा अपने को वर राजा मानने लग जाए तो उस आदमी ऊ परर जैसे आपको हंसी आती है कृपानाथ ऐसे ही ज्ञानवान को तुम्हारे पर हंसी आती है यत इंद्रिय मनो बुद्धि मुनि मोक्ष परायण विगत इच्छा भय क्रोध यस सदा मुक्त एव स जिसकी इंद्रियां मन और बुद्धि जीती हुई है जीती हुई का मतलब यह नहीं कि तरंग उठे नहीं मन से संकल्प हो नहीं अथवा इंद्रियों से कोई उपयोग ना करें इंद्रियों का उपयोग तो करें अब एक बात फिर समझे आप रूम में बैठे हैं और अंदर से कड़ी लगा दी आप भले चार घंटे बैठे रहे आप स्वतंत्र है आपको दुख नहीं है आप रूम में गए और किसी ने कुंडा लगा दिया बाहर से ल ड्रा लगा दिया कड़ा लगा दिया भले थोड़ी देर के लिए लगाया लेकिन किसी ने लगाया तो आप पराधीन हो गए और आपने लगाया है तो आप स्वाधीन है श्री राम ऐसे ही अपनी सत्ता में रहकर आप युद्ध करते हैं भोग भोगते हैं बच्चे को जन्म देते हैं इन इंद्रियों का आप उपयोग करते हैं तो आप रूम में अपनी सत्ता से बैठे आप अपनी मौज से क्रिकेट खेलते हैं या बाजार में धंधा करते उसका अलग स्वाद है और वेट कोई करा दे उतने काम की तो अलग बात है ऐसे इंद्रियों के और जगत को सत मानकर मन के भाव में बह जाना यह पशुता है और इंद्रियो को मन को उचित जगह पर स्टेरिंग को उचित जगह पर घुमाते रहना और अपनी यात्रा जीवन की करना य वांछनीय है श्री राम ऐसा नहीं है कि आप भोग भोगते और ज्ञानवान कुछ नहीं करते होंगे अरे तुमने जो सुख लिया ना वो तो तुम्हारा तो सुख कुछ नहीं ज्ञानी को तो ऐसे ऐसे सुख के प्रलोभन आते हैं कि उसके आगे आपका तो कुछ नहीं है अपने लोगों को संसारी लोगों को तो जो पत्नी जो स्त्री लड़ती है नाक सुको है बगासा खाती है पसीना निकलता है झुरिया पड़ जाती है ऐसे भोगों से अपन लोग आकर्षित हो जाते ज्ञानवान के आगे योगी के आगे तो अप्सराएं आती है जो कभी बगासा नहीं खाती पसीना नहीं होता झुरिया नहीं पड़ती और भी क्या क्या उनमें वो तो यह चीजें उन लोगों के शरणागत हो जाती है और हम लोग तुच्छ चीजों के शरणागत हो जाते हैं श्री राम आप संसार के भोग नहीं चाहेंगे तो संसार के भोग आपके चरणों में आएंगे उनका भी अनादर कर देंगे अपने स्वरूप में मस्त रहेंगे तो देव देव योनि के भोग भी आपके आ गछ अगर उनकी भी परवाह नहीं करेंगे तो ईश्वर स्वयं आ जाएगा ईश्वर आ जाएगा यह लौकिक भाषा में कहना पड़ता है ईश्वर कभी गया ही नहीं तो आएगा क्या अर्थात अपने ईश्वर तोव का आपको बोध हो जाएगा ज्ञान हो जाएगा जिस चीज का बोध नहीं है वह चीज होते हुए भी नहीं है जिस चीज का पता चल गया उसके होने का फायदा है सदियों से परमात्मा आपके साथ है अज्ञानी से अज्ञानी मूड से मूड अनजान से अनजान व्यक्ति भगवान उतना ही है उसके पास पास जितना बुद्ध के पास है सदियों से आप नहीं जानते तब भी भी परमात्मा तुम्हारा है और युगों से जगत को पकड़ते आए तभी भी जगत की चीज तुम्हारी नहीं जगत की चीज भी तुम्हारी नहीं है तो यह शरीर भी तुम्हारा नहीं है शरीर में रहने वाली इंद्रिया भी तुम्हारी नहीं है मन भी तुम्हारा नहीं है बुद्धि भी तुम्हारी नहीं है यह प्रकृति की चीजें है और यह प्रकृति की चीजें इसलिए बदलती रहती है श्री राम प्रकृति में परिवर्तन है तो यह चीजें बदलती रहती है फिर बदलने की स्पीड कम हो चाहे ज्यादा हो लेकिन बदलती जरूर है जो बचपन में आंखें थी जो जवानी में आंखों का रोशनी था तेज था वह बुढ़ापे में नहीं रहताजो बचपन में इंद्रियों की चंचलता थी और जनियो में इंद्रियों के जो विकार थे वह बुढ़ापे में नहीं रहता लेकिन तृष्णा बुढ़ापे में जो बढ़ती है वो बचपन में नहीं थी श्री राम वासना और चिकास जो बढ़ जाती है बुद्धि और मन में वह बचपन में नहीं होती वह जवानी में नहीं होती ईश्वर के सुख के बिना आरोपित सुख जो भी लोगे उसको प्राप्त करने में परिश्रम भोगते समय भय और जाने के बाद विषाद होता है श्री राम कितना सत्य है ईश्वरीय सुख के बिना आत्मा परमात्मा के सुख के बिना जो भी आप सुख लेंगे उस सुख को लेने में परिश्रम होगा भोगने में भय होगा और नाश में विषाद होगा और नाश जरूर होगा श्री राम रूपसी मगरूर नथी ए दो हुसन नाज न कर रूप सबई रावल रूप है तो मगरूर मत हो हुसन पर नाज मत करो झुरिया आने को है श्री राम सौंदर्य है तो बुढ़ापे का भय रहेगा सत्ता है तो पांच वर्ष के भीतर ही भीतर हिल जाए अथवा पाच वर्ष पूरा होते हिल जाए अथवा चालू पाच वर्ष में कितला फेंका गया कितला लेवा गया ईश्वरीय सुख के बिना आत्मा परमात्मा के सुख के बिना जो भी सुख है वह चूहे की शराब जैसा है श्री राम चाहे फिर व डेरी का सुख हो डेरे का सुख हो यह मठ मंदिर डेरा उसका सुख हो लेकिन समाज की बड़ी कमजोरी यह है कि जिस महात्मा का डेरा बड़ा जिसके शिष्य बड़े वो महात्मा बड़ा ऐसा नहीं है सत्य के आगे यह चीजें मूल्य नहीं रखती हम तो वही के वही थे लेकिन जब य आर्च बनी और अमेरिका जाकर आए तो अब हम बड़े हो गए राम राम राम इन तुच्छ चीजों के कारण हमारा मूल्य बढ़ा और यह तुच्छ चीजें चली जाए तो हमारा मूल्य घटे हमारा मूल्य तो वही था जो पहले था अब भी और बाद में रहेगा वह हम आत्मा है ऐसा महात्माओं को अनुभव होता है चाहे लोग पूजा करें सुवर्ण के बर्तनों में खिलाए और बख मल बिछा दे पुष्प बिछा दे तभी भी महात्मा वहीं का वहीं होता और चाहे लोग जूतियां उछाल दे और दुनिया भर का अपमान कर दे तभी भी सच्चा महात्मा तो वहीं का वहीं होता जहां उसको होना चाहिए श्री राम हम लोग क्या है कि हम लोग परिस्थितियों में होते हैं ना उसी ये परिस्थितियां हमको दबा देती है तो आप इंद्रियों में ना रहिए अन दता मन में मत रहिए बुद्धि में मत रहिए लेकिन इंद्रियों को मन को और बुद्धि को जो सत्ता देता है वो तुम्हारा असली स्वभाव आप अपने आप में रहिए श्री राम अपनी समझ इंसान को जब तक आती नहीं दिल की परेशानी तब तक दुनिया से जाती नहीं अपने आप का स्वभाव का जब तक पता नहीं चलता तब तक बेचैनी नहीं जाती बेचैनी दब जाना एक बात है बेचैनी भूल जाना दूसरी बात है बेचैनी को वि स्मृति के खाई में थोड़ी क्षणों के लिए डाल देना दूसरी बात है लेकिन बेचैनी अलविदा हो जाना बात निराली तो बेचनी अलविदा होने के लिए श्री कृष्ण का इस श्लोक को आप ठीक से समझेंगे जिसकी इंद्रियां मन और बुद्धि जीती हुई है ऐसा जो मोक्ष परायण मुनि इच्छा भय और क्रोध से रहित हो गया है वह सदा मुक्त ही है यत इंद्रिय मनो बुद्धि मुनि मोक्ष परायण विगत इच्छा भय क्रोध यह सदा मुक्त एवस इसमें जब तक भीतर का रस आता नहीं तब तक इंद्रिया और मन वश होते नहीं और जब तक मन वश होता नहीं तब तक भीतर का रस आता नहीं श्री राम हम समझते हैं भीतर का रस आए तब छोड़े ऐसा नहीं है और वोह बोलता भीतर वाला बोलता कि बाहर का छोड़ो तब मिलू अब क्या किया जाए थोड़ा आप सुर को थोड़ा वो सुरके तो हम सौदा बना दे होता है ना व दलाल लोग क्या करते वो बोलता हमको डेढ़ लाख चाहिए वो बोले हम लाख से एक पैसा भी ज्यादा नहीं दूंगा और लाख वाला सवा पे आवे और डेढ़ वाला थोड़ा नीचे आए सौदा हो जाता है ना ऐसे कुछ थोड़ा आप संयम करे और थोड़ा मैं उसको रिझा दूं ले जय जय जैसे नाविक नाव को ले जाता और नाव नाविक को ले भागती है नाविक नाव को ले जाता है और नाव नाविक को ले जाती है सापेक्ष है ऐसे ही इंद्रिय और मन को थोड़ा सा अंतर्मुखी के पोषक इंद्रिया मन अंतर्मुखी इसलिए पहले त्याग करना पड़ता है बाद में वैराग्य आता है त्याग करना माना हिम्मत करना है और फिर वैराग्य मन ऐसा रस मिल गया कि अब राग रहा नहीं त्यागी के अंदर में राग है बाहर से त्याग है लेकिन बाहर का त्याग जब उसका फलित होता है तो अंदर से बैराग्य पैदा होता है राग चला गया वस्तु रही तो कोई हरकत नहीं तुम्हारे पास क्या है एक दो चार छोटा पांच बच्चा होगा सात बच्चे होंगे और क्या होगा वशिष्ठ के पास एक स लड़का और मुक्त है भगवान राम का गुरु संसारी नहीं 100 बच्चों का बाप अपन संसारी कृष्ण के कितने बच्चे य तो कुल पूरा परिवार विस्तार देखो 16108 तो खाली मिसस थी बोलते 86000 तो खाली शिक्षक थे बच्चों को पढ़ाने के लिए तुम्हारे बच्चे को पढ़ाने के लिए एक शिक्षक दो शिक्षक सरोवर के किनारे रहकर लहरों को लहरों का मजा ले सकते हैं लेकिन सरोवर में जाकर लहरों का मजा लेना है तो थप्पड़ खानी देह छता जनी दशा वर्त देहाती इसलिए अन दता ईश्वर को भविष्य में पाना या सुख को भविष्य में पाना यह इच्छा छोड़ दो आपसे दूर है यह बेवकूफी को हटा दो और ईश्वर को आप नहीं पा सकते इस कायरता को अलविदा दे दो श्री राम आप ईश्वरी रस नहीं पा सकते यह का कायरता के विचारों को अलविदा दे दो ईश्वरी रस भविष्य में मिलेगा इस बेवकूफी को हटा दो और ईश्वर आपसे कहीं दूर है इस भ्रमण को भूल जाओ जय श्री कृष्णा चार बातें बहुत जरूरी है आप जो कुछ करते हैं सुचारु रूप से करो जो कुछ काम करते हैं दर्दी की सेवा करते नर्स है तो नर्स की ड्यूटी उस समय बजाओ रसोई करते तो रसोई प्रेम से करो दुकान प जाते जो कुछ करते सुचारु रूप से करो एक बात दूसरी बात करने के बाद अपने को करता मत मानो मन इंद्रियों ने और बुद्धि ने किया हम उससे अलग हरि ओम तत्सत आदु गप सब जो सुचारू रूप से करो और करने के बाद अपने इंद्रिया मन और बुद्धि ने किया है सत्ता मात्र साक्षी मात्र में हूं बाकी सब स्वपना है दो बात तीसरी बात अपना व्यक्तिगत खर्च कम करो व्यक्तिगत खर्च कम मनोबल बढ़ेगा आत्म रस की तरफ जाओगे तो तीन बातें हो गई ना सुचारु रूप से करें करने के बाद करता ना मानकर साक्षी भाव में आए व्यक्तिगत खर्च कम करें ये तीन बातें तो हो गई चौथी बात सत्संग और स्वाध्याय को ना छोड़े श्री राम जैसे शिशु के लिए पय पान है ऐसे साधक के लिए सत्संग है किसी भी बल पर किसी भी मूल्य पर सत्संगका घात ना करें सत्संग को जितना आप इस शरीर को स्नान कराने की आवश्यकता है रोटी खिलाने की आवश्यकता है उतना ही स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता है अंतक को हम लोग बड़ी गलती क्या करते हैं कि कहीं भी जाना आना है तो पहले तो सत्संग और साधना में ही धड़ाका करते कटिंग कर देते हैं आरा रख देते वहा तो मानना पड़ेगा कि नश्वर व को नश्वर जगत को आपने जितना मूल्य दिया है उतना भगवानको तुमने मूल्य नहीं दिया और जो भगवान का समय निकालकर संसार में लगाता संसार उसको थप्पड़ मारता है ऐसा देखा गया है बच्चा पैदा होता है पढ़ेगा कि नहीं पढ़ेगा उसमें संदेह है शादी करेगा कि नहीं करेगा उसमें संदेह है घर में रहेगा कि बाप से जुदा हो जाएगा उसमें संदेह लेकिन मरेगा कि नहीं मरेगा उसमें कोई संदेह नहीं मरना तो जरूर है तो फिर मजूरी कर कर के क्या मरना राम में आरा पाके मरना है श्री राम इंद्रिया वश क्यों नहीं होती मन वश क्यों नहीं होता कि हमने जिन चीजों को महत्व नहीं देना चाहिए उन चीजों को महत्व दे रखा है जिस कर्मों को महत्व नहीं देना चाहिए उन कर्मों को महत्व दे रखा है जिस व्यवहार को महत्व कम देना चाहिए उसको हमने अधिक दे रखा इसलिए हमारा इंद्रिया मन और बुद्धि परमात्मा में स्थिर नहीं हो पाती आत्म साक्षात्कार करने में अथवा अपने हृदय में ईश्वर है उसका अनुभव करने में तीन बातें अर्चन करती है बस केवल तीन बातें पहली बात है जीने की इच्छा आप जीने की इच्छा ना करेंगे तभी भी जिएंगे भैया श्री राम श्रीराम एक तो जीने की इच्छा दूसरा करने की इच्छा और तीसरा पाने की इच्छा ये तीन चीजें जो है इंसान को ईश्वर है तो इंसान ईश्वर है तो आत्मा परमात्मा नानक तुमसे बड़े नहीं थे कृष्ण तुमसे बड़े नहीं थे कबीर तुमसे बड़े नहीं थे लीला सा साई तुमसे बड़े नहीं थे और तुम उनसे छोटे नहीं हो लेकिन छोटे तुम रह गए और वे बड़े हो गए कारण एक ही है इन तीन चीजों को वे लोग समझ गए और अपन लोग ने समझते जीने की इच्छा शरीर में ममता जीने की इच्छा दूसरा करने की इच्छा तीसरा पाने की इच्छा ये जो तीन इच्छाएं हैं जीने की इच्छा करने की इच्छा और पाने की इच्छा इसी से आदमी अपने केंद्र से बाहर आ जाता है श्री राम श्रीम अगर यह तीन इच्छाएं जितने अंश में कम होगी उतने अंश में आदमी महान हो जाएगा और अगर ये इच्छाएं तीनों भीतर से चली गईतो आदमी आदमी के रूप में तो देखेगा लेकिन उसके द्वारा परमात्मा अठखेलिया करेगा बाहरसे तो कार कार दिखेगी लेकिन अंदर इंजन बदल जाएगा ऐसे वह आदमी तो आदमी देखेगा व्यक्ति तो व्यक्ति देखेगा लेकिन अंदर जीव की जगह पर ईश्वर अठखेलिया करेगा नानक जब घर छोड़कर गए साधन भजन करके आत्म ज्ञान पाकर आए तो उसका बाप बोलता था कि इसको तो मैं जानता हूं य तो नानक है मॉडल नानक का है लेकिन अब वो नानक को नानक मत समझो गुरु नानक समझो तो कल्याण होगा देवहुति ने अपने पुत्र के अंदर कपिल मुनि के अंदर भगवान के गीत सुने और उनका उपदेश सुनकर माता देवती गदगद हो गई आत्माराम को प्राप्त हुई उसके नेत्रों से जो जल चला वो जल की बूंदे जहां पड़ी ज जल के बिंदु पड़े वो सिद्धपुर में बिंदु सरोवर के नाम से प्रसिद्ध हुए श्री राम ये आत्म खजाना ऐसा है कि नहीं देखता है कि सामने वाला बेटा है कि बाप है पापी है कि पुण्यात्मा है पढ़ा लिखा है कि अनपढ़ है इतना महा पापी साढ़े सात बैल गाड़ियां भर जाए इतने जने द्विजा हों के उतरा लिए थे बालिया लुटा रहा लूटता था लोगों को जो मर जाते थे उनके जन् साढ़े सात बैल गाड़िया भर जाए उतने कट्ठे हुए थे साधु और ब्राह्मणों को भी छीन लेता था दीजों को मार देता था ऐसा वालिया लुटारा वाल्मीकि ऋषि बन सकता है तो तुम्हारे घर का कोईकुटुंबी या तुम आत्मज्ञान पा लो इसमें कोई कठिनाई नहीं है भैया श्री राम एक काम करिए कि मन को इंद्रियों को श्रीराम [संगीत] और बुद्धि को तुम सत्संग के रस से थोड़ा भर दोगे ना तो जीवन से दुख चिंता और नरक चला जाएगा और मनमानी करोगे तो जाना तो सबको है देर सवेर मनुष्य जन्म का दुरुपयोगहो जाएगा मनुष्य जन्म का दुरुपयोग हुआ ना तो समझो 84 लाख जन्म कभी घोड़ा बनेंगे कभी गधा बनेंगे कभी पेड़ बनेंगे कभी कुछ बनेंगे तो हम लोगों को 84 84 लाख जन्म भोगना पड़ता है अब मनुष्य जन्म में एक बात संत के हम सुन नहीं सकते हैं जब घोड़ा बन गए और हिंटर लगेंगे गाली पर गाली बरसेगी तब जब गधा बनेंगे और गाली पर गाली बरसेगी तब जब खच्चर बनेंगे तब बैल बनेंगे तब श्री राम कबीर जी कहते हैं सांझ पड़ा दिन आथ मा दिना चकवी रोए चलो चकवा वह जाइए जहां दिवस रैन ना हो हो शाम पड़ी चिड़िया रो पड़ी कि चलो चकवा ऐसी जगह जाएं कि रात ना हो क्योंकि रात को तुम अलग घोंसले में जाते मैं अलग जाती हूं कबीर जी कहते रैन की बिछड़ी चाक आन मिले प्रभात चकवा ने कहा तू शाम को बिछड़े गी तो सुबह मिलेगी आकर लेकिन मनुष्य जन्म में जो परमात्मा ज्ञान से बिछड़ गया वो फिर 84 लाख योनियों में ना सुबह मिल सकता है ना शाम मिल सकता है ना दोपहर मिल सकता है नारात मिल सकता है ना प्रभात मिल सकता है ना मध्य रात मिल सकता है वोह फिर एक मनुष्य जन्म है जो अंदर ज्ञान की धारा बैठी है परमात्मा की उसके साथ मनुष्य मिल सकता है अगर मनुष्य जन्म गया तो सब कुछ गया रुपए पैसों के एक थप्पी कम कर दे नौकरी के एक साल कम कर दे श्री राम थाली में आई हुई दो रोटियां कम कर दे लेकिन हमारे से हे भगवान सत्संग मत छीनना सत्संग से वंचित रहना महान का फल और सत्संग से करीब आना महान पुण्यं का तक है
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