अपने निज स्वरुप में जाग| Part-1
Ahmedabad - 16-10-1983
सत्संग के मुख्य अंश :
माया कैसी !... शहंशाह को भी दीन बना दे....
आत्मज्ञान के बाद राजा जनक की भावना, दृष्टिकोण..
यह ज्ञान व्यवहार में लाने से दु:खों से दूर करेगा !
सुख-दु:ख से दूर कैसे रहें ?
भोगी और योगी का अंतर.. इनसे ऊपर ज्ञानी.. कैसा होता है वह ?
मन की चाल को समझो.. कैसे वह आपको अपने आत्मतत्त्व से डीगाता है !
रणजीत सिंह की कहानी... इन 5 चोरों को सिर्फ गुरु ही भगा सकते !
राजा जनक ने उनकी परिक्षार्थ अष्टावक्र से क्या पूछा ?
वेदांत की महिमा.. सुनने मात्र से इतना फायदा !
सत्संग
0:00 आज मैं 0:01 अपने उस परम शत्रु को पहचान गया 0:05 हूं। शत्रु को पहचानते शत्रु ने शत्रुता 0:09 छोड़ दी है। परम मित्र हो गया 0:13 है ।हे दुनिया के 0:15 लोगो, तुम कहां सुख ढूंढने जाते 0:19 हो, आज मैंने पाया है वही जगह तुम्हारे लिए भी 0:24 है। राज्य तो एक व्यक्ति लिए है लेकिन यह साम्राज्य तो सबके 0:29 लिए है। 0:31 सत्ता तो एक व्यक्ति को मिल सकती है 0:33 मिथिला की, लेकिन परमात्मा तो सबको मिल 0:36 सकता 0:38 है। विषय सुख तो किसी किसी को मिलता है 0:42, लेकिन परमात्मा सुख को तो सब लोग ले सकते 0:45 हैं। हाय रे माया तो क्या जीवों को नचाती है, 0:51 सब शहंशाह होते हुए दीनता का स्वांग लिए हुए, 0:56 कंगाल की आवाज से भाग रहे हैं, यहां भागु ये 1:00 पाऊ, यह 1:01 पाऊ, पा पाकर सब छोड़ रहे हैं। ये माया तेरे 1:06 भी बड़े खेल हैं। हे मेरे 1:10 चित तेरे खेल आज खत्म 1:13 हुए, तू अपने राम में विश्राम को उपलब्ध 1:17 हुआ है, ओम 1:21 ओ ओम ओम ----|
1:31 इस प्रकार 1:32 जनक आत्मज्ञान को उपलब्ध 1:35 हुआ, इतने में दासी आई उसने कहा कि राजन 1:40 उठिए अब स्नान का समय हो गया है, रत्न 1:44 जड़ित घड़ों 1:45 में स्वर्ण के घड़ों में और कलश में 1:49 अलग-अलग तीर्थों का जल लाया गया है, आप 1:53 स्नान 1:54 कीजिए। जनक मन में ही सोचता है कि आज तो 1:58 सचमुच 2:00 मैंने परमात्मा तीर्थ में स्नान कर लिया 2:02 है, अब बाहर के तीर्थों का जल मिल जाए तो 2:07 क्या, न मिले तो क्या। बाहर के सुवर्ण घड़े 2:10 मिले तो क्या, ना मिले तो क्या ।खैर अब अपनी 2:16 चेष्टा को करूंगा। अब स्नान आदि करने से भी 2:19 मेरा आत्मा अनुभव बाहर नहीं जाता। अब मैं 2:23 नित्य कर्म करूं राज्य करूं फिर भी मेरा 2:27 मन अहंकार से आक्रांत ना होगा। मैं समाज 2:32 में रहूं फिर भी जगत की सत्यता अब मुझे 2:35 नहीं बासती। मैं देख रहा हूं कि सब सपने 2:38 के पुतले कठपुतली की नाई चेष्टा कर रहे 2:41 हैं, और जैसे सरोवर में पानी के बुद बुदे 2:46 उबस उबस कर लीन हो जाते हैं, ऐसे जगत जाल 2:50 और जंतु है, जैसे जलते 2:54 बुदबुदा उपजे बिन से नीत जग रचना तैसी रची 3:00 जान ले रे 3:01 मीत।
जैसे जल में बुदबुदा पैदा होकर लीन हो 3:05 जाता है ऐसे ही भूत जात पांच भूतों में 3:09 उत्पन्न हो होकर पर पोटो के नाई उत्पन्न 3:12 हो होकर लीन हो जाते हैं, उसमें मुझ आत्मा 3:16 का कुछ बिगड़ता नहीं। मेरे शरीर कई पैदा 3:20 हुए कई लीन हो गए यह अब आखिरी शरीर है, 3:24 साधु अब हम अमर हुए ना मरेंगे, यह शरीर सदा 3:28 के लिए परमात्मा में शांत हो जाएगा। अब 3:31 मेरी कोई वासना नहीं 3:34 रही। हे राघव इस प्रकार महिपति विचार करते 3:39 हुए, दासिया जो पानी के कलश और घड़े भर कर 3:43 आई थी, उन्होंने स्नान किया संध्या और 3:46 तर्पण किया, नित्य कर्म किए लेकिन आज के 3:50 नित्य कर्मों में उनकी कुछ नवीन ढंग और 3:52 चाल थी। आज तक तो मानते थे मैं कर रहा हूं, 3:56 लेकिन अब समझ रहे हैं कि यह देह के कर्म 3:58 है, मन के कर्म है, इनको सत्ता देने वाला 4:02 मेरा साक्षी आत्मा है। मैं कभी करता नहीं, 4:06 कभी मरता नहीं, कभी सोता नहीं, कभी जागता 4:10 नहीं, कभी आता नहीं, कभी जाता, नहीं सोने को 4:13 जागने को करने को मरने को सबको मैं देखने 4:17 वाला हूं ।इस प्रकार मही पति ने अपने ही 4:20 विचारों से अविचार को हटाकर परम् विजय को उप्लब्ध हो गए।4:28 हे राम जी तुम भी इस दृष्टि का आश्रय करो ।ज्ञानवान की 4:32 दृष्टि का आश्रय करके जो विचार करते हैं, 4:36 वह कुछ ही समय में ज्ञान को उपलब्ध हो 4:38 जाते हैं, और अज्ञानी हों की दृष्टि का 4:41 विचार करके जो आश्रय करते हैं, उनका अज्ञान 4:45 पक्का हो जाता है ।
हे राम जी जैसा मन सोचता 4:49 है ऐसा हो जाता है। मन के मनन 4:54 को छोड़ दो तो परब्रह्म हो जाता है, और मन 4:57 के मन के पीछे बहु तो जीव हो जाता है। इस 5:02 जीव ने कौन से कष्ट नहीं पाए ।कोलू का बैल 5:05 हुआ फिर भी दुखों से ना 5:07 छूटा ।मरुभूमि का मृग हुआ फिर भी दुखों से 5:10 ना छूटा ।पत्थर का कीड़ा हुआ फिर भी दुखों 5:14 से ना छूटा। हे राम जी ना धन से कल्याण 5:17 होता है, ना जन से कल्याण होता 5:20 है, ना मित्रों से कल्याण होता है, ना 5:23 शत्रुओं से कल्याण होता है। हे राम जी 5:26 संतों के वचनों से जितना कल्याण होता है 5:28 उतना तो स्वर्ग में भी कल्याण नहीं है ।5:31 फूलों के सैया पर सोने से भी उतना सुख नहीं 5:34 मिलता, जितना संतों के वचन सोचने और उसमें 5:38 डूबने से सुख मिलता है ।हे राम जी तुम भी 5:42 संतों की दृष्टि का अवलंबन लो ।साधु की एक 5:46 घड़ी समागम बड़ी बड़ी आपदाओं से पार कर 5:50 देता है, और दर्जनों के संग से जीव बड़े 5:53 बड़े कष्टों को पाता 5:56 है ।हे राम जी मैं भुजाएं 6:00 उठाकर चिल्लाता हूं, अज्ञानी जीवों को 6:04 बुलाता हूं, लेकिन हे राम जी मेरा कहना और 6:07 मेरा ज्ञान कोई नहीं समझ पाता। हे राम जी 6:11 जैसे केसरी सिंह पिंजरे से निकलने को 6:13 तत्पर हो जाता है, ऐसे ही तुम भी विचार से 6:18 अविचार को काटकर संसार समुद्र से निकलने में तत्पर हो 6:23 जाओ।
ओम ओम ओम ओम ओम 6:30 ओम ओम 6:34 ओम ओम ओम ओम ----|
नींद करते हैं नहीं जैसे आप 6:42 सपने में सुषुप्ति में आपको कोई खिंचाव 6:45 नहीं कुछ करना नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ 6:48 खोना नहीं, कुछ जानना नहीं, गहरी नींद में 6:51 आपको कैसा होता है, सुषुप्ति में कुछ नहीं 6:54 देवी देवता, अच्छा बुरा, अपना पराया सब 6:57 समाप्त,,, बिल्कुल आराम ऐसे ही जिसको जिन 7:01 महापुरुषों को बोध हो जाता है, साक्षात्कार 7:03 हो जाता है उनको जागृत अवस्था में भी अंदर 7:05 से कोई हेय उपादेय दौड़ धाम धूप नहीं। 7:09 प्रतीत प्रभाव में 7:11 जैसे कट पुतली अपने अंग हिलाती है, 7:14 सूत्रधार 7:16 की चेष्टा से, ऐसे प्राणों की इंद्रियों की 7:20 प्रारब्ध की परीक्षा प्रारब्ध की चेष्टा 7:22 से उनके काम हो जाते हैं ।शरीर की चेष्टा 7:25 हो जाती है खाना पीना, लड़ना झगड़ना, ये वो 7:28 अपना संकल्प कोई नहीं होता। ज्ञानी का 7:31 बे संकल्प सब काम होता है और अज्ञानी का 7:34 तो लंबे-लंबे संकल्प करेगा फिर भी कोई काम 7:36 होगा तो खुश, नहीं हुआ तो दुख, और बाकी अंत 7:39 देखो तो खुश जिसमें हुआ उस काम का भी नतीजा 7:42 कुछ नहीं और जिस काम के लिए दुखी हुआ उसका 7:44 नतीजा भी कुछ नहीं। अंत में राख और राख भी 7:47 समाप्त हो जाती है, तो ज्ञानवान को यह अनुभव 7:50 होता है कि सब सपना है सुख दुख, लाभ हानि, 7:52 गर्मी सर्दी उसमें सम रहता है। तो कल योग 7:56 वशिष्ठ में एक प्रसंग सुंदर आया था कि 7:58 वशिष्ठ बोलते हैं कि हेय उपादेय बुद्धि से 8:00 रहित होकर द्वंदो से परे होकर द्वंद माना 8:04 विपरीत जो, सुख है तो दुख है, लाभ है तो 8:07 हानि है, मित्र है तो शत्रु है, जीवन है तो 8:10 मौत का भय है, धन है तो निर्धनता का भय है, 8:14 सौंदर्य है तो कुरूप होने का भय है, यह सब 8:18 चीजें जो है ना द्वंद से घिरी है।
एक आत्मा 8:21 जो है वह निर्द्वंद है, तो सदा आत्मवान 8:25 होकर रहो, सदा सत्य संकल्प होकर रहो, सत्य 8:29 संकल्प कौन होकर रहेगा कि जो द्वंद में 8:31 नहीं बहता। जो द्वंद में नहीं बहता वो निर् 8:34 द्वंद है, और कृष्ण भी यही बात कहते हैं 8:36 वशिष्ठ जी भी यही बात कह रहे हैं कृष्ण 8:38 कहते हैं
द्वंदातितो भवा 8:41 अर्जुन त्रगुणा 8:43 विषया वेदा
वेद पढ़ोगे रीचाए पढ़ोगे याद रखोगे यह 8:46 भी यह भी आखिरी स्थिति नहीं 8:49 है। तीर्थों में जाओगे देवी देवताओं की 8:52 पूजा करोगे भगवान की पूजा करोगे भोगियों 8:55 से तो भगत ठीक है भोगियों से तो योगी ठीक 8:58 है, लेकिन साक्षात्कार तो भोगी और योगी दोनों 9:01 9:02 से परे की चीज 9:05 है ।भोगी में क्या फर्क और योगी में क्या 9:07 फर्क है, कि भोगी की वृत्ति इंद्रियों के 9:11 द्वारा जगत में फैलती है, और जिस जिस 9:13 इंद्रिय का सुख ज्यादा लेता है उस उसके 9:17 चिंतन में वह बार-बार बाहर भटकता है, 9:23 योगी अपने वृत्ति को शांत करता है, 9:27 । और भगत अपने वृत्ति को भाव में लाता है, 9:29 जितनी देर वृत्ति में भाव रहा उतनी देर 9:32 भगवान का भजन किया आनंद आया फिर भगत को भी 9:32 बचारे को। लेकिन ज्ञानी वृत्ति को ना भोगों 9:36 में आने देता है, ना कुंठित करता है, ना भाव 9:39 में आने देता है ज्ञानी सब वृत्तियों को 9:43 आत्माकार भाव में लाकर वृत्ति ब्रह्माकार 9:46 बनाकर वृत्तियों की भ्रांति को तोड़ देता 9:49 है ।वृत्तियां जिस चित्त से उठती उस चित्त 9:51 से पृथक हो जाता है।
तो चित्त और चैतन्य 9:56 में क्या फर्क है? अपने को जीव मानोगे तो 9:59 चित्त हो जाएगा, मन हो जाएगा और चि चंचल हो 10:02 जाएगा और अपने को ब्रह्म भाव में ले आओगे 10:05 तो चित्त शांत होने लगेगा। अपने को जीव भाव 10:08 में लाना यह चित्त का चालू करने की कुंजी 10:11 है, और अपने को ब्रह्म भाव में स्थित करना 10:14 यह चित्त को शांत करने की जगह है ।यह जरा ऊंचा 10:19 पल्ले सबको पड़ेगा भी नहीं फिर भी यह सुनने 10:22 से जो पुण्य होता है वह पुण्य हजार हजार 10:25 यज्ञों से भी उपलब्ध नहीं हो सकता। ऐसा 10:27 पुण्य है ये भगवत गीता के सात में अध्याय के 10:30 महात्म में लिखा 10:32 है, अवगत आत्माओं को भगवत गीता का सातवां 10:36 अध्याय सुना दिया जाता है और व उसका फल 10:39 उसको अर्पण करते हैं उनकी सद्गति होती है 10:42 और सातवा अध्याय में ज्ञान भरा है, तत्व 10:44 ज्ञान भरा है। सातवें अध्याय के तीसरे श्लोक 10:47 में है बहुनाम जन्मनां अंते बहुत जन्मों 10:51 के 10:52 बाद तीसरा श्लोक है मनुष्य नाम सहस्रेषु 10:58 कश्चित एदती सिद्धये हजारों मनुष्यों में कोई 11:02 सिद्धि के लिए प्रयास करता है, मूर्ख 11:04 मनुष्य तो मकान में, दुकान में, राग में रागिनी में, 11:07 में दोहो में उसमें उसमें उसमें संतुष्ट 11:11 हो जाते हैं उसी में अपने को कृतार्थ मान 11:13 लेते हैं । मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् एदती 11:18 सिद्धये, कोई विरला ही चित्त की शुद्धि 11:21 करने की सिद्धि पाता है । चित्त को शुद्ध 11:24 करने की कोशिश करता 11:26 है
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चित् एदती सिद्धये,
यतमामपी सिद्धानां कश्चित वेतिमाम तत्वतः 11:35
हजारों सिद्धों में हजार शुद्ध हृदय वालों 11:38 में, कोई विरला ही हजार एकाग्रता वालों में 11:41 कोई विरला ही मुझे तत्व से जानने की कोशिश 11:44 करता है, तत्व से जानता है। है तो बात ऊंची 11:47 लेकिन यह ऊंची बात भारत 11:51 में माताओं 11:54 के गोद में दूध पीने वाले बच्चों को सुनाई 11:57 जाती थी ।12:00 बचपन में ही सुनाई जाती थी। तू शुद्ध है, तू 12:03 बुद्ध है, तू आत्मा है, तू चैतन्य है, जागमोह 12:06 निद्रा मदालसा उवाच। अभी तो ऐसा समझते है कि आ हा 12:11 बापन ज्ञान तो बहु चच छ बापनी वाणी तो बहु 12:15 ऊंचा लेवल छ जन साधारण समझी अमारी जम चाले 12:20 छ ने मा पछ बापने ऊंची वाणी लोको विचार 12:23 करता 12:24 थ 12:26 के बापू बहु क बहु हाई लेवल छ मैं कैस 12:32 साड़ी छ बापनी बहु ऊच छ बहु ऊच बहु ऊच छ 12:36 तो कोना माटे भूत प्रेत माटे छ बुआ भोपा 12:40 माटे छ कि भक्तो माटे 12:43 छ ओम 12:45 ओम
तो लोग तत्व ज्ञान को या यथार्थ बात को 12:50 बहुत अच्छी बहुत सच्ची, बहुत आखिरी बात है 12:52 बहुत ऊंची बात, है ऐसा करके भी मन उनको 12:54 वहां से भगा देता है। 12:59 और जब मन का एक स्वभाव है जिसको तुमने आज 13:03 तक तुम जिन आंखें पूर के बैठो तुम्हें वही 13:06 याद आएगा जो तुमने देखा है, जो तुमने चखा 13:09 है जो तुमने सुंगा है, जो तुमने खाया है,जो 13:13 तुमने खिलाया है, जो तुमने सुना है वही याद 13:16 आएगा उसके सिवाय नया कुछ याद नहीं 13:21 आएगा । तुम बैठ जाओगे ना तो ऐसा नहीं कि बैठ 13:24 जाओगे और मन एकदम चिपक जाएगा आत्मा में 13:26 नहीं बैठोगे तो कुछ ना कुछ चालू हो जाएगी 13:28 पट्टी। 13:31 कृष्ण कन्हैया 13:33 लाल तो तुमने जो देखा है जो सुना है 13:37 मुसलमान ने मोहम्मद को सुना है तो बैठेंगे 13:40 तो मोहम्मद बहुत भगत होगा तो मोहम्मद के 13:43 विचार विचार में मोहम्मद देखेगा, कृष्ण का 13:45 भगत कृष्ण देखेगा, राम का भगत राम देखेगा, 13:48 सिनेमा का भगत सिनेमा के सायरा बानू देखेगा ।13:51 तो 13:52 जो गलबा और सदा केरोसिन का डब्बा देखेगा 13:56 डेकला देखेगा। तो तुमने जो है, जो किया है, 14:00 वही तुम्हारा मन फिर से करता 14:02 है। अब बहुत ऊंचा बहुत ऊंचा यदि आत्मा का 14:06 नहीं सुना अपने परब्रह्म परमात्मा जो साथ 14:09 में निकट में है जिसको भगवान कदम कदम पर 14:12 जिसका उपदेश दे रहे हैं, राम जी हनुमान को 14:14 दे रहे हैं, कृष्ण अर्जुन को दे रहे हैं 14:16, वशिष्ठ जी राम को दे रहे हैं, अष्टावक्र 14:18 जनक को दे रहे हैं शंकराचार्य लों को दे 14:21 रहे हैं, राम तीर्थ लोगों को दे रहे हैं, 14:23 तोतापुरी रामकृष्ण को दे रहे हैं, राम 14:26 कृष्ण विवेकानंद को दे रहे हैं, कबीर सलका 14:28 मलका को दे रहे है, नानक बाला और मर्दाना को दे 14:31 रहे हैं लीलाशाह आशाराम को दे रहे है, ओर आसाराम तुमको 14:33 दे रहे 14:35 हैं,
अब वो यदि तुम सुनोगे तभी तो तुम्हारे 14:39 में भाव आएगा कि मैं असंग हूं, निर्विकार 14:42 हूं, चैतन्य हूं, मुझ में बल भरा है । हनुमान 14:45 जी जैसे को जब उपदेश मिला कि तुम पवन सुत 14:48 हो, राम काज तुम रही देही, तुमने राम के काज 14:52 के लिए देही धरे, तब हनुमान को याद आया कि 14:55 मैं कुछ कर सकता हूं नहीं तो सुकड़ हुए 14:57 बैठे थे घबराए हुए। 14:59 तो तुम्हारे अंदर मैंने सुनी है छोटी मोटी 15:03 चुटकीली कहानी
एक थे रणजीत 15:06 सिंह। रणजीत सिंह रण में सबको जीत आते थे 15:11 नाम उनका था राजा वाजा नहीं थे क्षत्रिय 15:13 तो थे ही। सोए 15:17 थे पहले के जमाने में मकान ऐसे बनते थे कि 15:21 उस मकान को जो थलान होता था बाउंड्री वो 15:23 थोड़ी ऊंची होती थी, लेकिन चोरों के लिए 15:26 कितनी भी बाउंड्री ऊंची फर्क क्या पड़ता 15:27 है। चोर वो बाउंड्री को लांग गए और घर का 15:31 सामान पोटली बांधे, तो मिसस रणजीत जो थी 15:34 उसकी आंख खुली और पति को कहा कि वो अगले 15:38 कमरे में चोर आ गए हैं और तीन चार 15:43 हैं, सामान सब ले गए अब अपने को कुछ करना 15:47 चाहिए बोलते कितने बोले चार,, उसने कहा कि 15:50 पगली मेरे ऊपर रजाई उड़ा दे रजाई ढोका दे 15:57 बोले क्यों बो वो जा रहे मैं अकेला हूं म 16:02 जाऊंगा, मेरा क्या होगा भले ले जाए तो ले 16:05 जाए मेरा क्या होगा लेकिन पत्नी भी 16:09 तो क्षत्रिय घर की थी। मेरा पति रणजीत सिंह 16:14 और कायरता की 16:15 बात बोले,, आप क्या मजाक कर रहे हैं आपका 16:19 नाम रणजीत है रणजीत सिंह आपका नाम है अनम 16:23 कहने लगी और आप क्षत्रीय कुल में पैदा हुए, 16:25 आप तो खाली मेरी परीक्षा लेने को ऐसा कह रहे है,16:29 वरना मैं तुम्हारी पत्नी हूं मैं चाहूं तो 16:32 तलवार लेकर इनके पीछे झूम पडू तो इनके पैर 16:35 कच्चे होते हैं पराय घर में जो घुसा है ना 16:38 वो डरपोक होता है, अपने घर वाला निर्भय 16:41 होता है, तो अज्ञानी आत्मा को पराया समझते 16:44 इसलिए अज्ञानी डरते रहते हैं कहीं गलती ना 16:46 हो जाए, कहीं गलती ना हो जाए, कहीं ये ना हो 16:48 जाए । आपने देखा होगा शीशे में कोई प्रवाही 16:50 पदार्थ डालते हैं ना कहीं गिर ना जाए कहीं 16:52 गिर ना जाए, तो गलती होती रहती है तो 16:54 अज्ञानी हमेशा पराए घर में रहता है तो भय 16:57 भीत होता है । तो चोर जो है ना पराये घर में आए 17:00 है उनको पता है कि पराया घर है, वो को 17:02 ब्रह्मज्ञानी तो नहीं है कि निर्भय हो के 17:03 डटे रहेंगे। तो आप यह क्या कर रहे हैं और 17:07 आप अजीत सिंह है मेरे पति और इन मूर्खों 17:12 से, फकीरो से आप डर रहे हैं, यह कभी नहीं 17:15 हो सकता बोले ये तो मैं मजाक ही कर रहा था 17:17 लाओ मेरी 17:20 म्यान ले कर आओ उठाई म्यान हो हो कर तो चोर तो भाग गए 17:24 बोले देख कैसे भगा दिया, पत्नी ने कहा ठीक 17:26 है, याद मैंने दिलाया था ।17:31
उनके तो चार चोर थे और जगाने वाली पत्नी 17:35 थी, और तुम्हारे अंदर पांच चोर है जगाने 17:38 वाले गुरु है, बताओ तुम 17:41 जगो वेदांत बड़ा कठिन है हमारा दम नहीं है, 17:46 हे भगवान तू दया करना कृष्ण तू आजा संसार 17:50 में अंधेर हो गया। अरे वो थे तभी भी उनके 17:52 कुल में अंधेरा हो गया था वो कहते हैं कि 17:55 मेरे तत्व को जान लो बाकी क्रिया में 17:57 व्यवहार में तो होता रहता है। यदुकुल में ऐसा 17:59 अंधेर हो गया, रघुकुल में राम जी थे तभी भी 18:02 देखो, उथल पाथल ये हो । तो अवतार भी बोलते 18:06 हैं कि हम भी आते हैं तो कोई खास खास को 18:08 मर्दन सर्दन करके फिर हम चले जाते हैं ।18:11 हमारा कर्तव्य तो कोई खास विशेष काम को 18:14 सदा के लिए दुख निवृत्ति है, तो हमारे 18:16 उपदेश को आप मनन करके आप जग जाओ । इसीलिए 18:20 अवतार अपना कोई ना कोई ग्रंथ छोड़ के जाते 18:22 हैं ।संत भी अपना कोई ना कोई वचन छोड़ के 18:24 जाते है।रमण वाणी रह गई रमण गए लेकिन रमण 18:27 वाणी रह गई ।कबीर गये तो कबीर वाणी रह गई, 18:29 नानक गए तो नानक वाणी रह गई।तो जो बुद्ध 18:33 पुरुष 18:35 है बौद्धि ऋषि जो 18:39 गए तो सप्तसती रह गई, दुर्गा सप्तसती, तो 18:44 साक्षात्कारी के वचन रह जाते हैं अवतारों 18:47 के वचन रह जाते हैं और उनके वचन यही कहते 18:50 हैं कि तुम और हम एक ही है जगो ।म्यान पास में 18:54 ही है बुद्धि रूपी तलवार उसमें पड़ी है ।18:58 भाव रूपी म्यान तुम्हारी है उसमें से निकालो 19:00 बुद्धि रूपी तलवार और काटो कल्पनाओं को, 19:02 फिर देखो कहां तुम्हारे विकार रहते हैं, 19:05 विकारों में चिंताओं में रहने के लिए 19:07 बेवकूफी 19:09 चाहिए, बुद्धि ने तालू मारो तो तुमने दुख 19:12 थाए बुद्धि ने उपयोग करो तो दुख भागी जाए 19:18 लो।ओम ओम ओम ओम
धन अधिक होने से हम महान 19:24 नहीं हो जाते, सत्ता अधिक मिलने से आप महान 19:27 नहीं होते, मित्र अधिक मिल ने से आप महान 19:29 नहीं बनते, शरीर मोटा होने से आप महान नहीं 19:32 है, लेकिन आपकी समझ बड़ी होनी चाहिए ।
12 19:35 वर्ष का अष्टावक्र राजा जनक के दरबार में 19:38 जाकर खड़ा होता है कि तुमने सबको नजर केद 19:40 किया क्या बात है । जनक को बोलो कि 19:42 अष्टावक्र आ रहा है 19:44 तुमको प्रश्न का उत्तर देगा सिपाही ने कहा 19:48 कि तू 12 साल का लड़का 18 साल का पुक्त 19:50 माना जाता है, राज दरबार में 12 साल के 19:53 बच्चे को अलाउ नहीं है। बोले मैं 12 साल का 19:55 15 साल का ये मेरा शरीर है मैं नहीं 12 19:57 साल का ।मैं अनादि का हूं जाकर जनक को बोलो 20:00 और हिम्मत से जाकर कहा तो गए । जनक को बोला 20:03 जनक ने कहा इतना ऋषि कुमार इतना रणकार से 20:08 बोलता है चलो मैं आता हूं जनक आए पूछे कि 20:10 ऋषि कुमार आप तो शिशु हो, आप तो छोटे हो, 20:13 आप मेरा प्रश्नों का उत्तर कैसे 20:16 दोगे। बोले राजन मेरा देह छोटा है मैं छोटा 20:20 नहीं, मैं अनादि काल का 20:22 हूं, मेरा आत्मा अनादि काल का 20:27 है, राजा ने 20:31 पूछा ऐसा कौन सा जीव है कि आंखें बंद नहीं 20:34 करता है, सोते 20:36 समय और । ऐसा कौन है कि सोते हुए भी जगता 20:40 है । ऐसा कौन है कि जगते हुए भी सोता रहता 20:45 है और हे ऋषि पुत्र ऐसा कौन है कि जिसको 20:49 पाए बिना इस जीव को विश्रांति 20:52 नहीं, और इस जीव ने उसको कभी खोया भी 20:56 नहीं ऐसा कौन सा तत्व कि जिसको पाए बिना 21:00 इसको कभी विश्रांति नहीं मिलेगी। सब मिल 21:02 जाए लेकिन वह चीज नहीं पाया तो आप खाली के 21:08 खाली। और कभी तुमने वह खोया नहीं सदा 21:11 तुम्हारे पास 21:12 है सदा साथ में और फिर भी मिला नहीं और जो 21:15 मिला हुआ 21:17 है, फिर भी ना मिले के नाई भासता है वह कौन 21:21 तत्व है? अष्टावक्रने कहा कि मछली सोती 21:24 नहीं और दृष्टा सदा जागता रहता है । 21:28 उसको पाने के लिए उसको पाने के बिना जो 21:32 कुछ पाया वह व्यर्थ है, और वह कभी दूर है 21:34 नहीं उसको कभी तुमने खोया नहीं । नानक ने 21:37 इसी बात को अपनी भाषा में कहा
पायो कहे सो बावरा, खयो कहे सो कुर
पायो खयो कुछ नहीं नित्य एक रस भरपूर
केवल कल्पनाओं की 21:47 मान्यताओं की परत हटानी है पाना 21:50 नहीं है ।मान्यता की परते हटानी है तो समझ से 21:53 हटेगी, विचारवान आदमी दुखी नहीं होता है और 21:56 अविचारी आदमी कितना भी पाकर सुखी नहीं रहता 22:00 कुछ ना कुछ लगी पैया है। कुछ ना कुछ मुसीबत 22:03 इंदी ही आहे पछाड़ी जो मौत 22:06 बईठी आहे श्री 22:07 राम,, नानक दुखिया सब संसार। सुखी बसे मिस्की 22:12 ना जिन नाम आधार । जिनको उस तत्व का आधार 22:16 मिल गया नाम का आधार मिल गया, आत्मा का 22:18 ज्ञान मिल गया, गुरु की करुणा और कृपा का 22:20 प्रसाद जिसने पचा लिया, वो तो सुखी होता है 22:24 बाकी के लोग तो मजूरी कर कर के मर जाते है, 22:26 22:28 अष्टावक्र बोलते हैं जनक को, जनक खुश हो जाते 22:32 हैं और जनक को राज दरबार में ले जा रहे 22:34 हैं।। 12 वर्ष का ऋषि पुत्र बड़े बड़े 22:38 विद्वानों को भी नीचे दिखाकर आत्म ज्ञान 22:41 कराकर, रवाना हो जाते है । भारत का 12 वर्ष का 22:44 लड़का राज्य दरबार में तत्व ज्ञान का 22:47 उपदेश दे आता है, और अभी तो 50 50 साल के 22:51 लोग बापन जन हाई लेवल बहु ऊच ने गया आपने 23:00 बस हम बहु ऊंच बहु ऊंच छ पर ें चौच मारो 23:04 के 23:06 मैं ओम ओम ओम ओम है तो
वेदांत माना वेद का 23:13 अंतिम हिस्सा 80000 मंत्र कर्मकांड के हैं, 23:17 16000 मंत्र उपासना कांड के हैं, 4000 23:20 मंत्र वेदांत के हैं, वेदांत को बार-बार 23:23 सुनो समझ में आए चाहे नहीं आए और श्रद्धा 23:26 पूर्वक सुनोगे तो 80000 मंत्र कर्म का के 23:28 करने का फल हो जाता है, श्रवण 23:31 मात्रण उसका मनन करो तो 16000 मंत्र जो 23:35 उपासना कांड के उसका काम हो जाता है, और 23:38 मनन करते करते बुद्धि को उसी ज्ञान में 23:40 उसी विचारों में ध्यानस्थ कर दो तो नित 23:44 अध्यास का काम पूरा हो जाता है, बाद में जब 23:47 छटपटाहट होती है कि हमारा वास्तविक स्वरूप 23:50 क्या है अच्छा जब तुमने श्रवण किया, मनन 23:53 किया, नित अध्यास किया, तो पहले 23:56 के महाराज तुम नित अध्यासन ना करो मनन ना करो 24:01 केवल तुम अनजाने में भी वेदांत बार-बार 24:03 सुनते हो तो पहले की अपेक्षा तुम्हारी 24:05 बेवकूफी कम हो जाती है । पहले जो दुख की चोट 24:08 लगती थी, अपमान की चोट लगती थी, सुख की 24:12 आकर्षण, होती थे, संसार में सत्यता दिखती थी 24:15 बार-बार सुनोगे ना वेदांत को तो अपने आप 24:17 हटने लगेगा ।वेदांत अंतिम भाग और गहरा असर 24:20 करता 24:22 है। ऊपर ऊपर का करोगे भावुकता थोड़ी देर 24:25 रहेगी और भावुकता थोड़ी देर रहेगी ।भाव 24:27 बदला तो फिर सब गया लेकिन यह वेदांत गहरा 24:30 ज्ञान है। गहरा असर करता है सदियों तक इसका 24:33 असर चलेगा । तुम ज्ञान के रास्ते चलते चलते 24:36 यदि ज्ञान की चार भूमिका तय नहीं कर पाए 24:39 पहली भूमिका में भी यदि शरीर शांत हो गया 24:42 तो इंद्र पदवी तुम्हारे लिए तैयार है, 24:45 दूसरी भूमिका में शरीर शांत हो गया तीसरी 24:47 में तो ब्रह्मलोक में आप ब्रह्मा जी 24:50 रहेंगे, तब तक आप लहर से रहे यदि आपको 24:54 तीव्रता है तो ब्रह्मलोक छोड़कर फिर योगी 24:56 के घर आओगे और तीव्रता नहीं है तो जब का 24:58 अंत होगा तब आपको ब्रह्म साक्षात्कार होकर 25:01 सदा के लिए मुक्त हो जाए, ज्ञान एक ऐसी 25:04 ऊंचे में ऊंची भूमिका है।
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