रविवार, 8 फ़रवरी 2026

ईश्वर का दर्शन भाग -1 | आश्रम संध्या सत्संग 30-01-2026 सुबह

 


ईश्वर का दर्शन | आश्रम संध्या सत्संग 30-01-2026 सुबह 

TIME STAMP INDEX    

0:01 सर्वं खल्विदं ब्रह्म और बाह्य माया की भूल

0:47 ज्ञान चक्षु से तत्व न देख पाना

1:06 सुख और ज्ञान का संबंध

1:55 ज्ञान के दो प्रकार

2:36 इंद्रियगत ज्ञान की सीमा

2:42 ठूंठ और साधु का भ्रम उदाहरण (कहानी)

3:27 बुद्धि के अनुसार संसार दर्शन

4:09 महापुरुष दर्शन का सही अर्थ

4:56 लौकिक ज्ञान और आत्मज्ञान का भेद

5:29 बदलने वाली अवस्थाएं और साक्षी आत्मा

6:36 देखने वाला कौन है प्रश्न

7:15 आत्मज्ञान का स्वरूप

7:38 आत्मा कोई आकृति नहीं

8:19 मैं और संस्कार का विवेचन

8:36 आत्मज्ञान बिना सब ज्ञान तुच्छ

9:15 कर्तापन और भोग का सिद्धांत

10:09 आत्मज्ञान से कर्म आरोप का अंत

10:49 अर्जुन और श्रीकृष्ण प्रसंग (कहानी)

11:19 देह और वस्त्र का उदाहरण

12:10 स्कूटर उदाहरण और देह भ्रांति (कहानी)

13:06 देह को मैं मानने की भूल

14:04 ध्यान का वास्तविक अर्थ

14:29 आत्मा सर्वव्यापक सत्ता

15:01 सूर्य किरण उदाहरण (कहानी)

15:49 चेतना और जीवों का ज्ञान

16:49 पशु धर्म और मनुष्य धर्म

17:38 मनुष्य की अपार शक्ति

18:15 संकल्प शक्ति और आत्मा

18:39 संसार अनित्य प्रयोग

19:39 जगत स्वप्न और आत्मा नित्य

20:14 विचार तरंग और साक्षी

21:02 विकार नियंत्रण का उपाय

22:03 देह से अलग होना ही ज्ञान

23:01 सब में ब्रह्म दर्शन

23:39 घड़ा आकाश उदाहरण (कहानी)

24:26 आत्मसत्ता एक होने का बोध

24:43 बाह्य देवताओं पर निर्भरता की भूल

25:07 कुछ न करना ही ईश्वर प्राप्ति

25:17 फकीर और तुर्क दुनिया प्रसंग (कहानी)

26:10 ईश्वर आत्मा ही है बोध

26:53 सुख की सहजता

27:02 उद्योग और ईश्वर दूरी

27:24 करने की आदत की उलझन

27:55 ईश्वर की निकटता

28:00 आकृति कल्पना की भूल

28:16 निष्फुर अवस्था का रहस्य

28:22 कुछ न करने का सिद्धांत

28:30 संसार स्वप्न पुनरुक्ति

28:52 ध्यान और समाधि की भ्रांति

29:08 प्रारब्ध और ज्ञान

इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:01 सर्वं खल्विदं ब्रह्म कहकर बताया कि जब सब जगह ब्रह्म ही है तो बाह्य नाम रूप और क्रियाओं को महत्व देना मूढ़ता है।

0:47 विमूढ़ लोग ज्ञान चक्षु न होने से अपने ही तत्व और स्वरूप को नहीं पहचान पाते।

1:06 बिना ज्ञान के न आनंद है न सुख क्योंकि सुख ज्ञान से ही प्रकट होता है।

1:55 ज्ञान दो प्रकार का बताया गया एक इंद्रियगत और दूसरा आत्मज्ञान।

2:36 इंद्रियों और मन से मिलने वाला ज्ञान संस्कारों पर आधारित होता है और शुद्ध नहीं होता।

2:42 अंधेरी रात में ठूंठ को साधु या चोर समझ लेने का उदाहरण देकर इंद्रियगत भ्रम समझाया (कहानी)।

3:27 जैसी बुद्धि होती है वैसा ही संसार दिखाई देता है।

4:09 महापुरुषों का दर्शन केवल आकृति देखने का नहीं बल्कि उनके ज्ञान को समझने का साधन है।

4:56 लौकिक ज्ञान तुच्छ है और आत्मा का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है।

5:29 इंद्रियां मन और बुद्धि बदलती रहती हैं लेकिन जो इन्हें देखता है वह आत्मा नहीं बदलती।

6:36 बुद्धि और मन के निर्णय बदलते हैं तो उन्हें देखने वाला कौन है यह प्रश्न उठाया गया।

7:15 अपनी खबर लेना ही वास्तविक ज्ञान और आत्मज्ञान है।

7:38 आत्मा कोई प्रकाशमान आकृति नहीं बल्कि स्वयं ज्ञान स्वरूप है।

8:19 मैं हिंदू मैं पंजाबी जैसे भाव मन के संस्कार हैं शुद्ध आत्मा उनसे परे है।

8:36 आत्मज्ञान बिना संसार का सारा ज्ञान दो कौड़ी का बताया गया।

9:15 जो कर्म करता है वही भोगता है आत्मा कर्ता नहीं है।

10:09 आत्मज्ञान होने पर देह इंद्रियों के कर्म का आरोप अपने ऊपर नहीं रहता।

10:49 अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ होते हुए भी आत्मतत्व न जानने से मोहग्रस्त था और ज्ञान से उसका मोह नष्ट हुआ (कहानी)।

11:19 जैसे वस्त्र हम नहीं हैं वैसे ही देह भी हम नहीं हैं।

12:10 स्कूटर के खराब होने को अपने से जोड़ना मूर्खता है वैसे ही देह की पीड़ा को मैं मानना अज्ञान है (कहानी)।

13:06 बचपन से देह को मैं मानने की शिक्षा से आत्मा भूल गई।

14:04 ध्यान का अर्थ भगवान को खुश करना नहीं बल्कि देह अभिमान कम करना है।

14:29 आत्मा परमात्मा सर्वत्र है और उसी की सत्ता से सब चलता है।

15:01 सूर्य किरण जैसे छोटे बड़े पात्रों में समान रूप से पड़ती हैं वैसे ही आत्मा सब में है (कहानी)।

15:49 पशु पक्षियों में भी देह पालन का ज्ञान है लेकिन आत्मज्ञान नहीं।

16:49 आहार निद्रा भय मैथुन पशुओं में भी है मनुष्य की विशेषता आत्मज्ञान है।

17:38 मनुष्य में अद्भुत आत्मशक्ति है जिससे वह ब्रह्म में स्थित हो सकता है।

18:15 संकल्प विकल्प आत्मा से उठते हैं और उसी में स्थिर करने से कल्याण होता है।

18:39 तीन महीने संसार की अनित्यता देखने का प्रयोग बताया गया।

19:39 जो नष्ट होता है वह मिथ्या है जो सदा रहता है वही आत्मा है।

20:14 विचार और विकार तरंगों की तरह आते जाते हैं आत्मा सदा साक्षी है।

21:02 क्रोध काम लोभ को देखने से वे नियंत्रण में आ जाते हैं।

22:03 देह से अपने को अलग मान लेना ही ज्ञानवान होना है।

23:01 जो सब में ब्रह्म देखता है वही परम विरागी है।

23:39 घड़ों में एक आकाश का उदाहरण देकर आत्मा की एकता समझाई गई (कहानी)।

24:26 बल्ब अलग अलग हैं पर बिजली एक है वैसे ही आत्मसत्ता एक है।

24:43 जब तक आत्मसहारा नहीं जगता तब तक बाह्य सहारों में भटकना पड़ता है।

25:07 कुछ न करना ही ईश्वर प्राप्ति बताया गया।

25:17 फकीर के तुर्क दुनिया प्रसंग से निर्भय अवस्था समझाई गई (कहानी)।

26:10 अपने आत्मा का नाम ही ईश्वर है यह बोध बताया गया।

26:53 सुखी होना अत्यंत आसान है फिर भी लोग परेशान रहते हैं।

27:02 जितना उद्योग ईश्वर पाने में करते हैं उतना ही उससे दूर जाते हैं।

27:24 करने की आदत के कारण माला ध्यान में उलझन रहती है।

27:55 ईश्वर एक रत्ती भर भी दूर नहीं है।

28:00 आकृति और चमत्कार की कल्पना को भूल बताया गया।

28:16 निष्फुर अवस्था ही अंदर का ईश्वर है।

28:22 कुछ न करने से ही सब कुछ मिलता है।

28:30 संसार स्वप्न है यह बार बार स्मरण करने को कहा गया।

28:52 ध्यान और समाधि की जिद को प्रारब्ध से जोड़ा गया।

29:08 ज्ञान दुख सुख सब प्रारब्ध से हैं लेकिन आत्मज्ञान से बंधन कट जाता है।


 Manual Transcription

सर्वं खल्विदं ब्रह्म। जब सब जगह सचमुच ब्रह्म ही भरपूर है, तो फिर बाह्य नाम और रूपों को, बाह्य क्रिया और कलापों को इम्पोर्टेंस देना, बाह्य परिस्थितियों को महत्वपूर्ण समझकर आत्मा की महत्ता का विस्मरण करना। इसको शास्त्रीय भाषा में मूढ़ता कही। गीताकार तो कहते हैं ‘विमूढ’ उपसर्ग लगाकर। 


विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ॥15.10॥


विमूढ़ लोग उस अपने तत्व को, अपने स्वरूप को नहीं जान सकते। 

पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष:। एक ज्ञान सत्ता ही सबको देखती है। बिना ज्ञान के आनंद नहीं है, बिना ज्ञान के सुख नहीं मिलता। मिठाई और जिबान का मुलाकात हो जाए, लेकिन जब तक ज्ञान नहीं होता मिठास का, तब सुख नहीं होता। संत और हम लोग मिल जाएं, लेकिन ये संत हैं, ऐसा ज्ञान नहीं है तो फिर उनकी मुलाकात या उनके दर्शन का सुख नहीं मिलता। ऐसे परमात्मा और हम मिले हुए हैं, लेकिन ज्ञान नहीं है कि ये आत्मा है, इसीलिए सुख नहीं होता। जय जय! 


जुबान और मिठाई की मुलाकात होने पर आप नींद में हैं, आपको ज्ञान नहीं है तो मिठाई का ज्ञान नहीं है तो सुख नहीं होता। तो सुख ज्ञान में है, नासमझी में सुख नहीं है। सुख ज्ञान सत्ता में है। 


तो ज्ञान दो प्रकार का हुआ। वो एक होती है इंद्रियगत समझ। आंखों ने ये वृक्ष दिखाया, कानों ने कोई शब्द सुना दिया। मन से कोई हमने कल्पना कर ली, मनोराज्य देख लिया। यह है करणों के द्वारा करणों के अंतर्गत ज्ञान। ‘करण’ माने ये जिनसे देखा जाए। साधनों को संस्कृत भाषा में करण बोलते हैं। करणों के द्वारा जो ज्ञान होता है, वो शुद्ध ज्ञान नहीं होता है। संस्कार जैसे होते हैं, ऐसा ज्ञान होता है। जैसे है तो ठूंठा और अंधेरी रात में हम पसार हुए। लगा कि हा! हा! हा! हम लोग तो संसारी हैं। वाह! साधु बेचारा खड़ा-खड़ा तप कर रहा है। हमने अगरबत्ती संभाली, फूलमाला संभाली। चलो साधु बाबा को अर्पण करेंगे। है तो झूठ, अंधेरे में और हमारे अंदर सात्विक बुद्धि तो उसमें झूठ में साधु के दर्शन होंगे। है तो झूठ कि अंदर का म्हारो बेटो ऊभो ऊभो छे, कहीं पिस्तौल विस्तौल हशे तो धड़पड़ उभो जोईए। हम थर-थर-थर-थर, था-था-था, थर-थर-थर-थर होने लगेंगे क्योंकि हमारी आंखों ने तो दिखाया कुछ। और फिर इंद्रियगत ज्ञान है। जिसमें अगर चोर की बुद्धि हुई तो चोर दिखेगा। साधु की बुद्धि हुई तो साधु दिखेगा। ठीक है ना? ऐसे ही जगत में इंद्रियों से हमने जगत देखा, लेकिन हमारी उस जगत के विषयों के प्रति, जगत की चीजों के प्रति जैसी बुद्धि होगी, ऐसा दिखेगा। हमारे आंखें तो दिखाएगी कि दाढ़ी है, ये है महाराज। हमारी श्रद्धा की आंख है, पवित्र बुद्धि है। हमारे समझने की योग्यता है तो उनके ज्ञान को, उनके दर्शन को, उनके विचारों को समझकर हम ईश्वर से मिलने के काबिल हो जाएंगे। परमात्मा से मुलाकात करने का साधन है, महापुरुषों का दर्शन। अगर उसमें हमारे ज्ञान में केवल आकृति का है तो जेवा मानस आपणे छे तेवा संत छे, एमा शु जोवानु होय, बे हाथ हशे, पग हशे, मोडू हशे, आंख हशे, बीजू शु हशे? कपड़ा पहनेला छे, आपने पैंट पहनी है, उन्होंने धोती पहनी होगी। आपने शर्ट पहनी है, उन्होंने पैंटी पहनी होगी। बीजू शु हशे? आपने दाढ़ी रोज करी छे ते नी करता, बीजू शुं? तो आंख थी तो ये देखाणा। तो आंख का जो दृश्य है, उस दृश्य में बुद्धिवृत्ति है और बुद्धिवृत्ति में जैसी समझ है, ऐसा वो देखेंगे। तो उनका अपना मान्यता का ज्ञान है। ये ज्ञान, ये लौकिक ज्ञान है, तुच्छ ज्ञान है। इन सबका जिससे ज्ञान होता है, वो आत्मा है। इस आत्मा का ज्ञान को सच्चा ज्ञान बोलते हैं। जय राम जी की। हम प्रचार करते हैं, मिलकर खाते हैं, हम किसी का लड़का गोद ले लेते हैं, बड़ा करते हैं, ये करते हैं। ये सब ज्ञान जो है, विषयों का बुद्धि अंतर्गत, मन के अंतर्गत, कल्पनाओं के अंतर्गत तुच्छ ज्ञान है। इस ज्ञान की अवस्थाएं, इंद्रियों की अवस्थाएं, मन की अवस्था, बुद्धि की अवस्था जो सब बदलती है, उसको जो देखने वाला है, वो नहीं बदलता है। उसको आत्मा बोलते हैं, वो परमात्मा अपने साथ है। उसी की सत्ता से हृदय के धपकारे चलते हैं, उसी की सत्ता से आंख देखती है, उसकी सत्ता से बुद्धि सोचती है, निर्णय करती है और बुद्धि का निर्णय बदलता है। उसको भी कोई देख रहा है, वो नहीं बदलता है। मन का निर्णय बदला, उसको भी किसी ने देखा। शरीर छोटा था, बड़ा हुआ, इसको भी किसी ने देखा।... कुंवारे थे, उस वक्त भी अपनी पोजीशन क्या थी, वो देखा। शादी के दिन क्या था, वो भी देखा। शादी हुई, अमीरी हुई, गरीबी हुई, ये बदलता है। आंखों की रोशनी बढ़ी और कम हुई। जवानी में आंखें बड़ी रोशनी की तो बहुत तेज देती है। अब बुढ़ापे में फिर ढलान को जाता है तो आंख, कान ये सब इंद्रियों से का ज्ञान जो इंद्रियां स्वयं बलवान होती है, कमजोर भी होती है। तो इन सबको जो देख रहा है, वो एक रस है। वही वास्तविक में हम हैं। ये ज्ञान अपने को नहीं हुआ तो इंद्रियां जो करती है तो अपने को समझते हैं, मैंने किया। आंख ने देखा तो बोलते हैं, मैंने देखा। कान सुनता है कि मैं सुन रहा हूँ। नाक ने सूंघा के मैं सूँघा, मन संकल्प विकल्प पड़ता है कि मेरे, मेरे विचार चलते हैं। बुद्धि ने निर्णय किया कि मेरा निर्णय है, पण बुद्धि ना निर्णय बदला है, तू कौन है भाई? बुद्धि के निर्णय को देखने वाला तू कौन? बीमारी और तंदुरुस्ती को देखने वाला तू कौन? तो अपनी खबर सुन ले जरा। ओम, ओम! 


अपनी जो खबर है, वो वास्तविक ज्ञान है। वो सच्चा ज्ञान है। उसको आत्मज्ञान कहते हैं। आत्मा माने अपना। आत्मा का मतलब ऐसा नहीं। कोई ऐसा कोई प्रकाश करने वाला, कोई ऐसा तणखला जैसा कोई गोल होगा, कोई ऐसा वैसा होगा, डिब्बी जैसा चमकता हुआ हृदय में अमुक जगह पड़ा होगा, इसीलिए उसका नाम स्वयं प्रकाश रखा। नहीं! आंख ठीक देखती है कि नहीं देखती है। ये नीम का झाड़ है कि नहीं? इसको देखना है तो आंख चाहिए, प्रकाश चाहिए और मन चाहिए। आंख को देखना है तो प्रकाश की जरूरत नहीं है, मन चाहिए, खाली मन होगा तो आंख दिख जाएगी कि आंख है कि नहीं। अपना मन ही समझ जाए, मुझे प्रकाश नहीं, जरूर नहीं। और मन को देखना है तो न प्रकाश चाहिए, न नीमड़ा चाहिए। मन को देखना है तो कौन चाहिए? मैं चाहिए। वो मैं जो है, वो ज्ञान स्वरूप आत्मा है। फिर मैं हिंदू तो हिंदू तो उसके मन के संस्कार। मैं पंजाबी, ये संस्कार, मैं मनुष्य, ये संस्कार जो मैं है, वो शुद्ध स्वरूप आत्मा का है। उस ‘मैं’ का ज्ञान नहीं है तो जगत का सब ज्ञान इकट्ठा कर, उसकी कोई कीमत नहीं। दो कोड़ी का पेट भरने का और उस मैं जहां से उठती है, उसमें अगर स्थिति हो जाए, उस स्वरूप का बोध हो जाता है। अभी साक्षात्कार। उस ‘मैं’ स्वरूप आत्मा का ज्ञान हो जाए तो इंद्रियों से अच्छा भी होता है। ये भी हुआ, वो भी हुआ, पुण्य हो गया, पाप हो गया तो फिर देखता कि ये तो इंद्रियों से हुआ, मेरा क्या? और कितना कोई आदमी ने खून कर दिया तो तुम्हारे को चिंता होती है कि सजा मिल जाएगी। और किसी आदमी ने दान का दान पुण्य कर दिया तो तुम्हारे मन में तो ये नहीं होता कि मैंने दान किया। क्योंकि जो दान करेगा, वो भोगेगा। जो पाप करेगा, वो भोगेगा। तो जो पुण्य करेगा, वो सुख भोगेगा। पाप करेगा, वो दुख भोगेगा। तुमने तो किया नहीं, जो करेगा वो भोगेगा। और क्या रे! कोई कोई गजू कापताशे शहर में, कोई कोई आंखें मारताशे, कोई मछली खाताशे, कोई मुर्गा के बकरू कापताशे। पण तुमने चिंता छे नहीं कोई नहीं। अपने पाप किया है, ऐसा कुछ लागे शे, नहीं लगता। कोई मंदिर में जाता है, कोई संत ना दर्शन करके अंदर मंदिर खोलाशे। कोई दान-पुण्य करता है, कोई गरीबों ने साधु-संतों की सेवा करता है। तमने लागेशे सेवा करी राखे, पग दबाई राखे। बापजी नाके सेवा करी राखे नहीं। क्यों? कि वो लोग कर रहे हैं तो उनको आप अपने से अलग मानते हैं ना। तो उनका कर्म आपको नहीं लग रहा है। ऐसे ही आत्मा का ज्ञान हो जाएगा तो शरीर का, इंद्रियों का, मन का किया हुआ आपको आरोप नहीं होगा। जय जय! 


ब्रह्म स्नान, महा स्नान। सुबह खाली दो बार किया स्नान। बुद्धि, प्राण ये सब साधन हैं। म्हारो पग, कोई केतू पग, म्हारो पग तो तमे पग नी ना, पहला ये ठाकुर जी, गोविंद जी, कन्हैया और कन्हैया पोते आ जाए, ठाकुर जी आ जाए, अल्लाह, अल्लाह का बाप आ जाए तो भी जब तक अपने आत्मा का भान ना था, तब तक रोना चालू रहता। अर्जुन था ना। श्रीकृष्ण साथ थे तथा अर्जुन रोता था। श्रीकृष्ण ने विराट रूप का दर्शन कराया तो अर्जुन भयभीत हुआ। कुटुंबियों को देखकर मोह हुआ, रो रहा था। भोगा श्रीकृष्ण तो थे, लेकिन श्रीकृष्ण जो आत्मरूप से अपने हृदय में है, उसको नहीं जाना अर्जुन ने। जब अर्जुन को उपदेश मिला, अर्जुन ने विचार किया। श्रीकृष्णतत्व को जाना तो अर्जुन बोलता है, नष्टो मोह: -मेरा मोह नष्ट हो गया। तो जैसे ये मेरा पैर है, तो मैं पैर नहीं। जांघ है, साथल है, ‘मैं’ नहीं, ये नहीं तो ये भी ‘मैं’ नहीं। कोई कह दो, मैं साथल छूं, पग छूं, मैं माथू छूं। कोई बोले, ऐ माथू आओ! जो मजा आवे, ऐ बुशर्ट आमा आओ!, के आ तो म्हारा कपड़ा है। ऐ पैंट इधर आओ, ऐ टोपी! खोटू लागे। ऐसे ही जैसे पैंट, कोट, बुशर्ट, शर्ट आप नहीं हैं, ऐसे हाथ पैर, रक्त, नस-नाड़ियां ये आप नहीं हैं। ऐसा शरीर तो तुमको कितनी बार मिला, कितनी बार छूट गया। अब दुख पड़ता है, प्रतिकूलता आती है, शरीर को दुख ही दुख ज्यादा हो जाता है।... कोई गलती होती है, कुछ होता है तो दोष होते हैं, ये साधन में। अब स्कूटर में किसी में, थोड़ी खराबी हो तो बोलें कि हाय रे हाय! मैं बिगड़ी गया। स्कूटर का व्हील बिगड़ा हो, स्कूटर की किक बिगड़ी हो, स्कूटर का गियरबॉक्स बिगड़ा हो, स्कूटर का लाइनर बिगड़ा हो, स्कूटर का ब्रेक बिगड़ा हो तो हाय! मैं बिगड़ गया। नहीं, ये स्कूटर का बिगड़ा है। गियरबॉक्स बिगड़ गया तो स्पीड कम कर देगा। गियर टूट गया, गियर का चक्कर तो अलग बात है। एक्सीडेंट होकर स्कूटर एकदम नाकामयाब हो गया, वो अलग बात है। जैसे स्कूटर को हुआ तो ‘मेरे को’ -ऐसा मानना बेवकूफी है। ऐसे इस शरीर को होता है और हम समझते हैं मेरे को हुआ। क्यों? कि अपने को शुद्ध ज्ञान है नहीं। उल्टा ज्ञान घुस गया बचपन से। बच्चा हुआ तो मां बोलते हैं, जो तू ना आयो नहीं, मैं इसलिए आया जो तू मोटो हो, इसलिए शरीर को ही हम मैं मानने लग गए। तो वो जो शरीर को, मन को, इंद्रिय को, बुद्धि को देखने वाला जो शुद्ध चेतना आत्मा है, वो जो असली हम हैं, वो उसको हम भूल गए और नकली थोथे खोखे को मैं मानने लगे। नकली थोथे खोखे को ‘मैं’ माना, उसी लिए फिर सारी जिंदगी मजूरी कर करके आं करूं तो सुखी तो आं करूं तो सुखी तो आं। खोखले बाड़ी मेलवाना पेला ने सड़ा बिना बीजो आरो नथी। इसको तो एक दिन जला देना है। जिसको जला देना है, उसी के खाने-पीने की चिंता, उसी को सुखी करने की चिंता। और जहां से सुख प्रकट होता है, आत्मा उसका पता नहीं। इसलिए ध्यान करने से कोई भगवान को खुश करना है, ऐसी बात नहीं है। भगवान वहां बैठा अपने ध्यान करेंगे तो राजी हो जाएगा। नहीं, हम जो इसको मैं मानते और संसार को सच्चा मानकर हमारा मन भागता है, उसकी भाग कम होगी तो असली ‘मैं’ जो है उसका प्रकट होने का है। आत्मा तो अपना भगवान तो साथ में है। आत्मा परमात्मा। परमात्मा न हो, आत्मा न हो तो हृदय ना धककर चले? और वो आत्मा ऐसा है, सूक्ष्म अति सूक्ष्म है। कीड़ी, मकोड़े, मक्खी में भी उस आत्मा की सत्ता है। जैसे सूर्य के किरण बड़े देगड़े में भी पड़ते हैं और छोटे से कटोरे में भी पड़ेंगे। जरा सी वाटकी हो, कटोरी उसमें भी सूर्य के किरण पड़ेंगे। उससे भी कुछ बारीक चीज है, उस पर भी सूर्य का किरण तो आ गिरता है। तिनका हो तो तिनके पर भी सूर्य का किरण लगेगा, हाथी पर भी पड़ेगा। ऐसे ही सूर्य के किरणों से भी अति सूक्ष्म परमात्मा की चेतना है, जो कीड़ी में, मकोड़े में, घोड़े में, गधे में, हाथी में। मच्छरों को तुम सिखाने जाते हो कि इधर मत बैठो, ये बाबा जी की दाढ़ी है। इधर मच्छर कभी नहीं बैठते। उनमें इतना ज्ञान है कि गाल पर बैठेंगे, ललाट पर बैठेंगे, हाथ पर बैठेंगे, चरणों पर बैठेंगे। यहां माल मिलता है, इधर कुछ नहीं। इतना ज्ञान उनमें भी है, है कि नहीं? मच्छर तुम्हारे बाल ऊपर बैठा, नहीं बैठे। इतना ज्ञान है, ना माथे जो तुम्हारी गाल पर नहीं आती, वो इधर ही घूमती है। उसका अपना रेंज है। उतना समझते कि मेरे इधर ही घूमने जैसा, इधर जाऊंगी तो खतरा है। इतना ज्ञान उनमें भी है।  चेतन परमात्मा ज्ञान स्वरूप है। उनकी अपनी अपनी इंद्रियों में यथायोग्य प्रकाश करता है। इसीलिए भारत का ऋषि कहता है कि 

जले विष्णु: स्थले विष्णुर्विष्णु: पर्वतमस्तके । 

ज्वालामालाकुले विष्णु: सर्वं विष्णुमयं जगत्॥


 जल में देखो, जल जल जंतुओं में वो परमात्मा चेतना है। उनको भान है, केचड़ा है। कंकड़ फेंको तो आकर मछलियां भाग जाएगी और थोड़ा सा खाद्य पदार्थ फेंको, तुरंत जंप करके ले लेगी। इतना तो अकल उनमें भी है, लेकिन यह शरीर को पालने की अकल उनमें है। यह व्यावहारिक ज्ञान उनमें है। देह को पोषणे का ज्ञान है। देह के परे गुणों से परे, जिसकी सत्ता से ज्ञान। का मुख्य स्रोत जहां से आता है, उस आत्मा का भान नहीं। 


आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्। 


खाना, पीना, दुख आए तो भयभीत हो जाना और सुख आए तो सुखी हो जाना, मैथुन करके सुख भोगना। दुख आए तो दुखी हो जाना, भय आए तो भय भयभीत हो जाना। खुराक खाना अपने अपने योनि के अनुसार, यह तो पशुओं में भी है, मनुष्यों में भी इतनी अकल है। इतना ही अगर है तो कोई मनुष्य मनुष्य कहलाने निकला। 

धर्मो हि एकधिको नराणाम्।


धर्म ही एक मनुष्य में अधिक बात है। इसलिए मनुष्य सब पशु प्राणियों से, हाथी-घोड़ों से, गधा, चूहा, बिला, कुत्ता से, गंधर्वों से, यक्षों से भी मनुष्य श्रेष्ठ माना गया है। मनुष्य के पास बुद्धि अद्भुत है और चाहे तो अपनी उस बुद्धि को परब्रह्म परमात्मा में स्थिर कर दे, जन्म मरण से मुक्त हो जाए। मनुष्य में इतनी शक्ति भरी है, इतनी शक्ति भरी है कि उसकी शक्ति का पार पाना असंभव है। इतना शक्ति मनुष्य में छुपी हुई है कि वह संकल्प करता है, फिर विकल्प कर देता है। एक एक तरफ का निर्णय करके फिर निर्णय बदल लेता है। विकल्पों में अपनी शक्ति को क्षीण कर देता है। ओम, ओम, ओम, ओम, ओम!... अद्भुत संकल्प सामर्थ्य है, आत्मशक्ति है। आत्मशक्ति सीधा मन उससे सीधी हो लेता है। जैसे सरोवर का पानी तरंगित हुआ तो तरंग जो है सरोवर से सीधी उठी है। ऐसे अपना जो विचार उठते हैं, संकल्प विकल्प वो आत्मा से उठते हैं। तो उस आत्मा में अगर उसको मोड़ दिया जाए तो कल्याण हो जाए। तीन महीना प्रयोग करेंगे, जो दिखता है एक दिन ये झाड़ दिखेगा, एक दिन नहीं रहेगा। ये दिखेगा, एक दिन नहीं रहेगा। फलाना भाई एक दिन नहीं रहेगा। ये सब मकान भी एक दिन गिरेगा। बड़ी बड़ी दीवार चार-चार, छह-छह, आठ-आठ फुट चौड़ी दीवार है। जो नगर के कोट थे, वो आज खत्म, दिखते नहीं। हीरमगाम गए, जर्जरभूत हो रहे हैं। अहमदाबाद के कोट था, दरवाजा थे ना, बारह दरवाजे थे, कितने थे? अहमदाबाद में अहमद का कोट नहीं रहा। ऐसे जो दिखता है, नहीं रहेगा एक दिन। ऐसा तीन महीना खाली प्रयोग करें। जो दिखे कि मिथ्या है, स्वप्ना है, स्वप्ना है, एक दिन नहीं रहेगा, नहीं रहेगा, नहीं रहेगा। मिथ्या है तो मन की दौड़ कम हो जाएगी। जिसकी सत्ता से नहीं रहेगा, दिखता है वो परमात्मा तो रहेगा। शरीर नहीं रहेगा, जवानी नहीं रहेगी, मकान नहीं रहेगा, मित्र नहीं रहेगा। राम राम संग हो जाएंगे, मर जाएंगे तो मरने के बाद भी जो रहता है वो हम आत्मा हैं, ऐसा ज्ञान हो जाएगा। जगत स्वप्ना है, मिथ्या है, स्वप्ना है। जो कुछ दिखता है, झूठ है, जो कुछ दिखता है झूठ है। ये ईंटें पक्की नहीं थी, मिट्टी थी और समय पाकर कुछ दिनों के वर्षों के बाद मिट्टी हो जाएगी। यह वृक्ष पहले नहीं था, कुछ वर्षों के बाद नहीं हो जाएगा। तो संसार उत्पन्न होता है, लीन होता है, उत्पन्न होता है, लीन होता है। जैसे सागर में तरंगें पैदा होती हैं और लीन होती हैं, ऐसे ही परमात्मा की सत्ता से ये दिखता है, लीन होता है। परमात्मा नहीं लीन होता। मन में कभी विचार अच्छा आता है, कभी लीन हो जाता है, कभी गुस्सा आया, फिर चला गया, कभी काम आया, फिर चला गया, कभी क्रोध आया। काम सतत थोड़ी रहता है। क्रोध सतत रहता है, बताओ। सतत कोई दो घंटा क्रोधी होकर दिखाओ, आपको दो हज़ार इनाम। दो घंटा क्रोध करके दिखाओ। बोलते हैं विकार है, ठीक है, दो घंटा विकारी होकर दिखाओ। क्रोध करो, दो घंटा दो हज़ार रुपए इनाम, तीन घंटा करो तो तीन हज़ार इनाम। चलो, पांच घंटे क्रोध करो सतत तो पाँच हज़ार रुपए इनाम, करके दिखाए कोई? क्रोध का तरंग आएगा, चला जाएगा, लेकिन क्रोध का तरंग आया तब भी परमात्मा की चेतना थी। क्रोध का तरंग चला गया, तब भी चेतना है। वो चेतन परमात्मा को जो मैं मानता है, उसको आत्मज्ञान होता है। और तरंग को जो मैं मानता है कि मैं क्रोधी हो गया। ऐसे ही सेक्सुअल विचार आते हैं तो सतत नहीं आएंगे। सतत सेक्स नहीं होगा, सतत लोभ नहीं होगा, सतत मोह नहीं होगा, सतत अहंकार नहीं होता। सतत नींद भी नहीं आती। तम ऊंगी जाओ, हेडो सलग ऊंगो, एक महीने। ऊंग भी आती है, जाती है, जागरण भी आता है, जाता है, लेकिन परमात्मा जो है वो ऊंग में भी है, जागरण में भी है, क्रोध के समय भी है और शांति के समय है। जब क्रोध आता है तो उस वक्त देखोगे कि क्रोध आया है। मेरा परमात्मा तो पहले भी था और बाद में भी रहेगा। ये आया गया है। क्रोध के समय आप क्रोध कंट्रोल में आ जाएगा। काम के समय ऐसा विचार आएगा तो काम कंट्रोल में आ जाएगा। लोभ के समय के लोभ वृत्ति उठी, ए आया लोभ। लोभ वृत्ति को निहारा तो फिर आप लोभ के पंजे में जल्दी नहीं फंस लेंगे। जब हम मूर्छित होते हैं, लोभ के साथ जुड़ जाते हैं, काम के साथ जुड़ जाते हैं, क्रोध को सपोर्ट देते हैं, तभी अपने को जीवन छिन्न भिन्न करने वाले विकार उलझा देते हैं। और फिर होता तो ये शरीर में है, विकारों में है और अपने को मानते हैं। हमने करा, हमने पाप किया, हमने पुण्य किया। तो जिनके साथ आपका वास्तविक असलियत में संबंध नहीं है, उनके साथ अपन संबंध मान लेते हैं। जैसे अब जिनके साथ तुम्हारा संबंध नहीं है, शहर में ऐसे लोग कई लोग अभी दुष्कृत्य भी करते होंगे। फिल्मों में, सिनेमाओं में न जाने क्या क्या धक्कमधुक्की होता होगा, क्या क्या होता है? और कई लोग मंदिरों में और और जगह पर सत्कृत्य भी करते होंगे, लेकिन आपको उनका किया हुआ अच्छा और बुरा आपको पंच नहीं करता है कि मैं दुखी होऊँगा। मैं पाप कर रहा हूँ, मैं पुण्य कर रहा हूँ क्योंंकि आप उनको अपने से अलग मानते हैं। ऐसे ही देह से अपने को जो अलग मान लेता है, वो हो जाता है ज्ञानवान। 


ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं। 

कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ॥


उन्होंने तीन गुण भी छोड़ दिए। सिद्धि को तिनके जैसा समझा। सब में ब्रह्म अपना परमात्मा देखता है। जैसे सब घरों में एक ही आकाश है, अब नीम है। अब नीम में डाली अलग है, मोर अलग है, बीज अलग दिखते हैं, फल इसके अलग लगते हैं, दिखते हैं, पत्ते अलग, थड़ अलग, लेकिन है तो सब रस ही एक ही रस। लकड़ी बन गया, पत्ता बन गया, टहनी बन गया, बीज बन गया। रस में ही से ही तो बना। मिट्टी के खिलौने सब मिट्टी हैं, शक्कर के खिलौने सब शक्कर हैं, सोने के गहने सब सोना है, पानी की तरंगें सब पानी हैं। ऐसे ही उस आत्मदेव का जिसको बोध हो गया। वो सब ब्रह्म देखेगा। देखत ब्रह्म समान सब माहि। जैसे सब आकाश में घड़ा एक, सब घड़ों में आकाश एक ही है।...घड़े अलग अलग, आकाश एक। ऐसे ही शरीर अलग अलग और चेतन आत्मा एक। यह बल्ब अलग है, ऑफिस का अलग है, माइक अलग है, इंस्ट्रूमेंट अलग अलग हैं, लेकिन इलेक्ट्रिसिटी तो एक ही है सब। ऐसे ही सबके अंदर में आत्म सत्ता तो एक ही एक है और आत्म सत्ता को जो मैं मान लेता है, वह जीवन मुक्त हो जाता है। नहीं तो फिर गिड़गिड़ाते रहो। हे फलाना भगवान! हे फलाणी देवी, हे फलाना। हजारों देवीयों ने मंदिरों में, मस्जिदों में आं तेम, बधा ना सहारा मागो लियो, पण जहां सुधी आत्म सहारा नहीं जगायो, संकल्प बल ना जगायो, आत्मविश्वास जब तक नहीं लाए, तब तक जीवन में रोना पड़ता है। कुछ न करना ही ईश्वर प्राप्ति है। आराम निश्चिंत भव ।


तुर्क दुनिया। एक फकीर जा रहा था। 

बोले, "बाबा! देखो लोग क्या कहेंगे? आप खाली ऐसे कच्छा पहन के जा रहे हैं, इतने बड़े प्रसिद्ध महात्मा।" 

आला फकीर था, शायद लोग क्या कहेंगे? 

बोले तुर्क दुनिया, दुनिया की चिंता नहीं करो। 

लेकिन देवता लोग सोचेंगे कि जिसके चरणों पर हम सिर झुकाते हैं, ब्रह्मवेत्ताओं को ऐसा ब्रह्मवेत्ता ऐसा कच्छा पहन के चलता है, एकदम। जरा ख्याल करो।

बोले तुर्क दुनिया, तुर्क उकबा, तुर्क मौला। दुनिया क्या कहेगी? निष्फिकर हूं। देवता क्या कहेंगे? निष्फिकर हूं। मौला, मौला चाहिए कि मौला की भी जरूरत नहीं, अब वो भी तुर्क और नहीं का भी नहीं। तुर्क दुनिया, तुर्क उकबा, तुर्क मौला, तुर्क, तुर्क। 


ईश्वर, ईश्वर अब अपने से दूर है तो चाहिए। अब पता चल गया अपने आत्मा का नाम ही तो ईश्वर था। अब ईश्वर क्या कहेगा, यह बात को भी हमने छोड़ दिया। स्वर्ग वाले क्या कहेंगे? तुर्क लोग क्या कहेंगे? तुर्क। 

है मस्त पड़ा महिमा में अपनी, गैर राम अभी और नहीं। 

राम, हमारा कहीं और नहीं है कि उसको रिझाऊं। 

दुनिया की भी परवाह नहीं, स्वर्ग की भी परवाह नहीं, मौला की भी परवाह नहीं और। परवाह नहीं, की भी परवाह नहीं। नहीं परवाह है, ऐसी पकड़ भी हमारी नहीं है। तुर्क तुर्क। इतना आसान है, इतना आसान है, सुखी होना कि महाराज हाय राम! लोग क्यों परेशान हैं, समझ में नहीं आता। लोग समझते हैं कि जैसे संसार का उद्योग करने से संसार का काम होता है, ऐसे ही ईश्वर को या सुख को पाने के लिए भी कुछ उद्योग करें। जितना तुम उद्योग करते हो, उतना ईश्वर से दूर, सुख से दूर। सब उद्योग जब छोड़ते हो तो नींद कितनी फर्स्ट क्लास आती है। ऐसे ही जागृत में सब अंदर से उद्योग छोड़ दो। एकदम ब्रह्मज्ञानी। अब भी इस समय महाराज, देर नहीं है। हमारे घुसा है खोपड़ी में भूत के कुछ करें, कुछ करें तो भजन-चिंतन छोड़ के फिर गप्पा ठोके, गप्पा छोड़ो, बोले माला करो, माला छोड़ो तो बोले, ध्यान करो और संसार का तुच्छ करने की आदत है, उसी लिए माला करो, ध्यान करो। जब और करने की आदत नहीं है तो उसको भी छोड़ो। अब फिर देखो, ईश्वर आपसे एक रति भर भी दूर नहीं हो सकता। लोग समझते हैं कि कुछ आकृति आएगी, कुछ ऐसे चतुर्भुजी हो जाएंगे, कुछ ये हो जाएंगे। वो भी आएंगे तो आखिर यही कहेंगे कि तत्वज्ञान! अंदर का ईश्वर पा लें और अंदर का ईश्वर यह है ‘निष्फुर अवस्था’। 

लोग ये समझते हैं, कुछ करने से मिलता है, कुछ न करने से ही सब कुछ मिलता है। छोटी-छोटी बात में लोग उलझ जाते हैं। हायशो! हायशो, रिपीट, रिपीट, रिपीट। संसार सपना है,  

थातु कोइ ने ध्यान से तो तेनु प्रारब्ध तेऊ होसे। 

हम पहले बड़े ऐसे रहते थे। फिर हमारे हाथ में ब्रह्मभावनी आ गई। छोटी-सी फटी-टूटी। हमने उसको प्रिंट करा दिया। किसी का था, अपना लिखा हुआ नहीं था। पहले ये मेरे को खटका था कि ध्यान, ध्यान होना ही चाहिए, समाधि लगनी चाहिए, ध्यान होना चाहिए। फिर जब वो पढ़ा कि थातु कोइ ने ध्यान से तो तेनु प्रारब्ध तेऊ होसे, ले अपना बाप नू शुं। 

थातु कोइ ने ज्ञान से तो तेनु प्रारब्ध तेऊ होसे, थातु कोही ने दुख से तो तेनु प्रारब्ध तेऊ होसे।

ले सुतरा घोल पतासे पी। ...


🙏ॐ गुरु ॐ 🙏

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