सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

स्वीकृति और सावधानी - संध्या सत्संग 23-02-2026 सुबह

 स्वीकृति और सावधानी - संध्या सत्संग 23-02-2026 सुबह

TIME STAMP INDEX    

0:01 साधन में श्रम नहीं सुकृति
0:20 मन की जिद और ध्यान में पुनरावृत्ति
0:48 सुकृति और सावधानी का महत्व
1:17 तुच्छ इच्छा और साधन की थकान
1:35 मनमानी और सृष्टि का नियम
2:07 व्यवहार में सावधानी ही साधन
3:02 खुशामद और राग द्वेष
3:28 सुकृति से सहज साधन
4:40 अहंकार न पोषना सावधानी
5:19 सेवा का भाव और राजकुमार [कथा]
6:22 समय और व्यवहार की सावधानी
7:12 श्रम व्यर्थ यदि सुकृति नहीं
8:06 राग द्वेष से अशांति
9:34 चिंतन का प्रभाव
10:20 अभ्यास योग और अनन्यता
11:18 चित्त की शुद्धि और साक्षी भाव
12:39 दो सूत्र सुकृति और सावधानी
13:24 शक्ति अनुसार साधन
14:01 तीन दिन का प्रयोग
15:02 विचारों की सुकृति
15:25 सड़क किनारे घर का दृष्टांत [उदाहरण]
17:18 काम क्रोध और सावधानी
18:14 पांच विकार और तुलसी वचन [उदाहरण]
19:16 इंद्रिय मन बुद्धि का संबंध
21:16 ध्यान और संध्या
22:47 रोग भय में सावधानी
24:00 शाश्वत संबंध परमात्मा से
25:21 बाह्य आडंबर और अंतर्यामी
25:25 शरणागति श्लोक [प्रशंसा]
26:26 सेवा की शुद्ध भावना
27:08 वाहवाही और मधुर स्वभाव
28:00 बुद्धू हलवाई का बेटा [कथा]
29:33 अहम की अस्वीकृति



इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:01 अरे क्या करूं शक्ति नहीं है ऐसा कभी मत सोचो। साधन में श्रम की आवश्यकता नहीं है, शक्ति की जरूरत नहीं है। केवल सुकृति की जरूरत है और सावधानी की जरूरत है।

0:20 जब मन में ठान लेते हैं कि मैं किसी की बात नहीं मानूंगा तो वही बात ध्यान में दोहरती रहती है। इसलिए साधन में जिद नहीं सुकृति चाहिए।

0:48 साधन करने में श्रम नहीं सुकृति है। जो तेरी मर्जी सो मेरी मर्जी। जहां सुकृति नहीं वहां लोग साधन करके भी थक जाते हैं और बदलाहट नहीं आती।

1:17 भजन श्रेष्ठ का करते हैं और चाहते तुच्छ हैं। भगवान तुच्छ देकर फसाना नहीं चाहता। इसलिए सुकृति का अभाव है।

1:35 सबके मन की होने लगे तो संसार चल ही नहीं सकता। इसलिए अपनी मनमानी छोड़कर उसकी हां में हां मिलाओ।

2:07 व्यवहार में सावधानी भी साधन है। आश्रम में गंदगी करना, राग द्वेष करना यह असावधानी है। धर्म स्थान पर अहम पोषना साधन नहीं है।

3:02 जो खुशामद करे वह सोने जैसा लगे और जो सत्य कहे वह पीतल जैसा लगे यह सावधानी की कमी है। राग द्वेष से साधन बिगड़ता है।

3:28 यदि सावधानी बरतें तो साधन सहज हो जाएगा। सुकृति दे दो ईश्वर और गुरु के अनुभव में सहमत हो जाओ।

4:40 सावधानी यह कि अहंकार नहीं पोषना, राग द्वेष नहीं पोषना, शत्रु मित्र भाव नहीं बढ़ाना। मंदिर में जाकर भी दोष देखना असावधानी है।

5:19 सेवा करनी है तो जहां हो कर सकते हो। पहले सेवा लेने वाले नहीं मिलते थे। राजकुमार ने अपना चाबुक स्वयं उठाया कि मैं तुम्हारी सेवा क्यों लूं जब मैं समर्थ हूं। [कथा]

6:22 जिनसे बात करते हैं क्या उतना जरूरी है यह देखो। समय कहां दे रहे हो यह देखो। केवल सावधानी और सुकृति से साधन हो जाता है।

7:12 चाहे 40 साल भजन करो या 40 जन्म करो यदि सुकृति और सावधानी नहीं तो कुछ हाथ नहीं लगेगा। बाहरी तप से अहम पोषित होगा।

8:06 एंटी ग्रुप बनाना, राग द्वेष रखना, यही असावधानी और असुकृति का फल है। इसी से परिवार समाज राज्य में अशांति फैलती है।

9:34 जैसा चिंतन वैसा चित्त। संसार का चिंतन राग या द्वेष लाएगा। भगवान का चिंतन भगवान को हृदय में लाएगा।

10:20 अभ्यास योग से चित्त अनन्य बनाओ। जैसे अलग अलग यंत्रों में एक ही बिजली है वैसे सबमें एक ही सत्ता है। शत्रु में भी वही है।

11:18 चित्त दूषित न हो यह सावधानी है। सुख दुख के भोगी मत बनो, दृष्टा बनो। तब दुख दबाएगा नहीं।

12:39 दो ही सूत्र हैं सुकृति और सावधानी। श्रम साध्य नहीं है। शक्ति जितनी है उतनी से करो, पर शक्ति व्यर्थ न बिखरे इसकी सावधानी रखो।

13:24 25 वोल्ट हो तो 25 का ही बल्ब जलाओ। अपनी योग्यता अनुसार साधन करो और व्यर्थ आकर्षण में शक्ति न खोओ।

14:01 तीन दिन केवल सुकृति और सावधानी का अभ्यास करो। जो वर्षों में न मिला वह शांति प्रसन्नता मिल सकती है।

15:02 विचार आ रहे हैं तो उनसे लड़ो मत। सुकृति दो कि आ रहा है मैं देख रहा हूं। तब विचार शांत होंगे।

15:25 सड़क किनारे घर हो तो गाड़ियां गुजरती रहती हैं। आदत पड़ जाती है। ऐसे ही अनुकूल प्रतिकूल भाव आते जाते हैं। तुम आत्मा में बैठो। [उदाहरण]

17:18 काम क्रोध लोभ इसलिए आते हैं कि उसकी हां में हां नहीं की। राम का चिंतन नहीं तो विकार आते हैं। सावधानी से संबंध बदल दो तो विकार बदल जाएंगे।

18:14 पतंग रूप में जलता है, हाथी स्पर्श में फंसता है। एक एक विकार से जीव नष्ट होता है तो पांच विकारों में गिरा तो क्या हाल होगा। विकारों की हां में हां मत करो। [उदाहरण]

19:16 इंद्रिय मन बुद्धि का खेल है। मन इंद्रियों की ओर गया तो पतन, बुद्धि की ओर गया तो उत्थान। बुद्धि को बलवान करो बुद्धिदाता की हां में हां मिलाकर।

21:16 ध्यान और संध्या भगवान की स्मृति जगाने के लिए है। प्राणायाम जप से तन मन स्वस्थ होता है और साक्षी भाव जागता है।

22:47 रोग आए तो लंबा श्वास लो हरि ओमकार जपो। बीमारी शरीर को है मुझे नहीं। भय चिंता मन में है मैं साक्षी हूं।

24:00 ईश्वर से संबंध जोड़ना नहीं है वह शाश्वत है। शरीर संसार से माना हुआ संबंध है। तरंग और पानी जैसा जीव और परमात्मा का संबंध है।

25:21 बाहरी माला व्रत यात्रा सबको मुबारक। तुम अंतर्यामी में जाओ जहां जाने के बाद कहीं जाना नहीं।

25:25 सो साहिब सदा हजूर है। जो दूर जानता है वह अंधा है। घट में साक्षी चैतन्य है उसकी शरण जाओ। तमेव शरणम गच्छ सर्व भावेन। [प्रशंसा]

26:26 शरीर से जो कर्म करो अंतर्यामी की प्रसन्नता के लिए करो। नाम या प्रशंसा के लिए नहीं। सावधानी से सेवा में चार चांद लगेंगे।

27:08 जो वाहवाही के लिए सेवा करते हैं उनका स्वभाव तोचड़ा हो जाता है। जो भगवान की प्रसन्नता के लिए करते हैं उनका स्वभाव मधुर हो जाता है।

28:00 बुद्धू हलवाई का बेटा काशी पढ़ने गया। सब करता था पर दो कमी थी अपनी अकल नहीं और गुरु की बात नहीं मानता। [कथा]

29:33 वैसे ही हम शास्त्र और संत की बात नहीं मानते। मन की सेवा करेंगे तो अहम पुष्ट होगा। गुरु शास्त्र को स्वीकृति और अहम को अस्वीकृति कर दो तो कल्याण हो जाएगा।




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था

 संकल्प - विकल्प रहित परम शांत अवस्था सत्संग के मुख्य अंश : राम में विश्रांति पाने से सबकुछ सम्भव हो जाता है । करने, जानने और मानने की शक्ति...