गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

गुरुकृपा ही केवलम् - आश्रम संध्या सत्संग 05-02-2026 सुबह |

 


 

TIME STAMP INDEX

0:00 आत्म शांति और धरती के देव
0:33 कबीर जी और वैकुंठ की अस्वीकृति (दोहा)
1:03 सनकादि ऋषि और ज्ञान की महिमा
1:29 दर्शन और विकार का अंतर
2:08 अर्जुन का मोह नाश और सतगुरु तत्व
3:06 भटकता मन और कबीर वाणी (दोहा)
4:03 गीता श्लोक और समुद्र दृष्टांत (श्लोक)
4:49 जीवन के तीन अनिवार्य सत्य
5:56 सच्चा धन और राम नाम (दोहा)
6:41 हाथी और यमराज की कथा (कहानी)
10:54 ब्रह्मज्ञानी और परमात्मा का संबंध
12:20 कर्म कर्तृत्व और ईश्वर तत्व (शास्त्र संदर्भ)
15:40 मनुष्य की संभावना और सतगुरु की आवश्यकता
16:30 गुरु महिमा और साधना
17:27 तुलसीदास और वैराग्य की कथा (कहानी)
18:47 पत्नी द्वारा उपदेश और परिवर्तन
20:13 दीन प्रार्थना और संत शरण
22:00 अंतरंग उपासना और भीतर का देव
23:35 समय की नश्वरता और सत्संग आग्रह
24:46 गीता श्लोक और वासना शुद्धि (श्लोक)
26:02 गरुड़, राम और मोह (कहानी)
27:06 कागभुषुंडि सत्संग की महिमा
28:34 ज्ञान ज्योति और शांति अवस्था
29:29 सत्संग से जीवन रूपांतरण


CONTENT AS PER INDEX (MEANINGFUL PARAGRAPHS)

0:00 जिनके जीवन में आत्म शांति पाने की सच्ची रुचि है वे पृथ्वी पर रहने वाले देव हैं। स्वर्ग के देव पुण्य भोगते हैं और धरती के देव सेवा सुमिरन करके पाप नष्ट करते हैं और हृदय का अमृत पीते हैं।

0:33 कबीर जी के पास भगवान का बुलावा आया लेकिन वे रो पड़े। उन्हें मृत्यु का भय नहीं था बल्कि वैकुंठ में सत्संग न मिलने का दुख था। राम परवाना भेजिया वाचत कबीरा रोए क्या करूं तेरी वैकुंठ को जहां साध संगत न होए। (दोहा)

1:03 सनकादि चारों ऋषि ब्रह्मवेत्ता हैं। एक बोलता है तीन सुनते हैं और आत्मा परमात्मा की चर्चा से परम शांति में विश्राम पाते हैं।

1:29 केवल भगवान का दर्शन होने से विकार समाप्त नहीं होते। मंथरा, कैकई, शूर्पणखा, शकुनि और दुर्योधन ने दर्शन किया फिर भी काम क्रोध कपट रहे।

2:08 अर्जुन का मोह तब नष्ट हुआ जब श्रीकृष्ण ने तत्व का दर्शन कराया। जब तक सतगुरु आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कराता तब तक विकार रह सकते हैं।

3:06 जीव शांति और मुक्ति चाहता है लेकिन मन उसे संसार में भटका देता है। कबीर कहते हैं भटक मुआ भेदु बिना पावे कौन उपाय खोजत खोजत युग गए पांव कोस घर आए। (दोहा)

4:03 गीता का श्लोक कहता है जैसे समुद्र सब नदियों को समा लेता है वैसे ही निर्वासनिक पुरुष सब कुछ पाकर भी अचल शांति में रहता है। (श्लोक)

4:49 जीवन में तीन बातें अनिवार्य हैं। मृत्यु कभी भी हो सकती है। बीता समय लौटता नहीं। और लक्ष्य परम शांति परमात्मा होना चाहिए।

5:56 सच्चा धन परमात्मा की प्राप्ति है। राम नाम धन के बिना मनुष्य निर्धन है। कबीरा जग निर्धन धनवंता नहीं कोई धनवंता ते जानिए जाको राम नाम धन होई। (दोहा)

6:41 हाथी और यमराज की कथा में बताया गया कि मनुष्य शरीर में अपार संभावना है। एक साधारण किसान बुद्धि से यमपुरी का अध्यक्ष बन गया। (कहानी)

10:54 ब्रह्मज्ञानी और परमात्मा का सीधा संबंध होता है। उनके बीच किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।

12:20 शास्त्र बताते हैं कि परमात्मा ही कर्ता करावन है। जीव उसी सत्ता से कर्म करता है।

15:40 मनुष्य के भीतर इतनी संभावना है कि वह भगवान का माता पिता भी बन सकता है लेकिन सतगुरु बिना साधना भटक जाती है।

16:30 गुरु के बिना संसार का कोई भी कार्य नहीं होता तो आत्म साक्षात्कार कैसे होगा। गुरु महिमा सर्वोपरि है।

17:27 तुलसीदास की कथा में काम वासना से ग्रस्त जीवन का वर्णन है जो पत्नी के एक वाक्य से बदल गया। (कहानी)

18:47 पत्नी ने शरीर की नश्वरता दिखाकर राम प्रेम की ओर मोड़ा और वही तुलसीदास के लिए गुरु बन गई।

20:13 तुलसीदास की दीन प्रार्थना बताती है कि संत की शरण ही मुक्ति का द्वार है।

22:00 भीतर के देव के दर्शन सुलभ हैं। बाहरी दर्शन में भीड़ है भीतर सदा उपलब्ध है।

23:35 जीवन बहती गंगा है। सत्संग अभी नहीं किया तो अंत में पश्चाताप होगा।

24:46 गीता बताती है कि हल्की वासनाओं को हटाने के लिए श्रेष्ठ वासना अपनानी चाहिए। जैसे कांटे से कांटा निकलता है। (श्लोक)

26:02 गरुड़ जी ने भगवान राम को नागपाश से छुड़ाया लेकिन अहंकार से मोह में पड़ गए। (कहानी)

27:06 शिव जी ने गरुड़ को कागभुषुंडि के सत्संग में भेजा जहाँ सत्संग से उनका मोह नष्ट हुआ।

28:34 गुरु द्वारा जलाई गई ज्ञान ज्योति जीवन में प्रकाश शांति और माधुर्य लाती है।

29:29 सत्संग मनुष्य को सत्य स्वरूप ईश्वर में स्थापित करता है और उसे दूसरों को शांति देने योग्य बनाता है।

Manual Transcription 

जिनके जीवन में आत्मशांति पाने की रुचि है, तत्परता है, वे मानो इस पृथ्वी पर के देव हैं। दो प्रकार के देव होते हैं एक स्वर्ग में रहने वाले देव और दूसरे धरती पर रहने वाले देव। स्वर्ग पर, स्वर्ग में रहने वाले देव तो अपना पुण्य खत्म करते हुए स्वर्ग का मजा लेते हैं और पृथ्वी पर के जो देव हैं, वे अपना दान, पुण्य, सेवा, स्मरण करते हुए, पाप नष्ट करते हुए हृदय का अमृत पीते हैं। वे पृथ्वी पर के देव हैं। कबीर जी के पास भगवान का परवाना आया कि संत तुम पधारो। कबीर जी की आंखों में से आंसू आ गए। इसलिए नहीं कि अब जाना पड़ता है, मरना पड़ता है। नहीं, नहीं! कबीर ने कहा कि मुझे वहां आने की इच्छा नहीं होती क्योंकि वहां सत्संग नहीं मिलता। 

राम परवाना भेजिया, वाचत कबीरा रोय। 

क्या करूं तेरे वैकुंठ का, जहां साध संगत नहीं होय। 


सनकादि ऋषि चार हैं, चारों भाई ब्रह्मवेत्ता हैं। एक वक्ता बनता है और तीन श्रोता बनते हैं। आत्मा परमात्मा की चर्चा करते-करते परम शांति में विश्रांति पाते हैं। भगवान का दर्शन करने से तो मोह हो सकता है। भगवान का दर्शन करने के बाद भी कपट रह सकता है। भगवान का दर्शन करने के बाद भी बेईमानी रह सकती है, काम रह सकता है, क्रोध रह सकता है। ध्यान से सुनना। भगवान का दर्शन साकार दर्शन हो, फिर भी आदमी कपटी हो सकता है, कामी हो सकता है, क्रोधी हो सकता है, अहंकारी हो सकता है, रह सकता है। जैसे भगवान का मोह हो सकता है। भगवान का दर्शन करती थी मंथरा, फिर भी कितना कपट था। कैकेयी भी भगवान का दर्शन करती थी, कितना क्रोध था। शूर्पणखा ने भगवान का दर्शन किया, फिर भी शूर्पणखां में काम मौजूद है। शाकुनि ने भगवान कृष्ण का दर्शन किया, फिर भी कपट मौजूद है। दुर्योधन भगवान कृष्ण का दर्शन करते हैं, फिर भी क्रोध मौजूद है। ज्ञान की आंख जब तक नहीं खुलती है, तब तक बेचारा आदमी थपेड़े खाता है और भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया और अर्जुन को श्री कृष्ण ने कृष्णतत्व का दर्शन कराया। अर्जुन कहता है:


नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। 

स्थितिऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।। (गीता 18.73)


मेरा मोह नष्ट हो गया।  तो शिवजी का दर्शन हो जाए, रामजी का दर्शन हो जाए, कृष्ण जी का दर्शन हो जाए। लेकिन जब तक सतगुरु आत्मा परमात्मा का दर्शन नहीं कराता है, तब तक काम रह सकता है, क्रोध रह सकता है, लोभ रह सकता है, मोह रह सकता है, पाखंड रह सकता है, अहंकार रह सकता है। शूर्पणखा ने रामजी के दर्शन किए थे, शाकुनि ने कृष्ण के दर्शन किए थे, लेकिन जब तक सतगुरु तत्व का दर्शन नहीं होता है, तब तक इस जीव की बेचारे की साधना अधूरी रह जाती है। तब तक मन के जगत में ही रहता है और मन कभी-कभी बेचारा मन खुश तो कभी नाराज। कभी मन में मजा आया, कभी नहीं आया। इसलिए कबीर जी ने ठीक कहा है:

 भटक मुआ भेदु बिना, पावे कौन उपाय। 

खोजत खोजत जुग गए, पाव कोस घर आए।



यह जीव चाहता तो शांति है, चाहता तो मुक्ति है, चाहता तो है अपने नाथ को मिलने के लिए। मृत्यु आकर शरीर छीन ले, जीव अनाथ होकर मर जाए, उसके पहले अपने नाथ को मिलना चाहिए, लेकिन बेचारा मन भटका देता है। बाहर के संसार की वस्तुओं में भटका देता है। कोई, कोई भागशालियों को फिर पुण्य दान में घुमाता है और उनसे कोई ऊंचे होते तो सत्संग में आते हैं और उनसे जब कोई और भी आगे बढ़ता है तब वो सत्य स्वरूप आत्मा परमात्मा में पहुंचता है, उसे परम शांति मिलती है। तो भगवत गीता का यह श्लोक हमें भगवान यह श्लोक सुनाकर हमें सावधान कर रहे हैं। 

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।
(गीता 2.70)

जैसे समुद्र में सारी नदियां चली जाती हैं, फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता है, सबको समा लेता है। ऐसे ही उस निर्वासनिक पुरुष के पास सब कुछ आ जाए, फिर भी वह परम शांति में निमग्न पुरुष ज्यों त्यों रहता है। तो ऐसी जो अवस्था है, उस अवस्था का ख्याल करके जो साधन भजन किया जाए, आदमी जल्दी पहुंचता है। 

तीन बातें तो सब लोगों को अपने जीवन में लानी ही चाहिए। ये तीन बातें जो आदमी नहीं जानता है, वो आदमी के वेश में पशु है, पशु। तीन बातें तो हर एक मनुष्य को जाननी ही चाहिए। 

एक तो यह कि मृत्यु कभी भी हो सकती है, कहीं भी हो सकती है। जय रामजी की! मृत्यु कभी भी हो सकती है, कहीं भी हो सकती है। यह बात पक्की जाननी चाहिए। 

दूसरी बात बीता हुआ समय फिर वापस नहीं आता। 

और तीसरी बात कि अपना लक्ष्य परम शांति परमात्मा होना चाहिए। 

अगर तुम्हारा लक्ष्य उज्जैन नहीं है और तुम घर से निकले, यात्रा करते-करते महीनों तक भटक भटक के फिर वहीं पहुंच जाए। अगर लक्ष्य नहीं बनाकर आते तो यहां पहुंचते नहीं। पहले लक्ष्य बनाना पड़ता है, बाद में यात्रा शुरू होती है। ऐसे ही भगवान की भक्ति का ऊंचे से ऊंचा लक्ष्य हम लोग नहीं बनाते, इसलिए हम वर्षों तक की भटकान भटकते भटकते अंत में कंगले के कंगले रह जाते हैं। महाराज, कंगले क्यों? भक्ति किया, धन मिला, यश मिला, ये तो मिला लेकिन मरे तो कंगले रह गए। सच्चा धन तो परमात्मा प्राप्ति है, यह तो बाहर का धन है।... ये तो यहीं पड़ा रह जाएगा। इस शरीर को खिलाया-पिलाया, वो भी यहीं रह जाएगा। सच्चा धन तो आत्मधन है। कबीर जी ने ठीक कहा:

 "कबीरा यह जग निर्धना, धनवंता नहीं कोई। 
धनवंता सोई जानिए, जाको राम नाम धन होई।" 

जिसके जीवन में वो रोम-रोम में रमने वाला परम शांति स्वरूप, सुख स्वरूप, आनंद स्वरूप राम नाम का धन नहीं है, वो धनवान होते हुए भी कोई धनवान नहीं है। 

मैंने सुनी एक कहानी कि कोई हाथी मर गया। यमपुरी गया यमपुरी। यमराज ने हाथी से पूछा कि इतना मोटा, बड़ा, ताजा तवाना हाथी, तू मनुष्य लोक में पैदा हुआ और ऐसे कंगले का कंगला आ गया। कुछ कमाई नहीं की तूने? 

हाथी बोलता है, मैं क्या कमाई करता? मेरे से तो बड़ा मनुष्य है, वो भी कंगाल का कंगाल आ जाता है।

यमराज ने कहा, मनुष्य बड़ा कैसे? तेरे पैर के आगे खड़ा रहता है तो मनुष्य छोटा सा है। तू एक पूंछ का झापट मारे तो मनुष्य चार गुलाट खा ले। तेरी एक सूंड दस मनुष्यों को घुमा के गिरा दे। मनुष्य, मनुष्य से तो बड़ा मजबूत घोड़ा होता है, घोड़े से बड़ा ऊंट होता है और कई प्राणी होते हैं और उन सबसे तू बड़ा है। 

हाथी बोलता है, शरीर से तो मैं बड़ा हूं, लेकिन फिर भी मैं बड़ा नहीं। मनुष्य मुझ पर राज्य करता है, इसलिए मनुष्य मुझसे बड़ा है। एक महावत मुझे चलाता, घुमाता, फिराता, नचाता है। मनुष्य बड़ा है। 

यमराज ने कहा, खाक मनुष्य बड़ा है, मनुष्य तो बहुत नाटा है, छोटा है। इधर तो कई मनुष्य आते हैं। मनुष्य बड़े नहीं। 

हाथी बोलता है कि आपके पास मुर्दे मनुष्य आते हैं, कोई जिंदा से पाला पड़े तो पता चले कि मनुष्य कैसा होता है। जय राम जी की बोलना पड़ेगा। 

यमराज ने कहा, अच्छा तो मैं जिंदा मनुष्य को भी मंगवा लूंगा। अनऑफिशियली किसी को उठाकर ले आए। यमदूत को कह दिया। खड़े में कोई जवान सोया था, किसान। रात्रि का समय था। यमदूतों ने खाट के पायों को घेर के संकल्प से जैसे लिफ्ट चलती है, ऐसे उठा लिया ऊपर उसको। उसके प्राण निकाले नहीं, सीधे के सीधे ले जा रहे थे। उसकी मृत्यु तो थी नहीं, अनऑफिशियली उठाकर ले जा रहे थे। ऊपर की ठंडी हवाओं ने उस किसान की नींद खोल दी। उसने कथा में सुना था, यमदूत ऐसे होते हैं, वैसे होते हैं। सन्नाटे का समय था, चित्त एकाग्र था, वो दिखे। देखा कि ये तो मुझे यमपुरी ले जा रहे हैं। अगर इनके आगे कुछ भी बोला तो तू-तू, मैं-मैं हो गई। जरा सा खटिया टेढ़ा करेंगे तो मैं ऐसा गिरूंगा कि एक-एक हड्डी कहीं बिखर जाएगी, पता नहीं चलेगा। इतना ऊंचा चला गया था, गुरुत्वाकर्षण नियम के करीब-करीब पहुंचा होगा शायद। उस आदमी ने क्या करा? धीरे से अपने जेब में हाथ डाला और एक कागज पर कुछ लिखा और चुपके से फिर लेटा रहा। यमपुरी में खटिया पहुंच गया। यमराज ने यमदूत को और कहीं भेजा। जल्दबाजी में बिजी आदमी रहता है, भूल जाता है कौन क्या-क्या लाया है। किसी दूसरे यमदूत को उस आदमी ने चिट्ठी दी। चिट्ठी ले गया यमदूत। चिट्ठी में लिखा था, "आने वाले इस आदमी को मैं यमपुरी का चेयरमैन बनाता हूं, प्रेसिडेंट बनाता हूं।" नीचे सिग्नेचर भगवान आदि नारायण विष्णु। यमराज तो अटेंशन में आ गए कि ये आदमी प्रेसिडेंट ऑफ यमपुरी! उसको बना दिया तिलक-विलक करके। अब जो कुछ डिसीजन लेना है, उसकी सिग्नेचर चाहिए, उसका संकेत चाहिए। 
कोई पापी आया है, महाराज इसको क्या, कौन से नरक में भेजें? 

बोले वैकुंठ भेज दो। गया वैकुंठ। 
किसी ने अपनी पत्नी होते हुए भी कईयों के साथ गड़बड़ की। महाराज इसको कौन से नरक में भेजें? 
बोले वैकुंठ भेज दो। 
किसी ने विधवा माईयों का धन हड़प किया, डिपॉजिट हड़प के ।महाराज इसको कौन से कुंभीपाक में डालें या कौन से नरक में डालें? 
बोले वैकुंठ भेज दो। जो भी आए वैकुंठ, वैकुंठ, वैकुंठ थोड़े दिनों में वैकुंठ भर गया। 
भगवान नारायण सोचने लगे, क्या पृथ्वी पर ऐसे कोई आत्मसाक्षात्कारी पहुंचे हुए पुरुष आ गए हैं कि जिनका सत्संग सुनकर, दर्शन करके आदमी निष्पाप हो जाए और सब के सब वैकुंठ चले आए। अगर कोई ब्रह्मज्ञानी होता है तो मेरा और उसका सीधा संबंध होता है। जैसे टेलीफोन तुम्हारे घर में है तो एक्सचेंज से तो उसका संबंध होगा ही। बिना एक्सचेंज के टेलीफोन की लाइन अथवा डिब्बा कोई काम नहीं करेगा। तो अगर कोई ब्रह्मवेत्ता है तो उसका और मेरा तो सीधी लाइन होती है। अब तुम्हारे टेलीफोन में तो केबल या वायर होती है, लेकिन परमात्मा और परमात्मा को पाए हुए साक्षात्कारी पुरुष में केबल या वायर की जरूरत नहीं होती है, वो तो संकल्प मात्र होता है, पुण्य मात्र से होता है। 
मन मेरो पंछी भयो, उड़न लाग्यो आकाश। 
स्वर्ग लोक खाली पड़ो, साहिब संतन के पास। 

प्रभु जी बसे साध की रसना और परमात्मा साधु की जिव्हा पर नाचता है, बसता है और ऐसा कोई साधु मैंने भेजे नहीं। तो ये सब के सब लोग वैकुंठ में आ गए, क्या बात है? 
यमराज से पूछवाया। 
यमराज ने कहा कि कोई ब्रह्मज्ञानी आत्मसाक्षात्कारी पुरुष धरती पर पहुंच गए हैं और लोगों को कर्मकांड करवाते-करवाते, कीर्तन भजन करवाते, कृपा बरसा के बस उनको वैकुंठ का अधिकारी बनाते, ऐसी बात नहीं है। ये आपने जो भेजे हैं ना मुखिया, वही सब डिसीजन ले रहा है महाराज। 

भगवान सोचते हैं, मैंने तो कोई मुखिया भेजा नहीं। चलो, मैं स्वयं आता हूं। 
भगवान आए, यमराज उठकर स्तुति करते हैं, बोले कौन मुखिया है? 
बोले वो जो बैठा है प्रेसिडेंट, आपने भेजा है। मैंने तो नहीं भेजा। 
बोले ये आपकी सही, आपका सिग्नेचर। 
भगवान बोलते हैं आदि नारायण विष्णु, मेरा नाम! 
मुखिया को बोला कि भाई, मैंने तेरे को कब भेजा था और मैंने कहां सही की थी? ये तू मेरे नाम की जाली सही कर दिया है। 
वो बोलता है कि भगवान, ये हाथ पैर सब तुम्हारी शक्ति से चलते हैं। प्राणी मात्र के हृदय में तुम हो, ये तुम्हारा वचन है। तो जो कुछ मैं करता हूं, वो तुम्हारी सत्ता से हुआ तो तुम ही ने किया। हाथ क्या करें, मशीन बेचारी क्या करें? चलाने वाला तो वही है। 

"उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥"
रामायण में भी लिखा है। 

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । (गीता 18.61)
गीता में कहा है, अगर आपने नहीं सही करवाई तो मैं अपनी बात वापस लेता हूं लेकिन भगवान ये ख्याल करना कि अब कोई रामायण भी नहीं मानेगा और गीता को भी नहीं मानेगा। 'करन करावनहार स्वामी सकल घटा के अंतर्यामी।' यह शास्त्र भी कोई मानेगा नहीं। आप तो कहते हैं कि मैं सबका प्रेरक हूं, तो ये मेरे को प्रेरणा करने वाले भी तो आप ही हुए, तो आपका नाम लिखते हैं। अगर मेरे को आप झूठा साबित करते हैं तो आपके शास्त्र भी झूठे हो जाएंगे तो लोगों को फिर भक्ति भक्ति कैसे मिलेगी? संसार नरक बन जाएगा। 

भगवान बोलते हैं, बात तो सही है रे जिंदा मनुष्य! यमराज की तरफ निहारते हैं। अच्छा चलो भाई, यह सही करने की सत्ता मेरी है, इसलिए तूने मेरा नाम लिख दिया लेकिन जो भी आए, पापी अपराधी सबको तुम वैकुंठ क्यों भेज देता है? जिसका जैसा पाप है, उसको ऐसी ऐसी सजा दो, शुद्ध हो जाए। 
बोले, भगवान मैं सजा देने के लिए नियुक्त नहीं हुआ हूं। मैं तो अनऑफिशियली आया हूं और चार दिन की कुर्सी है। कोई पता नहीं कब चली जाए। जैसे चार दिन की जिंदगी है, जो सत्कर्म कर लिया सो कर लिया। ऐसे ही चार दिन की मेरी अनऑफिशियली कुर्सी है। जितना हो गया, अच्छा काम करना है और कहते हैं कि:

भला करे तो भला होए। 
जो औरों को शक्कर देता है, खुद भी शक्कर खाता है,
औरों को डाले चक्कर में वो खुद भी चक्कर खाता है। 
कलयुग नहीं, करयुग है। एक हाथ दे, एक हाथ ले। 
नेकी का बदला नेक है, बदों को बदी देख ले। 
इसे तू दुनिया मत समझ भैया, ये सागर की मझधार है। 
औरों का बेड़ा पार कर तो तेरा बेड़ा पार है। 

तो मैं इन सबका बेड़ा पार किया, तभी तो आप मेरे पास आ गए। फिर मैं ऐसा धंधा क्यों न करूं? अगर मैं इनको न भेजता, तो आप भी नहीं आते। आपकी दीदार भी नहीं होते तो मैंने तो अपनी भलाई का फल तो पा लिया। 

भगवान लंबी सांस छोड़ते हुए कहते हैं कि अरे चल भाई, उनको भेज दिया तो भेज दिया। अब तू पुण्य कमा लिया, मेरा दर्शन कर लिया, उनको मैं वापस भेजता हूं।

बोले, भगवान, उनको वापस भेजोगे तो फिर आपके दर्शन का फल क्या फिर नरक में? तो फिर आपके दर्शन की महिमा कैसे? 
बोले, अच्छा तो तू चला जा अब पृथ्वी पर। 
बोले, मैंने इतने लोगों को तारा और आपका दर्शन किया और फिर भी मुझे संसार की मजदूरी करनी पड़े तो फिर आपके दर्शन की और सत्कर्म की महिमा सुहागा घूम जाएगा। 
भगवान सोचते हैं अरे तू तो बड़ा वकील का बाप निकला रे तू। ऑफीशियली बातें हैं, आध्यात्मिक ज्ञान संयुक्त बात। 
भगवान बोलते हैं, अच्छा भाई, वो उनको तो मैं नहीं गिराऊंगा, भले वहां रहे। अब तू यह सीट छोड़, तू भी ऊपर चल, वैकुंठ में। 
वो बोलता है, मैं अकेला नहीं आऊंगा, जिस हाथी के निमित्त से मैं आया हूं, उसी को अगर पहले आप सैंक्शन करते हैं तो फिर यह दास आने को तैयार है। 
भगवान बोलते हैं चल भाई, हाथी देव, तू भी चल वहीं। हाथी सूंड ऊंची करके यमराज को बोलता है कि जय राम जी की, जय राम जी की। ये जिंदा मनुष्य है, देखा। 
मनुष्य के अंदर इतनी संभावना है कि वो भगवान का माई-बाप भी बन सकता है। जय राम जी की! भगवान राम के माई-बाप दशरथ और कौशल्या थे। भगवान कृष्ण के माई-बाप वसुदेव और देवकी थे। मनुष्य की इतनी ऊंची संभावना है, लेकिन अगर सतगुरु नहीं मिलता और सीधी साधना सूक्ष्म नहीं मिलती है तो मनुष्य भटक जाता है। भोगी भोग में भटक रहा है, त्यागी त्याग में भटक रहा है और भक्त बेचारा भावनाओं में भटक रहा है। 
भटक मुआ भेदु बिना पावे कोनो उपाय, 
खोजत खोजत युग गए, पाँव कोस घर
05.02.2026 Part 3

भक्त भोगी से तो भक्त अच्छा है, त्याग के अहंकार से तो भक्त अच्छा है, लेकिन भक्त भी बेचारा भटक रहा है। इसीलिए शास्त्रों ने कहा:
संत जना मिल हरजस गाइए। 
उच्च कोटि के महापुरुषों के चरणों में बैठकर हरि का जस गाओ, उनसे मार्गदर्शन लेकर फिर चलो। कबीर ने कहा: 

सहजो कारज संसार को, गुरु बिना होत नाही। 
हरि तो गुरु बिन क्या मिले, समझ ले मन माहीं। 

सहज कार्य आटा गूंथना है न, रोटी बनाने का आटा, उसमें भी कोई गुरु चाहिए। आटा गूंथने के लिए भी बेटी को, बहू को किसी न किसी से सीखना पड़ता है। सब्जी बनानी है तो पहले किसी से सीखना पड़ता है। तो जीवात्मा को परमात्मा का साक्षात्कार करने वाला बनाना है तो जरूर सतगुरु से सीखना पड़ेगा। 

सतगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट, 
मारे गोला प्रेम का, हरे भ्रम की कोट। 
तुलसी तुलसी क्या करो, तुलसी बन की घास। 
कृपा भई रघुनाथ की, तो हो गए तुलसीदास। 

तुलसीदास जब शादी किए थे तो अपने पत्नी के प्रति उनको बड़ी कामवासना थी, ऐसी कथा कहानी है। पत्नी मायके चली जाए तो तुलसीदास को वहीं जाना पड़े। एक बार तो अंधेरी रात में कूद पड़े, किसी शव को लक्कड़ समझकर नदी पार कर ली। आंधी तूफान, अंधियारी रातों में वह अपने ससुराल गए, पत्नी से मिलने के लिए। देखा कि खिड़की पर कुछ रस्सा-वस्सा है। उस अजगर को रस्सा समझकर सांप को कूद के पत्नी के कमरे में पहुंचे। 
पत्नी ने कहा कि इस अंधेरी रात में यहां कैसे पहुंच गए? नदी पार कैसे हुई और इधर खिड़की कूद के कैसे आ गए? 
बोले प्रिये, तूने रस्सी जो बांध रखी थी। 
पत्नी ने लालटेन की दीव ऊंची करते हुए देखा, रस्सी तो नहीं है, तो सांप है। इतना काम विकार में आप इतने बलवान हैं, आपकी वासना इतनी तेज है कि वो मुर्दे पर।... मुर्दे का सहारा लेकर नदी पार किए और सांप का सहारा लेकर आप मेरी खिड़की में कूद गए और फिर बदले में मिलेगा क्या? चमड़ा चाटते समय शरीर कमजोरी, हाड़ मांस में... 
मेरे हाड़ मांस में इतनी तुम्हारी प्रीति है, 
इससे आधी अगर भगवान के प्रति होती तो तुम्हारा बेड़ा पार हो जाता। 
पत्नी के द्वारा मानो परमात्मा, अंतर्यामी, ईश्वर, गुरु का काम कर रहे हैं। 
हाड़ मांस की देह मम ता में इतनी प्रीति, 
याते आधी जो राम प्रति, अवश्य मिटे भव भीती। 

तुलसीदास का हृदय बदल गया। बोले, "फिर से बोल।" 
पत्नी कहती कि हाड़ मांस के शरीर में जितनी मोहब्बत है, चमड़ा हटा के देखो तो आंतें मिलेंगी, मांस मिलेगा, नस नाड़ियां मिलेगी। दो खड़ी हड्डियां हैं और छोटी आड़ी हड्डियां हैं। अंदर में जो खाली जगह है, वहां मल-मूत्र है। नाक से लीट निकलती है, आंख से कीचड़ निकलता है, कान से मैला निकलता है, मुंह से थूक निकलती है और नीचे की इंद्रियों से क्या निकलता है, यह जानते हो? जरा सा चमड़ा हटा के देखो तो क्या हालत है। फिर भी यह शरीर जो प्यारा लग रहा है तो उस चैतन्य आत्मा राम की देन है। उस राम के प्यार को पाओ। इस हाड़ मांस को प्यार करके कब तक तुम खुशियां मनाओगे? लग गई बात। 

बोले, आज से तू मेरी गुरु। चले गए एकांत में, भगवान के आगे आंसू बहा के प्रार्थना करते हैं, "हे परमात्मा! मैं कामी हूं, मैं कुटिल हूं। मैं तेरा भक्त होने के लायक नहीं हूं। मैं संत होने के लायक नहीं हूं तो कम से कम तू मुझे तेरे संत का शिष्य तो बना दे। कोई सच्चे संत का मुझे भगत तो बना दे, इतनी तो दया कर।" फिर वो संत रोए हैं कि मैं संत का शिष्य बनूं, यह भी कोई कर्म होने चाहिए। पापी आदमी क्या संत का भगत होगा? क्या संत का प्रसाद लेगा? मेरे इतने पाप हैं कि मैं संत का शिष्य नहीं हो सकता हूं, संत का भगत नहीं हो सकता हूं, संत का साथी नहीं हो सकता हूं तो कम से कम तेरे संत या भक्त या वैष्णव के द्वार का मुझे तू गऊ बना दे, ताकि मेरा दूध तेरे संत की सेवा में जाए और देर सबेर मेरा कल्याण हो जाए। मेरे राम जी, इतना तो जरूर करना। फिर तुलसीदास जी सोचते हैं कि संत के द्वार की गऊ बनने के लिए भी तो कोई पुण्य चाहिए। मैं तो कामी हूं, कुटिल हूं। सांप को पकड़कर पत्नी के पास जाता हूं, रस्सी समझता हूं सांप को। इतना कामंध आदमी संत के घर की गाय कैसे बन सकता है? हे भगवान! संत के वैष्णव के घर की गाय नहीं बन सकता हूं तो कोई बात नहीं। तू मुझे कम से कम किसी संत या वैष्णव के घर का घोड़ा बना दे। वो मुझ पर सवारी करके कथा करने को जाएगा। मेरी सेवा थोड़ी स्वीकार हो जाएगी और देर सबेर मैं तुझको मिल पाऊंगा। हे भगवान! मुझे घोड़ा ही बना दे, तेरे भक्त का, तेरे संत का। मन ही मन गुनगुनाते हैं। 

आप भी कभी मन ही मन कमरे में भगवान से बातचीत करो कि भगवान जिंदगी पसार हो रही है, तेरी भक्ति मिल जाए, तेरा ध्यान मिल जाए, परम शांति का प्रसाद मिल जाए। दुनिया भर की बातें तुमने बहुत सुनी लाला, बहुत कही, बहुत कहोगे, लेकिन मुझसे आखिर में कुछ नहीं मिलेगा। रीते रह जाएंगे। कभी कभी उस दुनिया के स्वामी के साथ बातचीत करो। कभी रोओ, रोना नहीं आता तो इस बात पर रो कि पैसों के लिए रोता है, वाहवाही के लिए रोता है, लेकिन परमात्मा के लिए, ए मेरा पापी मन, तुझे रोना नहीं आता। कभी उसको प्यार करते-करते हँसो, देखो फिर धीरे धीरे तुम्हारी वो चेतना जगे। जो-जो आप अंतरंग उपासना, साधना करोगे, अंदर के देवता का दर्शन करने जाओगे, त्यों-त्यों आपकी परतें हटती जाएगी। बाहर के देव के दर्शन करने में तो तुम्हें लाइन लगानी पड़ेगी। पर्ची फड़ाने पर भी दर्शन हो चाहे न हो, लेकिन यहां अंदर का देव तो जब चाहिए तब दर्शन कर सकते हो और अंदर के देव के दर्शन एक बार ठीक हो गए तो फिर बाहर के देव के तुमने दर्शन न भी किए तो कोई फिक्र की बात नहीं है। तुम जहां भी हो, वहां देव ही देव है। 

तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु! मैं गऊ तो नहीं बन सकता, घोड़ा ही बना दे। घोड़ा भी बनने के लिए पुण्य चाहिए। अब तो प्रभु और दूसरा कोई उपाय नहीं। तेरे प्यारे, तेरे को अनुभव किए हुए किसी वैष्णव, किसी महापुरुष के द्वार का मुझे कुत्ता ही बना दे, ताकि उसकी निगाह पड़ती रहेगी, मेरे पाप कटेंगे, उसके हाथ का टुकड़ा खाऊंगा, मेरा दिल पवित्र होगा और देर सबेर मैं तेरे द्वार तक पहुंच पाऊंगा। इसलिए किसी संत, सच्चे संत के द्वार का कुत्ता भी बना देगा तो मेरा कल्याण हो जाएगा। सधे हृदय की प्रार्थना अंतःकरण को पवित्र करती है। 

भगवान कुत्ता क्यों बनाते, घोड़ा क्यों बनाते? गाय क्यों बनाते? भगवान ने तो संत, भगवान ने तो तुलसी को संत तुलसीदास बना दिया। 
तुलसी, तुलसी क्या करो, तुलसी बन की घास। 
कृपा भई रघुनाथ की, तो हो गए तुलसीदास। 

उस रघुनाथ की कृपा को पाने के लिए आप भी छटपटाओ, कभी यत्न करो। इतना जिंदगी का समय बीतता चला जा रहा है, अब कितना है बाकी? डेढ़ साल, दो साल निकाला, पांच साल निकाला, दस साल, बीस साल। आखिर क्या? तो यह जीवन बहती गंगा की नाईं बह रहा है, उसमें से अपना समय बचाकर काम कर लो। 

पड़ा रहेगा माल खजाना, छोड़ त्रिया सुत जाना है, 
कर सत्संग, सत्य स्वरूप ईश्वर का संग कर। 
कर सत्संग अभी से प्यारे, नहीं तो फिर पछताना है। 
खिला पीला कर देह बढ़ाई, वो भी अग्नि में जलाना है। 
कर सत्संग अभी से प्यारे, नहीं तो फिर पछताना है। 

उस सत्य स्वरूप का संग करो। सुबह नींद में से उठो तो संकल्प करो कि तेरा संग कैसे हो? कभी व्यवहार करते-करते बार बार सोचो कि हे मेरा परमात्मा, तू मेरे साथ है, लेकिन मैं अभी तक तेरा संग नहीं कर रहा हूं। मरने वाली चीजों के संग में पड़ा हूं। मिटने वाली दोस्ती के संग में पड़ा हूं, लेकिन अमिट मेरे मालिक! तेरी दोस्ती का मेरे को कब रंग लगेगा? तू दया कर दे।... सच्चे हृदय की प्रार्थना काम कर लेगी। अगर सच्चे हृदय की प्रार्थना नहीं तो कम से कम ऐसे वैसे भी करो तो धीरे धीरे वो भी सच्ची बन जाएगी। भगवान कहते हैं: 

आपूर्यमाणं अचलं प्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् तद्वत् कामाः प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी। 

हल्की चीज को निकालने के लिए, हल्की कामनाओं को निकालने के लिए अच्छी कामना करनी चाहिए। जैसे कांटे से कांटा निकलता है, ऐसे ही हल्के वासनाओं से, हल्के कर्मों से अपने दिल को पवित्र करना हो तो अच्छे कर्म में लगा दें अपने दिल को। हल्की आदतों को दूर करना हो तो अच्छी आदत डाल दो। देव दर्शन की आदत डाल दो, अच्छा है। भगवान के दर्शन की आदत अच्छी है। संसार आंखों से भीतर घुसता है, कानों से भीतर घुसता है तो संसार घुसता है तो अशांति पैदा करता है। इसकी अपेक्षा भगवान के श्री विग्रह को देखकर उसी को अंदर लाओ, अच्छा है। भगवान के प्यारे संतों के वचन सुनकर उन्हीं को संसार में लाओ। तो जैसे कांटे से कांटा निकलता है, ऐसे ही सत्संग से कुसंग निकलता है और सुदर्शन से कुदर्शन का आकर्षण निकलता है और देर सवेर कुदर्शन हट जाए तो फिर सुदर्शन तुम्हारा स्वभाव हो जाएगा। 

मैंने विनती की थी कि भगवान के दर्शन किया, लेकिन सत्संग नहीं है तो मोह हो सकता है। गरुड़ भगवान के सेवक थे। भगवान विष्णु जब रामावतार में आए, रामावतार में आए तो मेघनाथ जी से जब भिड़ना पड़ा तो मेघनाथ जी ने नागपाश में राम जी को बांध लिया। नारद जी गए, कहा गरुड़ के पास कि ठाकुर जी बंधे हैं, जाओ, मदद करो, सेवा करो। गरुड़ जी कोई साधारण पक्षी नहीं है, पक्षियों के राजा हैं। वे जब उड़ान भरते हैं तो उनके पंखों से सामवेद की ऋचाएं गूंजती है, इतने ऊंचे। वो आए, गरुड़ आए तो कई नाग तो ऐसे ही रवाना हो गए और बाकी के नागों को गरुड़ जी ने अपनी चोंच से ठिकाने लगा दिया। रामचंद्र जी निर्बंध हो गए। राम जी तो निर्बंध हो गए, लेकिन गरुड़ को मोह हो गया कि यह भगवान कैसे? अगर मैं नहीं आता तो ये नागपाश में बंधे रहते। ये भगवान कैसे? गरुड़ को मोह हो गया। मोह होने से शांति भंग हो गई। गरुड़ जी भटकने लगे। भटकते भटकते, घूमते घामते। आखिर गरुड़ जी अशांति मिटाने के लिए सत्संग की जरूरत महसूस करते हैं और भगवान शिवजी के पास गए कि भगवान मुझे उपदेश दीजिए, मैं बड़ा दुखी हूं, अशांत हूं। 

कब से अशांति हुई ?
कि जब से श्री रामचंद्र जी को नागपाश से छुड़ाया, तब से अशांति हुई। मन में यह आया कि भगवान कैसे? ये सचमुच में आदि नारायण हैं कि दशरथ के पुत्र राम हैं। वनवासी राम हैं। राम के प्रति मेरे मन में ऐसा हो गया, तब से बड़ी अशांति है। 
शिवजी ने देखा कि यह तो अपने को चतुर समझता है। मैंने ही नागपाश से भगवान को छुड़ाया। इसको जरा उपदेश तो मिले, लेकिन इसका अहम दूर हो, ऐसी जगह पर भेजना चाहिए। पक्षियों में क्षुद्र से क्षुद्र जाति कौवे की होती है और ऊंची से ऊंची जाति है गरुड़ की। जैसे किसी सम्राट को चपरासी और वो भी बेकार चपरासी, रिजेक्ट चपरासी के द्वार पर बर्तन भेजने मांजने भेजो, तो उसकी, उसके अहम गलाने की पराकाष्ठा हो गई। कोई चक्रवर्ती सम्राट हो और रिजेक्ट चपरासी के द्वार के बर्तन मांजे तो उसके मान की क्या कीमत रही? खग की भाषा खग ही जाने। तुम भी पक्षी, कौवा भी पक्षी। जाओ, उससे भगवत कथा सुनो तो तुम्हारा मोह दूर होगा। 

गरुड़ जी गए हैं। कागभुषंड के श्रीमुख से भगवान के गुणगान सुने हैं, सत्संग सुना है। भगवान के दर्शन से तो मोह हो सकता है, लेकिन भगवान के सत्संग से मोह दूर होता है तो दर्शन से भी सत्संग ऊंचा हो गया। तो जो सत्संग है, वो आदमी को सत्य स्वरूप ईश्वर में बिठाता है। शांत स्वरूप परमात्मा का अनुभव कराता है। अंतर आराम, अंतर सुख, अंतर्ज्योतिरेव च, अंदर का आराम, अंदर का सुख और अंदर की ज्ञान की ज्योति जगाता है। यह दीए की ज्योति तो गर्म होती है और वस्तुओं को जलाती है, लेकिन अंदर ज्ञान की ज्योति जब गुरु जगा देते हैं तो वस्तुओं को जलाती नहीं है, लेकिन जीवन में प्रकाश ले आती है, शांति ले आती है, माधुर्य ले आती है। जिनके हृदय में वो अचल शांति हुई, उनकी आंखों में जगमगाता आनंद, संतप्त हृदय को शांति देने का सामर्थ्य, अज्ञान में उलझे हुए जीवों को आत्मज्ञान देने की उनकी शैली अपनी अद्वितीय होती है। ऐसे पुरुष संसार में जीते हैं। लाखों लोगों का अंतःकरण भगवताकार बना देते हैं और ऐसा करने में आप सक्षम हो सकते हैं। अगर आप सत्संग का सहारा लेकर दिल मंदिर में जाने का प्रयास करें, कभी भी कोई भी दुख या सुख देने वाली घटना आए तो अपने ज्ञान का सहारा लो।



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