ईश्वर का दर्शन भाग-2 | आश्रम संध्या सत्संग 31-01-2026 सुबह
TIME STAMP INDEX
0:03 ईश्वर और आत्मा की एकता का बोध
0:38 सुखी होने की सहजता
0:47 ईश्वर प्राप्ति में उद्योग की भूल
1:03 नींद और जाग्रति का उदाहरण
1:18 करने की आदत और साधना की उलझन
1:39 ईश्वर की निकटता और निष्फुर अवस्था
2:05 मोजड़ी और पृथ्वी ढकने का उदाहरण (कहानी)
2:49 लालसा और प्राप्ति का रहस्य
3:16 संसार और ईश्वर की लालसा का भेद
3:56 गुरु दर्शन का उदाहरण (कहानी)
4:06 ईश्वर निर्माण का विषय नहीं
4:30 ईश्वर प्राप्ति की तीन बड़ी भूलें
5:10 नींद का उदाहरण और उद्योग त्याग
5:26 ज्ञानी की मौज अवस्था
6:10 अवस्था बनाम नाशवान अनुभव
6:40 माला जप का प्रयोजन
7:02 आनंदमयी मां का स्टेशन प्रसंग (कहानी)
7:38 आयास और कृत्रिमता की भूल
8:02 सुख और ईश्वर पाने का आयास
8:46 सुख रूप ईश्वर का रहस्य
9:02 आकृति कल्पना और अंतर्यामी ईश्वर
9:21 आज्ञा और अनकंडीशनल सरेंडर
10:00 अनकंडीशनल सरेंडर का सिद्धांत
10:46 सहारों का त्याग
11:13 बुद्धि और श्रद्धा के भेद
11:53 सुदामा और कृष्ण प्रसंग (कहानी)
12:21 माया और मायापति
12:39 नित्य ईश्वर दर्शन का बोध
13:20 निर्विषय सुख का स्वरूप
13:56 वस्तुओं में सुख का भ्रम
14:42 केवल लालसा से तत्व बोध
15:01 सांसारिक लाभ का धोखा
16:11 जो नहीं था वह नहीं हो जाएगा सिद्धांत
17:07 ईश्वर पाने की नहीं अभिमुख होने की बात
18:00 स्थिति और साक्षात्कार का भेद
19:14 संसार स्वप्न का विवेचन
20:15 शिव पार्वती संवाद और भजन भाव (भजन)
20:42 अभिमुखता और शांति
21:30 चार अवस्थाएं और तुरीय
22:00 शरीर संसार और साक्षी भाव
23:01 सरलता और कठिनता का भ्रम
23:35 कोलंबस उदाहरण (कहानी)
24:14 साधना के मार्गों की तुलना (कहानी)
25:09 सतगुरु कृपा और छलकना
25:39 आत्मा और ईश्वर की एकरसता
26:27 जानने की लालसा का महत्व
27:08 प्रार्थना और लालसा जागरण
27:40 अमिट स्वरूप और अखंड तत्व
28:02 शुद्धता की दबी हुई इच्छा
28:39 सत्संग का महत्त्व
इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:
0:03 यह बताया गया कि ईश्वर कहीं दूर नहीं बल्कि अपने ही आत्मा का नाम है और जब यह बोध हो जाए तो पाने छोड़ने की भाषा छूट जाती है।
0:38 सुखी होना इतना सरल है फिर भी लोग अनावश्यक रूप से परेशान रहते हैं और सुख को कठिन मान लेते हैं।
0:47 जैसे संसार के काम उद्योग से होते हैं वैसे ही लोग ईश्वर और सुख को भी उद्योग से पाना चाहते हैं और इसी से दूर हो जाते हैं।
1:03 नींद में कोई उद्योग नहीं होता फिर भी वह सबसे ताजगी देती है वैसे ही जाग्रति में भीतर का उद्योग छोड़ना है।
1:18 मन की करने की आदत के कारण कभी माला कभी ध्यान कभी भजन पकड़ता और छोड़ता रहता है।
1:39 ईश्वर एक रत्ती भी दूर नहीं है और अंत में निष्फुर अवस्था ही अंदर का ईश्वर है।
2:05 पूरी पृथ्वी को चमड़े से ढकना असंभव है लेकिन अपने पैरों में मोजड़ी पहनना सरल है वैसे ही दृष्टि बदलनी है (कहानी)।
2:49 जब तक नहीं मिला तब तक लालसा और मिल जाने पर लालसा का स्वतः शांत हो जाना बताया गया।
3:16 संसार की लालसा मिटे तो ईश्वर की लालसा भी छूट जाती है और ईश्वर स्वयं शेष रह जाता है।
3:56 गुरु दर्शन की लालसा न होने का उदाहरण देकर बोध की स्थिति समझाई गई (कहानी)।
4:06 ईश्वर कोई अवस्था या निर्माण की वस्तु नहीं है वह तो सदा मौजूद है केवल जानने का विषय है।
4:30 ईश्वर प्राप्ति कठिन मानना अपनी अयोग्यता मानना और कुछ करेंगे तब मिलेगा यह तीन बड़ी भूलें बताई गईं।
5:10 नींद के उदाहरण से कहा गया कि सब उद्योग छोड़ने से ही ताजगी और सुख आता है।
5:26 ज्ञानी संसार से सुख लेने का उद्योग छोड़ देता है इसलिए हर हाल में मौज में रहता है।
6:10 बनाई हुई अवस्था नाशवान होती है और जो अवस्था से मिले वह ईश्वर नहीं हो सकता।
6:40 माला और जप इसलिए हैं कि अंत में यह बोध हो जाए कि ईश्वर सदा निकट है।
7:02 आनंदमयी मां के स्टेशन प्रसंग से जीवन मुक्त अवस्था दिखाई गई (कहानी)।
7:38 सुखी होने के लिए किया गया आयास ही असली बाधा है और कृत्रिमता छोड़नी है।
8:02 जैसे सुख पाने का आयास छोड़ना है वैसे ही ईश्वर पाने का आयास भी छोड़ना है।
8:46 ईश्वर स्वयं परम सुख है और छोटे बड़े सुख छोड़ने से वही प्रकट होता है।
9:02 आकृति चतुर्भुज कल्पनाओं में उलझना माया है अंतर्यामी शुद्ध ईश्वर आकृति का विषय नहीं।
9:21 आज्ञा न मानने की असमर्थता से अनकंडीशनल सरेंडर का संकेत दिया गया।
10:00 शरीर मन बुद्धि के सहारे भी छोड़कर गुरु तत्व के सहारे जाना ही अनकंडीशनल सरेंडर है।
10:46 धन सत्ता कुटुंब बुद्धि जैसे सभी सहारे नाशवान हैं इसलिए परमात्मा के द्वार नहीं खुलते।
11:13 राजसी तामसी और सात्विक श्रद्धा का भेद समझाया गया।
11:53 सुदामा और कृष्ण के उदाहरण से सात्विक श्रद्धा की महिमा बताई गई (कहानी)।
12:21 ईश्वर माया का विषय नहीं बल्कि मायापति है और वही अपना आत्मा है।
12:39 हर रोज नींद में ईश्वर में ही विश्राम होता है इसलिए दर्शन नित्य है।
13:20 निर्विषय सुख और शांति ही ईश्वर का स्वरूप है।
13:56 वस्तुओं में सुख का भ्रम बताया गया और सुख को अपनी भाव तरंग कहा गया।
14:42 केवल तीव्र लालसा से बुद्धि सूक्ष्म होती है और तत्व में टिक जाती है।
15:01 धन सत्ता यश को लाभ मानना मनुष्य जन्म गवाने का धोखा बताया गया।
16:11 जो पहले नहीं था और मिला है वह एक दिन नहीं हो जाएगा यह सिद्धांत समझाया गया।
17:07 ईश्वर को पाना नहीं है केवल उसकी ओर अभिमुख होना है क्योंकि वह सदा मिला हुआ है।
18:00 बनाई हुई स्थिति साक्षात्कार नहीं है क्योंकि जो बनी है वह टूटेगी।
19:14 संसार को स्वप्न मान लेने से ही बेड़ा पार होने की बात कही गई।
20:15 शिव पार्वती संवाद के माध्यम से जगत को स्वप्न और हरि भजन को सत्य कहा गया (भजन)।
20:42 पद धन सत्ता छोड़ने से ही रात को शांति मिलने की बात कही गई।
21:30 जाग्रत स्वप्न सुषुप्त और तुरीय अवस्थाओं का संकेत दिया गया।
22:00 शरीर और संसार बदलने वाले हैं और देखने वाला साक्षी अमर है।
23:01 ईश्वर अभिमुख होना सरल है कठिन मानने से ही कठिन बनता है।
23:35 कोलंबस के उदाहरण से बताया कि मार्ग सरल हो जाए तो श्रम कम हो जाता है (कहानी)।
24:14 साधना मार्गों की नाव स्टीमर और हवाई जहाज से तुलना की गई (कहानी)।
25:09 सतगुरु की कृपा से छलकना भीतर का बोध है कोई बाहरी घटना नहीं।
25:39 आत्मा और ईश्वर एक रस हैं शरीर और संसार बदलते रहते हैं।
26:27 कैसे पाऊं कैसे जानूं यह तीव्र लालसा ही परमात्मा को प्रकट करती है।
27:08 संसार की लालसा जलाने और ईश्वर की लालसा जगाने की प्रार्थना बताई गई।
27:40 अमिट स्वरूप और अखंड तत्व को जानने की लालसा ही शेष रहती है।
28:02 शुद्धता की इच्छा भीतर दबी हुई है उसे जाग्रत करना ही साधना है।
28:39 सतत सत्संग का त्याग महान दुर्भाग्य और सत्संग का महत्त्व बताया गया।
Manual Transcription
आज, 31-01-26
ईश्वर, ईश्वर अब अपने से दूर है तो चाहिए। अब पता चल गया अपने आत्मा का नाम ही तो ईश्वर था। अब ईश्वर क्या कहेगा, यह बात को भी हमने छोड़ दिया। है मस्त पड़ा महिमा में अपनी गैर राम अभी और नहीं। वे राम हमारा कहीं और नहीं है कि उसको रिझाऊं। दुनिया की भी परवाह नहीं, स्वर्ग की भी परवाह नहीं, मौला की भी परवाह नहीं और परवाह नहीं की भी परवाह नहीं। नहीं परवाह है, ऐसी पकड़ भी हमारी नहीं है जा। इतना आसान है, इतना आसान है सुखी होना कि महाराज! हाय राम, लोग क्यों परेशान हैं, समझ में नहीं आता।
लोग समझते हैं कि जैसे संसार का उद्योग करने से संसार का काम होता है, ऐसे ही ईश्वर को या सुख को पाने के लिए भी कुछ उद्योग करें। जितना तुम उद्योग करते हो, उतना ईश्वर से दूर, सुख से दूर। सब उद्योग जब छोड़ते हो तो नींद कितनी फर्स्ट क्लास आती है। ऐसे ही जागृत में सब अंदर से उद्योग छोड़ दो।
एकदम ब्रह्मज्ञानी। अब भी इस समय महाराज, देर नहीं है। हमारे घुसा है खोपड़ी में भूत के कुछ करें, कुछ करें तो फिर भजन चिंतन छोड़ के फिर गप्पा ठोके। गप्पा छोड़ो, बोले माला करो, माला छोड़ो तो बोले ध्यान करो और संसार का तुच्छ करने की आदत है, उसी लिए माला करो, ध्यान करो। जब और करने की आदत नहीं है तो उसको भी छोड़ो। अब फिर देखो, ईश्वर आपसे एक रत्तिभर भी दूर नहीं हो सकता। लोग समझते हैं कि कुछ आकृति आएगी, कुछ ऐसे चतुर्भुजी हो जाएंगे, कुछ ये हो जाएंगे। वो भी आएंगे तो आखिर यही कहेंगे कि तत्वज्ञान ! अंदर का ईश्वर पा लें और अंदर का ईश्वर यह है, निष्फुर अवस्था। भाई जगत के ऊपर चादर बिछाने के लिए आपका प्रागट्य नहीं हुआ, लेकिन आप अपने पैरों में मोजड़ी, पहरो तो स्वतंत्र हैं। जगत को, पृथ्वी को चमड़े से ढाको तो आपके बस की बात नहीं है लाला। भगवत प्राप्ति के विषय में यह बात नहीं है कि उद्योग करूं, उद्योग करूं, नहीं है, नहीं है, नहीं है। लोग समझते हैं सांसारिक काम जैसे करने से होता है, ऐसे भगवान को प्राप्त करने के लिए भी कुछ करें, कुछ करें। अरे! कुछ संसार का करने की आदत है, उसी लिए भगवान को प्राप्त करने के लिए कुछ किया जाता है। आगे चल के पता चलता है कि अरे... ये भी छूटता है तब, ये यारा ही यारा है। यह गलत है कि मुझे उसकी आरजू है, जुस्तजू है। अगर मेरे से जुदा हो तो उसकी मेरे को जरूरत। मेरे दिल में धड़कन उसी की है तो अब उसको क्या खोजूं? मैं हूं ही नहीं, वही वह है तो उसको क्या खोजूं? भीतर की लालसा को खोज लूं, प्राप्ति करने के लिए। ईश्वर की प्राप्ति की लालसा नहीं होगी तो संसार की लालसा है। अब संसार की लालसा मिट गई तो ईश्वर की लालसा भी क्या करें? ईश्वर तो फिर स्वयं बच जाएंगे। नहीं मिला तब तक लालसा करो। मिल गया तो क्या लालसा करना? अब मैं आसाराम बापू का दर्शन करने की कभी लालसा नहीं करता हूं। भगवान की कसम! हजारों आदमी करते हैं और गुरु पूनम को धक्का मुक्की सहते हैं, आते हैं, ये करते हैं, लेकिन हमने कभी नहीं सोचा कि आसाराम बापू का दर्शन हो। क्यों? पता चल गया कि इसी को कहते हैं। ऐसे ही पता चल जाए कि ईश्वर इसी को कहते हैं।
संसार का काम तो करके कुछ निर्माण करेंगे, ऐसे ईश्वर प्राप्ति के लिए कुछ आप निर्माण करेंगे तो कोई अवस्था बनाएंगे, तो अवस्था होगी, ईश्वर नहीं होगा। ईश्वर तो बनाने का विषय नहीं है। ईश्वर तो मौजूद है। जब मौजूद है तो उसके लिए करना नहीं है, उसको जानना है। बात तो सीधी है। बड़े में बड़ा विघ्न है कि ये ईश्वर प्राप्ति कठिन है। दूसरा दुर्भाग्य यह है कि हमको नहीं हो सकता है। और तीसरी गलती यह है कि कुछ करें तब मिलेगा। अल्लाह! ये तीन गलतियों ने बस खाना खराब कर दिया। भोगियों का तो भोग में खाना खराब कर दिया, लेकिन भक्तों का इन तीन बातों ने खाना खराब कर दिया। दूसरी बात, हम योग्य नहीं हैं और तीसरी बात, कुछ करेंगे तब मिलेगा। नींद में क्या उद्योग करते हो तुम? सुबह इतने ताजे फ्रेश हो जाते हो। सब उद्योग छोड़ते हो, इसीलिए सुबह ताजे होते हो। ऐसे ही मन से सब उद्योग छोड़ दो। ओए, देखो तो ईश्वर ही ईश्वर। ज्ञानी देखो, जब देखो मौज में देखो क्या, कितना है, वो इसका, उसका, उसका प्रॉब्लम, उसका ये, उसकी मीटिंग, उसकी मीटिंग है। फिर भी देखा तो हर हाल में मौज। उद्योग छोड़ दिया है, संसार से सुख लेने का। इसीलिए सुख छलकता है। कहीं जाकर पाना नहीं क्योंकि वह हर देश में, हर काल में, हर वस्तु में है। सब वस्तु में है, सब जगह है, सब देश में है। मैन्युफैक्चरिंग करना नहीं और अमुक जगह पर है तो वहां जाकर पाएं, ऐसा भी तो नहीं। अमुक अवस्था में मिलता है, ऐसा भी तो नहीं। ऐसा कोई शर्त नहीं है कि अमुक अवस्था आएगी तब ईश्वर मिलेगा। हकीकत में अमुक अवस्था आए तब जो मिलेगा ना, वो नाशवान मिलेगा। अमुक अवस्था बनाकर जो मिलेगा वो नाशवान व्यक्ति होगा। वो कभी बिछड़ नहीं सकता, उसके बाप की ताकत नहीं है बिछड़े। अब अपने बाप की ताकत नहीं कि उससे अलग हो सके। ऐसा है। लेकिन ये बात बुद्धि में बैठती नहीं, इसलिए माला करो, जप करो। जप माला करने के बाद ये बात समझ में आ जाए तो हा! भूल जाओ संसार की बातों को, आयास छोड़ दो। कभी कभी तो याद करना पड़ता है कि खाना खाया कि नहीं खाया। आनंदमयी मां को रेलवे स्टेशन पर ले गए। पूछा कि माताजी कहां की टिकट लाऊं? मां काशी की लाऊं कि दिल्ली की टिकट ले आऊं, देहरादून की लाऊं। वो सोच में पड़ गई, भाई अब क्या पता, कहीं की भी ले आओ। है देख लो, ये जीवन मुक्त लोग। कोई आयास नहीं अपने और से। तुम लोग ऐसा नहीं करना आर्टिफिशियल। हम लोग आयास में लगे हैं और आयास भी लगे हैं सुखी होने के लिए। सुखी होने का आयास छोड़ दो। चलो, तभी भी ईश्वर प्राप्ति सरल हो जाएगी। सुख पाने की जो भी इच्छा होती है, उसको हटाओ। आयास, सुखी होने के लिए आयास न करो। देखो सुखी हो जाते हो कि नहीं। बोले, ईश्वर पाने का भी आयास न करें। हां, तो लाखों आदमी हैं, जो ईश्वर पाने का आयास नहीं करते, तो वो क्या जीवन मुक्त हो गए? ईश्वर पाने का आयास नहीं करते हैं, ये बात तो ठीक है, लेकिन और कितना आयास करते हैं? बीड़ी पीने का आयास करते हैं, चाय पीने का करते हैं, सट्टा खेलने का करते हैं। सुखी होने का तो आयास करते हैं ना। ईश्वर परम सुख रूप है तो छोटा सुख, बड़ा सुख, सब सुख को छोड़ दो तो परम सुख आ जाएगा। ईश्वर पाने का, ईश्वर सुख रूप है और सुख, सुख पाने का तो आयास करते हैं नास्तिक भी। सुख पाने का आयास ही ईश्वर से दूर ले जाता है। तो ईश्वर भी सुख रूप है। अंत में ईश्वर को पाने का आयास भी छोड़ दो तो ईश्वर, ईश्वर प्रकट हो जाता है और ईश्वर के बारे में सोच रखा है कि ऐसा होगा, चतुर्भुजी होगा, वरं ब्रूयात बोलेगा, वो सब माया विशिष्ट होगा। अंतर्यामी शुद्ध ईश्वर, ये सब आकृति वाकृति के झंझट में नहीं पड़ता है। आकृति जो होके आएगी, वो दृश्य होगी, वो तो द्रष्टा है।
इसमें बड़ी श्रद्धा है, तड़प भी बहुत है। मैंरे से बोले, बापू आप कोई आज्ञा करो।
मैं क्या आज्ञा, हमारी आज्ञा पालने वाला कोई पैदा ही नहीं हुआ। आज्ञा कोई मानने वाला मिलता ही नहीं।
बोले, बापू आप करके देखो, आज्ञा करके देखो। मैंने कहा, भाई, हमारी आज्ञा झेलने वाले कहां हैं? भोंय सुवाळुं भूखे मारूं, ऊपर थी मारूं मार, एटलूं करता हरि भजन तो करी ना कुनिहा। अनकंडीशनल सरेंडर। ये तो आगे चल के अपने शरीर का, मन का, बुद्धि के, निर्णय से भी आगे जाना पड़ता है। बुद्धि का भी सहारा छोड़ना पड़ता है, तब गुरु तत्व का सहारा पचता है। स्त्री का, पुरुष का, समाज का, कुटुंब का, नौकरी का, सेठ का, साहब का, इसका सहारा वो अंदर से ठुकरा दे। नौकरी करता है, लेकिन साहब का सहारा न रखे अंदर। ऐसे ही पत्नी का, पति का। अंत में अपनी बुद्धि के सहारे को भी आदमी जब ठुकराता है, तब अव्यक्त तत्व में प्रवेश होता है। हम लोगों को आदत पड़ गई है, सहारे बिना नहीं जीते। ये जो सहारे हैं, सब मरने वाले, मिटने वाले हैं। रुपयों के, पैसों के, धन के, सत्ता के, कुटुंब के, कबीलों के, ये सहारे सब मिटने वाले हैं। इसीलिए अमिट परमात्मा के द्वार नहीं खुलते हैं। बुद्धि का सहारा लेते हैं।
बुद्धि भी राजसी, तामसी का। सात्विक बुद्धि का सहारा भी थोड़े दिन तक ठीक है। राजसी बुद्धि, राजसी बुद्धि तो अपने ढंग का मापेगी, गूंथेगी। जो राजसी श्रद्धालु हैं ना, तामसी श्रद्धालु हैं, उनकी इच्छा के अनुसार होगा तो टिकेगी श्रद्धा, नहीं तो विरोध करेंगे। राजसी श्रद्धालु भी अपने अनुकूल होगा तो ठीक, नहीं तो फिर विरोध नहीं करेंगे, किनारा कर लेंगे। और सात्विक श्रद्धालु वाला अपने श्रद्धा के खिलाफ भी हुआ, व्यवहार, तभी भी वो अपने बुद्धि के अनुसार, अपनी धारणा के अनुसार नहीं हुआ, खिलाफ भी हुआ, तो भी बोले कोई बात नहीं, एमा शुं छे। सुदामा था सात्विक श्रद्धा वाला। आया था मांगने और कृष्ण ने दुशाला भी छीन लिया। बोले, भगवान कितने दयालु और फिर टनाटन कर दिया तो बोले, कितने दयालु! ये सात्विक श्रद्धा है। राजसी श्रद्धा है ना तो डांवांडोल हो जाती है और तामसी श्रद्धा है तो विरोध करती, फाइटिंग करती है, श्रद्धेय के प्रति।...
श्रद्धा घटती, बढ़ती, घटती, पिटती, खुटती रहती, खुटती बढ़ती। तो हम यह समझते हैं कि ईश्वर भी कोई आयास का विषय है। नहीं! आयास सब माया में होते हैं। ईश्वर माया पति है। और वह अपना आत्मा है। हर रोज ईश्वर का दर्शन होता है। अभी रात को जाएंगे, सोएंगे तो कहां? अपने बाप के पास सोएंगे। ईश्वर में ही तो सोएंगे अपन लोग, कहां जाएंगे? आत्मा में ही तो आराम करेंगे। पता नहीं कि यह है, इसीलिए झक मार रहे हैं। ईश्वर का दर्शन तो हर रोज होता है सबको। अभी भी हो रहा है। अभी भी हो रहा है, पता नहीं कि यह है। ओम, ओम, ओम!
निर्विषय जो सुख है, वह ईश्वर का है। निर्विषय जो शांति है, वह ईश्वर है। निर्विषय जो सुख है, वो परमात्मा का है। और वही विषयों के द्वारा भी जो सुख भासता है, तो परमात्मा का है। विषयों में सुख होता, तो दुकानें सुख से नाच उठती। सुख तो कोई देना नहीं चाहता।
दुकानों से वस्तुएं लेते हैं ना, तो वस्तुओं में सुख नहीं है। हम सुख देते हैं वस्तुओं को। ग्राहक खरीदने में सुखी होता है और व्यापारी बेचने में सुखी होता है। तो सुख तो उनके पास है। भाव तरंगित होते हैं। कितनी ऊंची बात है यह! वस्तुओं में, चीजों में सुख होता तो दुकानें सुख से नाच उठती। दुकानदार वो देता ही नहीं। वो बेच के पैसा लेके फिर अपनी कल्पनाओं को तदरूप करके सुखी होना चाहता है। हम लोग खरीद के कल्पनाओं को तदरूप करके सुखी हो रहे हैं। तो ये खरीद के, बेच के लेके जो कर रहे हैं ना, तो क्रिया करके जो सुख लिया जा रहा है ना, वो माया हो गई है। और जो शुद्ध रूप से उसको जान लिया था, निहाल हो गए। उसमें कुछ करना नहीं है। केवल लालसा हो। उसको पाने की तड़प हो। तो बुद्धि सूक्ष्म हो जाएगी, हम उसी में ठहर जाएंगे। सांसारिक उन्नति, सांसारिक लाभ ही वैसा घुस गया खोपड़ी में कि सांसारिक धन, सांसारिक सत्ताएँ, ये दिमाग में घुस गया कि ये लाभ है। हकीकत में ये धोखा है, मजूरी है। इसको लाभ मानते हैं मूर्ख लोग। धन को, सत्ता को, यश को, इसको लाभ मानते हैं। ये तो मनुष्य जन्म गंवाने की चीजें हैं, बर्बाद होने की चीजें हैं। जिसको अपन लोग लाभ मानते हैं, वो तो महा बंधन है, महा दुख की चीजें हैं, बेवकूफ बनाने की चीजें हैं। अपने को बेवकूफ बनाते हैं हम लोग।
स्त्री लाभ, पुत्र लाभ, यश लाभ, धन लाभ, शुभ लाभ अमृत चौघड़िया। काल में अपेक्षित है। सब धोखा है। मजूरी कर कर के मरो बस, मनुष्य जन्म गंवा देते हैं अपन लोग। इसने धन कमा लिया, इसने यश कमा लिया, इसने ये कमा लिया। अरे धूल के दो खोबे कमाए हैं। जो पहले नहीं था, वो पाया है। जो नहीं था, वो पाया है तो वो नहीं हो जाएगा। एक सिद्धांत है, जो पहले नहीं था और मिलेगा, वो फिर एक दिन नहीं हो जाएगा। पहले शरीर नहीं था, ठीक है, और बाद में नहीं रहेगा तो अभी कहां जा रहा है? नहीं की तरफ जा रहा है। हैं, रोज एक एक दिन नहीं की तरफ जा रहा है। नहीं होने की तरफ ही तो जा रहा है। ऐसे ही धन दौलत पहले नहीं था, सत्ता पहले नहीं थी, अभी मिली तो पाँच वर्ष के लिए हम मन गए। तो एक एक दिन नहीं की तरफ हो रहा है। जो चीज नहीं है, वो पाई तो क्या दो खोबे मिट्टी के पाए और क्या है? क्योंकि एक दिन नहीं हो जाएगा। स्त्री पाया, कब तक? पुत्र पाया, कब तक? देह पाया, कब तक? ईश्वर ऐसा नहीं कि ईश्वर नहीं है और ईश्वर पाना है। ईश्वर है, केवल उसके अभिमुख होना है। ईश्वर पाने की चीज नहीं है। जो पाया जाता है, वह खोया जाता है।
ईश्वर पाने की चीज नहीं है। ईश्वर तो पवा-पवाया, मिला मिलाया है। केवल उसके अभिमुख हो जाना है। संसार को पाते हैं, जिसने धन मार लिया, रुपए कमा लिए क्या खाक कमाया। जो पाया वह छोड़ के जाना है। मजूरी पाया, उसको संभालने की मजूरी पाया, खोपड़ी में टेंशन। और क्या पाया? खाक पाया, दो खोबे मिट्टी पाया। नींद हराम करने का पाया सामान। जो सब जगह मौजूद है, सदा मौजूद है, उसको जान लो तो बहादुरी की बात है। बाकी जो कुछ पाया है, तो फिर छोड़ के मरना है। उसको पाकर मनुष्य जन्म गंवाया तो क्या पाया? लगन करता था त्यार के आ सुखी थऊं शुं। ईश्वर सुख से लगन में जोई लो। छोकराओं मां शुं , ऐसे ही है, धोखा है। अपने साथ धोखा करना है और क्या है?... अब भागे भागे जा रहे हैं, धोखा में ही। मोड़ू थाय शे मोड़ू थाय शे जा रहे हैं देर हो रही है। जरा दुकान पर जाना, जरा इधर जाना, जरा ऑफिस में जाना, जरा ये करना है। भागे भागे जा रहे हैं। हईशो, हईशो । योग में, इसमें उसमें तो कुछ स्थिति बनाना पड़ता है। स्थिति कोई साक्षात्कार नहीं है, स्थिति अंतःकरण की होती है।
स्थिति बनाना एक बात है। बैठो रयो, ने मने भूख ना लगे, तरस ना लगे। हमारी स्थिति थई गई। समाधि लग गई। जो लगी है, वो टूटने की तरफ ही तो जा रही है। जो बनी है ना, ईश्वर ऐसा बनी चीज नहीं है। इतना तो पक्का करें कि सब सपना है। है तो सपना ही, बचपन सपना। और पुनीत आश्रम के वहां मकान लिया, तब सपना और मकान लेकर दस कुछ लेकर जेठालाल को देके चला गया। और अपने में गया, वो भी सपना। लड़की की शादी हो रही है। साईं दया करना हो गई। भगवान, वो भी सपना। अपनी शादी हुई थी, तभी भी देखो तो अभी सपना। रोज सपना होता है यार, तुम मान लो तो बेड़ा पार हो जाए नी। श्री राम! श्री राम।
बापू, बापू अभी आपको नहीं छोडूंगा। नामदान लूंगा। अभी मेरे को गुरु मंत्र चाहिए, ऐसा सोच के आए थे। आज देखो तो वो बात सपना हो गई। भगवान शंकर का अनुभव तो अपना अनुभव मना लो। शिवजी ने पार्वती को कहा -
उमा कहूं मैं अनुभव अपना,
उमा कहूं मैं अनुभव अपना।
सत्य हरि भजन जगत सब स्वप्ना।
सत्य हरि भजन।
अब सपने जैसे जगत को सत्य समझ के फाफा मारते हैं। सत्य तो अपना स्वरूप है, हरि भगवान और जगत है स्वप्ना। स्वप्ने का तो मान रहे सच्चा और जो सच्चा है उसका पता नहीं। बनते होशियार। अभिमुख हो जाएं, ईश्वर की लालसा करो। संसार की लालसा करो, फिर यत्न करो और प्रारब्ध हो, तब संसार की चीजें मिलती है। मिलती क्या है? खाक है छूटने के लिए मिलती है, मजूरी करने के लिए। उन सबको रात को रोज को छोड़ के भूलो, तब शांति मिलती है। चाहे कितना बड़ा पद, कितनी बड़ी सत्ता, कितना बड़ा धन, सब को छोड़ो। ये सब छोड़ो, तब इस रात को शांति मिलती है। आप समझ गए ये कितनी उंगली है? चार। चार, चार, चार। जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या। वो ध्यान क्या? तो ध्यान में दिखा कि भगवान राम ने एक तीर छोड़ा, दूसरा छोड़ा, तीसरा छोड़ा। फिर थोड़ी देर के बाद चौथा छोड़ा। तो ये तीन अवस्था रहती है मन में और मन, उस मन को भी छोड़ दो। लगता है कि हम संसार में रह रहे हैं। आप संसार में नहीं रह रहे हैं हजूर! संसार है बदलने वाला, आप हैं अब बदल। संसार और शरीर है, रोगी होने वाला। आप देखने वाले निरोग अवस्था को भी देखने वाले हैं। शरीर मरने वाला है, आप अमर हैं। शरीर अनेक रस है। बाल्यावस्था, युवावस्था, आप एक रस है। आप संसार और शरीर के साथ कहां रह रहे हैं? रह रहे हैं।
लगता है कि संसार में रहता हूं। संसार के साथ रहता हूं। संसार के साथ ब्रह्मा जी भी नहीं रह सकते तो आप कैसे रह सकते हैं? चिपक गए मान्यता से और मान्यता फिरा दे तो अभी साक्षात्कार! लो। आसान है कि नहीं? आसान है कि नहीं? भाई बोलो, आसान है तो करके दिखाओ, फिर जरा। करके दिखाना, करने लगे तो कठिन हो जाएगा। समझ लो। तड़प हो, इस बात को, ईश्वर अभिमुख होने को तो आसान है, कठिन नहीं है। कठिन, कठिन करके मुसीबत कर दिया अपने लिए। ऐसी, ऐसी स्थिति होना चाहिए। महावीर ने इतना कड़ा तप किया, हो क्या? भाई, पहले तो जब सतगुरु या ऐसा साफ सत्संग नहीं मिलता तो मजूरी करना पड़ता है। मजूरी करके किसी ने कोई चीज पा ली, कोलंबस ने परिश्रम किया, अमेरिका खोज लिया। अब सबको थोड़े उतना परिश्रम करके अमेरिका मिलेगा। कोलंबस को अमेरिका खोजने में जितना परिश्रम पड़ा, उतना सब लोग परिश्रम करें, तभी अमेरिका होगा, उनके लिए क्या? ऐसे ही है।
अब कोई फिर जाए दरिया के रास्ते से, छोटी बोट लेकर धक्के खाते-खाते छह महीने में पहुंचे, उसकी मौज की बात है। स्टीमर में जाए, चालीस दिन में पहुंचे, उसकी मौज है। हवाई जहाज में जाए, उसकी मौज है। ऐसे ही है, ये भी ऐसे ही है। कोई फिर जप-तप के रास्ते, निष्काम कर्म योग के रास्ते जाए, कोई सत्संग और सेवा के रास्ते चला जाए। ये फटाफट पहुंचना है। सतगुरु का सहारा, सत्संग, सेवा ये हवाई जहाज का मार्ग है।... अपना यात्रा, तीर्थ, टोने, माला, ये वो कर्म कर्मठ स्टीमर का मार्ग है और तीर्थों में भटकना ये नावड़ी का मार्ग है। और गुरु छलक जाए, ये रॉकेट का मार्ग है। उठकर सिर पर हाथ रखेगा तब छलका। वो बोल रहे हैं, आनंद में आकर इनको बोध हो जाए, ऐसा संकल्प दोहरा रहे हैं अंदर, यही छलकना हुआ। सतगुरु का छलकना कोई ऐसा थोड़े है कि जैसे घड़ा छलकता है और पानी गिर पड़ता है, ऐसे कोई आत्मा गिर पड़ेगा। ऐसा तो ये है छलकना, सदा परमात्मा में थी, है और रहेगी। आप पहले भी परमात्मा में थे, अजू अन्नदाता, कृपा करो, ये मान लो, बस कृपा करो। आप पहले भी ईश्वर में थे, अब भी हो और बाद में भी रहोगे। संसार में आप पहले भी नहीं थे, अभी भी नहीं हो। ये तो बदलता जा रहा है। आप वही के वही हो। सोचो आप, आप शरीर बदला तो आप बदले क्या? वही के वही हैं, वही के वही हैं तो एक रस हैं, ईश्वर एक रस है, आप एक रस है, आप और ईश्वर एक हुए हैं। शरीर बदलता है, संसार बदलता है तो शरीर और संसार एक हुआ। तो जो बदलता है, वो बदलता है। जो घूमती है, सो घूमती है। जो खड़ा है, सो खड़ा है। मैं एक रस हूं, पक्का कर लो। पक्का नहीं भी करते, तभी भी कहीं एक रस हो। कभी कोई दो रस थोड़े बनाते। नहीं जानते तभी भी आप वही हो। जानते तो जरा लाभ होता है। क्या करूं, कैसे करूं, कैसे पा लूं, कैसे समझ लूं? यह लालसा जोरदार हो, इससे परमात्मा प्रकट हो जाए। संसार की लालसा होती है ना, तो फिर उसमें उद्यम भी करना पड़ता है। और प्रारब्ध भी चाहिए, लालसा भी चाहिए। ईश्वर प्राप्ति के लिए केवल लालसा काफी है। वो अंतर्यामी है, देखता है, तुम्हारी लालसा है तो वो प्रकट हो जाएगा। फिर गुरु का वचन आते ही तुरंत पर्दा हटने लगेगा। हे प्रभु! हमको संसार की लालसा है तो तू जला दे और तेरी लालसा नहीं है तो पैदा कर दे, बस। संसार की लालसाएं उठे तो तू हमारी पूरी न कर, उनको जला दे। नाथ, इतनी दया कर और तेरे लिए तड़प नहीं है तो वो जगा दे। ऐसा प्रार्थना करें, तभी भी वो तैयार है। ईश्वर पाने की लालसा लगते ही दूसरी लालसा छूट जाती है। अब दूसरी लालसा छूटी तो फिर ईश्वर प्रगट ही हो जाएगा। फिर देर नहीं होती। हमारा स्वरूप तो अमिट है। अमिट स्वरूप को जानने की लालसा, अखंड तत्व को जानने की लालसा पैदा उसी लिए की जाती है कि और लालसाएं हट जाए। हकीकत में तो परमात्मा की लालसा भी है, लेकिन दबी हुई है। परमात्मा सुखरूप है, शुद्ध है तो हम भी सुख चाहते हैं। दूसरे हमारे से शुद्ध व्यवहार करें, ऐसा भी चाहते हैं। हम शुद्ध दिखें ऐसा भी हम चाहते हैं। चाहे अंदर कुछ भी कोश-कबाड़े करते हों, लेकिन हम दिखें शुद्ध, ऐसा भी तो चाहते हैं। ऑफिस में, दुकान में, घर में, मंदिर में, आश्रम में, कहीं भी हम चाहते तो हैं हम शुद्ध दिखें, ये भी लेकिन दबी हुई है। ऊपर से अशुद्ध करते हुए भी अंदर से तो दबी हुई है इच्छा, शुद्ध शुद्ध चाहे। उसको जोर से जगाना है, बस और कुछ करना नहीं। कठिन नहीं है, कठिन नहीं है। सतत सत्संग करें तो गोपद की नाई। सत्संग का त्याग महान पापों का फल है। सत्संग से दूर होना, समझो अपने दुर्भाग्य को बुलाना है।
🙏ॐ गुरु ॐ 🙏
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