शुक्रवार, 16 मई 2025

Sukshm Gyaan part- 2 (सुक्ष्म ज्ञान भाग-2 आश्रम संध्या सत्संग 15-02-2026 सुबह)



 सुक्ष्म ज्ञान भाग-2 आश्रम संध्या सत्संग 15-02-2026 सुबह

TIME STAMP INDEX 

0:04 – ब्रह्म बोध और जगत बोध का अंतर
0:34 – ब्राह्मी स्थिति और कर्तव्य का अभाव
1:36 – वास्तविक मंगल क्या है
2:24 – (कहानी) जेल और चार दाताओं का प्रसंग
4:22 – अस्त्वापादक और अभानापादक आवरण
5:26 – सिद्धियों के प्रकार
6:20 – चांगदेव और ज्ञानेश्वर प्रसंग
7:05 – ब्रह्म बोध की महिमा
8:22 – ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों का जीवन
9:50 – संत टोपनदास प्रसंग
13:36 – वशिष्ठ का उपदेश और ब्रह्म अभ्यास
15:12 – (कथा) करकटी राक्षसी का तप
17:44 – करकटी और राजा का संवाद
19:20 – चिदणु के प्रश्न
23:04 – राजा द्वारा चिदणु का उत्तर
28:44 – नेति नेति और चैतन्य का रहस्य
29:52 – करकटी का सत्संग और परिवर्तन


इंडेक्स के अनुसार कंटेंट:

0:04 ब्रह्म बोध और जगत बोध अलग हैं। जगत बोध तीन प्रकार का होता है सात्विक, राजस और तामस। ब्रह्म बोध में एक ही परमात्मा का ज्ञान, ध्यान और चिंतन रहता है।

0:34 ब्राह्मी स्थिति प्राप्त हो जाए तो उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं रहता। वह लोक उद्धार भी कर्तव्य से नहीं करता, उसका स्वनिर्मित विनोद होता है। साधक का कर्तव्य साधना है, गृहस्थ का कर्तव्य गृहस्थ धर्म निभाना है, पर ज्ञानी ब्रह्म स्वरूप होता है।

1:36 सच्चा मंगल वस्तुएं बांटने से नहीं होता। किसी को सुविधा देना सात्विक कार्य है, पर उसे परम सुख देना और बंधन से मुक्त करना सर्वोच्च मंगल है।

2:24 (कहानी) जेल में तीन सेठों ने कैदियों को भोजन, शरबत और कपड़े दिए। चौथे महापुरुष ने ताले की चाबी दे दी और सबको मुक्त कर दिया। स्वतंत्रता सबसे बड़ा दान है। ऐसे ही ब्रह्म बोध संसार रूपी जेल से मुक्ति देता है।

4:22 दो आवरण बताए जाते हैं। अस्त्वापादक आवरण जिसमें ईश्वर के अस्तित्व पर ही संदेह रहता है। अभानापादक आवरण जिसमें मानते हैं पर अनुभव नहीं होता। शास्त्र से पहला हटता है और सद्गुरु व अभ्यास से दूसरा हटता है।

5:26 सिद्ध दो प्रकार के होते हैं। एक योग सिद्धि वाले, दूसरे तत्व ज्ञान से सिद्ध। योग सिद्धि ऊंची है पर साक्षात्कार की सिद्धि सबसे श्रेष्ठ है।

6:20 चांगदेव के पास योग सिद्धियां थीं, मृत्यु को टाल देते थे। पर ज्ञानेश्वर की कृपा से उन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ। तत्व ज्ञान के बिना योग सिद्धि अधूरी है।

7:05 ब्रह्म बोध की महिमा ऐसी है कि ब्रह्मवेत्ता की कृपा से तुच्छ जीव भी उच्च गति पा सकता है। ब्रह्म ज्ञानी की दृष्टि से भी सद्गति मिलती है।

8:22 ऐसे महापुरुष साधारण वेश में रहते हैं। गरीबी में भी सम्राट समान होते हैं। पागल जैसे दिखें या राजा जैसे, भीतर से ब्रह्म में स्थित रहते हैं।

9:50 संत टोपनदास घर में रहते, बाजार से सब्जी लाते और शाम को सत्संग करते। जब उनका पोता मरा तो वे रोए। लोगों को आश्चर्य हुआ। बाद में समझाया कि परिवार को संभालने के लिए समझकर रोया ताकि घर में संतुलन रहे। उनका ब्रह्म ज्ञान अडिग था।

13:36 वशिष्ठ जी कहते हैं कि जिज्ञासु को अभानापादक आवरण हटाने के लिए ब्रह्म अभ्यास करना चाहिए। चलते फिरते, खाते पीते ब्रह्म चिंतन से चित्त ब्रह्ममय होता है।

15:12 (कथा) करकटी राक्षसी तृप्त नहीं होती थी। तप करके वरदान पाया पर अंत में ध्यान से उसका हृदय शुद्ध हुआ। इच्छा समाप्त हुई और शांति मिली।

17:44 करकटी ने राजा और मंत्री को खाने से पहले उनके ज्ञान की परीक्षा लेनी चाही। उसने भयानक रूप धारण कर प्रश्न पूछे।

19:20 उसने पूछा ऐसा कौन सा चिदणु है जो इंद्रियों से परे है, जो प्रकाश और अंधकार दोनों को प्रकाशित करता है, जिसे पाए बिना सम्राट भी कंगाल हैं और जिसे पाकर कंगाल भी पूज्य हो जाते हैं।

23:04 राजा ने उत्तर दिया कि वही परमात्मा चिदणु सबका आधार है। वह सूक्ष्मतम होकर भी व्यापक है। जैसे सूर्य से सब जीव जुड़े हैं वैसे ही सब उस परमात्मा से जुड़े हैं।

28:44 नेति नेति कहने पर भी जो शेष रहता है वही चैतन्य है। गहरी नींद में भी जो आनंद अनुभव होता है वही चिदणु का स्पर्श है। प्रलय में भी वही रहता है।

29:52 करकटी ने जाना कि राजा आत्मवेत्ता है। उसने संग की इच्छा जताई। राजा ने कहा पापियों को भक्षण कर और सत्संग कर। इस प्रकार वह राक्षसी भी ज्ञान मार्ग पर अग्रसर हुई।


 Manual Transcription 

 

(Bapuji satsang 30/3/1993 ahmedavad) 

    0:02 ब्रह्म बोध और जगत बोध  जगतबोध में तीन प्रकार होते हैं 0:09 सात्विक, राजस्व, और तमस बुद्धि के अनुसार जगत को ऐसा ही देखेगा सोचेगा। (ब्रह्म 0:16 बोध में) ब्रह्म बोध  में एक ही ब्रह्म परमात्मा को 0:24 पाने  का ब्रह्मा ज्ञान ,ब्रह्मा ध्यान, ब्रह्मा 0:35 चिंतन। ब्राह्मी स्तिथि एक बार प्राप्त हो जाए, तो फिर उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। न तस्य कार्यम विधते।उसके लिए कोइ कर्तव्य नही, लोगो के उद्धार करना वो कर्तव्य नही, उसका स्व निर्मित विनोद है। साधक का कर्तव्य है साधना। गृहस्थी का कर्तव्य है गृहस्थी गाड़ा चलाना, गृहस्थी अपने को साधक भी मानता है तो साधना करना चाहिए। लेकिन ज्ञानी अपने को। ब्रह्म मानता है, ब्रह्म का कोई कर्तव्य नही होता | बोले 1:09 संत महात्मा का ये कर्तव्य है संत महात्माओ का वो कर्तव्य है,  उनको पता ही नहीं संतत्व का।1:15 सारे कर्तव्यो  से पार जो पहुंचा है उसीके ही वासनाओ का अंत हो गया है, जिसकी  वासनाओ का अंत हो गया उसके कर्तव्यों का अंत हो गया है , वह अनंत से जुड़ गया है। 1:28 फिर भी ऐसे पुरुष संसार में कुछ करते हुए दिखते हैं तो यह उनका स्वनिर्मित विनोद है, 1:34 और ऐसे स्वनिर्मित विनोद वाले ब्रह्मवताओं के द्वारा ही जगत का स्थाई मंगल हुआ है। 1:43 वास्तविक मंगल हुआ। 1:48 बाकी तो ऐहिक वस्तु कोई किसी को दिला ऐहिक सुविधा दे दे ऐसे तो कई सात्विक कार्यकर्ता होंगे ,मगर  वास्तविक चीज तो 1:56 उन्ही वास्तविक तत्वों को पाए हुए महापुरुषों के द्वारा ही समाज में 2:03 बटी है। व्यक्ति को सुख सुविधाये एहिक वस्तु देना 2:09 उसकी अपेक्षा उसको ऐहिक वस्तु के बिना भी परम सुख देना बहुत ऊंची चीज है | 2:16


     एक छोटी कहानी है। किसी जेल में धर्मात्मा सेठ गया, कैदी लोग बिचारे रूखी सुखी खाते दया आ गई, सबको मेवा मिठाई मंगाके खूब जिमाया, 2:30 कैदी बड़े खुश हुए। दूसरे सेठको पता चला की, अपने भी कुछ नाम करूँ , वह सेठ गर्मियों के दिन में गया देखा की 2:38 कैदियों को पानी ठंडा नहीं मिलता और खरा पानी इधर का, शक्कर मंगवाई ,बर्फ मंगवाई ,शरबत पीलाया दिन भर खूब पियो ,कैदी बड़े खुश हुए। 2:51  तीसरा सेठ जाडो में गया ठंड में ,किसी को स्वेटर दिया, तो किसी को मोजे दिए ,तो किसी को कंबल दिया, तो किसी को चादर 2:57 दिया, तो किसी को कुछ कैदी  बड़े खुश हुए ।


    एक नए भोजन करवाया, दूसरे नए सरबत पिलाया, तीसरे नए गर्म कपड़े दिए 3:04  चौथा एक महापुरुष भी चला गया किसी दिन जेल में, ओर उसने कहा कि लो यह चाभी ओर वो है ताले घुमाओ ओर अपना अपना घर पहुच जाओ। 3:22 सम्राट को, सम्राट का गुरु रहा होगा, कुछ रहा होगा, सम्राट को किसी बात पर राजी कर लिया, उस महापुरूप ने ओर कुछ नही दीया, न भोजन करवाया, न कपडे दिए,न शरबत पिलाया, केवल चाभी दिखा दी।3:40 अब उन तीन दाताओं की अपेक्षा चौथा दाता  3:46 सर्वोपरि माना जाएगा , क्योंकि ताले ही खोल दिए जेल  में बैठकर शरबत 3:52 पीने की अपेक्षा, स्वतंत्र घर जाना, स्वतंत्र हो जाना बहुत ऊंचा है।


    3:58 ऐसे इस देह रूपी और संसार रूपी जेल में बैठकर चाहे स्वर्ग का सुख भोगना यहाँ, यहां का 4:04 सुख भोगना ,उसकी अपेक्षा ब्रह्म बोध हो जाना और ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार 4:10 कर लेना अंनत अनंत गुना ऊंचा होताहै।

तो एक ब्रह्म बोध होता है, दूसरा 4:16 जगत बोध  होता है ।चित की 2 धारा होती है, तो ब्रह्म बोध की तरफ जिसकी धारा चलती है, तो पहले उसको 2 आवरण समजाये जाते है, अस्तवापादक आवरण और अभानापादक आवरण।


    अस्तावा पादक आवरण 4:38 इस्वर है की नहीं , नहीं है  4:44 पता नही कैसा है , कोई बोलेगा साकार है, कोई निराकार है, कोई कैसा है , पता ही नही । लेकिन जिसने वेदांत सुना है, सदगुरु के चरनों पहुचा हैं, वो   समझता है कि   ईश्वर है ,वो आत्मा है, और अभी 4:52 है, यहां है, मेरे पास, मेरे साथ है। ये वो महसूस करेगा फिर भी अनुभव नही हो रहा है। अनुभव नही हो रहा है ये अभानापादक आवरण हैं।


     5:03 तो अस्तावा पादक आवरण वेदांत शास्त्र के उपदेश से दूर हो जाता है, और अभानापादक 5:10 आवरण सद्गुरु का सानिध्य से, ब्रह्मा अभ्यास करने से, आभानापादक आवरण हट जाता है, 5:18 और साधक  सिद्ध बन जाता है।

सिद्ध भी दो प्रकार के होते है, एक योग की सिद्धियो से सिद्ध पुरुष होते है, योग की सिद्धियो से तो कोई तांत्रिक सिद्धियों, से   5:32से  कोई मानसिक शक्तियों से वह नहीं उत्तम सिद्धों की बात है। तो एक योग की सिद्धियो से सिद्ध होते हैं,  अष्ट सिद्धि वाले, जैसे  हनुमान जी थे , व्यास जी थे, दूसरा होता है तत्व ज्ञान हो गया, तो तत्व ज्ञान की सिद्धि   5:50 साक्षात्कार की सिद्धि ये सबसे ऊंची हैं। साक्षात्कार की सिद्धि हो गयी उसके पास योग सिद्धि हो चाहे न हो, कोई उसको फर्क नही पड़ता, 6:02  लेकिन योग सिद्धि वाले को साक्षात्कार की सिद्धि नहीं है तो अधूरा है।

   

     योग सिद्धि वाले को ब्रह्म बोध नही है तो वह अधूरा है । चागदेव के पास योग सिद्धिया थी ।6:15 मौत आए उसके पहले वो अपना प्राण चढ़ा देते शहस्त्र सार में दस दिन 6:21 की समाधि करते मौत का समय गुजर जाता, फिर अपना 100 वर्ष आयुष्य बना लेते 14 बार मौत को ठेल दिया, लेकिम तत्व ज्ञान की6:33 सिद्धि नहीं थी, 22 वर्ष के ज्ञानेश्वर महाराज और 1400 वर्ष के 6:40 चांगदेव महाराज, 1400 वर्ष का चेला और 22 वर्ष का ज्ञानेश्वर गुरु बने। ज्ञानेश्वर की कृपा से फिर चांगदेव को आत्मसाक्षात्कार हुआ। तो ये ब्रह्म बोध ऊँचे में ऊंची सिद्धि हैं । परागति पराकाष्ठा |


    ऎसा ब्रह्म बोध जिन महापरुरुषो को हो गया, अभी आया था न थोड़े दिन पहले, भक्ति अंक में, काशी में ऐसे महापुरुष था बिल्ली मर गई थी उसको उठा कर गंगा में प्रवाह कर दिया, तो बिल्ली की जीवात्मा देव देहि में बदल गया,वो कहने लगी कि महाराज में तो बिल्ली चूहों के पीछे पड़ने वाली, ओर अभी में आपकी कृपा से स्वर्ग जा रही हु, मुझे देव देहि मिल गई 7:24 ।नहीं तो न जाने कितने लाख जन्म लेती तब  कहीं वहां पहुंचती।| मनुष्य जन्म होकर 7:32 पुण्य करके तब स्वर्ग में पहुंचती, लेकिन आप जैसी ब्रह्म बोध  से जो महापुरुष संपन्न होते 7:39 हैं ऐसे पुरुष अगर मरी हुई बिल्ली को भी अंतेष्टि  कर देते हैं, तो उसको इतना फायदा हो जाता 7:45| ऐसे ब्रह्म बोध  से संपन्न महापुरुष 7:51 मुर्दे, किसी मृतक आदमी को जला दिया जाता हो शमशान में ,ऐसे मृतक के मुर्दे के धुएं को 7:59 देख ले तो उस मुर्दे को भी दुर्गति से 8:06 हटाकर सद्गति की और प्रकृति भेज देती है,ऐसा ब्रह्म बोध की महिमा होता है, 8:13 और ऐसे पुरुष हम लोगों की  नाइ जीते है, आश्चर्य है,  हम से भी ज्यादा गरीबी में भी जी लेते है, और 8:20 फिर भी पूरे सम्राट होते है ,जैसे जड़ भरत ,सुखदेव जी महाराज ,।8:28 

 

    अभी कुछ वर्ष पहले  भाव नगर में चित्रासनी इलाके में मस्त राम बाबाजी थे, उनके पहले एक ओर संत हो गए , भाव नगर 8:41 के महाराज तख्तसेन हो गए, वे जाते थे उनके दर्शन करने को, तो बोलते थे साले तख्ता बीत जाएगा  बख्ता,  कर ले कुछ नहीं तो चला 8:51 जाएगा वकता, तख्त बखत, मैंने ऐसी बात सुनी, अब तख्त सिंह ने फिर 8:57 तख्तेश्वर महादेव बनाया अभी भाव नगर में हम देख कर भी आये । 9:03 और भी कुछ सत प्रवृत्ति की तो उस महात्मा के बाद और कोई महात्मा आए 9:09 होंगे, एक महात्मा तो हमने भी देखा, चित्रासनी में ऐसी बिल्कुल उनको देख कर अपने को भी दया आये की, ये क्या स्तिथि है ,लेकिन उनके अंदर की बहुत बड़ी पहुच है, तो ऐसे महात्मा पागल का भेष बना कर भी रह सकते है ,सम्राट होकर राज्य भी कर सकते है ।जिनको ब्रह्म बोध हुआ | ललनाओं के नृत्य हास्य विलास में भी समय बिता सकते है,ओर हिमालय में समाधि भी कर सकते है,आचार्य होकर उपदेश भी से सकते है,ओर गृहस्थी होकर गृहस्थी का गाड़ा भी घसीट सकते है।


    9:51 ऐसे एक संत हो गए संत टोपड दास। उनको पुत्र था, पोत्र था, घर में रहते हो सुबह मार्केट में सब्जी ले आते, अरे भाई थोड़ा धनिया तो दे दे सब्जी लिया तो थोड़ा धनिया तो देदे । ऐसा भी कर देते थे, और थे समजे हुए ।10:00 10:07ब्रह्म बोध से संपन्न। 10:18 शाम को थोड़ा बहुत सत्संग करते थे उनके घर के प्रांगण में । अड़ोस पड़ोस के लोग सत्संग से तो पहचान गए कि काका टोपनदास.


    एक टोपसदास दूसरे थे जो बहु से भिक्षा मांगते थे ,ये वो टोपसदास नही। ये सेठ टोपसदास नही,,, ये काका टोपसदास की बात बताता हूं । तो टोपसदास का सत्संग सुनकर  उनके सत्संगी समझते थे कि संसार सपना है,जो आया है वो जाएगा,मर जायेगा,कोई किसी का नहीं, बाबा रोज बताते थे । एक दिन वो काका टोपसदास का पोता मर गया , अ। ..काका टोपसदास ने ऐसा छाती कूटा ए हो। .., उनकी बहू ओर उनका बेटा उनको चुप कराने में लग गये।सत्संगी आश्चर्य में की हम समझते थे कि ज्ञानी है ।11:04 बड़े संत है ,लेकिन अभी पता चला की पोता मर गया तो आप  मरने  को तैयार हो गए ।


है मुजे मीठड़ा मिठड़ू मिठड़ू बोलयूं बोल्डन वारा मुहिजा पोटडहा ,मा मरी वन्या( सिंधी लाइन)


    अपने मरने को तैयार होंजाये फिर बहु समझाती बेटा समजाता,  एक दो दिन बीता सत्संग फिर चालू हुए11:37 तो श्रोताओं ने जो सत्संगिओं ने कहा कि आपका पोता आप तो रोज हमको उपदेश देते, क्या आपका पोता मर गया, और आप स्वयं मरने को 11:45 तैयार हो गए। ये बात समझ मे नही आई, टोपसदास ने कहा कि ये बात यह मत पूछो कल बगीचे में  11:55 सत्संग करेंगे उधर बताऊंगा । बगीचे में सत्संग हुआ, बोले पोता मर गया हम घर मे रहते 4आदमी12:01लड़कियों की तो मेरे शादी हो गई, एक लड़का 12:07 है, उसकी बहू है, और कई वर्षों के बाद उसको पुत्र हुआ और दो-तीन साल का उसका पुत्र मर 12:19 गया तो वह कितनी रोएगी ,क्योंकि उनको जगत बोध है ,जगत में सत्य बुद्धि है,शरीर मे हु ओर ये मेरा बेटा है, उनको तो ब्रह्म बोध नही है, 12:25 तो मेरा बेटा उसकी पत्नी, दोनों रो रहे थे, अगर मैं उनको चुप करने 12:32 जाता, तो बड़ी गड़बड़ होती बहुत देर लगती, और वो सोचते ,,,,,गुजराती लाइन समज नही आ रही,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,बेटा तो हमारा मरा, इस बुड्ढे को क्या ???? वो रोते थे नासमझी से, और मैने सोचा कि वो नासमझी से रो रहे है तो अपनी समझदारी क्यों छाट्टू।में समझदारी का सदुपयोग करू। में समझ कर रोया, में समझ कर रोया तो मुजे रोने का दुख नही था12:50 12:58 रोने का ऐसा अभिनय किया, की वो तुरंत चुप होकर मुझे चुप कराने लग गए, घर में चुप लानी 13:03 थी तो इस टेक्निक से मैं छुप लाया की आराम से उनको मेरे प्रति अभाव भी ना हो और रो 13:09 रो कर अपनी खोपड़ी खराब ना करो ।इसलिए मैंने थोड़ी देर के लिए समझ कर रो लिया तो 13:32 इसमें मेरा ब्रह्म ज्ञान भाग जाएगा क्या ? जय राम जी की


    राम जी रो रहे है सीते सीते हाय सीते, भाई लक्षमण, लक्ष्मन भैया लक्ष्मन।। लेकिन राम जी समज रहे है अंदर से ये सब जगत का ,शिष्टाचार का, चित का व्यवहार है,राम जी क्या है राम जी जानते है13:53 कबीर ने ठीक का भटक मूया भेदु बिना पावे कोन उपाय,, खोजत खोजत युग गए पाव कोस घर आये।।

खोजते खोजते सुख को , शाश्वत जीवन ,को अमर आनंद को खोजते खोजते युग बीत गए पावकोष घर आये , ऐसा सुख नजदीक है। तो वशिष्ठ जी कहते है कि हे रामजी।।एक चित बोध होता है एक जगत बोध होता है, और साधक को अभनापादन आवरण हटाना 14:01 होता है और संसार को संसारि को अस्तवपादक आवरण ओर अभानापादक आवरण अस्तापादक आवरण  14:16 सांसारि के होता है| और अभानापादक आवरण 14:22 जिज्ञासु  को होता है । तो संसारी को तो दोनों आवरण होते हैं , जिज्ञासु को एक आवरण होता है| जिज्ञासु मानता तो है कि भगवान है और अपना आत्म रूप से मानता है, केवल अभन है भान नहीं हो रहा है, उसे तो भान होने के लिए ब्रह्म अभ्यास करना चाहिए , चित्त जगत अभ्यास करता है न ।14:32 14:37  उसकी जगह ब्रह्मा 14:46 अभ्यास करना चाहिए ।

 

    जैसे उसे लड़के ने सारस सारसी देखा   पहले तो जगत अभ्यास था, पर अंत में ब्रह्म अभ्यास होते ही उसके चित् में ब्रह्म सुख 14:52  प्रकट हो गया, हो गया ब्रह्मज्ञान । ऐसे ही साधक को सावधान होकर ब्रह्म अभ्यास करना चाहिए। 15:01 चलते फिरते, खाता ,लेते बार-बार ब्रह्म अभ्यास करने से जगत का आकर्षण और पाप , ताप छूटकर  वह ब्राह् मय 15:09 हो जाता है ।।

  

राजा और कर्कटी राक्षसी


    15:30 चिराग देश के राजा मंत्री और वीर सहित वीर यात्रा को निकले ,और उनको आते देखकर कर्कटी राक्षसी ने विचारा कि मुझे भोजन मिला। यह मूढ अज्ञानी है, और इनको देह अभिमान है, इन मूर्खों के जीने से ना यह लोग ना परलोक 15:39 कोई अर्थ सिद्ध नहीं होता, ऐसे जीवो का जीना दुख के निमित्त है, इसलिए इनको यत्न 15:49 करके भी मारना योग्य हैं, और इनका पालन अनर्थ के निमित्त है, क्योंकि यह पाप को उदय 15:54 करते 16:07 है, ब्रह्मा की आदि नीति है की पापी करने योग्य है योग्य हैं और गुणवान मारने योग्य नहीं। कदाचित यह गुणवान हो तो मैं इन्हें न मारूंगी। 16:17 करकटी ने कहा है राजन जो तुम आत्मज्ञानवान पुरुष हो तो तुम कल्याण रूप हो, जो ज्ञान 16:25 से रहित होता है उसको मैं भोजन करती हूं, तुम्हारे छुटने का उपाय यही है, की जो मैं 16:34 प्रश्नों का समूह पूछती हूं, उसका उत्तर दो, जो तुमने प्रश्नों का उत्तर दिया तो मेरे 16:43 पूजने योग्य हो ।


    कर्कटी नाम के राक्षसी थी ।16:52 उसे भोजन करने से तृप्ति नहीं होती थी, तपस्या करके ऐसा वरदान पाऊं, लोगों के नासा 17:01 पुट से घुस जाऊं और उनके हृदय का शुद्ध खून पिया करु, तपस्या करके वरदान पाया खून पीती ।17:56 बाद में सूक्ष्म होती  खून पीती मोटी हो जाती,  हवा के जोके से गिर पड़ती। सोचा की खूब मोटी हो जाऊं, मोटी होजाने से जैसे मोटापा दुख देता है वैसे दुखी गयी| फिर गिद्ध को प्रेरित करके हिमालय में चली गई, गिद्ध के अंदर घुस गई, उसको प्रेरित करके हिमालय चली गयी , और गिद्ध के अंदर से गड़बड़ करके वमन करवा दिया, और वह बाहर निकली , वहां उसने तप चालू किया । ऐसा ध्यान किया उस कर्कटी राक्षसी ने ऐसा तप किया, ऐसा ध्यान किया, कि उसको शरीर की सूद ही नहीं रही । उसके कषाय परिपक्व हो गए हृदय शुद्ध हो गया समाधि लग गई।


     18:02 जो इरादे से आदमी भजन करने बैठता है वो इरादा देर सबेर पूरा होता है अगर भजन सही 18:08 है तो, संकल्प दृढ़ होता है ।भगवान ब्रह्मा जी आए और पुत्री वरदान मांग 18:19 ले, उस राक्षसी ने का वरदान मांगने के लिए तप किया था की अब जो शांति मिली है जो आत्मा 18:26 में परमात्मा में जो शांति मिले अब तो कोई इच्छा नहीं रुचि नहीं। 18:32 फिर भी जैसे ध्रुव अटल पदवी के लिए बैठा था भजन करने तो  अटल पदवी  मिली और 18:42 ज्ञान भी मिला, ऐसे ही कर्कटी को ब्रह्मा जी ने कहा 18:47 की तुम जो पातकी लोग हैं, प्रजा को सताते हैं, 19:12 उन्ही का भोजन करना पपिया का नाश होना ठीक है, क्योंकि वह पाप से बचेंगे। और गुणवान को कभी ना खाना अपने भोजन में। करकटी वरदान लेकर विचरण करती करती उसी नगर के जंगल में 19:18 जंगल में घूम रहे रहीबथी और नगर का राजा उसका मंत्री 19:25 रात्रि को वीर यात्रा पे निकले थे और कर्कटी ने  विराट रूप धारण करके खतरनाक 19:31 भयानक रूप धारण करके इस समय आप दोनों मेरे लिए भोजन आए हो, मैं 19:37 तुमको का खा जाऊंगी, निशाचर लोग पहले डराते और बाद में अटैक 19:45 करते हैं। कायर लोग छुप कर अटैक करते हैं वीर लोग आमने सामने तिथि तारीख नक्की करके 19:51 फिर युद्ध करते हैं। 19:58 तो यह कायर नहीं थी , लेकिन कर कटी राक्षसी थी, इसके लिए 20:03 इसके लिए दो राजा राजा और मंत्री को खा जाना 20:10 कोई बड़ी बात नहीं थी, जैसे बिल्ली के लिए चूहा कठिन है, भागते दौड़ते हैं 20:33 थोड़े कठिन भी हैं। इसके लिए वह राजा और मंत्री इतने कठिन नहीं थे । फिर भी समाधि करके इसका हृदय स्वच्छ हुआ था आहार तो इसका मास था शिकार आहार था राक्षसी का । वह जानती थी कि गुणवान की सेवा करनी चाहिए और दुष्टो को ही आहार में लेना चाहिए।20:49 अगर ये अज्ञानी है तो इनको भोजन करना हितकारी हो जाएगा मूर्ख है,अज्ञानी है दुर्गुणी है तो, अगर गुणवान है ज्ञानवान है तो इनका संग सत्संग करना हितकारी होगा। करकटी को ज्ञान समाधि खूब लगी इसलिए उसकी प्रज्ञा उसकी बुद्धि बहुत ऊंचाई तक पहुंची थी 20:57 ।करकट ने पूछा की -

    ऐसा कौन सा 21:12 सूक्ष्म वस्तु है जो इंद्रियां मन से पार है 21:18 ऐसी कौन सी चीज है जो सारे ब्रह्मांडों को व्याप रही है और छोटे 21:26 से छोटे वस्तुओं में ऐसा को से छिद अणु है, जो सूर्य को प्रकाशित करता है, चंद्रमा को 21:31 प्रकाशित करता है ।ऐसा कोनसा छिद अणु है जो 21:39 सुख में और दुख में एक रहटा है, 21:45 ऐसा कोनसा छिदनु की जो अंधकार को ओर प्रकाश को भी प्रकाशित करता है ।21:51 अंधकार है फिर भी वह देखता  है की ये अंधकार है और प्रकाश है उसको भी देखत है, अस्ति को भी 21:57 देखता है और नास्ति को भी देखता  है ऐसा कौन सा चिद अणु है । हेय ओर उपादेय से रहित मति को भी देखता है और हेय ओर उपादेय से सहित मति को भी देखता है।22:06 ऐसा कौन सा चिंद अणु हैहै की जिसको पाए  बिना सम्राट भी कंगाल रह जाते हैं, और जिसको पाने  22:12 से कंगाल भी सम्राटों से पूजा जाते हैं ।ऐसा कौन से चिद अणु है ?22:19 ऐसा कौन सा चिद अणु है  जिसको पाने   के बिना सब कुछ करा कराया व्यर्थ है , जिसको पाने से 22:27 लगता है की मैंने कुछ पाया ही नहीं। ऐसा कौन सा सूक्ष्म से सूक्ष्म चीज है,चिद अनु है, जिससे आधी व्याधि उपाधि प्रकाशित होती है 22:41 लेकिन आदि, व्याधि ,उपाधि उसे चवर्ती नही।22:53 ऐसा कौन सा चिद अणु है जो रोम रोम में रम रहा है, रामानंदी उसे राम कहते हैं , शैव उसे शिव कहते 23:01 हैं, वैष्णव से विष्णु कहते हैं, खुदा वासी से खुदा कहते हैं, देवी 23:10 देवी को मानने वाले उसे देव कहते हैं। ऐसा कोनसा चिद अणु है, की तुम्हारे हमारे सबके हृदय में है, 23:20 और तुम्हारे हमारे ना होने पर भी वो है। ऐसा कोनसा चिद अणु है, 23:29 ऐसा कौन सा चिद अनु है । इस प्रकार भिन्न-भिन्न से ढंग से उसी परमात्मा के विषय में कर्कटी ने 23:36 प्रश्न पूछा -

    जो लोग मन माना भजन करना चाहते है अथवा मनमाना कीसी रिदम में चलते रहते है उसको एक जनम तो क्या कई जन्म भी कम पड़ेगे, इस्वर प्राप्ति में ।23:56 जो शास्त्र  अनुकूल ओर आत्मसाक्षात्कारी महापुरुष के ज्ञान के अनुकूल साधन करेगा उसके लिए तो कुछ ही समय बहुत हो जाता है ,जैसे सुखदेव जी के 24:04 लिए 21 दिन बहुत हो गए, परीशित के लिए 7 दिन बहुत हो गए ,महावीर के लिए 12 वर्ष 24:11 बहुत हो गए, बुद्ध के लिए 7 वर्ष बहुत हो गए , किसीब के लिए 40 दिन बहुत हो जाते हैं ।अगर 24:19 सतगुरु मिले और अपना संयम सदाचार तत्परता हो ,ऐसी सूक्ष्म बात विचारने की हो लगन हो


    24:26 उस वीर्र यात्रा को निकले हुए राजा और मंत्री ने करकटी के सारे प्रश्न सुने । 24:35 राजा कहते हैं की हे कर्कटी तुमने एक ही उसे परमात्मा के बारे में पूछा है, 24:42

        - जो इंद्रियां मन  से परे है, सूक्ष्मतम है ,सूक्ष्म चीज कौ तो माइक्रोस्कोप से अच्छी 24:50 जाति है लेकिन वो परमात्मा देखा नहीं जाता, देखा नहीं जाता फिर भी है तो सही, 24:59 वो पांच कोशो में छुपता नही 5 कोशो में है  फिर भी छुपता नहीं , जैसे कपूर छुपता नहीं उसकी सुवास ऐसे ही उस  परमात्मा की 25:08 चेतन देखने की, सुनने की ,बोलने की योग्यता जो है, ऐसे ह्रदय में वो भगवान है तो सही, लेकिन छुपता नही, ह्रदय की धड़कनो से साबित होता है कि है तो सही चैतन्य , मन बुद्धि के इतने सुंदर आविष्कार हवाई जहाज बंनाने की सता उसी ज्ञान स्वरूप से आई।25:27 माता में पालन करने की शक्ति इस परमात्मा से आई ,पिता में अनुशासन करने की 25:33 शक्ति उसी परमात्मा से आई ,कवि की कविता उसी से आई,  विज्ञानी का विज्ञान उसी से सफल 25:39 होता है ,वह चिद अणु क्यों है की सूक्ष्म-सूक्ष्म तर 25:45 -सूक्ष्मतम है, बैक्टीरिया में भी उसकी चेतन है इसलिए वह चित अणु है,  चिद माने वह चेतन है और अणु, अणु माने जरा से  25:52 से तो जो छोटे से छोटा है वो बड़े से बड़ा है 25:58 जितना छोटी चीज उतनी ही वो बड़ी चीज ।

            - बोलें स्वामी जी यह 26:03 समझ में नहीं आया ,देखो हवा एकदम छोटी है सूक्ष्म है, तो कितनी व्यापक है  ,हवा से भी छोटा आकाश सूक्ष्म है,  तो वह ओर ज्यादा 26:14 व्यापक है, तो आकाश से भी ज्यादा वह चिद अणु परमात्मा 26:22 है, इसलिए हमारे शरीर में व्यापा है, सबके शरीर में व्यापा है । ब्रह्म , विष्णु, महेश के शरीर में भी वही परमात्मा व्यापा है  ।26:32 जेसेबिलोरी कांच रखने से, विशेष 26:38 सूर्य का प्रकाश और दाहकता का अनुभव होता है, ऐसे जो ध्यान समाधि करते हैं उसमें उसे 26:46 परमात्मा की विशेष सत्ता स्पूर्ति त्रिकालज्ञता आदि प्रकट होती है,  और जो सामान्य 26:53 जीते हैं उनमे समान्य चिद अणु की चैत्यन्यता तो होती ही है ।


    तो इस प्रकार कर्कटी राक्षसी से 27:03 प्रश्न सुनकर राजा कहता की-


तुम उसी परमेश्वर के बारे में पूछ रही हो, जो प्राणी मात्र का आधार है । जो सबकी धडकने चलाने की सत्ता देता हैं।27:15 जैसे सारी वनस्पति का आधार है सूर्य के किरण और जल 27:21 अच्छे पेड़ पौधे हो चाहे खराब हो ।अच्छे फूल खिले हो चाहे मंदे फूल खिले हो लेकिन 27:28 सत्ता तो सूर्य की है ।सारे पौधे सूर्य से जुड़े हैं सारे वृक्ष सूर्य से जुड़े 27:34 हैं, सारे मनुष्य और जीव सूर्य से जुड़े हैं।सूर्य वह ठंडा हो जाये तो विज्ञानी बोल नही सकते कि सूर्य वहां ठंडा हो गया अपना कुछ मैनेजमेंट कर दो, विज्ञानी भी उसी समय सफा हो जायेगे। 27:47 ऐसा हम लोग सूर्य से जुड़े है, तो सूर्य इतना दूर होते हुए भी हमारा शरीर 27:54 सूर्य से जुड़ा है, टेंपरेचर सूर्य से जुड़ा है, अगर सूर्य ठंडा हो जाए टेंपरेचर डाउन हो जाएगा हम  मर जाएंगे तो । तो शरीर को जो अमुक टेम्प्रेचर  चाहिए  अमुक धढकने चाहिए28:05 सूर्य की किरणों  से शरीर जुड़ा है, ऐसे सूर्य भी उसे परमात्मा से जुड़ा है और 28:11 तुम्हारा देह भी उस परमात्मा से जुड़ा है, जैसे मिट्टी का घड़ा चाहे किसी को कुम्हार का 28:18 हो, किसी घर में हो, लेकिन वे आकाश से जुड़े हैं, ऐसे किसी भी जाति अथवा वर्ग या उम्र 28:25 का व्यक्ति, वो परमात्मा से जुड़ा है। दुषचरित्र के कारण उस परमात्मा को पाने की  28:32 तड़प नहीं आती , संसार को पाने  की इच्छा बढ़ने से विकारी सुख पाने की इच्छा 28:37 बढ़ने से दुशचरित्रवान हो जाता है और ईश्वर को पाने की इच्छा से सतचरित्रवान 28:43 होता है , और सत्य में उसकी स्थिति होती है, जितना संसार के तुछ चीज चाहेगा उतनी 28:49 मति स्थूल हो जाएगी और छोटी-छोटी बातो  में दुखी सुखी होकर मर जाएगा ।28:55 और जितना परमात्मा को प्यार करेगा उतना ही मति। सूक्ष्म, सुक्ष्म तर सूक्ष्मतम होकर वो स्वयं ब्रह्म स्वरूप हो जाएगा। 29:05 उसी परमेश्वर के बारे  में पूछा। वही परमात्मा  चिद अणु 29:10 ज्योतियो की ज्योति है, तम को भी प्रकाशता है और प्रकाश को भी 29:16 प्रकाशता है , कुछ नहीं है, कुछ नहीं 29:22 है को भी प्रकाशता है, कुछ नही है कहने वाला तो है ।


    पिता ले गया मेहमानों को बिल अपना बड़ा 29:29 महल दिखाने के लिए ,पूजा रूम है, ये ड्राइंग रूम है ,ये ध्यान रूम है, यह रसोई रूम है ,29:34 ये फलाना है यह फलाना है । यह बड़े छोकरा का, यह छोटे छोकरे का, ये मजले का यह ,,बहुत सारे कमरे अपने बिल्डिंग के दिखाए 29:42 मेहमानों सहित पुत्र सहित बेटा को लेते हुए सेठ जी नीचे उतरे । बोले इतने सारे मेहमान है कोई रह तो नही गया बेटा , बेटा सब कमरो में झाक कर ऊपर से आवाज मारता है की पिताजी यहाँ कोई नही , ।पिताजी ने मेन गेट पर ताला मारते है।   बेटा बोलता है ये क्या करते हो, पिता बोला तूने ही तो कहा कि कोई नही है, बेटा बोला कोई नही है कहने वाला में तो हु।


    ऐसे ये नही ये नही ये नही नेति नेति नेति कहने के बाद भी कोई तो है। जो कोई है वह वही चेतन्य परमात्मा है जहाँ कुछ भी नही फिर भी है प्रलय हो जाती है कुछ नही रहता फिर भी कुछ तो है।अगर प्रलय में कोई नही रहता तो कोन बताता है कि प्रलय हो जाता है । प्रलय  में कुछ नहीं रहता कुछ नहीं रहता 30:36 उसको देखने वाला तो रहता है । गहरी रात को भी कुछ नहीं रहता कुछ नहीं रहता तो सुबह 30:42 अनुभव करते हो, कुछ नहीं रहता आनंद से सोया था, तो आनंद वो चिद अणु चैतन्य राम 30:49 का है । ये बात बहुत सूक्ष्म है साधारण व्यक्ति को तो ये 30:54 सुनना भी भाग्य में नहीं होता और कोई पुण्य आत्मा सुनता है तो समझ में नहीं आता, और कोई समझता है तो टिक जाए की रुचि नहीं ।31:02 इतना सूक्ष्म और पावरफुल है, टिक जाए इस बात में तो कल्याण हो जाए बेड़ा पर हो जाए ।।31:08 स्वयं भगवत मया हो जाए ये ऐसी बात है ।


    31:14 कथा आगे चलती है उस राजा ने कर्कटी को उसके सब सवालों का जवाब दिया । कर्कटी ने जाना की ये ज्ञानवान है , ,31:24 आत्म वेता है, परमात्मा को पाया हुआ बुद्ध पुरुष है, इसने अपने soul को अपने आत्मा परमात्मा को 31:32 जाना है जीवन मुक्त राजा है  । राजन फिर तो मैं आपके संपर्क में रहूंगी, सत्संग करूंगी। राजन ने 31:41 कहा तेरा आहार अगर मांस भक्षी है और मनुष्य पर भषण करती है तो जिन 31:46 पपिया को हम फाँसी  लगाने वाले उनको तू लेजा के भोजन कर लिया कर, तेरे काम आएगे उनका भी कल्याण होगा। जैल का भी खरचा बन्द हो जाएगा, तेरा भी गुजारा हो जाएगा ।


    वशिष्ठ जी कहते है कि है रामजी कर्कटी राक्षसी उस राजा के जो बन्दी थे उनको ले जाती जैसे बिल्ली चूहों को उठा कर ले जाती। ऐसे ही पापियो को उठा के ले जाती और जंगल मे ले जा कर भक्षण करती तृप्त होती। बीच मे समय पाकर राजा के साथ सत्संग करने आती और क्षुधा लगती तो राजा उसको दे देता अपराधी। जिनको फाँसी लगानी हो उनको उसके हवाले कर देतै,,,32:26 ऐसा सिलसिला कई वर्षों तक चला


    32:34 उस कर्कटी राक्षसी की आयुस्य पूरी  होने को थी वो हिमालय चली गई समाधि लगाकर अपना उस चिद अणु पर ब्रह्म परमात्मा 32:42 में अंतवाहक शरीर विलय कर दिया। स्थूल शरीर तो वहीं हिमालय में गल गया सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म 32:50 भूतों में मिल गया और वो जीव आत्मा पर ब्रह्म परमात्मा में


    जैसे घड़े का आकाश महाकाल को मिल जाता है 32:57 घड़े का पानी पानी में मिल जाता है  बहकर । घड़े की मिट्टी मिट्टी में मिल जाती है। 33:04 अज्ञानी का सूक्ष्म शरीर तो दूसरे जनमो में जाता है, अच्छे करम करता तो अच्छा जन्म बुरा काम करता है तो बुरा जन्म, 33:10   योगी का योग मंडल में जाता है। लेकिन ज्ञानी का साक्षात्कारी पुरुष का चेतन्य बपु महाचेतन्य से मिल जाता है वो मुक्त हो जाता है। फिर वह ब्रह्मा होकर सृस्टि करता है  33:25 विष्णु होकर पालन करता है रुद्र होकर संहार करता है, सब जगह होता है, और   फिर भी कही नही होता । साकार रूप में नही दिखता फिर भी निराकार तत्व में होता है।


    33:39 वह कर कटी राक्षसी बहुत समय तक नहीं आई तो राजा ने देखा की आई नहीं तो मालूम होता है 33:45 की, अब उसने शरीर छोड़ दिया, इसकी याद में दो मंदिर बनाए जाए  और प्रजा इसका पूजन करेंगे तो प्रजा का कल्याण होगा क्योंकि वो आत्मा परमात्मा को पाई हुए थी , 34:00 हुंकार करके है अपराधियों को डराती थी अपना शिकार के लिए 34:06 और फिर उसी के काम आता वो शिकार उनका मंगल होता इसलिए उसकी स्मृति में दो प्रकार के 34:15 मंदिर बनाए, एक मंदिर में उसका कर्कटी की प्रतिमा को हिंगला देवी का नाम दिया और 34:21 हिंगला देवी होकर वह पूजीजाए और दूसरी प्रतिमा मंगलकारी है यह मंगला  देवी तब से 34:29 हिंगला देवी और मंगला देवी की पूजा की परंपरा चली। 




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