ज्ञान ही ज्ञान - भाग-3 आश्रम संध्या सत्संग 08-02-26 सुबह
टाइम-स्टैम्प इंडेक्स
0:02 – पंचभूत और शरीर का रहस्य
0:26 – आकाश का महत्व और चार भूतों का आधार
1:00 – भूताकाश का स्वरूप और गुण
2:07 – चित आकाश और मन की गति
2:50 – चिदाकाश की सूक्ष्मता
3:33 – रामायण संदर्भ: चिदानंद स्वरूप
4:04 – चिदाकाश की व्यापकता
5:21 – योगी, ज्ञानी और ब्रह्मज्ञानी
6:18 – भगवान दर्शन और चिदाकाश का ज्ञान
7:09 – घटाकाश, मठाकाश और महाकाश
8:27 – सृष्टि, लय और चिदाकाश
9:07 – जीव कोटि और ईश्वर कोटि
10:30 – आत्मा, प्रकृति और आज्ञा का उदाहरण
11:17 – मन का उपदेश और मूल पहचान
12:01 – अपने स्वरूप को जानना
13:16 – ब्रह्मज्ञान को विमान की उपमा
14:10 – सर्वत्र, सदा और अभी का ईश्वर
16:10 – परमात्मा की समान उपलब्धि
18:12 – प्रेम और भक्ति में निकटता [कबीर वाणी]
19:14 – अमरता का बोध
20:59 – साक्षात्कार की तीन परीक्षाएं
22:00 – ज्ञानी और अज्ञानी का अंतर
23:31 – देह को स्कूटर की उपमा
24:17 – रमण महर्षि प्रसंग [कथा]
26:17 – जीवन की सहजता
27:35 – चित्त की ट्रैफिक का उदाहरण
29:15 – चल और अचल का विवेक
30:18 – बंधन का भ्रम और आत्मस्वरूप
पुनर्लेखन (नियम अनुसार)
0:02 यह शरीर पांच भूतों का पुतला है, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश।
0:10 लोग भूत कहते हैं, लेकिन सही अर्थ में यह पांच भूत ही हैं।
0:26 पृथ्वी, जल, तेज और वायु सभी आकाश के सहारे टिके हैं।
0:37 आकाश न हो तो हवा नहीं चले, पृथ्वी न ठहरे, जल न बहे और अग्नि न जले।
1:00 इसलिए पंचभूतों में आकाश मुख्य है।
1:07 जो आंखों से दिखता है वह भूताकाश है।
1:15 भूताकाश सबको स्थान देता है और स्वयं पर कोई लेप नहीं लेता।
1:29 मकान बनाओ या गिराओ, भूताकाश वैसा ही रहता है।
1:55 भूताकाश ब्रह्म की तरह सबमें होते हुए भी सबसे न्यारा है।
2:07 भूताकाश से सूक्ष्म चित आकाश है, जिसमें मन चलता है।
2:20 मन हवाई जहाज से भी तेज चलता है।
2:39 जहाज भूताकाश में चलता है और मन चित आकाश में।
2:50 भूताकाश और चित आकाश को जो अवकाश देता है वह चिदाकाश है।
3:00 चिदाकाश सबसे सूक्ष्म है, कल्पना से भी परे।
3:33 रामायण में कहा गया है कि राम चिदानंद स्वरूप हैं।
3:56 सत, चित और आनंद यही चिदाकाश का स्वरूप है।
4:11 चिदाकाश सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से भी स्थूल है।
4:17 बैक्टीरिया में भी वही चेतना है।
4:25 पर्वत उसके सामने राई के दाने समान हैं।
5:21 आत्मा का साक्षात्कार करने वाला योगी है।
5:28 ब्रह्मरूप साक्षात्कार करने वाला ज्ञानी और ब्रह्मज्ञानी है।
5:43 केवल भगवान का दर्शन भी अधूरा रह सकता है।
6:07 चिदाकाश में जागने से ही पूर्ण ज्ञान होता है।
6:24 भगवान भी चिदाकाश के सहारे ही प्रकट हैं।
6:46 हम सब उसी चिदानंद सत्ता से हैं।
7:02 जैसे मठ टूटने से आकाश नहीं टूटता।
7:16 वैसे ही सृष्टि के बनने बिगड़ने से चिदाकाश पर असर नहीं।
7:46 ज्ञानी अपने को चिदाकाश समझता है।
7:53 सृष्टियां सागर के बुलबुलों जैसी हैं।
8:27 ब्रह्म को परमात्मा या चिदाकाश कहो।
8:39 स्पंदन से फुरना होता है और जीवत्व आता है।
8:45 जिसने स्वरूप जान लिया वह ईश्वर कोटि में है।
9:07 प्रमाद से जीव कोटि बनती है, ज्ञान से ईश्वर कोटि।
10:30 आत्मा ब्रह्म है लेकिन प्रकृति के वश से जीव कहलाती है।
11:17 उपदेश है मन अपने मूल को पहचान।
11:38 अपने को न जाना तो गुरु या भगवान को कैसे जानोगे।
12:01 जिसने अपने को जाना उसने सब जान लिया।
12:40 हम आईने में शरीर देखते हैं, आत्मा नहीं।
13:16 ब्रह्मज्ञान विमान जैसा है, सीधे मंजिल पहुंचाता है।
14:10 ईश्वर सर्वत्र है, सदा है और अभी है।
15:11 जो सब में है वही हम में भी है।
16:10 संसार की वस्तुएं सबको समान नहीं मिलतीं।
16:29 परमात्मा सबको समान रूप से मिलता है।
17:28 प्रकृति अपूर्ण है, परमात्मा पूर्ण है।
18:12 प्रेम गहरा हो जाए तो भक्त भगवान को डांट भी देता है। [कबीर वाणी]
19:14 ज्ञानी जानता है कि वह कभी मरता नहीं।
20:59 साक्षात्कार की पहचान राग, द्वेष और अभिनिवेश का क्षय है।
22:00 ज्ञानी को जीने की लालसा और मरने का भय नहीं।
22:50 ज्ञानी और अज्ञानी दोनों को पीड़ा होती है।
23:11 फर्क केवल पहचान का है।
23:31 देह स्कूटर जैसी है, आत्मा चालक है।
24:17 रमण महर्षि का जीवन सहज और स्वाभाविक था। [कथा]
26:17 ज्ञानी क्रोध और दया को होने देता है।
27:35 जीवन में कभी ट्रैफिक है कभी सन्नाटा।
28:00 ज्ञानी देखने का आनंद लेता है।
29:15 संसार में चल और अचल दो तत्व हैं।
29:34 चल को चल मानो और अचल में स्थित हो जाओ।
30:05 बंधन केवल मान्यता से बनता है।
30:18 तू वही का वही है, केवल भ्रम में बंधा है।
Manual Transcription
ये अपना जो शरीर है ना, वो पाँच भूतों का पुतला है। भूत है ना—भूत, पाँच! बोलते हैं बहुत भूत है, नहीं, पाँच भूत हैं। क्या, क्या प्राओ? कितने भूत हैं न? पाँच भूत हैं।
बाकी के चार भूत जो हैं ना, वो आकाश के सहारे हैं। उसको भूताकाश कह देना। पृथ्वी, जल, तेज, वायु—ये चारों के चार जो भूत हैं, वो आकाश के सहारे हैं। आकाश नहीं हो तो हवा कहाँ घूमेगी? आकाश न हो तो पृथ्वी कहाँ ठहरेगी? बोला ना, आकाश नहीं हो तो नदियाँ कहाँ बहेंगी? आकाश न हो तो लपटें कैसे चलेंगी?
तो जो पाँच भूत हैं, उनमें मुख्य पहले हैं—ये भूताकाश।
भूताकाश जो हमें आँखों से दिखता है, वो भूताकाश है। तो आकाश भी तीन प्रकार के हैं। जैसे यह भूताकाश है—सबको ठौर देता है और लिपायमान नहीं रहता। मकान बना लो, गाड़ियाँ भगा लो, हवाई जहाज़ दौड़ा लो—सबको स्थान देता है भूताकाश, सबको ठौर देता है। नदियाँ, नाले, पर्वत, बाढ़ आ जाए—लेकिन भूताकाश को कुछ नहीं। सब उसके अंदर हैं, सब में वो है, लेकिन उसको कोई लेप लगता ही नहीं।
मकान बनाओ, तुम गंदगी करो, गंदगी हट जाए—तभी भी भूताकाश वही का वही। सफ़ाई रहे—तब भी भूताकाश वही का वही। भूताकाश मानो ब्रह्म है—सब में होते हुए, सदा होते हुए, सबसे न्यारा।
इस भूताकाश से सूक्ष्म होता है चिताकाश। ये भूताकाश में तो हवाई जहाज़ घूमते हैं, वो चिताकाश में मन घूमता है। हवाई जहाज़ों से मन ज़्यादा तेज़ होता है। अमेरिका जाना है न प्राओ तेनु—अठारह घंटे जहाज़ दौड़ेगा, तब अमेरिका पहुँचोगे। और मन कितने घंटे में पहुँचेगा? अभी गया, आया। अभी अमेरिका गए, आए।
तो मन दौड़ता है चिताकाश में, जहाज़ दौड़ता है भूताकाश में।
और भूताकाश और चिताकाश—चिताकाश समझ में आया न तुझसे?
तो भूताकाश और चिताकाश—ये दोनों आकाशों को जो अवकाश दे रहा है, उसको कहते हैं चिदाकाश। वो भूताकाश से चिताकाश सूक्ष्म है और चिताकाश से चिदाकाश सूक्ष्म है।
बाल का अग्रभाग—उसका हज़ारवाँ हिस्सा। बाल का अग्रभाग—उसके हज़ार हिस्से। उस हज़ार में हिस्से के एक हिस्से के लाख हिस्से करो—वो भी चिदाकाश के आगे मोटा है। चिदाकाश इतना सूक्ष्म है।
रामायण में आया है— चिदानंदमय देह तुम्हारी, विगत विकार को जाने अधिकारी।
हे राम जी, तुम कैसे हो? दिखते तो ऐसे हो दशरथ नंदन, लेकिन तुम तो चिदानंद हो।
व्यवहार में भी बोलते हैं—जय सच्चिदानंद! जय सच्चिदानंद, आके देखिए।
तो सत्, चिद् और आनंद।
तो चिदाकाश जो है ना, वो चिद्-अणु भी कहा गया। वो सूक्ष्म से सूक्ष्म है और स्थूल से स्थूल है। सूक्ष्म से सूक्ष्म इतना कि बैक्टीरिया के अंदर भी उसकी चेतना है, तभी बैक्टीरिया जीता है—जो आँखों से दिखते नहीं। और स्थूल से स्थूल इतना कि इतना व्यापक है कि सुमेरु पर्वत भी उसके आगे राई का दाना है—इतना वो बड़ा, व्यापक है।
कल्पना करो—हमारी नज़र जहाँ तक जाती है, वहाँ तक ये आकाश दिखता है। लेकिन उतना तो है नहीं। पृथ्वी का तो राउंड लगा लिया। आकाश का अंत बताओ वैज्ञानिक—नहीं बता पाएँगे। पृथ्वी को तो घुमा लिया, जहाज़ से देख लिया। आकाश!
ऐसा आकाश—भूताकाश, चिताकाश—जिनमें तुच्छ हिस्से पड़े हैं, वो चिदाकाश है।
इसलिए आत्मा का जिसको साक्षात्कार होता है, उसको योगी कहते हैं। लेकिन आत्मा ब्रह्म रूप है—ऐसा साक्षात्कार होता है, उसे ज्ञानी कहते हैं, ब्रह्मज्ञानी कहते हैं।
और ब्रह्मज्ञानी का दर्शन—बड़े भागी पावै, ब्रह्मज्ञानी को बल-बल जावै।
भगवान राम का दर्शन हो जाए, कृष्ण का दर्शन हो जाए, गुरु नानक का दर्शन हो जाए, झूलेलाल का दर्शन हो जाए—फिर भी कुछ बाकी रह जाता है। गुरु नानक का दर्शन तो बहुत लोगों ने किया, कृष्ण का दर्शन तो बहुत लोगों ने किया।
लेकिन गुरु नानक या कृष्ण ने जो चिदाकाश का बयान किया, जिस चिदाकाश में नानक, कृष्ण या कबीर जगे थे—उसमें नहीं जगा अर्जुन। इसलिए अर्जुन रो रहा था। और अर्जुन ने उपदेश मानकर जब जगा, तो अर्जुन का बेड़ा पार।
भगवान का दर्शन करें तो भी चिदाकाश का दर्शन बाकी रह जाता है। चिदाकाश का दर्शन कर लिया—भगवान का दर्शन न भी करें, तो चल गया। क्योंकि भगवान भी चिदाकाश के सहारे ही हैं।
गन्ने का रस इख के सहारे है—पानी के सहारे। ऐसे ही वो ब्रह्म, परमात्मा—विष्णु, शिव, ब्रह्मा, देवी-देवता, अवतार—सबके अंदर सत्ता उसकी है।
तो उस चिदानंद चिदाकाश सत्ता से हम लोग हैं, लेकिन हमारी सत्ता से चिदाकाश नहीं है। जैसे भूताकाश की सत्ता से मठ-आकाश है। मठ-आकाश के कारण भूताकाश थोड़े है?
यह हमारा मठ बना, हॉल बना। इसमें जो आकाश आया, उसको मठ-आकाश कहा। तो महाकाश के सहारे मठ-आकाश है। मठ-आकाश तोड़ देने से महाकाश थोड़े टूट जाएगा?
हॉल तोड़ देंगे तो भूताकाश का क्या बिगड़ेगा? और हॉल बना दिया तो उसका क्या सुधरेगा?
जैसे एक रूम, एक मकान, एक बिल्डिंग—हज़ारों बिल्डिंग बन जाएँ, हज़ारों बिल्डिंग ज़मीनदोस्त हो जाएँ—फिर भी भूताकाश का कुछ नहीं बिगड़ता।
ऐसे ही हज़ारों सृष्टियाँ बन जाएँ और हज़ारों सृष्टियाँ नष्ट हो जाएँ—फिर भी चिदाकाश का कुछ नहीं बिगड़ता, न बदलता।
तो ज्ञानी अपने को चिदाकाश समझते हैं। हैं तो सब—सब चिदाकाशी रूप हैं। ये तो सब बुलबुले जैसे हैं—बुदबुदे। सागर में हज़ारों बुलबुले हो जाएँ—तो सागर का क्या बड़ा? और लीन हो जाएँ—तो सागर का क्या घाटा?
ऐसे ही चिदाकाश में कई सृष्टियाँ होती हैं और कई सृष्टियाँ लीन हो जाती हैं। कई ब्रह्मा, विष्णु, महेश हुए—कई लीन हो गए। कई भगवान आए—कई अल्लाह, मियाँ अल्लाह, देवी-देवता प्रगट हुए—कई समाप्त हुए।
तो चिदाकाश का शुद्ध स्वरूप—वही परमात्मा है, उसे ब्रह्म कहो।
तो उसके स्पंदन में स्फुरणा हुई—स्पंदन। जैसे तुम सो गए, सुबह उठे तो स्पंदन हुआ। चाय पीना है, उठना है, जाना है, नौकरी करना है—स्फुरणा हुई।
स्फुरणा घनीभूत हुई तो वह जीवत्व को प्राप्त हुई। और जो स्फुरणा होते हुए भी अपने स्वरूप को जान गया, वह ईश्वर कोटि में आ गया।
तो सब ईश्वर कोटि में गिने जाते हैं—जिनको स्वरूप का प्रमाद नहीं हुआ, वे ईश्वर कोटि में हैं। और जिनको अपने स्वरूप का प्रमाद हो गया, वे सब जीव कोटि में हैं।
अब प्रमाद है तो आत्मज्ञान से वह प्रमाद हट जाता है—फिर ईश्वर कोटि।
लेकिन जीव और ईश्वर हैं तो सब ब्रह्म का ही खेल। घट-आकाश, मठ-आकाश और महाकाश—तीनों एक ही हैं, लेकिन उपाधि-भेद से घट-आकाश, मठ-आकाश, महाकाश।
ॐ… ॐ… ॐ…
उसने कहा कि आज शाम तक—जो मेरी आज्ञा में चलेगा, मेरा कहना मानेगा, उसको यह चाँदी का सिक्का और यह मिठाई का पैकेट इनाम मिलेगा। अपने बच्चों से कहा।
बच्चे बोले—तो फिर हमारे को क्या मिलेगा?
बोले—तुम हमारे कहने में।
बच्चे बोले—फिर तो यह इनाम पप्पा को ही जाएगा, क्योंकि पप्पा ही तुम्हारी आज्ञा में चलता है। हमारे बस की बात नहीं है।
अब है तो पप्पा मर्द। लेकिन बच्चे भी जान गए कि मम्मी की आज्ञा में चलता है। आज्ञाकारी पति है मम्मी का।
ऐसे ही है आत्मा—ब्रह्म, चिदाकाश। लेकिन यह प्रकृति रूपी जो मम्मी है ना, उसके कहने में चलता है—इसलिए जीव हो गया।
क्या बात मैं बता रहा हूँ! ओहो! वाह! बेहतर दे रहा हूँ।
तो ऐसे पप्पा की तो बच्चे भी मज़ाक उड़ाते हैं। हाँ, जो मम्मी के कहने में चल रहा है—ऐसे पप्पा की तो बच्चे भी मज़ाक उड़ाते हैं।
ऐसे ही मन, बुद्धि, अहंकार, काम, क्रोध, लोभ—ये सब उसके बच्चे हैं, परिवार हैं। वो फिर ऐसे ही चिदाकाश की मज़ाक उड़ाते हैं, बेचारे को धकेलते रहते हैं।
हाँ! बराबर न?
अब उसमें आ जाए कि—“मैं…”
“बस मन, तू ज्योति स्वरूप, अपना मूल पहचान।”
ऐसा नहीं कहा—मन तू नानक, नानक जप। नानक ने ऐसा नहीं कहा।
मन तू कृष्ण, कृष्ण जप—ऐसा भी नहीं।
मन तू ज्योति स्वरूप—मन तू कृष्ण पहचान, नानक पहचान नहीं। अपना मूल पहचान।
अपने मूल को नहीं देखा तो नानक को क्या पहचानोगे?
कृष्ण को क्या पहचानोगे?
तुम अपने को ही नहीं पहचानते तो!
बोले—हम तो महाराज को जानते हैं।
महाराज को क्या जानोगे? महाराज के शरीर को जानते हो।
हमको कौन जाने? हमको जाने तो निहाल हो जाए। हमको कोई जानता नहीं।
ये तो आसाराम को जानते हैं, हमको क्या जानेंगे! हमको जानेंगे तो हम हो जाएंगे।
“ब्रह्म स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे न शेष, गुरु और कार्य रहे न शेष।
मोह कभी न ठग सके, इच्छा न लव ले।”
वह ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त कर लेगा ना—फिर उसके लिए कोई कार्य शेष नहीं रहेगा। उसके सब काम हो गए।
जिसने अपने को पहचान लिया—उसने सब पहचान लिया।
अपने को पा लिया—उसने सब पा लिया।
अपने को जान लिया—सब जान लिया।
तो अपने को सही हम जानते हैं रोज़ आईने में? अरे, खाक जानते हैं!
नाक, कान, हड्डी, मांस—इन्हें देख रहे हैं।
अपने को देखो।
“देखा अपने आप को, मेरा दिल दीवाना हो गया।
ना छेड़ो मुझे यारों, मैं खुद पे मस्ताना हो गया।”
अभी तो कोई किसी में, कोई किसी में, कोई नर्क में, कोई स्वर्ग में, कोई रुपयों में, कोई पैसे में—और सब मस्ताना भटकते हैं।
अपने आप में मस्ताना हो गया—वो निहाल है।
ॐ… ॐ… ॐ… ॐ… ॐ…
बारह साल से चलाओ तो भी दरिया पार नहीं जाएगी गाड़ी। दुबई नहीं पहुँचेगी—दरिया पार नहीं करेगी।
और विमान में बैठा तो दो घंटे में दुबई, तीन घंटे में दुबई।
ऐसे ही ब्रह्मज्ञान विमान है।
अमेरिका वाला इधर घूमने आया। अब कार लेकर जाए तो अमेरिका पहुँचना मुश्किल है। प्लेन में जाए तो अठारह घंटे में अपने घर।
और यहाँ ज्ञान के प्लेन में बैठा—तो उसी घड़ी अपने घर।
“ऐ तालिब-ए-मंज़िल, किधर देखता है?
दिल ही तेरी मंज़िल है, तू दिल की ओर देख।”
अपने दिल की ओर देखे तो उसी समय पार।
यह बात समझ लो—जल्दी कल्याण हो जाएगा।
तो सुन लो—जिनको साक्षात्कार करना है।
जिनको साक्षात्कार नहीं करना—वो कान में उँगली डाल दो।
हम शास्त्रों में, वेदों में सुनते हैं—भगवान सर्वत्र है। ठीक है—भगवान सर्वत्र है।
अब जो सर्वत्र है, वह यहाँ भी होना चाहिए। यहाँ को छोड़कर सर्वत्र थोड़े होगा।
जब सर्वत्र है तो यहाँ भी है।
भगवान सदा है, सर्वत्र है।
अब जो सदा है—वो अभी भी है।
और जो सर्वत्र है—वो यहाँ भी है।
ऐसा नहीं कि पहले था, बाद में होगा—अभी नहीं।
ईश्वर सदा है, सर्वत्र है।
बराबर मानते हैं न?
ईश्वर सब में है। जो सब में है—वो हममें भी है।
तो हममें है, सदा है, और अभी भी है।
यह बात माननी पड़ेगी।
हम जहाँ हैं, वहीं हमारे साथ है।
ठीक है!
तुम्हारा चेहरा—ऐसा चेहरा मैं अमेरिका तक घूम के आया, दूसरे आदमी का नहीं देखा।
तुम्हारी क्वालिफ़िकेशन, समझ, धन, पत्नी—जैसी एक आदमी के पास है, वैसी दूसरे के पास नहीं। न्यून-अधिक है।
लेकिन परमात्मा—जो तुम्हारे पास है, उतना ही पटावाले के पास है।
जो पटावाले के पास है—उतना ही प्रधानमंत्री के पास है।
ऐसा नहीं कि किसी के पास भगवान ज़्यादा है और किसी के पास थोड़ा कम।
वही परमात्मा सब में समान रूप से सम है।
जो पटावाले में है—वही प्रधानमंत्री में।
जो तुम्हारे में है—वही वशिष्ठ में, कृष्ण में, राम में, नानक में, बुद्ध में।
तो जो बुद्ध को मिला—वही तुम्हें मिलेगा।
जो नानक को मिला—वही तुम्हें मिलेगा।
जो कबीर को मिला—वही तुम्हें मिलेगा।
परमात्मा-प्राप्ति पूर्ण होती है।
संसार-प्राप्ति दो आदमियों को एक जैसी नहीं होती।
क्या मज़े की बात है!
सनकादि ऋषियों को जो ब्रह्म साक्षात्कार हुआ, ब्रह्मज्ञान हुआ—नानक को हुआ होगा तो उतने का उतना। ऐसा नहीं कि संकादि ऋषि ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं, तो उनको इतना ब्रह्मज्ञान और नानक को थोड़ा-सा, कबीर को थोड़ा-सा और हमें तो बिल्कुल नहीं।
जितना संकादि को, उतना ही हमें। जितना नानक को, उतना ही हमें। जितना कबीर को, उतना ही तुम्हें। क्योंकि परमात्मा पूर्ण है, प्रकृति पूर्ण नहीं।
इसीलिए प्रकृति की चीज़ें दो आदमियों को बराबर नहीं मिलतीं।
तो यह बात समझ लो—परमात्मा सर्वत्र है। जो सर्वत्र है, वो यहाँ है।
परमात्मा सदा है। जो सदा है, वो अभी है।
परमात्मा सब में है। जो सब में है, वो हम में है।
और परमात्मा समान रूप से है—तो हमारे में भी वैसे का वैसा है।
ये चार बातें समझ लो तो बहुत मेहनत, बहुत मजदूरी कम हो जाती है।
नहीं तो लोग मानते हैं कि भगवान कहीं दूर है—इतनी साधना करेंगे तब आएगा।
अपने तो संसार में यही चलता है—नानक को मिला, अपने को थोड़े मिलेगा। उसके बाप का राज चलता है। अपने को नहीं मिलेगा।
बापू भगवान को लोग ऐसी दादागिरी में रखते हैं कि जब प्यार जोर पकड़ता है ना, तो अंगड़ाइयाँ लेने लगता है।
दोस्ती जब नई-नई होती है ना—“भाई साहब, सेठ जी, आइए, बैठिए।”
और जब एकदम निकट हो गए—“अरे उठ ना यार, क्या करता है बुद्धू, चल!”
एक-दूसरे को कूनी मारेंगे, चुटकी काटेंगे।
प्यार जब जोर पकड़ता है ना, तो ऐसा ही होता है।
ऐसे ही कबीर का भगवान के साथ मोहब्बत का जोर पकड़ गया। तो कबीर ने भगवान को डाँटा।
“भला होया हरि बिस्रयो, सिर से टली बला।”
“मुख से जपूँ, कर से जपूँ, उर से जपूँ राम।
राम सदा हमको जपे, हम पावें विश्राम।”
फिर कहते हैं—राम मरे तो हम मरे, राम मर गए तो हम ही मर गए।
फिर बोले—नहीं, राम मरे तो हम मरे, हमरी मरे बला।
सत्पुरुषों का बालका मरे न मारा जाए।
सतगुरु ने जो ब्रह्मज्ञान दिया, तब पता चला—मैं न मरता हूँ, न मारा जाता हूँ।
देह रहे या न रहे, मैं कभी नहीं मरता, न मारा जाता हूँ।
रामतीर्थ कहते थे—इस शरीर को काट दो, जिह्वा काट दो, इस वक्ता को जीर्ण-शीर्ण कर दो।
लेकिन उनको भी लोगों ने गंदे-गंदे खत लिखे। दुनिया ने किसी को छोड़ा नहीं—नानक को नहीं छोड़ा, कबीर को नहीं छोड़ा, तो रामतीर्थ को क्यों छोड़ेगी?
भगवान राम के गुरु वशिष्ठ महाराज—उनको भी नहीं छोड़ा।
योग वशिष्ठ में लिखा है—
“राम, मैं बाज़ार से गुजरता हूँ। मूर्ख लोग मेरे लिए क्या-क्या बकते हैं, मुझे सब खबर है। लेकिन उनकी बातों में तुम मत आना। मेरे वचनों को स्वीकार करके संसार-सागर से तर जाना।”
वशिष्ठ जैसे महापुरुष को अज्ञानियों ने सुनाया, तो रामतीर्थ को भी सुनाया।
रामतीर्थ सत्संग में कहते थे—
“राम बादशाह को तुम टुकड़े-टुकड़े कर दो, लेकिन याद रखना—राम बादशाह की मौत नहीं होती।
हज़ारों शरीरों में धड़क रहा हूँ।
कितनों को मारोगे? एक शरीर जाएगा, हज़ारों में मैं जीवित हूँ।
सूरज बनकर तप रहा हूँ, चाँद बनकर चमक रहा हूँ, हवाओं में अठखेलियाँ कर रहा हूँ।”
ॐ… ॐ… ॐ…
मैं सर्वव्यापक चिदानंद स्वरूप हूँ।
चिदानंद को कौन-सी तलवार काटेगी?
अब साक्षात्कार की तीन परीक्षाएँ होती हैं। साक्षात्कार हुआ या नहीं—तीन बातों से पता चल जाता है।
अज्ञान अवस्था में जो राग-द्वेष था—वही का वही है या केवल दिखाने भर को है?
मूँगफली कच्ची है या सेकी हुई—परख में आ जाएगी।
दूर से नहीं दिखेगी, लेकिन जिसके हाथ में है, वो जान लेगा।
तो स्वयं को तो आप जान लेंगे—राग-द्वेष ठोस उठ रहा है या देखने भर को।
साक्षात्कार के बाद राग, द्वेष और अभिनिवेश नहीं रहते।
अज्ञान में राग, द्वेष, अभिनिवेश रहते हैं।
ज्ञान में ये बाधित हो जाते हैं।
अभिनिवेश मतलब क्या?
जीने की इच्छा और मरने का भय।
देह से बने रहने की लालसा।
ज्ञानी को मृत्यु का भय भीतर से नहीं सताता।
जीने की इच्छा नहीं रहती, मरने का भय नहीं रहता।
क्यों? क्योंकि अज्ञानी देह को “मैं” मानता है।
ज्ञानी देह को “मैं” नहीं मानता।
ज्ञानी शूल पर चढ़ रहा है और भीतर से बोल रहा है—“अनलक, शिवोहम।”
मैं कभी मरता नहीं।
कोई रो-रोकर देह त्यागे—तो भीतर सत्यबुद्धि नहीं होती।
“मैं मर रहा हूँ”—ऐसा उसे लगता है।
ज्ञानी जानता है—“ये मर रहा है।”
हम जैसे अज्ञानी जब मरते हैं, तो समझते हैं—मैं मर रहा हूँ।
ज्ञानी समझता है—ये देह का कर्म है।
बुद्धू और बुद्ध—दोनों जा रहे हैं।
पैर में कंकड़ लगा—बुद्धू को भी चुभा, बुद्ध को भी चुभा।
दर्द दोनों को होगा।
ऐसा नहीं कि ब्रह्मज्ञान हो गया तो काँटा चुभेगा ही नहीं—नहीं।
फर्क सिर्फ इतना है—
बुद्ध कहेगा—इसको लगा है।
बुद्धू कहेगा—मुझे लगा है।
ज्ञानी समझता है—स्कूटर पंचर हुआ।
अज्ञानी समझता है—मेरा पंचर हुआ।
ज्ञानी स्कूटर में पेट्रोल डालता है।
अज्ञानी समझता है—मैं पेट्रोल पी रहा हूँ।
तो देह भी स्कूटर ही है।
ऑयल डालो, गियर बदलो।
तीन गियर हैं—सत्त्व, रज, तम।
सत्संग में टॉप गियर—सत्त्व।
कीर्तन-वर्तन में रज।
कोई उटपटांग आ गया—तो तम।
ज्ञानी मार भी खा सकता है, युद्ध भी कर सकता है।
ऐसा नहीं कि चुपचाप सब सह ले।
…ज्ञानी मार भी खा सकता है, युद्ध भी कर सकता है। ऐसा नहीं कि चुपचाप सब सह ले।
रमण महर्षि बैठे थे। एक पंडित आया, प्रश्न पूछा—अनाप-शनाप।
महर्षि ने उत्तर दिया। लेकिन पंडित बात काटने लगा, अपमान करने की कोशिश करने लगा।
सभा में बैठे हुए। हॉल भी कोई बहुत बड़ा नहीं—मैं जाकर आया हूँ रमण आश्रम, पंद्रह बाई चालीस का हॉल।
अपनी गिराकी ज़्यादा थी।
लोगों को लगा—ये क्या पूछ रहा है, क्या बक रहा है?
जो भी उत्तर दो, वही काट दे।
शास्त्र, उपनिषदों के वचन लेकर रमण महर्षि की वाणी काट दी।
महर्षि के आश्रम में एक बार चोर आए।
लोगों ने कहा—चोर आए!
महर्षि बोले—आने दो। सब में भगवान है, रब है। चोर काहे के? उनमें भगवान देखो।
आओ प्रभु, जो चाहिए ले जाओ।
चोरों ने सोचा—ऐसा करेगा तो पकड़वाएगा।
चोरों ने महर्षि को पीटा। बोले—ले क्या जाएँ, पहले ठीक करते हैं।
मार खाते रहे, सामान देते रहे।
वही रमण महर्षि—चोरों से तो मार खाने को तैयार।
ठीक है—ब्रह्म की यही इच्छा है। माया में कुट रहा है।
लेकिन वही पंडित जब प्रश्न पूछता है, उत्तर देता है और वो काटता है—तो रमण महर्षि उठे।
एकदम जंप मारा। डंडा पड़ा था—उठाया और उसके पीछे दौड़ पड़े।
इतनी तेज़ दौड़ कि पंडित मुट्ठियाँ बाँधकर भागा—नौ दो ग्यारह।
महर्षि लौटे, डंडा रख दिया और गद्दी पर बैठ गए।
इतनी शांति, इतनी शीतलता—लेखक लिखता है:
“ऐसी शांति पहले कभी नहीं देखी।”
तो सहज जीवन ऐसा होता है—
क्रोध भी होने देते हैं, युद्ध भी होने देते हैं, दया भी होने देते हैं।
करते नहीं—होने देते हैं।
इतने तृप्त कि जो आए, जैसा आए।
जैसे मैं सड़क पर बैठा हूँ। मेरा बंगला है, फ्लैट है, शाहिबाग है।
कारें गुजर रही हैं—गवर्नर की, पैसेंजर की, स्कूटर, मोटर।
मैं देखता हूँ—अहा! इतनी सारी मेरी।
दूसरे दिन कोई नहीं गुज़रा।
अरे! आज तो कोई नहीं आया—मेरा सब चट हो गया!
कल तक इतनी-इतनी गाड़ियाँ थीं, इतने मेरे आदमी थे।
आज टप!
कमान जरा सी ढीली हो गई।
ऐसे ही चित्त में कभी अमेरिकी ट्रैफिक चलती है, कभी गरीबी की ट्रैफिक।
चित्त को देखें—अलग होकर देखें।
ट्रैफिक आई—देखने का मज़ा लिया।
सन्नाटा आया—उसका भी मज़ा लिया।
जीवन में कभी ट्रैफिक, कभी सन्नाटा।
हम सन्नाटे में सन्नाटा बन जाते हैं और ट्रैफिक में ट्रैफिक—इसलिए हमारा भी हाल बिगड़ता है।
ज्ञानवान ट्रैफिक को ट्रैफिक समझकर देखते हैं।
अज्ञानी बोले—मेरी आई, मेरी नहीं आई।
ऐसे ही ज्ञानी के जीवन में धन, यश, वैभव आता है—ठीक है।
और चला जाए—तो रोता नहीं।
“आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा।”
एक बात और समझ लो—
जब तुम खुशी से पैसे उड़ाते हो तो मज़ा आता है।
कोई ज़बरदस्ती छीने—तो दुख होता है।
ज्ञानी खुशी से देह और संसार को फटाके की तरह फोड़ता है।
हम देह और संसार को पकड़कर बैठते हैं।
फटाका या तो फूटेगा या सड़ जाएगा।
संसार फटाका है।
संसार में दो तत्व हैं—चल और अचल।
जो दिखता है—वो चल।
चल को चल मानो, उसके चलने का मज़ा लो।
अचल को “मैं” मानो—बेड़ा पार।
रुपये आए, गए।
काम आया, गया।
क्रोध आया, गया।
तू वही का वही।
तू कहाँ बँधा?
ऐसी देह कई आईं, कई गईं।
तू वही का वही।
“मन तू ज्योति स्वरूप, अपना मूल पहचान।”
हम देह को मैं मान लेते हैं, व्यवहार को मेरा मान लेते हैं—यहीं फँसते हैं।
ज्ञानी समझता है कि इसका है,
हम समझते हैं कि मेरा है।
🙏ॐ गुरु ॐ🙏
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