गुरुवार, 24 जुलाई 2025

ईश्वर और पुरुषार्थ | iIshwar Aur Purusharth - (Part-2)

 

                                                                                                  ईश्वर और पुरुषार्थ | Part-2 -  
सत्संग के मुख्य अंश :
  • आध्यात्मिक विजय इस प्रकार से प्राप्त करें !

  • आत्मलाभ करना परम विजय क्यों है ?

  • मन की दो शक्तियाँ कौन-सी हैं तथा उन पर विजय कैसे प्राप्त करें ?

  • इंद्रियों के अल्पभोग से आप इस प्रकार जन्म मरण पर विजय प्राप्त कर सकते हैं !

  • साधक की असली विजय कब होती है ?

  • गोपियाँ और ग्वाल बंसी की नाद से कहाँ डूबने लगते थे ?

  • मन और बुद्धि को इस प्रकार पर परमात्मा में लगायें ।

  • असली आराम करना हो तो ऐसे करें !

  • सच्ची विजय कौन-सी है तथा उसे कैसे प्राप्त करें ?

सत्संग

    0:00 एक पंडित जी थे कथा करते थे, कथा करते थे लोग बड़े श्रद्धा से तालियां बढते थे, गाना गाते थे, चौपाया गाते 0:08 थे। बड़े आनंदित होते थे लोग, पंडित को हुआ कि इतने दिन से कथा सुनते लेकिन उनके जीवन 0:14 में देखो तो कुछ चेंजिंग नहीं आती, क्या बात है, ये कथा सुनते हैं कि केवल भावुकता का 0:20 सुख लेते हैं, केवल मन मनोरंजन करते हैं कि बुद्धि को भी उसमें प्रविष्ट करते हैं, 0:26 तुम्हारा मन एक जगह लगा और तुमने बुद्धि नहीं लगाई नहीं तो आप सफल नहीं हो 0:32 सकते, इसीलिए भगवान कहते हैं मनो बुद्धि, मन और बुद्धि दोनों मुझ में अर्पण करो, मन से 0:38 तो मेरा मनन करो और बुद्धि से मुझ में स्थिर होने का उपाय ढूंढो, पंडित ने देखा कि एक बुद्धि बुद्धि 0:46 भी लड़ाते हैं कि केवल मन से सुन लेते हैं, और थोड़ी देर आनंदित हो जाते हैं, तुमने 0:51 यदि मन से कुछ सुन लिया और मन से यदि खुशियां मान ली तो वो खुशी तुम्हारी शाश्वत नहीं रहेगी, वो ज्ञान तुम्हारा 0:57 शाश्वत नहीं रहेगा, लेकिन सुने हुए को जब भी तुमने विचार और बिठाया तब वो बुद्धि गत हो 1:02 जाएगा, बुद्धि गत हुआ तो स्थिति हो जाएगी,

     पंडित ने कथा चालू कर दी, कि गर्मियों के 1:08 दिन में सबको गर्मी लगती है, जी महाराज, उस गर्मी में साधु संत हिमालय को चले जाते 1:14 हैं, जी महाराज, एक बार मक्खियों के मुखी ने एक मीटिंग की और आदेश दिया कि अपने भी 1:20 हिमालय में चलो तो मखा और मक्खियां सब हिमालय में चले, और बड़े-बड़े बिल में घुस 1:25 गए, बड़े-बड़े ग्लेशियर थे वहां तो हिमालय में बर्फ खूब होता है, बर्फ के बड़े-बड़े 1:31 ग्लेशियर होते हैं, बात सच्ची है, लेकिन उन ग्लेशियरों में मक्खियां उन बिलों में घुस 1:37 गई, जी महाराज, फिर आनंद पूर्वक रहने लगी, पीने को ठंडा पानी रहने को ठंडा घर जहां शीतलता 1:45 शीतलता होआ अशांति कैसे हो सकती है, बोले जी महाराज, लेकिन भूख होती है तो फिर शीतलता 1:53 भी शीतलता नहीं टिकती है, जैसे योगी को योग का सुख ना मिला, भोगी को भोग का सुख ना 1:59 मिला, त्यागी को त्याग का सुख ना मिला, तो उनके जीवन में खटके का ऐसे ही मक्खियों को 2:05 स्वाद का सुख नहीं मिला और खाने का भोजन नहीं मिला तो मुखी को परेशानी होने लगी, 2:10 बोले जी महाराज, बातें कुछ तो सामाजिक मिलती जुलती है, इसलिए भगत बेचारे बोलते 2:15 हैं कि सचमुच घटना घटी होगी, अब बुद्धि लड़ाते नहीं, भगतडा जो है, एक दिन उन मुखिया 2:22 ने कहा कि खुराक के लिए पुरुषार्थ करो और सब मखिया को आदेश दिया और कोई हाप पुर गई, 2:27 और कोई कुलापुर गई और एक एक कोलापुरी गुड़ का रवा उठाकर मक्खियां उस बिल में 2:32 चली गई, जी महाराज, बोले आनंद से खाकर अपना जीवन बिताने 2:38 लगी, भगवान, यदि सत मति दे और भाग्य हो तो मखिया लंबा जीवन जी सकती है, बोले महाराज 2:46 जी महाराज जी महाराज महाराज ने पोथी संभाल लिए बगल में और चलने लगे, बाप जी 2:53 आपकी कथा बड़ी सुंदर, बड़ा आनंद, बोले कथा सुंदर आनंद समय गवाने की बात कर रहे हो, जो 3:00 कहता हूं जी महाराज जी महाराज. *****Gj मखिया कैसे गई बिल में, कैसे गई कोल्हापुरी गुड़ का रवा लेके कैसे घुस गई? य सब जरा 3:14 सोचो ? ******Gj  3:25 

    तो विजया दशमी वही होती है अर्जुन  शिष्य नहीं 3:31 हुआ अर्जुन ने तमाम प्रश्न पूछे, और जब संतोष कारक जवाब आता और लगता है 3:38 कि कृष्ण के मार्गदर्शन के सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं है, तब बोलते कि मैं तुम्हारा शिष्य 3:47 हूं, शिष्य हुआ माने सब बात मानने को राजी हो, पहले तो प्रश्न किए उत्तर किए और एक एक 3:54 प्रश्न अर्जुन का ऐसा है कि पूरे मानव समाज का प्रश्न है, और प्रश्न का उत्तर भी ऐ पूरे विश्व के लिए, उसके उत्तर है तो जहा 4:03 इस प्रकार की मेघा होती है जहां इस प्रकार का शिष्य होता है और कृष्ण के प्रकार का 4:09 गुरुत्व होता है, वहां विजय कोई बड़ी बात नहीं, संसार की विजय तो ठीक है, वह तो उनके 4:14 चरणों में रहती है,

     एक मस्तराम बाबा 4:19 थे, परमानंद भंडार के गुरु मस्तराम बाबा सिंधी जगत में मशहूर थे, 4:26 परमानंद भंडार शिकारपुर के विदेहत हो गया, अभी अभी थोड़े समय …. मस्तराम 4:34 के चरणों में एक राजा आया, ताज रखकर बोला कि बाबा जी तुम्हारी कृपा से मुझे बस राज मिल गया, जो चाचा… ने छीन लिया था खटपट करके 4:42 आपका प्रणाम करके आपके आशीर्वाद लेकर गया ना, मेरे को राज मिल गया  मस्तराम बोलते जा रे 4:48 झूठ है, नहीं गुरु जी आपकी कृपा से मिल गया आप ही ने तो दिलाया, बोले मेरी कृपा से साले 4:54 तेरे को नश्वर राज क्या मेरी कृपा से तो तेरे को मैं मिल जाता, ये तो मेरी दासी की कृपा 5:00 हुई,

     तो जो ब्रह्म वेता है अथवा जिसने आत्मा राम पा लिया है उनके मनौती मानने से, 5:08 उनका आशीर्वाद लेने से, उनका दर्शन करने करके जाते तो संसारी सफलता मिल जाती है,  5:13 कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन यहां तो लक्ष्य है ऋषि का कि सच्ची सफलता तो वह है कि एक 5:19 बार मिल जाए तो फिर असफलता का कभी मुंह देखने को ना मिले,

     न लब्ध 5:26 वाचा पारम लाभ मनते न अधिकम यस्मिन स्थितो न दुखे न गुरु विचा ….

 जिसको 5:34 पाकर उससे बढ़कर कोई लाभ नहीं है, और जिसमें स्थिर होने के बाद बड़े भारी दुख 5:40 भी तुम्हें चलित ना कर सके, वह है आत्म लाभ, अर्जुन को कह रहे हैं, श्री कृष्ण के इस 5:46 आत्म लाभ को पा लो ये परम विजय है, और यह परम विजय कर लिया तो बाहर की विजय तो खेल 5:52 मात्र है, और यह जरूरी नहीं कि बाहर की कोई विजय हुई तो तुम सदा के लिए सुखी हो गए, ना 6:00 तुमने राज जीत लिया तो सदा के लिए सुखी नहीं हो सकते, तुमने अमुक शत्रुओं को जीत 6:05 लिया तो भी सदा के लिए सुखी नहीं हो सकते, अमुक मकान दुकान जायदाद तुमने संपत्ति से 6:11 पा लिया, फिर भी तुम सदा के लिए सुखी नहीं हो सकते, क्योंकि मौत सब छीन लेगी, जब क्रोध 6:16 आएगा तो सब फीका हो जाएगा, जब काम सताएगा तब फीका हो जाएगा, और जब मौत आ जाएगी तो सब 6:22 सदा के लिए फीका हो जाएगा, 

    तो सच्चा विजय तो यह है कि तुम्हारे जो विकल्प ….है, 6:28 तुम्हारी जो वृत्तियां है, उन वृत्तियों मन की दो शक्तियां है, एक ज्ञान शक्ति और 6:35 दूसरी संकल्प शक्ति, तो संकल्प शक्ति को ज्ञान शक्ति देखती है, ज्ञान शक्ति का 6:42 ज्यादा उपयोग करोगे तो ज्ञान शक्ति का पीरियड बढ़ जाएगा, और संकल्प शक्ति कम हो जाएगी, संकल्प शक्ति जब कम हो जाएगी तो 6:49 पुरानी आदतें जीव भाव की आदतें राग की आदतें आमली खाने की आदतें है, नींबू खाने 6:54 की आदत है, खांड खाने की आदत है, श्रीराम, ये जो आदतों पर विजय पाना है, तो जिस समय वो 7:01 ऐसा भड़का आता है उस समय तुम्हारी ज्ञान शक्ति का उपयोग करके संकल्प शक्ति को रोको, 7:09 तो संकल्प और विकल्प शक्ति जब रुकेगी तो उसमें आध्यात्मिक बल चमकेगा, और आप अपने 7:15 कृष्ण तत्व को, अपने आत्म तत्व को, ठीक से अनुभव कर सकोगे  ओम ओम ओम ओम ओम  ओम ओम ओम ओम 7:30 हरि ओम। ........ 

    तामसी लोगों को तो पाप में ही सुख दिखाती है, राजसी लोगों को लोभ में और काम 7:52 में सुख दिखाती है भक्तों को गीत और भजनों में सुख दिखाती है, मेरा दर्शन नहीं करने 8:00 देती,

    ध्यान -  देवी ह्वेसा गुण मई मां माया दुरत्यया जो माम प्रपद्यन्ते जो मुझे प्रपन्न होते हैं,  तरन्ति ते , इस माया को तर जाते हैं, वे संकल्प और विकल्प के जालों को पार कर लेते हैं, वे शांत होते होते परमात्मा दीदार कर लेते हैं ,  वे मौन को उपलब्ध हो जाते हैं, 8:29 मौन का अवलंबन लेते हैं इंद्रियों का अल्प भोजन करते हैं, 8:36 देखना कम, सुनना कम, बोलना कम, सोचना कम, लेना कम देना 8:42 कम, बिन जरूरी वे कुछ ना प्रवृत्ति करते हैं, और समय बचाकर आत्म ध्यान में रहते हैं , चित्त 8:50 प्रसादा, उन्हें उस चैतन्य स्वरूप परमात्मा का प्रसाद प्राप्त हो जाता 8:57 है, ऐसे लोगों के जीवन में 9:02  तत्र श्री विजयो भूते ध्रुवा नीति मति मम ऐसे लोगों के जीवन में आध्यात्मिक विजय हो जाती है, ऐसे लोगों के जीवन में आत्म साक्षात्कार की विजय हो जाती है, ऐसे लोगों के जीवन में जन्म मरण के चक्कर को तोड़ने की विजय हो जाती है, शत्रु की पीठ तोड़ दी तो क्या बड़ी बात की, कोई मकान और हवेली को तो के गोले से तोड़ दिया तो क्या बड़ी बात है, साधक तो ध्यान के गोले से अपनी कल्पनाओं के महलों को तोड़कर परमात्मा में डूबता है, 9:52 -----------विजयादशमी  का संदेश नौ दिनों की 10:09 उपासना, व्रत, पूजन शक्ति की आराधना करने के बाद जो 10:15 शक्ति एकत्रित हुई है, उस शक्ति को खर्च करना विजय के 10:22 लिए, कोई धन पाने को विजय समझे, कोई राज्य पाने को विजय समझे, लेकिन साधक … तो अपने प्रभु 10:30 पाने को ही विजय समझता है, 10:45 ….11:00 ओम ओ शांति परम 11:07 शांति 

    ध्यान -  हे परमात्मा हमें डुबा दे तेरी परम शांति 11:12 में, हे मन तू बाहर का कब तक देखेगा,  बाहर के मित्रों से कब तक मिलेगा भैया, बाहर के सगे और संबंधी बहार की विजय और विजय कब तक 11:31 संभालेगा? आज तो नई विजयादशमी  आज तो नया दसेरा जीवन में ले 11:39 आ, सच्चा विजय तो यह है कि तेरे संकल्प विकल्प शांत होकर हृदय में छुपे हुए जो 11:47 परमात्मा है, हृदय में छुपे हुए जो अंतर्यामी है, उसका साक्षात्कार हो 11:55 जाए, भीतर ही भीतर निर्भयता की आवाज आने लगे कि – मैं आत्मा 12:01 हूं, मैं अमर हूं, ऐसी विजय घोष हो 12:06 जाए, मैं जन्मने मरने वाला यह देह धारी शरीर नहीं हूं, मैं संकल्प और विकल्प करने वाला मन 12:14 नहीं हूं, मैं काम और क्रोध में धक्के खाने 12:21 वाला चित नहीं हूं, मैं तो चैतन्य आत्मा 12:26 हूं, मेरा सारे विश्व में कोई शत्रु नहीं, मेरा कोई मित्र नहीं, क्योंकि मैं अद्वैत 12:33 आत्मा हूं, ऐसा विजय का डंडा मार, तेरे अनुभव के नगारे पर, पर भीतर ही 12:43 भीतर से शिवोहम सोहम के गीत गुंज,... आनंदो अहम, चैतन्य अहम, शिवो अहम, शांतो 12:52 अहम, मैं अमर आत्मा हूं, ऐसी विजय पता का आज 13:01 पाने के लिए तू कटिबद्ध हो जा, कदम रख ले, कई जन्मों में तूने संसारी विजय पाई थी, 13:09 कई जन्मों में तूने राज की विजय की थी, हे मन अब तो तू संकल्प और विकल्पों की विजय 13:18 कर ले और  

परम पुरुषम दिव्यम याति पार्थ 13:23 अनु चिंतयन  अभ्यास योग युक्तेन चेतसा ननु गामीन  

 तू अभ्यास योग से युक्त होकर तेरी चेत सा को अन्य गामिनी मत जाने 13:36 दे, तेरी वृत्तियों को अन्य गामिनी मत जाने दे, अन्य गामिनी का चिंतन करेगा तो संसार 13:44 में भटकेगा, जिसका तू चिंतन करता है,.... तो तू वही होता है,.... तो  चैतन्य का चिंतन करता है तो तू 13:51 परमात्मा में होता है, तू शत्रु का चिंतन करता है तो शत्रु में होता है, बाजार का 13:57 चिंतन करता है तो बाजार में होता है, दुकान का चिंतन करता है तो दुकान में होता है, 14:03 स्वर्ग का चिंतन करता है तो स्वर्ग में होता है, और नरक का चिंतन करता है तो नरक में होता है, मनि राम तेरे चिंतन का ही 14:10 सारा खेल है, आज तू चिंतन कर मैं आत्मा हूं, मैं चैतन्य हूं, मैं सुख रूप हूं, इस प्रकार 14:16 का चिंतन कर मैं प्रेम स्वरूप हूं, मैं आनंद स्वरूप हूं, मेरा यार मैं खुद 14:26 हूं, मेरा आत्मा मैं खुद हूं, मैं निर्भय स्वरूप 14:32 हूं, प्रथम पहला मस्तक …..मु के पछी लेबु  नाम जोने ये सब चिंतन किए, लेकिन अब तू आत्म 14:40 चिंतन कर, मुझे हर्ष नहीं, मुझे शोक 14:47 नहीं, मुझे भय नहीं, मुझे चिंता नहीं, ये सब मन के संकल्प थे, भय का संकल्प भय बना देता 14:57 है, शत्रु का संकल्प शत्रु खड़ा कर देता है, तो परमात्मा का संकल्प अंदर से परमात्मा 15:03 भाव पैदा कर दे, ऐसी विजय करके ही रहूंगा जीवन 15:15 में, कृष्ण कन्हैया बंसी बजैया बिंद्रावन की कुंज 15:21 गलियों में, साधक की दिल की गलियों में, चित्त की गलियों में, तो आनंदो हम शिवोहम 15:30 की बंसी बजा दे, मैं आनंद स्वरूप हूं, मैं 15:36 चैतन्य आत्मा हूं, मेरा जन्म नहीं मेरी मौत नहीं, मैं हाड 15:44 मास का पिंजर नहीं हूं,***** आ तो फई बाय फंदो करे नाम राख अम थाजी सेधा जीी **** रमण भाई छगन 15:52 भाई ये तो शरीर के नाम है, मेरे यह नाम नहीं, मैं तो इन नामों का आधार हूं मैं 16:00 आत्मा में डूब रहा हूं, आज मैं अपने घर में जा रहा हूं, मैं आज सच्ची विजय के तरफ कदम 16:07 रख रहा हूं, हजारों हजारों विजय होने के बाद भी 16:13 अविज हो गए लोग अब तो मैं सच्ची विजय करूंगा आत्म 16:19 साक्षात्कार, मैं आत्म द्वार के, आत्म देव के द्वार खटखटाने को जा रहा हूं, मैं अपने 16:26 दिल के द्वार अपने दिल के खजाने को खोलने को जा रहा हूँ, हे विकल्पों दूर हटो, हे चिंताएं 16:33 दूर भागो, हे संसार के मित्र और शत्रु के भाव तुम शांत हो, 16:39 जाओ, मैं अपने घर में,..... 16:49 घर धन भागी थी वे गोपियां बंसी का नाद सुनकर अपना शरीर का 16:55 भाव भूल जाती थी, धन भागी  थे वे अनपढ ग्वाल बंसी का नाद 17:03 सुनकर, अपना बाह्य जगत भूल जाते थे, और कृष्ण तत्व में खो जाते 17:10 थे, धन भागी रहे होंगे वह विषधर जो बीन का आवाज सुनकर डोलने लग जाते 17:18 हैं, तो साधक ओम ओम की ध्वनि सुनकर शिवोहम शांतो अहम का भीतर ही भीतर 17:27 जप करके यदि डोलने लग जाए उस परमात्मा की मस्ती 17:33 में उस परमात्मा की शांति में डूबने लग जाए, बाहर से थोड़े बेशुद हो 17:41 जाए, बाहर की खबर से बेखबर हो जाए,

 जिसने अनुराग का दान दिया उससे कण 17:49 मांग लजाता नहीं,

 अपनापन भूल समाधि लगा ये  पियो का बीहग 17:57 सुहाता नहीं 

 देख पयो हर शाम ढले क्यों मिट उसमें 18:03 मिल जाता नहीं

 चु गता है चकोर अंगार फरियाद किसी को 18:09 सुनाता नहीं, 

    तू भगवान के रास्ते चलता और फरियाद करता है, बेवकूफ 18:15 मन तू विजय के रास्ते चलता और कायरता की खबरें दे रहा है, कभी 18:22 नहीं अब तो विजय लक्ष्मी  का दृढ़ संकल्प करूंगा, आसुरी संकल्पों को आसुरी आवेशों को 18:32 आसुरी झुननों को ज्ञान की खड़क से काट कर फेंक 18:40 दूंगा, ओम 18:49 ओ

     तुम्हारा वाचिक जप करने से तन शुद्ध हो 18:57 रहा है, मानसिक जप करने से प्राण और वायु 19:02 शुद्ध होते है, प्राण और मन शुद्ध होते 19:07 हुए तुम परम विजय के स्थान पर कृष्ण तत्व 19:13 पर शांत हो रहे हो, दृढ़ भावना करें हमारा चित्त शांत हो 19:22 जाए, मैं शांत हो रहा हूं, परमात्मा शांति में, 19:29 ओम शांति परम शांति,  

    मन संकल्प विकल्प करे कहीं जाए, दिल्ली जाए, मुंबई जाए, मद्रास 20:24 जाए, फिर उसे परमात्मा के चरणों में ले आओ, कहीं भी जाए जाने 20:30 दो, लेकिन लौटा कर परमात्मा के चरणों में ले 20:35 आओ, बंबई एक बार जाए, दिल्ली एक बार जाए, मद्रास जाए, कलकाता जाए, कारखाने 20:44 जाए, भले जाए, लेकिन उसको फिर भगवान के चरणों में आत्मा की शांति 20:51 में ले आओ, कहीं भी जाएगा एक बार दो बार लेकिन परमात्मा के चरणों में तो अनेक बार 20:58 आने की आदत पड़ जाएगी, इधर-उधर भागेगा इधर उधर की जगह अनेक 21:04 है, लेकिन परमात्मा की शरण तो एक है, तो एक की शरण बार-बार 21:10 आएगा, अनेक केस से तो दस बार पांच बार जाएगा लेकिन एक के से हजारों बार आ जाएगा, 21:18 जब हजारों बार परमात्मा के शरण मन को आने की आदत पड़ जाएगी तो वही मन की मनन शक्ति ज्ञान में 21:26 परिणित होकर आत्म साक्षात्कार की खबरें देगी, 

    नारद जी को भगवान भेज देते 21:34 थे, नारद जी भगवान के चरणों में रह करते थे, द्वारका में, कभी भेजते 21:42 थे, बिंद्रावन, कभी ब्रह्म लोक कभी 21:50 वैकुंठ  कभी पाताल लोक, कभी  विष्णु लोक लेकिन नारद को जाने में देर 21:57 क्या लगती, फटाफट जाते जाकर फिर भगवान के चरणों में आते, 22:02 भगवान फिर और कहीं भेजते फिर भगवान के चरणों में आते,

     ऐसे ही तुम्हारा मन रूपी 22:10 नारद परमात्मा सत्ता से कहीं भी जाए लेकिन फिर घुमा घुमा के उसे वही आने दो, जहां से 22:18 वह रवाना होता है जहां से वो उठता है उसे फिर वही 22:24 लाओ, जहाज पर बैठा हुआ बाज पक्षी चारों तरफ पानी 22:30 देखकर फिर वही जहाज पर आ जाता है, पैर में बंधी हुई धागे की डोर वाला 22:38 पक्षी इधर उधर घूमता घामता  फिर भी उसी हाथ पर आ बैठता है, उसी डाल या हाथ पर आ निवास 22:47 करता है, जहां से वह रवाना हुआ था, ऐसे ही 22:52 तुम्हारा चित्त तुम्हारा मन दिन भर इधर उधर घूमता है, रात को फिर उस परमात्मा की शांति 22:59 पर परमात्मा रूपी डाल पर आकर विश्राम करता है, हर रोज परमात्मा के दर्शन होते हैं, 23:06 लेकिन ना समझी का पर्दा रहा, अविद्या का पर्दा रहा है अज्ञान का, इसलिए भगवान गीता 23:13 बारवे अध्याय आठवे और नौवे श्लोक में कहते हैं कि मुझे मन और बुद्धि तो अर्पित 23:19 करते केवल मन नहीं बुद्धि से वो पर्दा हटा, बुद्धि भी लगा मुझ में, केवल मन लगाने से 23:27 काम नहीं चलेगा, बुद्धि को परमात्मा में शांत होने 23:36 दो, मन में तो मनोरंजन हो सकता है थोड़ी देर के लिए हर्ष, लेकिन बुद्धि जब स्थिर हो 23:42 गई तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठित, उसकी बुद्धि परमात्मा में 23:47 स्थिर हो गई, फिर वह कहता है 

मनो बुद्धि अहंकार चित्तानी 23:53 नाह 

मैं मन नहीं हूं, मैं बुद्धि नहीं हूं, मैं चित्त नहीं हूं, मैं अहंकार भी नहीं, 24:00 मैं शोत्र भी नहीं हूं, मैं जीवा भी नहीं हूं, मैं पैर भी नहीं हूं, मैं हाथ भी नहीं 24:07 हूं, मैं काला गोरा भी नहीं हूं, मैं वात पीत वाला हाड मास का शरीर नहीं हूं, मैं 24:15 जाति वाला भी नहीं हूं, मैं वर्ण वाला भी नहीं हूं, मैं रंग और रूप वाला भी नहीं हूं, मैं तो आत्मा हूं, 

    इस प्रकार का अनुभव जब 24:23 साधक करता है, उसी दिन विजया दशमी घटती है वास्तव में, उसी दिन असली विजया दशमी होती 24:29 है, उसके पहले की विजया दशमी सामाजिक विजया दशमी है, लौकिक विजया दशमी है, साधक की 24:36 मनुष्य की सिद्ध की उपलब्धि जब होती है तब विजया दशमी मनाई जाती है, तुम्हारे संकल्प 24:44 और विकल्प तुम्हें भले बाहर की विजय करने को दौड़ा है, लेकिन मन को कहो कि बाहर की 24:49 विजय और पराजय जिस परमात्मा की सत्ता से होती है वही आत्मा मेरा परमात्मा ही मेरा 24:56 वास्तविक में आराम का स्थान है, आराम चाहिए 25:02 तो राम में है, बाहर के विजय में आराम नहीं, बाहर के धन में आराम नहीं, बाहर की सत्ता 25:09 में आराम नहीं, राम की सत्ता में आराम 25:14 है।

     एक बार अर्जुन और हनुमान कुछ चर्चा कर 25:20 रहे थे, हनुमान ने कहा कि हमने सेतु बांधा, 25:25 बड़े-बड़े पत्थर लगाए, पुल बांधा और रावण को इस प्रकार सजा दी, ऐसा ऐसा विजय 25:35 किया, अर्जुन कहता है पागल कहीं के और बात तो तुम्हारी हमें ठीक लगी, लेकिन पुल 25:42 बांधने के लिए बड़े-बड़े पत्थर उठाने की मजूरी क्यों की? मुझ जैसे को बुला लेते, मुझ जैसे को याद 25:48 कर लेते, मैं बाणों की पुल बांध देता, घड़ी भर में, हनुमान ने कहा कि बाण की पुल तो बांध 25:55 लेते आप, लेकिन वो पुल मेरा बोजा ना सह सकती, और मेरे जैसे तो 26:03 कई वानर हैं, मेरे जैसे तो और कई सैनिक है, सेना को पसार होना था, लकड़ा पुल बनाने की 26:10 या बाणों की पुल बनाने की कोई फैशन नहीं थी, हमें तो पूरी सेना पसार करनी थी, अर्जुन 26:17 बोलता है कि सेना पसार हो जाती, हनुमान बोलता है तुम पुल बना के दिखाओ, मैं यदि 26:23 पसार हो जाऊ और तुम्हारा फूल ना टूटे तो मैं समझूंगा कि सेना भी पसार हो सकती, 26:30 अर्जुन ने समुद्र पर बाण फेंकने शुरू किए, देखते ही देखते पुल बना 26:36 दी, हनुमान जी हुप करके जंप मार के चलने लगे, पुल हिलने 26:42 लगी, अर्जुन घबराए अर्जुन ने मन ही मन उस 26:48 कृष्ण तत्व का उस परमात्मा का ध्यान किया, पुल हिली लेकिन डूबी नहीं, हनुमान ने 26:55 खूब जोर मारा लेकिन पुल टस से मस नहीं हुई, हनुमान ने कहा कि तुम्हारी पुल तो बड़ी 27:01 मजबूत थी, पहले तो जंप मारने से डामाडोल हो रही थी, फिर एका एक क्या हुआ पता 27:08 नहीं इतने में श्री कृष्ण आ गए, हनुमान ने कहा कि हां तूने जब कृष्ण का ध्यान किया 27:15 है संकल्प तेरा वहां पुल के नीचे श्री कृष्ण तत्व वहां काम कर रहा 27:23 है, ये तेरे संकल्प के बल से रुकी है, तेरे बाणों के बल से नहीं रुकी, 27:28 तब अर्जुन कहता है कि वो पत्थर का पुल भी तुम्हारे फेंकने के कारण नहीं रुखा है 27:35 तुम्हारी श्रद्धा और संकल्प के बल से ही रुका था, कृष्ण दोनों की बात को अनुमोदन 27:41 देते हैं, और अपनी पीठ दिखाते हैं कि जो स्थूल जगत में सत्य बुद्धि रखते हैं उन 27:47 भक्तों को मैं खबर देता हूं कि– जब कृष्ण कृष्ण किया तो पुल के नीचे मैं आ गया था, 27:52 पुल को संभाला था, अब जिसकी पुलिया को जिसके जीवन की पुलिया को कृष्ण संभाल ले, 27:58 उसको विजय होने में क्या आश्चर्य है,

 यत्र योगेश्वर कृष्णो यत्र पार्थो 28:06 धनुर्धर तत्र श्री विजयो भूति ध्रुवा निति मति 28:12 ममः

     संजय का मत नहीं यह तो सब शास्त्रों का मत है, सब महापुरुषों का मत है, कि जहां 28:19 वो परमात्मा चेतना है, और जहां पुरुषार्थ है, वहां 28:25 विजय श्री और स्थाई नीति रहती है, उसमें कोई संदेह नहीं 28:32 है, कई विद्वान लोग इस श्लोक का जरा आदर कम करते हैं, लेकिन इस श्लोक में सब शास्त्रों 28:40 की खबरें मिलती है, संजय ने कहा है लेकिन संजय के घर की बात नहीं है, संजय के केवल 28:47 मन की दिल की बात नहीं है, यह तो सबके दिल की बात है, कि जहां चेतना समस्त विश्व का संजय ने एक 28:56 श्लोक बनाकर गीता को सचमुच में गीता के स्थूल भाव को समझने वालों को एक इशारा दे 29:04 दिया है, कि कृष्ण माना और चराचर जगत को जो धारण की हुई शक्ति है, 29:11 उस शक्ति के निकट जो होता है उस शक्ति का जिसको आधार है उसके पास विजय और श्रेय है, 29:19 जिस देश को, जिस समाज को जिस व्यक्ति को, जिस राष्ट्र को, मौन की शक्ति उपलब्ध हो गई, 29:27 जिस व्यक्ति को मौन की शक्ति उपलब्ध हो गई, वह हजारों व्यक्तियों से अलग होकर चमकता 29:33 है, 

        इसी अखबार में adwatize  आई एक ऑफिसर 29:40 चाहिए सूक्ष्म यंत्रों का मैनेजमेंट करने वाला, अर्थात वायरलेस 29:49 कंपनी में एक व्यक्ति की जगह है, खूब भीड़ कट्ठी हो 29:56 गई, अच्छी बढ़िया पोस्ट थी, लोग अर्जी पत्र और अपनी योग्यता पत्र और प्रमाण पत्र लेकर 30:03 बैठे हैं, कोई चाय पी रहा है, कोई बीड़ी फूंक रहा है, कोई गपशप लगा रहा है, बड़ा कोलाहल जमा था, खूब भीड़ 30:11 थी, बस च च च च करते ही रहे, सब। वाह्य पुरुषार्थ में लगे थे, सबको कोई ऑफिसर का 30:19 तोड़ करने की कोशिश थी, किसी की लाग बग लगाने की कोशिश को सोच रहे थे, बड़ी कतारें 30:26 थी, एक नौजवान उन कतारों से अलग एकांत में बैठा था, किसी से बात नहीं कर रहा था, कुछ 30:33 सोच भी नहीं रहा था, बड़ा शांत बड़ा स्थिर, 30:40 चित्त ….आवाज आई कि हम एक ऐसे जवान  को पसंद करना चाहते 30:45 हैं कि, जो बड़ा शांत हो और जिसकी पहनी दृष्टि हो, वो आ 30:54 जाए, विजय पत्र तैयार है, ले जाए, इतनी भीड़ ने तो यह सूक्ष्म यंत्रों का वायरलेस का 31:00 जरा आवाज सुना नहीं, जो शांत चित्त था वह जवान 31:06 गया, और जोही भीतर गया तो देन हारने प्रमाण 31:13 पत्र दे दिया, और उसको पसंद कर दिया गया, चुन लिया गया, वो विजय का सर्टिफिकेट लेकर 31:20 बाहर आया, लोगों को कहा भीड़ काहे की जमाई मैं सिलेक्ट हो गया, लोग गुस्से हुए, देर से 31:27 आया था दूर खड़ा था यह क्या लाग वग हुई कैसे विजय हुए,... उसने कहा कि मैं लाग वग तो नहीं की, 31:36 जाने के पहले तुम सबका मैंने ख्याल किया था, लेकिन मैंने देखा कि तुम कोई आदेश को 31:41 सुन ही नहीं रहे थे, सूक्ष्म यंत्रों से आवाज ध्वनि निकली कि हम उसी को पसंद करना 31:47 चाहते हैं जो सूक्ष्म ध्वनि को सुन ले, जो सूक्ष्म आदेशों को सुन ले वो तुरंत आ जाए, 31:53 पहले और उसे विजय पत्र मिलेगा, तो मैंने आदेश को सुन लिया तुम लोग तो बाहर मुक्ते 31:59 गप सप में थे आदेश ना सुन पाए, उसी लिए तुम रह गए,

     परमात्मा भी सूक्ष्म आदेश दिए जाता 32:05 है, परमात्मा भी सदा विजय पत्र हाथ में लिए हुए इंतजार कर रहा है, लेकिन हम इतने 32:12 बहिर्मुखी भीड़ में चले गए, इतनी बाहर की सफलताओं में विजय में विजया दसमी  में 32:18 ढूंढने लग गए कि, आज तक कई विजया दशमी आई और चली गई, लेकिन विजय पताका नहीं मिली, मिल 32:24 गई थीड़ी गुड़िया की पताका, मिल गया थोड़ा धंधे में विजय, मिल गया थोड़ा यश में विजय 32:30 मिल गया, थोड़ा राज्य में विजय, और अपने को खुश मानते हैं, लेकिन अंदर बिच्छी काट रहे 32:36 हैं, अंदर मौत का भय जारी है, अंदर प्रतिकूलता का भय विरोध का भय जारी है, 32:43 बीमारी और प्रतिद्वंदीका भय चालू  है, ये  विजय नहीं है, सच्ची विजय तो 32:50 यह है, कि तुम एक बार विजय को उपलब्ध हो जाओ तो तुम्हें जगत के लोग तो क्या 33:32 तेतीस  करोड़ देवता मिलकर भी तुम्हें पराजय ना कर सके, यही सच्चा विजय है, और विजया दशमी 33:03 संदेश देती है 

यत्र योगेश्वर कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर 

    लौकिक विजय भी वही होती है 33:11 जहां पुरुषार्थ और चेतना होती है, आध्यात्मिक विजय भी वही होती है, जहां 33:16 सूक्ष्म विचार होते हैं, बुद्धि की सूक्ष्मता होती है चित् की शांत दशा होती 33:22 है, वही आध्यात्मिक विजय होती है, तो आध्यात्मिक विजय और लौकिक विजय दोनों 33:28 प्रकार की विजय करने का संदेश विजया दशमी देती है,

     तो नवरात्रि कैसे हुए नौ दिन के 33:35 बाद दसवें दिन जो शक्ति है वह अपने कार्य को विजय करने में लगाई जाती है, राम ने आज 33:41 के दिन ही आरंभ किया था, विजय पाने के लिए शिवाजी महाराज ने भी आज के दिन ही आरंभ 33:47 किया था, रघुराजा ने आज के दिन कुबेर भंडारी से 14 करोड़ अशरफियां गिरवाई थी, 33:54 किसी गुरुकुल के शिष्य को भेंट देने के लिए लिए आज के दिन दसरे के दिन बिना मुहूर्त 34:03 लोग मुहूर्त मानते हैं, क्योंकि नौ दिन की जो शक्ति जिसके पास एकत्रित हो गई है, वो जो 34:09 भी कुछ करता है वह सफल हो जाता है, जिसके पास मौन की शक्ति है, संयम की शक्ति है, 34:15 जिसके पास आध्यात्मिक शक्तियां क्रिएट हो गई है, उसके कार्य बिना चौघड़िए देखे हुए 34:21 भी सफल हो जाते…हैं। बढ़िया ना बे भाग हो छे दुर्बल जो अच्छे-अच्छे चौघड़िए में भी 34:26 करता है, दुर्बल मन की माइया दुर्बल मन के बच्चे दुर्बल मन के जमाई जब शादी करते 34:32 हैं तो ग्रह मिलाते हैं नक्षत्र मिलाते हैं बमन को बुलाते हैं, हवन करते और बड़ी विधि विधान से शादी करते, फिर भी देखो 34:39 लड़का और लड़कियों की लड़ाई झगड़े और लड़की मां-बाप के घर आ जाती है, लेकिन सबल 34:45 मन की लड़की सबल ज्ञान की सबल समझ वाली लड़कियां लड़कों की शादी हो जाती है, बिना 34:50 मोरत और चौघड़िया देखने के भी और सात्विक विचार वालों का शादी हो जाता है तो जीवन 34:55 भर चलती रहती है गाड़ी बढ़िया,.... बे भाग ना

 न अयम् आत्मा बल हीनन लभ्य ,

 दसेरा ना दाड़े 35:03 घोड़ो ना दौड़े तो क्या दाड़े दौड़े लो केव दसेरे के दिन तुम्हारा मन रूपी घोड़ा 35:10 परमात्मा रूपी द्वार के तरफ ना दौड़े तो कब दौड़ेगा ?



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