मंगलवार, 29 जुलाई 2025

बहुत पसारा मत करो | Bahut Pasara Mat Karo | Part-1 |

 

बहुत पसारा मत करो||    Part-1| 

 सत्संग के मुख्य अंश:

  • बहुत पसारा करने से क्या होता है ?
  • कमाते हैं खाने के लिए, खाते हैं जीने के लिए और जीते हैं किसके लिए ?
  • राजा जानसूत का दृष्टांत... दो फकीरों ने उनका जीवन बदल दिया !
  • ज्ञान को पाने के लिए शुद्ध अंतःकरण अनिवार्य... कैसे करें अंतःकरण शुद्ध ?
  • हमेशा अतृप्त रहते हैं... पूर्णता कब मिलेगी ? 
  • अपनी महिमा में जगाता है वेदांत...
  • बड़े-बड़े संत महापुरुष के कर्म अनोखे होते हैं.. ऋषि दयानंद, बुद्ध के दृष्टांत !
  • वास्तव में हर जीव जीता है मुक्त होने के लिए.. पर यह बात बिना इस ज्ञान समझ न आयेगी !


 सत्संग

 आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।

 योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥

        योग में 0:13 आरुढ़ इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग 0:19 की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है। और  योगरूढ़ हो जाने पर उस योगरूढ़ पुरुष का जो सर्व संकल्पो का अभाव है 0:30  वही कल्याण में हेतु कहा जाता है।

 

        कबीर का वचन है  बहुत पसारा मत 0:40 करो कर स्वरूप की आश जिनका बहुत पसारा किया हुआ है जो 0:48 बहुत-बहुत जगहो पर अटैचमेंट कर चुके हैं, निमित बन चुके हैं उन लोगों के लिए 0:55 स्वर्णम अक्षर है।


बहुत पसारा मत करो  कर स्वरूप की आश 

बहुत पसारा जिन किए वे भी गए निराश।


         बहुत पसारा करने से क्या होता है?  बहुत पसारा करने से हमारी जो चेतसा 1:18 है बहु गामिनी हो जाती है, बिखराव वाली हो जाती है, और बिखराव वाली जो चेतसा 1:28 है, वो हमको अपने घर से दूर ले 1:34 जाती है,  इसलिए श्री कृष्ण का वचन है 1:39 कि अनन्य चिंतयंतु मा अनन्य भाव से, अन्य भाव से नहीं अनन्य भाव से हम लोग बिखर गए 1:48 हैं, बट गए। हमको पता ही नहीं कि हम पढ़ते किस लिए 1:56 हैं? पढ़ते पास होने के लिए, पास होते हैं कमाने के लिए, कमाते हैं, खाने 2:05 के लिए, और खाते हैं जीने के लिए, जीते किस लिए 2:12 उस बात का किसी को पता ही नहीं।ध्यान देना जरा हम कमाते हैं खाने के 2:20 लिए, खाते हैं जीने के लिए, जीते किस लिए 2:26 हैं? नो रिप्लाई कोई जवाब नहीं,  बस जीते 2:32 हैं कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलता है जीते हैं मरने के लिए, लेकिन गहराई से देखो 2:38 कि जीते हैं आप मरने के लिए नहीं मौत किसी को पसंद नहीं है। 60 वाला 70, 70 वाला 100, 100 वाला 108,  2:47 की माला जपना चाहेगा, 108 भी हो गया तभी भी वह गहराई से मौत नहीं चाहता, हम जीते मुक्त होने के लिए, ईमानदारी की बात है।



         नन्हे मुन्नो से पूछो इतवार आने को है तो कितनी 2:59 खुशिया छा जाती है,  जेल में जो सड़ रहे हैं उनको जब पैरल पर छुट्टी का अथवा एकदम 3:05 मुक्त होने के आदेश आता है तो उस दिन कितने खुश होते हैं। बैठे बैठे दो तीन घंटे 3:11 सत्संग सुनते सुनते जब छुट्टी कर देते तो कैसे फ्रेशनेस आ जाती है,  हालांकि है तो 3:16 बढ़िया काम।  तो मुक्तता इतनी पसंद है कि रग रग में एक तोता आकाश में उड़ा जा रहा है 3:25 उसको पकड़ के सुवर्ण के पिंजरे में डाल दो, खाने पीने के लिए तुम्हारे ऊंचे से 3:31 ऊंचे कीमती फल फ्रूट धर दो। स्वर्ण की कटोरी में पीने के लिए पानी 3:37 दे दो लेकिन वह जो अभी अभी मुक्त गगन गामी पोपट आया है,  उसको उसमें डाल दिया जब तक 3:46 उसके अंदर की लघु ग्रंथियां बंद नहीं जाती तब तक उसको खाना पिना हराम 3:53 हो जाएगा।  मैंने देखा,,,, चिड़िया भूखे में भूखे ऐसे जंतुओं को ऐसे प्राणियों को देखा 4:00 कि वो तड़प रहे रोटी के टुकड़े के लिए धीरे-धीरे रोटी डालते डालते मैं उनको कमरे में ले गया और कमरा बंद कर दिया, फिर उनके 4:06 आगे मिठाइयां रखो तो उनके लिए जहर हो गई बस तड़पते बाहर निकलने के लिए।  घुस कोले भी 4:12 तो हर  जीव जीता है मुक्त होने के लिए  लेकिन उसको पता 4:18 नहीं, हम कमाते हैं, खाने के लिए, और खाते हैं, जीने के लिए और जीते हैं, मुक्त होने 4:25 के लिए लेकिन मजे की बात है मुक्त होने के लिए तो हम जीते हैं लेकिन आज तक मुक्त 4:31 होने के रास्ते पर कदम नहीं रख पाए।  गए मंदिर में,  गए मस्जिद में, गए गिर्जा घर में 4:38 गए, तीर्थों में एक आश को पूरी करने के लिए अथवा एक इच्छा को छोड़कर 10 इच्छाएं 4:45 बुन ली इर्दगिर्द।। शुभ कर्म करते हैं लेकिन शुभ कर्म भी ऐसा ही करते हैं कि मुक्ति के 4:51 बजाय बंधन ही बढ़ जाए। समेटने के बजाय हम स्वयं को बिखेर 4:56 देते हैं, ऐसे लोगों के लिए जिनके पास श्रद्धा है, जिनके पास कुछ समझदारी भी है, 5:04 ऐसे लोगों के लिए यह दोहा जो कबीर जी का है सुवर्ण अक्षरों से लिख लेना चाहिए अपने 5:10 हृदय की डायरी में। बहुत पसारा मत 5:15 करो कर स्वरूप की आश, बहुत पसारा जिन किया वे भी गए 5:23 निराश।  क्योंकि जगत का तुम कितना भी बहुत पसारा करोगे लेकिन वो उसमें आशा तृप्त 5:32 नहीं रहेगी, आशा निराशा में ही बदलेगी। 


        ज्ञानसूत राजा की कथा अपने साधक जानते हैं। 5:39 ज्ञानसूत राजा बहुत पसारा किया, और फिर पसारा करते 5:45 करते धन अधिक होने पर फिर उबान आई तो दानी बन 5:51 गया। दान करते करते उसको एक ऐसा शौक चढ़ गया कि मैं ऐसे नदी, तलाव, बावड़िया करवा 5:57 दूं,  ऐसे भोजनालय बनवा दूं कि कोई भी आगंतुक साधु 6:03 संत भिखारी गांव मेरे गांव में प्रवेश करे तो किसी के वहां हाथ फैलाना उसको ना 6:10 पड़े मेरे ही उस भोजनालय में मेरे ही अन्न क्षेत्र में,  सदाव्रत में वह भोजन किया 6:17 करें।  महाराज ठहर ठहर उसके भोजनालय, सदाव्रत अन्य क्षेत्र खुल 6:23 गए। गांव द इधर उधर के आलस लोग भी खाते थे। आगत आगंतुक साधु संत भी खा ले ते थे। रह 6:31 लेते थे उसकी धर्मशाला में, पुण्य कर्म तो है ही है, दान अपनी जगह पर अच्छा है ही है, 6:38  ऐसा करते करते दो फकीर घूमते घाम राजा ज्ञानसुत के राज्य में पहुंच 6:43 गए मैं फकीर कह रहा हूं ध्यान से सुनना। दो बाबा जी नहीं,  दो फकीर।  वेश तो 6:51 बाबा जी का था फकीर का मतलब है जिसने अपने स्वरूप के विषय में जो संशय है, उसकी फाकी कर ली 7:06 उसको फकीर कहा जाता है। तो ऐसे दो फकीर घूमते घामते राजा ज्ञानसुत 7:13 के राज्य में पहुंचे, और उनके सदाव्रत में अन्न खा 7:20 लिया,  उन्हीं की बनी हुई धर्मशाला में उनको आराम करना पड़ा। तो वह जो फकीर थे ब्रह्म 7:28 वेता थे ब्रह्मज्ञानी थे,  उन्होंने देखा कि इतनी सुव्यवस्था है इतना 7:33 दानी राजा है इस दानी राजा को दान का मान छुड़ाना जरूरी 7:40 है।  पहले पापी पने का मान होता है, फिर पुण्यात्मा का भी मान होता है,  कर्ता मौजूद 7:47 रहता है। पहले विलासी पना 7:53 है, निर्धन पना है, अनपढ पना है फिर पढा 7:58 हुआ, पहले निर्धन था, अब धनवान पहले कंजूस था, अब दाता,  पहले 8:04 अप्रसिद्ध था अब प्रसिद्ध।  लेकिन ये सब परछिन मान्यताएं संसार से मुक्त नहीं 8:14 करेगी।  ज्ञानसूत राजा का पुण्य परिपाक को उपलब्ध हुआ होगा ज्ञानसूत के अन्न को ग्रहण 8:23 करने के बाद उन बाबा जीयों के मन में थोड़ा ख्याल आया कि इसको थोड़ा 8:30 कर्मों के जाल से ऊपर उठाना चाहिए। दान तो करें,  पुण्य तो करें, लेकिन इसके अंदर जो 8:38 छुपा हुआ ईश्वर का खजाना,  आत्म ज्ञान जो है वह जब तक नहीं मिलेगा, तो पुण्य का फल फिर 8:44 स्वर्ग में जाएगा सुख भोगेगा, फिर नीचे आएगा,  फिर जन्मेगया का सुख भोगने के लिए भी समय  8:49 देना पड़ेगा,  दुख भोगने के लिए भी समय देना है और सुख भोगने के लिए भी समय देना है।  8:55 अपने को खर्च करना है,  सुख कोई सुख में अपने को खर्चता है कोई दुख में अपने को खर्चता 9:01 है,  लेकिन खर्च होता है।  अपने आप का खर्च हो जाना एक बात है और 9:07 अपने आप की खबर हो जाना दूसरी बात। 


        अपने आप को कोई अच्छे कर्म में खर्च 9:15 ता है अपने आप को कोई बुरे कर्मों में खर्चता है। बुरे कर्मों में खर्चने वाले का 9:21 ज्ञान में, साधना में, साक्षात्कार में मुक्त अवस्था में अधिकार नहीं।  अच्छे कर्म 9:26 में जो अपने को खर्चता है उसका अधिकार है।

         कृष्ण बात बता रहे हैं आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं जो 9:34 योग में आरूढ़ होना चाहता हो, कर्म कारणमुच्यते  उसके लिए काम उसके लिए 9:44 कर्म कारण है। जब तक निष्काम भाव से कर्म नहीं किए 9:50 जाते हैं पुण्य कर्म किए नहीं जाते तब तक अंतःकरण शुद्ध नहीं होता और शुद्ध अंतःकरण 9:57 के बिना, जिज्ञासा पैदा नहीं  होती। अशुद्ध अंतःकरण में ज्ञान के वचन नहीं 10:03 ठहरते।  आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं जो योग में आरूढ़ होना चाहता 10:11 हो, कर्म कारणम उच्चते उसके लिए कर्म कारण 10:18 है। जब तक निष्काम भाव से कर्म नहीं किए जाते हैं, पुण्य कर्म किए नहीं जाते तब तक 10:24 अंतःकरण शुद्ध नहीं होता और शुद्ध अंतःकरण के बिना जिज्ञासा  पैदा नहीं होती। अशुद्ध 10:31 अंतःकरण में ज्ञान के वचन नहीं ठहरते। अशुद्ध अंतःकरण में भीतर को ठठोलने की, भीतर 10:39 को खोजने की योग्यता नहीं होती। अशुद्ध अंतःकरण में विश्रांति नहीं होती, और 10:45 विश्रांति वालों की पास ठहरने की क्षमता भी नहीं 10:52 होती।  अशुद्ध अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए सेवा परायण होना ठीक है कर्म करना  अच्छा 10:59 है लेकिन वो कर्म करते करते जो शुद्ध अंतःकरण हो तो शुद्ध अंतःकरण को फिर शांत 11:06 अंतःकरण भी बनाना चाहिए। 



        भगवान बुद्ध एक 11:13 दिन अपने भिक्षु कों के आगे बड़े गुढ़ विषय का प्रतिपादन कर रहे 11:20 थे। नितांत गुढ़ था और काफी लोग चाह से सुन रहे थे और 11:27 बुद्ध एकाएक चुप हो गए मौन हो गए। इतने गंभीर हो गए कि किसी की हिम्मत ना 11:32 हुई बुद्ध से पूछने की तथागत आप एकाएक क्यों चुप हो गए? भगवान 11:38 ऐसा कौन सा विषय जिस पर आप प्रकाश नहीं डाल सकते?  उस दिन सभा बिखर गई धीरे-धीरे 11:43 लोग सब चले गए दूसरे दिन बुद्ध ने जब प्रवचन चालू किया, लोगों ने आदर से 11:50 सुना, फिर प्रश्न उत्तर हुआ तो किसी भिक्षुक ने पूछा कि भगवान कल आप अधूरे 11:56 विषय को छोड़कर एकदम मौन हो गए तुषानीय हो गए नितांत तुषनिय हो 12:05 गए। क्या कारण था यह हमें संदेह होता और इसी विचार के हम 12:11 कल रात को सब अंदर-अंदर चर्चा कर रहे थे हमारी हिम्मत ना थी आपसे पूछने 12:17 की।  तथागत ने कहा कि मैं जब प्रवचन कर रहा था तो तीन 12:24 भिक्षुक के हाथ और पैर हिल रहे थे, कई लोग बैठे होते हैं 12:30 ना तो उनके हाथ और पैर हिल रहे थे,  तो मैंने देखा कि मैं इतना गहराई से बोल रहा 12:36 हूं और ये इतने बाहर है मैं इतना भीतर हूं और ये इतने बाहर है सौदा बनेगा नहीं। तो जब 12:42 सौदा ना बने तो माल दिखाना भी बेकार है,  और देना भी बेकार है। 

        आदमी इतना चंचल होता है कि उसकी चंचलता 12:52 की खबर उसका स्थूल शरीर काम बता रहा है जितना जितना आदमी 13:00 बिखरा है,  उतनी उसकी शक्तियां क्षीण होती है,  और 13:05 जितना जितना वह आदमी अंतर्मुखहै उतना उसकी योग्यता, शक्तियां विकसित 13:12 होती है। तो बुद्ध ने कहा मैं उसी लिए चुप हुआ 13:19 ऐसा नहीं कि मैं नहीं जानता था चुप हुआ लेकिन मैंने देखा कि नहीं जानने वालों के 13:24 बिना क्षमता वालों के आ upगे मैं बोल रहा हूं,  तो बोलना मेरा व्यर्थ है मेरी वाणी आजई खर्च नहीं 13:34 करूंगा। तो हाथ पैर हिल रहे हैं तो यह आदमी के भीतर के मन की अशांति के दर्शन देते 13:40 हैं, और अशांति तब होती है जब शूद्र देह 13:45 में अंहता हुई और देह के साथ संबंधों में ममता हुई तब अशांति होती 13:54 है। 

    ऐसे लोगों के लिए भी ज्ञानसुत राजा की बात याद रखने जैसी है। 14:00 भगवत गीता के छठे अध्याय में के महातम में

 

      रैंक मुनि का प्रसंग आता 14:08 है ये ज्ञानसूत 14:13 राजा पामर भी ना था,  बुद्धु भी ना था,  और बुद्ध भी ना था बीच में हिलोरे खाता 14:21 था। दो फकीर जब उसके राज्य में रहे और उसका अन्न ग्रहण किया और धर्मशाला में उसी के 14:27 धर्मशाला में सोए तो फकीरों को हुआ कि इस राजा को कुछ सद उपदेश मिले क्या किया 14:34 जाए। फकीरों का संकल्प काफी हो जाता है उसी रात ज्ञानसुत राजा ने स्वपना 14:41 देखा आकाश मार्ग में दो हंस उड़े जा रहे हैं, कथा कहती है कि उपले हंस को नीचे के 14:50 उड़ने वाले हंस ने कहा कि और आगे मत जा ऊपर ये ज्ञानसूत राजा का इलाका है ज्यादा 14:58 ऊपर जाएगा तो ज्ञानसूत राजा के तेज से तू भस्म हो जाएगा। तब वह हंस कहता है चल रे 15:05 पागल ज्ञानसुत राजा का तेज ऊपर नहीं है ऊपर तो खुला आकाश है, मानो शांत ब्रह्म है ऊपर 15:13 तो ब्रह्म परमात्मा का तेज है, वह जलाता नहीं है वह पापों को जलाता है, वह अशांत 15:19 नहीं करता वह शांति दाता है।  ये ज्ञानवान का तेज है ज्ञानवान की 15:27 दृष्टि जब ब्रह्माकार का होती है तो ब्रह्म लोक तक की उसकी वृत्ति फैल जाती है बुद्ध 15:32 पुरुषों की। तो बुद्ध पुरुषों के तेज का इलाका है यह बुद्धु के तेज का इलाका नहीं 15:39 है। बुद्धु का तेज होता है तो बुद्धु का अहंकार बढ़ता और दूसरे को शोषता है और 15:47 बुद्ध का तेज दूसरे को आत्मीयता से उठाता है,  और दूसरे को बुद्धत्व के तरफ ले जाता 15:53 है। तो यह बुद्धु का तेज नहीं है यह बुद्ध पुरुषों का तेज है ज्ञानसुत राजा का राज्य तो 16:01 छोटा सा है इस राज्य पर तो कितने राजा आके चले गए मेरी पृथ्वी,  मेरा मकान,  मेरा दुकान 16:07 कर कर के चले गए।  कबीर कहते हैं बहुत पसारा मत करो कर स्वरूप की आश बहुत पसारा जिन 16:15 किया वे भी गए निराश।  तो ज्ञानसुत का तेज तो निराशा में 16:20 बदलने वाला है, और मेरा मैं जहां उड़ रहा हूं वहां निराशा नहीं है क्योंकि वहां आशा 16:26 ही नहीं है। जहां आशा होती वही निराशा होती है,  वहां कोई आशा नहीं है वहां तो केवल राम ही 16:33 राम है।  आशा तो एक राम की और आश 16:38 निराश  .  ज्ञानसुत स्वपना देख रहे हैं और यह संवाद सुन रहे है।  सुबह 16:45 हुआ जांच करवाई कि अपने गांव में कोई ऐसे महापुरुष हैं कोई ज्ञानी देखा कि कल दो 16:51 फकीर आए थे सुबह सुबह चले गए वजीरो को भेजा कि कोई संत पुरुष हो कोई फकीर हो उनकी खोज 16:58 करो, जांच करते करते सीआईडी ने बताया कि रैंक 17:03 मुनि नाम का एक बुद्ध पुरुष है,  लेकिन महाराज उसका हाल तो ऐसा है कि आप 17:11 उसके आगे खड़े नहीं रह सकते, बेलगाड़ी का चलाने का धंधा करता है, 17:17 घर बार है नहीं,  रात को बेलगाड़ी के नीचे पड़ा रहता 17:22 है। ज्ञानसुत राजा ने उस फकीर के पास जाना स्वीकार किया। गए 17:29 600 अशरफिया खचर पर भर कर जाकर भेट धरि  और बोला महाराज मुझे ब्रह्म ज्ञानियों का 17:35 तेज बताओ,  ब्रह्मज्ञान का तेज मिल जाए ऐसा कृपा करो। ये 600 अशरफ़िया मैं आपको उसके बदले में 17:42 देता हूं। रेक  मुनि ने डांट दिया  चल रे भिखारी कहीं का तू ब्रह्म 17:50 विद्या 600 अशरफिया देकर लेने आया है 

भुई सवाडू भूखे मारू ऊपर थी मारू मार, 

एतलू  करता जो हरि बजे तो, करे नाखू निहाल

  तू 600 अशर्फियों से उस ब्रह्म को जानने 18:05 को आया है, हमारा ब्रह्म इतना सस्ता 18:14 नहीं।  कवि ने कहा 

प्रेम न खेतो उपजे प्रेम 18:19 न हाट बिकाय

 राजा च हो प्रजा च हो शीश दिए 18:25 ले जाए।  

600 असफिया नहीं लेकिन अपने आपको देना पड़ता 18:31 है। 


        सुनाई थी वह कथा कि श्रीमद् भागवत का प्रारंभ हो रहा था सुखदेव जी महाराज 18:38 परीक्षित के पुण्य से आकर्षित होते हुए प्रारब्ध वेग से आ रहे थे। सुखदेव जी ने जब 18:46 कथा सुनाने का संकल्प किया तो सूक्ष्म रूप में देवता लोक आये और देवताओं ने सुखदेव जी 18:53 को प्रार्थना की कि आपका शिष्य जो परीक्षित है,  उसको हम स्वर्ग का अमृत पिला 18:59 देते हैं,  और इसके बदले में आप हमको ब्रह्म विद्या का अमृत पान कराइए। सुखदेव ने कहा 19:06 तुम देवता बड़े चतुर चालाक हो स्वर्ग का अमृत पीने से पुण्य नाश होते हैं और 19:14 ब्रह्म विद्या का अमृत पीने से जन्म मरण नाश होते हैं। स्वर्ग का अमृत पीने से आदमी 19:21 बहिर्मुखी होता है, और साधना का अमृत पीने से आदमी अंतर्मुखी 19:28 होता है परमातम गामी होता है,  स्वर्ग का अमृत पीने से आदमी विषय गामी होता है और सत्संग का अमृत 19:36 पीने से आदमी अंतर्मुखी होता है परमात्तमगामी होता है।  तो तुम काच का टुकड़ा देकर 19:43 कोहिनूर लेने को आए हो, यह सौदा बाजी नहीं चलेगी, तुम चले जाओ। देवता लोगों को वापस कर 19:50 दिया। तो ज्ञानसूत राजा ने जब 600 अशरफिया ऑफर देकर और बदले में चाहा तो इस विद्या 19:56 का अदला बदला नहीं होता है। ये विद्या का तो सच पूछो तो साधक और संत के बीच एक निर्दोष 20:06 प्रेम जब छलकता है तब दिल ढुलता है दूसरे दिल में भर जाता हैमजे की बात है इतना भी 20:13 ढुले फिर भी वह दिल खाली नहीं होता और हजार हजार घड़े भर जाते हैं,

 पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

 पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते 

        एक दिया जले फिर उस दिए से हजार हजार दिया जले, फिर 20:25 भी उस जले हुए दिए की लो कम नहीं होती हो हो सकता है कि जले हुए दिए की लौ  कम हो 20:30 जाए तेल के आधार पर है, और तेल परिछन है वो परमात्मा परिछन नहीं है वो असीम है,  वहां 20:38 कुछ खुटता नहीं है।  पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते  20:44 पूर्णम ओम ओम तो यहां आज श्री कृष्ण का वचन है आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं  योग में यदि 20:52 आरुढ  होना चाहते हो तो तुम्हारे लिए कर्म कारण है कर्म करो लेकिन फल की इच्छा ना रखो फिर" 21:01 भी फल की इच्छा हो जाती है। कई लोग बोलते हैं कि हम तो निष्काम भाव 21:08 से करते हैं।  देश की सेवा करते हैं देश की सेवा करने वाले लोग ऐसा मानते हैं कि 21:14 भगवान ने देश को बनाया है कहीं ना कहीं कमी रख दिया है। हम सेवा करके वह कमी निकाल 21:20 के लोगों को सुखी कर देंगे। ऐसी बात नहीं है। देश की सेवा, कुटुंब 21:28 की सेवा, परिवार की सेवा ये सब सेवा जब तक तुमने गीता को ठीक से समझा नहीं, बुद्ध 21:36 पुरुषों का सानिध्य किया नहीं, तब तक मन तुमको सेवा के बहाने अपनी इच्छा तृप्ति 21:43 में आपको बांटता रहेगा, बिखरता रहेगा,  और हम बिखरते बिखरते यहां तक पहुंच 21:51 जाते हैं कि लोगों की नजरों से तो हम धनी हो, संत हो, प्रसिद्ध हो, सेठ हो,  साहूकार 21:58 हो,  लेकिन अपने आप में हम देखते तो कुछ ना कुछ खटकता रहता है, कुछ ना कुछ कमी होती 22:04 रहती है, कमी तब दिखेगी जब कमी वाले में हम बैठेंगे और पूरा तब दिखेगा जब हम पूरे में 22:12 बैठेंगे। 


        अंतःकरण और शरीर, मन,  शरीर और संसार 22:20 यह प्रकृति की चीजें है।  प्रकृति कोई दिन पूरी नहीं और जब तक हम संसार में शरीर में 22:27 या अंत में बैठे तब तक हमें पूर्ण तृप्ति नहीं होगी। अभी कह देते हैं कि बस एसएससी 22:35 पास हो जाए बस शांति।  *******Gj  कॉलेज में भी हो गए,  एलजी बीजी करते 23:02 करते डॉक्टरी कोर्स लिया और एमबीबीएस भी हो गए, अब क्या हाल है?  हमारी पोस्टिंग जरा 23:09 बड़ी सिटी में हो तो ट्रेनिंग लेने में मजा आए। पोस्टिंग बड़ी सिटी में हो गई।  फिर 23:16 बापू अब सर्विस नहीं अपना दवाखाना खोले तो अच्छा है। दवाखाना अपना खोला। अब आप तृप्त 23:23 हो गए जिन्होंने अपना दवाखाना खोला है और दे छुरी घुमा रहते हैं सेवा के बहाने वाड़ी 23:30 लाल में जाते हैं वस में जाते हैं और जगह जाते और फिर वहां से चुनचुन के मुर्गे अपने उसमें भरते और कटा कटी करते हैं, और 23:38 माड़ी पर माड़ी है कार है दो कार है चार कार है ऐसे लोगों को मैं जानता हूं अपना 23:43 प्लेन है,  ऐसे डॉक्टरों को मैं जानता हूं।


         फिर भी उनकी गहराई में देखोगे 23:53 तो तब कबीर का वचन याद आएगा अच्छी तरह से 24:00 बहुत पसारा मत करो कर स्वरूप की 24:07 आश बहुत पसारा जिन किया वे भी गए निराश 24:14 बहुत पसारा जिन किया वे भी गए निराश 24:20 रात्रि को हम सो जाते हैं कोई इच्छा नहीं होती, कोई वासना नहीं होती,  कोई पसारा नहीं 24:27 होता,  सेठ, नौकर राजा, रंग सब एक अवस्था में 24:33 फुटपाथ वाला अथवा एयर कंडीशन,  बंगले में आराम करने वाला, प्रारंभ में वह अपने को 24:40 सुखी मानता वो अपने को दुखी मानता मान्यता अपनी वृत्ति की है। हो सकता है फुटपाथ वाला 24:45 बोले अरे सेठी लोग तो क्या एयर कंडीशन में सोते हैं कभी गर्मी पड़ी तो बीमार अपने तो फुटपाथ पे सोते हैं ऐसे हैं अपने सुखी उसकी 24:53 मान्यता से वो सुखी भी हो जाए, और सेठ बोले क्या तो अपने***** इस प्रकार की वो 25:05 वृत्ति करेगा तो सेट एयर कंडीशन में होते हुए भी वो हार्ट कंडीशन में और वो फुटपाथ 25:13 में होते हुए भी सुखी हो सकता है, लेकिन फुटपाथ सुख का कारण नहीं है एयर कंडीशन 25:18 दुख का कारण नहीं है वेदांत तुम्हें एयर कंडीशन नहीं छुड़ाता वेदांत तुम्हें 25:23 फुटपाथ में नहीं भेजना चाहता लेकिन वेदांत चाहता है कि जिस समय जो अवस्था आए वह 25:29 अवस्था संसार की है शरीर की है मन की है तुम इन सबको सत्ता देने वाले हो तुम 25:36 स्वामी होकर सेवक मत बनना तुम अपनी महिमा अपनी मोहर जिसको जिस 25:44 प्रकार की लगाते हो वह चीज वैसी हो जाती है  


        एक आदमी शमशान के 25:52 पास रहता था, बड़ा डरता था। मां-बाप की मिल्कत थी, मकान वहां रह गया बच्चा कहीं 25:59 पढ़ लिख कर आया सुना था,  भूत होते हैं, प्रेत होते हैं अब शमशान से गुजर के जाना पड़ता 26:05 है।  दोपहर होती 10 बजते 10:30 बजते तब जाता और शाम को जल्दी भागा भागा घर पहुंच जाता, 26:12 क्योंकि बीच में मशान पड़ता है कोई भूत ना पकड़ ले, कोई प्रेत ना आ जाए, कोई हौवा कौवा 26:18 ना खा जाए, बड़ा भयभीत रहता था। महाराज समय बीतता गया, धड़कन तो चालू रही। 26:27 गांव में घूमते घाम से कोई बाबा जी आए बाबा जी को कहा कि मशान में से मैं गुजरता हूं ना मेरा बस खाया पिया सब खून लेवल हो 26:35 जाता है। 26:40 आजू बाबा जी ने देखा कि इसको मन में घुस गया कि मशान में कोई है भूत प्रेत पकड़ 26:47 लेगा, मार लेगा। बाबा ने कहा तू चिंता मत कर आकाश बाँधु, पाताल बाँधु, जल बाँधु, थल बाँधु, तेज 26:53 बाँधु, पृथ्वी बाँधु अला बाँधु, बला बाँधु, भूत बाँधु, प्रेत बाँधु, साकीनि, बाँधु, साकीनि26:59 बाँधु, फूक मार इसको कागज को फूंक मारी और बाबा ने अपना कुछ किया जो कुछ उसको जरा 27:05 मानसिक असर हो जाए, बाबा ने कुछ ऐसा वैसा भोज पत्र पर लिखा और ताबीज में डाल दिया और बोले इसको अगरबती कर, इसको चंदन लगा, 27:12 इसको ये कर, इसको जितनी फॉर्मेलिटी लंबी चौड़ी उतना मन को हुआ कि ये कुछ 27:20 है। बोले देख ये तो बांध दे और दिन को तो 27:26 क्या रात को 12 बजे निकल दो बजे निकल तेरे आगे भूत प्रेत आएंगे तो भस्म हो जाएंगे। 27:32 मैं कोई जैसा तैसा बाबा नहीं महाराज उसको असर हो गई अब तो सुबह 27:38 निकलने लगा कभी-कभी अंधारे में निकलने लगा रात्रि को निकलने लगा उसको पक्का हो गया 27:43 कि यह तावीज बस इसकी बराबरी कोई नहीं है भूत प्रेत क्या आ सकते। भाग गया भूत प्रेत 27:50 लेकिन महाराज नहाता था तो कहीं तावीज गुम ना हो जाए, सोता था तो कोई ताबीज निकाल ना 27:56 ले, बातचित करता था तो बारबार ताबीज के तरफ देखता था कि छीन ना ले, तो एक भय को 28:02 निकालने के लिए दूसरा भय घुस गया निर्भय नहीं हुआ उसने संशय की फाकी नहीं 28:08 की।


         हम मंदिर में जाते हैं इसलिए कहीं नौकरी ना छूट जाए, हम मंदिर में इसलिए जाते 28:14 हैं कहीं नर्क में ना पड़ जाए, हम किसी से रिश्ता नाता रखते कि कहीं रेड ना आ जाए, हम 28:19 किसी से बातचीत करते उससे अच्छा शबद बनते कि फलाना नाराज हो जाएगा तो इसका सपोर्ट काम में आएगा, तो फलाने के अंदर उसके अंदर 28:27 जो अस्तित्व उस अस्तित्व का ज्ञान नहीं तो हमारे भय ने जगाए बदली। एक कंधे से दूसरा 28:34 कंधा, दूसरे कंधे से पहला कंधा, कंधे बदलते आए दुख नाश हुआ नहीं, दुख ने कंधे बदले हैं 28:40 दुख ने जगाए बदली है। पास हो जाऊं तो शांति, प्रमोशन मिल जाए तो शांति, लाड़ी मिल जाए 28:47 तो शांति, छोकरा मिल जाए तो शांति, छोकरे को पत्नी मिल जाए तब निराद और पत्नी को छोकरे 28:54 की पत्नी अब सब मिल जाती नहीं और मिलती तो सबका सेट नहीं होता, स्वभाव सेट नहीं होता 29:00 तो दादा अपसेट हो जाते हैं, और समझो सेट भी हो गए तो भी आसक्ति ऐसी होती है, कि मौत सब 29:08 सेट को अपसेट कर देता है। चुकरा ने बना गना 29:13 व्यवस्थित कर छोकरा ने र छोकरा एने प सारी ते दाखल कर बू सेट थ ग काका तमारे सेट थवा 29:21 बाकी नहीं तो बधू सेट ट कबीर कहते तुम अपने को आप में सेट करो 29:27 फिर दूसरा तुम्हारे होने मात्र से सेट होने लगेगा। दूसरा सेट हुआ तो भी अपसेट और 29:32 अपसेट है, तो भी अपसेट। 


        जगत का कोई काम हम पूरा कर ले तो भी अधूरा है, अधूरा तो अधूरा 29:40 है ही है लेकिन जिसको हम लोग पूरा मानते हैं वह भी अधूरा है वहु आखो दाड़ो काम करे 29:46 रात पड़े सासू ना पग दाब सासू के पति को केबा टला करया वास छोकरा सु द पति ने पदा 29:56 बानी बधु काम पति सवार थाम काम पति बधू बाकी छ चा कर बाकी 30:03 छ कप दोवा बाकी न छोकरा नवरा ना बाकी, ऐसे ही रोज काम पूरा करके आदमी सोता है सुबह 30:10 देखो तो सब का सब अधूरा। जीवन भर तुम पूरा करते करते मर जाते फिर भी कुछ ना कुछ 30:16 अधूरा रह जाता, क्योंकि बहुत की आश हमें निराशा में गिरा देती है, बहुत है नहीं 30:23 बहुत के पीछे जो एक है उसका जब तक ज्ञान नहीं होता, तब तक बहुत विषय बहुत इंद्रियों 30:30 का, अब इंद्रिया तो हमारे पास पांच है, आंख एक है, लेकिन उसके विषय अनेक रंग, अनेक कान 30:37 एक है सूत्र इंद्रिय एक है लेकिन उसके शब्द अनेक है नाक एक है गंध अनेक है जीव 30:45 एक है रस अनेक है तो कुल पांच विषय पांच विषय अलग-अलग है लेकिन पांचों विषयों को 30:52 प्रकाशने वाला तो एक है। जिसने रूप को देखा उसने रस को देखा, जिसने रस को देखा, 30:58 उसी ने गंध को देखा, जिसने गंध को देखा, उसी ने शब्द को सुना, तो यह सुनने वाला तो एक है, जिसने सुख को देखा उसने दुख को देखा, 31:06 जिसने मित्र की वृत्ति को देखा, उसी ने शत्रु की वृत्ति को देखा, तो मित्र और शत्रु यह तुम्हारी वृत्तियों का खेल है। 

         तुम स्वरूप का ख्याल करो आरु रुक्ष मुनर योगम कर्म कारण 31:20 उच्चते योग में आरू होना चाहते हो तो तुम्हारे लिए कर्म कारण है, कर्म करते करते 31:27 अंतक जब शुद्ध होता है, कर्म केवल ऐसा नहीं कि किसी को मकान दिलाया यह करा वो करा 31:33 भक्ति करना भी एक कर्म है, ध्यान करना भी एक कर्म है, जप करना भी एक कर्म है, दूसरे 31:39 के आंसू लूस लेना वह भी एक कर्म है। 

        ऋषि दयानंद जा रहे 31:44 थे रास्ते में, चौमासे के दिन थे एक बैलगाड़ी की कीचड़ में फस 31:52 गई। लोग घेरा डाल केर खड़े हो गए थे सब सुझाव देते थे, ऐसे निकालो, ऐसे निकालो, बेल 31:59 हटाओ यह करो वह करो बैल ज्यो ज्यो जोर मारते थे त्यों त्यों गाड़ी के पहिए अंदर घुसते 32:06 जा रहे।  बेल के मुंह से फिन और लार निकलने लगी ऋषि दयानंद ने देखा कि सब सुझाव देते 32:14 हैं। काम बिगड़ रहा है बैलों को खोल 32:19 दिया अपने पास जो ऊपर की धोती थी उसको बाँध के कमर में, गाड़े को खींच के बाहर 32:26 निकाल दिया, फिर चल दिए जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लोग प्रशंसा करने लगे महाराज तुमने बहुत काम 32:32 किया, ये क्या, वो किया, बोले क्या किसने किया, कौन किया, आ गई लहर हो गया। इसने किया, 32:37 जिसने किया, उसने किया, और जिसका हुआ हुआ उसमें मैं और तुम क्या 32:44 होते। तो बुद्ध पुरुष के द्वारा बड़े-बड़े काम हो जाए समझदार संत के द्वारा 32:49 बड़े-बड़े काम हो जाए, हमारी नजरों में लेकिन उनसे तुम पूछो कि तुम क्या करते हो? वह करता है तो फिर वो संत नहीं, और संत है 32:57 तो करता नहीं।


गुलाम नबीर


         हम तो गुलाम नबीर के भाई हैं गुलाम नबीर जा रहा था रास्ते से पूनम की रात थी 33:06 कहीं नजर पड़ी कुए में देखा कि अरे रमजान के महीने और 33:13 आज आज चांद फसा है इधर, कुए में चांद फस गया, बोले तू कुए में फंस गया यार हमारी 33:20 जाति वाले सब भूखे मरेंगे बाहर निकल। खूब डाटा फटकारा पत्थर मारे बाहर निकल नहीं तो 33:27 पिटाई करूंगा। चांद कुए में से बाहर निकले भी कैसे। गुलाम नबीर ने कहा तू नहीं निकलेगा 33:34 लेकिन मैं तुझे निकाले बिना जाऊंगा भी नहीं, और रोजा भी मैं भी नहीं खोलूंगा और लोग भी नहीं खोलेंगे। मैं ऐसा आदमी नहीं कि 33:40 तुझे छोड़ दू। मैं बड़ा कार्यकरता हूं, मैं विशेष आगेवान हूं, तेरे को बाहर 33:46 निकाल के ही छोडूंगा। महाराज रस्सा वस्सा इकट्ठा किया और फांसा लगाया डाला कुए में 33:52 पानी हिला बोले अब हिलता है,घबराता है, लेकिन बाहर नहीं आता है। जरा सा तो मान 33:58 अ लो घबराए तोही मानतो कापे से तो नथी मानतो 34:03 


        महाराज हर एक की दुनिया अपनी अपनी होती है। जगत कैसा है मत 34:10 कहो। दुनिया कैसी है उसका कोई बयान मत करो। देखने वाला कैसा है, जैसा देखने वाला 34:18 है उस समय जगत ऐसा है।  कीड़ी की नजर में जगत अपना, कौवे की नजर में जगत निराला, हाथी 34:23 की नजर में जगत निराला, मछियो का जगत निराला चूहों का जगत निराला, संसारियो  का जगत 34:29 निराला, साधक का जगत निराला, कोई जैनी जा रहा है और उसने देखा 34:37 किसी सन्यासी को उसके लिए व साधु साधु नहीं। जेनी के पास कोई बुद्ध पुरुष बैठा है, 34:43 जैनी के पास कोई कबीर बैठा है, कबीर की अपनी मान्यता है कबीर का अपना अनुभव है, 34:49 और जैनी तो कहेगा कि   साधु तो उसको कहेंगे जो फती बाँधे उबला हुआ पानी पिए, और घर बार छोड़ा हुआ हो, नंगे पैर हो। कबीर ना नंगे 34:56 पैर है, ना उबला हु पानी पीते, न ही घरबार छोड़ा है। 


        जैनी की नजर में कबीर कबीर नहीं 35:02 है, नानक कोई संत नहीं है। ऐसे ही वागरी के पास से कोई नानक गुजर 35:10 जाए, अथवा कोई जैनी फकीर, सच्चा संत गुजर जाए ठीक है। आ तो उघरा प पर तो ख पन आवा हम 35:17 तो मर माय बाप रो बावा थ जा मजा उसके लिए साधु होना, लड्डू खाने के लिए साधु होना है, 35:24 उसके लिए साधु होना कोई लक्ष्य नहीं है। तो वागड़ी की दृष्टि अपनी है, जैनी की दृष्टि अपनी है, 35:30 हिंदू की दृष्टि अपनी है, मुसलमान की दृष्टि अपनी है, और हिंदुओं में भी हर एक व्यक्ति की अपनी अपनी निगाह है। एक कुटुंब 35:37 में पांच आदमी है और पांचों आदमी की अपनी अपनी निगाह से वह संत को देखते हैं, भगवान को देखते हैं। तो दृष्टि रेव सृष्टि जैसी 35:45 दृष्टि ऐसी ही सृष्टि होती है। जिस काल में जैसी दृष्टि उस काल में ऐसी सृष्टि। अपने 35:51 आश्रम के साधक जो भूत पूर्व मिनिस्टर जानते ना कर्षण भाई। कर्षण ने मेरे को कहा एक 35:58 बार के बापू आ तो ठीक छ लासा बापू ना दर्शन ने आप म पहला तो 36:06 मारी दृष्टि जुी हती साधु जोतो मने मार लो उ मा देश जो सत्यानाश कर तो 36:17 कर देश जो सत्यानाश यो हो तो साधु कर जा अ खबर पड़ी साधु ना हो तो होते 36:28 संसार में तो जल मरता संसार। मिनिस्टर हजारो वि क दरोज छपा मा कोई आवे बीज कोई 36:35 थाय विरोधियो क था तो वेदांत सत्संग साभ पछ संत ना होने तो खरेर जीवाने मजा न 36:43 मरवाने मजा न मार अनुभव क अनुभव साच अने अत्यार 36:49 सीमा वो कोई समय था जिस समय साधु ऐसे लगते आप बोलते कि पहले की दृष्टि हमारी छोटी थी। 36:57 लेकिन और कुछ ऊंचे बढ़ोगए तो आज भी जो तुम्हारी मान्यता है वह भी कुछ छोटी दिखेगी, तो जैसे 37:04 जैसी तुम्हारी योग्यता बढ़ती जाती है, जितनी जितनी वासना कम होती जाती है, 37:10 इच्छाएं कम होती जाती है, और आप अपने आप में आते रहते हो, घर में आते रहते होज़ उतना 37:16 उतना आपको ख्याल होता है कि जीवन कितना मूल्यवान है। सत्संग कितना मूल्यवान है, और फकीर का शब्द कितना मूल्यवान है। 


         गुलाम नबीर ने क्या करा जरा बता दूंगा फ़ासा डाला खूब हिलाया  आपने डोल बोल फ़ासा 37:32 बिलाड़ी ना फेर अंदर फासो फेरने फिर फिर कोई चट्टान में फस गया, गुलाम नबीर के यार अब 37:41 तो तेरे को फसाया तो है निकाल के ही छोडूंगा। जोर मारा चट्टान से जोर क्या चलता है, बोले कुछ 37:47 भी हो मैं तेरे को निकाल के छोडूंगा, खूब खीचे, खूब खीचे खूब खीचे, लेकिन चट्टान भी 37:54 चट्टान थी, कोई भारी थी। महाराज निकल  नहीं रहा, पसीना पसीना करो बोले मैं मर्द की औलाद 38:02 हूं, मैंने अपनी मां का दूध पिया है, अब तू कौन है, मां क्या है, दूध क्या है, तू नहीं 38:08 जानता केवल सुना सुनाया है मां का दूध पिया है ये सब अहंकार के खेल है। मैं मारी 38:14 मान दूध पी दू छ आई जाते तारी बान दूध पी तो महाराज दो पाच दस झटके मारे और झटके 38:22 मारे तो रस्सी टूट गई और पीठ के बल से वो बेचारा जा गिरा, जाग गिरा  तो मूर्छित हो गया 38:30 कुछ घड़ियों के बाद मूर्छा खुली और आंख खोलीतो देखा कि आकाश में। बोले ठीक है थोड़ी 38:36 सी चोट लगी है लेकिन तेरे को लाकर रख दिया, तेरे को लाकर मैंने रख दियाज़ मैं कोई 38:42 जैसा तैसा आदमी नहीं हू।


         तो जो अपने आप में नहीं होता उसको मन 38:50 कितने कितने धोखे देता है। फिर गुलाम नबी हो कि घेइमल हो। किसी जाति व्यक्ति की बात नहीं है जब 38:58 तक हम अंतर्मुखी  नही हुए, तक तक कार्य ओर काण भाव को हमने नही जाना तो घटना घटेगी  39:05 प्रकृति में अनुकूल और थोप लेंगे मैंने किया। होगी प्रतिकूल कर देंगे कि इसने 39:13 किया।


         महात्मा बुद्ध का कोई 39:19 शिष्य जा रहा था, शिष्य का शिष्य दोनों जा रहे थे। 39:27 एक सांप तड़प रहा था, पेड़ के 39:33 नीचे, पास में कहीं थोड़ा दूरी पर तलाव था, वो सांप तड़फता तड़फता, ना मरता है, ना जीता है, 39:40 किड़ियाने घेर लिया  है और ऐसी बुरी हालत शिष्य ने देखकर गुरु से पूछा कि, भगवन 39:49 इसने ऐसा तो कौन सा कर्म किया होगा इतना तड़फ रहा है और किड़िया उसको 39:55 इतनी चिपक गई है अदमुआ हो गया ना मरता है, ना जीता है, इसको देखकर बड़ी करुणा 40:02 होती है।


         गुरु ने कहा कि कुछ महीने पहले अपने यहां से गुजरे थे और तुझे याद 40:09 होगा एक मच्छीमार तलाव पर मच्छिया मार रहा था, जो सामने तलाव है और तूने उसे रोका भी 40:16 था हिंसा मत कर, मत कर्म की जाल बून, लेकिन उसने तेरी बात उड़ा दी और हंस लिया, वही 40:23 मच्छी मार साप हुआ है और वो जो मच्छिया है वो किड़िया हुई और एक दूसरे को सताते हैं। 40:29 उसने उनको सताया उनको सताता कर्म की गति चालू है। कर्म नाश नहीं 40:34 हुए।


         वो मच्छिया को आटा डालता तो मच्छिया और कुछ बनकर उसको भी खिला देती, लेकिन खाने 40:40 वाला और खिलाने वाला दोनों की यात्रा चालू रहती अंत नहीं होता जन्म मरण के चक्कर का। 40:47 अशुभ तो बाँधता है लेकिन शुभ का कर्तृत्व भी बाँधता है।


         कर्म किए बिना रह तो नहीं 40:53 सकते कर्म तो करना लेकिन कर्तृत्व तुम्हारे में नहीं आए देखा आंख ने लेकिन 40:59 आरोप कर लिया मैंने देखा, सुना है कान ने वृत्ति के द्वारा मैंने सुना, सोचा है 41:05 विचारा है मन ने मैंने विचारा है, निर्णय किया है वृत्ति बुद्धि वृत्ति ने मेरा 41:10 निर्णय है, तुमने अन्न जल खाया शरीर से पसार हुआ वो जिवड़ा माता के गर्भ में राके 41:16 मारो दीक पैसो मारो परमेश्वर बैरी मारी गुरु छोकरा छैया साल ग्रम बाप जी पूजा को  नहीं करो। 


         जीवन इतना अल्प हो जाता है जीवन इतना 41:28 नपा तुला हो जाता है कि हमको पता ही नहीं कि हम किसलिए जीते हैं, ईमानदारी से देखो 41:34 तो हर जीव जीता है मुक्त होने के लिए, पढ़ते किस लिए हैं पास होने के लिए, पास 41:41 किस लिए होना चाहते हैं कमाने के लिए, कमाते किस लिए खाने के लिए, और खाते किसके लिए जीने के लिएज़ जीते किस लिए 41:50 हैं मरने के नहीं, मरना कोई नहीं चाहता। 


        चिड़िया भी मरना नहीं चाहती भैया, चूहा भी 41:56 मरना नहीं चाहता, जीते हैं मुक्त होने के लिए मनुष्य। लेकिन 42:01 हमारा मुक्त होना कैसे हमको किसी ने बंधन में डाला नहीं, हमारी मान्यताओं ने हमारी पकड़ो ने 42:08 हमको बंधन में डाल दिया। हमारी ऐसी प्रकार की पकड़े हो गई इस प्रकार की मान्यता हो गई समझते कोई आकाश पाताल में 42:15 भूत बैठा है,आकाश पाताल में देवी देवता बैठा, और वह मुक्त करेंगे। भूत के भय को हटाने के लिए ताबीज 42:23 रख लिया, ताबीज गुम ना हो जा उसका भय लगा है, 42:29 मैंने बताया था व कहानी एक आदमी मरने पड़ा बुलाया अपने धर्म गुरु 42:35 को, मुल्ला जी को बुलाया प्रार्थना कर रहा है कि खुदा ताला तू मुझे माफ कर देना, जो 42:42 कुछ हो गया मुझे क्षमा कर देना, थोड़ी देर में बोलता है कि हे शैतान तू भी मुझे माफ 42:49 कर देना, तो व धर्म गुरु पूछता है कि ये क्या घड़ी में शैतान से माफी मांगता है, 42:54 घड़ी में खुदा से माफी मांगता है, बोले पता नहीं ना मैं पूरा शैतान हूं ना मैं पूरा 43:00 इंसान हूं, पूरी शैतानियत भी नहीं किया और पूरा मैं ईमानदारी से भी नहीं जी सका।


         मैं सच कहता हूं कितना भी धार्मिक आदमी हो 43:06 कितना भी सच्चा हो कितना भी पवित्र हो फिर भी गहराई में उसको पूर्ण पवित्रता का अनुभव नहीं होगा, क्योंकि पूर्ण तो एक 43:13 परमात्मा है कर्ता कभी पूर्ण हो ही नहीं सकता है। 


        ज्ञानसूत राजा ने सपने  में 43:22 देखा कि हंस कह रहे हैं कि ज्ञानसुत का तेज क्या है, मैं तो रैंक मुनि के तेज जो 43:29 दूसरों को शांति और शीतलता देने वाला हैज़ दूसरों के अहंकार को परमात्मा में मिटाने वाला है, जो दूसरे के सत्ता और सामर्थ्य 43:37 ईश्वर के साथ एक कराने वाला, ऐसे रैंक मुनि के तेज में मैं बिचरता हूं। ब्रह्मवेताओं के 43:43 तेज में बिचरता हूं ज्ञानसूत के तेज में नहीं बिचरत  हूं। ज्ञानसूत ने सुना रैंक मुनि के 43:49 पास गए 600 अशरफिया वापस दे दी, रैंक मुनि नाराज हो गए हैं अब क्या किया जाए, जांच 43:56 करते करते पता चला कि रैंक मुनि कैसे प्रसन्न हो, आदमी लगा दिए पीछे, जिस हेतु 44:02 जिस कारणों से रैंक मुनि प्रसन्न हो वे कारण उन्होंने खड़े कर 44:09 दिए, रैंक मुनि के चरणों में एक गांव भेंट कर दिया। रैंक मुनि का जो जो जैसा रैंक 44:15 मुनि को अनुकूल लगे ऐसा उन्होंने वातावरण कर दिया, और रैंक मुनि रैंक परण नाम गांव 44:21 का रख दिया। कहा कि भगवान अब ये गांव तो मैंने आपके चरणों में अर्पण किया और मेरा सिर आपके चरण में अर्पण है मैं और मेरा 44:28 राज्य कुछ भी नहीं है ब्रह्मविद्या के आगे, तब रैंक मुनि प्रसन्न हुए कि ये अपनी 44:33 मान्यता छोड़ना चाहता है। रैंक मुनि को गांव की जरूरत क्या। रैंक मुनि ने कहा कि राजन 44:39 तू अन्न धन यह देकर सबको अपना मानना चाहता है, या सबको मैं खिलाता हूं, लेकिन सबके 44:46 अंदर जो बैठा है उसमें यदि तू स्थिर हो जाएगा तो तेरे को अनुभव होगा, कि ब्रह्मा, 44:51 विष्णु, महेश का भी मैं उत्पत्ति और पालन करता हूं, मैं इतना महान हूं ऐसा तुझे ज्ञान हो जाएगा। 44:58 बाहर के साधनों से तू दाता बनकर तेरी असीमता में तू नहीं पहुंचेगा बाहर के धन से तू 45:05 पूर्ण धनी नहीं होगा, बाहर की सत्ता से तेरी पूरी सत्ता नहीं होगी, बाहर के राज्य 45:10 से तेरा पूरा राज्य नहीं मिलेगा। इसलिए कबीर कहते हैं दास कबीर चढयो गढ ऊपर राज 45:15 मिल अविनाशी तुम उस अचल को जान लो, फिर अचल की सत्ता से ब्रह्मा भी चल रहे हैं, विष्णु 45:22 भी चल रहे हैं, महेश भी चल रहे हैं, उस अचल चैतन्य का अनुभव कर लोगे तो तुम्हारा यह 45:28 धन, जन, सुख, संपत्ति जो सतीम है वो तुम्हें असीम मालूम होगी, तुम्हारा शरीर ना होते हुए 45:36 भी तुम रहते हो, और तुम ऐसे अखूट हो तुम ऐसे व्यापक हो कि सच पूछो सब तुम्हारा ही खाते 45:44 हैं, और सब तुम्हारे में ही जीते हैं, तुम इतने व्यापक हो। साक्षात्कार होता है तब 45:49 बुद्ध पुरुषों का यह अनुभव नहीं होता कि मेरा इतना आश्रम है। मेरे 2000 शिष्य हैं। 45:54 अभी 500 शिष्य हुए फिर 50 लाख होंगे, और 50 लाख शिष्यों का मैं 46:00 गुरु हु नहीं। जब तक ऐसा याद है उसको मैं 50 लाख शिष्यों का गुरु हूं तब तक वह महात्मा 46:06 नहीं व नेता है। धर्म का नेता हो सकता है, महात्मा को तो 50 लाख की सीमा नहीं होती 46:12 50 करोड़ की सीमा नहीं यह जगत नहीं, लेकिन इससे भी अनंत अनंत जो जगत है उन सब जगतो 46:19 का जो आधार भूत है वो महात्मा का अधिष्ठान महात्मा का अपना अनुभव। महात्मा को अनुभव 46:25 है कि तमाम तमाम आकाश गंगा मुझ में है, तमाम तमाम सूर्य मुझ में है, तमाम तमाम 46:30 चांद मुझ में है, तमाम तमाम दुनिया मुझ में हैज़ और मैं उनमें हूं, वे बदल जाते नाश होते, 46:37 लेकिन मैं नाश नहीं होता, आशाराम नाश हो सकता है लेकिन मैं नाश नहीं होता, महात्मा का अनुभव 46:45 बड़ा अनूठा हो जाता है।




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