चिंता छोड़ो, भगवान की शरण लो शरणागति का असली मतलब क्या है ?
TIME STAMP INDEX
0:03 – प्रारंभिक संवाद और अनुशासन
0:46 – डांस और कीर्तन का अंतर
1:33 – काम केंद्र और राम केंद्र का अंतर
2:29 – (कीर्तन/आरती) जय देव जय देव सतगुरु राया
5:41 – प्राणायाम और हरि ओम शांति जप
8:54 – “ये यथा माम् प्रपद्यन्ते” श्लोक का अर्थ
10:39 – शबरी, मीरा, एकनाथ के भाव उदाहरण
11:40 – शरणागति का श्रेष्ठ भाव
15:01 – (कहानी) मेड़ता के राजा जयदेव सिंह की शरणागति
24:58 – करण कुंडल कुंड की कथा
25:27 – (कथा प्रसंग) मीरा और मूर्ति का भाव
27:03 – जगन्नाथ दास और सेवा का प्रसंग
28:54 – ओंकार जप की महिमा
31:08 – नाम जप से शारीरिक और मानसिक लाभ
32:46 – ओंकार से 19 शक्तियों का जागरण
38:47 – मंत्र दीक्षा और चेतना
39:00 – (कहानी) जगन्नाथ दास की सेवा में भगवान प्रकट
इंडेक्स के अनुसार कंटेंट
0:03 प्रारंभ में अनुशासन कराया जाता है। लोगों से कहा जाता है कि सत्संग सुनने आए हो तो शांत बैठो। नाचने कूदने के लिए नहीं, साधना और सीखने के लिए आए हो। 0:46 घर में नाचो तो डांस होता है, यहां भगवान के नाम से नाचो तो कीर्तन होता है। डांस काम केंद्र को उत्तेजित करता है, लेकिन भक्ति का नृत्य हृदय केंद्र को विकसित करता है। 1:33 वहां काम केंद्र जागता है, यहां राम केंद्र जागता है। शिव डमरू बजाकर, कृष्ण बंसी बजाकर, नारद वीणा बजाकर, मीरा और प्रह्लाद भक्ति में नाचते हैं। यह प्रेम की चाल है, इसे नृत्य कहते हैं। 2:29 (कीर्तन/आरती) “जय देव जय देव जय सतगुरु राया” की आरती गाई जाती है। गुरु के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित की जाती है। गुरु से ज्ञान, चैतन्य और मंत्र दीक्षा का स्मरण किया जाता है। 5:41 आरती के बाद लंबा श्वास लेकर हरि ओम शांति का जप कराया जाता है। प्राणायाम से नाड़ी शुद्धि होती है, नाम जप से मन और बुद्धि शुद्ध होती है। 8:54 गीता का श्लोक बताया जाता है कि जो भक्त जिस भाव से भगवान को भजता है, भगवान भी उसी भाव से उसे स्वीकार करते हैं। सभी लोग आनंद, अमरता और ज्ञान चाहते हैं क्योंकि भगवान का स्वभाव वही है। 10:39 शबरी ने भाव किया कि राम मेरे बेर खाएंगे तो राम आए। मीरा ने भाव किया कि भगवान मेरे हितैषी हैं तो विष अमृत हो गया। एकनाथ के यहां भगवान सेवक बनकर आए। भाव के अनुसार भगवान प्रकट होते हैं। 11:40 सबसे श्रेष्ठ भाव शरणागति है। मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं। पुरुषार्थ करो, फिर जो हो उसे भगवान की इच्छा मानकर संतुष्ट रहो। यही सच्ची शरण है। 15:01 (कहानी) मेड़ता के राजा जयदेव सिंह भगवान की शरण में थे। शत्रु ने उनके नियम का लाभ उठाकर आक्रमण किया। राजा ने कहा मैं भगवान की शरण में हूं। भगवान ने उनका रूप धारण कर युद्ध में सेना का उत्साह बढ़ाया और विजय दिलाई। 24:58 जहां भगवान का कान का कुंडल गिरा था वहां “करण कुंडल” नाम का कुंड बना। यह भगवान की शरणागति की लीला का स्मारक बना। 25:27 (कथा प्रसंग) मीरा विवाह में बड़ी मूर्ति ले जाना चाहती थी। भगवान ने स्वप्न में कहा मैं आकार से नहीं, भाव से बंधता हूं। मीरा छोटी मूर्ति ले गई और उसी भाव से उसकी रक्षा हुई। 27:03 एक संत जगन्नाथ दास वृद्धावस्था में बीमार हुए। भगवान सेवक बनकर उनकी सेवा करने लगे। सच्ची दासता भगवान को भी दास बना देती है। 28:54 ओंकार का जप केवल रोग मिटाने के लिए नहीं है। यह सीधा भगवान का नाम है। इससे कैंसर जैसे रोगों से रक्षा होती है, पर इसका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य नहीं, शरणागति है। 31:08 सत्संग और जप से रक्त में श्वेत कण बढ़ते हैं। निराशा दूर होती है, मनोबल और बुद्धि में प्रकाश आता है। धरती पर आध्यात्मिक कंपन फैलते हैं। 32:46 ओंकार जप से अनेक शक्तियां जागती हैं जैसे रक्षण शक्ति, गति शक्ति, कांति शक्ति, प्रीति शक्ति, तृप्ति शक्ति, शासन शक्ति, क्रिया शक्ति और अन्य दिव्य सामर्थ्य। 38:47 मंत्र दीक्षा से मंत्र चेतन होता है। श्रद्धा और भावना से जप करने पर जीवन में दिव्य परिवर्तन आते हैं। 39:00 (कहानी) जगन्नाथ दास को शौच जाने में कठिनाई होती थी। भगवान सेवक बनकर उन्हें ले जाते, हाथ धुलाते और सुलाते। अंत में प्रकट होकर कहा मैं दासों का दास हूं। तीव्र प्रारब्ध भोगना पड़ता है, इसलिए रोग नहीं हटाया। जो भगवान का दास बनता है, वह वास्तव में स्वतंत्र हो जाता है। ओम
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