TIME STAMP INDEX
इंडेक्स के अनुसार अर्थपूर्ण कंटेंट:
0:03 बिना अभ्यास के कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। जैसे आटा गूंथना, रोटी बनाना अभ्यास से आता है, वैसे ही संसार से तरने और आत्मज्ञान पाने के लिए भी अभ्यास आवश्यक है। जप, ध्यान और साक्षी भाव का अभ्यास जीवन में जरूरी है।
1:08 मन के दोष अज्ञान से पैदा होते हैं। जैसे-जैसे आत्मज्ञान का अभ्यास बढ़ता है, वैसे-वैसे दोष शांत होने लगते हैं। योग और ध्यान से चित्त शुद्ध होता है।
1:29 मृत्यु का भय आत्मा को न जानने से होता है। जिसने आत्मदेव को जान लिया, उसके लिए मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं।
2:09 अभ्यास के साथ वैराग्य जरूरी है। बिना वैराग्य के ज्ञान टिकता नहीं। ऐसा वैराग्य हो कि देह को भी अपना न माने, केवल साधन माने।
3:10 राग और द्वेष बुद्धि को कमजोर करते हैं। जितना राग-द्वेष कम होगा, बुद्धि उतनी निर्मल और प्रखर होगी।
3:25 (कहानी: चित्रकार और गुरु) एक शिष्य ने सुंदर चित्र बनाया, पर गुरु ने कमी न निकालने पर उसे अधूरा बताया। शिक्षा यह कि पूर्णता केवल आत्मा में है, कर्म में नहीं।
4:15 जैसे ऑडिटर गलती खोजता है, वैसे ही अपने जीवन की कमी को देखना चाहिए। जो कमी दिखती है, वही दूर होती है।
4:50 कमी को अपने में न मानकर चित्त की वृत्ति मानो। स्वयं को साक्षी समझो। इस अभ्यास से दोष भी निकलेंगे और आत्मज्ञान भी बढ़ेगा।
5:10 आत्मज्ञान से पहले इंद्रियों और वाणी का संयम जरूरी है। दोष आने पर प्रार्थना और प्रायश्चित हृदय से होना चाहिए।
6:09 दोष छुपाने से वे मन में और गहरे बैठ जाते हैं। छुपाया हुआ दोष कारण शरीर तक जाकर कई जन्मों का बंधन बन जाता है।
7:13 यदि जीवन में पतन का मार्ग चुना तो आगे दुःख ही मिलता है। जवानी में साधना कर ली तो कल्याण है, अन्यथा भवचक्र में भटकना पड़ता है।
8:08 बुद्धिमान संकेत से समझ जाते हैं और अभ्यास में देर नहीं करते। मूर्ख बहाव में बहते रहते हैं और निकलना कठिन मान लेते हैं।
9:26 अभ्यास के लिए ऐसा स्थान चुनो जहाँ आत्मभाव जागे। सत्संग आत्मज्ञान का सबसे बड़ा साधन है।
10:39 (कहानी: पहलवान और भैंसा) पहलवान रोज छोटे से भैंसे को उठाता रहा, अभ्यास से शक्ति बढ़ती गई। वशिष्ठ जी कहते हैं अभ्यास से सब सुगम हो जाता है।
11:43 आत्मभाव का अभ्यास, जगत की परिवर्तनशीलता को देखने का अभ्यास और साक्षी भाव में टिकने का अभ्यास जरूरी है।
12:17 साधक होकर बेईमानी रखना आत्मपथ के विरुद्ध है। ईश्वर की वस्तु को अपनी मानना ही बेईमानी है।
13:06 (दृष्टांत: मैनेजर) जैसे मैनेजर कंपनी को संभालता है, वैसे ही शरीर और संसार को ईश्वर की संपत्ति मानकर संभालो, आसक्ति मत रखो।
14:20 वेदांत संसार त्यागने को नहीं कहता, बल्कि बदलने वाली वस्तुओं में चिपककर आत्मस्वरूप भूलने से बचाता है।
15:27 मनुष्य जन्म आत्मज्ञान का अधिकारी है। देवता भी मोक्ष के लिए मनुष्य जन्म चाहते हैं। यह ईश्वर की महान कृपा है।
17:51 मनुष्य बड़ा महल या पद से नहीं, बड़े विचारों से बनता है। ब्रह्म के विचार जीवन को ऊँचा उठाते हैं।
18:52 ज्ञान प्राप्ति के बाद ज्ञानी अलग-अलग प्रकार से जीवन जीते हैं, पर सभी स्वरूप में स्थित रहते हैं।
20:21 जैसे नाम सुन-सुनकर पहचान बनती है, वैसे ही आत्मा में जागने का अभ्यास निरंतर करना पड़ता है।
21:14 अहंकार सब गुणों का नाश करता है। श्रद्धा सब दुर्गुणों को बहा ले जाती है।
21:48 सात्विक श्रद्धा ज्ञान तक ले जाती है। राजसी श्रद्धा सुविधा तक रहती है। तामसी श्रद्धा विपरीत होते ही टूट जाती है।
23:32 (कहानी: सुदामा और श्रीकृष्ण)
सुदामा की सात्विक श्रद्धा हर परिस्थिति में अडिग रही, इसलिए भगवान ने उसका सच्चा कल्याण किया।
26:33 पुण्य कर्म, जप, सत्संग और परोपकार से सात्विक श्रद्धा विकसित होती है।
27:12 आत्मज्ञान सबसे ऊँचा है। इसके सामने देवता, राज्य और समाधियाँ भी तुच्छ हैं।
28:01 ईश्वर के मार्ग पर धैर्य जरूरी है। बीज बोकर तुरंत फल की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
28:53(उदाहरण: गुठली बोना)
ज्ञान की गुठली हृदय में रखो, सत्संग से सींचो और धैर्य से उसकी रक्षा करो।
30:02
जैसे खेती की रक्षा के लिए वाड़ होती है, वैसे ही साधना की रक्षा के लिए विवेक जरूरी है। लोभ, मोह और अहंकार से सावधान रहना चाहिए।
बिना अभ्यास के नहीं होता कुछ। आटा गूंथने का भी अभ्यास है तो गूंथ सकते हैं, रोटी बनाने का भी अभ्यास है तो बना सकते हैं। ऐसे ही संसार से तरने का अभ्यास करना पड़ता है। जप का अभ्यास है तो माला घूमती हैं, फिर साक्षी बनने का अभ्यास हो, सुख-दुख के प्रसंग में उनसे पृथक होने का अभ्यास आ जाए। चित्त के विचार, चित्त के दोषों के समय, अपनी निर्दोषता का याद अभ्यास आ जाए। चित्त के दोष शांत होने लगेंगे। ज्यों-ज्यों ज्ञान की तरफ बढ़ते जाएंगे, त्यों-त्यों दोष नाश होने लगेंगे। दोष अज्ञान से होते हैं ना! दोष सब अज्ञान से होते हैं। आत्मज्ञान के अभ्यास से दोष दूर होने लगेंगे। योग के अभ्यास से भी चित्त के दोष दूर होने लगेंगे। जितना आदमी दुखी-सुखी होता है, उतना उसके अभ्यास की कमजोरी है। जितना आदमी भयभीत रहता है, मृत्यु का भय है, मौत आ जाए और डर लगता है, समझो अभ्यास की कमी है, हमारा आत्मा को जानने की। आत्मदेव को नहीं जाना, इसलिए मौत का भय है। आत्मदेव को जान लिया तो मौत तो उसकी होती नहीं। और शरीर को डरा-डरा के रखो, तभी भी वो एक दिन तो मरेगा। तो अविद्या है, अज्ञान है। आत्मा का ज्ञान नहीं हुआ। आत्मा का ज्ञान के लिए अभ्यास है। बिना अभ्यास के कोई चीज सिद्ध नहीं होती। और अभ्यास में वैराग्य चाहिए। अंदर वैराग्य नहीं है तो आदमी जो भी काम करेगा, सेवा करेगा तो भी स्वामी को भोगी बनाएगा। वैराग्य नहीं है ना और और और बिना अभ्यास और वैराग्य के ज्ञान जमता नहीं, टिकता नहीं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते"। ऐसा वैराग्य हो कि अपने देह से भी वैराग्य हो जाए। एक दिन छोड़ना है उसको, वैसे अपना नहीं मानना, संसार का मानना। उसको तंदुरुस्त रखा, ठीक है, उपयोग करने के लिए है संसार का। महापुरुषों की युक्ति समझकर अपने चित्त को शांत कर लेते हैं उनको तत्वज्ञान में फिर देरी नहीं लगती बुद्धिमानों को। राग और द्वेष से बुद्धि दुर्बल हो जाती है। राग-द्वेष जितना कम होगा, उतना बुद्धि बढ़िया होगी।
एक चित्रकार ने फर्स्ट क्लास चित्र बनाया। छह महीना तक बनाया, पूरी कारीगरी लगाई अपनी और जाकर अपने मास्टर को दिखाया, गुरु को।
गुरु ने कहा कि वाह! ऐसा तो मैं भी नहीं बना सका।
वो रोने लगा लड़का।
बोले, "क्यों रोता है?"
जब अब मेरे कृत्य से, कमी कोई नहीं निकालेगा तो मैं आगे कैसे बढ़ूं? मेरे कृत्य से कमी नहीं निकलेगी तो मैं आगे कैसे बढ़ूं?
कृत्य प्रकृति में होता है ना। प्रकृति अपूर्ण है। कोई कृत्य पूर्ण होता नहीं। तो कृत्य करने वाला पूर्ण कैसे है? कहने का तात्पर्य है कि जो ऊंचा उठाना चाहते हैं ना, हम ऑफिसों में इधर उधर होता है ना, तो क्या तुमने बढ़िया-बढ़िया क्या लिखा है? तुम्हारा हिसाब बढ़िया अप टू डेट कौन सा है, ऐसा थोड़े ऑडिटर देखेगा। गलती कहां है? ऑडिट का मतलब है गलती कहां है, कमी क्या है? ऐसे अपने जीवन में जो कमी है, उसको देखो। दिखेगी तब जब तुम्हारे से दूर होगी। अब तुम देखोगे नहीं तो तुम्हारे में बैठ जाएगी। तुम देखोगे तो तुम्हारे से दूर हो जाएगी। दूर होगी तभी दिखेगी। तो फिर अपने में मानो नहीं उसको, ये मेरे में नहीं है। ये जो कमी दिख रही है, मेरे में नहीं, ये चित्त में है। चित्त का मैं दृष्टा हूं, साक्षी हूं। ओम आनंद! आप इस प्रकार का अभ्यास बनाओ। कमियां भी निकलते जाएगी, आत्मज्ञान भी होता जाएगा, युक्ति है। जब तक आत्मज्ञान नहीं होता, तब तक दृष्टि का भी, वाणी का, कान का संयम करना चाहिए। चित्त से ब्रह्मचर्य के विरुद्ध कोई फुरना उठा तो उसी वक्त पतन होना शुरू हो जाता है तन का, मन का। एकांत में भगवान को, गुरु को प्रार्थना करना चाहिए, रोना चाहिए कि मैं ऐसा अभागा हो रहा हूं, मेरे चित्त में ऐसे दोष हो रहे हैं। हृदयपूर्वक जब तक प्रायश्चित या प्रार्थना नहीं होती, तब तक भीतर से दोष निकलते भी नहीं। गुरु या पिता दोष निकालने को करें, लेकिन आदमी स्वयं जब तक उसमें डटता नहीं, अपने दोष निकाले, तब तक गुरु और पिता का भी उपदेश सौ टका फायदा नहीं करता।... हम लोग दोष छुपाते हैं, दोष को पोषते हैं हम लोग। दोष को छुपावे नहीं, दोष को पोषे नहीं। दोषों से पृथक ब्रह्म परमात्मा निर्दोष है। हम भी पृथक होंगे तो निर्दोष होंगे और उसमें उनको छुपाएंगे तो अपने में भरे नहीं। कोई चीज छुपाने के लिए क्या करना पड़ता है? अपने घर में रखनी पड़ती है ना। छुपा दे तो क्या हुआ? अपने घर में रखते हो, ऐसे कोने में रखते हो कि घर में नहीं रहती, दिमाग में रह जाती है। फलाणी जगह वस्तु डाटी, गाड़ दिया, दिमाग में ही भर दिया। ऐसे ही दोषों को छुपाने से दोष दिमाग में आ जाते हैं। अपने शरीर में तो होते हैं, फिर मन:शरीर में घुस जाते हैं और भी पक्के छुपाते जाएं और करते जाएं तो कारणशरीर में घुस जाते हैं और वह कई जन्मों तक बैठते हैं। वृद्धावस्था आएगी कोई थूकेगा भी नहीं। जवानी में बहुत प्राप्ति कर लिया तो ठीक है, नहीं तो बुढ़ापे में तो कोई सामने हमारे
देखेगा भी नहीं। अगर हम पतन के रास्ते चले और मरने के बाद भी पतन के रास्ते चले तो वृक्ष बनेंगे। कौन हमारे को प्रणाम करेगा? गधा बनेंगे, भैंसा बनेंगे, सूकर, कुकर, सूअर बनेंगे। तब भी ये जिनको थैंक यू कहते हैं या धन्यवाद कहते हैं, वो लोग छुड़ाने को आएंगे क्या? जिनके साथ हम ममता का विचार, व्यवहार रखते हैं, वे लोग छुड़ाने को आएंगे जब हम गधा बनेंगे, सूअर बनेंगे, भैंसा बनेंगे। बुद्धिमान इशारे से समझ जाते हैं। बुद्धिमान को अभ्यास करने में देर नहीं लगती और मूर्ख लोग तो बहते रहते हैं उसी बहाव में जो गिरावट की आदत पड़ गई, बोले अब हमारा निकलना मुश्किल है। नहीं, कितना भी गिर गया, निकलने को तैयार हो जाए तो निकले और गिरता चला जाए तो गिरे। कठिन भी नहीं है, एकदम सुगम है और सुगम नहीं है, महाकठिन है। महाकठिन इसलिए है कि जो बदलने वाला शरीर है, बदलने वाला अंतःकरण है, बदलने वाली अवस्थाएं हैं, नष्ट होने वाली चीजें हैं, उनके साथ चिपक जाते हैं हम। उसी लिए महाकठिन है और जो सब बदलाव को देखता है, उस 'मैं' साक्षीपने में स्थित होने का अभ्यास नहीं है। इसीलिए कठिन लग रहा है कि अभ्यास कर ले तो सरल हो जाए। अभ्यास की कमी से ही हम लोग पिछड़ जाते हैं। अभ्यास कहीं जंगलों में जाकर करना है, अमुक जगह जाकर करना है। जहां आत्मभाव जगाने का वातावरण मिले, जहां जगा सको, वो जगह अच्छा है और आत्मभाव सत्संग में जगेगा, आत्मदेव की बातें सुनने से जगेगा। इसीलिए ज्ञानवानों की संगति करो। वशिष्ठजी कहते हैं, संगति माना उनके वचन सुनकर फिर वो अपने वचन बना लो। उनका अनुभव सुनकर अपना अनुभव बनाओ। अरे! अभ्यास है, शरीर की ऐसी इतनी आवश्यकताएं न बढ़ाओ। शरीर का इतना परिचय न बढ़ाओ, इतना संसार का व्यवहार न बढ़ाओ कि परमात्मा देव में जगने का अभ्यास करने का मौका ही न मिले। फिर समय बचाकर थोड़ा तो एकांत में बैठकर अभ्यास करो। एकांत का जमा हुआ अभ्यास फिर व्यवहार में ले आओ। व्यवहार करते-करते परिस्थितियां जो आए, उसमें साक्षी होने का अभ्यास कर दो। महासुगम है।
बड़ा पहलवान था। लोगों की नजर में एक बड़ा विशाल भैंसा, मोटा उसको उठाता था वो। गांव के लोगों ने कोई साधु को कहा कि अमुक आदमी भैंसा उठाता है। है तो पतला दुबला, लेकिन भैंसा बड़ा-मोटा उसको उठा लेता है। वो बड़ा अद्भुत पहलवान जैसा काम करके दिखाता है। ये क्या कारण होगा?
महात्मा ने कहा चलो हम पूछ के बताते हैं, देखें।
उससे कहा कि भाई, तुम इतना बड़ा भीमसेनी भैंसा उठाते हो?
हम तो पतले दुबले महाराज जी! जब पाड़ा जन्मा था, उस दिन मैंने उसको कंधे पर उठाया और दूसरे दिन भी उठाया। ऐसे मैं रोज इसको उठाता हूं। रोज ही ये बढ़ता गया और मैं उठाता गया तो अभ्यास मेरा बढ़ गया। वशिष्ठजी कहते हैं कि अभ्यास जिसमें किया, वह वस्तु सुगम हो जाती है। बिना अभ्यास के सिद्ध नहीं होता। आत्मभाव का अभ्यास, जगत के मिथ्यात्व का अभ्यास, शरीर, शरीर की परिस्थिति, संसार ये सब बह रहा है, बदल रहा है, उसको देखने का अभ्यास आ जाए। अपने को अपने आप में जगने का अभ्यास। विकार आया, क्रोध आया कि अच्छा क्रोध आया। अरे आ गया क्रोध!... ऐसा करके भी जग गया तो अब जगने का आदत पड़ जाएगा। बोले और तो सब ठीक है ज्ञान, भजन ध्यान समझ में तो आता है, लेकिन स्वामीजी मन में यह बेईमानी है। विकार नहीं छूटते। साधक बनकर बेईमानी रखना, अपने को परमात्मा का बनाकर फिर बेईमानी रखना, सत्संग कोई बेईमानी रखने का तो रास्ता नहीं है, बेईमानी छोड़ने का मार्ग है। ईश्वर की वस्तुओं को अपनी मानना ही बेईमानी है। ईश्वर की वस्तुओं को अपनी मानना ही बेईमानी है। बेईमानी छोड़ने का अभ्यास करो तो बेईमानी छूट जाए। बस अपनी न मानो, बेईमानी छूट गई। ईश्वर की है, ईश्वर की वस्तु है तो उसका ठीक सदुपयोग करें। अपनी तो इधर-उधर हो जाए तो कोई वांदा नहीं, फालतू हो जाए, बिगाड़ो। ईश्वर के हैं, भगवान के हैं, मैनेजर काम करता है ना, बड़ी कुशलता से करता है। नफा होता है तो फर्म का होता है, घाटा होता है तो फर्म का होता है, वो करता काम।
अपनी दिलचस्पी से, उस मैनेजर का प्रमोशन होता जाता है। फर्म के नफे और घाटे से उसको उतना राग-द्वेष नहीं होता। ऐसे ही शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता से, परिस्थितियों की अनुकूलता-प्रतिकूलता से अपने को राग द्वेष नहीं होना चाहिए। शरीर एक कंपनी है, फर्म है। इसको खिलाओ, पिलाओ, चलाओ, संभालो, तंदुरुस्त रखो, होशियार बनाओ, कुशल बनाओ, कंपनी का विकास करो लेकिन मैनेजर बनकर। प्रकृति की दी हुई चीज है, प्रकृति ईश्वर की है। ऐसा अभ्यास हो जाता है कि वेदांत कोई तंदुरुस्त रहने की मना नहीं करता। भोजन करने की, व्यापार करने की, धनवान होने की कोई मना नहीं करता लेकिन ये बदलने वाली वस्तुओं से चिपककर अबदल आत्मा को, अबदल अपने स्वरूप को भूलकर जन्म-मरण के दुखों में जाने की बेवकूफी वेदांत सहन नहीं करता, वो छुड़ाने की कोशिश करता है। हमारे मनुष्य जन्म का कितना बड़ा मूल्य है,
वो वेदांत समझाता है। वेदांत की बातें समझकर ज्ञान की, भक्ति की, योग की बातें समझकर उनका अभ्यास किया जाए। भक्ति, योग, ज्ञान वहीं ले जाएंगे जहां ईश्वर चाहते हैं। ईश्वर हमारा कभी अहित नहीं कर सकते। जैसे मां बच्चे का अहित नहीं सोच सकती, कर नहीं सकती, ऐसे परमात्मा तो परम माई-बाप हैं। वो हमारा अहित नहीं करते। ईश्वर तो चाहते हैं हमें जगाना, इसलिए हमको मनुष्य जन्म दिया। कीट, पतंग, पशु आत्मज्ञान के अधिकारी नहीं है, भगवतप्राप्ति के देव, गंधर्व ये अधिकारी नहीं, उनको भी भगवत प्राप्ति करनी हो तो मनुष्य जन्म। तो अब मनुष्य ही तो अधिकारी है और चौरासी लाख योनियां हैं, उसमें वो अधिकार नहीं है। मनुष्य जन्म में आत्मज्ञान पाने का, प्रभु की प्राप्ति करने का अधिकार है। तो भगवान ने तो अधिकारी बना दिया। भगवान तो तुम्हें मुक्त करना चाहते हैं। भगवान तो अपने स्वरूप का दर्शन तुम्हें कराना चाहते हैं, तभी तो मनुष्य बनाया। चौरासी लाख योनियों को दूसरों को अधिकार नहीं है।
देवताओं को भी अगर मोक्ष पाना है तो मनुष्य बनना पड़ेगा। और दैत्य, असुरों को, राक्षसों को, भैंसा को या पेड़ को, पौधे को थोड़े साक्षात्कार होगा या भगवान की भक्ति होगी। मनुष्य है, भगवत प्राप्ति का अधिकारी। तो भगवान के तरफ से तो हमको अधिकार मिल गया। भगवान के तरफ से हमको मुक्त होने का, भगवत प्राप्ति करने का अधिकार मिला है। जब इतर योनि अधिकारी नहीं हैं, इतर योनि को अधिकार नहीं है कि देवताओं को भी अगर मुक्ति चाहिए तो मनुष्य बनना पड़ेगा। देवता लोग भी मृत्युलोक में मनुष्य बनकर साधन भजन करने की वांछा करते हैं तब कोई ऐसे देवता आकर कुछ भगवत प्राप्ति कर लेते हैं। तो हमको मनुष्य जन्म मिला, फिर श्रद्धा है, थोड़ी बहुत बुद्धि है। फिर सत्संग मिला तो यह सब ईश्वर की कृपा है ना! ईश्वर ने इतना सहयोग दिया। तो फिर हम ढील क्यों करें? अब ईश्वर जो चाहते हैं, तो हमारा भला ही चाहते हैं ना। ईश्वर हमारा कल्याण नहीं चाहते, हमको भैंसा बना देते। गधा बना देते। ईश्वर हमारा कल्याण चाहते हैं ना। उनकी नजर में हम जंच गए हैं उनको। फिर, फिर क्यों हल्की बुद्धि करके नीचे गिरे? हल्के विचार करके नीचे गिरे।
बड़े बड़े महलों में रहने से आदमी बड़ा नहीं होता। बड़े भाषण करने से आदमी बड़ा नहीं होता और आकाश में हेलीकॉप्टर में या हवाई जहाजों में उड़ने से आदमी बड़ा नहीं होता। बड़े विचारों से आदमी बड़ा होता है, छोटे विचारों से आदमी छोटा होता है। ब्रह्म के विचार करो, मैं कौन हूं? यह शरीर आखिर कब तक रहेगा?...ये संबंध कब तक रहेंगे? मैं नित्य हूं, ये अनित्य हैं। मैं एकरस हूं, ये अवस्थाएं बदलने वाली हैं। मन भी बदलता है, बुद्धि के निर्णय भी बदलते हैं। मैं अबदल हूं। वो कौन हूं? सत्संग में सुना है कि अबदल तो आत्मा है तो मैं वही हूं। ये बड़े विचार हैं। तो फिर अबदल में टिकने का अभ्यास करो, महान बन जाएगा। ऐसे महान ज्ञानवान, अलग अलग प्रारब्ध है, अलग अलग अपनी मौज है। कई ऐसे ज्ञानवान हैं जो कंदराओं में बैठे समाधि कर लिया है। स्वरूप को जानकर उसमें भी शांति। कई ऐसे हैं जो लीला करते हैं, उपदेश करते हैं। कई ऐसे हैं, विनोद करके जीवन बिताते हैं। कई पागलों का वेश धरकर बैठे हैं। कई ऐसे ज्ञानवान हैं, जो नित्य नियम, जप, तप, कर्म करते हैं। वैसे व्यवस्थित ताकि दूसरे लोग भी उधर की तरफ मुड़ जाएं। कईयों का ऐसा स्वभाव ही होता है। तो कई ज्ञानवान अपने अपने ढंग से बोध होने के बाद शेष जीवनयापन करते हैं लेकिन स्वरूप में जग गए। एक बार परमात्मा का दर्शन हो गया, ज्ञान हो गया, फिर सारी प्रकृति, सारी परिस्थितियां उनके लिए खिलवाड़ मात्र हो जाती हैं। विनोद मात्र हो जाता है। आश्चर्य त्रिभुवनजयी! श्रुति कहती है, वो आश्चर्यकारक है। बाले बालवतां युवे युवां, बच्चों में, बच्चों जैसा, जवानों में जवान, गरीबों के साथ गरीब जैसा, अमीरों के साथ अमीर जैसा लेकिन अंदर से समझता है कि सब खेल है। अभ्यास करते तो आत्मज्ञान होना कोई कठिन नहीं है। अभ्यास के बल से ही तो मैं ब्राह्मण हूं, मैं वैश्य हूं, मैं क्षत्रिय हूं, मैं जीव हूं। मैं फलाने का बेटा हूं, मैं फलाना भाई हूं। ये सुन-सुनकर तो माना है। म्हारो नाम मंगूबा, म्हारो नाम अंबालाल। म्हारो नाम मफत लाल और मफत लाल क्या? बचपन में पढ़ा नाम मफत लाल सुन सुन के पक्का हो गया। सौ आदमी सो रहे हैं, मफत लाल। यह भी तो अभ्यास से ही पड़ा। जो भी नाम पड़ा है, जो भी जिसका। ऐसे ही अपने आत्मा में जगने का अभ्यास करो तो भाई। ओम ओम, ओम ओम!
दुराचार, अश्रद्धा या फांका ऐसा दुर्गुण है कि उसमें सब योग्यता नाश हो जाती है। अहंकार जो है, फांका ऐसा दुष्ट है कि उसमें सब सद्गुण नाश हो जाते हैं और श्रद्धा ऐसा सद्गुण है कि उसमें सब दुर्गुण बह जाते हैं। श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है सात्विक, राजसिक और तामसिक। सात्विक की श्रद्धा एक बार हो गई, नहीं ढिलेगी, उसमें ज्ञान बढ़ जाएगा। तो
वचन सुनते ही गुरु के जिसमें श्रद्धा है, श्रद्धा के वचन सुनके श्रद्धेय के। समझो मेरी मेरे गुरुदेव में श्रद्धा है, सात्विक श्रद्धा है तो उनका वचन सुनूंगा। बस मैं अपने जीवन को ऐसा ढाल दूंगा। यह सात्विक श्रद्धा ज्ञान पैदा कर देती है। सात्विक श्रद्धा जिसमें करेंगे, उसके सब गुण अपने में आ जाएंगे। भगवान विष्णु में श्रद्धा है तो भगवान विष्णु का जो सामर्थ्य है, जो अंतर्यामीपना है, वह अपने में आ जाएगा। भगवान विष्णु को अपने स्वरूप का बोध है, अपने को भी होने लगेगा। ऐसा गुरु मिल जाएगा। सात्विक श्रद्धा जो है, एक बार हो गई तो हो गई। ज्ञान कराके छोड़ेगी। सात्विक श्रद्धा। चाहे हजार मुसीबत आ जाए, हजार प्रतिकूलता आ जाए, श्रद्धेय व्यक्ति का बाह्य आचरण नहीं देखते, श्रद्धेय व्यक्ति के आदेश को। सात्विक श्रद्धा ऐसी है कि जिसमें हम श्रद्धा करते हैं, उसके दोष नहीं दिखेंगे। उनका ज्ञान हमको हजम होगा। उनके प्रति फरियाद नहीं होगी। मेरी सात्विक श्रद्धा है, जिसमें तो उसके प्रति मेरे दिल में फरियाद नहीं होगी। जैसे सुदामा सात्विक श्रद्धार्थी और कृष्ण ने दुशाला छीन लिया। नंगे पैर रवाना कर दिया। खाने को कुछ था नहीं। मांगने को आया। एक कौड़ी भी नहीं दिया। श्री कृष्ण ने जो दुशाला दिया था, वह भी वापस ले लिया। तभी भी सुदामा कहता है कि भगवान कितने दयालु हैं। साथ में पढ़े थे, मेरे मित्र हैं। मेरे मित्र कितने दयालु हैं प्रभु! मैंने मांगा धन, संपत्ति, रोजी रोटी, लेकिन कहीं रोजी रोटी के मोह में फंस न जाऊं, इसलिए मेरे को कुछ नहीं दिया। कितनी दया किया, बड़े अच्छे हैं। सात्विक श्रद्धा है।... और जब घर पहुंचते हैं तो सुशीला सज-धज कर महारानी जैसी होकर आ रही है, दासियों के साथ। पूछते हैं कि तू कैसे बदल गई एकदम, झोपड़ी की जगह पर महल। सुशीला ने कहा, "तुमने वहां प्रार्थना करा और भगवान ने यहां ऋद्धि-सिद्धियों की सब लीला करके अमीर में बदल दिया।"
बोले, प्रभु कितने दयालु हैं! मेरा भक्त रोजी-रोटी की चिंता में कहीं भजन न भूल जाए, इसलिए ऐसा कर दिया।
सब छीन लिया, तभी भी सात्विक श्रद्धा ऐसी है। वो ज्ञान से, अपना ज्ञान का उपयोग करके सही अर्थ लगा लेंगे।
राजसी श्रद्धा जब तक आपके अनुकूल चला, थोड़ा बहुत ठीक-ठीक चला, घर-तर और थोड़ा पुचकार है, वो तो राजसी श्रद्धा टिकेगी। जहां थोड़ा सा उन्नीस-बीस हुआ कि में मारो शुं दोष हतो, आं हतो, तो मति वैसे हिलेगी। और तामसी श्रद्धा जो है, वो तो थोड़ा सा उन्नीस-बीस हुआ, विपरीत हो जाएगा, दुश्मन बन जाएगा श्रद्धेय का। कई लोग ऐसे होते हैं, तामसी प्रकृति के भगवान शिव की पूजा करेंगे। फिर देखेंगे कोई इच्छा पूरी नहीं हो, शिव जी का फोटो-वोटो फेंक देंगे। कई लोग देवी-देवताओं के फोटो रखते हैं, पूजते हैं, फिर अपनी इच्छा के अनुसार उनका नहीं हुआ तो वो देव को छोड़ कर दूसरे देव को, दूसरे देव को छोड़ के तीसरे देव को।
अगर सात्विक श्रद्धा है तो बस लग गया तो लग गया और उसको गुरु के वचन भी ऐसे लगेंगे, जैसे शुद्ध वस्त्र को केसर का रंग चढ़ता है। सात्विक श्रद्धा ऐसी चीज है। अगर सात्विक श्रद्धा है तो स्वाभाविक होगा और स्वाभाविक नहीं होता है तो फिर ऐसा करने से सात्विक श्रद्धा हो जाएगा। ज्ञान का साधन है कि पुण्य क्रिया करें, दूसरों को सुख पहुंचाएं। जैसे अपने शरीर को दुख, दुख के समय दुख होता है, वैसे ही दूसरों को दुख न दें। जप, व्रत, नियम, शास्त्र, पठन, सत्पुरुषों का सानिध्य, उनके वचनों में विश्वास ऐसा सब करने से सात्विक श्रद्धा होने लगता है। यह ब्रह्मविद्या का साधन है, आत्मज्ञान पाने का। जो आत्मज्ञान पा लिया, उसके आगे तैंतीस करोड़ देवताओं का पद कुछ नहीं। जिसने आत्मज्ञान पा लिया, उसके आगे इंद्र का राज्य कुछ नहीं। जिसने आत्मज्ञान पा लिया, उसके आगे योग समाधि से हजार वर्ष का बन के कोई बैठे हैं, वो भी कुछ नहीं। आत्मज्ञान एक ऐसी चीज है। हजारों वर्ष की समाधि करके बड़े योगी बैठे हैं, लेकिन आत्मज्ञान नहीं है तो कुछ नहीं। एक दिन वो फिर नीचे आ जाएंगे। आत्मज्ञान हो गया, बेड़ा पार। तो ये आत्मज्ञान का साधन है। संतों की संगति, सत्शास्त्रों का विचार। कभी-कभी लोग धैर्य छोड़ बैठते हैं। ईश्वर के रास्ते जो आदमी चलता है न, धैर्य न छोड़े तो पहुंच जाए, धैर्य छोड़ देते हैं। तो कहे किसको साक्षात्कार हुआ, इसका तो नहीं हुआ, इसको भी नहीं हुआ, उसको भी नहीं हुआ लेकिन जन्म-जन्म मुनि जतन करहिं। जन्म-जन्म तक जतन करते थे, ऐसे लोग आत्मज्ञान पाकर धन्य-धन्य हो जाते थे। अपने को दो दिन में, चार दिन में, दो साल में, एक साल में इतना प्रयत्न नहीं तीव्र, तो अभी तक कुछ नहीं हुआ, अभी तक कुछ नहीं हुआ। तो कई लोग ऐसे होते हैं, अच्छा खाओ, पियो, मौज करो। गुठली डाल के, मिट्टी डाल के, पानी पिला के छोड़ देना चाहिए। कुछ समय जम जाए। अब गुठली डालना क्या है कि ब्रह्मज्ञान का सत्संग महापुरुषों से सुनके हृदय में रख देना चाहिए। सत्संग
सुनके ओ, आ, ए, ओ और बंदर जैसा फिर गुठली रख के मिट्टी डाला और फिर निकालें तुरंत। गुठली डाल के छोड़ देना चाहिए। ऐसे ही संस्कार डाल के उसको रख देने चाहिए संस्कार, संस्कार फिर खुले नहीं। जो सुना है, ज्ञान का संस्कार उसको जमाना चाहिए फिर इसको पानी पिलाना चाहिए। नित्य सत्संग करते रहना, ये पानी पिलाना है। सत्संग, सेवा, परोपकार ये उसको पानी पिलाना है। गुठली में से छोड़ होता है, लेकिन जानवर खा जाए तो आम नहीं मिलेगा। उसकी रक्षा करना। रक्षा करना क्या है कि गधा खा न जावे, बकरी उसको चर न जावे, भैंस उसको लपका न मार दे, ऊंट उसको पैर से कुचल न दे। इसके लिए वाड़ करनी पड़ती है। जानवर आवे नहीं। खेती में वाड़ करते हैं ना, नहीं करो तो सफाया। ऐसे ही ब्रह्मज्ञान की खेती में वाड़ करने के लिए अहंकार तो नहीं घुसता, गधा, दुष्चरित्र विकार तो नहीं घुसते, पापाचरण तो नहीं घुसता, नहीं तो यह पौधा खा जाएंगे। उसकी रक्षा करनी पड़ती है। जैसे पौधे की रक्षा के लिए वाड़ है और जानवरों से बचाव है, ऐसे इसमें खबरदारी की, विवेक की वाड़ बनानी पड़ती है। लोभ, मोह, विकार, वाहवाही, ये कहीं हमारा पौधा उखेड़ तो नहीं देगी। मान पुड़ी है जहर की, खाए सो मर जाए। कोई मान में गिरते हैं, कोई काम में गिरते हैं, कोई लोभ में गिरते हैं, कोई मोह में गिरते हैं, तो ये सब जानवर हैं। जानवर जैसे पौधा खा लेता है, ऐसे ही ये विकार हमारी साधना रूपी पौधा चट कर देते हैं। तो धैर्य होना चाहिए, धैर्य के साथ खबरदार! तो जिसकी सात्विक श्रद्धा होती है, उसके अंदर ये गुण अपने आप आ जाते हैं।
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