साधक ऐसा चाहिए - Part -1 (१६ - १० - ८३)
सत्संग के मुख्य विन्दु -
तुलसीदास जी का मत - अर्थात्, जो कुछ दिखाई देता है, सुनाई देता है, विचार में आता है, वह सब मोहजनित है, उसमें परमार्थ नहीं है।
संसार की नश्वरता - देह का सौंदर्य वृद्धावस्था में मिट जाता है। // जवानी के विषय भोग क्षणिक हैं। // शरीर बुढ़ापे में रोगों का घर बन जाता है।// संबंधी भी समय पड़ने पर पराए हो जाते हैं। // इसलिए विवेकी पुरुष पहले ही आत्मा का सहारा ले लेता है, विषयों से उपराम हो जाता है।
वैराग्यवान की दृष्टि - देवताओं का सुख भी उसे तुच्छ लगता है। // अप्सरा मरी हुई हिरणी जैसी लगती है। // वावाही और प्रतिष्ठा उसे सुअर की विष्ठा जैसी लगती है।// उसके लिए सब कुछ मायामात्र है।
गुरु-शिष्य कथा // राजा की बगिया में शिष्य पलंग पर सो गया तो थप्पड़ खाए, और गुरु मौन रहकर सम्मान पाए // संदेश: अहंता ही मार खाती है।
दत्तात्रेय और यदु राजा का संवाद - दत्तात्रेय ने कहा—"मेरे 24 गुरु हैं। मैंने सब कुछ से शिक्षा ली है—पृथ्वी से धैर्य // जल से शीतलता // अग्नि से एकांतप्रियता, //कन्या अकेले रहने की महिमा, //मधुमक्खी से संग्रह त्याग की सीख। // सार: संसार के प्रत्येक जीव-जंतु और प्रकृति से साधक शिक्षा ग्रहण कर सकता है।
कठियारे और बाबा की कहानी -
सेठ और बाबा की कहानी
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।।
जो कुछ मन से सोचा जाता 0:37 है। वाणी श्रवण नेत्र आदि इंद्रियों से अनुभव किया जाता है वह सब नाशवान है मन का 0:44 विलास है माया मात्र है।
ये श्रीमद् भागवत का 11 में स्कंद का 0.52 सातवा अध्याय का एक श्लोक है श्रीमद्भगवद गीता के 11 स्कंद सातवा अध्याय शलोक 1:02 है, इसी अर्थ का तुलसीदास जी ने अपनी भाषा 1:07 में कहा है, देखिए सुनिए गुनिये मोह मूल परमार्थ 1:15 नाही, देखिए सुनिए गुनिये मन माही मोह मूल 1:21 परमार्थ नाही, जो कुछ देखने में आता है सुनने में 1:27 आता है मन के विचार में आता बुद्धि के निर्णय में आता है इंद्रियों की 1:33 पकड़ में आता है। समाज की जकड़ में आता है जो कुछ दिखता है सब अज्ञान से सच्चा 1:42 भासता है, बाकी सब सपना है सब स्पप्न मात्र है। मोह मूल 1:48 है
अपने स्वरूप का पता नहीं इसलिए जीव बिचारा भटक भटक इसी में जीवन गवा देता है। 1:55 लेकिन समझदार लोग समझते कि शरीर की नश्वरता क्या है,, 2:03 बुढ़ापा आने के पहले ही जवानी को विषय भोग में न गिराकर परमात्मा में लगा देते 2:09 हैं। आग लगने पर कुआ खोदते नहीं पहले से ही कुआ तैयार कर देते 2:16 हैं। नींद कहां से आएगी सारी रात दूसरों की नींद खराब होगी और लोग बोलेंगे बूढ़ा मर जाए।2:21 उसके पहले वह अहंकार को मार देता है वासना को मार लेता 2:28 है चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाएगी चेहरा भद्दा हो जाएगा उसके पहले व अपना असली चेहरा देख लेता 2:36 है। बाल सफेद होने के पहले ही व अपना हदय को स्वच्छ कर लेता 2:41 है।,,,,,, ढीले पड़ जाते हैं आंखों से आंसू बहने के कारण आंखें विबीच जाती 2:49 है, वक्ष स्थल मरे हुए ढोर के चमड़े जैसा हो जाता 2:55 है। बुढ़ापे में शरीर के जो मल विसर्जन के स्थान है वह 3:02 भी अपना धर्म छोड़कर निस्तेज हो जाते हैं 3:08 दस्त लग जाते हैं अजीर्ण हो जाता है। अनिद्रा का रोग हो जाता है बुढापे में 3:15
मित्र संबंध और संबंधी और अपने सब पराए होने लगते हैं। उसके पहले वह परमात्मा 3:22 का हो जाने की कोशिश करता है। जो सुयज्ञ है जो समझू है वो समझता है कि 3:28 सब चार दिन चुटका मात्र है, देखने भर कोई मित्र है, देखने भर को पत्नी और पति 3:36 है, यह सारा संसार स्वप्न की नाई बहा जा रहा, 3:45 है मौत के पहले वह अपना सामान सजा लेता 3:51 है।
उस वैराग्य वान की बुद्धि में सदा ऐसा ही रहता है जैसे अजगर की कोई सैय्या नहीं बनाकर आराम 3:59 करता है। अग्नि को कोई आलिंगन करने की इच्छा नहीं 4:05 करता, वमन किए हुए भोजन को कोई ग्रहण करने की इच्छा नहीं करता, ऐसे व विषयों की इच्छा 4:13 नहीं करता, वावाही कि इच्छा नहीं करता, धन की इच्छा नहीं करता, निर्धनता की 4:19 इच्छा नहीं करता, उसको तो यह लगन होती है कि बस परमात्मा को कैसे 4:26 पाये।
कई जन्मों में कीट बना था, कई जन्मों में पतंग बना कई जन्म में बंदर बना था, कई 4:31 जन्मों में देवता बना था, उस वैराग्य वान को 4:38 तो देवताओं का सुख वो कुत्ते का सड़ा मास जैसा लगता है, अपसरा 4:47 उसको मरी हुई हिरनी जैसी लगती है, ववाहि उसको सुकर की 4:53 विष्टा जैसी लगती है।
हम समझते होंगे कि जिस बुद्ध पुरुष 4:52 वावाहि करते उसको बहुत मजा आता होगा, लेकिन उसको ना मजा आता है ना सजा आता है, साधक को तो सजा होती 5:06 है।
साधक के लिए प्रतिष्ठा सुकर विष्टा जैसा लगता है। मूर्ख को प्रतिष्ठा से रस 5:11 आता है, मूढ को प्रतिष्ठा में रस आता है,साधक को प्रतिष्ठा जहर जैसी लगती है।
सिद्ध के 5:19 लिए जिसने अपना काम बना लिया है उसके लिए प्रतिष्ठा अप्रतिष्ठा सब मनो मात्र है। 5:26 सारा विश्व मनोमय है, माया मात्र है।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः। मन से वाणी 5:34 से चक्षु से कानों से जो कुछ सुनाई दिखाई पड़ता सब मनोमय 5:40 है।
तुम्हारी मन की वृति को अंतर्मन पर देखो फिर प्रशंसा निंदा कुछ नहीं है, भोग और त्याग 5:48 कुछ नहीं है, मित्र और अमित्र कुछ नहीं है, कुछ नहीं में सारा धमाधम हो रहा 5:56 है।
जो समझदार है जो सूयज्ञ है व अपना एक एक स्वास अनमोल समझते 6:05 हैं, जैसे तपे हुए लोहै का पान करने की इच्छा नहीं 6:12 होती, ऐसी उसको विषय भोग की इच्छा नहीं होती। वह समझ लेता है जैसे दरिया को अथवा नदी 6:22 पार करने वाला सुनता है कि नदी के बीच मझधार में गहरा पानी है तो पहले से तुम्बा बांध 6:27 देता है। ऐसे ही संसागर सागर को तरने के लिए पहले ही वो ज्ञान का तुंबा बाध लेता 6:34 है।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।
(गुरु 6:40 और शिष्य जा रहे थे गुरु ने कहा देख बेटा कुछ बनना 6:48 मत, बनेगा तो बिगड़ेगा कुछ बनना मत मेरे साथ है तो फिर कुछ बनना 6:55 मत। ) साधक भी कुछ बनने की इच्छा नहीं करता। 7:00 मुक वत, जड़ वत, लोशत वत, काष्ठ वतका बहुत चतुर मत बन नही तो बेमौत मारा जाएगा7:08 संसार में। (डाहप सायडप के छ डे नाम नीह 7:13 सा लाये।) सिंधी (कह नानक सुन रे मना वृथा जनम 7:20 न गवाये)
चहरा लथरिया खाए विभिष चेहरा हो जाए पड़ोसी कहेगे 7:25 की बुड्ढा रात भर नीद खराब कर रहा है। रोग घेर ले उसके पहले ही वो निरोग आत्मा 7:33 की औषधि को जान लेता है। यह विवेकी मनुष्य का काम 7:40 है। लोग कंधे पर पहुंचाए उसके पहले व अपने मन को आत्मा में पहुंचाने का यत्न करता 7:47 है। मित्र मुह मोड़ ले उसके पहले ही वह अपना मुह परमात्मा की तरफ मोड़ लेता है। 7:55
बेटा तू सावधान रहना कुछ बनना मत, सतर्क 8:03 रहना क्योंकि बनने की पुरानी आदत 8:08 है।
शिष्य ओर गुरु कहानी
( गुरु और शिष्य घूमते घामते जा रहे किसी राजा की बगिया में राजा सैलानी था हवा खाने को आता था, 8:17 अपने कमरे में आराम करता था अलग अलग कमरे बने 8:23 थे, सिचुएशन देखने के लिए, बाहर का सिचुएशन के लिए राजा आता था, भीतर का सिचुएशन पता 8:30 नहीं। शिष्य एक कमरे में सो गया, 8:35 जाकर गुरु दूसरे कमरे में सो गए। राजा घूमता आया देखा कि मेरे कमरे में कौन सो 8:41 गया है नौकर ने पूछा कौन है तो शिष्य ने कहा कि 8:47 मैं मैं साधु। सिपाई ने उठाकर एक थप्पड़ रख दी की 8:55 साधु है, कैसा साधु है राजा साहब के पलग पर सो गया, राजा के घर में घुस गया बिना पूछे। 9:03 9:08 कैसा तू साधु है, साधु है और फिर भी पलंग पर सोने का शौक नहीं 9:16 गया, साधु है, फिर भी अब तू आराम चाहता है कान खीच के दो चार थप्पड़ रख दिए भगा 9:23 दिया। घूमते घूमते राउंड मारते दूसरे कमरे में पहुंचे देखा कि वहा भी कोई सोया हुआ 9:32 है। बजीर ने पूछा कौन हो? बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया बजीर पूछता 9:37 गया आखिर हिलाया तो व बाबा आंख मचलता हुआ 9:43 उठा। पूछा कौन हो बाबा चुप। राजा ने कहा इनको डाटो मत कोई 9:52 सिद्ध महात्मा मालूम होते राजा ने उनका आदर किया प्रणाम 9:59 किया। )
जब कुछ जीव बनता है तब अहंता जोडता है 10:05 अहंता मार खाती है अहंता और मार खाती 10:10 है, और अंहता ममता में कोई सार नहीं 10:16 है।
भागवत कहता है - यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः। जो कुछ मन से सोचा जाता है वाणी से 10:29 श्रवण और नेत्र आदि इंद्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान है।
10:36 मन का विलास है, माया मात्र इदम सर्वम,
सब माया 10:43 मात्र, जिसको अज्ञानी पामर मूर्ख लोग सच समझकर अपना जन्म गवा रहे हैं, उस संसार में 10:50 कोई सार नहीं। कोई किसी का नहीं है हाड़ मास का देह, 10:55 रक्त पससे भरा हुआ है।
जैसे समझदार 11:00 आदमी स्वान की त्वचा में पड़ा हुआ खीर पान करने की इच्छा नहीं 11:09 करता, ऐसे समझदार दूसरे गर्भ में माताओं का दूध पीने की इच्छा नहीं 11:14 करता, जैसे कोई लेटरिन के पाइप में निद्रा 11:21 करने के लिए नहीं जाता, ऐसे ही दूसरे जन्म में माता के उस पाइप में नो महिने 13 दिन 11:29 आराम करने की इच्छा नहीं करता समजदार आदमी।
देखिए सुनिए 11:38 मोह मूल परमार्थ नाही ये सब मोह मूल है, इसमें कोई सार नहीं है धनी होने में सार 11:44 नहीं, निर्धन होने में सार नहीं, बहुत धन कमाने में भी सार नहीं, 11:49 भिखारी होने में भी सार नहीं, स्वर्ग होने में भी सार नहीं।
सब 12:01 असार सब माया मात्र है जैसे रक्त और परो के 12:09 भरे हुए कुंड में कोई स्नान करना नहीं चाहता, जैसे पामर और दारु व्यक्ति को कोई 12:15 न्यायाधीश बनाना नहीं चाहता, ऐसे ही अज्ञानी मन के कहने में साधक 12:27 नहीं चलता।
ॐ ॐ ॐ ॐ ओ ओ ओ 12:34 ओ ओ
श्री कृष्ण का वचन 12:41 है ओधव जैसे भभकते हुए तिनको में कूदने की इच्छा 12:46 नहीं की जाती, ऐसे ही समझदार इंद्रियों के भोग में नहीं कूदता वो अपने इंद्रियों को 12:59 अंतर्मुख करता है। अपनी इन्द्रियों को अन्तर मुख करके मन को परमात्म शांति में डुबोकर मेरे से अचल हो जाता है।
13:05 सुकदेव जी महाराज सावधान करते हैं परीक्षित बिलासी आदमी के लिए तो सारा संसार छोटा है 13:13 सारे संसार की चीज कम है, लेकिन वैराग्य वान के लिए जो कुछ है बहुत कुछ है, हाथ में 13:21 भोजन लेकर खाने को मिल जाए तो बर्तन क्यों रखना। खुबे में पानी पी सकता है तो गिलास 13:28 क्यों संभालना पड़े। भुजाओ कोई अपना तकिया बनाकर आदमी 13:34 आराम कर सके तो तकिया क्यों बढ़े।
जिसको सात दिन में मुक्ति चाहिए उसको 13:40 संग्रह तो नहीं, लेकिन जो कुछ है उससे भी उपराम होकर सतत हरि का चिंतन करके हरि रूप 13:48 हो जाना चाहिए।
जिसके केश मौत में पकड़े हैं उसको 13:53 अधिक मित्र नहीं बनाने चाहिए, अधिक जगत की बातें नहीं करनी, चाहिए उसे शुचि होना चाहिए, 14:00 दक्ष होना चाहिए, उदासीन होना चाहिए, गत व्यथा होना चाहिए, 14:08 उनपे अपेक्षा ना रखें अपेक्षा न करे।
किसी का धन किसी का साम्राज्य किसी का 14:16 ऐश्वर्य देख कर इच्छा ना करें क्योंकि मन सत्य संकल्प है फिर उस अवस्था में आना पड़ेगा।
फिर 14:23 जन्मना पड़ेगा फिर मरना पड़ेगा इसलिए दक्ष होना चाहिए जैसे तैसे 14:29 संकल्प करके अपने को कर्म के बंधन में ना डालो, लेकिन ऐसे संकल्प करो कर्मों के बंधन 14:37 बनाये उसको काटो।
अभी जो तुम्हारी स्थिति है, अभी जो तुम्हारी अवस्था है, अभी जो तुम 14:47 हो, यह तुम्हारे संकल्पों का रूपांतर है। पहले के किए हुए संकल्प अभी तुम 14:53 हो, और इस होने से भी काम नहीं चलता और होने से भी काम नहीं चलेगा तुम कुछ होने 15:02 की इच्छा मत करो। सतत सावधान रहकर उस आत्म पद को जान 15:09 लो।
जैसे समझु आदमी समुद्र का जल पीने की 15:15 इच्छा नहीं करता, ऐसे ही समझु आदमी इंद्रियों के भोग की इच्छा नहीं 15:23 करता।
वांगू मक्खन पेड़िया सुंदर विषय पिछाण
ये लडडू चुने जहर के खावण मर जाढ।
जैसे चूने के लड्डू मक्खन के पिंड जैसे लगते हैं लेकिन खाने मात्र से जीव का 15:36 मृत्यु हो जाता है, ऐसे विषय सुख कर भाते हैं भोगने मात्र से बल बुद्धि तेज 15:44 तंदुरुस्त आयुष नाश हो जाता है।
बुढ़ापे में मन चंचल हो जाएगा अधैर हो 15:52 जाएगा उसके पहले ही व मनन कर लेता है। बुढ़ापे में टांग शिथिल हो जाएगी उसके 15:59 पहले ही वो यात्रा स्थान की यात्रा ये कर लेता है। बुढ़ापे में कान बहरे हो जाएंगे उसके 16:04 पहले वह ब्रह्म विद्या सुन लेता है, बुढ़ापे में आंखों की रोशनी मारी जाएगी 16:11 उसके पहले वो महात्मा पुरुषों का दर्शन प्रशन करके आत्म शांति पा लेता 16:16 है।
बुढ़ापे में बुद्धि चंचल स्थिर अग्रहनी शक्ति 16:21 हो जाएगी, उसके पहले वो बुद्धि को स्थिर बुद्धि को जवानी में ही आत्मा में 16:29 स्थिर कर लेता है। ध्यान में स्थिर कर लेता है। बुढ़ापा आने के 16:36 पहले ही।
आग लगने के पहले ही वो ज्ञान का कुआ खोद लेता है, हे 16:42 उद्धव मैंने कई प्रकार के जीव और जंतु की रचना की, मैंने वृक्षों की रचना की पशु की, 16:49 रचना की, पशुओं की रचना की, दो पैर और दो हाथ वाले आदमी की अपेक्षा मुझे और कोई अधिक 16:56 प्यारा नहीं। उसी को आत्मज्ञान पाने का अधिकार मिला है। उसी को मनुष्य जन्म सफल करने का 17:01 अधिकार मिला है। उधो विषय सुख तो और योनियों में बड़े सुविधा 17:06 पूर्ण मिलते हैं।
खाना पीना बच्चों को पैदा करना दुख आए 17:14 तो घबराना और सुख आए तो पूछ हिलाना, ये तो कई जन्म के पामर जीव कर लेते 17:19 हैं।
जैसे सुकर नाली में खुश होता है ऐसे 17:25 ही अभागे आदमी विषय भोग में खुश होते हैं हुआ है हु हु में अपना जन्म गवाते हैं, उनको अच्छी 17:32 कथाएं रुचती नहीं उन अभागो को अच्छी कथाओं में समय नहीं मिलता। लेकिन मेरा जो प्यारा भक्त 17:40 है, जिसके पास विवेक है व साधु पुरुषों को खोज लेता 17:48 है।
निर अभिमानी होकर उनके चरणों में प्रणाम करके अपना पाप और संताप निवृत करता 17:54 है। मेरे जो साधु पुरुष है उनके दर्शन पशन से उसको मेरी याद आती 18:00 है। मेरे जो संत पुरुष है उनके हदय के अनुभव युक्त वचनों को वो अपने हृदय के वचन 18:11 बना लेता है। उधव और अधिक तुझे मैं क्या 18:18 कहु जैसे उल्लू को सूर्य नहीं दिखता ऐसे ही विषय के भोग में जो उल्लू हो गए उनको 18:25 ज्ञानियों का ज्ञान नहीं दिखता। बेहद भागी अभागे धन ऐश्वर्य में ही 18:32 अपना जीवन गवा देंगे और बुढ़ापे में पश्चाताप करके मरेंगे फिर विष्ठा के कीड़े होंगे फिर भी उनके 18:38 दुख दूर ना होंगे।
पुत्र में मोह होगा पौत्र में मोह होगा पुत्र और पौत्र के विष्टा के कीड़े बनकर वे दुख से न छूटेंगे। 18:44।
तुलसीदास कहते 18:53 हैं -
जो न तरै भवसागर नर समाज अस पाइ।
सुकृत निंदक मंद मती आत्महन अधोगति जाई।
वो कृतज्ञ है निंदक है मंद मती है 19:04 आत्महत्यारा है, अधोगति को जाएगा कुती के पेट में आएगा, गधी के पेट 19:04 में आएगा, कीड़ों के पेट में आएगा, वृक्ष बनेगा ऐसे भोगियों का वो संग नहीं 19:12 करता।
जैसे त्यागे हुए मल का संग नहीं किया 19:17 जाता त्यागे हुए मल को हाथ में नहीं लिया जाता, ऐसे 19:23 ही वो ऐसे पामर विषय व्यक्तियों का साथ नहीं करता वो मूढो के हाथ में अपना हाथ 19:30 नहीं देता। उसका हाथ तो साधु के चरणों तक पहुंचता है। उसके हदय तो साधुओ के लिए खुला 19:37 रहता है, उसका हदय मूढ़ के लिए बंद हो जाता 19:45 है। लेकिन जो अभागे लोग है,वैराग्य की बात सुनके ही भाग जाते हैं हे उद्धव जिनके पाप 19:54 बहुत है उनको ज्ञान और वैराग्य की बात का पता ही नहीं चलता। 20:03
जिसके पुण्य पुंज है जिनके भाग्य खुले हैं, जिन पर मेरी कृपा 20:09 है, जिन पर माता पिता का आशीर्वाद है, जिन पर किसी गरीबों की दुआ 20:15 है, उनकी अक्ल काम देती 20:22 है, वो संसार के सागर में डूबने के पहले 20:27 ही आत्म ज्ञान का किनारा ढूंढ लेते हैं।
नाक की रीत टेढ़ी हो जाती 20:34 है, गाल लथर जाते है, उससे पहले वो अहंकार की लथर कर साधु पुरुषों से आत्म ज्ञान 20:43 सुनकर अपने जीवन को आत्मा में स्थिर कर देता है।
है उद्धव अधिक तुझे क्या 20:53 कहु। ये पुत्र मेरे हैं, यह परिवार मेरा है, ऐसी दुर्बुद्धि को त्यागकर, 21:00 इस सबको मनो मात्र समझ कर, माया मात्र समझकर इसका मोह त्याग 21:11 दे।
हे उधव तू बद्रिकाश्रम जा, इंद्रियों 21:16 की चपलता छोड़, जगत की चीजों की वासना 21:23 छोड़, ये आंखों के विषय, ये कानों के विषय, ये नाके के विषय, ये शिशना के विषय, मूर्ख 21:31 लोगों को भटका देते हैं।
मछली जैसे स्वाद में अपना जीवन बर्बाद 21:39 कर देती है, ऐसे तू जिह्वा के स्वाद में अपना जीवन बर्बाद मत 21:45 करना। हिरण जैसे शब्द में अपना जीवन बर्बाद कर देता है, ऐसे ही उधव तु अपना बाहर के 21:52 गीत गान में अपना जिंदगी बरबाद मत करना। 21:58 हाथी जैसे हाथीनी को देखकर कामातुर हो जाता है, गड्ढ़े में गिरता है और सारी जिंदगी महावत की गुलामी सहता 22:07 है, ऐसे काम रूपी महावत की गुलामी सारी जिंदगी सहकर अंत में क्या मिलता 22:15 है? अंत में क्या हाथ लगता है उधव? श्री कृष्ण कितनी सुंदर बात कह 22:23 रहे ? श्री कृष्ण ऐसा नहीं कहते कि बस कृष्ण कृष्ण कृष्ण करते रहो, श्री कृष्ण 22:29 कहते कि मैं जो कहता हु उसको समझ कर संसार से उपराम हो जाओ।
मैं जो तुम्हारे हृदय में छुपा हूं उसमें 22:37 तुम आराम करो फिर मेरे में और तुम्हारे में कतई भेद ना रहेगा। विषयों की गुलामी करने से तुम तुच्छ 22:46 हो जाते हो, दिन हो जाते हो और अपने आत्मा में आराम करने से तुम 22:52 परमेश्वर हो जाते हो। हे उद्धव चुनौती तुम्हारी है 23:02
यदुकुल के राजा और दत्तात्रेय योगेश्वर का संवाद
पूर्व में हमारे कुल के यदुकुल के यदु राजा 23:08 ने बहुत भोग भोगे थे, राज्य का सुख लिया था, लेकिन इंद्रिया 23:15 तृप्त नहीं हुई। आत्मा के आनंद में 23:24 मस्त, ब्रह्मानंद की मस्ती में मस्त, अवधूत नागेश्वर को उन्होंने 23:32 देखा। यदु राजा ने आदर से प्रणाम किया और कहा कि भगवान तुम्हारे पास कोई राज्य नहीं फिर 23:38 भी चेहरे पर बड़ी शांति है। तुम्हारे पास सोने के लिए पलंग नहीं है 23:44 फिर भी बड़ी शांति है, खाने के लिए व्यंजन नहीं, फिर भी तुम्हारा चेहरा तंदुरुस्ती की 23:50 और प्रसन्नता की खबर दे रहा है। तुम्हारे पास नौकर चाकर ना होते हुए भी 23:57 तुम्हारा शरीर सुडौल तंदुरुस्त है। हे नाथ तुम्हारी 24:06 शांति को देखकर मुझे अपने राज्य से घृणा हो रही है तुम्हारी निश्चलता को देखकर मुझे अपने चलित 24:14 राज से उपरमता हो रही है। यदु राजा ने दत्त को प्रणाम करते हुए 24:23 पूछा क्या आप ऐसे महान आत्मारामी कैसे हुए 24:28 आपके चित में परम शांति के फुव्वारे फूट रहे हैं, तुम्हारे दर्शन से हमको इतना आनंद आ 24:34 रहा है, तो तुम्हारे अंदर कितना आनंद होगा? तुम्हारी निगाहों से इतना प्रेम टपक रहा 24:40 है तो तुम्हारे भीतर कितना होगा? अर्द्ध पाद से पूजन किया, आदर से चरणों में 24:51 बैठकर। हमारे कुल में उत्पन्न हुए यदु कुल में यदु राजा ने प्रश्न किया 24:59 तब जीव मात्र के परम आत्मज्ञानी व योगेश्वर दत्तात्रेय कहते हैं,,कि 25:08 राजन मैंने एक गुरु नहीं बनाया कई बार एक गुरु के उपदेश 25:15 से जीव का काम नहीं चलता, एक बार के मंत्र दीक्षा से काम नहीं 25:21 चलता, इसलिए अनेक अनेक ब्रह्म वेत्ताओं के उपदेश को गुरु लोग दोहरा कर आत्मज्ञान जगाते 25:30 हैं। दत्तात्रय गुरु है जिसको आत्म ज्ञान है, वे सब गुरु है 25:37 उनको हमारा प्रणाम जो इंद्रियों को संयत करके अपने 25:43 चित्त को परमात्मा में लगाते हैं, उनको हमारा प्रणाम,, जो मौत के 25:50 पहले शरीर जर्जरी भूत होने के पहले बुढ़ापा आने के 25:55 पहले शमशान में राख होने के पहले अर्थी की सवारी करने के पहले जो 26:03 इंद्रियों पर सवार हो जाते हैं ऐसे साधकों को दुख नहीं देखना पड़ता 26:15 है। बाकी के लोग धुन धुन के पछताते हैं।
स धुन धुन पछता वही, कालहि कर्म ही मिथ्या दोष लगावे।।
26:35 दत्तात्रेय कहते हैं - हे यदु राजा मैंने पृथ्वी को गुरु बनाया 26:44 है, पृथ्वी को कोई खोलता है कोई कितना अनिष्ट करता है कोई कितना ही 26:50 हरकत करता है लेकिन पृथ्वी में धैर्य है, सब अपनी अपनी धारणा और मान्यता के अनुसार 26:56 व्यवहार करता है, ऐसे मैंने अपने चित्त को पृथ्वी की तरह अचल 27:01 कर दिया। कोई भला कहे तो क्या है? कोई अत कहे तो क्या? है कोई बुरा कह दे तो क्या है 27:07 कोई चंदन का लेप कर दे तो क्या? कोई सोने के सिंहासन पर बैठाए तो क्या है? कोई थूक 27:13 दे तो क्या है? आखिर तो पृथ्वी का बना हुआ पुतला पृथ्वी में मिट जाएगा, इसलिए मैं अपने चित्त को पृथ्वी का 27:21 गुण लेकर अचल रखता हूं। चित्त को अचल रखने के कारण मेरी शांति 27:28 अचल बनी रही है।
मैंने जल को भी अपना गुरु 27:36 बनाया, जल का स्वभाव जैसे द्रविभूत है, जल का स्वभाव जैसे शीतल है, उसे तपाया जाए तो 27:44 गर्म दिखता है लेकिन छोड़ दो तो फिर शीतल होता है। गर्मी उसका अपना गुण नहीं 27:52 है गर्मी लाई जाती है, देखने मात्र को है। 27:57 जल को फिर वो जैसे का वैसा हो जाता है ऐसे ही मैं चित को छोड़ देता 28:07 हूं उस चैतन्य में तो वह चित चैतन्य स्वरूप में शीतल हो जाता 28:15 है, जैसे जल का स्वभाव है लोगों की प्यास 28:24 बुझाना, ऐसे ही में ज्ञान का पर्व लगा लोगो की अशांति और जन्म जन्म की प्यास बुझाने 28:31 का प्रयास करता हु। मैंने जल को अपना गुरु बनाया 28:38 है।
मैंने तेज को भी अपना गुरु बनाया है अग्नि को अपना गुरु बनाया है अग्नि कभी 28:45 व्यक्त होती है कभी अव्यक्त हो जाती है ऐसे ही में कभी तो लोगों के बीच होता हूं और कभी एकांत में चला 28:53 जाताहु। सतत लोगों के बीच रहने से विक्षेप बढ़ जाता है, 28:58 सतत लोग के बीच रहने से इंद्रियों में आदमी जीने लगता है, सतत लोको के बीच रहने 29:03 से भोगों में आसक्ति हो जाती है। इसलिए साधक को उचित है कि सतत लोगों के 29:09 बीच ना रहे कभी कभी एकांत में चला जाए। लोग भाशा जिनको मौन मंदिर में रहने को मिल 29:15 जाता है उनको बढ़िया बढ़िया अनुभव होते हैं एकांत वासो लघु भोजनाम मोनां म निराशा 29:24 करुणावरुणालय। एकांतवास में जो चित का प्रसाद मिलता है, एकांतवास में जो आत्मा की शांति लहराती है, 29:32 एकांतवास में जो अग नाश होते हैं, एकांतवास में जो परमात्मा का प्रेम मिलता 29:38 है, वो कोई एकांत वासी से पूछो मीरा को क्या मिलता है मीरा से 29:47 पूछो।। बुद्ध को क्या मिलता है मौन में बुद्ध को पूछो।। कबीर को क्या मिलता है कबीर से पूछो।। 29:54 जनक को क्या मिला था जनक से पूछो।। 30:00 ॐ ॐ ॐओ ओ ओ 30:06 ओ
संसार को सच्चा मानने के कारण, इंद्रियों में अपना जीवन नष्ट करने, 30:13 के कारण भोगों में अपनी बर्बादी करने के कारण, 30:18 वह अनहद नाद सुनाई नहीं पड़ता, वो सोहं का नाद सुनाई नहीं 30:26 पड़ता, वो सहज में आत्मा का आनंद दिखाई नहीं पड़ता। , ॐ ॐ 30:38 ओ मैंने कई गुरु किए इन 24 गुरुओं में
एक कुंवारी लड़की भी मेरी 30:45 गुरु थी घूमता घामता गया में, लड़की के सपर्ण के लिए कुछ लोग गए थे घर 30:53 मां बाप थे नहीं, वो धान छड़ रही थी 30:58 मेहमान बैठे कमरे में मां आएगी खिचड़ी बनानी है मेहमानों के लिए भोजन बनाना है। 31:03 चावल छड़ रई थी। उसके हाथ में बंगिया थी देखा कि बहुत 31:10 बंगिया होगी तो आवाज आएगा मेहमान हमारे घर की दरिद्रता समझ जाएंगे बंगरिया उतार कर रख दी। 31:18 दो में भी आवाज आ रहा था फिर एक उतार दी एक रही तो आवाज बंद हो 31:25 गया।
अधिक लोगों के बीच रहने से राग द्वेष होता है तेरा मेरे का गुं घाट होता 31:33 है, लेकिन साधना में तो दो आदमी रहने से भी एक दूसरे के मानसिक आंदोलन की असर होती 31:39 है। इसलिए साधना में जब बैठे तो अकेले एक होकर बैठे एक होकर अपने को समझे। जब मैं घर में 31:47 बैठु या गुफा में बैठु तो अकेले अपने ईश्वर में डुबा रहु। और कोई नहीं ऐसी भावना से मैं अद्वैत 31:55 भावना में स्थिर होता हूं,।
साधक को अकेले में कभी-कभी बैठने का 32:01 अभ्यास करना चाहिए । मन के विचारों को निहारना चाहिए, कभी 32:06 कभी मौन होना चाहिए। मैंने उस लड़की की चूड़ीयों से भी शिक्षा ले ली कि अकेला बैठना शांति का 32:14 कारण होता है।
मैंने अजगर को भी अपना गुरु बनाया है। 32:31 मैंने मछली को भी अपना गुरु बनाया है। मैंने पतंग को भी अपना गुरु बनाया 32:39 है। मैंने मधुमक्खी को भी अपना गुरु बनाया है। राजन जैसे मधुमक्खी संग्रह करती रहती 32:47 है संग्रह के साथ उसका भी विनाश हो जाता है। ऐसे ही साधक 32:54 को संसारी चीजों का संसारी बातों का संग्रह नही करना चाहिए। यदि संसारी बातों का संग्रह करता है 33:03 तो अपनी शक्ति उसम लीन हो जाती है और साधक का नाश हो जाता है। साधना का नाश हो जाता 33:10 है। तुलसीदास कहते हैं -
देखिए सुनिए गुनिये मन माही मोह मूल परमार्थ नाही|
भागवत में 33:18 कृष्ण कह रहे हैं
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।।
जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी श्रवण नेत्र आदि इन्द्रियों से अनुभव किया 33:35 जाता है, वह सब नाशवान है, मन का विलास है, माया मात्र 33:42 है। बड़े बड़े राजे चले गए पृथ्वी की धूली की कणिका तुम गिन सकते 33:49 हो, लेकिन यहां पर कितने मनुष्य आकर चले गए वो नहीं गिन सकते हो 33:58 सम्राट अपना नाम जिन कीर्ति स्तंभ पर स्वर्ण अक्षर से 34:03 लिखकर गए कीर्ति स्तंभ भी जर्जरी भूत होकर नष्ट हो गए कुतुब मीनार बनाकर जो लोग अपनी 34:11 यश चाहते थे उन लोगों की हड्डियां भी नहीं मिल रही है, अब तो कुतुब मीनार भी चलने को है। ऐसे 34:20 कुतुब मीनार भी कई बने और कहीं चले गए तो तुम्हारा मीनार कब तक 34:25 रहेगा। तुम्हारा यह देहरूपी मीनार गिरे उसके पहले ही तुम अपनी वासनाओं को 34:31 परमात्मा के चरणों में गिरा कर परमात्मा के हो जाओ।
सुखदेव जी महाराज परीक्षित को कहते 34:38 हैं राजन भोगी मनुष्य के लिए तो बहुत सारे भोग है, लेकिन साधक के 34:45 लिए तो बहुत समय है।खटवांग राजा को एक महूरत में ज्ञान हो गया, तेरे लिए तो सात 34:53 दिन है। सात दिन में मोक्ष होना कोई कठिन बात नहीं है, लेकिन इंद्रियों 34:59 को अंतर्मुख करके मन को परमात्मा में लगा दे तो 7 घड़ियों में भी मोक्ष हो सकता 35:06 है।
ये जगत को माया मात्र समझ इस जगत को स्वप्न मात्र समझ राजा वेण आया रघुराजा 35:13 आए और राजा आए, लेकिन हे राजन सब आकर जैसे पानी में बुद बुदे होकर 35:20 नष्ट हो जाते हैं ऐसे सब राजा आ आकर नष्ट हो गए, तू किस राज्य की इच्छा रखता है।
कबीर 35:27 कहते हैं -
क्या करिये क्या जोडिये थोड़े जीवन का काज छोड़ी छोड़ी सब जात है
सब छोड़ छोड़ कर जा 35:39 रहे है। मैंने सर्प को भी अपना गुरु बनाया है सर्प जैसे दूसरे के बिल में जी लेता है 35:48 ऐसे ही साधक भी दूसरे के मकान में दूसरे के आवास में जी ले। बड़े आवास बनाने की 35:53 चिंता ना करें।
उर खोदन बोरिंग भोगवे को 36:02 कुओ बिल टाइंडो आहे 36:11 कुओ वडो खोडिंडो वेंदो गिर्दों वेदों बिल में
36:17 वदो शाही विल टाइंडो वेंदो। नाग ईंदो बिल में गुसदो कुए के खाई वेदों पान अछि रहीदो विल में। सिंधी
ऐसे गृहस्थी आदमी तो खूब कथा करते 36:25 हैं, त्यागी सन्यासी ब्रहमचारी उसको भोग कर भगवान के रास्ते चल 36:37 पड़ते है।
संग्रह अधिक अच्छा नहीं यह मोक्ष पथ में आड है।
कैसे भला तू भग सके सिर पर लगा 36:45 जो भार है।
सेठ और बाबा की कहानी
एक सेठ फकीर के चरणों में आया बाबा जी 36:52 मुझे दया करके शांति दीजिए, संत दयाल होते है, कृपा निधान होते है। 37:00 बाबा ने कहा शांति तो तेरा स्वभाव है, शीतलता तेरा स्वभाव है। नहीं महाराज बहुत 37:06 दुखी उसने सब दुखड़े सुना दिए। बाबा ने देखा कि बड़ा बीमार है क्या 37:12 किया जाए। बाबा ने कहा यदि परमात्मा का दर्शन 37:18 करना है, शांति पानी है, सुख पाना है, तो मेरे साथ घूमने चलना कल। 37:23 को।
बोले महाराज संतो के साथ एक कदम उठाना अच्छा है मेरे सौभाग्य होंगे मैं चलूंगा 37:30 आपके साथ। दूसरा दिन सुबह हुआ महाराज और सेठ 37:35 दोनों चल पड़े घूमने के लिए, सामने पहाड़ी दिखाई दे रही 37:41 है, महात्मा ने कुछ कंकड़ और पत्थर ईकट्ठे किए पोटला बांधा। सेठ जी को कहा के जरा उठा 37:50 चल। सेठ जी ने पोटला सिर पर लिया। चलते भए थोड़ा सा ही चलने पर सेठ का तो अभ्यास भी 37:57 नहीं था पोटला भारी था, बोला बाबा जी आप तो तेजी से जा रहे मैं 38:04 तो नहीं चल सकता। थोड़े पत्थर कम कर दिए बोले हां अब 38:10 जरा ठीक है थोड़ा सा एहसास हुआ, और चले फिर 38:15 भी बोजा लग रहा है, तो और थोड़े गिरा दो, और ऊपर चले। बोले 38:23 बाबाजी ज्यो ज्यो ऊपर जाते है तो थोड़ा भी ज्यादा लग रहा है जो जो ऊचे चढ़ते हैं तो थोड़ा भी ज्यादा 38:30 लग रहा है और जो जो आदमी नीचे होता है तो ज्यादा 38:35 भी थोड़ा लग रहा है जो जो आदमी नीचे के केंद्रों में होता है जो जो हल्की बुद्धि का होता है त्यों बहुत सामग्री होते हुए भी 38:43 उसे संतोष नहीं होता, और जो ऊपर उठता है परमात्मा के तरफ थोड़ी सामग्री होते भी 38:48 उसको बहुत सारी लगती है और बोज लग रहा है।
बोले ले चल चलते चलते आधे से कुछ ऊपर 38:56 उठे सेठ बोलता है बाबा जी ये भी नहीं उठ रहे, बाबा ने कहा और कम कर 39:01 दे, आखर जब शिखर के करीब करीब पहुंचना था देखा कि ये छोटा सा पत्थर भी अब तो बोजा, 39:07 देख रहा है फेंको उसको बाबा। फेंका उसको फिर हास हल्के हो गए और जल्दी पहुंच गए। बाबा ने 39:15 कहा बस ऐसे ही है शांति को पहुंचना है तो बस छोड़ दे इच्छाओं को, वासनाओं को, मेरे 39:21 तेरे को।ज्यो ज्यो छोड़ता जाएगा त्यों हल्के फूल की नाही तू परमात्मा के द्वार तक पहुंच 39:26 सकता है। 39:32
भगवान कृष्ण उद्धव को कह रहे हैं, दत्त यदु राजा को कह रहे हैं, कबीर सलका मलका को कह 39:39 रहे हैं, मैं तुमको कह रहा हूं, वही की वही 39:49 बात है।
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।।
देखिए सुनिए गुनिला मोह मूल परमार्थ 40:05 नाही
सब मोह मूल है बुढ़ापा आ गया, लड़के कहने में नहीं चल 40:13 रहे, खेद होता है, और कहने में चलते हैं तो राग होता 40:18 है, जमाई अच्छा है तो अहंकार होता है, और बुरा है तो विषाद होता है। 40:28 पुत्र के घर पुत्र हैं और दादा दादा कहते हैं तो मोह होता है और पुत्र के घर संतान 40:33 नहीं है तो चिंता हो रही है। कबीरा कुते की दोस्ती दो बाजू जंजाल रीझे तो मु चाटे और 40:41खिजे तो पैर काटे। जगत के लोगों के साथ मेल है तो 40:47 तुम्हारा समय नाश कर लेते हैं और द्वेष है तो अशांति पैदा कर देते हैं। कृष्ण कहते 40:53 उधव तू किसकी मित्रता करेगा कब तक लोगों के बीच रहेगा। उठ जा वैराग्य 41:01 का आश्र रख
वैराग्य राग रस को भव
वैराग्य में ही राग 41:08 रख,
वित राग भय क्रोध मुनि मोक्ष परायण
राग भय क्रोध से हटकर मोक्ष के परायण हो जाए मनुष्य 41:22 जन्म।
जैसे अंधा आदमी 41:28 आँखों में शूल नहीं भोकना चाहता, ऐसे अज्ञानी विषयों के शूल नहीं 41:34 भोकना चाहते फिर भी भोक रहे है। जैसे कोई आदमी अपनी आंख में भाला 41:42 भोकना नहीं चाहता या कोई समझदार आदमी अपने भोजन में 41:49 विष नहीं डालना चाहता ऐसे उधाव जिज्ञासु अपने जीवन में 41:56 विषयों का विष नहीं डालना चाहता है। 42:01 दत्त कह रहे हैं कि यदु राजा 42:08 मैंने उस सर्प को भी अपना गुरु बनाया। सर्प को भोजन मिलता है तो कर लेता 42:15 है नहीं तो हवा पान करके भी पड़ा रहता है गुफा में। ज्यादा चतुराई करके बाहर आता है तो 42:22 पत्थर और कंकड़ पड़ते और मारा जाता है ऐसे ही मेरा मन भी ज्यादा चतुराई करके बहिर्मुखी 42:29 होता है तो लोगो की धिकार और फटकार उसको मिलेगी। इसलिए मैं अपने मन को अंतर्मुखी कर लेता हूं।
ॐ ॐ ॐ ----------------------
42:57 जैसे साइकिल के पहिये निकाल दो तो चलना उसका मुश्किल है, ऐसे ही जीवन से अभ्यास ओर वैराग्य हटा दो तो प्रभु की यात्रा होना मुश्किल है। ध्यान का अभ्यास करो और विवेक के साथ 43:04 अपने भीतर छुपे हुए वैराग्य को जगाकर 43:12 वैराग्य राग रस को बढाओ।
श्रीमद् भागवत के 11 में स्कंध में 43:20 सातवे में अध्याय में भगवान कृष्ण उद्धव को उपदेश देते 43:26 हैं, यद
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्।।
उद्धव मनोमय संसार है जो इंद्रियों से देखा 43:41 जाता है, कानों से आंखों से जो देखा सुना जाता है, मन और बुद्धि से जो सोचा समझा जाता 43:49 है, वह सब माया मात्र है। इस माया मात्र जगत की चीजों में मूर्ख 43:58 अज्ञानी फस मरते हैं, तुम विवेक का आश्रय 44:04 लेकर अपने अभ्यास और वैराग्य का 44:11 बल लगाकर दुष्ट इंद्रियों के प्रवाह को रोककर 44:16 अंतर्मुखी करो फिर मुझसे अंतर से ऐसे मिलोगे कि फिर कभी बिछड़ने का 44:23 दुर्भाग्य ना आएगा।
44:36 जैसे कोई मुर्दे को आलिंगन करने की इच्छा नहीं 44:43 करता, लोह में तपी हुई पुतली को जैसे कोई आलिंगन करने की इच्छा नहीं 44:51 करता, विष वाले भोजन का स्वाद लेने की कोई इच्छा नहीं 45:04 करता, जैसे नरक के रक्त और परू 45:11 के खंड में गोते खाने की कोई इच्छा नहीं 45:18 करता, जैसे बिष्ठा के होद में आराम लेने की कोई इच्छा नहीं 45:25 करता, ऐसे ही विषय विषटा में जो आराम की इच्छा नहीं करता वो जिज्ञासु मुझे जल्दी पा लेता 45:34 है।
जैसे अंधे ड्राइवर के कार में बैठने की पथिक इच्छा करे तो गिर जाता है, मर जाता 45:42 है। ऐसे ही अहंकार अंधे के कहने में जो साधक चलता है उसकी साधना नष्ट हो जाती 45:52 है।
दत्तात्रेय कहते हैं कि है यदु राजा 45:59 - मैंने मकड़ी को भी अपना गुरु बनाया है जैसे मकड़ी अपने से जाला निकालती है और 46:06 फिर अपने में समेट लेती है, ऐसे ही व परमात्मा अपनी चित्त शक्ति 46:12 द्वारा जगत का विस्तार करते हैं और फिर अपने में समेट लेते हैं। जीव भी अपने 46:19 चैतन्य सत्ता के द्वारा हर रोज संसार का विस्तार करता रात्रि को समेट लेता है।
46:27 अष्टावक्र कहते हैं कि जैसे समुद्र में लहरिया 46:34 है ऐसे यह विश्व मुझ में है मैं विश्व स्वरूप आत्मा हूं, यह संसार 46:43 की लहरिया है मुझे कोई गण नहीं कोई त्याग नहीं मैं 46:49 अपने आप में परितृप्त हु46:54।
कठियारे और बाबा की कहानी -
पुराणों की कथा है कोई बाबा के चरणों में कठिआरे ने प्रणाम कर 47:01 दिया, बाबा जी पूरा नहीं होता है, काठिया बेच बेच के जिंदगी बर्बाद किए जा रहा 47:09 हूं कृपा हो जाए नाथ। बाबा ने कहा बेटा थोड़ा आगे जाया 47:15 कर कटियारा आगे गया तो चंदन के लक्कड़ मिलने 47:20 लगे। कोई गरीबी दूर हुई कुछ अमीरी आई 47:27 बाबा के साथ कभी-कभी चर्चा कर लेता था धर्म कर्म 47:33 की। फिर बाबा को कहा बाबा मेरे से और लोग बहुत मालदार है कुछ कृपा करो बाबा ने कहा 47:39 और आगे जाओ। कहानी कहती कि वह आगे गया उसे खाने 47:47 मिली तांबे पीतल की, और कोई धातुओं 47:52 की, अमीर हुआ।
कुछ समय के बाद बाबा के पैर पकड़े बोले 47:58 बाबा। और यदि कोई आदेश हो तो कहो बाबा ने कहा और आगे 48:05 जाओ सुवर्ण और हीरो की खाने मिली अत्यंत मालदार 48:12 हुआ, झोपड़ी की जगह पर महल हो गए, टूटे बर्तनों की जगह पर सुवर्ण की 48:18 थालियां हो गई, कंधे पर बोझ उठाने की जगह पर अब रथ 48:25 में घूमने का मिल रहा है, लेकिन चित्त में शांति नहीं 48:30 है चित्त में आनंद नहीं है बाबा के पैर पकड़े बोले बाबा पहले जो 48:37 काठी करके जीता था उसमें तो मजे की नींद आ जाती थी अब तो 48:43 नींद भी हराम हो गई बाबा ने कहा वापस आ बोले बाबा वापस आने 48:48 को कहते हो तो कंपन होता है, अब कृपा करो वापस भी ना आऊ और कुछ 48:55 शांति मिले बाबा ने कहा तो और आगे जा, जवाहरात 49:03 मिले बोले बाबा ये सब हुआ है न अब चित में डंक लगते हैं कि इसका क्या होगा, मेरा क्या 49:10 होगा,ये छूट जाएंगे क्या होगा।
बाबा ने कहा और आगे जा और आगे गया तो 49:17 एक आत्मनिष्ठ महापुरुष की झोपड़ी दिखाई 49:22 दी, जो सदा परमात्मा की मैं को पी जिनके आंखों से वह मदीरा टपक रही 49:30 है जिनके होठों से व मदीरा हिल रही है, जिनके दिल और दिमाग 49:38 से ईश्वर आनंद के सिवाय और कोई बात सत्य नहीं भाती। ऐसे ब्रह्म निष्ठ महापुरुष की 49:46 झोपड़ी दिखाई कटियार को बड़ी श्रद्धा हुई कि एक बाबा ने आगे आगे करते हीरे जवाहरत तक 49:53 पहुंचा दिया ये बाबा मिल गए बाबा के चरणों में 50:00 बैठे, बाबा में ऐसा था कठियारा था फिर तांबे की फिर सोने की ऐसे खाने मिलते 50:05 मिलते अब लौकिक ढंग से तो मैं बहुत सुखी दिखता हूं। संसारियो को तो मैं बड़ा सेठ दिखता हूं 50:13 नगर सेठ दिखता हूं लेकिन चित्त में शांति नहीं।
आगे जाते जाते अब आप तक पहुंचा हूं 50:20 बाबा ने कहा कि मेरे तक पहुंचा है अब तू अपने तक भी तो पहुंच 50:27 कठियारा कहता कि बाबा नहीं जानता हूं मैं कठियारा पुराना मेरी जात कटियारा है, अभी सेठ हूं यह सब जात बात दब गए तो सेठ जी 50:37 हू। बाहर से लोगों की नजर सेठ लेकिन अंदर से बड़ा कंगाल हो गया हूं कोई खुशी नहीं 50:43 भीतरी।
भीतरी कोई तसल्ली नहीं भीतरी कोई शांति नहीं बाबा ने कहा इतना यदि समझ में आता है 50:50 तो सौभाग्य है कई अंधों को तो पता ही नहीं चलता और जीवन बर्बाद कर लेते क ऐसे अंधे हैं कि धन के मद से 50:58 अपने को सेठ मानकर ना साधु की शरण पहुंचते है ना अपने आत्मा की शरण आते है। तेरे में सदगुण है क्योंकि साधु की 51:06 आशीर्वाद से जो संपत्ति मिली है उसमें तेरे को विवेक है।
अब तू ऐसा 51:13 कर थोड़े प्राणायामकर, थोड़ा नाम संकीर्तन 51:19 कर, ऐसा चालू कर दे घर में करते करते फिर मेरे पास आया करना। 51:26 उसने ऐसा किया कुछ दिन बीते अन्नमय कोष से कुछ अंतर की यात्रा हुई, 51:35 प्राणमय कोष में जब प्राणमय कोष में यात्रा हुई बाबा ने 51:41 सामने बिठा कर थोड़ा ध्यान कराया और संप्रेक्षण 51:46 शक्ति का धक्का लगा दिया प्राण में कोष में जो स्थिति थी वो मनोमय कोष में चला 51:53 गया ध्यान करता है तो मन की बड़ी शांति महसूस हुई, बड़ा आनंद आता 52:01 है आंखों से हर्ष के आंसू टपक रहे हैं, चित धन्यवाद से भर गया 52:08 है, बोलने की इच्छा नहीं होती, देखने की इच्छा नहीं होती, निहारने की इच्छा नहीं 52:13 होती, घर जाने की भी इच्छा नहीं होती, इतना अद्भुत माल पाया 52:22 है कि जिसका बयान नहीं। बाबा के तरफ देख के फिर अपनी आंख बंद 52:29 कर लेता है, बाबा समझ गए कि ये मनोमय कोष और आनंदमय कोश के करीब करीब 52:36 पहुंच गया। परमात्मा के निकट की यात्रा के काबिल हो 52:41 गया बाबा ने कहा का कैसा है और कुछ खान चाहिए हीरे चाहिए जवाहरात 52:49 चाहिए, बोलता है -
बाबा कुछ चाहिए तो गदाई है, कम चाहिए तो खुदाई है, और कुछ ना चाहिए तो शहंशाही है।
अब तो कुछ नहीं चाहिए बस हो गया सब देख 53:02 लिया। मैंने अपने को ही ठगा, हिरे और मोती तो नहीं बहारे अपने 53:10 कर्मों को ही मैंने बुहारा स्वर्ण के बर्तनों में मैंने भोजन नहीं किया बाबा इन बर्तनों ने मेरा भोजन 53:17 कर लिया। बाल सफेद हो गए चेहरे पर झुरिया पड़ गई। बहुत करीब है बहु और बेटे 53:26 सोचते कि कब मर जाए जिनके लिए सब कुछ किया वे भी अपने नहीं बाबा। अब तो कृपा करो कि और गहरे में ले 53:35 जाओ बाबा समझ गए कि इसके पास विवेक और वैराग्य 53:40 है, जो कुछ दिखता है उसमें यदि उपरानता आ रही 53:45 है तो समझ लेना कि आखरी जन्म है, जो कुछ दिखता है उसम रुचि हो रही है तो समझना अभी 53:52 बहुत कुछ माताओं के गर्भ में से पसारना बाकी है, बहुतों पिता की शिशीना से पसार होना 53:58 बाकी है। ,गरीब। बीचारे धनवान नहीं जानते हैं कि धन 54:04 से सब कुछ नहीं होता जगत की विद्या को पढ़कर अभिमानी लोग नहीं समझते कि बाह्य विद्या कोई सहारा नहीं है सच्चा सहारा तो 54:13 तुम्हारा अंतर्यामी परमात्मा है, जितने तुम उसके करीब होते हो उतना जगत तुम्हारी 54:19 अनुकूलता करता है जितना तुम उससे दूर होते हो उतना जगत भी तुम्हें ठुकराया है। 54:26 जितना आत्मा के करीब थे उतना लोगों ने उनको पूजा जब लोग संपर्क में ज्यादा रहे 54:32 आत्मा को पीठ दी बहुत समय तक बहुत वर्षों तक लोगों के संपर्क में रहे 54:39 जीसस।
जीसस अपने देश में गए तो लोगों ने देश को सजाया था यहूदियों ने उन्हीं 54:45 यहूदियों ने मिलकर जीसस को क्रॉस पर चढ़ाया जैसे मेगनेट के करीब होता है लोहे 54:52 का टुकड़ा तो छोटे छोटे कणों को पकड़ रखता है और जो लोहचुंबक से दूर हुआ तो छोटे छोटे 54:58 कण उसको छोड़ देते हैं ऐसे ही चुंबक का चुंबक तुम्हारा आत्मा जितना तुम अंतर मुख 55:04 होते हो उतना लोग तुम्हें प्यार करते हैं लोग तुम्हारे करीब होते हैं, और जितना तुम 55:10 अंतर्यामी को पीठ देकर लोगो के चक्कर में आ जाते हो, उतना तुम लोगों से ठुकराए 55:16 जातेहो। जीसस को क्रस पर चढ़ दिया उस वक्त जीसस का वचन 55:22 था,,,, के मेरे प्रभु मैंने तेरा त्याग कर दिया इसलिए मेरे को 55:28 देखना पड़ता है अपने शिष्यों को कहा कि मैं मानता हूं कि मेरी शक्ति निकल 55:35 गई मुझे ऐसा हो रहा है कि मेरी शक्ति सब बिखर गई है, अंत समय पश्चाताप करते जीसस ने उस योग 55:43 की कला का आसारा लिया और प्राणों को चढ़ा दिया मूर्खों ने समझा कि फासी लग गई उसको 55:49 लेकिन तीन दिन तक उन्होंने प्राण दसवे दस चढ़ा दिए, बाद में जब खोल दिया गया तो छटक गए और 55:58 कश्मीर में जाकर फिर पुनः अपनी एकाग्रता स्थापित की और कश्मीर में 56:07 कई जीसस के रहने के चिन्हा मिलते हैं ईसायत वहा 56:13 नहीं पहुंची थी इसयत बाद में शुरू हुई ईसा उधर पहले पहुंचे 56:22 थे वहां का प्रचलित मलम है ईसा मलम 56:29।
लोगों का कहना है कि ईसा को जब घाव हो गए थे दुर्जन ने सताया था तो इसी मलम से वोह ठीक 56:35 हुए और यह मलम ईसा के आशीर्वाद से अब बड़ा प्रसिद्ध हुआ इस मलम में बड़ा चमत्कार है 56:41 सब घाव को ठीक करता है जो आत्मा के करीब होता 56:48 है उसके नाम से सब घाव ठीक हो सकते हैं तो तुम यदि आत्मा के करीब हो जाओ तो तुम्हारे 56:54 कई विकार के घाव भी तुम्हे ठीक कर सकते हैं।
कृष्ण कहते हैं 57:01 उधव मुझे साथ ले चल, मैं आपका हूं मैं आपके साथ रहूंगा ऐसी 57:08 दुर्बुद्धि को छोड़ साथ कोई आया नहीं साथ कोई गया नहीं तत्व से कोई बिछड़ा नहीं और शरीर से 57:16 कोई कभी साथ रहा नहीं, तो पुत्र और परिवार में आसक्ति का 57:22 त्याग कर दे, को मेरा मानकर इस देह के पीछे पालन पोषण के 57:29 पीछे शिशुपाल की नाई जिंदगी मत गवाना, जो शिशुओं को पालने में लग जाता है उसे 57:34 शिशुपाल कहा जाता है। जो बाल बच्चों की चिंता में आत्मा का 57:39 घात कर लेता है वो शिशुपाल है। उसका घात भर सभा में हुआ करता है हे 57:49 उधव तू उस अंतर्यामी आत्मा का सहारा ले उधव तू 57:56 वैराग्य का सहारा ले बद्रिकाश्रम जा जो मैंने तुझे उपदेश दिया है उसको 58:03 विचार कर और अंदर में अपने स्वरूप को 58:12 पा ले।
दत्त यदु राजा को उपदेश दे रहे हैं के राजन तेरे राज्य से तूने सब सुख देख 58:19 लिए कठियारे को महात्मा कह रहा है कि कटियारा तूने धन जायदाद देख 58:27 ली
जिससे धन का उपभोग होता है जिससे जायदाद का स्वाद आता है यह लोलो मनुष्य को 58:34 इंद्रियों के विषय लुभा लेते हैं, जैसे नख को हवा बहा लेती है ऐसे मूर्ख 58:41 आदमी के मन को इंद्रिया बहा ले जाती है, तू विवेकी 58:47 बनना अब अपनी साधना को नष्ट भ्रष्ट मत करना अपने मौन और एकांत शांति का बलिदान ततू 58:56 तुच्छ विषयों के पीछे नहीं देना।
जैसे मूर्ख 59:04 बच्चा बिस्किट की लालच से स्वर्ण का टुकड़ा दे डालता है ऐसे 59:11 ही इंद्रियों की लालच से तुम आत्मा की शांति का त्याग नहीं करना। अभागे आदमी को 59:17 सत्संग में और ध्यान में रुचि नहीं होती एक कठियारा तो सौभाग्यशाली हो ना, 59:26 अंतर में छुपे हुए तेरे परमात्मा को प्रार्थना करना।
* * * * *
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें