गुरुवार, 28 अगस्त 2025

ज्ञानज्योति प्रगटाओ| Gyanjyoti Pragtao| Part-2

 


सत्संग के मुख्य अंश-

वेदों का पठन-पाठन तथा मूर्तिपूजा उपासना के रूप में कब से प्रचलित हुई? 

सूक्ष्म बुद्धि से शिवपद को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। 

शांति का जीवन में क्या महत्व है तथा वह किस प्रकार प्राप्त होती है? 

अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी शरण आने को क्यों कहा? 

जैसा अन्न होता है वैसा मन बन जाता है...कणाद मुनि का प्रसंग !

तन-मन और प्राण का समन्वय हो तो आत्मराज्य में प्रवेश मिल जाता है। 

तमोगुणी, रजोगुणी तथा सत्वगुणी मनुष्य के क्या लक्षण हैं? 

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सत्संग

0:01 सब धर्मों से श्रेष्ठ धर्म है मन इंद्रियों का शांत 0:12 होना, ध्यान आध्यात्मिकता की अंतरंग साधना 0:20 है, जिस समय ब्राह्मण बुद्धिमान थे, समाज में विवेक वैराग्य बुद्धि बल का 0:30 प्रभाव था, उस समय ज्ञान मार्ग का वेद और उपनिषदों 0:38 का श्रवण मनन होता था, पठन पाठन होता 0:45 था, जिस समय क्षत्रिय और वैश्य का प्रभाव 0:51 बढ़ा, तब से मूर्ति पूजा पाठ पूजा का प्रारंभ हुआ 1:01 होगा ऐसा विद्वान पुरुषों को लगता 1:07 है, और जब आदमी का तन  बीमार मन 1:15 मलिन भोग वासना बढ़ी मतलब शुद्र चीजों की आसक्ति बढ़ी, 1:23 शुद्र का प्रभाव बढ़ा, मजदूर बढ़े, 1:31 तब परोपकार 1:37 सेवा आदि के द्वारा परमात्मा को पाने का मार्ग 1:46 खुला। 


बुद्धि सूक्ष्म है तो उपनिषदों का विचार करने मात्र से 1:55 जीव शिव पद को पा लेता है, बुद्धि मध्यम है तो उपासना आदि करने 2:05 से व्यक्ति अपने चैतन्य स्वरूप ईश्वर की यात्रा की ओर चल पड़ता 2:12 है, और बुद्धि अगर मजदूरी कर रही है विषय भोगों की मजदूरों का प्रभाव पड़ा शुद्र 2:22 चीजों में उलझने वालों का प्रभाव बढ़ गया जीवन में तो ज्ञान मार्ग की साधना कठिन सी 2:28 लगने लगी, इसलिए फिर सेवा भाव कर्मकांड उसका 2:37 प्रचार जो ब्रह्म वेता है उन महापुरुषों का अनुभव 2:43 है कि, क्रिया करने से जो चीज मिलेगी वह नश्वर 2:51 होगी, कर्म से जो फल मिलेगा वह शाश्वत नहीं होगा, 3:01 उपासना से जो फल मिलेगा वह आखरी नहीं 3:08 होगा, लेकिन ज्ञान से जो फल मिलेगा वह तो मिला मिलाया था, उसका केवल 3:16 अज्ञान दूर होता है, विश्व में कितने भी कर्म कर ले कितनी 3:23 भी उपलब्धियां कर ले, लेकिन अपने स्वरूप का बोध नहीं हो 3:31 तो मृत्यु का झटका आते ही करता बेचारा अनाथ रह जाता 3:41 है, वह कर्ता अपने मूल स्वरूप को जाने इसलिए 3:46 भागवत कार  ने कई ऐसे श्लोक रचे कि, कर्ता अपने घर 3:56 पहुंच जाए, उसमें का एक श्लोक आज हम 4:06 विचार करेंगे, ये एकनाथी भागवत का श्लोक बोर्ड पर लिखा है, दोहरा दो 4:13 


अमान मत्सरो दक्ष , निर्ममो दृढ सौहद

  असत्वरो अर्द्ध जिज्ञासु, अनाश्यु अमोघ वा


 

 जो सत शिष्य 5:20 है,  वह मान और मत्सर से रहित, अपने को कार्य 5:26 से कार्य में दक्ष, अपने कार्य में दक्ष, ममता रहित, गुरु में 5:33 दृढ़ प्रीति वाला, निश्चल चित और परमार्थ का जिज्ञासु, ईर्षा से रहित, और सत्यवादी 5:43 होता है।  इस प्रकार के नौ सद्गुणों से सुसज्जित जो होता है, वह सत शिष्य सतगुरु 5:52 के थोड़े उपदेश मात्र से, साक्षात्कार करके जीवन मुक्त पद में आरूढ़  हो जाता 5:58 है। 


 गुरु के लक्षण बताए शास्त्रों में जो प्राणी मात्र 6:04 का हित चाहता हो, सर्व भूत हिते रता जिसकी बुद्धि 6:14 हो, जो अपने स्वरूप में जगा हो, जिसको जगत 6:20 मिथ्या भाषता हो, स्वप्न तुल्य लगता हो, अथवा त्रिकाल में ही जगत की उत्पत्ति ही 6:26 ना दिखती हो, इस प्रकार की जिनकी दृढ़ अनुभूति 6:32 है, जो अपने वृत्तियों से पर अपने स्वरूप में जगे हैं, इस प्रकार के कई ज्ञानवान 6:39 महापुरुषों के लक्षण कहे गए।  उनमें मुख्य लक्षण है कि, जिनके चरणों में बैठने से 6:46 हमारे चित्त में शांति आती हो, वह बढ़िया से बढ़िया ज्ञानियों का लक्षण है।  ज्ञानवान 6:52 के चरणों में बैठने से शांति का एहसास होता हो, तो यह बढ़िया बढ़िया उनका 7:01 लक्षण।


  कुछ ऐसे लक्षण होते, स्वसंवेद और कुछ परसंवेद होते हैं। यज्ञ करना, तप करना, 7:09 तीर्थ करना, कीर्तन करना, होम करना, हवन करना, य स्व करने वाले को भी पता होता और दूसरे 7:16 लोग भी देखते हैं, यह पर संवेद भी है, लेकिन 7:21 आत्मज्ञान पर संवेद नहीं, वह स्वसंवेद है, वह दूसरों को नहीं दिखेगा, आत्मज्ञान 7:28 तुम्हे हो जाए तो तुम्हारा ज्ञान का अनुभव दूसरों को नहीं दिखेगा, दूसरों का तुम्हारा बाह्य व्यवहार 7:37 दिखेगा, लेकिन तुम अपने स्वरूप में जगे हो वह तो तुम्हें ही अनुभव होगा, इसलिए ज्ञान 7:43 का अनुभव स्वसंवेद है, 


फिर भी शास्त्रों ने बड़ा साहस किया स्वसंवेद अनुभव होते 7:50 हुए भी साधक को कैसे पता चले कि, जिनके नजरों में जिनके वातावरण में आने से शांति 7:58 आती हो, क्योंकि ज्ञान का परम शांति का अनुभव ज्ञानी का स्वसंवेद अनुभव होता है, 8:04 वो क्रियाकलाप व्यवहार करते हुए भी अपने हृदय में परम शांत अवस्था का अनुभव करता 8:11 है। 


 और परम शांत अवस्था से बढ़कर व शांति के अनुभव से बढ़कर और कोई जगत में 8:20 श्रेष्ठ अनुभव नहीं माना गया, देवी देवताओं का दर्शन या रिद्धि 8:27 सिद्धियों की उपलब्धि, उसका बुद्धिमान ने इतना महत्व नहीं गिना, 8:33 जितना शांति का महत्व है, और वह शांति आत्मज्ञान से होती है, लब्धवा ज्ञानम पराम 8:41 शांति, 


श्री कृष्ण ने देखा कि अर्जुन रथ तो लेकर आया है युद्ध करने के लिए, ईर्ष्या थी 8:49 और लोभ था, और अब पलायन वादी के बात कर रहा है कि, मैं सन्यासी हो जाऊंगा भिक्षा मांग 8:55 कर खाऊंगा, इन सुहृदों को मित्रों को कैसे मारूं, ये पृथ्वी का राज मुझे नहीं चाहिए, मैं साधु हो जाऊंगा, तो अंदर में तो भोग की 9:03 वासना है, ईर्ष है, लालच है,  और बाहर से पलायन वाद करता है। इसलिए अर्जुन जाएगा तो भी ठीक 9:11 से संन्यासी के धर्म को नहीं निभा सकेगा, इसलिए भगवान ने उनको कर्म निष्काम 9:18 कर्म मार्ग का उपदेश दिया, योग का उपदेश दिया, और व अगर तू उसमें नहीं आ सकता तो सब 9:23 कर्म मुझे अर्पण करके, तू साक्षी मात्र होकर चलता रहे, ऐसा करके श्री कृष्ण ने 9:28 अर्जुन को अपने स्वभाव में अपने आत्म स्वभाव में जगाया, मैं क्षत्रिय हूं उस 9:34 स्वभाव को त्यागने का उपदेश दिया,


 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकम् शरणम व्रज,

अहम त्वां सर्व पापेभ्यो  मोक्षयिष्यामि मा शुच। 


 मैं क्षत्रिय हूं मेरा यह कर्तव्य है, मेरा वो कर्तव्य, ये सब 9:47 कुछ छोड़कर तू मेरी शरण आ जा, मेरी शरण आ माना, ये सारे भाव जहां से उठते हैं, उस भाव 9:55 के आधार में तू आजा, तो तुझे बोध हो जाएगा, फिर तुझे कर्म बांध नहीं सकेंगे, तो बोध 10:02 होने के लिए ब्रह्म वेता का सानिध्य नितांत जरूर 10:09 जरूरी है।  लेकिन ब्रह्मवेत्ता का सानिध्य मिले, हमें बोध पाने के ये नव गुण न हो तो, 10:17 ब्रह्म वेता के सानिध्य से छोटा मोटा ही लाभ होगा लेकिन, आत्म साक्षात्कार का लाभ 10:23 से हम वंचित हो जाएंगे।  तो आत्म साक्षात्कार का लाभ हो इसलिए आज के इस 10:28 श्लोक को, हम अच्छी तरह से समझेंगे, कि जो सत शिष्य है, मान और मत्सर से रहित होता 10:35 है, जैसे धनवान के पीछे कोई गठ पड़े तो धनवान कैसे संभल जाता है, अथवा धनवान के 10:43 पीछे इनकम टैक्स की इंक्वायरी निकले तो व कैसा अपना सेटिंग कर लेता है? जय राम जी की।


 10:50 ऐसे ही जिसमें सद्गुण है उसकी वाह-वाह होने लगती तो, वाहवा की जगह से अपने को 10:57 बचाकर निर् मान की जगह पर जाता है, और यही कारण था कि राजे महाराजे जब गुरुओं के 11:04 द्वार पर जाते थे तो, भिक्षा पात्र लेकर मधुकरी करने जाते थे, राजा बन के गुरु जी 11:11 को एक महल में रखकर ब्रह्मविद्या ले सकते थे, लेकिन वह ब्रह्म विद्या पचती नहीं, मैं 11:17 राजा हूं और मैं राजगुरु हूं, उनको भी मैं राजगुरु हूं और उनको भी लगे मैं राजा हूं, 11:22 तो पंडित गुरु पंडित हो सकते हैं लेकिन ब्रह्मवेत्ता नहीं, 11:34


 उपनिषदों के ज्ञान में जो महापुरुष सन्यासियों को पढ़ाने का संकल्प करते 11:42 थे तो, फिर उनको कणाद आदि मुनि की कथा सुना देते थे, कणाद मुनि हो गए दर्शन शास्त्र के 11:49 अच्छे विचारक, वे एकांत अरण्य में रहते थे, और अपनी 11:55 आजीविका खेतों में जो कण गिर जाते थे उसको चुनकर उसी से गुजारा करते थे, और छठा भाग राज्य 12:02 को कर में दे देते थे, उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध के, तत्वज्ञान 12:08 का उपनिषदों का दर्शन शास्त्र का जो उनका विचार थे, उन विचारों को पढ़कर दूर दूर से 12:14 अच्छे अच्छे विद्वान संत उनका दर्शन करने आते, 


आखिर राज्य को पता चला, राजा को पता 12:20 चला कि कणाद मुनि इतने पवित्र हैं कि उनके जो दर्शन शास्त्र के सिद्धांत और अनुभव के 12:27 वचन हैं, उनसे बड़े अच्छे-अच्छे बुद्धिमान लोग आकर्षित होकर आए। जांच करो वह क्या 12:34 खाते हैं, कैसे रहते, मेरे राज्य में रहते और मैंने उस साधु पुरुष का दर्शन नहीं किया, उनकी सेवा नहीं की, पता चला कि वह 12:40 मुनि तो कण ढूंढ के खाते, राजा शर्मे हुए पश्चाताप से भर गए, गए मुनीश्वर के कुटिया 12:49 पर, और अपना ताज बाज उतार कर लंबे दंडवत प्रणाम किए, के मुनीश्वर मैं आपसे क्षमा 12:54 चाहता हूं, आप मेरे राज्य के अरण्य में रहते हैं, और राजा का फर्ज है कि साधु ब्राह्मण 13:02 अतिथि साधु ब्राह्मण अपंग आदि उन लोगों की संभाल रखे, और आप जैसे महान विद्वानों की 13:10 मैंने सेवा नहीं की, और आपको कण ढूंढकर गुजारा करना पड़ा, मैंने आपकी सेवा नहीं की, 13:16 मैंने खबर तक नहीं ली, आपकी इसलिए मैं बड़ा शर्मिंदा हूं, आप मुझे क्षमा करें, अभय दान 13:22 दे, मुझ भाग्य का नाम फलाना फलाना है, और मैं यहां इस नगर की व्यवस्था करता हूं, मुझे राजा कहते हैं लोग मैं ऐसा नहीं कहा 13:30 मुझे लोग राजा कहते। बोले ठीक है, सुखी भव, निर्भय रहो, बोले महाराज अब इस दास की 13:37 प्रार्थना स्वीकार करो कि, आप ये कुटिया बुटिया छोड़ो आप चलो मेरे महल में आपको एक 13:44 महल का खंड पूरे का पूरा अर्पण कर देता हूं, सेवक होंगे नौकर होंगे, दास होंगे, 13:51 दासिया होंगी, कोई पैर चपी करेगा तो कोई बादाम का रोगन घिसे, ताकि आप ठीक से 13:56 बुद्धिमता का और कोई तत्व चिंतन कर 14:02 सके, और खाने पीने के लिए केसर कस्तूरी पिस्ता बादाम डले हुए बासु दी खीर 14:09 होगी, महाराज आपकी पूरी सेवा होगी, ताकि आप पूरा तत्व चिंतन करके और बढ़िया दर्शन 14:15 शास्त्र लिख सके। 


 महाराज ने कहा सीधा चला जा, और मुड़ के दोबारा इधर मत 14:22 आना, जय राम जी की।  कणाद मुनि ने कहा दोबारा नहीं 14:27 आना, अगर महल में रहूंगा तो, राज्य का अन्न कैसा होता है उस राज्य के अन्न को खाकर 14:35 मैं तत्व चिंतन करूंगा कि, तेरी सेवा लेकर मैं तेरे गुणगान लिखूंगा, जैसा अन्न होता है ऐसा मन हो जाता है,  14:43 तो उपनिषदों का ज्ञान उस वक्त प्रचलित था, जो 14:50 लोग अपनी बुद्धि को दूषित होने से बचाते 14:55 थे, परिश्रम से के परिश्रम करके जीवन को सुदृढ़ करते थे, और बुद्धि का 15:04 विकास करते थे, शारीरिक और मानसिक जब विकास था ठीक से, उस समय उपनिषदों का 15:10 प्रचार प्रसार हुआ होगा।  


चीन में आज से 3000 वर्ष पहले 15:16 कन्फूसियस  जा रहे थे, एकाएक वो चकित हुए, कि एक किसान अपने 15:24 बेटे के साथ कुए में से पानी खींच रहे हैं, 15:29 खेत को पिला रहे हैं, चमड़े के कोष को खींच रहे हैं, कंफ्यूज इसको हुआ कि इन विचारों 15:35 को अभी तक पता नहीं चला कि बैल की खोज हुई है, बैल के द्वारा कुए में से पानी खींचा 15:40 जाता है, इतना मैन पावर खर्च रहे हैं, जहां बैल पावर की जरूरत है, या मोटर की एक हॉर्स 15:48 दो हॉर्स पावर मोटर की जरूरत है, वहां मैन पावर बिचारे बिगाड़ रहे हैं, मैन पावर की 15:54 रक्षा करने को मैं इनको सिखाऊं, जरा उपदेश दूं, जय श्री कृष्ण 16:01 कन्फ्यूशियस रुक गए और उस बुड्ढे के कंधे पर हाथ रखकर कहा 16:07 कि, किसान तुम्हें पता है कि बैल की खोज 16:12 हुई है, बैल के द्वारा कुए में से पानी निकाला जाता है, और खेत में सिंचा जाता है, 16:17 बुढे ने कहा चुप रहो धीरे बोलो, मेरा लड़का सुन लेगा, बाद में बात करते अकेला में, जाकर 16:25 कन्फ्यूशियस  से उसने बात की, कि मुझे पता है बैल के द्वारा पानी खींचा जाता है, 16:31 लेकिन मैं क्यों खींच रहा हूं, अपने बेटे के साथ कि वो स्वावलंबी हो, और कुछ शरीर से 16:40 परिश्रम होगा तब उसका मन खिलेगा, बुद्धि का विकास होगा, जो शरीर से परिश्रम नहीं करते 16:47 हैं, मैन पावर मैन पावर बचा बचाकर शरीर को लाड लड़ाते हैं, वो बेचारे थोड़ी तितिक्षा 16:54 नहीं सह सकेंगे, तो आप कृपा करके आपका उपदेश 16:59 और किसी जगह पर आजमाना, मेरा लड़का कहीं आलसी ना हो जाए। जय 17:06 जय। 


 मिस्टर सोलन से पूछा गया कि आप इतने 17:11 बुद्धिमान और इतना ऊंचा भारी उपदेश देते हैं, और शरीर का बांधा भी बढ़िया है, क्या 17:20 कारण है?  जहां बुद्धि अकल होती है वहां शरीर लथु होता है, और जहां शरीर पाढ़े जैसा होता 17:26 है वहां उपला मार नहीं होता है, लेकिन आपका शरीर का बांधा भी बढ़िया है और 17:33 बुद्धि का भी विकास इतना है, इसका कारण क्या? सोलन ने 17:40 कहा कि कुछ न कुछ परिश्रम में खोज लेता हूं, इसलिए शरीर का बांधा मजबूत है, और मैं 17:48 संसार में विद्यार्थी होकर रहता हूं, कुछ ना कुछ नया विचार रहता हूं, खोजता रहता हूं , 17:54 इसलिए बुद्धि का भी विकास है, तो बुद्धि का विकास और शरीर का बांधा मजबूत है।


 ऐसा जो 18:02 जमाना था उस जमाने में उपनिषदों का ज्ञान का प्रचार प्रसार अच्छी तरह से हुआ, आज 18:09 क्या है कि अंदर में वासना है 20वीं सदी की, और ज्ञान लेना चाहते इसवी सन पूर्व न 3 18:17 हजार वर्ष पहले का, इसलिए क्या होता है कि ज्ञान का ओढ़ना, 18:23 ओढ कर भक्ति का कथाकार का ओडना, ओढ कर काम वही करते जो 20वीं सदी के लोग कर जब 18:29 कतरे लोग, जय श्री कृष्ण। 


तो बुद्धि को शुद्ध करें, और बुद्धि 18:37 किन साधनों से शुद्ध होती है कि, अमानी, मान की इच्छा से आदमी कुछ का कुछ 18:44 करने लगता है, मान की इच्छा ही छोड़ दो, तो तमाम प्रपंच से आदमी बच जाता है, अदम्भित्व, 18:52 ईर्षा का अभाव, मत्सर का अभाव, ये अगर सद्गुण आने लग जाते हैं तो, आदमी तमाम तमाम 19:00 दोषों से बच जाता है, और तमाम तमाम व्यर्थ के परिश्रम से बच जाता है, तो उसका तन और 19:06 मन जो है, आत्म विश्रांति के काबिल होता है, कई लोग शरीर को तो स्थिर रखते हैं, 19:14 लेकिन मन भागता है, कई लोग मन को स्थिर करने की कोशिश करते, तो प्राणों का ठिकाना 19:19 नहीं, हकीकत में तन मन और प्राण ये तीनों का जब समन्वय होता है तो आत्मी आत्म राज्य 19:27 में प्रवेश करता है, प्राण बल नहीं है तो मन की भावना तो अच्छी 19:34 है, लेकिन रोता रहेगा शरीर तंदुरुस्त है लेकिन मन विकारों 19:39 में भाग रहा है, तो तंदुरुस्ती टिकेगी नहीं, महाराज मन के विचार तो ठीक है लेकिन 19:46 शरीर लथ है तो भी जप तप सेवा पूजा आदि कुछ कर सकेगा नहीं , सत्संग की जगह पर भी 19:52 नहीं आ सकेगा, जरा सा गर्मी होगा कि चलो, व जवा दो बापू तो बदे छ जय श्री कृष्ण।  पटाने 19:57 नमस्कार करो तो शरीर सुदृढ़ हो प्राण शक्ति हो, और मन 20:04 शक्ति हो, उस आदमी के लिए यह लोक और परलोक खिलौने हो जाते 20:10 हैं, उस आदमी के लिए आत्म विद्या घर की विद्या हो जाती 20:15 है, 


तो आज हम इस श्लोक को विचारेंगे  कि, सत 20:20 शिष्य मान और मत्सर से रहित होता है, अपने बराबरी के शिष्यों को 20:29 या अपने से ऊंचो को या अपने से छोटों को देखकर ऊंचो को देखकर कुंठित नहीं होता, 20:36 छोटों को देखकर अहंकारी नहीं होता, बड़ों को देख, बराबरी को देखकर ईर्षित नहीं होता, 20:42 लेकिन सबको गुरु के कृपा पात्र समझकर सबसे आदर का व्यवहार करता है, प्रेम का व्यवहार 20:47 करता है, प्रेम और आदर का व्यवहार करने से आप यूं न सोचे कि मैंने उसको आदर दिया, या 20:54 मैंने उसको प्रेम किया, लेकिन प्रेम और आदर का व्यवहार करने से तुम्हारा सत्व गुण 21:00 बढ़ता है,  तुम्हारी योग्यता बढ़ती है, आपके घर अतिथि आ गया, या आपने जिससे व्यवहार 21:07 किया, उससे नम्रता का व्यवहार किया, तो आप छोटे नहीं हुए, हकीकत में नम्रता का 21:12 व्यवहार करके उसको आपने बड़ा बनाया, तो आपने दूसरे को बड़ा बनाया, दूसरे को बड़प्पन 21:18 का दान किया, तो आप दाता हो गए, जय राम जी की।


 हम लोगों का मन क्या सोचता है कि, हम तो 21:26 बड़े बने, और हमारे इर्दगिर्द वाले हमको मान दे, लेकिन ज्ञानी का स्वभाव होता है सत 21:33 शिष्यों का स्वभाव होता है कि आप अमानी रहते हैं, दूसरों को मान देते हैं, जैसे 21:39 भगवान रामचंद्र जी आप अमानी और गुरु जी को मान देते, लखन भैया को मान देते हैं, गुरु 21:46 के वचनों को मान देते हैं, पिता के वचनों को मान देते हैं, तो आप अमानी दूसरों को 21:51 मान ये सतोगुण बढ़ाता है, तमोगुण का लक्षण 21:57 है- आलस्य, निद्रा, वैर, प्रमाद, दीर्घ 22:03 सूत्रता।  रजोगुनिओ   का लक्षण है प्रवृत्ति, किसी में दोष ना देखना, भोग 22:12 बढ़ाना, यश बढ़ाना, और ऐहिक जगत में सुख खोजना, यह रजोगुणीओं  आदमियों का लक्षण होता है।  22:21 और सात्विक आदमी का लक्षण होता 22:26 है, मैं कौन हू, कहां से आया हूं, आखिर क्या होगा, इस संसार की ये  माया की जाल से मुक्त 22:36 कैसे होऊं, उसमें शांति होती है, सहन शक्ति होती है, 22:41 क्षमा होती है, परोपकार होता है, और मान मत्सर ये वेर जेर से व दूर रहता है।  यह 22:50 सात्विक आदमी का लक्षण है, और सात्विक आदमी ज्ञान में जल्दी प्रविष्ट हो सकता है।  रजो 22:57 तमो गुणिओं  को परिश्रम करना पड़ता है, और सत्व संजायते  ज्ञानम, सत्व गुण होने से ज्ञान जल्दी 23:04 प्रकट होता है, तो गुण तो माया के हैं।  तमोगुण हो, रजोगुण हो, सतोगुण हो लेकिन यह 23:10 सतोगुण जो है वो माया के पार ले जाने में सहायक है, सात्विक व्यक्ति को स्वाभाविक 23:17 सुख, स्वाभाविक शांति मिलती है।  राजसी व्यक्ति को परिश्रम करके भोग भोग कर थोड़ा 23:23 सा सुख लेना पड़ता है।  और तामसी आदमी पाप का पोटला चढ़ाते चढ़ाते जरा सा सुख का 23:29 एहसास करता है, लेकिन अंदर से दुखी को दुखी रहता है, भयभीत रहता 23:35 है,


 एक बार बुद्ध के चरणों में एक युवक आ 23:41 गिरा।  जैसे सुखा बांस गिरे, ऐसे चरणों में आकर प्रणाम किया, अनजान था भिक्षुक ना था, 23:48 शिष्य नहीं था, पहली बार आया और बुद्ध के पास श्री चरणों में लंबा पड़ गया।  बुद्ध ने 23:54 पूछा य क्या कर रहे हो, तुम मेरे को जानते तक नहीं।  बोले महाराज खड़े-खड़े तो बहुतों को 24:03 देखा, खड़े-खड़े देखा लेकिन सिवाय दुख के परेशानी के और 24:09 कुछ नहीं मिला, इसलिए मैं श्री चरणों में लेटकर कुछ देखना चाहता 24:15 हूं, खड़े हैं तो हमारा अहंकार खड़ा है, खड़े हैं तो हमारी मान्यताएं खड़ी है, खड़े 24:22 हैं तो हमारी वासना खड़ी है, वो खड़े-खड़े तो वासना अहंकार और मान्यताओं ने बोझा ही 24:27 दिया, परेशानी दी, इसलिए मैं श्री चरणों में लेट गया, ताकि मेरा ईगो भी जरा विश्रांति 24:35 ले।  बुद्ध ने भिक्षु कों को संकेत करके कहा - कि भिक्षुको  तुम तो मेरे को भगवान मानकर प्रणाम 24:44 करते हो, आदर करते हो, लेकिन ये  मेरे को भगवान नहीं मानते, अनजान व्यक्ति समझकर कोई 24:50 साधु बाबा है, ऐसा समझकर अपने आप को मिटा रहे हैं, ये तुम लोगों से ज्यादा लाभ ले 24:57 रहे हैं।  तुम तो यश को मान को ज्ञान को इधर को उधर को देखकर फिर झुकते हो, और झुकने 25:04 में भी होता है कि हम शिष्य और हमने प्रणाम किया, लेकिन यह तो झुक कर सचमुच में 25:09 झुकता है, और यह सचमुच में झुककर झुकते झुकते वो कोई बाहर की आकृति का अवलंबन 25:17 लेते लेते अंदर निराकार की शांति में जा रहा है।  ये तुम लोगों से बढ़िया शांति ले 25:22 रहा है।  तुम लोगों से बढ़िया प्रसाद में प्रवेश कर रहा है। 

 गीताकार ने कहा -

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते |

 प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते || 65||.


 जगत में सब दुख दूर करने की ताकत नहीं, 25:41 संसार में यह क्षमता नहीं, पूरा संसार मिलकर एक आदमी के सब दुख दूर नहीं कर सका, 25:50 है।  पूरा संसार मिलकर एक आदमी को पूरा सुख नहीं दे सका है।  संसार में पूरा सुख देने 25:58 की ताकत नहीं, और पूरा दुख मिटाने की ताकत नहीं, अगर संसार के साधनों से पूरा दुख मिट 26:05 जाता, तो भगवान राम जिसके घर अवतरित हुए हैं, ऐसे दशरथ को दुख नहीं देखना पड़ता, और 26:13 ऐसे कौशल्या मा को दुख नहीं देखना पड़ता, विधवा होने का और ऐसे कई कई को कपट का छल 26:20 आदि का सहारा नहीं लेना पड़ता, राम जी के तो दर्शन कर रही थी।  मंथरा भी कर रही थी।  26:27 बढ़िया से बढ़िया मिली थी मंथरा को।  जहां भगवान राम अवतरित हुए हैं, वहां 26:34 मंथरा की सर्विस हुई है, फिर भी देखो। 


 एक शिष्य ने गुरु से 26:43 पूछा - कि हम लोगों के पास पांच इंद्रियां हैं।  लेकिन गुरु महाराज जब दुख होता है तो 26:50 आंख ही क्यों रोती है, कान नहीं रोते, नाक नहीं रोता, मुंह नहीं 26:55 रोता, आंख ही क्यों रोती है।  गुरु भी कोई जोगी थे ज्ञानी थे, गुरु ने कहा बेटा आंख 27:03 का मन के साथ सीधा संबंध है।  इसलिए मन को थोड़ा सा भी दुख होता है 27:08 तो आंख गीली हो जाती है।  तो आंख का मन के साथ सीधा संबंध है।  तो 27:15 आंख को ऐसा दृश्य नहीं दिखाएं, रामायण भले देखें, लेकिन रामायण के आगे और पीछे 27:21 क्या-क्या आता है,...  जय जय, और उससे मन चंचल तो नहीं हो जाता ? जो लोग गहरी मोड़ी रात 27:30 को रात की, देर तक वो चलचित्र देख देख के 27:35 सो जाते हैं, उनका मन तमस और रजस में आ जाएगा, सात्विकता चली 27:43 जाएगी, चलचित्र देखते देखते, रात्रि को।  के चलो दुकान से आए नौकरी से, टीवी चल रही, 27:48 देखते देखते देखते सो गए, तो महाराज सुबह भी ऐसे ही विचार आएंगे, टेंशन बढ़ जाएगा, 27:55 चिंताएं बढ़ जाएगी, और आकर्षण बढ़ जाएगा, भीतर के गीत से आदमी दूर चला जाएगा, और 28:00 बाहर के गीतों की गुलामी का उसके हाथ में जंजीर पड़ जाएगी, इसलिए क्या करना चाहिए? 28:07 कैसे करना चाहिए ? कितना करना चाहिए?  वो सब विवेक से सोचकर आदमी चले तो आत्म शांति 28:16 पाने के लिए काफी समय है।


 लेकिन हम अजायी वस्तुओं में ,  अजाय आकर्षणों में, अपने अंदर 28:23 की शक्तियों को बिखेर देते हैं, तो अजायी वस्तु, अजाय अक्षर आकर्षणों से बचने के लिए 28:29 आज का श्लोक हमें कहता है कि, मत्सर रहित और अपने कार्य में दक्ष 28:36 रहे।  अपने कार्य में दक्ष रहे, जैसे व्यापारी अथवा वकील, साहब से बातचीत करता 28:44 है, हंसता है, लेकिन वकील का लक्ष्य क्या है कि, असल पर इनकम टैक्स ज्यादा ना पड़ 28:51 जाए।  जय जय । अथवा तो कोर्ट में लड़ता है, तो कुछ भी बयान  28:58 करता है, तो असल की फेवर की पॉइंट उसके मगज में घूमती है।  ऐसे ही अपने मन में आत्म 29:06 ज्ञान पाने की रुचि होनी चाहिए, तो हम लोग व्यवहार में दक्ष रहेंगे।  व्यवहार में अगर 29:14 दक्षता नहीं है, तो आपकी सज्जनता भी आपको लंबा समय आपकी सहाय नहीं कर सकेगी, दक्षता 29:20 नहीं है तो सज्जनता, सज्जनता के बहाने आप किस व्यवहार में, किस वातावरण में, किस 29:27 फील्ड में, बह जाए आपको पता नहीं चलेगा।  इसलिए आपके जीवन में 29:32 दक्षता भी होनी चाहिए।  मत्सर रहित हो, ईर्ष रहित 29:38 हो, मान की इच्छा से रहित हो, साथ साथ में दक्ष 29:46 हो।  


जैसे - मछली जाल में फंसती  तो छटपटाती है, 29:52 ऐसे प्रशंसकों के बीच साधक आता है तो उसका मन छटपटाता है। 29:58 जैसे लुटेरों  के बीच खानदान आदमी छटकने की कोशिश करता है।  ऐसे ही प्रशंसकों के बीच से 30:05 साधक छटकने की कोशिश करता है।  तो यह समझ लो कि उसमें दक्षता है।  नहीं तो, प्रससंको के बीच 30:13 रहते रहते मान की बातें सुनने की आदत पड़ जाएगी, और जो मान का प्यासा होगा मान की 30:22 इच्छा रखेगा, वाहवाही का जिसको लत लग गई,  वो अपमान नहीं सह 30:29 सकेगा, और जो मान का गुलाम है, उसको लोग पुचकार के खाम खा की मजूरी उसके सिर पर डाल 30:37 देंगे, जय राम जी।  शास्त्रों ने तो यूं कहा - 


मान पुड़ी है  जहर की खाए सो मर जाए

 चाह उसी की राख वो भी अति दुख पाए


 मान की चाह से आप कहीं गए 30:51 और आपको मान नहीं मिला, आप शादी में गए कपड़े लाते गहने गांठे पहर के गए शादी में,  फलाने 30:58 के दोस्त, गए और उधर आपका किसी ने भाव नहीं पूछा, खाली प्लेट आद आइसक्रीम खिला दिया, तो 31:04 आइसक्रीम का स्वाद फीका हो जाएगा।  क्योंकि मान के लिए गए थे और वहां किसी ने पूछा नहीं, अरे यार गए तो सही खर्चा तो बहुत गया, 31:11 लेकिन हमारे को तो देखा भी नहीं यार।  खाम खा के अशांति लेकर चले आएंगे, और 31:17 मान की इच्छा नहीं है तो थोड़ा सा भी किसी ने मान दे दिया तो काफी है, और नहीं भी दिया तभी भी आपकी मौज, आपके पास रहेगी, तो 31:25 हम मान की इच्छा से कोई भी कर्म करते हैं, मान की इच्छा से कोई भी फंक्शन में जाते, 31:30 अथवा मान की इच्छा से कोई भी व्यवहार करते हैं, और मान नहीं मिलता तो दुख होता है, और मान की इच्छा ही नहीं है तो मान मिल गया 31:37 तो क्या है? और नहीं मिला तो क्या ? आप स्वतंत्र हो गए।  तो मान की इच्छा आपको पराधीन बनाती 31:43 है।  जय राम जी की।  यह कहना बड़ा आसान है और कह तो मैं भी देता हूं, लेकिन मान की इच्छा 31:50 मिटाई उनको मेरा प्रणाम जय।  





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