शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

गीता सार - भाग -3 | आश्रम संध्या सत्संग 03-02-2026 सुबह

 

गीता सार - भाग -3 | आश्रम संध्या सत्संग 03-02-2026 सुबह


Index 

0:00 परमात्मा की सर्वव्यापकता और उसका न जाना ही मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना

0:33 मछली और पानी का उदाहरण देकर ईश्वर की निकटता समझाना (कहानी)

1:14 श्वास और शरीर के उदाहरण से जीवन आधार का बोध

2:18 पंचमहाभूत और अष्टधा प्रकृति का सिद्धांत

4:25 संयोग जन्य सुख की अस्थिरता

6:11 मुर्गी और बतख का उदाहरण तथा प्रथम संस्कार का प्रभाव (कहानी)

8:18 परा और अपरा प्रकृति का भेद

9:39 चेतन शक्ति और जड़ प्रकृति का संबंध

11:24 आत्मा और शरीर का भेद

12:44 मन का अभाव की ओर भागना

13:33 संसार और ईश्वर के बीच की उलझन

14:17 सेवा और परोपकार से चित्त शुद्धि

15:46 कर्म, भक्ति और ज्ञान के मार्ग

17:15 अहंकार और पुण्य का सूक्ष्म प्रभाव

19:07 नदी में गिरने वाले व्यक्ति का उदाहरण (कहानी)

20:30 नियत की शुद्धता का महत्व

22:36 गीता के अनुसार प्रकृति और चेतना

24:35 राग द्वेष और मन का स्वभाव

26:42 जो है उसका सदुपयोग करने की सीख

27:48 आत्मविचार और साधना के उपाय

29:14 पुण्य पाप और मनुष्य जन्म का रहस्य

30:37 जीवन में सही संग का महत्व

Description 

0:00 परमात्मा को पाए बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ है क्योंकि वह सदा सर्वत्र होकर भी जाना नहीं जाता और यही सत्संग का आश्चर्य है।

0:33 मछली पानी में रहते हुए पानी का मूल्य नहीं जानती और बाहर आकर छटपटाती है वैसे ही मनुष्य ईश्वर में रहते हुए उसकी कीमत नहीं समझता (कहानी)।

1:14 श्वास और शरीर के उदाहरण से समझाया कि जो आधार है उसकी कीमत तब समझ आती है जब वह रुकता है।

2:18 पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश के साथ मन, बुद्धि और अहंकार मिलकर अष्टधा प्रकृति बनती है जो बाहर और भीतर दोनों जगह है।

4:25 संयोग से मिलने वाला सुख सुई की नोक पर पानी जैसा है जो टिकता नहीं इसलिए उससे तृप्ति नहीं होती।

6:11 मुर्गी के बच्चे को बतख दिखाने से उसका आकर्षण गलत दिशा में चला गया जैसे मनुष्य माया की ओर खिंच जाता है (कहानी)।

8:18 परा प्रकृति चेतन है और अपरा प्रकृति जड़ है तथा चेतन शक्ति ही जड़ को गति देती है।

9:39 जैसे पानी से सेवाल जीवित रहती है वैसे ही चैतन्य के सहारे प्रकृति चलती है।

11:24 शरीर नश्वर है और आत्मा उससे भिन्न है इसलिए स्वयं को जड़ प्रकृति मानना भूल है।

12:44 मन अभाव की ओर भागता है और जो है उसकी उपेक्षा करता है इसलिए अशांति बनी रहती है।

13:33 कभी संसार का सुख और कभी ईश्वर की चाह मन को विक्षिप्त कर देती है।

14:17 अभावग्रस्त लोगों की सेवा और परोपकार से चित्त की ग्रंथियां खुलती हैं।

15:46 कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों मार्ग हैं लेकिन जड़ प्रकृति से तादात्म्य टूटे तो आनंद प्रकट होता है।

17:15 अहंकार के साथ किया पुण्य भी अशांति देता है और कभी गिरावट भी ईश्वर की कृपा बन जाती है।

19:07 नदी किनारे गिरा व्यक्ति बहाव से पार लग गया जैसे कभी अनायास कृपा से जीवन बदल जाता है (कहानी)।

20:30 नियत शुद्ध हो तो छोटी भूल का भी भारी दोष नहीं होता।

22:36 गीता बताती है कि जड़ प्रकृति से भिन्न चेतन शक्ति ही जगत को धारण करती है।

24:35 राग से गुण और द्वेष से अवगुण दिखते हैं यह मन का स्वभाव है।

26:42 जो नहीं है उसकी इच्छा छोड़कर जो है उसका सदुपयोग करना ही कल्याण का मार्ग है।

27:48 श्वास, जप और आत्मविचार से अष्टधा प्रकृति से अलग अपने स्वरूप का बोध होता है।

29:14 पुण्य और पाप के संतुलन से मनुष्य जन्म मिलता है और संग के अनुसार जीवन दिशा लेता है।

30:37 प्रतिदिन मन को आत्मज्ञान का संग दो ताकि शुभ संस्कार प्रबल हों और अशुभ क्षीण हो जाए।


Manual Transcription 

जिसको पाए बिना आदमी कंगाल और जिसको पाए बिना मनुष्य का मनुष्य जन्म व्यर्थ, जिसको जाने बिना सब कुछ जाना हुआ तुच्छ। जिसको मिले बिना सब मित्रों से मिलना मजूरी। ऐसा परमात्मा सदा, सर्वत्र, सबसे मिला हुआ है और आज तक पता नहीं। यह आश्चर्य है। सत्संग की बात क्या बात है! 


मछली तो शायद पानी को छोड़ सकती है, एक सेकंड के लिए भी। पानी के बिना की जगह में एक सेकंड छटपटा सकती है और तब उसे कदर पड़ती है पानी की और पानी में होती है तो उसको पता ही नहीं कि पानी का क्या मूल्य है। जब पानी से बाहर आती है तब छटपटाहट होती है, तब उसको पता चलता है कि अरे! सागर भी कोई चीज है और मनुष्य की विडंबना यह है कि तुम परमात्मा से एक क्षण भी बाहर नहीं निकल सकते, इसलिए तुमको छटपटाहट कभी होती नहीं। यह सत्संग है आज का। खुदा की कसम खा के बोलता हूं, क्या बात है, तो यही बात है सच्ची, ये दोनों हाथ धर दिए हैं। 


एक क्षण भी अगर तुम ईश्वर से अलग हो जाओ तो पता चले कि क्या उसकी कीमत है। अभी सांस चल रहा है तो इसकी कोई कीमत नहीं। एक क्षण के लिए तुम्हारा नाक दबा दें, मुँह शरीर दाब दें तो फिर जरा लगेगा और एक मिनट के लिए दाब दें तो फिर पता चले। अरे नाक न दाबे, नाक से तुम सांस लेते रहो, लेकिन तुम्हारे अंगों को डामर लगा दिया जाए, जो रोम कूप हैं, वो बंद कर लिया जाए तो आप पंद्रह मिनट से ज्यादा जी नहीं सकते। अभी रोम कूप का कोई... अरे हम नाक से सांस लेते हैं, फिर इसकी क्या जरूरत है? ये पता ही नहीं था कि इनके बिना भी हम नहीं जी सकते। गाना गाते तेरे लिए भी क्या जीना रे, जा ढको! [हंसी] तो कहते गए और उनके बिना जीते गए और क्या क्या करते गए। उस तत्व के बिना, उस तत्व के आधार से वो तत्व ही सार है। वैज्ञानिक ढंग से देखो, वेदांतिक दृष्टि से देखो, प्राकृतिक दृष्टि से देखो। ये जो पृथ्वी खड़ी है, ठोस दिख रही है। इससे दस गुना जल है। और जल के सहारे खड़ी है। बेट जो है ना बेट, नदी में बेट दिखते हैं। ऐसे ही पृथ्वी से दस गुना जल, जल तेज के सहारे खड़ा है, तेज वायु के सहारे खड़ा है और सबका सहारा देने वाला आकाश सबको अवलंबन दे रहा है और वह आकाश का सहारा है प्रकृति, महतत्व। महतत्व का सहारा है प्रकृति और प्रकृति का सहारा है पुरुष। अब बाहर भी व्यष्टि समष्टि में और भीतर व्यष्टि में। 


तुम्हारे शरीर में पृथ्वी तत्व है, जल तत्व है, तेज तत्व है, है कि नहीं है? तेज तत्व न होता तो आँखें देखती कैसे? जल तत्व न होता तो यह पानी और पसीना और यह रक्त, थूक, लार। वायु तत्व है ये श्वांस लेते प्राण, फिर पांच हो जाते हैं प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान। और आकाश तत्व भी है। कान, नाक, ये, हृदय तो इस शरीर में भी यह पंच प्रकार के पांच भूतों के महाभूतों का व्यष्टि यह शरीर। मन, बुद्धि और अहंकार। यह अष्टधा प्रकृति तुम्हारे शरीर में भी है, बाहर भी है। अब बताओ कि अष्टधा प्रकृति... में तुमने चालीस साल, तीस साल, पैंतीस साल, पचास साल अभी अनुभव किया और उसके पहले भी अष्टधा प्रकृति के शरीर मिले, उसके तुम अनुभव करते आए हैं और इस प्राकृतिक अष्टधा प्रकृति के संयोगजन्य सुख यदि टिकते, तो एक एक दिन में तुमने कई क्षण सुख के लिए होगा। लाओ, लाओ, सुख लेते लाओ, ले सुई की नोक पर पानी का गैलन ढोलो। सुई की नोक पर जितना पानी टिके, उतना-उतना भी सुख टिकता तो करोड़ों जन्म में तुम सुख लेते आए संयोगजन्य सुख तो अभी सुख होता। वैगन भरे हुए होते, गोदाम भर जाते सुख के। 


तो संयोगजन्य सुख, संयोग माना क्या? धन तो तिजोरी में है, लेकिन अहम् बोलता है कि मेरे पास सात लाख है। मकान तो जमीन पर है, लेकिन अहम् भावना करता कि मेरा मकान तीन मंजिल का है। पुत्र तो बाजार में घूम रहे हैं, मेरा बेटा है, तेरा बेटा नहीं है, वो तो सुख का बेटा है। लाड़ी में सुख मिलेगा तो उसका पीछे जाएगा। गाड़ी में मिलेगा तो उसके पीछे जाएगा। डायवर्स में सुख देखेगा तो वो भी कर देगा। बेटा सुख का है, तेरा बेटा नहीं, लेकिन सुख उस बेचारे को पता ही नहीं। संयोग जन्य सुख में जीवन बिता रहा है। तो यह जो संयोग जन्य सुख है, इन संयोग जन्य सुखों से आज तक हम यदि सुखी होते तो सब आदमी तृप्त होते। 


जो वास्तविक सुख है, उसको तो पीठ किया और जो सुख से दूर लिए जा रहे हैं।... उसके पीछे हम पड़े। मैंने बताई थी वो मुर्गी की कहानी कि वैज्ञानिकों ने क्या करा कि मुर्गी अंडे देकर बच्चे सेह रही थी। बच्चा जब निकलने को था, बच्चे की मुद्दत पूरी हुई, अंडे में मुर्गी ने चौंच मारी। अंडा फूटा और बच्चा निकले। बच्चा निकले, उस घड़ी क्या करा वैज्ञानिकों ने कि मुर्गी ने अंडा को तो चौंच मारी और बच्चा जो मुंह बाहर निकालता है, अपनी चौंच बाहर निकालता है, तो वैज्ञानिकों ने क्या करा कि असली मुर्गी हटा दी और उसके आगे बतख रख दी, बच्चे के आगे। और बच्चा को फर्स्ट इंप्रेशन पड़ा कि यह मेरी मां है। बच्चा बतख के पीछे जाने लगा और बतख पानी की तरफ जाती है और बतखों में घूमती है। इसका तो भाव नहीं पूछती, फिर भी ये चिन-चिन चिन-चिन करके उसके इर्द गिर्द मंडरा रहा है और मां बेचारी जो असली मां है, वहां वो अपने पंख फैलाकर बुला रही है। उस पिंजरे में पड़ी-पड़ी कराह रही है मां! लेकिन वहां नहीं जाता और बतख है चौंचे मार रही, उसका पीछा छोड़ता नहीं और मां बुला रही है, उधर जाता नहीं। रात को ठंडी में ठिठुर रहा है, फिर भी मां के पास नहीं जाता। बतख की चौंच खा रहा है। ऐसा क्यों हुआ कि जन्मते वक्त फर्स्ट इंप्रेशन जो पड़ी न उसको, आकर्षण उधर का हो गया। ऐसे कई बच्चों को मैं देखता हूं कि हजारों जन्मों से बतखों की चौंच खाते आए हैं। कोई एमए पढ़ा बच्चा है, कोई बीए पढ़ा बच्चा है, कोई धनवान बच्चा है, कोई निर्धन बच्चा है, लेकिन बतख की चौंच खा रहे हैं, माया की। एक होती है परा प्रकृति, दूसरी होती है अपरा। तो जैसे बतख और मुर्गी, ऐसे परा और अपरा, विद्या और अविद्या। तो अविद्या की जो प्रकृति है, वो बतख जैसी है और विद्या का जो स्वभाव है, विद्या क्या करती है? कि जड़ चीजों को चेतना देती है और चैतन्य शरीर में विचार प्रदान करती है और विचारवान है, उसको तत्त्व की तरफ मदद करती है। ये परा प्रकृति भगवान की। अपरा। व्यवहार की दृष्टि से देखा जाए तो पांच भूत, मन, बुद्धि और अहंकार ये जो है, जड़ प्रकृति है, बांधने वाली है और जो है भगवान की परा प्रकृति जो है, जिससे संपूर्ण जगत धारण किया जा रहा है, जीव रूपा प्रकृति वह जो है, वह प्रकृति योग की दृष्टि से देखा जाए तो चिदावली भी है। चित्त शक्ति, वो चित्त शक्ति चैतन्य की सत्ता से चैतन्य की सत्ता में रहती है। जैसे पानी के बल से ही सेवाल रहती है, जितनी पानी को ढकती है, ऐसे ही वो परा प्रकृति पानी, पानी स्वरूप चैतन्य का तत्व स्वरूप चैतन्य का सहारा लेकर, यह जड़ प्रकृति को चेतना देती है। वो चित्त शक्ति न हो तो ये तुम्हारा अष्टधा जो शरीर है, यह जड़ प्रकृति का उसको चेतना नहीं मिलती। एक होती-- एक है जड़ प्रकृति, दूसरी होती है जीव रूपा चेतन प्रकृति। तो जड़ प्रकृति में अपना सामर्थ्य नहीं, लेकिन भगवान की जो चेतन प्रकृति है, वो उसको सत्ता स्फूर्ति देती है। और चेतन प्रकृति और भगवान में ऐसा, ऐसा अभेदत्व है जैसा दूध और दूध की सफेदी में। फल और फल की रस में। सांप और उसके टेढ़े मेढ़े चाल में। आपस में अभिन्न है। जैसे पुरुष और पुरुष की शक्ति। भाई इधर आओ, तुम ये काम कर लोगे? हाँ बाबा जी, कितने पैसे लोगे? बोले, बाबा जी, हम पंद्रह रुपये। अच्छा तो पंद्रह रुपये तो तुम्हारा रोज का और पाँच रुपये तुम्हारे में जो काम करने की शक्ति उसका दे रहे हैं। बोले, शक्ति हमारे में और हम, हम और हमारी शक्ति एक है। जैसे पुरुष और पुरुष की शक्ति अभिन्न है, ऐसे ही परब्रह्म परमात्मा और परमात्मा की... जीव रूपा जो प्रकृति है, परा प्रकृति वो अभिन्न है। तो परमात्मा और परमात्मा की शक्ति अभिन्न है, ऐसे तुम और तुम्हारी शक्ति भी अभिन्न है। जय जय! जय जय। 


जैसे परमात्मा की जड़ प्रकृति और परमात्मा उससे अलग है, ऐसे ही तुम्हारी जड़ प्रकृति और तुम उससे अलग हो। तुम अगर ये होते तो बाल काट काट के कितने फेंक दिए तो तुम फेंक जाते। नख काट काट के कितने बहा दिए, तुम बह जाते और दिन रात न जाने कितना कितना बहता है। नाक से बहता है, कान से बहता है, मुंह से बहता है, न जाने क्या क्या बहता है। बाथरूम में वो सब रोज बदलता रहता है।...मैंने बताया था ना कि पंद्रह मिनट, आप पंद्रह मिनट से ज्यादा नहीं जी सकते। नाक चालू हो, श्वासोश्वास लेते रहें, लेकिन शरीर को डामर का लेप कर दे, रोमकूप भर दे, बहाव बंद हो जाएगा। बहाव बंद हो जाएगा तो आप नहीं जी सकते। फिर पता चलता है कि रोमकूप की कोई कीमत है, अभी कोई कीमत नहीं। ऐसे ही जो चीज नहीं है, उसके तरफ मन भागता है और जो है मौजूद उसकी कोई परवाह नहीं। तो मन हमेशा अभाव को खोजता है, अभाव में जीता है। इसीलिए भगत लोग भी जप करेंगे ना! राम हरे राम, हरे राम, हरे राम, लेकिन वहां टिकेगा नहीं। फिर धुन को चेंज करना पड़ता है। जय जय! धुन चेंज हुई, फिर कीर्तन के ताल को चेंज करना पड़ता है। ताल चेंज हुआ, फिर, फिर रिदम को चेंज करना पड़ता है। फिर और कुछ चेंज करना पड़ता है, फिर बोलना पड़ता है, फिर बोलने को चेंज करना पड़ता है। 


मन को यदि अनुकूल रखना है तो चेंजिंग चाहिए, बदलाव चाहिए और बदल होती है प्रकृति में। इस बदल को जानने वाला तत्व मैं हूं, ऐसा जान लें, तो भी निहाल हो जाए। कितना आसान है, कितना सरल है! कभी कभी संसार के सुख भोगकर आदमी ईश्वर के तरफ चलता है। थोड़ा विवेक उठता है तो न संसार अच्छा लगता है, न ईश्वर का स्वाद आता है। चित्त बड़ा विक्षिप्त होता है, बड़ा उदास होता है। जैसे गहरी कोई अशांति छा गई, विक्षेप छा गया। कुछ ऐसे पढ़े लिखे लोग पूछते हैं कि ये कोई अगले जन्म का कर्म होगा। किसी को तो बड़ी खुशी खुशी रहती है और हमारे पास सब कुछ होते हुए भी आनंद नहीं, खुशी नहीं। अगले जन्म का कर्म हो या न हो, लेकिन इस जन्म का भी जितना जितना हमने भीतर से जड़ चीजों को थामने का इरादा पक्का किया है, जड़ चीजों में जितनी जितनी हमारी पकड़ होती है, उतना उतना हमारा चित्त जड़ी भाव को प्राप्त हो जाता है। इससे छूटने का उपाय है कि जिनके पास, जो नंगे हैं, भूखे हैं, सबको तो तुम दे नहीं सकते, लेकिन जितने को तुम दे सको, उतने अभावग्रस्त जो लोग हैं, जिन चीजों से उन गरीब दीन दुखियों पर तुम अपने आत्म भाव करके उनकी सेवा करो, चित्त प्रसन्न होने लग जाएगा। जय जय! 


हम संत हैं। असंत के नाते हम संत हैं। दुर्जन के कारण हम सज्जन दिखते हैं। निर्धन के कारण हम धनवान दिखेंगे। अनपढ़ के कारण हम पढ़े हुए दिखेंगे। उनके पास नहीं है तब हम सेठ दिखते हैं तो सेठ हम हुए तो उनकी कृपा से हुए हैं। अभावग्रस्त हैं, इसलिए हमारे पास है। जिनके पास नहीं है, उनके कारण हमारे पास जो है, उसका सुख, उसका कुछ विशेष दिख रहा है। तो ऐसे लोगों को अपना स्वरूप समझकर नश्वर चीजें हैं, छोड़ के तो जाना ही है। उनका यदि सत् उपयोग करने लग जाएं तो चित्त की जो पकड़ें हैं, ग्रंथियां हैं, वो खुलने लग जाएगी। तुम्हारे पास धन है तो धन, विद्या है तो विद्या, बल है तो बल, अकल है तो अकल। जो चीज है वो परोपकार में लगाओ और परोपकार में लगाओ तो अष्टधा प्रकृति और जीव रूपा प्रकृति, प्रकृति में हो रहा है। मैं न करता हूँ, न कराता हूँ, न लेता हूँ, न देता हूँ। हरि ओम् तत्सत् और सब गपशप, कर्ता वर्ता सब गप शप। ऐसा भाव करो तो भी तत्वज्ञान हो सकता है। ये कर्म का मार्ग हुआ। 


भक्ति करो, भक्ति का रास्ता लो, योग का रास्ता लो, ज्ञान तत्वज्ञान का रास्ता लो। लेकिन ये प्रकृति, जड़ प्रकृति के साथ जो तादात्म्य है, वो तादात्म्य विच्छेद हो जाए तो तुम्हारे जैसा आनंद स्वरूप और विश्व में कोई नहीं। अरे, तुम तो भगवान को आनंदित कर सकते हो। ईश्वर को आनंद देने की योग्यता तुम्हारे में है और तुम जरा जरा सुख के लिए यार घूमते हो बाजारों में कि ए फिल्म तू सुख दे, सकूरू फूटेलू सुख आपसे बेचारी। ए आइसक्रीम तू सुख दे, हे टीवी तू सुख दे, हे वीडियो तू सुख दे, हे कैमरा तू सुख दे। ये सब क्षण भर के लिए हाश्श्श हो जाएगा। हाऽऽ फाइन रेडी, ओके! ऐ फोटो सरस आयो, पर केटली वार, मजा केटली वार टक्के। ये सब आने जाने वाला संयोग जन्य सुख है। इस सुख से तुम्हारा काम नहीं चलेगा, हाँ। इस सुख से तृप्ति नहीं होगी। इस सुख में कोई सार नहीं। कभी कभी तो पुण्य करते समय अहंकार हो जाता है। जो कर्म करने से अहंकार जड़ीभूत हो जाए, अहंकार घन होता है, वो पुण्य कर्म भी अशांति दे देता है और कभी कभी तो पाप कर्म से भी शांति आने लगती है। हेतु पाप कर्म नहीं होता। अपराध होना, गिर जाना अपराध नहीं है, गिर जाना प्रमाद है और गिरकर न उठना अपराध है। फिर से समझ लें, गिर जाना अपराध नहीं है, प्रमाद है, नासमझी है, गलती है। गिर जाना प्रमाद है, लेकिन गिरकर न उठना, ये अपराध है। चित्त विक्षिप्त हो गया। ऐसा गलती हो गया, ये हो गया। कभी कभी गिरावट भी तुम्हें ईश्वर की कृपा से किनारा दे देती है।... मन में भर गया कि मैं कुछ जानता हूं, मेरे पास कुछ है। मेरा मकान बढ़िया है, मेरी इज्जत बढ़िया है, मेरा रुपया बड़ा है, मेरी फैक्ट्री बड़ी है, मेरा दुकान बड़ा है, मेरा दोस्त बड़ा है, मेरी औरत बढ़िया है, मेरा पति बढ़िया है। ऐसे इन संयोग जन्य सुख में शायद तुम्हारा अहंकार कहीं उलझ गया है। उस उलझे हुए अहंकार को भगवान की दया से कभी कभी तुम संयमी है, मैं ब्रह्मचारी हूं, मैं त्यागी हूं, मैं अमुक हूं। इससे भी कभी कभी पकड़ आ जाती है। वेदांत को जानता हूं तो कभी कभी ये चीजें भी तुम्हें वास्तविक शांति और आनंद से दूर कर देती हैं। श्री राम! श्री राम। 


आदमी खड़ा था, नदी किनारे इधर उधर देखा और रेतीले तट पर खड़ा था। रेती बही और गिर पड़ा, नदी में गिर पड़ा। इतनी देर तो चिंता कर रहा था, उस पार कैसे जाऊं? डूब जाऊंगा, डूब जाऊंगा और गिर पड़ा। फड़-फड़ हुआ थोड़ा, बहाव ने उस किनारे लगा दिया। वाह रे वाह! जिससे डरता था, अकड़े खड़ा था, चिंतित खड़ा था। बहाव ने उस किनारे लगा दिया। तो यह हुआ ईश्वर की अहेतु की कृपा, कृपासरिता का स्वभाव। ऐसे ईश्वर का कभी स्वाभाविक कृपा, महात्मा की स्वाभाविक कृपा होती है, आदमी उस किनारे आ जाता है। तो कभी कभी अपराध होने पर भी अहं टूट जाता है और अहं टूटा तो आदमी इस किनारे आ जाता है। ध्यान देना, कभी कभी हम अपने को सज्जन, सुखी, धनवान, अमुक अमुक मानते हैं तो भीतर से बाहर खम्म हो जाते हैं, ईश्वर से दूर हो जाते हैं। सहजता, सरलता, स्वाभाविकता से तो ऐसी कोई ऐसी चोट लगती है, ऐसा कोई अपराध लगता है कि अपने में जो सज्जनता थी, जो सेठ पना था, जो विशेष पना था, वह बह गया। बह गया तो उस किनारे हम लग जाते हैं। 


मैंने सुनाया था ना सुबह रामानुजाचार्य कहते हैं कि ईश्वर के उपयुक्त जो भी शरीर है, वे सब मनुष्य हैं। फिर जटायु हो, गीदड़ हो, जटायु तो था, कागभुषंड हो अथवा तो गरुड़ हो। कोयल कुहू कुहू करके अगर परमात्मा को पुकारती है तो वह भी भगवत भजन के भगवान के अधिकारी हैं और मनुष्य राम राम राम राम राम राम करते हुए गंगा किनारे और लोगों के अंगूठियां हाथ वाले लोगों के लोटे चुराता है, मालाएं चुराता है, ऐसे लोग भी हैं। गंगा के किनारे राम राम जपते, माला घुमाते, तीन तीन घंटे और कौन आया, कौन सुंदर है, कौन सुंदर है, वो देखने को लोग खड़े होते हैं। गंगे माता की जय करते जाते हैं। यात्रियों से बातचीत करने के लिए गंगा माई की जय कर रहे हैं। जय तो है, लेकिन हेतु शुद्ध नहीं। तो तुम्हारा इरादा यदि शुद्ध है तो कोई गलती हो गई तो उसका इतना पाप नहीं। इतना खिन्नता होने की जरूरत नहीं, इतना दुख नहीं होता। अकीदा शुद्ध फिर कोई अपराध हो गया तो उससे चिंतित होने की जरूरत नहीं। अकीदा मलिन है और आदमी बढ़िया काम करता है तो उसका भी कोई ज्यादा लाभ नहीं होता। तो हम अपनी नियत को न बिगाड़े और नियत बिगाड़ते हैं सुखी होने के लिए। जय जय! सुखी होने के लिए नियत बिगाड़ते हैं हम लोग। और नियत बिगाड़ने से संसार के सब सुख मिल नहीं जाते और मिल भी गए तब भी वो लोग सुखी नहीं होते हैं। तो खामखां अपनी नियत बिगाड़ के बेइज्जती करना, भगवान के आगे अंतर्यामी के आगे बेइज्जती कराना अपनी। नियत बिगाड़ने का कारण यह होता है कि इंद्रियां शरीर संसार दिखाती हैं। मन संसार की सूचनाएं केंद्रित करता है, एकत्रित करता है, बुद्धि उसमें सहयोग देती है और अहंकार अपने में थोपता है। गीता तो तुमने भी पढ़ी होगी, लेकिन विश्लेषण करना पड़ेगा इस प्रकार। तभी भगवान कहते हैं कि अष्टधा जो प्रकृति है, जड़ प्रकृति है। इससे जो मेरी जीव भूता प्रकृति है, 'यदं धारयते जगत' उससे जगत धारण करता हूं। तो जैसे भगवान समष्टि का जगत धारण करते हैं, ऐसे ही तुम भी तो समष्टि का धारण करते हो, उसी शक्ति से। तो भगवान की शक्ति और तुम्हारी शक्ति एक है। भगवान की चेतना और तुम्हारी चेतना एक है। सत् चित्त आनंद जिसमें सत् चरित्रता हो, चेतन अभिमुख बुद्धि हो, वही आनंद स्वरूप परमात्मा की अभिव्यक्ति कर सकता है और वही मनुष्य है। अथवा ऐसी क्षमताें जिसमें छुपी हुई है, वह भी मनुष्य है। 


मनसा सीवति इति मनुष्य:। जैसे सुई कपड़े में प्रवेश करती है, पीछे पीछे धागा चलता है, कपड़ा सी लेती है। सुई। दो कपड़ों को जोड़ देती है। ऐसे ही जिसकी वृत्ति जगत, जीव और जगत अथवा संसार, जगत और जगदीश, इसके बीच की जो वृत्ति है, हमारी, वह ऐसी पैनी हो, ऐसी सूक्ष्म हो कि हमारा रहना, खाना, पीना, बोलना, चलना, हिलना डुल्ना यह सब ऐसा हो कि इस जीव ब्रह्म की एकता के लिए हो।... भगवान और भक्त की एकता के लिए हो तो हमारा सब व्यवहार भक्ति हो जाता है। मनसा सीवति इति मनुष्य: ।जो मन से सीये। आंखों ने तो व्यक्ति दिखाया, मन से तुमने संबंध मान लिया और मन से जैसा संबंध माना, ऐसा वो दिखेगा। आज तक मित्र था, दो घंटे पहले अड़ गए। अब उसके सब दुर्गुण दिखते हैं। क्यों? कि मन जिसके लिए द्वेष करता है, उसके दुर्गुण, दुर्गुण देखता है और मन जिसके लिए राग करता है, उसके सद्गुण देखता है और गुणमय सृष्टि है। गुण दोष का तो सारा जगत भरा है और राग से गुण दिखेंगे, द्वेष से अवगुण दिखेंगे। किसी से द्वेष है, फिर भी उसमें गुण दिख रहे हैं तो तुम्हारे द्वेष में कमी है। और किसी में राग है और उसके अवगुण दिख रहे हैं तो तुम्हारी प्रीति में कमजोरी है। अब तुम्हारी कहते तो तुम अपनी मान लेते हो। सच तो यह तुम्हारी मन बुद्धि की है, लेकिन तुम अपने को नहीं जानते तो मेरे को भी झूठ बोलना पड़ता है कि तुम्हारी, तुम्हारी, तुम्हारी! यह अष्टधा प्रकृति का स्वभाव है। मन में राग आया तो गुण देखे, द्वेष आया तो अवगुण देखे। राग तीव्र नहीं है तो गुण के साथ अवगुण भी दिखे। द्वेष तीव्र नहीं है तो अवगुण के साथ गुण भी दिखे। लेकिन ये सब दिखे और दिख दिखकर गायब हो गए, वो तत्व है। और वो तत्व जैसा परमात्मा का भिन्न है, ऐसा तुम्हारा भिन्न है। यही तो सत्संग है। ऐसे ही अष्टधा प्रकृति में जो कुछ हमारी पढ़ाई, लिखाई, समझ, दौड़, उपलब्धियां हैं, उससे जीवन का रस शुरू नहीं होता है। मानसिक उपलब्धियां, शारीरिक अनुकूलताएं, बौद्धिक चाहनाएं कुछ मिल जाती है, लेकिन उससे तृप्ति नहीं होती। अभाव के लिए मन और दौड़ता है। तो बाबाजी! सत्संग के सार रूप में हम अब क्या करें, जल्दी हमारा परम कल्याण हो जाए। भाई, जो दांत गिर गया है ना, उधर जीभ बार बार जाती है, उधर जाना छोड़ दो। जो गिर गया, जो नहीं है, वो नहीं है। जो है, उन दांतों से चबा चबा के खाओ। ऐसे ही जो चीजें नहीं हैं, उनकी इच्छा न करो। जो है उनका ठीक से सतोपयोग करो और वो चीजें जो है, उसका सतोपयोग तो करो। सतोपयोग क्या है कि अपने देह के विलास को सतोपयोग नहीं कहते। उसको परमार्थ में दूसरों के आंसू पोंछने में लगाओ, जितना कुछ तुम्हारी हिम्मत हो और कि उससे भी अधिक में अधिक रुपया पैसा, पढ़ाई लिखाई तो तुम्हारे पास कुछ नहीं। बढ़िया में बढ़िया परमात्मा तत्व है, उसका तुम सतोपयोग करो। उसके साथ बात करो, उसके साथ गुनगुनाओ, उसके साथ मुस्कुराओ, पागलों जैसी बड़बड़ाहट करो, लेकिन उसके साथ करो। एक तरीका यह भी है। दूसरा तरीका है कि जो नहीं है, यह नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं, नहीं कहते, कहते, जो नहीं कह रहा, वो मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ, मैं कौन हूँ? बस दम धमाक करो। ऐसे करते-करते खोज करोगे तो भी परमानंद अवस्था में डूबते जाओगे। तीसरा तरीका है कि श्वास ली खूब जोर से। और जितनी देर रोक सके, रोकी। फिर श्वास को धीरे धीरे छोड़ा। श्वास को छोड़ा, उसके साथ पांच भूतों का शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार ये सब मैं नहीं हूँ। अष्टधा प्रकृति है और भगवान उससे भिन्न है। उसके साक्षी है, द्रष्टा है। जैसे भगवान द्रष्टा है, ऐसे इनका सबका मैं द्रष्टा हूँ। फिर श्वास लिया, रोका, जप किया। जब छोड़ा तो अष्टधा प्रकृति की मान्यता अपने में जो घुस गए थे, वो छोड़ दी। युक्तियां तो कई हैं, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हमको जो सदा साथ में है, उसको पाने की तड़प नहीं। 


जितना हेत हराम में, उतना हरि से होय, 

कहै कबीर वा दास का फिर पला न पकड़े कोई।


 ये जो नश्वर चीजें हैं, उनमें जितनी प्रीति है, उससे आधी भी यदि राम के प्रति हो जाए तो आदमी निहाल हो जाए। मैंने बताया तो स्वल्प पुण्यवताम राजन विश्वासो नैव जायते। पुण्यों की जब कमी होती है तो आदमी का विश्वास खो जाता है। अनंत अनंत जन्मों के बाद एक मनुष्य जन्म मिलता है, जो पुण्य पाप मिश्रित होते हैं। अब अनंत अनंत संस्कार हैं। करोड़ों जन्म में तुम्हारे किए हुए सुकृत भी हैं और किए हुए दुष्कृत भी हैं। अब सुकृत और दुष्कृत जब दोनों सेम लेवल में आते हैं, अधिक सुकृत है तो ऊपर की योनियों में और अधिक दुष्कृत है तो नीचे तिर्यग, गधा, कुत्ता, भैंसा, पेड़ पौधा, कबूतर, चिड़िया आदि खिसकोला, छछूंदर, बिल्ली, कुत्ता आदि आदि योनि में जाता है। 


जब आदमी के पुण्य और पाप बिल्कुल ठीक ठीक समकक्ष होते हैं तो मनुष्य बनता है। व्यक्ति जीव के पुण्य पाप सम होते हैं तो अब उसको जैसा संयोग मिले, दुष्चरित्र वाला व्यक्ति मिले और जड़ चीजों के तरफ आकर्षण दिखाने वाला संयोग मिले। जैसे वैज्ञानिकों ने अंडा फूटते ही बतख दिखा दी, ऐसे ही हमारा जन्म में कोई बतख दिखा दे तो हमारा जीवन बतख की तरफ जाता है और कोई माँ दिखाने की बात कर दे तो माँ के तरफ चल पड़ता है। श्री राम! अब जन्म के वक्त तो तुमको किसी ने बतख दिखाई या माँ दिखाई, तुम्हें पता नहीं। चलो, लेकिन अभी तुम अपने मन को रोज सुबह माँ दिखाओ, बतख न दिखाओ। रोज सुबह अपने मन और बुद्धि को आत्मज्ञान की बातों से ही प्रसन्न करो। तो जैसा संग होगा, ऐसे अनंत, अनंत जन्मों के जो सात्विक संस्कार हैं, वो जग खड़े होंगे। तो एक हिस्से की बहुलता होगी तो दूसरे हिस्से में जो रस बट रहा था, नाश हो रहा था, वो रस सब इधर आ जाएगा। जैसे जमीन में गन्ना बोया है, मिर्च बोया है। गन्ना इतना घाटा बो दो... कि मिर्च को उगने का मौका ही न मिले। तो गन्ना एकदम दूर थोड़ा सा कर दो और मिर्च ज्यादा कर दो तो गन्ना को रस नहीं मिलेगा। ऐसे ही शुभ को इतना बढ़ा दो कि अशुभ को मौका न मिले।


ॐ गुरु ॐ 🙏


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