ज्ञानज्योति प्रगटाओ| Gyanjyoti Pragtao| Part-1|
सत्संग के मुख्य अंश:
ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के अद्भुत लक्षण...
सत्शिष्य वही है जो मान-बड़ाई से दूर रहे... ऐसा क्यों जरूरी है शिष्य के लिए?
नाशवान चीजों का अहंकार हमें अविनाशी परमात्मा से दूर करता है और यही अहंकार गुरु के द्वार पर मिटता है और उस परमात्मा को पाना सहज होता है .. विस्तृत वर्णन !
शिष्य कब शिष्य है और कब वह शिष्य होते हुए भी शिष्य नहीं? ... जानिये सत्शिष्य के लक्षण !
भगवान के दर्शन बाद भी आत्मशांति नही तो अभी पाना बाकी रहा !
जो मान देकर कुछ लेना चाहे वह ठग है और जो मान या अपमान देकर कुछ देना चाहे वो ब्रह्मवेत्ता हैं !
आध्यात्मिक धन पाने की ये युक्तियाँ आप भी सीख लें !
ब्रह्मवेत्ता के शिष्य को ये दो मंत्र याद रखने ही चाहिए !
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सत्संग-
0:00 उपनिषदों का सिद्धांत के गुरु की कृपा के बिना ज्ञान नहीं हो सकता है, 0:05 और गुरु की कृपा होती है वृत्ति निर्मल करने से, 0:10 वृत्ति निर्मल नहीं होगी तब तक गुरु की सेवा भी नहीं कर सकते हैं, 0:16 और गुरु के सिद्धांतों में अपने वृत्ति को लगा भी नहीं सकतेहैं, 0:23 तो श्रीमत भागवत का श्लोक वृत्ति निर्मलता का संकेत करता है, 0:31 जैसे खेत भी हो बीज भी हो 0:38 और पानी भी हो लेकिन कुशल खेड़ू नहीं है, तो बीज का फल पूरा नहीं मिलता, ऐसे ही जीव भी है ब्रह्म भी है लेकिन जीव ब्रह्म की एकता कराने वाले 0:56 सद्गुरु की कृपा अगर हम ठीक नहीं पचापाते, तो जीवन भर मनमाने साधन करने से , मनमाने 1:16 आविष्कार करने से भी कोई खास लाभ नहीं होता है । मनमाने अविष्कार तो लाखों लोग कर रहे हैं, कई आविष्कार हुए कभी जगत का क्या हुआ? 1:24 जितने विज्ञानी बने उतने अगर ब्रह्मवेत्ता होते तो आज दुनिया कहां हो जाती 1:29 जितने वैज्ञानिक बने हैं, मनमाना आविष्कार किए हैं, जगत के चीजों के, उतने अगर ब्रह्मवेत्ता 1:35 होते। तो ऐसे ही सहज में सुख और शांति मिल जाता खुद ही,
ऐसा ही ब्रह्मवेत्ता की लक्षण होते हैं, सुहृदता समता लेकिन मुख्य लक्षणों उन महापुरुषों का होता है शांति, सच्चे शिष्य हृदय में शांति, 2:02 उनके दर्शन से उनके सानिध्य मात्र से उनको शिष्यों को साधकों को शांति का अहसास होने लगता है। ये ब्राह्मवेत्ताओं के लक्षण है। 2:17 जैसे दिया बड़बानल में मिल कर एक हो जाता है, बूंद सागर में मिलकर एक हो जाती है, घटाकाश महाकाश में मिलकर एक हो जाती है। 2:31 अथवा घी की पुतली घी है, शक्कर के गुड़िया शक्कर ही हैं, ऐसे 2:38 ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है, जिसको ब्रह्म का साक्षात्कार होता है उसका 2:43 तन भी चिन्मयबपु कहा जाता है। उसको उसके चरण उसके चरण रज भी हम लोगों के 2:50 कल्याण करने लगता जाता है। जब ब्रह्म वेत्ताओं की चरण रज 2:55 कल्याण करती है , मनोकामना पूरी करती है, तो ब्रह्मवेत्ता जिसका स्वयं कल्याण करना चाहे 3:04 उसको तो फिर संदेह क्या है । 3:10 ब्रह्म वेत्ताओं के चरण रज से अगर मनोकामनाएं पूरी होती है , श्रद्धालु की , तो ब्रह्म वेत्ता स्वयं जो चीज देना चाहते हैं वो चीज कितनी महान होगी ? तो उपनिषद कहती है की ब्राह्मवेत्ताओं के कृपा के बिना ब्रह्म साक्षात्कार नहीं होता , और जब तक ब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता तब तक ये जीव कितना भी कुछ कर लेता है, लेकिन मृत्यु का झटका लगते ही अनाथ हो जाता है। 3:36 कई कर्तव्य निभाले लेकिन उसका कर्तृत्व 3:44 ब्रह्म में लीन नहीं होता है। फिर भागवत कार ने आगे के श्लोक में बताया, 3:53 गुरु के लक्षण तो ये लगभग, पूरा वर्णन तो शास्त्र भी नहीं कर सकते संकेत मात्र कर सकते हैं। ऐसा है एकनाथी भागवत में, 4:01
शिष्य के लक्षण बताएं हैं, जो शांत हो, तितिक्षावान हो, जैसे चूहा बिल्ली से भागता है । ऐसे ही शिष्य मान बढ़ाई से दूर रहे, मान बढ़ाई से देहाध्यास बनता है । और देहाध्यास अहंकार को जन्म देकर आत्मा से विमुख कर देता है। शिष्य सतशिष्य वही है जो मान बढ़ाई से दूर रहे। जिसको मान की पुड़िया जहर जैसी लगे, 4:52
मानपुडी है जहर की खाए सो मर जाए,
चाह उसकी रखता वह भी अति दुख पाए
5:01 जो मान की इच्छा रखता है , वो भी संसार में दुख उठाता है। 5:07 क्योंकि मान मिलेगा तो किसी शरीर को नाम को मिलेगा, तो शरीर नाम के साथ जुड़ा रहेगा तो 5:15 अति दुख पाएगा। गर्भों का दुख है, अपमान का दुख है। जिस को मान की इच्छा है वो थोड़ा सा अपमान भी तो नहीं सह सकेगा।
तो शिष्य 5:32 आध्यात्मिक मार्ग का श्रेष्ठ पथिक है। मान से दूर भागता है, 5:41 अहंकार बढ़े ऐसे वातावरण से वो दूर भागत है। लेकिन अहंकार विसर्जित हो ऐसे गुरुओं के द्वार पर उसकी स्वाभाविक रुचि होने लगती है। तो आधी अविद्या ऐसे गुरु के सानिध्य से और गुरुओं के द्वार आने जाने से दूर हो जाती है। क्योंकि वहां छोटे से छोटे व्यक्तियों और बड़े से बड़े व्यक्तियों के साथ होते हैं । तो 6:10 छोटे बड़े का भेद मिटने की जगह हो जाति है।
6:17 तो जो मान्यता होती अहंकार बनता है धन से सत्ता से बुद्धिमता से सौंदर्य से , तो ये नाशवान चीज है, तो उस नाशवान चीजों से अहंकार रिकवर होता है। तो चीजें तो नाशवान होती है। लेकिन अहंकार जो रिकवर होता है, वो हमें अविनाशी परमात्मा से दूर कर देता है| और अहंकार इन नाशवान चीजों का है| नाशवान चीजों की अहंकार छोड़ने से अविनाशी का मुलाकात हो जाती है।
तो शिष्य के लक्षण है जो शांति प्रिय हो, जो सत्य प्रिय हो, सत्य बोलने में जिसकी रूचि हो, शांति में जिसकी रूचि हो, तितिक्षा जो सहन करता हो, और मान बढ़ाई से दूर भागता हो, संसार के भोगों से जिसका मन समझ गया हो की ( कुछ नहीं) वो है शिष्य l मंत्रदीक्षा ले ली ये तो शिष्य होगया ठीक है लेकिन शिष्य तब है जब गुरुके सिद्धांत से संग्लन हो, जितने 7:32 जितने अंश में हम लोग गुरुओं के सिद्धांत से जुड़े हैं उतना ही हमारा शिष्यत्व है। गुरु के द्वार पे आकर फेर दूसरों का उपयोग कर लेवे, तो वो गुरु द्रोही हुआ। तो शिष्य जो है वो कीर्ति से भोगोंसे, कपट से दूर भागता है , जो भोग से कपट से दूर भागे वो है शिष्य| और जो गुरु के कृपा के चादर ओढ़ के भोग कपट चोरी, दारी, हिंसा ये आदि सब करने लग जाये , वो तो असुर है , जैसे असुर लोग देवताओं के झुण्ड में घुस के अपना काम कर लेते हैं,तो एकनाथ महाराज ने शिष्य का लक्षण वर्णन किया और
ब्रह्मवेत्ता 8:31 महापुरुषों के स्वभाव का वर्णन किया, ब्रह्मवेत्ता के लक्षण नहीं। ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के स्वभाव 8:40 तो शांति, उनके सानिध्य में शांति हमें शांति मिलने लग जाए ये उनकी मुख्य पहचान है । प्रारब्ध बेग से ब्रह्मवेत्ताओं के लक्षण तो अलग अलग होता है, कोई राज्य करता है, 8:49 कोई समाधि करते कोई उपदेश देते कोई पागलों का 8:57 रूप बनाकर बैठे होते हैं, ब्रह्मवेत्ता, घाट वाला का जीवन अपने ढंग का है, मस्तराम का अपने ढंग का, 9:04 गुरुदेव का हमारे गुरुदेव का अपने ढंग का था, उधर है भावनगर के जो मस्तराम बैठे हैं 9:11 उनका अपने ढंग का, 9:17 नहाना धोना कुछ नहीं, वहीँ लेट्रिन वहीं बाथ रूम, उन्ही कपड़ों में, लेकिन उन के लक्षण वाह्य लक्षण तो नहीं, मुख्य लक्षण है की उन के निकट बैठने से शांति आती है। वो ब्रह्मवेत्ता हैं। और ये बहुत ऊँची चीज है।
आत्मिक शांति ये बहुत ऊँची चीज है। भगवन के दर्शन से भी ऊँची चीज है। 9:40 अर्जुन को भगवान के दर्शन और अंदर शांति 9:46 नहीं थी तो भगवान को मेहनत करना पड़ा, 9:51 भगवान के दर्शन हो जाए, लेकिन आत्मा शांति नहीं पाया, तो फिर भगवान 9:59 को कष्ट देना पड़ेगा, फिर भगवन आये उपदेश दें , उसके मनन कर के और तब शांति पाओ तब भगवान हम परम तृप्त होते है, खुश होतीं और साधक भी खुश होते हैं। भगवन आकर उपदेश दें अथवा गुरुओं का सान्निध्य लेकर उपदेश लेकर उनके कृपा लेकर, शांति लाभ करना चाहिए। ह्रदय की शांति, सबकुछ करते तो ह्रदय के सुख के लिए तो करते हैं, और क्या है? सुख अपने आप मिलने लगता है।
जो भी दुनिआं के दौड़ धुप करते है वो सुख के लिए करते हैं। आंतरिक सुख के लिए, …तो हृदय शांत होने लगता है, तो जिसे शांति प्रिय है , अमानित्व अदंभित्व आर्यव 10:52 क्षमा शौच ये शिष्य के लक्षण है, ह्रदय में क्षमा स्वभाव शौच माने शुद्धि, वाह्य और अभ्यन्तर शुद्धि, निरभिमानता निरहंकारिता ये शिष्य के सद्गुण है| ये बढ़ते जायेंगे तो गुरु की कृपा पचती जाएगी।
जैसे भूमि हो न जमीन है। पिहत के हो जड़ा न हो ऐसा जमीं की सुयोग्यता होती है तो वहां ईसबगोल ज्यादा होता है। वातावरण अनुकूल हो तो । और गुजरात साइड में इसबगोल होगा। रतलाम में इसबगोल करो तो फेल जाता है, उधर नहीं बन सकता, वहां के धूप इधर नहीं है, रतलाम में अफीम बहुत अच्छा होता है खस खस बहुत बढ़िया होता है। वो इलाके में रतलाम के इलाके में , तो ऐसे ही जैसे बीज बोने के लिए भूमि और हवामान और वातावरण काम करता है|
ऐसे ही ब्रह्म साक्षात्कार के लिए भी वातावरण 12:08 संस्कार इस पर भी आधारित होता है, 12:16 साधक जितना कुशल होगा उतना वहां ब्रह्म विद्या फलेगी फूलेगी | सत्शिष्य ने मान यश वावाहि कष्ट रूप लगती है, उसे बहार आवे, ऐसा शिष्य की अवस्था हो जाती है, आदर बुद्धि सन्मान मले यहाँ आप चारु छन ते आत्मबुद्धि हैदेइछे देहात्मा बुद्धि तहे तो आत्मिक सुख बहुत दूर हेवनु छे gj सम्मान में आत्मबुद्धि होने से देहात्मबुद्धि हो जाती है। देह आत्मबुद्धि होने से जीवत्व मजबूत होने लगता है, शिवत्व गलने के बजाय शिवत्व से दूर हो जाता है।
इस लिए धरम से शुरुआत होती है देवी देवता , आप ही बनाओ सुपारी, आप ही बनाओ गुड़ के गणपति और प्रणाम करो, क्यों?... की देह आत्मबुद्धि कम हो । 13:24 देह आत्मबुद्धि। मान में सत बुद्धि सुख बुद्धि रखने से, 13:31 मान में नाम में सुख बुद्धि रखने से देहात्म वृत्ति मजबूत होती है, 13:39 मान और सुख मान में 13:44 मिथ्या बुद्धि करने से देह आत्म अध्यास घटता है सहजता होता है और सहजता का जो स्वतंत्र सुख है।
मान का सुख परतंत्र है। कोई मान देगा तब सुख और मान दे के ये …. ये करते हैं आजकल। ये नहीं की मान दे के भगवन के तरफ ले जाएं, ऐसा कहां होता है। मान दे कर पांच पचीस हजार पड़ा हुआ है, लाख रूपया पड़ा हुआ के, तो आओ भाई सेठ, अथिति विशेष, साहेब आओ भाई आम करो, करॉय करवाइदेचहे, तो हकीकत में जो मान देते हैं, वो अंदर से आत्मज्ञानी है की नहीं वो हमको देखना पड़ेगा। वो हम को यमराज के पास से छुड़ाने में समर्थ हैं कि नहीं,14:20 यमराज के पास से जो छुड़ाने में समर्थ है, वो मान तब देंगे जब हम ईश्वर के तरफ 14:45 बढ़ेंगे, देहध्यास छोड़ने की तरफ बढ़ेंगे, अथवा कोई ना कोई हमारे में आध्यात्मिक गुण 14:53 होगा उसको मान देकर विकसित करेंगे, ऐसा नहीं की मान दे के तुम्हारा कुछ लेना चाहते हैं, नहीं नहीं, 14:59 जो मान देकर तुम्हारा कुछ लेना चाहे वो तो ठग है, तो वो तो ठग है, मान देकर कुछ लेना चाहते हैं वो 15:07 तो ठग हैं, लेकिन मान दे कर अथवा डाँट के 15:13 विनोद प्यार कैसे भी करके तुमको कुछ देना चाहते वो ब्रह्मावेत्ता होते हैं , जो वो तुमको देना चाहे , और ऐसा दें फिर कहीं लेना न पड़े ऐसा जो देना चाहे वो ब्रह्म वेत्ता हैं, और मान आदि दे के या कुछ और डाट धमकी देके तुमसे कुछ चाहते हैं वो तो ठग हैं। तो श्रीकृष्ण किसी को डांट धमकी देते हैं। राज ले लिया तो ठग हुए की नहीं राज क्या ले लिया अहंकार ले लिया, उनके कर्म ले लिया 15:46 राजसूय किया नहीं जिसके कहने मात्र से 15:53 राजाओं ने राज छोड़ दिया उन्होंने राज किया नहीं,
जैसे मछली जाल में फंसा कर छटपटाती है 16:01 ऐसे ही साधक मान से छटपटाता है , दूर भागता है। मान में यश में सुख बुद्धि होने से अंदर से आदमी पराधीन हो जाता है। 16:14 इसलिए उसमें सुख बुद्धि नहीं करना चाहिए। जीसे अंतःकरण शुद्ध होता है और आत्मज्ञान की प्यास बढ़ती है। रामतीर्थ रात रातको उठ उठ के रोते थे की बाइस साल होगया, आज के दिन भी ऐसे ही गया , फिर कब मिलोगे? भगवान हृदय में हो और कब मिलोगे? ऐसे छटपटाहट है न जिव को शुद्ध बना देती है।
इनकम टैक्स वाले आते जाते हैं तो धनवान अपना धन को सेट कर देता है। इनकम टैक्स की दौरे की होते ही अपने धन को अपने कागजात को सेट कर देता है। ऐसे ही मान यश आने की संभावना होती उससे पहले वो सद्गुण का धनवान जो साधक है वो अपने से कार्य को गुणों को छुपा के दूसरों को आगे कर देता है। 17:06 ये ये नश्वर धन छुपाने के लिए कितनी आइडिया कितनी लगाने पड़ती है, तो वह तो आध्यात्मिकता 17:11 पुण्य का धन है।
अपमान होने से पाप खत्म होते हैं और मान 17:16 मान होने से पुण्य खर्च जाते हैं, यश मान होने से पुण्य खर्चता है , अपमान होने से पाप खर्च जाते हैं, आप कुदरती यश मान होता हो 17:22 वो अलग बात है। अपने को थोड़ा, लेकिन अंदर से 17:31 यश मान की इच्छा करें तो अपना पुण्य खर्च होता है। पुण्यों का फल है न मान यश प्रतिष्ठा ऐसे ही रघुकुल के राजा को बोलै के वहां बिस्तर लगाओ जाके, भाभी के द्वार, शाम को । छे बजे विस्तरा लगा के शो जाओ, वशिष्ठ ने बताया, रघु कुल का सम्राट और बिधवा भविके द्वार पर महल के द्वार पर बिस्तरा लगा कर सो जाना, छे बजे, लोगो ने तो कुछ का कुछ कहा, अफ़्वहा हो गए लेकिन उन के कोढ़ उतरता गया उतरता गया, सातवे दिन का का जरा सा फोड़ी रही , गुरु महाराज जरा सा फोड़ी रही वोले मेरे से हिस्से का है मैं निंदा करूँ तो उतरजाएगी लेकिन तुम्हारे जैसे सज्जन आदमी की नंदा कर के में क्यों पाप का भागी बनूँ। 18:29 ये तुम्हारे अफवाह और निंदा हुए उन्होंने तुम्हारा पाप धो डाला, ये बताया था न कथा रघुकुल का कथा,
मान पूड़ी है जहर की मान की जगह से दूर भागना चाहिए साधक को, मूढ़ जो है संसारी पामर मन होता है 18:51 वो मान मान की जगह पे भागेगा। 18:57 और साधक मान की जगह से दूर भागेगा, और ज्ञानी मान अपमान दोनों को पार करता जायेगा, 19:04 मृत्यु कितने बड़ा खतरनाक अपना अपमान है, यम आके प्राण निकाले, समसान में ले जाए लक्कड़ ऊपर दाल देवे ये कितना अपमान है, यमनु प्राण काढ़े समसान में ले जाए लकड़ा ऊपर हल गावे ये अपमान ाजआर मान मिळवावे मान मुटु तो माथे छे जो छे न मन भागीजै मान लिए दे लोगोने ये न घोरापमान ठेवे नु छे अपमान थवाणु तो ममन माँ प्रीति अंदर थी होए न अपमान न दुःख नहीं पचवै सके छे इसलिए राजा महाराजा न सु करता 20:02 गुरु बोलते जा बेटा भिक्षा कर आ , हेउ नथी के गुरु मान
नहीं नहीं 20:15 शिष्य को ऐसा मान मिले की ब्रह्म देव अपनी गद्दी से उतर के उसे वेल कॉम करे, शिष्य अपना देहध्यास छोड़ता है तो उसके देह लीन हो जाएगा फिर , ऊपर लोको में जाता है तो इंद्र उसके पूजन करते हैं, 20:30 ऐसा बनाना चाहते हैं, इसलिए लौकिक मान की शुक्र की पूजन किया न इंद्र ने, और गुरु ने क्या किया झाड़ू लगवाया, ब्रह्मवेत्ताओं के शिष्य जो ब्रह्म वेत्ता मूल महापुरुष होते हैं 20:55 उनके वहां कोई शिष्य हो गया फिर वह किसी का गुलाम नहीं होता, ज्ञानी का शिष्य कहीं भी गुलाम नहीं हो 21:02 सकता,
अरे लड़कियां आती होगी शेर जैसी हैं, रास्ते में कई मिलिट्री कई हो इस की ताकत नहीं, सिंघण उठी जाए ऐसा होता है ब्रह्मवेत्ता का शिष्य ऐसा होता की वो ब्रह्म के सिवाय कहीं 21:19 झुकेगा नहीं, अभी कहीं झुकना है तो गुरु को ठीक से जाना नहीं, किसी से प्रेम से व्यवहार करें नम्रता से 21:35 करें वो अलग बात है, अंदर से किसी से प्रभावित हो जाए, ऐसा तो ब्रह्मवेत्ता का शिष्य नहीं हो सकता, 21:44 दूसरे किसी से प्रभावित हो जाए ऐसा ब्रह्मवेत्ता का शिष्य नहीं है वो, अगर कहीं किसी से प्रभावित हो गया तो वो ब्रह्मवेत्ता का शिष्य नहीं है वो, ब्रह्मवेत्ता का शिष्य किसी से इम्प्रेस नहीं होता, जो प्राइम मिनिस्टर के सेक्रेटरी है, वो पट्टा वाला से या 22:02 कलेक्टर से इम्प्रेस होगा क्या? अगर इम्प्रेस हो रहे तो प्रिम मिनिस्टर का सेक्रेटरी पद नहीं संभाल सका, सीधी बात है सीधी दृष्टान्त है, 22:16 ऐसा होता है।
मान का इच्छा करेगा उसका देह द्यास बढ़ेगा वो अपमान नहीं सह सकेगा, उसको धन का लोभ रहेगा, विषयों में रुचि रहेगी प्रीति रहेगी, और 22:30 पराधीनता रहेगी अंदर से, और पराधीन स्वप्ने सुख नहीं , 22:38 इसलिए आईडिया से आदमी समझते सनझते समझते ऊपर उठ जाता है। अमानित्व शिष्य के लक्षण है, दूसरा मत्सर रहित होना।
ज्ञान के भी मत्सर होता है। ज्ञान के मत्सर से भी बड़े बड़े झगड़े होते हैं , और वो मत्सर तो महाराज भल भालों को लग जाता है, कोई भी अकल होइसारी ाव्रत ये न मतसार होए अंदर, अपणु बीजू , ये जो मत्सर है वो बड़ो बड़ो को पटकता है, विस्वामित्र जैसों को पटक दिया मत्सर ने। है मेरा तपस्या है , मेरा ज्ञान ऐसा है, इसलिए दूसरी सृष्टि कर के दिखाया, तप नाश कर दिया, जो जोगी होते हैं न अगर आत्मज्ञानी गुरु अपनी घर तरनि और जोगी हो गए , तो योग की शक्ति आजायेगी तो थोड़ा अपमान हो जायेगा मान मत्सर, तो अपनी तप खरच कर, पनि बताबी जाए की बतावी न पांच मानस तवी बतावै पंडर वरस पूरा ठेगई बुद्धू लोग तो ये मत्सर भी तप नाश कर देता है पुण्य क्षीण कर देता है, इसे शिष्य बचता है ,
गुरु कैसे संतुष्ट हों, तो हम मान मत्सर सहेंगे तो गुरु संतुष्ट नहीं रहेंगे ? 23:45 हम नीरअहंकारी बनेंगे तो गुरु संतुष्ट नहीं रहेंगे ? 24:03 हम निरंकारी होंगे मान मत्सर रहे होंगे तो गुरु राजी 24:16 रहेंगे, मूल मंत्र है के गुरु कैसे राजी हो, पहले मंत्र है की ब्रह्मवेत्ता गुरु कैसे मिले, जिसके हृदय में छटपटाहट है ब्रह्मवेत्ता गुरु उसको मिलते हैं, , और छटपटाहट नहीं तो उसको मिले हुए भी वो वहां टिकेगा नहीं, ब्रह्मवेत्ता गुरु कैसे मिले , वो ब्रह्मवेत्ता गुरु राजी कैसे हों, ये दो मंत्र जीवन में आ जाये, तो बाकी के सद्गुण अपने आप आने लगेंगे, ब्रह्म वेत्ता गुरु कैसे मिले, और वो राजी कैसे हों, हम पर संन्तुष्ट कैसे रहें, 24:33
जैसे मा स्वाभाविक बच्चे को दूध पिलाती है, लेकिन कभी-कभी बच्चे ऐसे अंगड़ाई लेती है की 25:07 तो मां के वक्ष स्थल से दूध उभर आता है, 25:12 ऐसे ही हम लोगों का ऐसा व्यवहार हो की हमको देखते देखते गुरु के ह्रदय से हमारे 25:19 कल्याण का भाव उभर उभर कर निकले, वह लाभ करता जाता है, हमारा कल्याण करता जाता है, 25:30 क्यों की वो महापुरुष सत्य संकल्प होते हैं, अपने लिए तो संकल्प उठता नहीं, जल्दी उनके संकल्प उठता नहीं , लेकिन हो तो जब हमारे कल्याण का, 25:37 उससे बहुत लाभ होता है, नहीं तो ये जिव वेचारा करोड़ जन्म के माता पिताओं का लेना देना करोड़ों जन्म का एक ही जन्म में साक्षात् कार कर ले, गुरुओं का सत्य संकल्प का तो प्रभाव है,
आप मत्सर माने मान मत्सर इर्षा दुसरो को वो करते है , दुसरो को छोटा दीखाने के लिए भी अपना समय शक्ति गवां देते, लड़ते झगड़ते ये मत्सर हैं, तड़ातड़ी धड़ा धड़ी ये मत्सर का दोष होता है न अंदर में तब आजाता है ऐसा भड़का व्यवहार करवाणु ये मत्सर का दोष होता है इसलिए नहीं तो सौम्यता 26:24 मत्सर कम हो जाएगा तो सौम्यता आजायेगा, सौम्यता बढ़ता है तो समझो साधना बढ़ रही 26:30 है। और मान और मत्सर बढ़ रहा है तो समझ लो कोई दूसरी दिशा में गाड़ी जा रही है।
26:38 जो दुर्जन है अहंकारी है उसको निंदा का बाण लगता है, इससे तो जहाँ निंदा होती वही 26:43 जाता है, भीख मांगने जा रहा है, अपमान की जगह, 26:49 जो अपमान को चाहता है, या जो अपमान की जगह पर जानबूझकर जाता है, उसको अपमान के असर भी तो नहीं होती। और जो मान चाहता और मान नहीं 26:57 मिले तो कितना दुख हो, कोई फंक्शन में बुलाया अतिथि विशेष करेंगे, ैनमते कोई व्यक्ति गया ैलो लोक सु करू इ लोग कैथे जो अथिति विशेष करूछु आ साहेब न करूछु ता ना जमीं एम् ने अथिति विशेष करवाणु जे मानस अतिथि विशेष केंसिल तो बारे दिन थयो न शब्दों छे न बीजू कोई छे ते बात हेवनु , gj सो कड़ो आदमी से जो मिले सुख क्षण भर तो, सौकोड़ो की गुलामी होइ की तालु पड़े तो सर लगे 27:33 केटलो झूठ केटलो पोलसन अतिथि विशेष न, बारीक़ से देखो तो सरासर वेवकूफी है, और शिष्य का स्वतंत्र सुख होता है, और मान चाहने वालो का तो हजारो हजारो पराधीनता का सुख होता है, पराधीनता का कोई सुख होता है? धुतकारा पड़ता न, आवे भइल आभै फलाना आभै फलाना
एक दूसरे के क्या क्या करना पड़ता है, और फिर भी 28:56 अंदर की मस्ती होती कहां उनमें ? 29:02 गुरु की प्रसन्नताएं और अपना कार्य कैसे सिद्ध हो, अपना कार्य क्या है की ?- आत्म ज्ञान । 29:07 आत्मज्ञान माने में क्या? जो भी करना चाहिए वो कर लेता है , जैसे व्यापारी दक्ष रहता है, ग्राहक को वो वैरायटी दिखाएगा वो दिखाएगा, कैसे भी 29:17 ग्राहक माल ले जाए और दो पैसा मिल जाए उसमे वो दक्ष होता है, ऐसे ही शिष्य का तीसरा गुण है दक्षता, कैसे भी कर् के इस जन्म में आत्मज्ञान हो जाये , समय व्यर्थ न जाये, ये पुट्ट और नूह और पत्नी और समाज की छोटी मोटी बावाही ये इधर ही पड़ी रहेगी, मिथ अपमान निन्गो ये माथा चढूनी बाई बयान तो शरीर को जलाएंगे ये बड़ा अपमान है, अकेला समसान में छोड़के कुटुम्बी चले आएंगे, फिर जीवन भर इसका मान हुआ तो क्या हुआ? 29:59 तो यह अपमान मृत्यु का अपमान हो जाए, उसके पहले मृत्यु के पार जगह पर पहुंच जाएं, इसमें 30:05 वह शिष्य दक्ष रहता है कुशल रहता है, उसमें उसने अगर बुद्धि का उपयोग किया तो ठीक शिष्य है, और 30:13 ठीक मनुष्य जन्म का उसने फायदा उठाया, नहीं तो बुद्धू है बुद्धू, कमा कमा के रुपए पैसे 30:19 क्या-क्या जिगिड जिगिड कर के, छोरे छोरियों को बहू को दे के, और आप 30:24 यमदूतओं के गुलाम हो गया, तो वो मूर्ख है। शिष्य में तो ये होता है अदम्भित्वं अमानित्व अमात्सर्य दक्षता ये गुण होते हैं, तो वहां ज्ञान टिकता है, गुरु के कृपा ठीक से खींच के आ जाती है, पोतानु कार्य आत्म लाभ आत्म लाभ प्राप्त करना माँ आलास नहीं विलंब नहीं , विलम्ब करिस्साके नहीं आलस रखे नहीं , बॉडी शिष्य छे व दक्ष कहवै छे दक्षता कुशलता हाँ आलस आत्मलाभ करना माँ आलास थे तो व दक्ष नथी बुद्धू छे , शिष्य तो छे पर बुद्धू छे , विनम्र छे पर बुद्धू छे।
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